रविवार, 2 मई 2021

संपादकीय : 'स्रवंति' अप्रैल 2021

 


संपादकीय...

 

“बढ़ते ही रहेंगे

हम न मरते हैं

मरने से डरेंगे” (अब शेष हूँ मरता नहीं)

कहकर उद्घोष करने वाले डॉ. प्रेमचंद्र जैन का जन्म बदायूँ जनपद के ग्राम नगला बारहा में 3 जनवरी, 1938 को हुआ था। अपभ्रंश पर उनका विशेष अधिकार था। वे कर्मठ व्यक्ति थे। अपने विचारों और कार्यों के कारण हमेशा जाने जाते रहे। 16 मार्च, 2021 को वे पंचतत्व में लीन हो गए। उनका जाना व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए अपूरणीय क्षति है।

डॉ. प्रेमचंद्र जैन को बचपन से ही घर में शिक्षा का वातावरण प्राप्त था क्योंकि पिताजी मूलतः अध्यापक थे। उन्होंने स्यादवाद महाविद्यालय, काशी विश्वविद्यालय एवं पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान से उच्च शिक्षा अर्जित की। ‘अपभ्रंश कथा काव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक’ विषय पर 1969 में काशी विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि अर्जित की।  वे जैन धर्म के गहन अध्येता थे। इस का प्रमाण है उनका ‘जैन रहस्यवादी अपभ्रंश काव्य और उनका हिंदी पर प्रभाव’ (1964) नामक ग्रंथ। डॉ. शिवप्रसाद सिंह अभिनंदन ग्रंथ ‘बीहड़ पथ के यात्री’ के वे संपादक थे।

प्रेमचंद्र जैन स्वाभिमानी थे। साहसी और कर्मठ थे। वे दृढ़ निश्चयी थे। इस संबंध में उनके गुरु शिवप्रसाद सिंह का यह कथन उल्लेखनीय है- "तुम संकल्प को यथा समय सही ढंग से पूरा करने में सदैव तत्पर हो।"  उनके व्यक्तित्व के संबंध में बताते हुए चंद्रमणि रघुवंशी ने कहा कि “कृशकाय डॉ. प्रेमचंद्र जैन प्रभावशाली व्यक्ति न होने के बावजूद अपने ज्ञान की बपौती के बूते पर मिलने वाले प्रत्येक अपरिचित पर भी अमिट प्रभाव छोड़ने में सदैव सफल रहते हैं। उनकी विनम्रता ‘सोने में सुहागा’ की कहावत को चरितार्थ करती है।“ (निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक, पृ. 31)।

डॉ. प्रेमचंद्र जैन सबके लिए 'गुरु जी' थे। इस संबंध में डॉ. कृष्णावतार 'करुण' का यह मत उल्लेखनीय है- "गुरु जी नजीबाबाद में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के गुरु जी हैं। यहाँ तक कि मेरी माँ भी उन्हें गुरु जी ही कहती हैं।" (वही, पृ. 39)। वे बहुत ही आत्मीयता के साथ सबका स्वागत करते थे। गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे भी मिला। गुरु जी मुझे अपनी बेटी के रूप में मानते थे। केवल मानते ही नहीं, बल्कि कभी कभी पिता के समान रूठते भी थे और जल्दी ही मान भी जाते थे।

मुझे यह सोचकर हमेशा गर्व होता है कि गुरु परंपरा में मेरे संबंध सूत्र आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़ते हैं. आचार्य द्विवेदी, शिवप्रसाद सिंह, प्रेमचंद्र जैन, उनके शिष्य और अंत में मैं। मेरे बाद भी यह क्रम चलता रहेगा। इस अर्थ में गुरु जी डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी से मेरा जुड़ाव स्वाभाविक ही है।

ज्ञान जगत के संबंधों के बारे में कहना ही पड़े तो मैं कहूँगी कि इसका श्रेय दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद की पत्रिका 'स्रवंति' को है। सह संपादक के रूप में मैं इससे जुड़ी हूँ और इसका हर अंक गुरु जी को भी जाता था।  मुझे याद है कि 'स्रवंति' का अंक प्राप्त होते ही वे अपनी टिप्पणी तुरंत भेजते थे। उनकी प्रतिक्रियाओं में सामग्री का मूल्यांकन भी होता था और दिशा निर्देश भी। उनके इस कार्य ने पत्रिका-परिवार को सजग बनाए रखा। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह भी एक उपलब्धि है। पिता की भाँति स्नेह और प्यार बाँटने वाले 'गुरु जी' आज भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं,  फिर भी हमारी स्मृतियों में वे सदा ही जीवित रहेंगे।

'गुरु जी' अपने गुरु शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्राप्त गुरुमंत्र को हमें विरासत में दे गए हैं- "चिंताएँ छोड़कर नियति से लड़ो…  लड़ना ही धर्म है। सारा जीवन बन जाए युद्ध… । तभी मृत्यु का भय भाग जाता है।"

 

पाठकों के आस्वादन हेतु 'मध्यांतर' में डॉ. प्रेमचंद्र जैन की कविताएँ दी जा रही हैं.


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की दो पुस्तकें लोकार्पित

हैदराबाद, 19.2.2021 (मीडिया विज्ञप्ति)।

'तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा' का लोकार्पण 


यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित परिसर में विगत 11 फरवरी को डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की दो पुस्तकों ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ और ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए सभा के सचिव श्री जी. सेल्वराजन ने कहा कि एक तेलुगुभाषी लेखिका के रूप में डॉ. नीरजा की उपलब्धियों पर सभा गर्व का अनुभव करती है।

दोनों पुस्तकों का लोकार्पण लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक डॉ. रमेश कुमार पांडेय ने किया। उन्होंने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि हिंदीतरभाषी हिंदी सेवियों ने ही हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया है। उन्होंने आगे कहा कि डॉ. नीरजा की ये दोनों पुस्तकें हिंदी और तेलुगु भाषा-समाजों के बीच सेतु को सुदृढ़ करने वाली हैं।

विशेष अतिथि के रूप में पधारे केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपनिदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने यह जानकारी दी कि विमोचित पुस्तकों में सम्मिलित ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ के लिए लेखिका को केंद्रीय हिंदी निदेशालय से एक लाख रुपए का ‘हिंदीतरभाषी हिंदी लेखक पुरस्कार’ भी प्राप्त हुआ है। उन्होंने इस पुस्तक में शामिल तेलुगु भाषा और साहित्य विषयक सामग्री को भारतीय साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

'कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा' का लोकार्पण

लोकार्पित पुस्तकों की समीक्षा करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ में जहाँ कवयित्री की हिंदी में रचित मौलिक कविताएँ शामिल हैं, वहीं उनके द्वारा किया गया हिंदी, तमिल और तेलुगु के कुछ प्रसिद्ध रचनाकारों की कविताओं का अनुवाद भी सम्मिलित है। उन्होंने बताया कि ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ में जहाँ तेलुगु भाषा और साहित्य के उदय से लेकर इक्कीसवीं सदी तक के विकास को अलग-अलग निबंधों के माध्यम से दर्शाया गया है, वहीं इसमें सम्मिलित 76 तेलुगु साहित्यकारों का ‘परिचय कोश’ इसकी उपादेयता को और भी बढ़ा देता है।

लेखिका का परिचय देते हुए शिक्षा महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. के. चारुलता ने कहा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा बहुभाषाविद लेखिका हैं और उन्होंने साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के सह-संपादक के रूप में साहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बनाई है।

इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और शिक्षा महाविद्यालय, हैदराबाद की ओर से लेखिका का भावभीना अभिनंदन किया गया। 000


- वुल्लि श्रीसाहिती 
304, मेधा टावर्स, राधाकृष्ण नगर
अत्तापुर, हैदराबाद - 500048 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

Role of Language Classrooms in Transforming the students into Better Citizens


I got an opportunity to hear the renowned Resouce Person Prof. Gopal Sharma (Professor, Department of English Language and Literature, Arba Minch University, Ethiopia) on "THE ROLE OF LANGUAGE CLASSROOMS IN TRANSFORMING THE STUDENTS INTO BETTER CITIZENS" in an international webinar conducted by English department of Sardar Patel College, Secunderabad in collaboration with IQAC.

I am presenting a zist of it what I recollected.

1. It's a well known fact that every language has 4 SKILLS - LSRW - Listening, Speaking, Reading📖 and ✍️Writing. But there is one more skill which is very important and that is the CRITICAL THINKING. This will transform students 👩 into better students👩‍🎓

2. Language is the medium of expression. So we have to use positive ➕ language. We can comment on one's behavior to change them and their arrogant attitude but we should never comment ON THEM. If we comment on them there is a possibility for that student Or a person to develop negativity ❎ We should never hurt one's feelings with our vocabulary. So we should be careful while speaking. We should never use such a language which focuses on the weakness of a person. We should use the language that focuses on self-esteem.

3. Every student 👩‍ is unique and different. Hence the teacher 👩‍🏫‍ should be flexible and also should give space to students. And the student👩‍🎓 should also be responsible. Flexibility should not be taken for granted.

4. Most of the things can be corrected ✅ if we adopt ALLNESS AND TOGETHERNESS along with the INVOLVEMENT.

5. Always a teacher 👩‍🏫‍ should be an observant. When he or she is an observant then they can create a lively, interactive and a happy atmosphere in the classroom.

6. An observant teacher can bring out the unique talents hidden in the students. A teacher should become a role model for the students.

7. A teacher can expect more from the students. High expectations must be there so that they can encourage students to face challenges and to prove themselves.

8. Everyone should cross the gender wall to achieve the goal.

9. We all should know that THE REAL CLASSROOM IS AN EXTENDED FORM. IT IS NOT RESTRICTED TO THE FOUR 4⃣ WALLS.

10. Hence keep a broader aspect. We are all equally responsible to create a healthy atmosphere in the classrooms.

11. Then definitely students 👩‍🎓can be transformed into better CITIZENS.

"WE SEEK HARM TO NONE
AND HARMONY TO ALL" (AMANDA GORMAN)

(This is just a zist of what I recollected.)

'नई कविता : साहित्यिक और सामाजिक संदर्भ' पर व्याख्यान

 

हिंदी विभाग, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर, तमिलनाडु द्वारा आयोजित एकदिवसीय व्याख्यान में विषय विशेषज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित तेवरीकार, कवि, भाषाविद, समीक्षक और शिक्षाविद प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने "नई कविता: साहित्यिक और सामाजिक संदर्भ" पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला.

उनके व्याखान का सार संक्षेप यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है.

1. सामाजिक संदर्भ के बदलने से लोगों की चित्तवृत्ति बदलती है. साथ ही साहित्य का संदर्भ भी बदल जाता है.

2. दुनिया भर में घटित परिवर्तनों से भी जनता की चित्तवृत्ति में परिवर्तन आता है.

3. तार सप्तकीय प्रयोगवादी कविता एक तरह से 'नई कविता' की भूमिका है.

4. नई कविता को दो मुख्य धाराओं में विभाजित किया जा सकता है -
(अ) आत्मनिष्ठ या व्यक्तिनिष्ठ धारा और
(आ) समाजनिष्ठ या जनवादी धारा. इन दोनों धाराओं ने नई कविता को विस्तार दिया.

5. नई कविता एक आंदोलन के रूप में उस काल खंड का एक हिस्सा है अर्थात स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर इमर्जेंसी लगने तक का समय.

6. नई कविता का सामाजिक संदर्भ उसके साहित्यिक अवदान का आधार बनाकर अभिव्यक्ति पक्ष में ढलता है.

7. नई कविता में 'नई' शब्द नवीन या काल सापेक्ष न रहकर विशिष्ट/ नए भाव बोध को व्यक्त करता है तथा 'कविता' शब्द अभिव्यक्ति के नए माध्यम और नए शैली रूपों को व्यक्त करता है.

8. 1920 में डी. एच. लारेंस ने 'न्यू पोयट्स' शीर्षक पुस्तक का संपादन किया. यहीं से नवलेखन के संदर्भ में 'न्यू/ नया' शब्द की शुरूआत हुई।

9. 1950 के आसपास समसामयिक कविता को 'न्यू पोयट्री/ न्यू वर्स' कहा जाने लगा. इसमें 'नई कविता' के वैश्विक साहित्यिक संदर्भ के सूत्र निहित हैं।

10. जी. एस. फ्रेज़र ने उस समय के नए काव्य को 'न्यू मूवमेंट' कहा.

11. डेनाल्ड हाल ने नए अमेरिकी काव्य को 'न्यू पोयट्री' कहा.

12. 1952 में आकाशवाणी, पटना के एक प्रसारण में अज्ञेय ने 'नई कविता' शब्द का प्रयोग किया. इससे पहले इलाहाबाद की 'परिमल' नामक संस्था द्वारा आयोजित एक गोष्ठी में पहली बार इस पदबंध का प्रयोग हुआ था।

13. डॉ. रामविलास शर्मा: “अज्ञेय ने सन् '37 में निराला के लिए जो लिखा था “एज ए लिटररी फोर्स, एट ऐनी रेट, निराला इज़ आलरेडी डेड", वही बात सन् '61 की नई पीढ़ी ने अज्ञेय के लिए दुहराई।"

14. 'नई कविता' की विशिष्ट संवेदना या साहित्यिक व सामाजिक लक्ष्य हैं -
¶ आधुनिक सभ्यता के आंतरिक संघर्ष की अभिव्यक्ति
¶ वैज्ञानिक एवं रूढ़ चिंतन के बीच टकराव की अभिव्यक्ति
¶ परंपरा का पुनर्मूल्यांकन
¶ बढ़ते मशीनीकरण के प्रभाव की अभिव्यक्ति
¶ युद्ध की विभीषिका का चित्रण
¶ इकाई व्यक्ति को महत्व

15. नई कविता में इकाई व्यक्ति के अस्तित्व के लिए संघर्ष है, जिजीविषा है.

16. 1990 के बाद जो विमर्शीय कविता उभरी, उसकी भूमिका नई कविता के अस्तित्व/ अस्मिता की खोज वाले मूल्य से तैयार होती है.

17. नई कविता में जहाँ 'व्यक्ति' की जिजीविषा और अस्तित्व के संघर्ष की बात है, वहीं आगे चलकर विमर्शीय कविता में यह व्यक्ति हाशियाकृत समुदाय में बदल जाता है. उस समुदाय की जद्दोजहद ही विमर्श है. जैसे स्त्री/ दलित/ अल्पसंख्यक/ आदिवासी/ इतरलिंगी विमर्श।