शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

तेलुगु साहित्य में गांधी की व्याप्‍ति



"सत्य के प्रयोग करते हुए मैंने रस लूटा है, आज भी लूट रहा हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी मुझे विकट मार्ग पूरा करना है; इसके लिए मुझे शून्यवत्‌ बनना है। ... अहिंसा नम्रता की पराकाष्‍ठा है। और यह अनुभव सिद्ध बात है कि इस नम्रता के बिना मुक्‍ति कभी नहीं मिलती।" (मोहनदास करमचंद गांधी)

सत्य, अहिंसा और शांति के प्रतीक राष्‍ट्रपिता माहात्मा गांधी (02 अक्‍तूबर, 1869 - 30 जनवरी, 1948) जनमानस में आज भी विराजमान हैं। उन्होंने भारतीय जनता के सम्मुख आदर्श स्थापित किया है। अतः काका कालेलकर कहते हैं कि "गांधी जी ने जिस उत्कट श्रद्धा से और गहराई से चंद सिद्धांतों का पालन किया और लोगों से करवाया उसे देखते हुए गांधी विचार, गांधी मत या गांधी मार्ग की एक निश्‍चित जीवन दृष्‍टि और जीवन साधना तैयार हुई। इसमें दो राय नहीं।" (काका कालेलकर; गांधी नव सर्जन की अनिवार्यता; पृ.236)|

गांधी जी का समूचा जीवन सत्य के प्रयोगों से भरपूर है। उनके व्यक्‍तित्व में ऐसी विलक्षणता और अनोखी शक्‍ति थी कि शत्रु भी आकृष्‍ट हो जाते थे। "जितने अनुयायी गांधी विचारधारा के निकले उतने किसी अन्य के नहीं, गांधी जी ने जिस मानवतावाद को अग्रसर किया वह कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। सत्य और अहिंसा के साथ उन्होंने सत्याग्रह का अनुपम मेल कर एक प्रगतिशील मानववाद को जन्म दिया।" (लक्ष्‍मी सक्‍सेना; समकालीन भारतीय दर्शन; पृ.16)

भारतीय संस्कृति से राष्‍ट्रपिता माहात्मा गांधी के विचार ओतप्रोत हैं। भारतीय संस्कृति की ओर देखने का अर्थ है गांधी की ओर देखना। "संसार का ध्यान गांधी जी की ओर इसलिए आकृष्‍ट हुआ कि उन्होंने पशुबल के समक्ष आत्मबल का शस्त्र निकाला, तोपों और मशीनगनों का सामना करने के लिए अहिंसा का आश्रय लिया।" (रामधारी सिंह ‘दिनकर’; संस्कृति के चार अध्याय; पृ.531)। सामान्य जनता ही नहीं बल्कि साहित्यकार भी गांधी जी की विचारधारा से प्रभावित हैं। हिंदी साहित्य के साथ साथ अंग्रेज़ी, जर्मन, इटैलियन, फ्रेंच, रूसी, चीनी, जापानी, हिब्रू, अरबी, फारसी, संस्कृत, असमी, मराठी, तमिल, कन्नड, मलयालम और तेलुगु आदि विजातीय और सजातीय भाषाओं के साहित्य में गांधी जी का प्रभाव दृष्‍टिगोचर है।

आह्‍लाद का विषय है कि भारत भर की भाषाओं में से सबसे पहले गांधी विचारधारा की अभिव्यक्‍ति तेलुगु में हुई। 20वीं सदी के आरंभ में ही आंध्र प्रदेश के साहित्यकारों ने गांधी जी के सिद्धांतों का स्वागत किया। दक्षिण अफ्रीका में बापूजी के सत्याग्रह में भाग लेकर कारावास भोगनेवालों में से अधिकांश लोग आंध्र प्रदेश के थे। गांधी जी ने आंध्र प्रदेश के गाँव गाँव की यात्रा की थी। उन्होंने यह पाया कि आंध्र प्रदेश में उनके सिद्धांत पूरी तरह से क्रियाशील हैं। इससे संतुष्‍ट होकर उन्होंने कहा था कि "वहाँ निष्‍ठावान मेहनती कार्यकर्ता हैं, साधन संपत्ती है, कवित्व है, श्रद्धा भक्‍ति और त्याग बुद्धि है।" (अड़पा रामकृष्‍णराव; तेलिगु में गांधीवाद)

वेंकट पार्वतीश्‍वर, विश्‍वनाथ सत्यनारायण, रायप्रोलु सुब्बाराव, वेंकटेश्‍वर राव, जाषुवा, दाशरथी, सी.नारायण रेड्डी और शेषेंद्र शर्मा आदि कवि गांधी जी से प्रभावित हुए। उन सभी ने उनके सिद्धांतों को अपनी रचनाओं में अंकित किया। इन कवियों की कविताओं में दीन-दलितों तथा शोषित और प्रताड़ितों का हाहाकार, किसानों एवं मजदूरों के मानवाधिकारों की अनुगूँज विद्‍यमान है। इतिहास से पता चलता है कि तिरुपति वेंकट कवि द्वय के नाम से विख्यात दिवाकर्ला तिरुपति शास्त्री और चेल्लपिल्ला वेंकट शास्त्री ने मद्रास (अब चेन्नै) में रवींद्रनाथ टैगोर और सरोजनी नायुडु आदि के सम्मुख बापूजी की प्रशंसा में आशु कविता सुनाई थी।

तुम्मला सीताराम मूर्ति चौधरी ‘महात्मा के आस्थान कवि’ के नाम से विख्यात हैं। उन्होंने गांधी जी की आत्मकथा को तेलुगु में ‘महात्मुनि कथा’ नामक महाकाव्य का रूप दिया है। मारिगंटि शेषाचार्य ने ‘श्री गांधी भागवतम्‌’ (श्री गांधी भागवत्‌) में स्वतंत्रता संग्राम का वर्णन किया है। ‘स्वराज्य रथमु’ (स्वराज्य रथ) नामक काव्य में बलिजुपल्ली लक्ष्‍मीकांतम्‌ ने गांधी जी के सिद्धांतों को उजागर किया है। उन्होंने यह स्पष्‍ट किया है कि इस रथ के सारथी गांधी जी हैं और रथ को खींचनेवाले अश्‍व जनता हैं।

राष्‍ट्रकवि दिनकर कहते हैं कि बापू जी का व्यक्‍तित्व इतना विराट है कि वह पृथ्वी और स्वर्ग तक व्याप्‍त है -"तेरा विराट यह रूप कल्पना/ पट पर नहीं समाता है/ जितना कुछ कहूँ, मगर कहने/ को शेष बहुत रह जाता है।" दिनकर की ही भांति सी.नारायण रेड्डी ने भी गांधी जी के व्यक्‍तित्व को विराट मानकर यह कहा है कि उनकी दिव्य शक्‍ति के सान्निध्य में नरक स्वर्ग हो गया है - "नरक में नन्दन वन लगाया है तूने/ स्थिरों को सिंह शावक बनाया है तूने/ मिट्टी और पत्थरों को वज्रों में परिवर्तित किया तूने।"

तेलुगु साहित्य के इतिहास में राष्‍ट्रकवि के नाम से विख्यात गुरुजाडा अप्पाराव की कविता ‘देश भक्‍ति’ में बापूजी का संदेश मुखरित है - "देशमुनु प्रेमिंचुमन्ना,/ मंचि यन्नदि पेंचुमन्ना,/ विट्टि माटलु कट्टि पेट्टोय्‌/ गट्टि मेल्‌ तलबेट्टवोय्‌।" (देश को प्रेम करो,/ अच्छाई को बढ़ाओ,/ झूठे आश्‍वासन देना बंद करो,/ आचरण करना सीखो।)।
गांधी जी ने अपने व्यावहारिक जीवन दर्शन से भारतीय सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक जगत को एक नया मोड़ दिया तथा राजनैतिक जगत को नई गति प्रदान की। वे यही चाहते थे कि देश में चारों ओर हरियाली और समृद्धि हो। इसी संदेश को गुरजाडा ने अपनी कविता में व्यक्‍त किया है - "पाडि पंटलु पोंगि पोर्ले/ दारिलो नुवु पाटु पडवोय्‌।/ तिंडि कलिगिते कंडा कलदोय्‌,/ कंडा कलवाडेनु मनिषोय्‌।" (जिस राह में हरे भरे खेत लहराते हों, उस राह में श्रम करो। भरपेट खाना जिसके पास होगा उसका स्वास्थ्य भी ठीक होगा।)।

गुरुजाडा ने यह भी घोषित किया है कि "देशमंटे मट्टि कादोय्‌,/ देशमंटे मुनुषलोय्‌..."(देश का अर्थ सिर्फ मिट्टि नहीं है। देश का अर्थ है मनुष्‍य)।

गुर्रम्‌ जाषुवा का खंड काव्य ‘गब्बिलम्‌’ (चमगादड) दलितों की दीन दशा की व्यथा सुनता है। अनाथा (अनाथ), शमशान वाटिका (श्‍माशान), बाष्‍प संदेशमु (अश्रु संदेश), पाता चुट्टमु (पुराना मेहमान) आदि कविताओं के माध्यम से उन्होंने अस्पृश्‍यता और जाति भेद के दुष्‍परिणामों को उकेरा है।

तेलुगु साहित्यकारों ने कविताओं के माध्यम से ही नहीं नाटक, कथा साहित्य, निबंध आदि के माध्यम से भी गांधी जी के विचारों को साहित्य में उतारा है। उन्नव लक्ष्मीनारायण का उपन्यास ‘मालपल्ली’ (भंगियों का गाँव), विश्‍वनाथ सत्यनारायण के ‘वेयि पडगलु’ (सहस्रफण), अडवि बापिराजु के ‘नारायणराव’, बुच्चिबाबू के ‘चिवरकु मिगिलेदि’ (जो शेष है) आदि उपन्यासों में बापूजी के सिधांतों का प्रतिपादन हुआ है।

गांधीजी तत्कालीन अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति से संतुष्‍ट नहीं थे। उस समय शिक्षा का उद्‍देश्‍य अंग्रेज़ी सरकार की निष्‍ठापूर्वक सेवा करनेवाले नागरिकों को तैयार करना भर था। इस संदर्भ में गांधी जी ने स्वयं लिखा है कि "मैकाले का यह उद्‍देश्‍य था कि हम पश्‍चिमी सभ्यता का जनता में प्रचार करनेवाले बन जाएँ।" (महात्मा गांधी, सच्ची शिक्षा; पृ.13)। कवि सम्राट विश्‍वनाथ स्तयनारायण ने ‘वेयि पडगलु’ (सहस्रफण) में इसी तथ्य को उजागर किया है। उसका अंश यहाँ उद्धृत है -
"महात्मा गांधी को अपना असहयोग आंदोलन प्रारंभ किए दो वर्ष हो चुके थे। लोग यह मानने लगे थे गांधी जो भगवान के अवतार हैं, श्रीकृष्‍ण हैं। चरखा उनकी वंशी है। और चरखे की ध्वनि वंशीनाद। सारा देश वृंदावन है और सारी जनता गोपियों की भांति करोड़ों के संख्या में गांधी जी की बात बात पर मुग्ध होकर अनुसरण करती है। देश में एक ऐसा युद्ध प्रारंभ हुआ जो सचमुच युद्ध नहीं था। इस महान आंदोलन को देखकर अन्य देशों के लोग आश्‍चर्यचकित हो गए। देश में अंग्रेज़ी पढ़ाई और पाश्‍चात्य रीतियों के प्रति अनादर उत्पन्न हुआ। उग्रवादी लोग मानने लगे कि अंग्रेज़ी पढ़ाई ने भारतवासियों को पराई संस्कृति के मोह में डाल कर परतंत्रता की शृंकलाओं में बाँध दिया है और उनके मस्तिष्‍क में दास्ता का भाव भर दिया है। रंगापुर गाँव का एक युवक जिसका नाम केशवराव था, एम.ए., बी.एल. पास करके मद्रास में वकालत कर रहा था। गांधी जी का आंदोलन प्रारंभ होते ही उसने अपनी वकालत चोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़ा। ... स्थान स्थान पर राष्‍ट्रीय महाविद्‍यालयों की स्थापना हुई और अंग्रेज़ी पढ़ाई छोड़े हुए विद्‍यार्थियों की शिक्षा का कई देशभक्‍तों ने प्रबंध किया। ... केशवराव का विश्‍वास था कि देश में कला और विद्‍या का नाश हो चला है। इसलिए उनके पुनरुत्थान के लिए राष्‍ट्रीय महाविद्‍यालय को प्रयत्‍न करना चाहिए, इसलिए विद्‍यालय में स्वदेशी ढंग का व्यायाम सिखाया जाता था।" (वेयि पदगलु (सहस्रफण) - हिंदी अनुवाद; पृ.147)

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि गांधी जी राष्‍ट्रीय एवं राजनैतिक प्रतिष्‍ठानों के कारण नहीं बल्कि साहित्यकारों की वाणी में बसकर लोक में व्याप्‍त होने के कारण अमर है। इतना ही नहीं अहिंसा का आजीवन पालन करके विश्‍व के सम्मुख गांधी जी ने जो आदर्श स्थापित किए हैं, उसके लिए संपूर्ण विश्‍व उनका ऋणी है। परंतु उनके व्यावहारिक चिंतन को वाद की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। इस विषय में गांधी जी के शब्दों से ही इस चर्चा का समाहार करना उचित होगा - "गांधीवाद नाम की कोई चीज नहीं है और न ही अपने पीछे मैं कोई ऐसा संप्रदाय छोड़ जाना चाहता हूँ। मैं कदापि यह दावा नहीं करता कि मैंने किन्हीं नए सिद्धांतों को जन्म दिया है। मैंने तो अपने निजी शाश्‍वत सत्यों को दैनिक जीवन और उसकी समस्याओं पर लागू करने का प्रयत्‍न मात्र किया है। मैंने जो समितियाँ बनाई हैं और जिन परिणामों पर मैं पहुँचा हूँ वे अंतिम नहीं है। मैं उन्हें बदल भी सकता हूँ। मुझे संसार को कुछ नया नहीं सिखाना है। सत्य और अहिंसा इतने ही पुराने हैं जितनी ये पहाड़ियाँ। मैंने तो केवल व्यापक आधार पर सत्य और अहिंसा के आचारण में जीवन और उसकी समस्याओं का अनेक विधियों से परीक्षण किया है। अपनी सहज जन्मजात प्रकृति से मैं सच्चा तो रहा हूँ और अहिंसक नहीं । सत्य तो यह है कि सत्य मार्ग की खोज में ही मैंने अहिंसा को ढूँढ़ निकाला। मेरा दर्शन जिसे आपने गांधीवाद का नाम दिया है सत्य और अहिंसा में निहित है, आप इसे गांधीवाद के नाम से न पुकारें, क्योंकि इसमें ‘वाद’ तो नहीं है।" ((सं) डॉ.लक्ष्मी सक्सेना; समकालीन भारतीय दर्शन; पृ.89)

2 टिप्‍पणियां:

arpanadipti ने कहा…

badhiyan sampadakeey badhai

cmpershad ने कहा…

स्रवंति के लिए लिखे गए इस लेख से तेलुगु लेखकों से परिचित हुए जो गांधी जी प्रेरित हुए। इस परिचय के लिए आभार॥