शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

एक दिन मनुष्य सूर्य बनेगा : नरेश मेहता

किंतु!
किंतु यह संभव है,
बंधु। यह असंभव है,
कर्म और वर्चस को,
छीन सके कोई भी
जब तक हम जीवित हैं (संशय की रात)

इन पंक्तियों के कवि हैं नरेश मेहता (15 फरवरी, 1922 - 22 नवंबर, 2000)। नरेश मेहता के विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को समेटना कोई आसान कार्य नहीं है। नरेश मेहता अपने आपको सामान्य मनुष्य ही मानते थे। उनके लिए मनुष्यता ही सर्वोपरि गुण है। इसीलिए वे कहते हैं–
मानव जिस ओर गया
नगर बने, तीर्थ बने,
तुम से है कौन बड़ा?
गगन-सिंधु मित्र बने,
भूमि का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो
त्यागो सब जीर्ण वसन, नूतन के संग-संग चलते चलो।

नरेश मेहता मनुष्य को खंड-खंड के रूप में देखना नहीं चाहते। वे यह भी कहते हैं कि ‘मनुष्य चला तो सृष्टि चली।’ ‘समय देवता’ शीर्षक कविता में उन्होंने मानव इतिहास के विविध रंगों को उकेरा है। इस कविता में विभिन्न देशों की जीवन पद्धति और युद्ध की विभीषिका को रेखांकित करते हुए वे कहते हैं कि ‘बम के गोलों से भी धरती बाँझ हुई है,’ ‘लगातार बारूद गलती बंदूकें हाँफ रही है,’ ‘विदेश पूँजी की कीलें छाती में ठुकी हुई थीं।’ नरेश मेहता बिंबों के माध्यम से विसंगतियों की ओर संकेत करते हुए नई मानवता के विकास की कामना करते हैं। वे यह मानते हैं कि जड़ता और ऊर्ध्वता दोनों छोरों पर मनुष्य है। इस संबंध में एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि “जड़ता से मेरा तात्पर्य है सारी संवेदनशीलता का अस्वीकार! क्रूरता भी मनुष्य है। उदात्ततम स्वरूप भी मनुष्य हैं, जैसे राम, कृष्ण और गांधी। कसाई भी मनुष्य और अवतार भी मनुष्य है।” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 151)

नरेश मेहता उदात्त भावों से युक्त रचनाकार थे। साहित्य और साहित्यकार के दायित्व को वे बखूबी जानते थे। उनके अनुसार साहित्य का अर्थ है मनुष्य को रचना। उन्हें यह बात सालती है कि मनुष्य को रचा नहीं जा रहा है। “हम मनुष्य को देखकर उसको केवल लिख रहे हैं। हमारी उससे कोई सहानुभूति नहीं है। अगर वह किसी गलत दिशा में जा रहा है, हमें ऐसा लग भी रहा हो, तो भी हम उसे केवल लिख भर देते हैं। हमने मनुष्य को रचा नहीं।” (मेरे साक्षात्कार, पृ.142)

एक दिन मनुष्य सूर्य बनेगा
क्योंकि वह आकाश में पृथिवी का
और पृथिवी पर आकाश का प्रतिनिधि होगा।

नरेश मेहता उस मानव के बारे में सोचते हैं जो पीड़ित और शोषित है। महलों में रहने वालों से उनका कोई नाता नहीं। उनकी अनुभूतियों और अनुभवों का फलक बहुत व्यापक है। उनकी कृतियों में मानवाता के प्रति प्रेम और जीवन की वास्तविकताओं को देखा जा सकता है।

हम सब उनके कवि रूप से भलीभाँति परिचित हैं। उनके गद्यकार रूप के बारे में तो बहुत ही कम चर्चा होती है। वे लेखन को अनभिव्यक्त आइसबर्ग की टिप मानते हैं जो हमें दिखाई देती है। उनकी मान्यता है कि “जीवन की अनुभूति या अनुभवों के अतल जल के अंधकार में गहरे पैठे आइसबर्ग का वह विशाल वास्तविक स्वत्व हम कभी नहीं देख पाते हैं जो उस टिप को निरभ्र व्यक्त किए होता है। निश्चित ही वह टिप नहीं बल्कि ठंडे, अगम जलों में डूबा पसरा हिमखंड ही आइसबर्ग का वास्तविक सृजनात्मक स्वत्व है।” (नरेश मेहता, हम अनिकेतन, पृ.9)। सृजनात्मक क्षमता मनुष्य के भीतर जल में डूबा हुआ वह हिमखंड है जो दिखाई नहीं देता। उसे वक्त होने के लिए सही वातावरण चाहिए। ‘जीवन से अनाविल रूप में निबद्ध यह सृजनात्मकता’ को ही नरेश मेहता जीवन कहते हैं जिसे धारण करना मनुष्य की नियति है और भोगना, प्रकृति। लेकिन जीवन की सृजनात्मक सत्ता या स्वरूप को ‘पूर्ण रूप’ से अभिव्यक्त करना संभव ही नहीं। सृजन और लेखन के बीच निहित सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए नरेश मेहता कहते हैं कि जीवन की अनभिव्यक्त तथा अकथनीय सत्ता या स्वरूप, सृजन है। “सृजन अनभिव्यक्त सत्ता है। लेखन, सृजन का संलाप रूप है। इसलिए सृजन को नहीं बल्कि लेखन को भाषा, अभिव्यक्ति, श्रोता, देश और काल सभी कुछ चाहिए होता है।” (वही, पृ.28)।

मनुष्य का जीवन अनुभव आधारित है। अनुभव देश-काल-वातावरण से परे होता है। वह तो बस घटित होता है। “वह तो एक निपात की भाँति केवल घटित होना जानता है। वह न तो सांसारिकता है, न किसी प्रकार का निषेध।” (वही, पृ.25)। नरेश मेहता साहित्य को अपनी दृष्टि से समझना चाहते थे और अपना एक अलग पथ निर्मित करना चाहते थे। उनका जीवन संघर्षमय रहा। अतः वे जीवन के मूल्य को पहचानते हैं। उनकी रचनाओं से गुजरते समय इस बात को महसूस कर सकते हैं।

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