शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

‘उर्वशी’ : आभा है निखिल भुवन की




"नहीं, उर्वशी नारि नहीं, आभा है निखिल भुवन की;
रूप नहीं, निष्‍कलुष कल्पना है स्रष्‍टा के मन की।" (उर्वशी, पृ.17)


रामधारी सिंह ‘दिनकर’(30 सितंबर, 1908 - 25 अपैल, 1974) का साहित्यिक व्यक्‍तित्व राष्‍ट्रीय आंदोलन की इतिहास यात्रा से जुड़ा हुआ है। उनका समय नवीन आयामों के विकास का समय था। उन दिनों स्वाधीनता आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था। ‘वंदे मातरम्‌’ के उद्‍घोष ने जनमानस में राष्‍ट्रीयता की चिनगारी को जगा दी थी। इन सभी परिस्थितियों से प्रभावित होकर दिनकर ने अपने समूचे अस्तित्व को राष्‍ट्रीय अनुभूतियों के अधीन कर दिया तथा पौरुष का शंखनाद और क्रांति के अंगार लेकर वे साहित्य में उतरे।


पौरुष के प्रतीक, अनल के कवि, मानवता के पक्षधर दिनकर ने जन-जागरण की काव्यधारा को भी तीव्र एवं प्रहर बनाया। उनकी कविताओं में योद्धा का गंभीर घोष, अनल का सा तीव्र ताप और सूर्य का सा प्रखर तेज विद्‍यमान है। जीवन की हर स्थिति में उनका कवि रूप ही जीवंत और प्रखर बना रहा। राष्‍ट्रीयता उनकी कविता का मूल स्वर है। उनकी कविता किसी क्षणिक उत्तेजना या तात्कालिक आवेग की कविता नहीं अपितु स्वदेश की मिट्‍टी को दहकानेवाली, हिमगिरि को पिघलानेवाली और गंगा के पानी को खौलानेवाली शाश्‍वत कविता है।


दिनकर का पौरुष और क्रांति का तेवर ‘रेणुका’. हुँकार’, ‘सामधेनी’, ‘कुरुक्षेत्र’,‘रश्‍मिरथी’ से होते हुए ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में नए रूप में सामने आता है। इन काव्यों की मूल समस्या युद्ध है। स्‍वाधीनता के संघर्ष में जूझ रहे भारत के ‘युगचारण’ कहे जानेवाले दिनकर का क्रांतिकारी तेवर ‘उर्वशी’ में एक सुंदर मोड़ लेकर प्रेम की रागात्मिकता और अनोखे ‘कामाध्यात्म’ में परिवर्तित होता दिखाई देता है। कई आलोचकों ने इसे एक आकस्मिक घटना माना लेकिन स्वयं दिनकर ने कहा - "माचा पर बैठे बैठे टीन बजाते बजाते थक गया हूँ। अब कुछ ऐसा लिखना चाहता हूँ जिसमें आत्मा का रस अधिक हो।" (कुमुद शर्मा; हिंदी के निर्माता; पृ.323)


"पढ़ो रक्‍त की भाषा को, विश्‍वास करो इस लिपि का;
यह भाषा, यह लिपि मानस को कभी न भरमायेगी,
***** ***** *****
रक्‍त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी
क्योंकि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है।" (उर्वशी; पृ.45-46)


इस उद्‍घोष पर आधारित काव्य रूपक ‘उर्वशी’ का प्रकाशन 1961 में हुआ। इसमें पुराण प्रसिद्ध पुरूरवा और उर्वशी की कथा संकलित है। नाटक की भाँति पाँच अंकों मे विभक्‍त इस काव्य रूपक के प्रत्येक अंक में स्थान स्थान पर रंगमंचीय संकेत भी अंकित है। ‘उर्वशी’ कवि की समसामयिक विचारधारा के साथ साथ उनके जीवन दर्शन की भी द्योतक है। कवि ने नर-नारी की प्रेम समस्या पर अत्यंत गंभीरता एवं सूक्ष्मता के साथ विचार किया है। ध्यान देने की बात है कि उन्होंने सौंदर्य और आसक्‍ति तथा कर्तव्य और प्रेम में कोई अंतर नहीं किया है।


‘उर्वशी’ के प्रथम अंक में विभिन्न पात्रों के द्वारा वर्णित घटनाओं तथा उनकी विचारधाराओं में उसके प्रतिपाद्‍य की स्थापना हुई है। प्रारंभ में पुरूरवा की राजधानी प्रतिष्‍ठानपुर के बगीचे में अप्‍सराएँ आती हैं। यहीं उनके द्वारा पुरूरवा और उर्वशी के स्वर्ग में प्रथम दर्शन और उससे उत्पन्न प्रेम का पता चलता है। द्वितीय अंक में पुरूरवा की महारानी औशीनरी को उर्वशी और पुरूरवा के प्रेम संबंध का समाचार मिलता है। इस अंक में दाम्पत्य और परकीय प्रेम की तुलना की गई है। चेतन और अचेतन स्तर पर प्रेम के विविध रूपों का विश्‍लेशण किया गया है। तीसरे अंक में पुरूरवा और उर्वशी विश्‍व-नर और विश्‍व-नारी के प्रतीक बन जाते हैं। वे दोनों गंधमादन पर्वत पर विहार करते समय स्त्री-पुरुष प्रेम के विविध गहन अनुभव प्राप्‍त करते हैं। यहाँ दर्शाया गया है कि मनुष्‍य होने के कारण पुरूरवा भौतिकता और अध्यात्म के बीच झूलता है और प्रेम के अनुभव को अशरीरी स्तर तक ले जाने के लिए चेतन और अचेतेन स्तर पर क्रियाशील रहता है। चौथे अंक में उर्वशी अपने नवजात शिशु को च्यवन ऋषि की पत्‍नी सुकन्या को सौंप कर पुरूरव के साथ रहने लगती है। क्योंकि उसे यह शाप है कि पति और पुत्र नहीं, पति या पुत्र का ही सुख मिल सकता है। इस अंक में प्रकृति और पुरुष की एकानुभूति तथा संन्यास और प्रेम के बीच संतुलन की स्थापना का परिचय महर्षि च्यवन के माध्यम से दिया गया है। पाँचवे अंक में सुकन्या उर्वशी-पुरूरवा के पुत्र आयु को प्रतिष्‍ठानपुर ले आती है। भरतमुनि का शाप प्रतिफलित होता है और उर्वशी अदृश्‍य हो जाती है तथा पुरूरवा संन्यास ले लेता है। आयु का राज्याभिषेक होता है। औशीनरी उसे माँ का प्रेम देती है -( "बरस गया पीयूष, देवी! यह भी है धर्म क्रिया का/ अटक गयी हो तेरी मनुज की किसी घाट-अवघट में ,/ तो छिगुनी की शक्‍ति लगा नारी फिर उसे चला दे;/ और लुप्‍त हो जाय पुनः आतप, प्रकाश, हलचल से।" (उर्वशी; पृ.130)


‘उर्वशी’ में वर्तमान युग के व्यक्‍ति के अंतर्द्वन्द्व का चित्रण हुआ है। स्वयं दिनकर की दृष्‍टि में पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है और उर्वशी सनातन नारी का। उर्वशी पंचेंद्रियों की कामनाओं का प्रतीक है तो पुरूरवा इंद्रिय संवेदना से प्राप्‍त सुखों से उद्वेलित मनुष्‍य है। जिस प्रकार धर्म का उद्‍भव भय से और कला का जन्म काम से होता है, उसी प्रकार देवत्व की तृष्‍णा रूप के निराकार भाव से उपजती है। अतः ‘उर्वशी’ का कवि कहता है - "जीवन में सूक्ष्‍म आनंद और निरुद्‍देश्‍य सुख के जितने भी सोते हैं, वे कहीं-न-कहीं, काम के पर्वत से फूटते हैं। जिसका काम कुंठित, उपेक्षित अथवा अवरुद्ध है, वह आनंद के अनेक सूक्ष्म रूपों से वंचित रह जाता है।" (उर्वशी; भूमिका)


‘उर्वशी’ का मूल विषय काम एवं अध्यात्म के बीच सामंजस्य की खोज ही है। यह काव्य दर्शन और मनोविज्ञान द्वारा जीवन के कामपक्ष की व्याख्या करता है। काम या प्रेम के अनेक रूप हैं - भ्रातृ प्रेम, मातृ प्रेम, पितृ प्रेम, यौवनाश्रित प्रेम, शृंगारिक प्रेम, आत्म प्रेम तथा ईश्‍वर प्रेम। हम भली-भाँति जानते हैं कि मानव चेतना के आधार तत्व हैं - इंद्रियाँ, मन और आत्मा। मानव चेतना का संपूर्ण इतिहास शारीरिक काम से उद्वेलित है। ‘उर्वशी’ काव्य में काम के चार प्रतिनिधि रूप हैं - उर्वशी अतीन्द्रिय प्रेम से कुंठित होकर मानवीय प्रेम अर्थात्‌ ऐंद्रिक सुख की प्राप्‍ति के लिए मानव लोक में आती है। पुरूरवा द्वन्द्व से युक्‍त है चूँकि द्वन्द्व में रहना मनुष्‍य का स्वभाव है। पुरूरवा जिस मानवीय प्रेम का प्रतीक है वह ऐंद्रिय होकर भी आत्मिक है। महारानी औशीनरी का प्रेम संपूर्ण समर्पण का प्रतीक है तथा सुकन्या के प्रेम में काम का सफल रूप है। अर्थात्‌ काम का पूर्ण उपभोग तो है पर वह स्वतंत्र न होकर धर्म का ही अंग है।


‘उर्वशी’ में दिनकर ने नर-नारी प्रेम की अशरीरी आनंद लहर को प्रस्तुत किया है। उन्होंने इस बात पर बार बार बल दिय है कि प्रेम का जन्‍म काम में होता है, किंतु उसकी परिणति काम के अतिक्रमण में होनी चाहिए। इसलिए कवि कहते हैं - "रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं है" (उर्वशी; पृ.36) और यह प्रेम ‘सेक्स’ से भिन्न है चूँकि ‘सेक्स’ केवल शारीरिक स्तर की अनुभूति है जबकि प्रेम की अनुभूति में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों अनुभूतियाँ समन्वित रहती हैं। इसलिए दिनकर यह मानते हैं कि प्रणय अनास्क्‍ति के गंगाजल में स्‍नान कर पवित्र हो जाता है - "नहीं इतर इच्छाओं तक ही अनासक्‍ति सीमित है/ उसका किंचित स्पर्श प्रणय को भी पवित्र करता है।" (उर्वशी; पृ.34)


किंतु प्रेम की इस आध्यात्मिक अनुभूति को प्राप्‍त करना मानव मात्र के लिए सहज नहीं है। इसे पाने के लिए विषिष्‍ट होना चाहिए। अतः दिनकर ने उस विशिष्‍ट समन्वित नर को ‘कवि’ की संज्ञा दी हैं - "दाह मात्र नहीं, प्रेम होता है अमृत-शिखा भी,/ नारी जब देखती पुरुष को इच्छा-भरे नयन से,/ नहीं जगाती है केवल उद्वेलन, अनल रुधिर में ,/ मन में किसी कान्त कवि को भी जन्म दिया करती है।/ नर समेट रखता बाँहों में स्थूल देह नारी की,/ शोभा की आभा-तरंग से कवि क्रीड़ा करता है।/ तन्‍मय हो सुनता मनुष्‍य जब स्वर कोकिल-कण्ठी का,/ कवि हो रहता लीन रूप की उज्जवल झंकारों में।/ नर चाहता सदैव खींच रख लेना जिसे हृदय में,/ कवि नारी के उस स्वरूप का अतिक्रमण करता है।" (उर्वशी; पृ.47)


स्थूल से सूक्ष्म एवं लौकिक से अलौकिक की ओर प्रस्थान ही ‘उर्वशी’ काव्य का प्राण स्वर है। दिनकर ने दिव्य एवं उज्ज्वल प्रेम का निरूपण भी किया है - "देह प्रेम की जन्मभूमि है, पर उसके विचरण की/ सारी लीला-भूमि नहीं सीमित है रुधिर-त्वचा तक।/ यह सीमा प्रसरित है मन के गहन गुह्य लोकों में ,/ जहाँ रूप की लिपि अरूप की छवि आँका करती है,/ और पुरुष प्रत्यक्ष विभासित नारी-मुखमंडल में / किसी दिव्य अव्यक्‍त कमल को नमस्कार करता है।" (उर्वशी; पृ.47-48)


इस प्रकार दिनकर ने देह से उतपन्न होनेवाले प्रेम को रहस्य चिंतन तक पहुँचा दिया है। अर्थात्‌ उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि शारीरिक प्रेम से आत्मिक प्रेम पैदा होता है। नारी के रूप को ‘दिव्य अव्यक्‍त कमल’ अर्थात्‌ उदात्त बना देना वस्‍तुतः फ्रायड के मनोवैज्ञानिक उदत्तीकरण के तरह ही है। इतना ही नहीं उन्होंने नर-नारी के बीच विद्‍यमान अंतर को भी इस उदत्तता के आकाश में विलीन होते दिखाया है - "वह निरभ्र आकाश, जहाँ की निर्विकल्प सुषमा में ,/ न तो पुरुष मैं पुरुष, न तुम नारी केवल नारी हो,/ दोनों हैं प्रतिमान किसी एक ही मूलसत्ता के,/ देह-बुद्धि से परे, नहीं जो नर अथवा नारी हो।" (उर्वशी; पृ.48)


‘उर्वशी’ का तृतीय अंक वस्तुतः इस काव्य का मर्मस्थल है। पुरूरव और उर्वशी गंधमाधन पर्वत पर हैं, धरती और स्वर्ग के मध्य। पुरूरवा धरती का धर्म छोड़कर स्वर्ग के धर्म को ग्रहण करता है तथा उर्वशी स्वर्ग का धर्म छोड़कर आसक्‍ति की व्यथा को भोग रही है। प्रकृति से उद्‍भूत बिंब में भावों को अभिव्यक्‍त करने की गहरी शक्‍ति होती है। गंधमादन पर्वत का बिंब आँखों के सामने उभर कर आता है - "दमक रही कर्पूर-धूलि दिग्बधुओं के आनान पर,/ रजनी के अंगों पर कोई चंदन लेप रहा है।/ यह अधित्यक्‍ता दिन में तो कुछ इतनी बड़ी नहीं थी?/ अब क्या हुआ कि यह अनन्त सागर-समान लगती है?/ कम कर दी दूरता कौमुदी ने भू और गगन की?/ उठी हुई-सी मही, व्योम कुछ झुका हुआ लगता है।" (उर्वशी; पृ.51)


इस अंक में प्रेम की व्याख्या अधिक हुई है। पुरूरवा और उर्वशी आत्मज्ञापन करने लगते हैं कि ‘यह कर्म नहीं क्रिया है, क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है।’ बुद्धि और कामना के द्वन्द्व से उत्पन्न मनुष्‍य के अंतर्मन की झांकियों को दिनकर ने अपने विचार एवं कल्पना के माध्यम से बाँध लिया है। ‘उर्वशी’ की कथा को संयोजित करते हुए दिनकर ने ‘भूमिका’ में लिखा है कि "नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है। इस नारी का संधान पुरुष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते उसे मन के समुद्र में फेंक देती है, जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँचकर निस्पन्द हो जाता है। और पुरुष के भीतर एक और पुरुष है, जो शरीर के धरातल पर नहीं रहता, जिससे मिलने की आकुलता में नारी अंग-संज्ञा के पार पहुँचना चाहती है। इंद्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श; यही प्रेम की आध्यात्मिक महिमा है।" (उर्वशी; भूमिका)


इसमें संदेह नहीं कि ‘उर्वशी’ में प्रतिपादित काम और अध्यात्म के समन्वय के इस सिद्धांत की अनेक प्रकार से व्याख्या, विवेचन और आलोचना की जा सकती है; की गई है। लिकिन विवादों को किनारे करके यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि ‘उर्वशी’ साहित्य आकाश में वह नक्षत्र है जो निरंतर अपनी उदात्त एवं उज्जवल आभा से सहृदयों को आकर्षित करती रहेगी तथा प्रेमियों में निश्‍चल प्रेम की उत्तेजना, कर्मशील व्यक्‍तियों में निष्‍काम कर्म की प्रेरणा तथा सहृदयों में आत्मदान की भावना जगाती रहेगी -
"प्राण की चिर-संगिनी यह, वह्‍नि
इसको साथ लेकर
भूमि से आकाश तक चलते रहो।
मर्त्य नर का भाग्य
जब तक प्रेम की धारा न मिलती
आप अपनी आग में जलते रहो।" (उर्वशी; पृ.42)


`स्रवंति' राष्ट्रकवि दिनकर विशेषांक (मई , २००९) में प्रकाशित

लाल शॉल ओढ़कर मेरे घर आई एक रिवॉलवर




तेलुगु साहित्य जगत्‌ में आरुद्रा (31 अगस्त, 1925 - 4 जून, 1998) के नाम से विख्यात भागवतुल सदाशिव शंकर शास्त्री का जन्म विशाखपट्टनम्‌ में हुआ। आरुद्रा ने कविता, कथा साहित्य, नाटक, समीक्षा, आलोचना और गीत सहित अनेक विधाओं के माध्यम से समसामियिक परिस्थितियों को सशक्‍त रूप से उकेरा है।

महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आरुद्रा ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन (1943 - 1947) के समय इंटरमीडियट की पढ़ाई को तिलांजलि देकर रॉयल इंडियन एयरफोर्स में लिपिक के रूप में कार्यभार संभाला। तत्पश्‍चात्‌ उन्होंने संगीत पर अपना ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने चेन्नै से प्रकाशित ‘आनंदवाणी ’ नामक पत्रिका के संपादक के रूप में 1947 -1948 तक काम किया। उस पत्रिका में प्रकाशित आरुद्रा और श्री श्री (श्रीरंगम्‌ श्रीनिवास राव) की कविताओं ने निद्रा मग्न जनमानस को जगाया और उन्हें सोचने पर मजबूर किया।

आरुद्रा 1943 में स्थापित ‘अभ्युदय रचयितल संघम्‌’ (अरसम्‌ - प्रगतिशील लेखक संघ) के व्यवस्थापकों में एक हैं। उन्होंने आजीवन उस संस्था की अभिवृद्धि हेतु कार्य किया। कहा जाता है कि आरुद्रा ने अपने मामा श्रीश्री तथा ‘चासो’ के नाम से विखात चागंटि सोमयाजुलु से प्रभावित होकर मार्क्सवादी दृष्‍टिकोण को अपनाया।

आरुद्रा ने ‘त्वमेवाहम्‌’ नामक प्रतीकात्मक खंड काव्य का सृजन किया। ‘त्वमेवाहम्‌’ की रचना उन्होंने 1948 में रज़ाकरों (निजाम की सेना) के हाथ रौंदी और कुचली गई स्त्री के बारे में ‘कृष्‍णा’ पत्रिका में पढ़कर प्रतिकार स्वरूप की। उन्होंने तेलंगाना निज़ाम के निरंकुश शासन पर कुठाराघात करते हुए लिखा है - "ब्रेन लो स्टनगन्‌ला/ चेट्‍लु चिट्टेलुकलु ,/ चेरभड्ड आडवाल्लु ,/ चेद पुरुगुलु/ मदमेक्किन सोल्जरलु।" (त्वमेवाहम्‌; ब्रेन में स्टेनगन के समान है/ पेड़-पौधे और चूहे/ जंजीरों में जकड़े मनुष्‍य/ सलाखों के पीछे कैद औरतें,/ दीमकों जैसे/ अंकुशहीन सैनिक।)

आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि "एर्र शालुवा कप्पुकोनी/ मा इंटिकोच्चिंदी ओक रिवॉलवर।" (त्वमेवाहम्‌; लाल शाल ओढ़कर/ मेरे घर आई एक रिवॉलवर)

आरुद्रा ने कविता के लोकमंगलकारी रूप की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ‘कविता पथविहीन दग्ध मरुभूमि में शीतल जल और मीठे फल प्रदान करके आशा तथा आकांक्षा को जागृत करनेवाली शस्यश्‍यामल भूमि है।’ वे कोरी कल्पना को काव्य की उपकारिणी नहीं मानते। उन्होंने सर्वत्र यथार्थ को ही महत्व दिया है। उनके मतानुसार ‘हाथी दाँतों की मीनारों में बैठकर कल्पना करनेवाले जीवन के सही अर्थ को नहीं जान सकते हैं। यदि जीवन का सही अर्थ जानना है तो यथार्थ की भूमि पर उतरना ही होगा।’ उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई थी। परंतु भारत के अंग्रेज़ी शासन से मुक्‍त होने पर भी देशवासियों को कष्‍टों से मुक्‍ति नहीं मिली, यह देखकर उनका कवि-हृदय विकल हो उठा। कवि ने देखा कि हाशिए पर स्थित लोगों की हालत तब भी वही थी और आज भी वही है। उनका जीवन और भी दूभर होता जा रहा है। इससे उद्वेलित होकर आरुद्रा कहते हैं कि - "मना स्वातंत्रम्‌ मेडिपंडु,/ मना दरिद्रम्‌ राचपुंडु।" (हमारी स्वतंत्रता मीठा फल है,/ हमारी दरिद्रता कैंसर है।)

आरुद्रा की रचनाओं में ‘इंटिंटि पद्‍यालु’ (घर घर के पद), ‘रामुडिकि सीता एमवुतुंदि’ (राम के लिए सीता कौन हैं?), ‘गुडिलो सेक्‍स’ (मंदिर में सेक्‍स) और ‘जानपदा जावली’ (लोकसाहित्य) आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी यह भी बहुत बड़ी देन है कि उन्होंने व्यावहारिक भाषा में ‘समग्रांध्र साहित्यम्‌’ (समग्रांध्र साहित्य - 13 खंड) का सृजन किया। तेलुगु साहित्य के क्षेत्र में यह कृति मील का पत्थर है।

जिस प्रकार गांधी जी अंग्रेज़ी के खिलाफ नहीं थे, बल्कि अंग्रेज़ियत के खिलाफ थे, उसी प्रकार आरुद्रा भी अंग्रेज़ियत के खिलाफ थे। उनकी कविताओं में अंग्रेज़ी - तेलुगु कोड मिश्रण की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यथा - "कावाली कविता हृदयानिकि नरिशमेंट,/ कारादु एनाडु मेदडुकु पनिशमेंट" (बनाओ कविता को हृदय का नरिशमेंट,/ मत बनाओ उसे मस्तिष्‍क के लिए पनिशमेंट।)

उन्होंने लगभग 400 से अधिक फिल्मी गीतों की रचना की जो आज भी तेलुगु सिनेमा दर्शकों के मुँह से अनायास ही ध्वनित होते हैं। 500 से अधिक फिल्मों के लिए पटकथा, गीत तथा संवाद लिखने का श्रेय आरुद्रा को प्राप्‍त है। अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से उन्होंने दर्शकों के हृदय में अपना ऐसा स्थान बनाया जो चिरस्थायी है। वे हमेशा कहा करते थे कि "कविता कोसम्‌ नेनु पुट्टानु,/ क्रांति कोसम्‌ कलम पट्टानु।" (कविता के लिए ही मैंने जन्म लिया,/ क्रांति के लिए ही मैंने कलम साधा।)

जनमानस में चेतना जगानेवाले आरुद्रा ने 73 वर्ष की आयु में 4 जून, 1918 को अपने पाठकों से चिरविदा ली।


बुधवार, 28 जुलाई 2010

तेलुगु काव्य प्रभा


आज के परिप्रेक्ष्य में अनुवाद एक अपरिहार्य सामाजिक आवश्‍कता बन गया है। दिन-ब-दिन इसका वर्चस्व बढ़ता ही जा रहा है। अनुवाद के माध्‍यम से सिर्फ भाषा का अंतरण नहीं होता बल्कि संस्कृति का अंतरण होता है। अतः अनुवाद को सांस्कृतिक सेतु कहा जता है। वास्तव में अनुवादक को दो भाषा समाजों के मध्य सांस्कृतिक राजदूत की भूमिका निभानी पड़ती है। इसमें संदेह नहीं कि अनुवाद के माध्यम से भारतीय साहित्य और संस्कृति को वैश्‍विक स्तर पर पहुँच और पहचान मिली है। साथ ही विश्‍व साहित्य भी भारतीय भाषाओं में अनूदित है। भारतीय भाषाओं के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी अनुवाद के माध्यम से हो रहा है।

आज की विचाराधीन पुस्तक पर चर्चा करने से पहले मैं एक और बात कहना चाहती हूँ। वह यह कि कहा जाता है कि गद्‍यानुवाद की अपेक्षा काव्यानुवाद कठिन कार्य है क्योंकि इसमें भाषांतरण मात्र से काम नहीं चलता, कविता का दूसरी भाषा में पुनःसर्जन करना पड़ता है। काव्यानुवाद करने के लिए अनुवादक के पास भी कवि हृदय अर्थात्‌ संवेदनशील हॄदय होना जरूरी है। तभी काव्यानुवाद मूल की भाँति पाठक को प्रभावित कर सकता है। ऐसा न होने पर अनूदित पाठ का जड़, नीरस और प्रभावहीन होने से नहीं बचाया जा सकता।

पिचले कई दशकों से आधुनिक तेलुगु कविताओं का अनुवाद हिंदी में प्रचुर मात्रा में हो रहा है। इसी कड़ी में सद्‍यः प्रकाशित पुस्तक ‘तेलुगु काव्य प्रभा’(2010) हमारे समक्ष है। इसके अनुवादक जी.परमेश्‍वर ने तेलुगु के 56 कवियों की 56 कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि डॉ.सी.नारायण रेड्डी, साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत एन.गोपि, प्रमुख दलित कवि कत्ति पद्‍माराव और मुस्लिमवादी कवयित्री शाजहाना से लेकर नवागंतुकों तक की कविताएँ इस संग्रह में संकलित हैं।

कविता तीव्र मनोभावों का सहज उच्छलन है। संवेदनशील कवि कविता के माध्यम से जीवन संघर्ष के अनेक चित्रों को उकेरता है। साथ ही, जीवन संघर्ष और सामाजिक चित्तवृत्ति के साथ कविता और उसकी अभिव्यक्‍ति में भी बदलाव आता है। पिछली शताब्दी में तेजी से बदलती प्रवृत्तियों के साथ साथ तेलुगु कविता भी बदली। कवियों ने समसामायिक स्थितियों को सरल भाषा में काव्यात्मकता के साथ अंकित करना आरंभ किया। इस संकलन की कविताएँ इस प्रवृत्ति का आइना पेश करती हैं। जी.परेमेश्‍वर द्वारा अनूदित इन कविताओं में एक ओर जीवन का सार प्रवाहित है तो दूसरी ओर दलित का आक्रोश। तेलंगाना की संस्कृति के साथ साथ उपभोक्‍ता संस्कृति का चित्र भी अंकित है। इतना ही नहीं प्लेटोनिक प्रेम भी है और पुरुष विमर्श भी।

सिनारे के नाम से प्रसिद्ध डॉ.सी.नारयण रेड्डी तेलुगु के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, समीक्षक, शिक्षाविद्‌, गीतकार, चिंतक और वक्‍ता हैं। वे किसी वाद के कटघरे में नहीं समाते। वे वस्तुतः मानवतावादी कवि हैं। उनकी कविताओं में मानव जीवन की सूक्ष्‍म परतें उजागर होती हैं। कवि अपनी कविता ‘मौलिक पाठ’ के माध्यम से यह स्पष्‍ट करते हैं कि मात्र साँस लेना ही जीवन नहीं है। मानव मूल्यों की रक्षा के लिए प्राणों को अर्पित करना ही जीवन का परमार्थ है - "उच्छ्‌वास-निःश्‍वास के संपुट को ही/ जीवन समझने के बदले/ मानव मूल्यों की रक्षा हित/ प्राणों के अर्पण में ही/ जन्म चरितार्थ होता है।" (पृ.14)

नलगोंड़ा जिले में जन्मे एन.गोपि की कविताओं में मिट्टी का सोंधापन है। अपनी कविता ‘स्माइल प्लीज’ के माध्यम से वे कहते हैं कि "हँसने को कहने पर हँसी आएगी क्या !/ ***/ हँसने के लिए कहते है तो/ तुम पर ही हँसने की इच्छा होती है।/ किन पर्तों के नीचे, अंतिम साँसें गिन रही हैं हँसी।/ गाँव में खोई हुई कांति, शहर में जगमाएगी क्या?/ कैमरे पर डालकर परदा, हँसने को कहते हो।/ ***/ तुम्हारे खींचे जानेवाले फोटोग्राफ में / कितनी रिक्‍तताएँ!!/ भर सकोगे उन्हें??" (पृ.26)

गुंटूर जिले में जन्मे कत्ति पद्‍माराव दलित कवियों में प्रमुख हैं। उनकी कविता में पीडितों और शोषितों की आवाज गूँज उठती है। वे जाति भेद का खंडन करते हैं। भारतीय समाज जाति के नाम पर अमानवीय रीति से बँटा हुआ है। इस भेद भाव को मिटाने के लिए अनेक प्रयास हुए लेकिन यह आज भी समाज में विद्‍यमान है। इसी पर आक्रोश व्यक्‍त करते हुए कवि अपनी कविता ‘हमारे गाँव में मानवता नहीं है’ में कहते हैं कि - "मेरे गाँव के साथ मेरा कुछ बनता नहीं, जमता नहीं।/ मुझे तो मेरी बस्ती ही पसंद है।/ ***/ मानव को जाति भेद की दृष्‍टि से देखनेवाली/ मेरे गाँव की आँख/ फोड़ने का मन करता था मेरा।/ गाँव के तालाब में जब वह अपनी भैंस को नहलाता था/ तो मुझे सीढ़ियों पर चढ़ने तक नहीं देता था/ ***/ आज का गाँव/ मानवताविहीन, बिफरा-साँड़ है।/ मानव को मानव-सा/ न देखपानेवाले, हमारे गाँव पर/ कभी-कभी गाज गिरती है।/ ***/ उसकी माँस पेशियों के बढ़ने के साथ साथ/ जाति का अंह बढ़ता ही जा रहा है।/ गाँव और मुहल्ले के बीच/ कौटिल्य द्वारा बनाई गई/ लौह-दीवार टूट नहीं रहीं।" (पृ.23-24)

शिखामणि ने अपनी कविता ‘पुतली’ में एक अधेड़ उम्र की भिखारिन की दुर्दशा का वर्णन किया है जो तपती दुपहरी में सड़क के किनारे अंजलि पसार कर बैठी रहती है - " तपती दोपहरी की धूप में / भीड़ भरी सड़क के एक कोने में / सदा एक ही मुद्रा में / अंजली पसार कर/ एक अधेड़ उम्र की औरत.../ ***/ मानव होकर भी वह ठूँठ बन गई है।" (पृ.53)

प्रेम ऐसी भावना है जिसे परिभाषित करना कठिन कार्य है। एम.रघु ने अपनी कविता ‘प्रेम पत्र’ में यह स्पष्‍ट किया है कि "यौवन का छिटका/ प्रेम लेख/ किताब में रखे मारे पंख-सा मिला/ कल्पना की प्रेयसी-सी/ विचारों से भरी कक्षाएँ/ संकेत, मेघसंदेश की/ यादें हैं आज भी तरो ताजा।" (पृ.38)। लेकिन आज मनुष्‍य जीवन इतना यांत्रिक बन चुका है कि उसके पास न तो प्रेम करने के लिए वक्‍त है और न प्रेम पत्र लिखने के लिए ही। इसीलिए कवि व्यंग्य पूर्वक कहते हैं कि - "सचमुच/ वह प्लेटोनिक प्रेम की पीठिका है!/ अब गोदावरी की बाढ़-सा/ सच्चा प्रेम डूबा जा रहा है।/ अब लिखा नहीं जाता/ प्रथम प्रेम पत्र।" (पृ.39)

किछ दश्कों से स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्‍ति और स्त्री सशक्‍तीकरण की बातें सुनाई दे रही हैं। स्त्री अधिकारों के साथ ही पुरुष सोच के बदलाव को भी कुछ कविताओं में लक्षित किया गया है। कोडूरि विजय कुमार ने अपनी कविता में उत्तर आधुनिक पुरुष के इस सोच को दर्शाया है कि संसार के एक ग्राम बन जाने के साथ ही स्त्री पुरुष का भेद भाव समाप्‍त हो गया है। यह पढ़ना बड़ा मनोरंजक लगता है कि उत्तर आधुनिक पुरुष भी यह सोचकर घरेलू काम करने से परहेज करते हैं कि कहीं ऐसा करना स्त्री को बुरा न लगे। अर्थात्‌ स्त्री को बाहर के साथ साथ घर की भी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए बाध्य करने का बहुत सुंदर तर्क उत्तर आधुनिक मर्दों ने खोज लिया है - " जिस दिन नौकरानी नहीं आती है,/ चौका बासन करने की, कपड़े धोने की बात सोचता हूँ,/ लेकिन ‘तुम्हें यह सब पसंद नहीं होगा’ समझकर चुप हो जाता हूँ।/ ***/ बच्चों के नैपकिन बदलना चाहता हूँ,/ टॉयलट धोना चाहता हूँ,/ ‘तुम ठीक से नहीं धोते हो’ कहोगी, समझकर चुप रह जाता हूँ।/ स्त्रियों के समान सुंदर,/ घर या ससोई का काम/ क्या पुरुष कर सकते हैं, माय डियर!" (पृ.49)

समसामियिक तेलुगु कविता की एक विशिष्‍ट प्रवृत्ति के रूप में मुस्लिमवादी कविता उभर कर आई है। परंतु इस संग्रह में शाजहाना, ख़ादर शऱीफ शेख़ और एस.समीउल्लाह की जो कविताएँ संकलित हैं, वे इस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ऐसा संभवतः इसलिए है कि अनुवादक ने विभिन्न प्रवृत्तियों के प्रतिनिधित्व की दृष्‍टि से कवियों और कविताओं का चयन नहीं किया है, बल्कि ‘विशेषकर पिछले 2007 से 2009 के बीच (यानि तीन वर्ष) एक रविवारीय अंक में छपी कविताओं को उन्होंने चुना है।" जैसा कि निखिलेश्‍वर ने कहा है ‘समकालीन तेलुगु कविताओं का यह एक समयिक अंश है। अनुवादक को जो भी जंचा और अनुकूल लगा, उन कविताओं को अपना लिया’। निखिलेश्‍वर ने अनुवादक की कलम की लड़खड़ाने और शब्द चयन में असावधानी की ओर भी संकेत किया है। मुझे इस संबंध में कुछ नहीं कहना। जैसा कि डॉ.एम.रंगय्या ने इंगित किया है इस संकलन की उपलब्धि इसके विषय वैविध्य में है जिसमें प्रेम, गाँव, माँ, बुढ़ापा, स्वप्‍न, फूल, कली, धूप, पगड़ी, दलित, पुतली, समय, स्वेच्छा, कुशल मंगल और चूने की डिबिया तक न जाने क्या क्या शामिल है।

120 पृष्ठ की यह अनूदित काव्य कृति ‘कादंबिनी क्लब’, हैदराबाद द्वारा प्रकाशित की गई है। मूल्य के स्थान पर ‘अमूल्य’ अंकित है। डॉ.अहिल्या मिश्र के नेतृत्व में ‘कादंबिनी क्लब’ ने अनेक उपलब्धियाँ अर्जित की है। यह कृति उस क्रम में एक और मील का पत्थर है। यों तो हैदराबाद में हिंदी और तेलुगु के साहित्य को प्रोत्साहित करनेवाली अनेक संस्थाएँ हैं लेकिन हिंदी के माध्यम से तेलुगु को एक अमूल्य पुस्तक के रूप में उपलब्ध कराने का जो अनूठा कार्य है वह सराहनीय है।

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तेलुगु काव्य प्रभा (कविता संकलन)/ जी.परमेश्‍वर/ मूल्य : अंकित नहीं/ 2010/ पृ.120/ प्रकाशक : कादंबिनी क्लब, 93/सी, राज सदन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद - 500 038

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

पुस्तक लोकार्पण और चर्चा

साहित्य मंथन , हैदराबाद के पुस्तक-चर्चा विषयक कार्यक्रम में संयोजक डॉ. बी. बालाजी ने मुझे भी एक पुस्तक पर आलेख पढ़ने का मौका दिया. उनका आभार मानते हुए उस शाम के कुछ फोटो.........




समाज सुधारक साहित्यकार वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु



‘गद्‍य ब्रह्‌मा’ और ‘गद्‍य तिक्कन’ के नाम से तेलुगु साहित्य जगत्‌ में विख्यात कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु का जन्म 16 अप्रैल, 1848 में राजमहेंद्रवरम्‌ (राजमंड्री) में हुआ। साहित्यकार के साथ साथ वे समाज सुधारक भी थे। उन्होंने समाज सेवा के लिए साहित्य को साधन बनाया। नारी समाज को जागृत करना उनका परम लक्ष्‍य था। इस लक्ष्‍य की सिद्धि के लिए उन्होंने अनेक आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने 1876 में ‘विवेकवर्द्धनी’ और ‘हास्य संजीवनी’ नामक मासिक पत्रिकाएँ आरंभ की और 1883 में ‘सतीहित बोधनी’। इन पत्रिकाओं के माध्यम से श्रुति, स्मृति और पुराणों से प्रमाण देकर उन्होंने पुरातन पंथियों की जड़ मान्यताओं पर प्रहार किया। स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने के साथ साथ उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और अंतर जातीय विवाह का भी समर्थन किया और बाल विवाह का खंडन भी किया।


वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु ने आधुनिक तेलुगु गद्‍य साहित्य को अनेक नूतन विधाओं से समृद्ध किया। वे तेलुगु के प्रथम उपन्यासकार, नाटककार, आत्मकथाकार, जीवनीकार और निंबंधकार हैं। उन्होंने तेलुगु भाषा को परिष्‍कृत किया और सर्वप्रर्थम गद्‍य में सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने गद्‍य में समस्यापूर्ति का भी प्रवर्तन किया।


वीरेशलिंगम्‌ के युग में आंध्रप्रदेश अंधविश्‍वासों के गर्त में डूबा हुआ था। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्‍त कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। उस युग में स्त्री की स्थिति अत्यंत दयनीय और सोचनीय थी। परंपरागत बंधनों के कारण स्त्री जीवन चूल्हा-चक्की तक सिमटकर रह गया था। वह केवल बच्चा पैदा करने का यंत्र मात्र थी। बाल विवाह के कारण भी अनेक स्त्रियाँ को अल्पायु में ही विधवा जीवन की यातनाएँ सहनी पड़ती थी। वीरेशलिंगम्‌ ने स्त्री की इस सोचनीय स्थिति की ओर ध्यान दिया और सुधारवादी आंदोलनों का सूत्रपात किया। उन्होंने ‘वितंतु शरणालयमु’ (विधवा शरणालय) की स्थापना की थी। इसके बाद स्त्रियाँ स्वयं अपनी शिक्षा, अस्मिता और अधिकारों के प्रति सजग हो उठीं।


साहित्य के क्षेत्र में वीरेशलिंगम्‌ ने कुल मिलाकर 130 ग्रंथ लिखे। उनमें संस्कृत और अंग्रेज़ी के अनुवाद तथा मौलिक ग्रंथ भी हैं। 1878 में प्रकाशित ‘राजशेखर चरित्रमु’ (राजशेखर चरित्र) को तेलुगु साहित्य का प्रथम उपन्यास माना जाता है। यह उपन्यास गोल्डस्मिथ कृत ‘विकर ऑफ द वेकफील्ड’ पर आधारित है। इसमें हिंदू समाज की कुरीतियों का खंडन किया गया है। उन्होंने कथावृत्त, चरित्र चित्रण, परिवेश, आचार-विचार आदि का तेलुगुकरण किया। औपन्यासिक तत्व, कथा निर्माण एवं भाषा शैली की दृष्‍टि से भी यह उपन्यास श्रेष्‍ठ है। इस उपन्यास की प्रासंगिकता को देखकर1886 में रिवरेंड हच्चिनसन ने अंग्रेज़ी में इसका अनुवाद किया। 1887 में ‘फार्चून्स व्हील’ नाम से इसका अंग्रेज़ी रूपांतर प्रकाशित हुआ।


1883 में ‘गुलिवर्स ट्रेवल्स’ का ‘सत्यराज पूर्वदेश यात्रलु’ (सत्यराज की पूर्वदेशी यात्राएँ) नाम से तेलुगु अनुवाद प्रकाशित हुआ। उपर्युक्‍त दोनों उपन्यास अंग्रेज़ी कृतियों के आधार पर रचे गए हैं, किंतु मौलिकता से पूर्ण है। वीरेशलिंगम्‌ का उपन्यास ‘आडलयालम्‌’ (स्त्री जाति) ने तेलुगु साहित्य जगत्‌ में तहलका मचा दिया था। इस उपन्यास में लेखक ने यह दर्शाया है कि स्त्री यदि अपने अधिकारों के प्रति सजग हो उठेगी तो वह भी पुरुष के समान इस समाज में अपनी पहचान बना सकेगी। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने परंपरागत रूढ़ियों पर प्रहार किया। तत्कालीन समाज में प्रचलित सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई। इस उपन्यास में उन्होंने इस बिंदु को उजागर किया कि पत्‍नी की मृत्यु के बाद पति को उसके साथ सहमरण करना चाहिए क्योंकि स्त्रियों के सती होने की प्रथा थी।


वीरेशलिंगम्‌ की सभी रचनाओं में तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों का खंडन पाया जाता है। उपन्यास लेखन को विशेष प्रोत्साहन देने के लिए वीरेशलिंगम्‌ ने 1891 में राजमंड्री से ‘चिंतामणि’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस पत्रिका के माध्यम से उपन्यास लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता था।

1883 में वीरेशलिंगम्‌ ने कालिदास कृत ‘अभिज्ञान शाकुंतल’ का तेलुगु रूपांतर किया। उन्होंने ‘मालविकाग्नि मित्र’, ‘प्रबोध चंद्रोदय’ और ‘रागमंजरी’ आदि नामों से अंग्रेज़ी नाटकों का सरल और सरस अनुवाद भी प्रस्तुत किया था। ‘प्रह्‌लाद नाटक’, ‘दक्षिण गोग्रहणमु’, ‘सत्य हरिश्‍चंद्र’, ‘विवेक दीपिका’ आदि उनके मौलिक नाटक हैं।


पंतुलु ने तेलुगु में सर्वप्रथम ‘प्रहसन’ का सूत्रपात किया। समाज सुधार को ही लक्ष्‍य बनाकर ‘वेश्‍या प्रिय’, ‘महावंचक’, ‘विचित्र विवाह’ और ‘कलह प्रिया’ आदि दर्जनों प्रहसनों की रचना की हैं। वे अच्छे समीक्षक भी थे। तर्क शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, शरीर विज्ञान, भौतिक शास्त्र आदि शास्त्र ग्रंथों की रचना करके उन्होंने तेलुगु साहित्य को समृद्ध बनाया।


प्रगतिशील विचारोंवाले युग पुरुष कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु का देहावसान 27 मई, 1919 को हुआ। तेलुगु साहित्य जगत्‌ में आज भी वीरेशलिंगम्‌ का नाम चिरस्थाई हैं। कहना न होगा कि वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु हिंदी में आधुनिकता के प्रवर्तक भारतेंदु के समकालीन ही नहीं, अपनी रचनाशीलता और वैचारिकता में भी उनके समकक्ष और समतुल्य हैं। हिंदी क्षेत्र के नवजागरण का नेतृत्व जिस प्रकार भारतेंदु हरिश्‍चंद्र ने किया उससे कहीं अधिक प्रभावी रूप में वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु ने तेलुगु समाज के नवजागरण को नेतृत्व प्रदान किया ।


बुधवार, 21 जुलाई 2010

अनुवाद : अर्थ और परिभाषा



अर्थ

  • ‘अनुवाद’ भाषाओं के बीच संप्रेषण की  प्रक्रिया है.  इसके लिए अंग्रेज़ी में ‘ट्रांसलेशन’, फ्रेंच में ‘ट्र्डुक्शन’, अरबी में ‘तर्जुमा’, तमिल में `मोळीपेयरपु ' और तेलुगु में ‘अनुवादमु’ तथा ‘तर्जुमा’ और कन्नड़ तथा मराठी में `अनुवाद', पंजाबी में 'उलथा', 'अनुवाद', कश्मीरी में 'तरजमु', सिंधी में 'तर्जुमो', 'अनुवादु' आदि शब्द प्रचलित हैं. इसी प्रकार मलयालम भाषा में अनुवाद के पर्याय के रूप में पोरुलितरिप्पू, भाषांतरं, पारिभाषिकं , अनुवादं और तर्ज्जमा शब्द चलते हैं.

  • ‘ट्रांसलेशन’ शब्द लैटिन के ‘ट्रांस’ और ‘लेशन’ के संयोग से बना है जिसका मतलब है ‘पार ले जाना’. (Translation = Trans+Lation = to go through)

  • (i) `अनुवाद’ शब्द का संबंध ‘वद्‌’ धातु से है, जिसका अर्थ है ‘बोलना’ या ‘कहना’.
  • (ii) ‘वद्‍’ धातु में ‘घञ्‌’ प्रत्यय लागाने से ‘वाद’ शब्द बनता है, और फिर उसमें ‘पीछे’, ‘बाद में’, ‘अनुवर्तिता’ आदि अर्थों में प्रयुक्‍त ‘अनु’ उपसर्ग जुड़ने से ‘अनुवाद’ शब्द बनता है।अनु+वाद=अनुवाद = पुन:कथन/ किसी के कहने के बाद कहना.

  • अनुवाद का अर्थ है ‘प्राप्‍तस्य पुन: कथने’ या ‘ज्ञातार्थत्स्य प्रतिपादने’. अर्थात्‌ ‘पहले कहे गए अर्थ को फिर से कहना’।.(शब्दार्थ चिंतामणि)

  • The root word of `Translation' is `Translatum'(l), which means `Carrying over'. It means the rendering of a text into another language. (Chambers Twentieth Century Dictionary)

पाश्‍चात्य परिभाषाएँ :

  • Translation is the replacement of textual material in one language by the equivalent textual material in another language. (J.C.Catford)
अर्थात्‌ एक भाषा की पाठ्‍य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्‍य सामग्री से प्रतिस्थापित करना अनुवाद कहलाता है.

  • Translating consists in producing in the receptor language the closest natural equivalent to the message of the source language. First in meaning and secondly in style. (E.A.Nida & Taber)
अर्थात्‌ मूल भाषा के संदेश के समतुल्य संदेश को लक्ष्य भाष में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को अनुवाद कहते हैं. संदेशों की यह समतुल्यता पहले अर्थ फिर शैली की दृष्‍टि से निकटतम एवं स्वाभाविक होती है.

  • To Translate is to change into another language retaining the sense. (Samuel Jhonson)
अर्थात्‌ एक भाषा से दूसरी भाषा मे भावार्थ का परिवर्तन ही अनुवाद है.

  • Translation is the replacement of a representative of a text in one language by a representation of an equivalent text in a second language. (Hartman & Stork)
अर्थात्‌ एक भाषा या भाषा सेदूसरी भाषा या भाषा भेद में प्रतिपाद्‍य को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया या उसके परिणाम को अनुवाद कहते हैं.

  • Translation is the expression in another language (or target language) of what has been expressed in another, source language, preserving semantic and stylistic equivalence. (Roger T.Bell)
अर्थात्‌ मूल भाषा पाठ के अर्थ एवं शैली का अन्य भाषिक संस्कृति के अर्थ एवं शैली तत्वों में अंतरण ही अनुवाद है.

  • Translation is the interpretation of verbal signs by some other language. (Roman Jackobson)
अर्थात्‌ एक भाषा के मौखिक चिह्‌नों का अन्य भाषा के द्वारा प्रतिपादन ही अनुवाद है.

  • Translation is the transference of the context of a text from one language into another, bearing in mind that we cannot always dissociate the context from the form. (Foresten)
अर्थात्‌ एक भाषा में रचित पाठ के कथ्य को दूसरी भाषा में रूपांतरित करना अनुवाद है. हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि कथ्य और भाषा रूप हमेशा अलग अलग होते हैं.

  • Translation is a custom house through which passes, if the custom officers are not alert, more smuggled goods of foreign idioms, than through any other linguistic frontiers.
अर्थात् अनुवाद एक कस्टम हाउस है, जिससे होकर स्रोत भाशा के प्रयोग का विदेशी माल भाह्सा में अन्य स्रोतों की तुलना में अधिक आ जाता है, यदि अनुवादक उपेक्षित सतर्कता न बरते.



  • A translation should give a complete transcript of the ideas of the original work. The style and the manner of writing should be of the same character as that of the original. A translation should have all the ease of the original composition. (Alexander Frazer Titler)
अर्थात अनुवाद में मूल का अम्पूर्ण भाव समाहित होना चाहिए. अनुवाद की शैली तथा लेखन विधि मूल के जैसी होनी चाहिए. अनुवाद को मूल की तरह सहज होना चाहिए.



  • A Translation should affect as in the same way as the original may be supposed to have affected its first hearers. (Mathew Arnold)
अर्थात अनुवाद ऐसा होना चाहिए कि उसका वही प्रभाव पड़े जो मूल का उसके पहले श्रोताओं पर पडा होगा.


भारतीय परिभाषाएँ :

  • अनुवाद की प्रविधि एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरित करने तक सीमित नहीं है. एक भाषा के रूप के कथ्य को दूसरे रूप में प्रस्तुत करना भी अनुवाद है. छंद में बताई बात को गद्‍य में उतारना भी अनुवाद है. (डॉ.विश्‍वनाथ अय्यर)
  • भाषा ध्वन्यात्मक प्रतीकों की व्यवस्था है और अनुवाद है इन्हीं प्रतीकों का प्रतिस्थापन. अर्थात्‌ एक भाषा के प्रतीकों के स्थान पर दूसरी भाशा के निकटतम समतुल्य और सहज प्रतीकों का प्रयोग.(डॉ.भोलानाथ तिवारी)
  • एक भाषा के विशिष्‍ट भाषा भेद के विशिष्‍ट पाठ को दूसरी भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत करना अनुवाद है जिसमें वह मूल के भाषिक अर्थ, प्रयोग के वैशिष्‍ट्‍य से निष्‍पन्न अर्थ, प्रयुक्‍ति और शैली की विशेषता, विषय वस्तु तथा संबद्ध सांस्कृतिक वैशिष्‍ट्‍य को यथासंभव संरक्षित रखते हुए दूसरी भाषा के पाठक को सवाभाविक रूप से ग्राह्‌य प्रतीत है. (डॉ.सुरेश कुमार)
  • एक भाषा (स्रोत भाषा) की पाठ समग्री में अंतर्निहित तथ्य का समतुल्यता के सिद्धांत के आधार पर दूसरी भाषा (लक्ष्‍य भाषा) में संगठनात्मक रूपांतरण अथवा सर्जनात्मक पुनर्गठन ही अनुवाद है.(डॉ.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव)
  • अनुवाद एक सांस्कृतिक सेतु है.
  • अनुवाद सामाजिक - सांस्कृतिक लें दें का सशक्त माध्यम है. 



    देशोद्धारक काशीनाथुनी नागेश्‍वरराव पंतुलु


    "आंध्र पत्रिकनिच्ची
    अमृतांजनमिच्ची
    तलनोप्पी बापिन
    धन्युडितडु"
    (धन्य हैं ‘आंध्र पत्रिका’ नामक दैनिक समाचार पत्र देकर और ‘अमृतांजन’ नामक औषधि का आविष्‍कार कर सिर दर्द को मिटानेवाले काशीनाथुनि नागेश्‍वरराव पंतुलु! - दुग्गिराला गोपालकृष्‍णय्या)


    देशोद्धारक कशीनाथुनि नागेश्‍वरराव पंतुलु का जन्म कृष्‍णा जिला में बंदरू के समीप एलमर्रू नामक गाँव में 1 मई, 1876 में हुआ। मद्रास विश्‍वविद्‍यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्‍त करने के बाद व्यापार करने के उद्‍देश्‍य से उन्होंने मुंबई और कलकत्ता की यात्रा की। बहुत कोशिशों के बाद उन्होंने मुंबई में 1893 में‘अमृतांजन’ कंपनी प्रारंभ करके ‘अमृतांजन’ नामक औषधि का आविष्‍कार किया। उससे प्राप्‍त धन को उन्होंने समाज सेवा के लिए उपयोग किया।


    तेलिगु में सर्वप्रथम दैनिक समाचार पत्र निकालने का श्रेय नागेश्‍वरराव को ही प्राप्‍त हैं। तेलुगु जनता में देशभक्‍ति जगाने के लिए उन्होंने 1908 में मुंबई से ‘आंध्र पत्रिका’ नाम से साप्‍ताहिक पत्र निकाला था। 1914 में यह पत्र मद्रास से दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। तत्कालीन समाज में जागरूकता लाने में इस समाचार पत्र का योगदान महत्वपूर्ण है। आंध्र विश्‍वविद्‍यालय की स्थापना में भी ‘आंध्र पत्रिका’ की भूमिका निर्विवाद है। नागेश्‍वरराव ने इस पत्रिका के माध्यम से तेलिगु साहित्य और संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1924 में उन्होंने ‘भारती’ नामक साप्‍ताहिक तेलुगु मासिक पत्रिका भी आरंभ की। इन दोनों पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने अनेक कवियों, लेखकों और विद्वानों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ उन्हें पुरस्कार देकर भी सम्मानित किया।


    स्वतंत्रता आंदोलन के समय जनता को जागृत करने के लिए और उन तक समाचार पहुँचाने के लिए काशीनाथुनि नागेश्‍वरराव पुस्तकालयों के लिए ‘आंध्र पत्रिका’ की प्रतियाँ मुफ्‍त में उपलब्ध कराते थे। उनके सेवाभाव, देशभक्‍ति और दानशीलता से प्रभावित होकर राष्‍ट्रपिता माहात्मा गांधी ने उन्हें ‘विश्‍वदाता’ उपाधि प्रदान की थी।


    स्वतंत्रता संघर्ष के समय अनेक आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने के साथ साथ नागेश्‍वरराव ने मुक्‍त हस्त से आंदोलनकारियों की आर्थिक सहायता भी की। 1924 में मद्रास में संपन्न आंध्र महासभा में उन्हें ‘देशोद्धारक’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। इसी प्रकार आंध्र विश्‍वविद्‍यालय ने उन्हें ‘कलाप्रपूर्ण’ की उपाधि देकर अपनी कृतज्ञता प्रकट की।


    नागेश्‍वरराव पंतुलु ने ‘आंध्र वाड्‍.मय चरित्र’ नाम से तेलुगु साहित्य का संक्षिप्‍त इतिहास भी लिखा है। उनके द्वारा लिखी गई भगवद्‍गीता की टीका आज भी प्रासंगिक है। 11 अप्रैल, 1938 को उन्होंने सदा के लिए इस भौतिक संसार से विदा ली परंतु इसमें संदेह नहीं कि वे अपने राष्‍ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों के कारण सदा के लिए तेलुगु जनमानस में गौरवपूर्ण स्थान पर प्रतिष्‍ठित रहेंगे।

    शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

    ‘ज्योति-सागर’ में अवगाहन करते हुए


    सद्‍य: प्रकाशित काव्यकृति ‘ज्योति-सागर’(2009) हैदराबाद की चर्चित कवयित्री ज्योति नारायण(17 मार्च ?) की चौथी कृति है। 80 पृष्‍ठों की यह काव्य कृति बसंती प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित है। इसका मूल्य है रु.150/- ।

    ‘ज्योति-सागर’ के प्रकाशन के पूर्व कवयित्री के तीन काव्य संग्रह - ‘प्रेम ज्योति का सूरज’(2003), ‘चेतना ज्योति’( ) और ‘ज्योति कलश’( ) प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कविताओं के अवलोकन के आधार पर बेहिचक यह कहा जा सकता है कि इनमें उनके जीवनानुभव का सार निहित है। वे अपनी कविताओं के माध्यम से पाठकों को यह संदेश देना चाहती हैं कि -

    "मानवता विश्‍वास संजोये बैठी है,/ पुरखों का इतिहास संजोये बैठी है।/ तुमको बनना है भविष्‍य भारत का,/ मानवता यह आस लगाए बैठी है।" (‘ज्योति-सागर’; पृ.20)

    ‘ज्योति-सागर’ में संकलित रचनाएँ वस्तुत: मुक्‍तक हैं। मुक्‍तक चार पंक्‍तियों में स्वत:पूर्ण रचना होती है। इसका अन्य रचनाओं के साथ पूर्वापर संबंध नहीं होता। इस प्रकार की रचनाओं में जीवन के किसी अनुभव पर टिप्पणी होती है या कोई इस प्रकार का निष्‍कर्ष होता है कि जो सूक्‍ति बन जाता है। इस पुस्तक में कुल 195 मुक्‍तक संचित किए गए हैं जिन्हें 12 खानों में सजाया गया है। इनके शीर्षकों से ही इनके विषय प्रकट हो जाते हैं जैसे -(1)मुक्‍तक, (2)माटी औए मानवता, (3)ईमान-अवाम और सियासत, (4)देश-धर्म और सियासत, (5)जिंदगी, (6)दर्द, (7)औरत, (8)माँ, (9)सपना, (10)तुम और तुम्हारी याद, (11)प्रेम/प्यार और (12)मैं।

    कहा जाता है कि जो सरसता प्रदान करे वही रस है। यह रस काव्य की आत्मा है। चाहे कविता हो या गीत या मुक्‍तक उसमें सरसता होनी चाहिए। इसी सरसता के बल पर बिहरी जैसे रचनाकार दोहे रूपी मुक्‍तक काव्य द्वारा गहन विचारों या मर्मस्पर्शी भावनाओं को प्रस्तुत कर पाठक या श्रोता को आनंद सागर में डुबो देते हैं। काव्य का भावपक्ष हृदय की सघन अनुभूतियों की भावभूमि से पल्लवित और पुष्‍पित होता है। इस दृष्‍टि से देखें तो निस्संकोच यह कहा जा सकता है कि ‘ज्योति-सागर’ में संकलित मुक्‍तक कवयित्री की अंतर्वेदना की आत्माभिव्यक्‍ति है। इसकी विषयवस्तु विविधतापूर्ण है। ‘ज्योति-सागर’ अर्थात ज्योति रूपी सागर में अवगाहन करने से जो मुक्‍तक अर्थात मोती प्राप्‍त होते हैं वे जीवन के सुख-दु:ख, आत्मसंघर्ष और मानसिक घुटन के साथ साथ सामाजिक विसंगतियों, व्यक्‍ति मन के अंतर्द्वन्द्व, प्रकृति प्रेम, प्रणयानुभूति, पारिवारिक रिश्ते-नातों, संबंधों के ह्रास, आज की और पुरानी जीवन शैली की तुलना, राजनैतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक विचारों की सीपी में पकाकर पेश किए गए हैं। आधुनिक विमर्शों में खास तौर से स्त्री विमर्श ने इन मुक्‍तकों या मोतियों को आबदार बनाया है।

    किसी भी कार्य को करने के पीछे कुछ न कुछ प्रयोजन अवश्य होता है। काव्य सृजन के पीछे भी कुछ प्रयोजन निहित है। ज्योति नारायण ने अपना काव्यप्रयोजन आरंभ में ही बता दिया है -

    "जो भी लिखना खरी खरी लिखना/ बात मेरी ये आखरी लिखना,/ प्यार का नाम जब कभी लिखना,/ एक मीरा थी बावरी लिखना॥"(पृ.15)

    बात साफ है कि वे खरी बातें अर्थात्‌ जीवन की सच्चाइयों को लिखना-लिखाना चाहती हैं और प्रेम के पागलपन को व्यंजित करना चाहती हैं। कवयित्री ने मीरा की भाँति बावरी होकर अपनी अनुभूतियों को शब्दों में तराशना चाहा है। उनके लिए कविता आत्म-अन्वेषण की साधना है। इसीलिए वे कहती हैं कि

    "खुद की तलाश में यूँ भटकती है जिंदगी/ खुद में खुदा मिला ले तो - करूँ बंदगी उसकी। मुझे खुद में ही खुदा को ढूँढ़ना है...।" (मेरी बात)।

    कवयित्री वस्तुत: आशावादी हैं अत: वे कहती हैं कि इस दुनिया से अंधेरे को भगाने के लिए रोशनी की जरूरत है और यह तभी संभव होगा जब मन में विश्‍वास होगा -

    "शाख शाख फूल खिलाओ प्यारे,/ मन में विश्‍वास जगाओ प्यारे।/ जिससे रौशन हो जाए अंधेरी दुनिया,/ एक दिया ऐसा जलाओ प्यारे॥"(पृ.33)

    यह सर्वविदित है कि जीवन सुख-दु:ख का मिश्रण है। संघर्ष ही मानव नियति है। जन्म लेना संघर्ष में पड़ना है। रोटी, कपड़ा और मकान मानव की मूलभूत आवश्‍यकताएँ हैं। रोटी वस्तुत: श्रम सिद्धांत का प्रतीक है। इस बात को स्पष्‍ट करते हुए कवयित्री ने कहा है कि -

    "सच पूछो तो माटी श्रम की भाषा है,/ रोटी रोटी में इसकी परिभाषा है।/ तत्व ज्ञान का मर्म बताती है सबको,/ अंकुर अंकुर में सोई जिज्ञासा है॥" (पृ.17)

    वे आगे यह भी कहती हैं कि

    "जिंदगी दर जिंदगी जो सिलसिला है,/ आदमी की भूख का यह काफिला है।/ ज्ञान हो, विज्ञान हो, या दीनो-धरम हो-/ रोटियों के पृष्‍ठ पर लिखा गया ये फलसफा है।" (पृ.43)

    कवि भी मनुष्‍य ही है और इसलिए वह भी सामाजिक प्राणी है। समाज से कटकर वह जी नहीं सकता। समाज में व्याप्‍त विसंगतियों को देखकर उसका संवेदनशील हृदय उद्वेलित होता है। मनुष्‍य और मनुष्‍य के बीच आज खाई उत्पन्न हो रही है। शराफत का जमाना नहीं रहा। ईर्ष्या और दुश्मनी के बीज बोए जा रहे हैं और नफरत की फसल उगाई जा रही है -

    "ईर्ष्या और दुश्मनी की यहाँ/ क्यों पर्चियाँ बँटती हैं?/ और शराफत अपने आँसुओं से-/ क्यों कफ़न धोती रहती है?" (पृ.49)

    जब चारों ओर ईर्ष्या, दुश्मनी और नफरत व्याप्‍त है तो सहृदय व्यक्‍ति की आत्मा का विचलित होना स्वाभाविक है। इसलिए कवयित्री कहती हैं -

    "अजब सुनसान सा लगा मुझको,/ बहुत वीरान सा लगा मुझको।/ यहाँ, जिंदगी हो गई है पत्थर दिल,/ शहर शमशान सा लगा मुझको॥" (पृ.31)

    संवेदनाओं के जमने के इस जमाने में जीवन की धड़कनें भी मानो श्मसान में सोती हुई प्रतीत होती है।

    मनुष्य और मनुष्य के बीच फासला इतना बढ़ता जा रहा है कि रिश्ते-नाते निरर्थक और संबंध नष्‍ट होते जा रहे हैं। इन्सानियत भी खतरे में पड़ गई है -

    "बस्ती बस्ती किस कदर वीरानियत है,/ क्रूरता से हँस रही शैतानियत है।/ आदमी को आदमी दिखता नहीं है-/ आज खतरे में पड़ी इन्सानियत है॥" (पृ.30)

    मंदिर और मस्जिद के नाम पर भाई भाई से लड़ने लगा है -

    "खुद ही लगा के आग बुझाते मिलेंगे लोग,/ यूँ ही वफाए रस्म निभाते मिलेंगे लोग।/ न मस्जि़द में खुदा होगा, न मंदिर में कोई राम-/ मज़हब का खून यूँ ही बहाते मिलेंगे लोग॥" (पृ.30)।

    ‘ज्योति-सागर’ के इस अत्यंत आबदार मोती की चमक अन्यत्र भी कौंधती प्रतीत होती है। यथा - "ये किसका बोल-बाला हो रहा है,/ लहू का रंग काला हो रहा है।/ वहाँ सब चाँद तारे छू रहे हैं-/ यहाँ मस्जिद शिवाला हो रहा है॥" (पृ.31)।

    इसमें संदेह नहीं कि सांप्रदायिक सोच का जहर हमारी पीढ़ियों को विषाक्‍त कर रहा है और हम प्रगति की यात्रा में सदियों पिछड़ते प्रतीत हो रहे हैं।

    कहा जाता है कि ‘जननी जन्मभूमिश्‍च स्वर्गादपि गरीयसी’। इसलिए अपनी मिट्‍टी से कटकर रहना किसी के लिए संभव नहीं। कवयित्री भी अपनी मातृभूमि से अपार प्रेम करती हैं इसलिए तो वे कहती हैं -

    "मातृभूमि की मिट्‍टी सबसे पावन है,/ नंदन वन है, यही इंद्र का कानन है। यहाँ सभी ऋतुओं का नर्तन होता है,/ फागुन खिलते फूल, बरसता सावन है॥" (पृ.17)

    इसी क्रम में कवयित्री अपने पाठकों को संदेश देती हैं कि -

    "माथे पर मिट्‍टी का तिलक लगाओ तुम,/ दुनिया को मिट्‍टी का अर्थ बताओ तुम।/ है सोई चैतन्य धार इस जड़ता में ,/ प्रखर चेतना का अंकुर बन जाओ तुम॥" (पृ.18)

    मातृभूमि पर जब भी संकट मंड़राता है कवयित्री विचलित हो उठती हैं -

    "देश की सरहदों पे खतरा है,/ देश की हर हदों पे खतरा है।/ देश महफूज हो तो कैसे हो-/ देश को हर पदों पे खतरा है॥" (पृ.29)

    कुछ मुक्‍तकों में राजनीतिज्ञों पर व्यंग्य भी किया गया है -

    "मौलवी और पुजारी मिलेंगे,/ जाल फेंके शिकारी मिलेंगे।/ इस सियासत की गलियों में अक्सर,/ वोट के ही भिखारी मिलेंगे॥" (पृ.29)

    जैसा कि आरंभ में इशारा किया जा चुका है, कवयित्री की स्त्री विषयक स्व-धारणाएँ भी इन मुक्‍तकों में मुखरित है। स्वयं स्त्री होने के नाते कवयित्री ने स्त्री के दिल की धड़कन को बारीकी से चित्रित किया है।

    सदियों से स्त्री को परंपरागत रूढ़ियों की चिता पर जलाया जा रहा है। हमेशा ही वह हाशिए पर रही है -

    (1) "हाय औरत तुम्हारी वफ़ा को,/ हर तरफ आजमाया गया है।/ नोंच कर तेरे पाँवों की पायल,/ तुझको घुंघरू पहनाया गया है॥" (पृ.50)
    (2) "आग कब यह बुझाई गई है,/ सदियों सदियों सताई गई है।/ रूढ़ियों की चिता पर हमेशा-/ सिर्फ औरत जलाई गई है॥" (पृ.50)
    (3) "वक्‍त के हाशिए की लकीरें,/ चंद लम्हों की मोहताज होंगी।/ संगमरमर के लाखों महल हों-/ कब्र में कैद मुमताज होंगी।"(पृ.50)

    स्त्री की इस बंदिनी और अबला छवि को आज भी नकारना असंभव है क्योंकि इक्कीसवीं सदी में भी साधारण भारतीय स्त्री के जीवन की सच्चाई यही है। इसके अलावा ज्योति नारायण ने स्त्री विमर्श के एक और आयाम को खूबसूरती से उभारा है। ‘ज्योति-सागर’ में संकलित कुछ मुक्‍तकों में मातृत्व का जीवंत पक्ष दिखाई देता है -

    (1) "माँ मुझे टूटा खिलौना याद आता है,/ और वह भीगा बिछौना याद आता है।/ जब कभी तुम याद आती हो मुझे माँ,/ अपने माथे का डिठौना याद आता है॥" (पृ.53)
    (2) कितने खुश थे तेरी पनाह में हम,/ दुबके दुबके से तेरी बाँह में हम।/ तेरी ममता का वह घना साया, नन्हें बिरवें से तेरी छाँह में हम॥" (पृ.53)

    अंत में यही कि कवयित्री ने अपने मुक्‍तकों में आकर्षक प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से जीवन के हर पहलू को उजागर करने का सफल प्रयास किया है। वे अहर्निश साहित्य के सागर में प्रभंजन गति लिए आगे बढ़ना चाहती हैं -

    "आरती का दीप बन जलती रहूँगी,
    मैं हृदय की दाह सब सहती रहूँगी।
    ठोकरों की राह है मंजिल मेरी,
    मैं प्रभंजन गति लिए बढ़ती रहूँगी।" (पृ.62)

    आशा है कि हिंदी पाठक इस संग्रह का स्वागत करेंगे।

    ________________________________________________________________________
    ज्योति-सागर (मुक्‍तक-संग्रह)/ ज्योति नारायण/ बसंती प्रकाशन, पी-137,पिलंजी सरोजिनी नगर, नई दिल्ली-110 023/ 2009/ रु.150/-/ पृ.80




    मंगलवार, 13 जुलाई 2010

    ‘आंध्र भोज ’ श्री कृष्णदेव राय









    "तेलुगुदेल यन्न देशंबू तेलुगेनु
    तेलुगु वल्लभुंडु तेलुगोकोंडा
    एल्ल भाषालंदु एरुगवे माटाडि
    देश भाषालंदु तेलुगु लेस्सा"
    (कृष्णदेव राय, ‘आमुक्‍तमाल्यदा’)

    (यह तेलुगु देश है और मैं तेलुगु प्रजा का राजा हूँ. तेलुगु भाषी हूँ. अन्य भाषाओं का ज्ञान है और उनमें बातचीत करने की क्षमता भी है. किंतु सब देशों की भाषाओं की तुलना में तेलुगु ही सर्वोत्तम है.)

    अपनी मातृभाषा को सर्वोत्तम माननेवाले कृष्णदेव राय का स्थान तेलुगु साहित्य के इतिहास में चिरस्थाई है. हिंदी साहित्य के इतिहास का स्वर्ण युग भक्‍ति काल है तो तेलुगु साहित्य के इतिहास का स्वर्ण युग कृष्णदेव राय का काल है.

    भारतीय इतिहास में विजयनगर साम्राज्य को ख्याति प्राप्‍त है. इसके यशस्वी शासक हैं श्री कृष्णदेव राय. स्वामी विद्‍यारण्य ने 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की. हरिहर राय (1336- 1343) और बुक्का राय (1343- 1377), दोनों ने विजयनगर साम्राज्य पर शासन किए. इसके बाद उनकी संतानों ने शासन किया. 1486 में सालुवा नरसिंह राय विजयनगर साम्राज्य की गद्‍दी पर बैठे. 1491 में नरसिंह राय की मृत्यु के बाद नरसा नायक शासनारूढ़ हुए.

    सालुव वंश (1336-1500) के पराभव के पश्‍चात्‌ विजयनगर साम्राज्य तुलुवा वंश के अधीन हो गया. तुलुवा वंश के सम्राट नरसा नायक की तीन रानियाँ थीं - तिप्पांबा, नागलांबा और ओबांबा. तिप्पांबा के पुत्र का नाम नरसिंह राय था, नागलांबा के पुत्र का कृष्णदेव राय तथा ओबांबा के पुत्र थे अच्युतदेव और सदाशिव राय. नरसिंह राय ने सन्‌1501 से 1509 तक विजयनगर पर शासन किया. 24 जुलाई, 1509 में विजयनगर साम्राज्य के महामंत्री तिम्मरसु की सहायता से कृष्णदेव राय गद्‍दी पर बैठे. उन्होंने 1509 से 1529 तक राज्य किया. उनके शासन काल में विजयनगर साम्राज्य का क्षेत्र कटक व गोवा से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक व्याप्त हुआ. उनके राजकाज की भाषा नागरी लिपिवाली संस्कृत थी.





    ‘आंध्र भोज’, ‘कन्नड राज्य रमा रमणा’ और ‘मूरु रायरा गंडा’(तीन राजाओं के राजा) के नाम से प्रसिद्‍ध कृष्णदेव राय कलापोषक थे. उन्होंने अपने दरबार में संस्कृत, तेलुगु, कन्नड और तमिल भाषाओं के कवियों के साथ साथ संगीत, नृत्य तथा अन्य ललित कलाओं के विद्‍वानों को भी आश्रय दिया और सम्मानित किया. साहित्यिक गोष्‍ठीयों का आयोजन एवं अन्य कलाओं का प्रदर्शन ‘भुवन विजयमु’ (भुवन विजय) नामक सभा भवन में हुआ करता था.

    कृष्णदेव राय के दरबार की शोभा थे ‘अष्‍ठ दिग्गज’ - अल्लसानि पेद्‍दना, नंदि तिम्मना, मादय्यगारि मल्लना, धूर्जटी, अय्यलराजु रामभद्रुडु, पिंगलि सूरना, भट्‍टुमूर्ति(राम राजा भूषणा) और तेनाली रामककृष्णा. इनमें अल्लसानि पेद्‍दना को ‘आंध्र कविता पितामह’ कहा जाता है. उन्होंने ‘मनु चरित्र’, ‘गुरु स्तुति’ तथा ‘हरिकथा सारमु’(हरिकथा सार) नामक तीन कृतियों की रचना की पर आज केवल ‘मनु चरित्र’ ही उपलब्ध है. नंदि तिम्मना ने ‘पारिजातापहरणमु’ (पारिजात का अपहरण) नाम से शृंगार रस प्रधान प्रबंध काव्य की रचना की. मादय्यगारि मल्लना ने ‘राजशेखर चरित्रमु’(राजशेखर चरित्र), धूर्जटी ने ‘कालहस्ती महत्यमु’(कालहस्ती का महत्व), अय्यलराजु रामभद्रुडु ने ‘रामाभ्युदयमु’(रामाभ्युदय) नामक प्रबंध काव्यों की रचना की. पिंगलि सूरना ने ‘राघव पांडवीयमु’(राघव पांडवीय) नामक श्‍लेष परक प्रबंध काव्य में रामायण और महाभारत की कथाओं को संजोया है. भट्‍टुमूर्ति ने ‘काव्यालंकारा संग्रहमु’(काव्यालंका संग्रह), ‘वसु चरित्रमु’(वसु चरित्र) तथा ‘हरिश्‍चंद्र नलोपाख्यानमु’(हरिश्‍चंद्र नलोपाख्यान) की रचना की. इनमें से अंतिम प्रबंध काव्य में राजा हरिश्‍चंद्र तथा नल-दमयंती की कथाएँ हैं. ‘विकट कवि’ के नाम से प्रख्यात तेनाली रामकृष्णा ने ‘उद्‍भटाराध्य चरित्रमु’ (उद्‍भटाराध्य चरित्र) की रचना की जो शैव धर्म पर आधारित है. बाद में उन्होंने वैष्णव धर्म पर आधारित प्रबंध काव्य ‘पांडुरंग महात्म्यमु’ (पांडुरंग महात्म्य) और ‘घटिकाचल महात्म्यमु’(घटिकाचल महात्म्य) की रचना की. कृष्णदेव राय के युग में प्रबंध काव्यों की बहुलताहोने कारण उसे ‘प्रबंध युग’ भी कहा जाता है.

    कृष्णदेव राय स्वयं प्रकांड पंडित और कवि थे. उन्होंने संस्कृत में ‘मदालसा चरित्र’, ‘सत्यवधू परिणय’, ‘ज्ञान चिंतामणि’, ‘रसमंजरी’ तथा ‘जांबवती परिणय’ की रचना की. 1511 में उन्होंने तेलुगु में ‘आमुक्‍तमाल्यदा’ की रचना की. विशिष्‍टाद्वैत को प्रतिपादित करनेवाला यह प्रबंध काव्य तेलुगु साहित्य की अनुपम कृति है. कृष्णदेव राय कृत ‘आमुक्‍तमाल्यदा’ में आंडाल(गोदादेवी) के बाल्यकाल से लेकर भगवान विष्‍णु से उनके विवाह तह की यात्रा का वर्णन अंकित है. इसमें वैष्णव भक्‍त विष्णुचित्त की कथा भी वर्णित है अत: इसे ‘विष्णुचित्तीयमु’ के नाम से भी जाना जाता है.

    ‘आमुक्‍तमाल्यदा’ की संक्षिप्‍त कथावस्तु इस प्रकार है. मत्स्यध्वज नामक पांड्‍य नरेश मदुरा नगर का राजा था. वह विलासी पुरुष था. एक दिन उसने किसी ब्राह्‌मण के मुँह से यह सुना कि अंधेरे को त्यागने से ही उजाला होगा, यौवन भीतने से ही वार्धक्‍य होगा अत:मनुष्य को उस जगत्‌ में अलौकिक तत्व की प्राप्ति हेतु उद्‌योग करना चाहिए. उसकी बातों से इस भौतिक संसार के प्रति राजा का मोहभंग हो गया. संसार में सबसे उत्तम धर्म पर विचार करने हेतु अगले ही दिन उन्होंने सभा का आयोजन किया जिसमें हर प्रांत के धर्माचार्य पधारे.

    श्रीविल्लिपुत्तूर में विष्णुचित्तनामक वैष्णव भक्‍त रहता था. वह अहर्निश श्री मन्नार स्वामी(भगवान श्रीकृष्ण) की आराधना करता था. कहा जता है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं विष्णुचित्त को विशिष्‍टाद्वैत संप्रदाय की श्रेष्‍ठता प्रमाणित करने की प्रेरणा दी तो विष्‍णुचित्त ने अपने आराध्‍य भगवान से निवेदन किया कि -

    "गृह सम्मार्जनमो, जलाहरणमो, शृंगार पल्यंकिका
    वहनंबो, वन मालिका करणमो, वाल्लभ्यल शयध्वजा
    ग्रहणम्बो, व्यजनातपत्र-धृतियो, प्राउदीपिकारोपमो
    नृहरी, वादमुलेल्लेरे यितरुलु नीलीलकुंबात्रमुल्‌ ॥"
    (कृष्णदेव राय, ‘आमुक्‍तमाल्यदा’)
    (हे भगवान! घर की साफ सफाई करना, जल लाना, शृंगार पालकी का वहन करना, पुष्पमाला तैयार करना, शयन का प्रबंध करना, पंखा झलाना और दीपक जलाना आदि सेवाएँ ही मुझसे बन अपड़ती हैं. भला मैं शास्त्रार्थ क्या जानूँ? हे प्रभु! तुम्हारी लीलाओं का वर्णन करना क्या मेरे लिए संभव है?)

    भगवान के आग्रह पर विष्णुचित्त ने पांड्‍य नरेश मत्स्यध्वज के दरबार में पहुँचकर विशिष्‍टाद्वैत का प्रतिपादन किया और वापस अपने नगर आकर भगवान की आराधना में लीन हो गया.

    एक दिन उद्‍यान के सरोवर के निकट विष्णुचित्त को एक बालिका मिली. उसे ही आंडाल या गोदादेवी के नाम से जाना जाता है. वह अपने हाथों से सुंदर पुष्पमालाएँ गूँथती और स्वयं पहनकर निहारती थी. तत्पश्‍चात्‌ उन्हें भगवान को पहनाती थी. कहा जाता है कि इसी संदर्भ के अनुसार इस काव्य का नाम ‘आमुक्‍तमाल्यदा’ पड़ा अर्थात्‌ स्वयं धारण की हुई माला को समर्पित करना. गोदादेवी की माधुर्य भक्‍ति से प्रसन्न होकर श्रीरंगेश(रंगनाथ, आंडाल के आराध्य भगवान विष्णु) ने उनसे विवाह किया.

    ‘आमुक्‍तमाल्यदा’ मे लोक जीवन का चित्र भी अंकित है. इसमें द्रविड स्त्रियों की जीवन शैली का चित्रण, मछुआरों का वर्णन, ग्रामीण स्त्रियों का हास-परिहास आदि का सुंदर समायोजन हुआ है. कृष्णदेव राय ने इस प्रबंध काव्य में तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिवेश को उकेरा है.


    कृष्णदेव राय के शासन काल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ जो आज भी प्रसिद्‍ध हैं. उनमें से एक है अनंतपुर जिले में स्थित पेनुगोंडा का ‘लेपाक्षी मंदिर’. कहा जाता है कि 1538 में विजयनगर साम्राज्य के कोषाध्यक्ष विरूपन्ना ने इस मंदिर का निर्माण किया. यहाँ पापनाशेश्‍वर, श्रीराम, वीरभद्र और दुर्गा की पूजा होती है. भारत में सबसे बड़ी नंदी की मूर्ति यहाँ स्थित है. इतना ही नहीं हंपी में आज भी विजयनगर साम्राज्य के अवशेष पाए जाते हैं.




    उल्लेखनीय है कि आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा इस वर्ष विजयनगर साम्राज्य के इस सबसे यशस्वी शासक श्री कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक(24 जुलाई, 1509) की पाँचवी शताब्दी का उत्सव मनाया गया जिसका उद्‍घाटन राष्‍ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल ने किया. वास्तव में कृष्णदेव राय ने विजयनगर साम्राज्य को भारतीयता के सांस्कृतिक गढ़ के रूप में प्रतिष्‍ठित किया था. उनके राज्याभिषेक की छठी शताब्दी की आरंभ के अवसर पर उनकी सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का संकल्प ही ऐसे आयोजनों को सार्थकता प्रदान कर सकता है.