मंगलवार, 14 जुलाई 2015

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की पत्रकारिता

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की पत्रकारिता 

- ऋषभ देव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा 

भारत के दक्षिणपूर्व समुद्र तट पर अवस्थित अविभाजित आंध्रप्रदेश राज्य (जो अब 2 जून 2014 से आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के रूप में नवगठित हो चुका है) क्षेत्रफल की दृष्टि से 2 जून 2014 तक देश का चौथा और जनसंख्या की दृष्टि से पांचवाँ सबसे बड़ा राज्य था जिसमें तीन क्षेत्र शामिल हैं – तेलंगाना, तटीय आंध्र और रायलसीमा. अविभाजित आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद ही फिलहाल नवगठित दोनों प्रांतों की राजधानी है. आंध्र और तेलंगाना की राजभाषा तेलुगु रही है. उर्दू यहाँ की सहराजभाषा है और हिंदी, मराठी, तमिल, कन्नड़ तथा उड़िया भाषियों की भी यहाँ बड़ी तादाद है. स्मरणीय है कि अविभाजित आंध्रप्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को तत्कालीन आंध्रप्रदेश के साथ हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को सम्मिलित करके किया गया था. वर्तमान में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना राज्य से तेलुगु, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी की अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं. प्रमुख तेलुगु पत्र-पत्रिकाएँ हैं – ईनाडु, आंध्रभूमि, आंध्रप्रभा, आंध्रपत्रिका, आंध्रज्योति, प्रजाशक्ति, साक्षी, वार्ता, सूर्या, नमस्ते तेलंगाना और विशालांध्रा. उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में सम्मिलित हैं – अवाम, इत्तेमाद (डेली), मुंसिफ (डेली), सियासत (डेली), ब्लिट्ज़. राज्य के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्र हैं – डेली हिंदी मिलाप और स्वतंत्र वार्ता. साथ ही अनेक पत्रिकाएँ हिंदी में प्रकाशित होती हैं. इनके अलावा अंग्रेज़ी के जिन पत्रों के संस्करण आंध्रप्रदेश से प्रकाशित होते हैं उनमें शामिल हैं – डेक्कन क्रोनिकल, हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, बिजनस लाइन, इकोनॉमिक टाइम्स, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, प्लेज और हंस इंडिया. उल्लेखनीय है कि आंध्रप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. तेलुगु पत्रकारिता तो 19वीं शताब्दी के दूसरे दशक से ही आरंभ हो गई थी. इसके बाद उर्दू पत्रकारिता का उदय 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हुआ जबकि हिंदी पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा चलाये गए हिंदी प्रचार अभियान के दौर में और खास तौर से ब्रिटिश और निजाम शासन के विरुद्ध आर्य समाज की राष्ट्रीय गतिविधियों के साथ बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के आरंभिक वर्षों में उदित हुई. 

1. आंध्रप्रदेश की तेलुगु पत्रकारिता 
तेलुगुभाषी प्रांत आंध्रप्रदेश में प्रकाशन की सुविधा और पत्रकारिता के इतिहास का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि ईसाई मिशनरियों के प्रयास से 1747 में तेलुगु में ‘बाइबिल’ का प्रकाशन हुआ. आगे चलकर 1818 में मछलीपट्टनम (बंदरु, जिला कृष्णा) से ‘हितवादी’ और 1835 में बल्लारी से ‘सत्यदूत’ – ये दो तेलुगु पत्रिकाएँ निकलीं जो ईसाई धर्मप्रचार पर केंद्रित थीं. सुरवरम प्रताप रेड्डी ने ‘आंध्रुला सांघिक चरित्र’ (आंध्र का समग्र इतिहास) नामक ग्रंथ में यह सूचित किया है कि 19वीं शताब्दी के मध्य काल में ‘श्रीयक्षिणी’ (साप्ताहिक) प्रकाशित होती थी जिसे उन्होंने तेलुगु भाषा की प्रथम पत्रिका माना है. लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी हुई पहली तेलुगु पत्रिका 1838 में मंडिगल वेंकटराय शास्त्री के संपादन में मद्रास से प्रकाशित हुई जिसका नाम था ‘वृत्तांतिनी’. इसमें सरकार से संबंधित टिप्पणी, जुलूस तथा हड़ताल आदि से संबंधित समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते थे. वास्तव में ‘वृत्तांतिनी’ को पहली देसी तुलुगु पत्रिका होने का गौरव प्राप्त है. (डॉ.बालशौरि रेड्डी, ‘तेलुगु पत्रिकला चरित्र’, (तेलुगु पत्रिकाओं का इतिहास), एमएसको बुक्स, हैदराबाद, 2010).

1842 में पुव्वाड वेंकटराव के संपादकत्व में ‘वर्तमान तरंगिणी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ जो आठ वर्ष तक चला. इस पत्रिका को संस्कृत महाकाव्यों का तेलुगु अनुवाद प्रकाशित करने का श्रेय है. इसके अतिरिक्त 1848 में ‘हितवादी’ और ‘दिन वर्तमान’ जैसी पत्रिकाएँ निकलनी शुरू हुईं जिनमें क्षेत्रीय समाचारों के साथ साहित्यिक विषयों का भी समावेश होता था. उल्लेखनीय है कि 1862 में पूर्णरूप से साहित्यिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक विषयों को समर्पित मासिक पत्रिका ‘सुजन रंजनी’ आरंभ हुई जो बाद में त्रैमासिक हो गई. 1863 में बल्लारी से ‘श्रीयक्षिणी’ तथा 1865 में मद्रास से ब्रह्मसमाज की पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. इन पत्रिकाओं ने विदेशी धर्मप्रचार का सामना करने के लिए भारतीय दर्शन, धर्म, निष्ठा, स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति और समाज सुधार पर ध्यान केंद्रित किया. ये पत्रिकाएँ अंग्रेज़ों के अत्याचार के विरुद्ध भी खुलकर लिखतीं थीं. (चर्ल अन्नपूर्णा, तेलुगु पत्रकारिता (आलेख), भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, 2000, (सं.) दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा). इस अवधि की एक अन्य पत्रिका थी ‘आंध्र भाषा संजीवनी’. इसमें भी साहित्य, समाज और राजनीति विषयक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित होती थीं. तेलुगु भाषा के विकास में इस पत्रिका का योगदान अत्यंत महवपूर्ण है. तेलुगु पत्रकारिता के प्रथम दौर की इन सभी पत्रिकाओं ने सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रीय चेतना को उद्बुद्ध करने के साथ साथ आंध्र क्षेत्र के नए लेखकों को प्रोत्साहित करने का बड़ा काम किया. यहाँ ‘पुरुषार्थ प्रदायिनी’ (1872 से प्रकाशित/ (सं) उमा रंगनायकुलु), ‘स्वधर्म प्रकाशिनी’, सुधीरंजनी’ और ‘सकल विद्याभिवर्धिनि’ का भी उल्लेख किया जा सकता है जिनमें तेलुगु मुहावरे, लोकोक्तियाँ, प्राचीन सूक्तियाँ और ऐतिहासिक गाथाएं प्रकाशित होती थीं. 

1874 में आधुनिक तेलुगु भाषा के सुधार आंदोलन के प्रवर्तक कंदुकूरि वीरेशलिंगम द्वारा राजमहेंद्री से प्रकाशित ‘विवेकवर्धनि’ के साथ तेलुगु पत्रकारिता के नए युग का सूत्रपात हुआ. “वहीं से उन्होंने सन 1874 में ‘विवेकवर्धनि’, सन 1883 में ‘सतीहितबोधिनि’, सन 1892 में ‘सत्यसंवर्धनि’, सन 1905 में ‘सत्यवादिनि’ नामक पत्रिकाओं का क्रमश: प्रकाशन किया और सामाजिक परिवर्तन तथा राष्ट्रीय जागरण के प्रधान आधार के रूप में इन्हें स्थापित किया. इतना ही नहीं उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि लोगों की रुचि ही समाचार पत्र की असली पूंजी है. उस समय की प्रगतिविरोधी शक्तियों, मठाधीशों, धोखेबाजों और गुंडों की भी उन्होंने अच्छी ख़बर ली. उनकी पत्रिकाओं से ये असामाजिक तत्व थर-थर कांपते थे.” (वही) 

यहाँ किसी अंग्रेज़ी पत्रिका के प्रथम तेलुगुभाषी संपादक के रूप में प्रतिष्ठित नेल्लूर वासी दामपुरी नरसैया का उल्लेख आवश्यक है. उन्होंने अंग्रेज़ी में मद्रास से ‘द नेटिव एडवोकेट’ (साप्ताहिक) का संपादन किया. साथ ही अनेक समाज सुधारकों तथा ब्रह्म समाज से प्रभावित होकर 1871 में नेल्लूर से ‘नेल्लूर पायोनियर’ का प्रकाशन किया. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर 1881 से’ 1897 तक की अवधि में ‘पीपुल्स फ्रेंडली’ (अंग्रेज़ी साप्ताहिक) का प्रकाशन किया. दामपुरी नरसैया को तेलुगु के प्रथम साप्ताहिक ‘आंध्र भाषा ग्राम वार्तामणि’ के प्रकाशन का भी श्रेय प्राप्त है जिसे उन्होंने ग्रामीण, निर्धन और दलित समुदाय के हितों के लिए समर्पित किया. 

1876 में वी.कृष्णमाचार्युलु के संपादकत्व में मद्रास स्कूल बुक एंड वर्नाकुलर लिटरेचर सोसाइटी की ओर से मद्रास से प्रथम बालोपयोगी तेलुगु पत्रिका ‘जनविनोदिनि’ निकली. इस अवधि की अन्य उल्लेखनीय पत्रिकाएँ हैं - ‘शशिरेखा’ (1874 से/ मद्रास/ (सं) गटुपल्लि शेषाचार्युलु), ‘आंध्रप्रकाशिका’ (1885 से/ (सं) ए.वी.पार्थसारथी नायुडु), ‘देशाभिमानी’ (मासिक) (1890 से/ बेजवाड़ा (विजयवाडा) : (सं) देशगुप्तम शेषाचलपति द्वारा आरंभ यह पत्र आगे चलकर दैनिक हो गया. अतः ‘देशाभिमानी’ को तेलुगु का प्रथम दैनिक समाचार पत्र माना जाता है), ‘मनोहारिणि’ (नरसापुर/ (सं) अखिलन), ‘चिंतामणि’ ((सं) न्यायपति सुब्बाराव). तेलुगु पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास में स्त्री संबंधी प्रथम पत्रिका के रूप में ‘सतीहितबोधिनि’ (सं. वीरेशलिंगम पंतुलु) के अतिरिक्त स्वयं महिलाओं द्वारा संपादित ये पत्रिकाएँ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – ‘सौंदर्यवल्ली’ (मद्रास/ (सं) श्रीमती रामबाई), ‘हिंदू सुंदरी’ (काकीनाडा/ (सं.) मोसलिकंटि रामबायम्मा), ‘सावित्री’ (सं. पुलुगुर्ति लक्ष्मी नरसमाम्बा), ‘अनसूया’ (सं. विन्जमूरि वेंकट रत्नम्मा). 

बीसवीं शताब्दी में तेलुगु पत्रकारिता का बहुमुखी विकास हुआ तथा इसके माध्यम से “व्यावहारिक भाषा” को लोकप्रियता प्राप्त हुई. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के युग में देशभक्त कोंडा वेंकटप्पय्या (1902, बंदरु – कृष्णा पत्रिका), चिलकमर्ती लक्ष्मी नरसिम्हम (मनोरमा – 1906, देशमाता – 1910) और मुट्नूरी कृष्णाराव (1907 से कृष्णा पत्रिका के संपादक) जैसे पत्रकारों के नाम प्रमुख हैं. 1905 में “वंदेमातरम आंदोलन” के प्रबल होने पर तेलुगु पत्रकारिता में राष्ट्रीयता का जमकर विकास हुआ. अंग्रेज़ विरोधी तेवर के कारण चिलकमर्ती लक्ष्मी नरसिम्हम (भारतभूमि एक दुधारू गाय है, अंग्रेज़ रूपी चालाक ग्वाले भूखे बछड़े की तरह रोती हुई भारतीय जनता के मुँह को छींके से बाँधकर इस गाय का दूध अपने लिए दुह रहे हैं.) और ‘स्वराज्य’ (1908) के संपादक गाडिचर्ल हरिसर्वोत्तम राव (अरे रे! फिरंगी! क्रूर व्याघ्र!) को जेल यात्रा करनी पड़ी. इस युग में चिल्कूरी वीरभद्रराव ने राजमहेंद्री से ‘आंध्रकेसरी’ और चिल्लरिगि श्रीनिवास राव ने मछलीपट्टनम से ‘नवयुग’ का प्रकाशन किया. जैसा कि ऊपर संकेत किया जा चुका है 1902 में देशभक्त कोंडा वेंकटप्पय्या और दासु नारायण राव द्वारा शुरू की गई ‘कृष्णा’ पत्रिका से 1907 में मुट्नूरि कृष्णा राव संपादक के रूप में जुड़े. इस पत्रिका से अवटपल्ली नारायण राव, पट्टाभि सीतारामैया, कोपल्ले हनुमंता राव और कौता राममोहन शास्त्री भी संबद्ध रहें. 

‘कृष्णा पत्रिका’ के समान ही ‘आंध्र पत्रिका’ ने भी राष्ट्रीय आंदोलन काल में संघर्षशील पत्रकारिता का इतिहास रचा. इसे 1908 में साप्ताहिक के रूप में काशीनाथुनि नागेश्वरराव पंतुलु ने मुंबई से आरंभ किया था. 1914 में इसे दैनिक पत्र के रूप में मद्रास स्थानांतरित कर दिया गया. बाद में दैनिक और साप्ताहिक ‘आंध्र पत्रिका’ के साथ साथ काशीनाथुनि नागेश्वर राव पंतुलु ने साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘भारती’ भी निकाली. पंतुलु के प्रयास से तेलुगु जनता में पठन-पाठन के संस्कार का प्रभूत विस्तार हुआ और उनकी प्रेरणा से अनेक देशभक्त युवक पत्रकारिता के क्षेत्र में आए. स्मरणीय है कि विश्वनाथ सत्यनारायण का विख्यात महाकाय उपन्यास ‘वेयीपडगलु’ (सहस्रफण) ‘आंध्र पत्रिका’ में दैनिक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था. 

“बाद में ‘आंध्र साहिती परिपुष्पत्रिका’ नामक पत्रिका सन 1912 में प्रकाशित हुई. इसी युग में ‘त्रिलिंग’ नामक पत्रिका सन 1916 में निकली. इसी प्रकार सन 1923 में निकली ‘मुत्याला सरस्वती’ नामक पत्रिका ने प्राचीन प्रबंध काव्यों के प्रचार को प्रधानता दी. सन 1924 में प्रकाशित ‘आंध्र सर्वस्वम’ और ‘सारस्वत सर्वस्वम’ आदि पत्रिकाएँ उल्लेखनीय हैं. इसी वर्ष में प्रकाशित ‘प्रबुद्धान्ध्र’ नामक पत्रिका में गिडुगु राममूर्ति जी के व्यावहारिक भाषा वाद को समर्थन मिलता है.” (एल.विश्वनाथ रेड्डी, तेलुगु भाषा के विकास में पत्रिकाओं का योगदान, सहस्र वर्षों का तेलुगु इतिहास, (सं) यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद). 

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने तेलुगु पत्रकारों की एक और नई पौध तैयार की. इनमें टंगुटूरी प्रकाशम पंतुलु का नाम शीर्षस्थ है जिन्होंने 1921 में मद्रास से ‘स्वराज्य’ का अंग्रेज़ी, तमिल और तेलुगु में प्रकाशन आरंभ किया. उनके बाद गोविंदराजुलु वेंकट कृष्णा राव ने भी मद्रास से ही ‘नवयुगम’ का प्रकाशन किया. उन्हें तेलुगु के प्रथम साम्यवादी पत्रकार माना जाता है. ‘मातृसेवा’ (1922, ताड़िपत्री से, गाडिचर्ल हरिसर्वोत्तम राव), ‘कांग्रेस’ (1922, राजमहेंद्री, अन्नपूर्णय्या) तथा ‘सत्याग्रही’ (एलुरु, आत्मकूरी गोविंदाचार्युलू) को ब्रिटिश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा. ‘कांग्रेस’ के कई संपादकों को जेलयात्रा भी करनी पड़ी. राष्ट्रीय आंदोलन को तीव्रतर बनाने में एलुरु से प्रकाशित ‘गान्डीवमु’ और ‘देवदत्तमु’, मद्रास से प्रकाशित ‘जन्मभूमि’ (एक कानी – तीन कौड़ी मूल्य के कारण ‘कानी’ पत्रिका नाम से प्रसिद्ध) तथा नेल्लूरु से प्रकाशित ‘जमीनु रैतु’ (1928) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

राष्ट्रीय आंदोलन काल में रायलसीमा और तेलंगाना क्षेत्र से भी कई तेलुगु पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं. ‘मातृसेवा’ (ताड़िपत्री), ‘हास्य मंजूषा’ (अनंतपुर), ‘पिनाकिनी’, ‘कौमोदिकी’ (नंदयाल), ‘इंद्रावती’ (सं. वनम शंकर शर्मा), ‘विजयवाणी’ (सं. मूलनारायण स्वामी), ‘ब्रह्मनंदिनी’ (कडपा, (सं.) स्वधानम कृष्णमुनी) रायलसीमा की प्रतिनिधि पत्रिकाएँ रहीं. यहाँ उल्लेखनीय हैं कि तेलंगाना क्षेत्र में तेलुगु पत्रकारिता का विकास अपेक्षाकृत पिछड़ा रहा क्योंकि यह इलाका निजाम शासन में दबा हुआ था. इसके बावजूद ‘हितबोधिनि’ (1913, महबूब नगर), ‘तेलुगु पत्रिका’ (1920, इन्गुर्ति), ‘नीलगिरि’ (नलगोंडा), ‘गोलकोंडा’ (1925, सुरवरम प्रताप रेड्डी) तथा ‘सुजाता’ (1927, (सं.) सुरवरम और मंडपाटि) ने तेलंगाना क्षेत्र की तेलुगु पत्रकारिता को निजी पहचान प्रधान की. आगे चलकर 1933 – 38 की अवधि में तेलंगाना क्षेत्र से ‘देशबंधु’, ‘दक्कन केसरी’, ‘आंध्र वाणी’, ‘तेलुगु तल्लि’ और ‘विभूति’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. 1945 में राजगोपाल मुदलियार ने अंग्रेज़ी दैनिक ‘दक्कन क्रोनिकल’ के साथ साथ तेलुगु दैनिक ‘तेलंगाना’ का प्रकाशन आरंभ किया जो बाद में बंद हो गया. उन्होंने ही आगे चलकर ‘आंध्र भूमि’ तेलुगु दैनिक निकाला जो अभी तक चल रहा है. तेलुगु दैनिक ‘मिज़ान’ भी 1945 में हैदराबाद से आरंभ हुआ. इसके अलावा निज़ाम शासकों के शोषण चक्र के विरुद्ध किसानों के क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थन में विजयवाडा से ‘प्रजाशक्ति’ (सं. रामानुजराव) का प्रकाशन आरंभ हुआ – यह दैनिक पत्र भी अब तक चल रहा है.). 

तेलुगु पत्रकारिता को उद्योग के रूप में विकसित करने का प्रथम श्रेय 1937 से प्रकाशित समाजवादी पार्टी के पत्र ‘नवशक्ति’ और 1938 से प्रकाशित रामनाथ गोयनका के पत्र ‘आंध्रप्रभा’ को जाता है. विशेष रूप से ‘आंध्रप्रभा’ दैनिक ने तेलुगु पत्रकारिता में अनेक नए आयाम जोड़े. स्वातंत्र्यपूर्व युग की तेलुगु पत्र-पत्रिकाओं में ‘जनवाणी’, ‘प्रतिभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘प्रबुद्ध आंध्र’, ‘उदयिनी’, ‘ज्वाला’’, साहिती’, ‘विज्ञानमु’, ‘बाला’ और ‘चंदामामा’ के नाम उल्लेखनीय हैं. इन्होंने तेलुगु के व्यावहारिक भाषारूप को लोकप्रियता प्रदान की तथा साहित्यिक पत्रकारिता, महिला पत्रकारिता, विज्ञान पत्रकारिता और बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. 

तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास से पता चलता है कि 1939 से 42 तक समाजवादी दल द्वारा गुप्त रूप से ‘स्वतंत्र भारत’ का प्रकाशन किया जाता था. इसके अलावा ‘जनता’, ‘संदेशम’, ‘विशालांध्र’, ‘जनवाणी’, ‘नगारा’ जैसी पत्रिकाओं ने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए डटकर संघर्ष किया. ‘विशालांध्र’ 1952 से दैनिक हो गया. ये पत्र-पत्रिकाएँ साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करने वाली रहीं. ‘नवयुग’ (युवाओं के लिए), ‘आंध्र वनिता’ (महिलाओं के लिए) ‘वर्कर’ (श्रमिकों के लिए) तथा ‘अभ्युदय’ (प्रगतिशील लेखक संघ) भी प्रगतिशील विचारधारा की विशिष्ट पत्रिकाएँ हैं. 

तेलुगु पत्रकारिता का नया उन्मेष तीन ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा है – भारत की आजादी (1947), आंध्र प्रांत का गठन (1953) और आंध्र प्रदेश का निर्माण (1956). पहले मद्रास से छपने वाले तेलुगु समाचार पत्र अब आंध्र प्रदेश में छपने लगे. आंध्रप्रभा (1959), आंध्रपत्रिका (1965), आंध्रज्योति (1967), प्रभा और ज्योति आदि सचित्र दैनिक और साप्ताहिक पत्र एकाधिक केंद्रों से प्रकाशित होने लगे. 1974 में विशाखपट्टनम से और 1975 में हैदराबाद से ‘ईनाडु’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ हुआ. 

वर्तमान में आंध्रप्रदेश भर से तेलुगु की लगभग 500 पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं. इनमें प्रसार संख्या की दृष्टि से ईनाडु, आंध्रज्योति, आंध्रभूमि पहले तीन स्थानों पर हैं. वर्तमान उपलब्ध प्रमुख तेलुगु दैनिक समाचार पत्र हैं – आंध्रभूमि, आंध्रज्योति, आंध्रपत्रिका, ईनाडु, ईमाता, वार्तलु, आंध्रप्रभा, विशालांध्रा, प्रजाशक्ति, विजेता, वार्ता, साक्षी, सूर्या, नेटि तेलंगाना. साप्ताहिक तेलुगु पत्रिकाओं में आंध्रभूमि, आंध्रज्योति, आंध्रप्रभा, स्वाति, चित्रभूमि, ज्योतिचित्र, मयूरी, सितारा, शिवरंजनी, इंडिया टुडे (तेलुगु), रचना, कृष्णा पत्रिका, प्रतिभा, प्रगति के नाम उल्लेखनीय हैं. तेलुगु की मासिक पत्रिकाओं के अंतर्गत मुख्य रूप से अन्नदाता, चतुरा, स्वाति, उद्योग विजयालु, विपुला, चतुरा, आंध्रभूमि, प्रजासाहिती, पालपिट्टा, प्रतिबिंबम, माभूमि, गमनम, ग्रामस्वराज्यम, अभिनय, मनिदीपम, चिनुकु, प्रजाशक्ति, उज्वला, कापुमित्रा, कापुसत्ता, कापुयुवता, भूमिका, महिलाज्योति, माधुरी-2, रैतुनेस्तम, रैतुमित्रा, आंध्रप्रदेश, मयूरी अत्यंत उपयोगी पत्रिकाएँ हैं. इसके अतिरिक्त वेदांतभेरी, शुभवार्ता, सप्तगिरी, सनातन सारथी, अक्षरमैथिली, उषश्री, सनमार्गामु, भक्तिप्रपंचम, ज्ञानभूमि, मणिदीपम, पुण्यक्षेत्रालु, तिरुपति, ओंकारवेदमु, ऋषिपीठमु आदि आध्यात्मिक वर्ग की तेलुगु पत्रिकाओं के रूप में उल्लेखनीय है. फिल्म पत्रकारिता भी तेलुगु में अत्यंत लोकप्रिय हैं. इस कोटि की मुख्य पत्र-पत्रिकाएं हैं – सितारा (1976, मासिक), चलनचित्र (1973, मासिक), सिनी सम्राट (1997), स्टार डिटेक्टिव (1998, पाक्षिक), सिनिमा चांस (1998), संतोषम (2002, साप्ताहिक), उल्लासम (2003, मासिक), सुमांजलि (2003, साप्ताहिक), केमेरा (2003, साप्ताहिक), सिनी गूढ़ाचारी (1987, साप्ताहिक), सिनेमा (1984, मासिक), सिनीरमा (1976), ज्योतिचित्रा (1977), चित्रभूमि (1980, साप्ताहिक), सिनीविनोदमु (2002, तेलुगु – हिंदी साप्ताहिक), चित्रांजलि (2001, साप्ताहिक), चित्रम (2001, साप्ताहिक), मूवी लैंड्स (2002, साप्ताहिक), मा (1998, मासिक), शिवरंजनी (1986, मासिक; 1997, साप्ताहिक), मेघसंदेशम (1997, साप्ताहिक), सिनी मार्जिन (1986, साप्तहिक) और आंध्रभूमि (सिनेमा – 1981, साप्ताहिक). इसी प्रकार प्रमुख तेलुगु बालपत्रिकाओं में चंदामामा, बंगारुबोम्मा (1976, मासिक), चिन्नारीलोकम (1985, मासिक), आंध्रबाला (1995, मासिक), बाल जोजो वेन्नला (2000, मासिक), चिन्नारुलु (2002, मासिक), सिसिंद्रीलु (2006, मासिक) और बालतेजम (2006) के नाम सम्मिलित हैं. 

तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास की सबसे नई ऐतिहासिक परिघटना के रूप में फरवरी 2004 से आरंभ पहले वैश्विक तेलुगु समाचार पत्र के प्रकाशन का उल्लेख किया जा सकता है. ‘तेलुगु टाइम्स’ के नाम से प्रकाशित यह समाचार पत्र भारत और विदेशों के मीडिया और व्यवसाय जगत के अनुभवी पत्रकारों द्वारा चलाया जा रहा है. इसके पृष्ठ तैयार तो हैदराबाद के कार्यालय में किए जाते हैं लेकिन उन्हें सीधे अमेरिका स्थित प्रेस को प्रेषित कर दिया जाता है और उन्हें वहीं में मुद्रित और वितरित किया जाता है. वास्तव में ‘तेलुगु टाइम्स’ का प्रकाशन उत्तरी अमेरिका में बसे हुए पांच लाख प्रवासी तेलुगुभाषियों की मीडिया और जनसंचार संबंधी अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए आरंभ किया गया है. 

2. आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता 
आंध्रप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास का दूसरा आयाम उर्दू पत्रकारिता से संबंधित है. आंध्रप्रदेश की प्रथम उर्दू पत्रिका का प्रकाशन 1857 ई में हआ जब आसफ़जाही शासन के दौरान हैदराबाद से स्वास्थ्य संबंधी पत्रिका ‘तिबाबत’ निकली. आजे चलकर 1860 में काज़ी मोहम्मद क़ुतुब के संपादन में हैदराबाद का पहला उर्दू समाचार पत्र ‘आफ़ताब दक्कन’ आरंभ हुआ जो वास्तव में हैदराबाद की सभ्यता, संस्कृति और विभिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक और राजमहल संबंधी गतिविधियों की सूचनाएँ जनता को देने का माध्यम बना. इसी प्रकार 1869 से 1948 तक हैदराबाद राज्य के गजट के प्रकाशन की भी जानकारी मिलती है. ‘आफ़ताब दक्कन’ (1860) के अलावा ‘खुर्शीद दक्कन’ (1877) को भी इस राज्य का पहला उर्दू समाचार पत्र माना जाता है. प्रथम उर्दू ‘दैनिक’ समाचार पत्र के स्थान के भी दो दावेदार हैं. पहला 1883 में सुल्तान मोहम्मद आकिल देहलवी द्वारा संपादित ‘खुर्शीद दक्कन’ तथा दूसरा 1888 में हाजी करतान द्वारा संपादित ‘शौकत उल इस्लाम’. 19वीं शताब्दी के अंतिम पच्चीस वर्षों में प्रकाशित अन्य उर्दू पत्रों में शामिल हैं ‘अखबार आसफी’ (1885), ‘अफ़सर उल अखबार’ (1886) और ‘अफ़सर’ (1897). 

‘भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन’ (2000) में सम्मिलित ‘उर्दू पत्रकारिता’ विषयक निबंध में नेहपाल सिंह वर्मा यह जानकारी दी है कि “हैदराबाद के पत्रकारिता जगत के सबसे महत्वपूर्ण समाचार पत्र ‘मुशीर दक्कन’ का संपादन 1892 ई. में स्व. किशनराव ने किया. उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में शायद ही कोई दूसरा समाचार पत्र इतना पुराना इतिहास रखता है. यह पत्र 22 अप्रैल 1892 से 10 दिसंबर 1898 ई. तक नियमित प्रकाशित होता रहा. कुछ दिन बंद रहा. पुनः 1899 ई. से प्रकाशित होने लगा. 1898 ई. में आपत्तिजनक निबंध के प्रकाशन के आरोप में किशनराव को शहर से निकाल दिया गया. उन्होंने इसे मद्रास से निकाला और फिर 1899 ई. से इसे पुनः हैदराबाद से प्रकाशित किया. 1902 ई. में सादिक़ हुसैन ने ‘इल्म व अमल’ प्रकाशित किया. 1901 ई. में समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं की संख्या 14 थी जिनमें 12 उर्दू के और 2 मराठी के थे. इनमें सात दैनिक पत्र थे. इनमें ‘मुशीर दक्कन’ ही ऐसा दैनिक पत्र था जो 1970 ई. तक प्रकाशित होता रहा. इस दैनिक ने पत्रकारिता को एक नया रूप दिया. उस समय लोगों की राजनैतिक समाचारों में रुचि कम थी, कोई संवादवाहिनी संस्था नहीं थी. बादशाह को ईश्वर के बाद शक्ति का अवतार मानते थे. ऐसे समय 1904 ई. में मोहब हुसैन ने ‘इल्म व अमल’ जारी किया. यह वह समय था जब राष्ट्रीय कांग्रेस की हवा हैदराबाद पहुँच गई थी. केशवराव कोरटकर, वामन नायक, मुल्ला अब्दुल कय्यूम, डॉ.रघुनाथ चट्टोपाध्याय, पं. तारानाथ, बैरिस्टर श्री किशन और बैरिस्टर मोहम्मद असगर ने निजाम राज्य में जनजागृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लेख लिखे.” ‘मुशीर दक्कन’ को पत्रकारिता के मूल्यों की स्थापना का श्रेय दिया जाता है.” (नेहपाल सिंह वर्मा, ‘उर्दू पत्रकारिता’ (आलेख), भातरीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ.109). 

आगे चलकर 1911 में ‘मुआरिफ’ (मुल्ला अब्दुल बासित) और ‘उस्मान गजट’ (सैयद राजा शाह) के अतिरिक्त ‘सहीफ़ा’ ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की. इस पत्र ने साहित्यिक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बताया जाता है कि निजाम मीर उस्मान अली खान की उत्तर भारत की यात्रा के अवसर पर उनके साथ गए अकबर अली द्वारा प्रेषित ताज़ा समाचारों के कारण ‘सहीफ़ा’ को यह लोकप्रियता मिली. 1920–1948 की अवधि में अहमद मोहिउद्दीन द्वारा ‘रहबर दक्कन’ का प्रकाशन किया गया जो मजलिस इत्तहाद उल मुसलमीन का धार्मिक पत्र था. बाद में इसका नाम ‘रहनुमाये दक्कन’ कर दिया गया जो मुसलमानों और मुस्लिम धर्म के पक्षधर पत्र के रूप में आगे भी प्रकाशित होता रहा. 

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि रजाकार आंदोलन (1948) के कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियों ने इस राज्य में हिंदू-मुस्लिम एकता के वातावरण को बहुत क्षति पहुँचाई तो आर्य समाज के आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को शक्ति प्रदान की. “उस समय ‘रहबर दक्कन’, रैयत’ और ‘पयाम’ महत्वपूर्ण पत्र थे. सरकार ने जब देखा कि ‘रैयत’ राष्ट्रीयता का प्रचार कर रहा है तो उस पर रोक लगा दी गई. एम.नरसिंह राव, संपादक ने समाचार पत्र ही बंद कर दिया. ‘रैयत’ के बंद होते ही बी.रामकिशन राव और एम.नरसिंह राव (जो बाद में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हुए) के सहयोग से शोयब उल्लाह खान ने ‘इमरोज’ निकाला. शोयब उल्लाह खान गांधीवादी थे. उन्होंने खुलकर हैदराबाद में हो रहे सांप्रदायिक तांडव का विरोध किया. उन्होंने बादशाह उस्मान अलीखान को सलाह दी कि वह हैदराबाद को भारत में विलय कर देश की कौमी धारा से जुड़ जाएँ और रजाकारों की गतिविधियों को तुरंत बंद करा दें. रजाकारों ने उन्हें जान से मार डालने की धमकी दी और एक दिन जब वह साईकिल से काम कर वापस लौट रहे थे उन पर आक्रमण किया गया. उनका सीधा हाथ काट दिया गया और उन्होंने वहीं सड़क पर अपने प्राण छोड़ दिए. हैदराबाद की पत्रकारिता के इतिहास में यह पहले पत्रकार का बलिदान था, जो रंग लाया और भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल को हैदराबाद पर पुलिस एक्शन कर इसे भारत में विलय कराने का कार्य करना पड़ा. उसी समय प्रगतिवादी विचारधारा के दैनिक पत्र ‘पयाम’ (सं. अख्तर हसन) के कार्यालय पर भी आक्रमण किया गया और आग लगा दी गई.” (द्रष्टव्य - नेहपाल सिंह वर्मा, ‘उर्दू पत्रकारिता’, भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ. 110).

इन सब परिस्थितियों के समानांतर आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता की यात्रा आगे बढ़ती रही. ‘निजाम गजट’ (1927 : हबीब उल्ला रशदी, विकार अहमद), ‘सुबह दक्कन’ (1928 : अहमद आरिफ़, अली अशरफ़), ‘मज़लिस’ (1948 : हकीम गफ्फार अहमद अंसारी), ‘वक्त’ और ‘मंशूर’ (1928 : अब्दुल रहमान रईस), ‘सल्तनत’ (1930 : अहमद उल्लाह कादरी), ‘पयाम (1935 : काज़ी अब्दुल गफ़ार) के अनंतर 1942 (भारत छोड़ो आंदोलन) से 1948 (हैदराबाद का भारत में विलय) की अवधि में अनेक उर्दू पत्र-पत्रकार सामने आए. जैसे ‘मीज़ान’ (1942 : गुलाम मुहम्मद और हबीब उल्लाह ओज), ‘तन्जीम’ (1942 : अली अशरफ़), ‘इत्तहाद’ (1947 : अब्दुल इहाशमी), ‘मुस्तकबिल’ और ‘तामीर दक्कन’ (फैज़ उद्दीन ‘फैज़’), ‘इन्कलाब’ (मुरतुज़ा मुज्तहदी), ‘मुहबे वतन’ (लक्ष्मी रेड्डी), ‘आवाज़’ (अब्दुल कादर), ‘जिन्नाह’ (अज़हर रजवी), ‘हमदम’ (मुस्तफ़ा कादरी), ‘आगाज़’ (सैयद मोईन उलहक), ‘मंजिल’ (अज़हर रजवी), ‘इखदाम’ (मुरतुजा मुजतहदी), ‘नई जिंदगी’ (जे.एन.शर्मा), ‘शोईब’ (अनीस उलरहमान).

इसमें संदेह नहीं कि 1935 (‘पयाम’) से 1948 (‘इखदाम’) तक की अवधि आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रही. “बादशाह के समर्थक समाचार पत्रों में ‘निजाम दक्कन’ और ‘दक्कन’ प्रमुख थे. इन समाचार पत्रों में बादशाह की ओर से नज़री बाग से जारी निजाम के आदेश और फरमान छपते थे, जिन्हें बाद में हर समाचार पत्र को प्रकाशित करना पडता था. ‘रहबर दक्कन’, ‘मजलिस’, ‘इत्तहाद’, ‘जिन्नाह’, ‘आगाज़’ मजलिस के समर्थक समाचार पत्र थे. इन पत्रों ने स्वतंत्र हैदराबाद के लिए जनमत तैयार किया. ‘रैयत’, ‘पयाम’, ‘वक्त’ और ‘इमरोज़’ प्रजातांत्रिक शासन के लिए आवाज़ उठा रहे थे. ‘पयाम’ ने कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए काम किया. अंततः 1948 ई. में इन समाचार पत्रों का प्रकाशन रंग लाया और हैदराबाद राज्य का भारत में विलय हो गया.” (वही). उल्लेखनीय है कि 1948 में प्रगतिशील पत्रकार मुरतुजा मुज्तहदी द्वारा प्रकाशित ‘इखदाम’ से अनेक प्रगतिशील पत्रकार और लेखक संबंधित रहे जिनमें मखदूम मोहिउद्दीन और राज बहादुर गौड़ भी सम्मिलित थे. मुरतुजा ने 1950 में ‘अंगारा’ निकाला जिसके बंद होने पर मोईन फारुकी ने ‘अंगारे’ का प्रकाशन किया. 

1948 के बाद की अवधि में अर्थात निजामशाही के समापन के बाद अनेक नए उर्दू पत्र सामने आए जिनमें उल्लेखनीय हैं ‘नई जिंदगी’ (जे.एन.शर्मा), ‘हमदर्द’ (नक्श आलमी), ‘हमदम’ (जमाल उद्दीन और मुस्तफा कादरी), ‘ताजयाना’ (सआदत जहां), ‘हमारा इखदाम’ (शहरयार), ‘नया ज़माना’ (असद जाफ़री), ‘सल्तनत’ (सादउल्लाह कादरी), ‘पैसा अखबार’ (अहमद उल्लाह कादरी), ‘अंगारे’ (मोईन फारुकी), ‘वतन’ (रशीद बेग), ‘अमर भारत’ (पूरनचंद शाकिर), ‘सदाकत’ (वही उलहसन), ‘ज़बीह’ (इस्माईल ज़बीह), ‘हक’ (शेख चाँद), ‘नवीद दक्कन’ (अज़ीम अस्कंरी), मुंसिफ (महमूद अंसारी), ‘खून नाव’ (जी.एम.उरूज) आदि. इनके अलावा 1948 से हैदराबाद से ‘मिलाप’ (दैनिक उर्दू पत्र) निकला जिसके संपादक युद्धवीर थे. अपनी राष्ट्रीय चेतना और आर्य समाजी विचारधारा के कारण इसे हिंदुओं में खूब लोकप्रियता प्राप्त हुई. अब यह पत्र बंद हो चुका है. 

हैदराबाद की उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में ‘सियासत’ का अपना विशिष्ट स्थान है. इसे आबिद अली खान ने महबूब हुसैन ‘ज़िगर’ के साथ मिलकर 15 अगस्त 1949 से उर्दू दैनिक के रूप में आरंभ किया. वर्तमान में दैनिक ‘सियासत’ के साथ साथ मासिक ‘सियासत’ का भी प्रकाशन किया जाता है. इस पत्र को प्रगतिशील विचारधारा के लिए जाना जाता है. दैनिक ‘सियासत’ के वर्तमान संपादक है जाहिद अली खान. इसके जैसी ही लोकप्रियता ‘मुंसिफ’ को भी प्राप्त है जिसे महमूद अंसारी ने आरंभ किया था और अब भारतीय अमेरिकी खान लतीफ़ द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है. 

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि आंध्रप्रदेश की पत्रकारिता में उर्दू पत्रों और पत्रकारों का योगदान अविस्मरणीय है. यहाँ अंत में यह जोड़ना भी प्रासंगिक होगा कि शीर्षस्थ उर्दू पत्रकार जाहिद अली खान और नसीम आरिफी यह मानते हैं कि उर्दू मीडिया में अभी संसाधनों और प्रोफेशनलिज्म की कमी है जिसके कारण वह कुछ हद तक पिछड़ा हुआ है. इसके बावजूद वह बड़ी सीमा तक उर्दू भाषी जनता और आंध्रप्रदेश के प्रशासन के मध्य सेतु की भूमिका निभा पा रहा है. यहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री के समक्ष अंग्रेज़ी और तेलुगु के अखबारों के साथ साथ उर्दू अखबारों की क्लिपिंग भी प्रस्तुत की जाती हैं. आज ‘सियासत’ दुनिया के 107 देशों में पढ़ा जाता है लेकिन यह अवश्य चिंतनीय है कि नई पीढ़ी का उर्दू के प्रति झुकाव काफी कम होता जा रहा है. 

3. आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता 
आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता का इतिहास पर्याप्त रोचक है तथा इस प्रांत के हिंदी प्रेम और राष्ट्रीयता का द्योतक भी. पत्रकारिता के इतिहास संबंधी शोधकर्ताओं ने इस तथ्य पर विस्मय प्रकट किया है कि जहाँ एक ओर हिंदी विरोधी समझे जाने वाले मद्रास प्रांत में हिंदी पत्रकारिता को हिंदी प्रचार के साथ जुड़कर विकसित होने का अनुकूल वातावरण मिला, वहाँ उर्दू को प्रमुखता देने वाला और दक्खिनी हिंदी को अपनाने वाला निजाम द्वारा शासित हैदराबाद प्रांत हिंदी पत्रकारिता के रास्ते में काँटे बिछाने वाला बना. इसके बावजूद यह भी रेखांकित किया गया है कि हिंदी पत्रकारिता का जो रूप हमें दक्षिण भारत में देखने को मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता क्योंकि यहाँ हिंदी देशप्रेम की संवाहिका बनकर आई और भावों की संवाहिका कुछ देर से बनी. डॉ.गोपाल शर्मा ने हैदराबाद के प्रमुख हिंदी पत्रकार मुनींद्र जी के अमृतोत्सव के अवसर पर दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ ‘भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन’ (2000) के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए अपने शोधपूर्ण निबंध ‘दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता’ में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को चार कालों में विभक्त किया है, जिन्हें आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में ज्यों-का-त्यों स्वीकार किया जा सकता है. यही नहीं उनके द्वारा प्रस्तुत सूचनाएँ और विश्लेषण भी अत्यंत प्रामाणिक हैं जिन्हें हम यहाँ आभार सहित इस्तेमाल कर रहे हैं. आंध्रप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को जिन चार कालखंडों में बाँटा जा सकता है, वे हैं –
1. उद्भव काल (सन 1947 से पूर्व)
2. विकास काल (सन 1948 से 1972 तक)
3. नव निर्माण काल (सन 1973 से 1998 तक)
4. वर्तमान काल (सन 1999 से....)

स्वातंत्र्यपूर्व काल में स्थानीय राजनैतिक कारणों वश हैदराबाद में निजामशाही के दौरान हिंदी को ‘बगावत की भाषा’ और ‘विदेशी भाषा’ समझा जाने लगा था जबकि उर्दू यहाँ की राजभाषा थी. हिंदी में पत्र-पत्रिका प्रकाशित करने पर पाबंदी थी. 1931 में अर्जुन प्रसाद मिश्र ‘कंटक’ ने ‘भाग्योदय’ नामक मासिक पत्रिका के लिए अनुमति तो प्राप्त कर ली लेकिन भयभीत जनता का सहयोग न प्राप्त कर सके. यही कहानी और भी एक-दो हिंदी पत्रों की है. हिंदी के प्रति शासन के इस विद्वेष का कारण यह था कि यहाँ धार्मिक एवं नागरिक स्वतंत्रता के लिए आर्य समाज शासन से टकराव मोल लेता रहता था. आर्य समाज के प्रचारक हिंदी का प्रयोग करते थे अतः उनके प्रभाव को कम करने के लिए हिंदी भाषा और हिंदी पत्रकारिता को लगातार दबाया जाता था. आर्य समाजियों ने हैदराबाद की जनता के लिए बाहर से पत्र प्रकाशित करने शुरू किए, एक ऐसा ही पत्र सोलापुर से निकला. ‘आर्य संदेश’ नामक इस पत्र में जनता को न्याय-पथ पर चलने की सलाह दी जाती थी और हैदराबाद के शासन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए तैयार किया जाता था. इस पत्र के संपादकद्वय त्रिलोकी नाथ शास्त्री और राम देव ने ‘आर्य संदेश’ को राजनीतिक चेतना फैलाने के लिए प्रयोग किया. इस पत्र का मुख्य संदेश आज भी हैदराबाद के बुजुर्गों को याद है : ‘उठ बाँध कमर, क्यों डरता है – फिर देख प्रभु क्या करता है.’ यह पत्र दो वर्ष तक भी न चल पाया. चल ही नहीं सकता था. सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया. कई वर्षों तक हैदराबाद राज्य की हिंदी पत्रकारिता में लुका-छिपी का खेल चलता रहा. आर्य प्रतिनिधि सभा अनुमति लेकर पत्र निकालती, सरकार प्रतिबंध लगा देती, इसलिए संपादकों ने कई नामों की अनुमति ले डाली. कभी कोई पत्र नागपुर से छपता, कभी सोलापुर से, कभी पत्र बड़ा होता तो कभी विवरण पत्र मात्र बन जाता. इस समय प्रकाशित पत्रों के नामों की एक लंबी सूची है जैसे आर्यभानु, दैनिक दिग्विजय, सुधाकर, हनुमान, दिवाकर, पताका, वेद प्रकाश, वैदिक ज्योति आदि. कई अन्य पत्रकारों ने भी कोशिश की जैसे बृंदावन विहारी मिश्र ने ‘व्यापार’ नामक पत्र निकाला और अपने आप को विवादों से दूर रखने का प्रयत्न किया. (गोपाल शर्मा, ‘दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता’ (आलेख), भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ. 115). इस प्रकार स्वातंत्र्यपूर्व काल में हैदराबाद में हिंदी पत्रकारिता को अपने अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष करना पड़ा. 

स्वातंत्र्योत्तर काल में उपर्युक्त स्थिति में परिवर्तन आया और हैदराबाद नवीन पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का केंद्र बनकर उभरा. सितंबर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत संघ में विलय के बाद हैदराबाद से नियमित रूप से दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्र निकलने लगे. हैदराबाद से प्रकाशित ‘अजंता’ और ‘कल्पना’ जैसी मासिक पत्रिकाओं ने ‘सरस्वती’ और ‘हंस’ के समान ख्याति अर्जित की. ‘अजंता’ हिंदी प्रचार सभा हैदराबाद द्वारा प्रकाशित की जाती थी. गया प्रसाद शास्त्री, श्यामू संन्यासी, श्रीराम शर्मा, वंशीधर विद्यालंकार, हरिकृष्ण पुरोहित, राजकिशोर पांडेय और भीमसेन निर्मल जैसे दिग्गज इस पत्रिका के संपादक रहे. दूसरी ओर ‘कल्पना’ का प्रकाशन बद्री विशाल पित्ती द्वारा अगस्त 1949 से आरंभ किया गया जिसके संपादकों में डॉ.आर्येंद्र शर्मा से लेकर भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय और मुनींद्र जी तक अनेक समर्पित हिंदी सेवी जुड़े थे. इसके कला विभाग से एम.एफ.हुसैन और जगदीश मित्तल जैसे चित्रकार और कला समीक्षक संबद्ध रहे. यह भारत भर के लेखकों एवं पत्रकारों की प्रिय पत्रिका बनी तथा 1978 में कोई विशेष कारण घोषित किए बिना बंद हो गई. स्मरणीय है कि आर्येंद्र शर्मा मूलतः वैयाकरण थे. उनकी पुस्तक ‘बेसिक ग्रामर ऑफ हिंदी’ भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई थी जिसे आज भी हिंदी का मानक व्याकरण माना जाता है. भाषा के प्रति उनकी गंभीरता और अच्छी रचनाओं को पहचानने की विवेकी दृष्टि ने ‘कल्पना’ को अपनी एक अलग जगह बनाने में मदद की. ‘कल्पना’ के माध्यम से वे अनेक नए रचनाकारों को सामने लाए जो बाद में प्रतिष्ठित हुए. इसी अवधि में मारवाड़ी प्रेस, हैदराबाद के बालकृष्ण लाहोटी द्वारा प्रकाशित ‘दक्षिण भारती’ भी निकली जो चार-पांच वर्ष तक चली. इसके संपादक महेंद्र भटनागर थे. बाद में वेमूरि आंजनेय शर्मा भी इस पत्रिका के संपादक रहे. यह पत्रिका दक्षिण भारत के हिंदी साहित्यकारों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आरंभ की गई थी.

इन साहित्यिक पत्रिकाओं के अतिरिक्त इस काल में हैदराबाद से कई समाचारबहुल पत्र भी प्रकाशित हुए. डॉ.गोपाल शर्मा ने लिखा है कि साप्ताहिकों में ‘आर्यभानु’ और ‘संगम’ उल्लेखनीय पत्र हैं. ‘आर्यभानु’ का संपादन विनायक राव विद्यालंकार और कृष्णदत्त ने किया. वंदेमातरम रामचंद्रराव ने इस पत्र को जीवित रखने का भरसक प्रयास किया. शिवनंदन शास्त्री ने ‘संगम’ का प्रकाशन 28 अप्रैल 1958 को प्रारंभ किया. इस पत्र ने पाठकों को सुरुचिपूर्ण साहित्य दिया. “हैदराबाद के दैनिक पत्रों में ‘डेली हिंदी मिलाप’ को भी इस काल की प्रमुख उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए. ‘हिंदी मिलाप’ नाम से अखबार दिल्ली और जालंधर से भी निकलते थे. ‘मिलाप’ स्वतंत्रता से पूर्व ही हैदराबाद से प्रकाशित होने लगा था. स्वतंत्रता के पश्चात श्री युद्धवीर जी के संपादकत्व में इस पत्र ने अपनी पहचान भी बनाई और हिंदी प्रेमियों के बीच जगह भी. धीरे धीरे यह पत्र दैनिक आवश्यकता बन गया. ‘मिलाप’ के प्रकाशक की हैसियत से युद्धवीर जी ने अनेक नए पत्रकारों को अवसर दिया. बाहर से भी योग्य प्रतिभाओं को बुलाया और अवसर दिया. पं.दिवाकर पांडेय इस पत्र से जुड़े. सरदार हरनाम सिंह ‘प्रवासी’ ने इस पत्र में कार्य किया. श्री रवि श्रीवास्तव इस पत्र से जुड़े. ‘मिलाप’ जब कुछ दिनों के लिए बंद हो गया तो दिवाकर पांडेय ने प्रकाश भाई के साथ मिलकर ‘दैनिक विश्व वाणी’ का प्रकाशन किया. ‘विश्व वाणी’ के साथ डी.एस.सिंह ‘लाट’ भी जुड़े. ‘साथी’ के संपादन प्रकाशन में भी दिवाकर पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही.” (वही, पृ. 117). 

आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक नया मोड 1973 में तब उपस्थित हुआ जब 14 सितंबर 1973 (हिंदी दिवस) से मुनींद्र जी के संपादकत्व में ‘हैदराबाद समाचार’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. आगे चलकर इसका नाम ‘दक्षिण समाचार’ कर दिया गया. इस पत्र की पृष्ठभूमि में मुख्य रूप से दो लक्ष्य थे. एक तो यह कि हैदराबाद के हिंदी से जुड़े हुए लोगों को परस्पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा प्राप्त हो. आगे चलकर इसका क्षेत्र हैदराबाद से बढ़कर आंध्रप्रदेश और फिर दक्षिण भारत तथा अंततः पूरा भारत बन गया. दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुरूप हिंदी को भारत की सामासिक संस्कृति की वाहक भाषा के रूप में विकसित करना. हिंदी के विकास, भाषा की शुद्धता, साहित्य में घटित नई रचनात्मक प्रवृत्तियों की जानकारी और अंग्रेज़ी के विरोध तथा मानक हिंदी के प्रयोग को इस पत्र ने सदा आंदोलन के रूप में प्रसारित किया. इसके साथ ही इस साप्ताहिक पत्र ने हिंदी के लेखन को प्रोत्साहित करने और दक्षिण भारत भर में हो रहे लेखन से समस्त भारत को परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुनींद्र जी के निधन के बाद उनके पुत्र प्रफुल्ल कुमार तथा उनके बाद वर्तमान समय में नीरज कुमार ने भी इन्हीं नीतियों पर ‘दक्षिण समाचार’ को आगे बढ़ाया है. 

हिंदी अकादमी, हैदराबाद (1956) द्वारा कई वर्ष तक हस्तलिखित पत्रिका के रूप में प्रकाशित प्रसारित ‘संकल्य’ 1974 में विधिवत पंजीकरण के बाद मुद्रित मासिक पत्रिका के रूप में निकलने लगी. उस समय इसके संपादक मुधुसूदन चतुर्वेदी थे बाद में 1977 से बैजनाथ चतुर्वेदी के संपादकत्व में इसे साहित्यिक त्रैमासिक के रूप में भारत भर में ख्याति प्राप्त हुई. 

हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार और संवर्धन की दृष्टि से हैदराबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की आंध्र शाखा द्वारा प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ का योगदान उल्लेखनीय है. 1977 अप्रैल से प्रकाशित ‘पूर्णकुंभ’ के संपादन से दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र के सचिवों के रूप में कई बड़े हिंदी प्रचारकों के नाम जुड़े रहे हैं. परंतु इस पत्रिका ने 1997 से विशेष रूप से नया स्वरूप तब प्राप्त किया जब दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा क्रमशः संपादक और सह-संपादक के रूप में ‘पूर्णकुंभ’ से जुड़े तथा कविता, कहानी, लेख, समीक्षा आदि विविध विषयों के साथ साथ इसमें अनुवाद, भाषाविज्ञान और साहित्य की विशिष्ट विधाओं को प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया. इस अवधि में ‘पूर्णकुंभ’ के कई चर्चित विशेषांक भी निकले, यथा, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, शिवप्रसाद सिंह, नागार्जुन, नागेंद्र और रामविलास शर्मा पर केंद्रित विशेषांक. आगे चलकर अप्रैल 2003 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा – आंध्र की तेलुगु पत्रिका ‘स्रवंति’ और हिंदी पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ का परस्पर विलय करके उन्हें द्विभाषी साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवन्ति’ का रूप दे दिया गया जिसमें हिंदी और तेलुगु दोनों भाषाओं की सामग्री रहती है. सभा के सचिव इसके पदेन संपादक रहते हैं. सह-संपादक के रूप में नारायण राजु और मल्लसर्ज मंगोडी के बाद अगस्त 2008 से गुर्रमकोंडा नीरजा इस पत्रिका का संपादन कार्य देख रही हैं. हिंदी और तेलुगु की मौलिक और अनूदित सामग्री प्रस्तुत करने वाली यह पत्रिका जनवरी 2011 से इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. इस लघुकाय पत्रिका के कई विशेषांक भी विगत वर्षों में प्रकाशित और चर्चित हुए, जैसे राष्ट्रकवि दिनकर विशेषांक (मई 2009), उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य विशेषांक (फरवरी 2011), शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक (अप्रैल 2011), अज्ञेय जन्मशती विशेषांक – 1,2,3 (जून, जुलाई, अगस्त 2011), स्व.प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव अमृत वर्ष विशेषांक (अक्टूबर 2011), दूरस्थ शिक्षा पर एकाग्र (मार्च 2012), पुण्य स्मृति (परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, अमरकांत, राजेंद्र यादव और ओमप्रकाश वाल्मीकि) विशेषांक (2014) और मुक्तिबोध विशेषांक (2015). 

हिंदी प्रचार सभा (नामपल्ली, हैदराबाद) द्वारा 1977 से प्रकाशित मासिक ‘विवरण पत्रिका’ भी हिंदी भाषा और साहित्य के मुद्दों को समर्पित है. इसके संपादकों के रूप में पांडुरंग ढगे, शीलम वेंकटेश्वर राव, धोंडीराव जाधव और चंद्रदेव भगवंत राव कवडे ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. सहयोगी संपादक के रूप में सुरेश दत्त अवस्थी और अहिल्या मिश्र ने इसे साहित्यिक स्वरूप प्रदान करने के लिए पर्याप्त श्रम किया है. यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रतिष्ठान, हैदराबाद की पत्रिका ‘अग्रतारा’ का भी उल्लेख जरूरी है जिसने हिंदीतरभाषियों के लेखन को प्रमुखता से छापा. अनियतकालीन पत्रिका ‘राष्ट्रनायक’ 1963 से हरिश्चंद्र विद्यार्थी के संपादन में निकल रही है. इसके अलावा पुरुषोत्तम प्रशांत द्वारा प्रकाशित ‘काव्य वार्षिकी मध्यांतर’ ने अपने पांच अंक निकालकर देशभर के कवियों को हैदराबाद से जोड़ा. कहना न होगा कि इस अवधि (नवनिर्माण काल) में हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता ने चतुर्मुख विकास किया. पत्रकारिता पर चर्चाएँ भी आरंभ हुईं और शोध भी. पत्रकारीय लेखन के क्षेत्र में इस अवधि में नन्दकिशोर शर्मा (वेणु गोपाल), किशोरी लाल व्यास नीलकंठ, गोवर्धन ठाकुर, जे.वी.कुलकर्णी, विजय कुमार मलहोत्रा, मुरलीधर शर्मा, विजयराघव रेड्डी, मनोहर लाल व्यास, दुली चंद शशि (‘मुचकुंदा’ के संपादक वजन कवि), बजरंग राव बांगरे, नेहपाल सिंह वर्मा, अशोक मिश्र आदि कलमकार खास तौर से उभरकर सामने आए.

‘हिंदी पत्रकारिता : विविध आयाम’ (सं. वेदप्रताप वैदिक) में आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के मूल्यांकन के संदर्भ में डॉ.श्रीराम शर्मा ने 1976 में संकेत किया था कि आंध्रप्रदेश का तेलंगाना क्षेत्र आज एक ऐसे साप्ताहिक पत्र की प्रतीक्षा कर रहा है जो उसकी सांस्कृतिक और साहित्यिक आवश्यकता को पूरा कर सके. इस बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ.गोपाल शर्मा ने 2000 में लिखा कि “यूँ तो शर्मा जी के सामने ‘मिलाप’ भी था, ‘हैदराबाद समाचार’ भी और आंध्रप्रदेश सरकार का ‘आंध्रप्रदेश’ भी, आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी का ‘संकल्य’ भी, फिर भी वे एक बेहतर पत्र चाहते थे. इस पत्र की चाह शर्मा जी के जीवन काल में पूरी न हो सकी. नवनिर्माण काल में ‘स्वतंत्र वार्ता’ (1996 से आरंभ) ने बहुत हद तक इस चाह को पूरा किया. इस पत्र के प्रकाशन ने दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता को बहुआयामी बनाया. (1996 से मार्च 2012 तक) इसके संपादक के रूप में डॉ.राधेश्याम शुक्ल दक्षिण के लेखकों एवं पाठकों को ऐसा मंच प्रदान करने में समर्थ हुए जिसकी आवश्यकता थी. उनके द्वारा संपादित ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक किसी भी राष्ट्रीय पत्र के समकक्ष बड़े गर्व के साथ रखे जाने योग्य पत्र के रूप में स्थापित हुआ तथा स्थानीय लेखकों एवं पत्रकारों को अपनी पहचान बनाने का एक और मौक़ा मिला.” 

1999 से हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान काल आरंभ माना जा सकता है. नवंबर 1999 से यहाँ से गोविंद अक्षय के संपादन में कविता प्रधान मासिक ‘गोलकोंडा दर्पण’ का प्रकाशन आरंभ हुआ जिसे आरंभ से ही ऋषभ देव शर्मा, गोपाल शर्मा, नेहपालसिंह वर्मा, कविता वाचक्नवी, अमृत मेहता, पूर्णिमा शर्मा, दिलीप सिंह, वेणु गोपाल और भगवान दास जोपट जैसे स्थायी स्तंभकारों के लेखन ने अलग पहचान दी. लगभग इसी समय 2000 ईस्वी से ‘संकल्य’ ने भी अपने नए रूपाकार में वसंत चक्रवर्ती के प्रधान संपादकत्व में आलोचना प्रधान त्रैमासिक के रूप में नया अवतार लिया. इसे भी ऋषभ देव शर्मा और शुभदा वांजपे जैसे संपादकों ने देश भर में प्रतिष्ठा अर्जित करने में सहयोग दिया. चक्रवर्ती जी के निधन के पश्चात 2003 से टी.मोहन सिंह इसके संपादक हैं. हिंदी अकादमी, हैदराबाद के सचीव के रूप में गोरखनाथ तिवारी इसके प्रकाशक हैं. विगत दस वर्षों में ‘संकल्य’ हैदराबाद की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका बन गई है. इसके महादेवी वर्मा (2002), प्रेमचंद (2005,2006), दिनकर (2008), बच्चन (2009), आदिवासी विमर्श (2010) और जन्मशती (2011-12) विशेषांक देश भर में साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित हुए हैं. 

हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता के संवर्धन में महिला पत्रकारों का योगदान भी अविस्मरणीय है. सीता युद्धवीर, विपमा वीर, नरेश बंसल, अहिल्या मिश्र, कमला रानी संघी, सरोज बजाज, मुखविंदर कौर, कविता वाचक्नवी, गुर्रमकोंडा नीरजा, रमा द्विवेदी, प्रतिभा गर्ग आदि ने संपादन, और स्तंभ लेखन को सुपारिभाषित स्त्री-स्पर्श प्रदान किया है. यहाँ अहिल्या मिश्र के प्रधान संपादकत्व में प्रकाशित अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका ‘पुष्पक’ का उल्लेख भी आवश्यक है जिसके विगत पंद्रह वर्ष में 20 अंक प्रकाशित हो चुके हैं. कृष्णकुमार गोस्वामी, दिलीप सिंह, ऋषभ देव शर्मा, रमा द्विवेदी और लक्ष्मी नारायण अग्रवाल आदि के परामर्श और संपादन में ‘पुष्पक’ ने विविध विधाओं की साहित्यिक पत्रिका के रूप में दक्षिण भारत के हिंदी रचनाकारों को तो अखिल भारतीय मंच प्रदान किया ही है, देश भर के अनेक नए-पुराने रचनाकारों को भी दक्षिण में परिचित कराया है.

आंध्रप्रदेश भर में फैले हुए केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों और उपक्रमों के राजभाषा विभागों से अनेक हिंदी पत्रिकाएँ गृह पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती हैं. इनमें यों तो अपने अपने विभाग की सूचनाएँ और गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं तथापि इनमें से कुछ राजभाषा पत्रिकाओं ने तकनीकी लेखन की दृष्टि से राजभाषा विभागों के बाहर भी अपना वैशिष्ट्य प्रमाणित किया है. जैसे सीसीएमबी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘जिज्ञासा’, एनजीआरआई, हैदराबाद से प्रकाशित ‘वसुंधरा’, एनएमडीसी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘खनिज भारती’, एनआईआरडी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘ग्रामीण विकास समीक्षा’ और बीडीएल, हैदराबाद से प्रकाशित ‘पथिक’ आदि. 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आंध्रप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता का उदय यद्यपि अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में हुआ था परंतु स्वातंत्र्योत्तर काल में इस हिंदीतर राज्य में निरंतर बढ़ती हुई हिंदी की स्वीकार्यता ने हिंदी पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया और दैनिक समाचार पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता तथा राजभाषा पत्रकारिता के विविध क्षेत्रों में आज राज्य की राजधानी हैदराबाद के अलावा विजयवाडा और विशाखपट्टनम से भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक प्रकाशन हो रहा है. उल्लेखनीय है कि लोगों की सामाजिक-राजनैतिक जागरूकता तथा साहित्यिक अभिरुचि के निर्माण और परिष्कार में हिंदी की इन पत्र-पत्रिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा भारत की राष्ट्रभाषा-राजभाषा-संपर्कभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा में अपना-अपना योगदान दिया है.


  

   

  

 






















शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

व्योमकेश दरवेश

हर्ष का विषय है कि हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी की रचना ‘व्योमकेश दरवेश’ (2011, राजकमल प्रकाशन) का वर्ष 2014 के मूर्तिदेवी पुरस्कार के लिए चयन किया गया है. स्मरणीय है कि वर्ष 2013 में अपनी इस बहुचर्चित कृति के लिए उन्हें व्यास सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अतिरिक्त वे गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके हैं और उन्हें प्रगतिशील समीक्षा के आधार स्तंभ के रूप में जाना जाता है. 

16 फरवरी, 1932 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के विस्कोहर गाँव में जन्मे विश्वनाथ त्रिपाठी सफल आलोचक तो हैं ही, पर वे मूलतः कवि हैं. उनका पहला काव्य संग्रह 1980 में ‘जैसा कह सका’ के नाम से प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका त्रिलोचन शास्त्री ने लिखी थी और यह समर्पित था विष्णुचंद्र शर्मा को. इसके बाद ‘प्रेमचंद विस्कोहर’ नाम से उनकी कविताओं का दूसरा संग्रह प्रकशित हुआ. उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं – (आलोचना) कुछ कहानियाँ : कुछ विचार, हिंदी आलोचना, लोकवादी तुलसीदास, देश के इस दौर में; (संस्मरण) व्योमकेश दरवेश; (आत्मकथा) नंगातलाई का गाँव. 

विश्वनाथ त्रिपाठी मनुष्य को सबसे ऊपर मानते हैं. 80 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में बातचीत करते हुए जब शशिभूषण द्विवेदी ने उनसे प्रश्न किया कि ‘जब आदमी बहत्तर साल का हो जाता है तो देवता हो जाता है, अब आप तो अस्सी के हो गए हैं. क्या लगता है देवता हो गए हैं या अभी तक मनुष्य ही हैं?’ तो उन्होंने कहा कि ‘यह बात मेरे गुरुजी हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने ‘अनामदास का पोथा’ में लिखी है कि बहत्तर साल का आदमी देवता हो जाता है. पंडितजी संस्कृत, ज्योतिष और तंत्र के भी विद्वान थे, उन्होंने ऐसा लिखा है तो संभव है कि परंपरा में ऐसी कोई बात रही हो. लेकिन मेरी समझ से यह बात उन्होंने व्यंग्य में लिखी थी. अब बहत्तर साल का रिटायर्ड आदमी किसी काम का तो रह नहीं जाता, इंद्रियाँ जवाब दे जाती हैं, जो जीना-भोगना होता है, जी-भोग लिया होता है. अब उसे पड़े-पड़े भगवद्-भजन के अलावा क्या करना है. तो ऐसे आदमी को देवता कहो या जो कहो. रही मेरी बात तो मैं मनुष्य ही बना हुआ हूँ और वही बना रहना चाहता हूँ’. अपने गुरु की भाँति विश्वनाथ त्रिपाठी मनुष्य और मनुष्यता को प्रधान मानते हैं. 

विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी जड़ों से जुड़े हुए रचनाकार हैं. उनकी कविताओं में सघन मानवीय संवेदना है. वे अपनी कविताओं में राहुल सांकृत्यायन, त्रिलोचन शास्त्री, रामविलास शर्मा, प्रेमचंद और लेनिन को याद करते हैं, साथ ही कुछ ऐसे प्रश्न उठाते हैं जो पाठकों को झकझोरते हैं – ‘मरोड़ी हुई मेरी भुजाओं/ और मेरी बिटिया की दूब-बाहों के बीच/ अधजली रोटी का यह टुकड़ा कहाँ से आ जाता है.’ उनकी कविता में अवधी की छटा भी विद्यमान है – ‘उड़त पखेरुआ हिए छॉंह परि जाइ/ परितै मनई गूँग बहिर ह्वै जाय.’ 

विश्वनाथ त्रिपाठी की रचनाओं में देश, गाँव और मनुष्य को बखूबी देखा जा सकता है. ‘देश के इस दौर में’ (1989) शीर्षक कृति के माध्यम से उन्होंने परसाई के रचना संसार को उद्घाटित करने के साथ साथ रचनात्मक मूल्य, रचनाधर्मिता और स्वातंत्र्योत्तर भारत के बनते-बिगड़ते यथार्थ का शब्दचित्र खींचा है. 

विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘नंगातलाई का गांव’ (2006) को ‘स्मृति आख्यान’ की संज्ञा दी है. इस आत्मकथा में वे बिसनाथ और नंगातलाई दो रूपों में उपस्थित हैं. इसे विलक्षण जुगलबंदी कह सकते हैं. इसके बारे में स्पष्ट करते हुए उन्होंने स्वयं कहा है कि नंगातलाई का गांव वस्तुतः विस्कोहर ही है. यदि कहा जाय कि इसके बहाने उन्होंने ग्रामीण जीवन शैली और सभ्यता की मनोरम झांकी प्रस्तुत की है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इसमें जय-पराजय, हास-परिहास, मान-अभिमान, क्रोध, प्रसन्नता, विनम्रता, अहंकार आदि सब कुछ समाहित है. यह सिर्फ ‘नंगातलाई’ या कहें ‘विस्कोहर’ का आख्यान नहीं है बल्कि यह भारत के हर गाँव का आख्यान है. इसमें ऐसे अनेक प्रसंग और चरित्र हैं, उनसे जुड़ी स्मृतियाँ हैं, अन्न और जल के संदर्भ हैं जो उस भारतीय मनीषा को झकझोरते हैं जो गाँव की जीवन शैली से अवगत है. उन्होंने इस कृति के माध्यम से गाँव की व्यथा-कथा को दर्शाया है. 

मूर्तिदेवी पुरस्कार हेतु चयित ‘व्योमकेश दरवेश’ (2011) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित विलक्षण स्मृति आख्यान है. स्वयं लेखक ने इस पुस्तक को ‘पुण्य स्मरण’ कहा है. इस पुस्तक को लिखने के पीछे निहित पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने इस प्रकार कहा है – ‘इस पुस्तक को लिखने की इच्छा मेरी बहुत पहले से थी लेकिन कभी हिम्मत नहीं कर पाता था. एक तो पंडितजी का व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उन पर लिखते हुए हमेशा डरता था कि न्याय कर पाऊँगा या नहीं. सबसे पहले इसे लिखने की इच्छा मैंने भीष्म साहनी के सामने जाहिर की थी. अज्ञेय और भीष्म साहनी के बड़े भाई बलराज साहनी पंडितजी के साथ काम कर चुके थे. फिर पंडितजी के न रहने पर मुझे उनकी याद बहुत सताती थी. उनके साथ मेरा तेईस साल लंबा साथ था. उनके परिवार की भी मुझ पर बहुत कृपा रही. छात्र जीवन में जब मैं उनके संपर्क में आया तो बहुत साधनहीन था. बहुत कम लोगों ने अपने छात्र जीवन में उतने उपवास किए होंगे जितने मुझे करने पड़े. कानपुर से बीए किया. वहाँ सिनेमा देखने का चस्का लग गया था. सो किसी तरह सेकंड डिवीजन में पास हुआ. बड़ा दु:खी हुआ और भागकर पंडितजी की शरण में आ गया. पंडितजी के बारे में बहुत सुना था. उनके पास गया तो भक्तिभाव में था, मगर उन्होंने कहा कि तुम्हें क्या पता कि मुझमें कितने दोष हैं. खैर... पंडितजी जानते थे कि भूख आदमी की अनिवार्य जरूरत है. उन्होंने खुद बहुत गरीबी देखी थी. उनके पास जाने पर वे हमेशा पूछते थे कि भोजन किया है या नहीं. भूखे तो नहीं हो. यह बात उनकी सर्जना में भी दिखाई देती है. पंडितजी शास्त्रज्ञ पंडित थे लेकिन साधारण मनुष्य के सुख-दु:ख और उनके जीवन में उनकी बहुत रुचि थी. दलित, वंचित और अभावग्रस्त मनुष्य को लेकर उनके मन में बहुत करुणा थी. वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अस्पृश्य के संदर्भ में ‘दलित’ शब्द का प्रयोग किया. पंडितजी परंपरा से जुड़े विद्वान थे लेकिन उनका दृष्टिकोण संकीर्णतारहित था. उनका मानना था कि हिंदी कोई अकेली भाषा नहीं है, वह अखिल भारतीय भाषाओं से जुड़ी है. उसका एक कांटा काशी में है तो दूसरा भुवनेश्वर में और तीसरा केरल में. इस तरह ये चीज उनके साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से जुड़ती है. हिंदी क्षेत्रों में तो लोग हिंदी के नाम पर तमाम कर्मकांड करते रहते हैं लेकिन पंडित जी ने शांतिनिकेतन में एक बांग्लाभाषी क्षेत्र में पहली बार हिंदी भवन बनवाया. वे कहते थे कि हिंदी राष्ट्रभाषा है या नहीं, यह सोचना हिंदी वालों का काम नहीं है. इस बारे में दूसरे लोग सोचें. हमारे लिए तो हिंदी मातृभाषा है. पंडितजी किसी तरह के कर्मकांड में विश्वास नहीं करते थे. अकादमिक दुनिया में भी तमाम तरह के कर्मकांड होते हैं जो पंडितजी को नहीं आते थे इसलिए वे अकादमिक दुनिया में हमेशा ही अनफिट रहे. उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय छोडऩा पड़ा तब भी कुछ ऐसी ही स्थितियाँ थीं. उनके विरोधी बहुत हो गए थे. उन्होंने विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में मीराँ पर पद्मावती ‘शबनम’ की किताब की जगह परशुराम चतुर्वेदी की किताब लगवा दी थी. बेशक परशुराम चतुर्वेदी की किताब पद्मावती ‘शबनम’ की किताब से लाख गुना बेहतर थी लेकिन जिस तरह अकादमिक कर्मकांडों को ताक पर रखकर पंडितजी ने उसे पाठ्यक्रम में लगवाया वह बहुत से लोगों को हजम नहीं हुआ और उनका बहुत विरोध हुआ. आखिरकार पंडितजी को विश्वविद्यालय से हटना पड़ा. लेकिन पंडितजी का सम्मान बहुत था. काशी विश्वविद्यालय से हटते ही उन्हें चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से बुलावा आ गया. चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में उनकी जगह प्रोफेसर पद के जो उम्मीदवार थे इंद्रनाथ मदान उन्होंने पंडितजी के कारण अपना नाम वापस ले लिया यह कहकर कि प्रोफेसर बनने से अच्छा है पंडितजी के अधीन रहकर रीडर बने रहना. तो पंडितजी का सम्मान तो बहुत था लेकिन अकादमिक कर्मकांड में वे कभी फिट नहीं हो पाए. खैर... तो पंडितजी को मैं जानना चाहता था. जिसके प्रति आपका लगाव होता है उसे आप जानना चाहते हैं. उनके प्रति एक जिज्ञासा थी. श्रद्धा में भी एक जिज्ञासा होती है जैसे प्रेम में होती है. तो उसी जिज्ञासा यानी जानने की प्रक्रिया में यह किताब लिखी गई. लिखना जानने की ही प्रक्रिया है. यही ज्ञान है, गुणकथन है, कीर्तन है. यही कविता है. तो यह एक ही प्रक्रिया के विभिन्न आयाम हैं. फार्म के स्तर पर यह किताब पंडितजी की जीवनी है लेकिन वस्तुत: यह संस्मरणात्मक जीवनी है. चूंकि पंडितजी के प्रति मेरी इतनी श्रद्धा रही है कि उन्हें लेकर मैं तटस्थ रह ही नहीं सकता इसलिए अपनी अक्षमता का मुझे बोध भी है. पंडितजी पर जैसी किताब लिखी जानी चाहिए वह तो बहुत मुश्किल है. हालांकि इस किताब को लिखने को लेकर किसी तरह के नैतिक दायित्व का भाव मुझमें नहीं रहा, बस मैं इसे लिखे बिना रह नहीं सकता था. यह एक तरह से मेरे अस्तित्व की माँग थी. इसे लिखवाने में नामवर जी और नित्यानंद तिवारी की बड़ी भूमिका रही है. मेरे लेखन पर नामवर जी का बहुत असर रहा है. पंडितजी पर किताब लिखने का पहला हक तो नामवर जी का ही था. किन्हीं कारणों से वे नहीं लिख पा रहे हैं, यह अलग बात है. फिर भी उन्होंने पंडितजी पर जो लिखा है - ‘दूसरी परंपरा की खोज’ वह बहुत महत्वपूर्ण है. उसने मुझे बहुत प्रेरित किया. इस तरह इस किताब को लिखने का बहुत बड़ा श्रेय नामवर सिंह को ही जाता है. पंडितजी के बारे में बहुत सी बातें मुझे उन्हीं से पता चलीं.’ इस स्मृति आख्यान को रचने में विश्वनाथ त्रिपाठी जी को काफी समय लगा. उन्होंने एक जगह यह भी कहा है कि ऐतिहासिक महत्व की इस रचना के सृजन के दौरान लंबे समय तक वे द्विवेदी जी की यह डाँट याद करते रहे हैं कि, ‘आलस्य प्रतिभा की खाद होती है, लेकिन तुममे खाद कुछ ज्यादा ही हो रही है.’ 

पाठक ‘व्योमकेश दरवेश’ को पढ़ते समय संस्मरण के साथ साथ आत्मकथा, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, डायरी और समीक्षा का आनंद उठा सकते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि इस कृति के बहाने विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने गुरु को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है. यह कृति निश्चित ही विश्वनाथ त्रिपाठी की शोधदृष्टि का परिचायक है. इस पुस्तक में हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन को अलग-अलग भागों में सोपानबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है. पहला भाग बचपन, बसरिकापुर और काशी तथा उनके छात्र जीवन से संबंधित है. इस भाग में प्रामाणिक जानकारी प्रदान करने के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी ने आचार्य विश्वनाथ द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, ग्रंथावली के वैयक्तिक संस्मरण खंड - ‘शांतिदूत’, नागरी प्रचारिणी पत्रिका के आचार्य केशव प्रसाद मिश्र स्मृति ग्रंथ तथा द्विवेदी जी द्वारा लिखित महत्वपूर्ण पत्रों व अन्य संदर्भों का उपयोग किया है. साथ ही द्विवेदी जी के परिवार और गाँव सब जगह से उनकी स्मृतियों को खंगाला है और इन सूत्रों को रोचक ढंग से पिरोया है.

दूसरा भाग है ‘अथेयं विश्वभारती.’ इसमें शांतिनिकेतन का प्रभाव, हिंदी भवन, विश्वभारती पत्रिका, शांतिनिकेतन का जीवन, मातृ संस्था का निमंत्रण, मन का बंधन आदि उपशीर्षकों के अंतर्गत द्विवेदी जी के जीवन की परतों को खोला गया है. तीसरा भाग है ‘काशी विश्वविद्यालय : देखी तुम्हारी काशी’. इसमें उन्होंने अध्यापक मंडल, सतीर्थ प्रकरण, ‘संदेश रासक’ प्रकरण, बना रहे बनारस हिंदी विश्वविद्यालय : हजारी प्रसाद द्विवेदी, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, साहित्य अकादमी तथा द्विवेदी जी : परिवार में जैसे उपशीर्षकों के माध्यम से बहुत ही अंतरंग और मार्मिक घटनाओं का उल्लेख किया है. आकाशधर्मा का विस्थापन, गाढ़े का साथी : पंजाब, फिर बैतलवा उसी डार पर, व्योमकेश दरवेश चलो अब - शीर्षक भागों में संवेदनशील लेखक ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के अकादमिक संघर्ष से लेकर उनके अवसान तक की घटनाओं का हृदयस्पर्शी अंकन किया है. 

विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी को जड़ों से समझा है. यदि ऐसा नहीं होता तो इस स्मृति आख्यान को लिख पाना संभव नहीं होता. द्विवेदी जी की विद्वत्ता से तो वे परिचित थे ही, साथ ही गुरु के सान्निध्य में रहकर उनकी विशेषताओं, कमजोरियों और सीमाओं को भी आत्मसात करने का अवसर उन्हें मिला था. इसलिए वे इस पुस्तक में द्विवेदी जी के जीवन की छोटी-छोटी बातों को भी प्रस्तुत कर सके हैं. उन्होंने लिखा है ‘एक कुर्ता तक बनाने के लिए घर में महाभारत मच जाता था. किंतु येन-केन-प्रकारेण काशी पहुँचकर उनकी प्रतिभा रंग लाई.’ 

हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक को बहुत महत्व देते थे. विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की पुस्तक में भी लोक जीवन का अत्यंत रोचक वर्णन है. देखें - “बनारस के आसपास की ग्रामीण औरतें लाल कत्थई रंग की साडियाँ बहुत पहनती हैं. वे घास काटतीं, घास के गट्ठर सिर पर रखे, सड़क के किनारे काम करती हुई अक्सर दिखलाई पड़तीं. ग्रामीण औरतें जब साथ-साथ चलती हैं तब चुप नहीं रहतीं. या तो गाती, या बात करती हैं, हँसी-ठट्ठा करती हैं, या फिर झगड़ा करती हैं. गुस्से में चुप रहना, न बोलना, शहराती लोगों को आता है.” 

काशी की संस्कृति के बारे में विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं कि, “काशी में विद्वत्ता और कुटिल दबंगई का अद्भुत मेल दिखलाई पड़ता है. कुटिलता, कूटनीति, ओछापन, स्वार्थ - आदि का समावेश विद्वता में हो जाता है. काशी में प्रतिभा के साथ परदुखकातरता, स्वाभिमान और अनंत तेजस्विता का भी मेल है जो कबीर, तुलसी, प्रसाद और भारतेंदु, प्रेमचंद आदि में दिखलाई पड़ता है. काशी में प्रायः उत्तर भारत, विशेषतः हिंदी क्षेत्र के सभी तीर्थ स्थलों पर परान्नभोजी पाखंड़ी पंडों की भी संस्कृति है जो विदग्ध, चालू, बुद्धिमान और अवसरवादी कुटिलता की मूर्ति होते हैं. काशी के वातावरण में इस पंडा-संस्कृति का भी प्रकट प्रभाव है. वह किसी जाति-संप्रदाय, मुहल्ला तक सीमित नहीं सर्वत्र व्याप्त है. पता नहीं कब किसमें झलक मारने लगे.” अभिप्राय यह है कि आचार्य द्विवेदी के बहाने लेखक ने ‘व्योमकेश दरवेश’ में एक ओर तो अपनी लोक-संपृक्ति को सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है वहीं दूसरी ओर भारतीय जीवन-दर्शन की मनुष्य-केंद्रीयता को अपने रचना-नायक के माध्यम से पुनः रेखांकित किया है. ऐसी बहुआयामी कृति के मूर्तिदेवी पुरस्कार हेतु चयन पर ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से अनंत शुभकामनाएँ!!

शनिवार, 4 जुलाई 2015

‘चाँद’ का ‘फांसी’ अंक

हो जाता है शक्तिहीन जब, शासन अतिशय अविनय से।
लखता है जग बलिदानों की, पूर्ण विजय तब विस्मय से।।

‘चाँद’ का ‘फांसी’ अंक 
'चाँद' का 'फाँसी'  अंक
राधाकृष्ण प्रकाशन
1988 पहला पुस्तकाकार संस्करण
1997 द्वितीय आवृत्ति 

                              फाँसी के फंदे में डाकू कह, जो फाँसे जाते हैं;
                              उनसे बढ़कर उन लोगों को, हम अपराधी पाते हैं।
                              निरपराध जनता का रण में, जो नित रुधिर बहाते हैं; 
                              नर-घातक नृशंस हैं फिर भी, जो नरपाल कहाते हैं। 
                                                     दमन निरत दुश्मन के मन पर, क्या अधिकार जमाया है?
                                                      अगणित अबलाओं का तूने विधवा-वेश बनाया है!! 
                                                ***                              ***
                           तूने क्रूर दृष्टि से अपनी, कितने ही घर घाले हैं; 
                           अमित अशक्त अबोध सरल शिशु हा अनाथ कर डाले हैं!
                          बंधुहीन हा बंधु अनेकों, पड़कर तेरे पाले हैं, 
                         पुत्रहीन कर वृद्ध पिता को, किए स्वकर मुख काले हैं।
                                                  अरी निश्चरी सर्वनाश का, यह क्या भाव समाया है?
                                                  अगणित अबलाओं का तूने विधवा-वेश बनाया है!! 
                                                                     (‘एक राष्ट्रीय आत्मा’, फाँसी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 226) 

[1]

2006 में पत्रकारिता डिप्लोमा करते समय भारतीय पत्रिकारिता का इतिहास, प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने नाम, संपादकों के नाम आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की. उसी अवधि में कक्षा में ‘चाँद’ के ‘मारवाड़ी’ और ‘फाँसी’ अंक तथा ‘हिंदू पंच’ के ‘बलिदानी’ अंक के बारे में भी जानने का मौक़ा मिला था. लेकिन उस अवधि में उन पत्रिकाओं को पढ़ना तो दूर की बात देखा तक नहीं. लाइब्रेरी में पत्रकारिता की पुस्तकें खोजते समय एक-दो बार देखा भी, पर विशेष ध्यान नहीं दिया. लेकिन पिछले दिनों जब ‘मनमीत’ और ‘शार्प रिपोर्टर’ के संपादक अरविंद कुमार सिंह और परिलेख प्रकाशन के संस्थापक अमन कुमार त्यागी हैदराबाद आए तो मैं उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की लाइब्रेरी दिखाने ले गई. अरविंद कुमार सिंह थोड़ी देर में ‘फाँसी अंक’ के साथ प्रकट हुए. उसे देखकर मैं चौंक उठी. हम लोगों ने उस अंक की जीरॉक्स भी करवा ली. अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि ‘शार्प रिपोर्टर’ के पत्रकारिता विशेषांक के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है तो अमन कुमार त्यागी ने सुझाया कि इस पर एक छोटा-सा लेख हो जाए तो अच्छा बन पड़ेगा. उन दोनों के आग्रह से मैंने इस अंक को पढ़ना शुरू किया. पढ़ने से बहुत सारे तथ्य सामने आए. भारतीय दंड व्यवस्था और कानून के बारे में जाना ही उसके साथ ही देश-विदेश की क्रांतियों और फाँसी के विभिन्न तरीकों से भी अवगत हुई. पढ़ते समय मेरा पूरा शरीर काँप उठा. ‘चाँद’ के इस ऐतिहासिक ‘फाँसी’ अंक के बारे में आपसे कुछ साझा करना चाहती हूँ. 

[2]

साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘चाँद’ का महत्वपूर्ण स्थान है. 1922 में इस पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रारंभ हुआ था. रामरख सिंह सहगल, महादेवी वर्मा आदि इसके संपादक रहे. पत्रिका में संपादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान नियत था. ‘फाँसी’ अंक [नवंबर 1928] के ‘संपादकीय विचार’ शीर्षक स्तंभ में संपादक की यह टिप्पणी सोचने पर बाध्य करती है – ‘समाज अपराधियों को तैयार करता है. अपराधी उसके यंत्र हैं, जो उसे पूरा करते हैं. सामाजिक वातावरण अपराध के उगने का क्षेत्र है. अपराधी तो एक बीज-जंतु है, जो क्षेत्र पाने पर उग पड़ता है. प्रत्येक समाज अपने योग्य अपराधी उत्पन्न कर लेता है. अपराध की समस्या में सामाजिक कारणों का व्यक्त करना शक्य नहीं.’ (संपादकीय विचार, ‘अपराध का विकास’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 6). राजनैतिक अपराधियों के बारे में कहा गया है कि ‘ये अपराधी निस्संदेह उच्च श्रेणी के होते हैं और इनके उद्देश्य तात्कालिक समाज-स्थिति के विपरीत होते हैं. राजनैतिक अपराधी क्रांतिवाद के प्रवर्तक होते हैं. क्रांतिवाद की प्रवृत्ति में उनकी उच्च परार्थ-वृत्ति ही अधिक होती है.’ (वही). 

यह भी ध्यान देने की बात है कि ‘चाँद’ के संपादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे. इसके साथ ही कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित करते थे जो समाज में स्त्रियों की स्थिति को उजागर करते थे. इसमें साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनैतिक विषय स्थान पाते थे. ‘चाँद’ के ‘फाँसी’ अंक में ‘दुबे की चिट्ठी’ नाम से प्रकाशित एक पत्र का छोटा-सा अंश देखें – 
                    ‘अजी संपादक जी महाराज, 
                                             जयराम जी की! 
                  आप ‘फाँसी-अंक’ निकालने जा रहे हैं? फाँसी पर इतनी खफगी? आखिर आप फाँसी से इतने नाराज                    क्यों हैं, पहले यह बताइए!’ 

इस पर संपादकीय टिप्पणी इस प्रकार है – 
‘मेरी क्षुद्र-बुद्धि में तो यही आता है कि फाँसी का दंड अनावश्यक होने के साथ ही साथ हिंसा तथा बर्बरता का द्योतक है. इसके विरुद्ध पाश्चात्य देशों के अनेक विद्वानों ने बहुत-कुछ लिखा है. अनेक पाश्चात्य  देशों में मृत्यु-दंड की अमानुषिक प्रथा उठती जा रही है. इस संबंध में प्रभावशाली आंदोलन हो रहे हैं! जब संसार अन्य बातों में सभ्यता की मूर्ति बन रहा है तो भारतवर्ष को इस विषय में सभ्यता का परिचय देना  चाहिए.’ (दुबे की चिट्ठी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 162) 

[3]

स्मरणीय है कि ‘फाँसी’ अंक का ऐतिहासिक महत्व है. पत्रिका के तेवर के बारे में क्या कहना. ‘फाँसी’ अंक पढ़ने से पता चलता है कि इसका तेवर तो ऐसा है कि बड़े बड़ों तक को चुनौती देने में कोई हिचक नहीं. इस संदर्भ में नरेशचंद्र चतुर्वेदी का कथन उल्लेखनीय है – ‘यों तो ‘चाँद’ अपनी विचारोत्तेजक शैली एवं नए भावबोध के कारण सभी से अलग विशिष्ट प्रकार का मासिक पत्र था. देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सभी प्रकार की सामग्री को इसमें प्रकाशित किया जाता था. अंग्रेजी राज के विरुद्ध भी उसका दृष्टिकोण बहुत साफ था और मैं समझता हूँ ‘फाँसी’ अंक उसी की चरम परिणति था. ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक जैसे प्रसिद्ध हुआ था उसी प्रकार ‘चाँद’ का ‘मारवाड़ी’ अंक भी बड़ा प्रसिद्ध हुआ था, परंतु तब अपने ही भाइयों के एक वर्ग और जाति के विरुद्ध सामग्री होने के कारण उसको वह स्थान नहीं मिल पाया जो ‘फाँसी’ अंक को मिला.’ (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, भूमिका, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1988 पहला पुस्तकाकार संस्करण, 1997 द्वितीय आवृत्ति). 

[4]

1928 नवंबर में दीवाली के अवसर पर ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक प्रकाशित हुआ था जो सवा तीन सौ पृष्ठों का था. यह ‘चाँद’ के सातवें वर्ष का प्रथम अंक था. इस अंक में फाँसी पर चढ़ाए गए शहीद पत्रकारों के जीवनवृत्त तो हैं ही, साथ ही फ्रांस की स्त्रियों, यूरोप, स्कॉटलैन्ड, रोम आदि प्रसिद्ध देशों के नायक-नायिकाओं के बलिदानों की कहानी से संबंधित सामग्री, विभिन्न देशों की क्रांतियों का इतिहास और उनके चित्र भी अंकित हैं. फ्रांस की राज्यक्रांति, 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता विद्रोह, प्राणदंड की क्रूरता आदि की जानकारी भी उपलब्ध है. यह अंक वास्तव में दस्तावेजी महत्व का है. इस अंक में भले ही ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खुला विद्रोह और बगावत की बात नहीं कही गई परंतु इस अंक में संकलित सामग्री प्रामाणिक, ऐतिहासिक और मार्मिक सामग्री है जो प्रकारांतर से विद्रोह और बगावत को बढ़ाने वाली है. इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने ‘चाँद’ के इस अंक को ज़ब्त कर लिया था. इस अंक का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि अमर शहीद सरदार भगतसिंह ने छद्म नाम से इस अंक में अनके लेख लिखे हैं. ध्यान देने की बात है कि बलवंत सिंह, युवक और विद्रोह आदि छद्मनामों से भगत सिंह ‘मतवाला’, ‘प्रताप’ आदि अनेक पत्रिकाओं में लेख लिखते थे. 

‘फाँसी अंक में जो महत्वपूर्ण सामग्री संकलित है उसे पाठक यदि ध्यान से पढ़ेंगे तो यह भलीभाँति समझ सकेंगे कि देश की आजादी के लिए कुर्बान होने वाले अनेक साहसी वीरों ने कैसे अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, कैसे उनके विचार थे और अपने देश के भविष्य को वे कैसा देखते थे. इस अंक में कई ऐसी विशेषताएँ भी हैं जो स्मरण करने योग्य हैं. क्रांतिकारियों ने अपने को गोपन रखकर यह प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करने के लिए किस तरह का जोखिम उठाया होगा! यह कम आश्चर्य की बात नहीं है. उनके बाद उनके संबंध में सही जानकारी देने वाले भी तो नहीं रह जाते. इस अंक में जिन आधुनिक फाँसी चढ़ने वाले वीरों का ब्यौरा दिया गया है 'उनमें से कुछ रेखाचित्र सरदार भगतसिंह ने जेल की काल-कोठारी से लिखकर भेजे थे. उन्होंने डॉ. मथुरासिंह और बलवंत सिंह के छद्म नामों से भी कुछ लेख लिखे थे. इस प्रकार की बहुत-सी सामग्री इस अंक में है. (आलेखों के) नीचे जो नाम दिए गए हैं, वे छद्म नाम हैं और उनके बारे में यह कहना कठिन है कि उनमें से कौन-से सरदार भगतसिंह के हैं और कौन-से अन्य व्यक्तियों के हैं.’ (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, भूमिका) 

[5] 

‘फाँसी’ अंक ने एक ओर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए प्राणों का बलिदान आवश्यक माना है तो दूसरी ओर भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में प्राणदंड/ फाँसी को क्रूर, अमानुषिक और पाशविक व्यवहार घोषित किया है. यही इस अंक का मूल स्वर है. इस अंक का संपादकीय निश्चित ही क्रांति के व्यावहारिक पहलू की सार्थकता को सिद्ध करता है. संपादकीय का शीर्षक है ‘क्रांतिवाद’. उसका एक अंश यहाँ प्रस्तुत करना समीचीन होगा. ‘फाँसी’ अंक के संपादक के रूप में आचार्य चतुरसेन शास्त्री यह लिखते हैं कि ‘क्रांति एक स्थिर सत्य है. पर यह बात सर्वथा असंभव है कि सत्य सब अवस्थाओं में मधुर और दर्शनीय हो. भावनाओं का मूल्य वास्तव में विपत्ति है, और कोई भी सद्भावना उतनी ही ऊँची उतरती है, जितनी कि विपत्तियों में वह स्थायी रहती है. सद्भावनाएँ भी कभी-कभी देखने में कुत्सित और भीषण हो जाती हैं. जैसे खोटे सोने से खोटापन निकालने को जब उसे तेज़ाब में पकाते हैं, तब उसका जैसा वीभत्स, मैला और भीषण रूप बनता है, वैसे ही जब सत्य कलुषित स्वार्थों से पद-दलित होता है तो विशुद्ध होने के लिए सत्य को भीषण बनना पड़ता है. क्रांति भी सत्य का एक भीषण रूप है. वह चाहे जैसी भयानक क्यों न हो, सदा सत्य की पवित्रता और शांति की पुनर्रचना के लिए ही होती है. ‘क्रांति’ एक बड़ा डरावना शब्द है. शांतिप्रिय लोग, चाहे वे कितने ही संपन्न और सशक्त क्यों न हों, क्रांति के नाम से डरते हैं. कोई राजसत्ता चाहे कैसी ही उदार क्यों न हो, उसने क्रांति को तत्क्षण बलपूर्वक दबा देने के लिए कड़े से कड़े कानून पहले ही से बना रक्खे हैं. मतलब यह कि राजा और प्रजा दोनों ही क्रांति के नाम से काँपते हैं और क्रांति के बीज को तत्काल नष्ट कर देने में सबसे अधिक व्यग्रता तथा तत्परता दिखाते हैं. इतना सब है, फिर भी संसार के सभी सभ्य राज्यों में – अच्छे से अच्छे ज़मानों में, भारी से भारी शक्ति के सामने समय-समय पर क्रांति बराबर हुई, और यद्यपि तत्कालीन सत्ताधारियों ने क्रांति के नेताओं को फाँसी देने, सूली पर चढ़ाने, गर्दन काटने, जीता जलाने, विष पिलाने और आजन्म कारावास के निर्दय और चरमसीमा के दुःख दिए हैं, परंतु बाद में इतिहास ने उन्हें मुक्तकंठ से धर्मात्मा और निर्दोष माना है.’ (संपादकीय विचार, ‘क्रांतिवाद,’ ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 8,9).

[6]

‘फाँसी’! मात्र कल्पना से ही पूरा शरीर काँप उठता है. इतिहास गवाह है कि इंग्लैंड में ‘6 वर्ष का बालक ढाई आने का रंग चुराने के अपराध में फाँसी पर चढ़ाया गया था!’ (संपादकीय विचार, ‘फाँसी’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 13). यहाँ तक कि भेड़ें और पोस्ट-ऑफिस की चिट्ठियाँ चुराने के अपराध में भी व्यक्तियों को फाँसी पर लटका दिया जाता था!!! आज भी फाँसी की सजा का औचित्य विवाद का ही विषय है. ‘फाँसी’ अंक में प्रकाशित ‘फाँसी के भिन्न-भिन्न तरीके’ (रमेशप्रसाद) शीर्षक लेख फाँसी देने की क्रूर प्रथा को आँखों के सामने चित्रों के माध्यम से उकेरता है. 12 चित्र हैं. अर्थात 12 अलग-अलग अमानुषिक तरीके. ‘कहा जाता है कि 600 प्रकार के फाँसी देने के यंत्र आविष्कृत हुए हैं और उनमें कई तो बड़े विचित्र हैं.’ (रमेशप्रसाद, ‘फाँसी के भिन्न-भिन्न रूप’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 142). फाँसी देने का अर्थ है मनुष्य का प्राण हरण. अक्सर फिल्मों में दिखाते हैं - गले में रस्सी डालकर, कुत्तों या मगरमच्छों से नुचवाकर, पत्थरों से मारकर, जीवित समाधि बनाकर, विष पिलाकर, सिर पर पानी डालकर, गरम तेल की कड़ाही में डालकर, पानी में डुबोकर, क्रॉस में लटकाकर, घोड़ों के पीछे बाँधकर, कीलों पर सुलाकर आदि आदि आदि तरीकों से व्यक्ति को मरने की कोशिश की जाती है. स्त्रियों को फाँसी देने के लिए ‘डकिंग स्टूल’ का प्रयोग किया जाता था. इस तरीके में अपराधी को एक कुर्सी पर बैठा दिया जाता था और कुर्सी को अपराधी सहित पानी में डुबोकर बाहर निकाला जाता था. पानी में अपराधी को रखने का समय धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था. अंत में जल समाधि. कितनी भयानक यातना. ध्यान देने की बात है कि इतना होने पर भी देशभक्त क्रांतिकारी अपने प्राणों की आहुति देने से पीछे नहीं हटे. लेखकों/पत्रकारों ने भी बराबर अपनी लेखनी के माध्यम से सरकार को चुनौती दी. आने वाली पीढ़ी के समक्ष अद्भुत मिसाल कायम की. 

[7]

स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ पुरुष ही नहीं थे महिलाएँ भी थीं. हर क्षेत्र में उस समय स्त्री सशक्त थी. देश की आजादी के लिए अपने आपको होम करने में अग्रणी थी. ‘फाँसी’ अंक में 1857 के कुछ संस्मरण भी दर्ज हैं. उन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि कैसे अंग्रेजी सेना ने गाँवों को जलाकर श्मसान बना दिया, बगावत का संदेश फैलाने वाले हिंदुस्तानी सिपाहियों को तोप से कैसे उड़ा दिया गया और असहाय स्त्रियों और बच्चों का संहार कैसे किया गया. इतिहास-लेखक जॉन का संस्मरण पढ़कर मेरा मन द्रवित हो उठा. वे लिखते हैं, ‘बूढ़ी औरतों और बच्चों का उसी तरह वध किया गया है, जिस प्रकार उन लोगों का, जो विप्लव के दोषी थे. इन लोगों को सोच-समझकर फाँसी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें उनके गाँव के अंदर जलाकर मार डाला गया; शायद कहीं-कहीं उन्हें इत्तिफाकिया गोली से भी उड़ा दिया गया. *** सड़कों के चौरास्तों पर और बाजारों में जो लाशें टंगी हुई थीं, उनको उतारने में सूर्योदय से सूर्यास्त तक मुर्दे ढोने वाली आठ-आठ गाडियाँ बराबर तीन-तीन महीने तक लगी रहीं और इस प्रकार एक स्थान पर छह हजार मनुष्यों को झटपट खतम करके परलोक भेज दिया गया.’ (सन 57 के कुछ संस्मरण, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 149-150). अंग्रेजों ने ही नहीं बल्कि भारतवासियों ने भी अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों की हत्या की. 15 जुलाई, सन 57 की इस घटना को भारतीय विप्लवकारियों के नाम पर सदा के लिए कलंक के रूप में याद किया जाता है. ‘बीबीगढ़ (कानपुर) के 125 अंग्रेज कैदी स्त्रियाँ और बच्चे कत्ल कर डाले गए और 16 तारीख को सवेरे उनकी लाशें एक कुँए में डाल दी गईं.’ (वही, पृ. 156). बूढ़े, स्त्रियाँ और बच्चे चाहे अंग्रेज हों या भारतीय, वे तो असहाय और निरीह होते हैं. उनका वध करना सच में शर्मनाक बात है. 

[8]

रघुवीर सिंह का आलेख ‘फ्रांस की राज्यक्रांति के कुछ रक्त रंजित पृष्ठ’ तथा त्रिलोचन पंत का आलेख ‘फ्रांस में स्त्रियों का प्राण-दंड’ पढ़ें तो फ्रांस के रक्त रंजित इतिहास का पता चलता है. शोलित कोर्दे, मेरी आंत्वानते, मादाम रोलाँ आदि को फ़्रांस की क्रांति में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी. उस समय तो तत्कालीन शासक खून के प्यासे थे. फाँसी देना या किसी को मौत के घाट उतराना उनके लिए आम बात थी. लेकिन क्रांतिकारी निडर थे. हर देश में हर समय क्रांतिकारी निडर होकर अपने लक्ष्य पर डटे रहे. आजादी से पहले तत्कालीन पत्रकारों ने भी ईमानदारी, निडरता और देशभक्ति का प्रमाण दिया. फाँसी के डर से वे अपने लक्ष्य से नहीं भटके बल्कि खुशी-खुशी फाँसी के तख्ते पर चढ़ गए और बलिदान हो गए. 

                                   देश-दृष्टि में, माता के चरणों का मैं अनुरागी था।
                                                   देश-द्रोहियों के विचार से, मैं केवल दुर्भागी था।।
                                   माता पर मरने वालों की, नज़रों में मैं त्यागी था।
                                                  निरंकुशों के लिए अगर मैं, कुछ था तो बस बागी था।।

                                  देश-प्रेम के मतवाले कब, झुके फाँसियों के भय से।
                                                 कौन शक्तियाँ हटा सकी हैं, उन वीरों को निश्चय से।।
                                  हो जाता है शक्तिहीन जब, शासन अतिशय अविनय से।
                                                 लखता है जग बलिदानों की, पूर्ण विजय तब विस्मय से।।

                                  वीर शहीदों के शोणित से, राष्ट्र-महल निर्माण हुए।
                                                उत्पीड़क बन राजकुलों के, भाग्य-दीप निर्वाण हुए।।
                                  माता के चरणों पर अर्पित, जिन देशों के प्राण हुए।।
                                                रहे न पल भर पराधीन फिर, प्राप्त उन्हें कल्याण हुए।।
                                                                                              (शोभाराम जी ‘धेनुसेवक’, फाँसी के तख्ते से)