मंगलवार, 10 जनवरी 2017

श्रद्धांजलि...

जगदीश सुधाकर
21 नवंबर, 1946 - 6 जनवरी, 2017
जाना एक जनकवि का....

अभावों में जन्मे, 
अभावों में पले,
और हम मर गए, 
अभावों के तले. 
लकड़ियाँ भी थीं इतनी 
कि रह गए अधजले. 

इन हृदयविदारक पंक्तियों के रचनाकार जगदीश ‘सुधाकर’ अभी इसी माह अपनी इहलीला समेटकर परलोक गमन कर गए. अपनी अंतिम साँस तक अभावों से जूझते रहे सुधाकर जी को लगभग छह महीने पहले जून 2016 में ‘ब्रेन-अटैक’ आया था. उस समय तो वे उबर गए पर दूसरी कई रुग्णताओं ने उन्हें घेर लिया और अंततः 6 जनवरी, 2017 के सूर्योदय से पहले हास्य-व्यंग्यपूर्ण जनकविता के क्षेत्र का यह ‘सुधाकर’ अस्त हो गया. 

शब्द-क्रीड़ा और आशु कविता के महारथी इस जनकवि का जन्म 21 नवंबर, 1946 को कलूरकोट, जिला मियाँवाली (अब पाकिस्तान) में हुआ था. भारत विभाजन से उजड़ और उखड़ कर उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश के कस्बे खतौली में आए तो शिशु जगदीश माँ की गोद में थे. धर्म के घोर पाखंड और उन्माद से जन्मे द्वि-राष्ट्रवाद के घातक सिद्धांत को इसीलिए वे आजीवन कोसते रहे. अपनी किशोरावस्था में उन्होंने नए राष्ट्र के सपने को परवान चढ़ने से पहले ही ध्वस्त होते हुए देखा और उनके भीतर के कवि ने सहज ही चिर प्रतिपक्ष की स्थायी भूमिका अंगीकार कर ली. जैसा कि उनके अंतिम पलों में उनके साथ रहे उनके कविमित्र जसवीर सिंह राणा का मानना है, बिना लाग-लपेट के सामाजिक और राजनैतिक
अधूरी आजादी (काव्य संकलन)
जगदीश सुधाकर
2001
हिंदी लेखक मंच, मणिपुर 
जीवन के हर दोगलेपन पर हँस-हँसकर चोट करना उसी के लिए संभव है जिसका दिल इस सब पाखंड और भ्रष्टाचार को देखकर भीतर-भीतर ज़ार-ज़ार रोता हो. ऐसे ही थे जगदीश सुधाकर. 

जगदीश सुधाकर ने 1964-65 के दिनों में विधिवत लिखना शुरू किया – लिखना भी क्या, डायरी तो वे रखते नहीं थे, किसी भी मुड़े-तुड़े कागज़ पर लिखते थे और संदूकची में डाल देते थे. कहानी और नाटक भी उन्होंने लिखे. पर कभी उन्हें हाथ में कागज़ लेकर रचना बाँचते नहीं देखा गया. कवि सम्मेलनों के मंच पर दोनों हाथ चलाकर आँखें मटकाकर अपनी सद्यः रचित अलिखित कविताओं के द्वारा वे श्रोताओं को लोटपोट करते थे और कई बार वहाँ पधारे हुए तथाकथित बड़े लोगों के कोपभाजन भी बनते थे. पर सच कहने और खरी-खरी सुनाने से बाज़ नहीं आते थे. शायद यही कारण रहा हो कि वे किसी टीम में शामिल नहीं थे. उनके कविधर्म की प्रथम प्रतिज्ञा थी – जो मुझे गलत दिखेगा उसे गलत कहूँगा. उनका यह गुण बाबा नागार्जुन को बड़ा प्रिय था. बाबा प्रो. देवराज के यहाँ खतौली आए तो अपनी-अपनी तरह के इन दोनों अक्खड़ जनकवियों की संगत खूब जमी. प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं सुधाकर जी हाँक लगाते थे – ‘आदरणीय जी!’ और बाबा छौंक लगाते थे – ‘फादरणीय जी!’ वैसे भी बाबा को सुधाकर जी के हाथ की मछली काफी पसंद थी – डॉ. देवराज के कॉलेज चले जाने पर वे सुधाकर जी की रसोई में पहुँच जाते थे. पर अब बस कहानियाँ रह गईं! मैंने उनके अभिन्न मित्र डॉ. ऋषभदेव शर्मा से श्रद्धांजलि में कुछ कहने के लिए कहा तो उन्होंने कवि आलम की पंक्तियाँ दुहरा दी - 

“जा थल कीन्हें बिहार अनेकन, ता थल काँकरी बैठि चुन्यो करैं।
जा रसना सों करी बहु बातन, ता रसना सो चरित्र गुन्यो करैं॥
आलम जौन से कुंजन में करी केलि, तहाँ अब सीस धुन्यो करैं।
नैंनन में जो सदा रहते, तिनकी अब कान कहानी सुन्यो करैं॥“ 

इन्हीं शब्दों के साथ हम जनकवि जगदीश सुधाकर को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं और परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार को यह महाकष्ट सहन करने की शक्ति प्रदान करे. 

- गुर्रमकोंडा नीरजा, हैदराबाद 

रविवार, 18 दिसंबर 2016

श्रम संस्कृति के किसान कथाकार विवेकी राय

विवेकी राय
19 नवंबर, 1924
22 नवंबर, 2016

भोजपुरी के प्रथम ललित निबंधकार एवं आलोचक, ग्राम-जीवन और लोक-संस्कृति के प्रति समर्पित कथाकार विवेकी राय 22 नवंबर, 2016 को पंचतत्वों में विलीन हो गए. उनका जाना हिंदी एवं भोजपुरी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है. 

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भरौली ग्राम में 19 नवंबर, 1924 को जन्मे विवेकी राय की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा सोनयानी (गाजीपुर जिला) में संपन्न हुई. उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पीएचडी उपाधि अर्जित की. वे अध्यापन कार्य से जुड़े रहे. उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – (उपन्यास) बबूल (1964, डायरी शैली में), पुरुष पुराण (1975), लोकऋण (1977), श्वेत पत्र (1979), सोनामाटी (1983), समर शेष है (1988), मंगल भवन (1994), नमामि ग्रामम् (1997), अमंगल हारी, देहरी के पार (2003) तथा अन्य. (कविता संग्रह) अर्गला, राजनीगंधा, गायत्री, दीक्षा, लौटकर देखना आदि. (कहानी संग्रह) जीवन परिधि (1952), नई कोयल (1975), गूंगा जहाज (1977), बेटे की बिक्री (1981), कालातीत (1982), चित्रकूट के घाट पर (1988), सर्कस (2005), आंगन के बंधनवार, अतिथि आदि. (डायरी) मनबोध मास्टर की डायरी (2006). (ललित निबंध) किसानों का देश (1956), गाँवों की दुनियाँ (1957), त्रिधारा (1958), फिर बैतलवा डाल पर (1962), गंवाई गंध गुलाब (1980), नया गाँवनाम (1984), यह आम रास्ता नहीं है (1988), आस्था और चिंतन (1991), जगत तपोवन सो कियो (1995), वन तुलसी की गंध (2002), उठ जाग मुसाफ़िर (2012) आदि. (संस्मरण) मेरे शुद्ध श्रद्धेय. (रिपोर्ताज) जुलूस रुका है (1977) आदि. अतः यह स्पष्ट है कि उनका कृतित्व वैविध्यपूर्ण एवं बहुआयामी है. वे प्रेमचंद पुरस्कार, साहित्य भूषण पुरस्कार, आचार्य शिवपूजन सहाय सम्मान, शरदचंद जोशी सम्मान, पंडित राहुल सांकृत्यायन सम्मान आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों एवं सम्मानों से अलंकृत हुए. 

विवेकी राय अपने आपको ‘किसान साहित्यकार’ मानते थे. वे अपनी जमीन से इस तरह जुड़े हुए थे कि उनकी रचनाओं में मिट्टी के सोंधेपन से पाठक सहज ही आप्लावित हो जाते. उनके साहित्य को देखने से यह स्पष्ट है कि उसमें स्वातंत्र्योत्तर भारतीय गाँवों का सच्चा चित्र उपस्थित है. अपने अंचल के बीच पल्लवित होने के कारण वहाँ के संबंधों, मूल्य-संक्रमण, लोकगीतों, लोक मान्यताओं, संस्कारों व लोक-व्यापारों आदि की प्रामाणिक छवि उनके साहित्य में सहज ही उभरती है. इस संदर्भ में रामदरश मिश्र का कथन उल्लेखनीय है. वे कहते हैं, “विवेकी राय किसान लेखक हैं, उनके लेखन में अपनी गँवाई धरती बोलती है जन-सामान्य की भूख-प्यास बोलती है, उसके उत्कर्ष की चिंता बोलती है, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पाखंड के विरुद्ध प्रतिवाद बोलता है, यानी, समग्रतः उसमें मनुष्यता बोलती है.” (रामदरश मिश्र, सहचर है समय, दिल्ली : परमेश्वरी प्रकाशन, 2008, पृ. 514). आंचलिक उपन्यासकारों में फणीश्वरनाथ रेणु के पश्चात विवेकी राय का नाम लिया जा सकता है. उन्होंने हिंदी शब्द-भंडार को अनेक नए शब्दों से समृद्ध किया है. 

विवेकी राय की पहचान वस्तुतः एक कथाकार के रूप में स्थापित हुई है, किंतु उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ कविता से हुआ. 1951 में उनका पहला काव्य संग्रह ‘अर्गला’ प्रकाशित हुआ था. उनकी कविताओं में एक ओर प्रकृति है तो दूसरी ओर दर्शन, शृंगार, रहस्य और राष्ट्रीय-बोध. उनकी कविताओं के संबंध में नंददुलारे वाजपेयी का कथन द्रष्टव्य है – “यद्यपि इन पद्यों की शैली और छंद नए नहीं हैं, पर इनकी भावधारा में नवीन जीवन शक्ति है. प्रकृति के अपूर्व जागरण में मानव के जाग्रत होने और मानव के जाग्रत करने के बलशाली संकेत हैं. कवि के इन प्राकृतिक सौंदर्य-चित्रणों में उसकी मानवीय संवेदना समायी हुई है – वैसी ही भावना जैसी अंग्रेज कवि वर्ड्सवर्थ की थी.” (मान्धाता राय, ‘प्राकरणिकी’, विवेकी राय और उनका सृजन-संसार, (सं) मान्धाता राय, वाराणसी : विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2007, पृ. x से उद्धृत). उनकी कविता का एक उदाहरण देखें– 
“भला देखो 
तनिक गंभीर होकर यह 
कि किसके लिए व्याकुल चित्त, अंधा – 
धुंधधर्मी झोंक में उद्विग्न आकुल मन? 
तुम्हारा कौन, संबंधी?
तुम्हारा कहाँ क्या अटका? 
नकारा, व्यर्थ, निष्फल 
परम अनर्थ, नाहक सोचते क्या हो? 
कहाँ होती कहीं कोई समस्या भ्रमित – 
मन की सोचवाली दौड़ से हल है?” (दीक्षा, पृ. 2)

विवेकी राय कविता से गद्य की ओर मुड़े. इस संबंध में उन्होंने स्वयं कहा कि “मैं 1960 तक कविता लिखता रहा. उसके बाद मुख्यतः दो कारणों से धीरे-धीरे अनायास वह छूट गई. उन दिनों गद्य लेखन का दबाव अधिक था. उपन्यास, कहानियों के अतिरिक्त ‘आज’ (वाराणसी) में एक साप्ताहिक स्तंभ ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ भी चल रहा था और यह तेरह-चौदह वर्षों तक चलता रहा. इसमें मुक्त भाव से डायरी के अतिरिक्त ललित निबंध, यात्रावृत्त, रेखाचित्र, हास्य-व्यंग्य, संस्मरण, और रिपोर्ताज आदि निबंध की विविध नई विधाओं को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता रहा. मुझे कविता के माध्यम से जो कुछ भी कहना था वह इन्हीं के भीतर कह लेता और बराबर ऐसा लगता कि अब अलग से कविता लिखना और कवि बना रहना बेकार है. ये डायरियाँ प्रायः काल्पनिक होतीं और अपने समय को रेखांकित करने के साथ-साथ स्थायी मूल्य से पूर्ण भाव-चिंतन, युगीन संवेदना, जीवन संघर्ष और सामाजिक चेतना आदि से संबंधित सृजनात्मक कोणों को विस्तारपूर्वक उभारती हुई चलती थीं. इन डायरियों को उन दिनों अत्यधिक लोकप्रियता मिली थी और अपनी पूरी शक्ति के साथ मेरा कवि गद्य की उक्त विविध विधाओं को उत्तरोत्तर निखार देने में जुटा था. अब आप महसूस कर सकेंगे कि कविता की ओर से मैं गद्य की ओर मुड़ नहीं गया बल्कि मैंने अपनी कविता को सुविधा के लिए गद्य की ओर मोड़ लिया. ‘फिर बैतलवा डाल पर’, ‘गंवाई गंध गुलाब’ और ‘जुलूस रुका है’ आदि में संकलित अनुरंजक तथा भावात्मक, चिंतनात्मक डायरियों के पन्ने मेरे कथन को पुष्ट कर सकेंगे.” (विवेकी राय, आधुनिक भारत का चेहरा धुंधग्रस्त है, संवाद चलता रहे, कृपाशंकर चौबे, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 1995, पृ. 96).

विवेकी राय कवि या कहानीकार ही नहीं अपितु उपन्यासकार, निबंधकार, व्यंग्यकार, समीक्षक, आलोचक आदि अनेकानेक रूपों में हमारे समक्ष प्रकट होते हैं. उनके साहित्य के रसास्वादन के लिए पाठक में भी के विशेष प्रकार के संस्कार की आवश्यकता है और वह है ग्रामीण-जीवन, ग्रामीण-प्रकृति और ग्रामीण-संस्कारों को समझने की प्रवृत्ति. स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण जनता की दयनीय दिशा, लोक-जीवन की सांस्कृतिक बनावट, ग्रामीण मानसिकता में व्याप्त रुग्णता, शोषण की नई शक्तियाँ, विघटित होते प्रजातांत्रिक मूल्य, हताशा, मोहभंग आदि को उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से उकेरा है. सांस्कृतिक मूल्यों से कटकर आधुनिकता के रंग में रंगे जा रहे ग्राम-जीवन की त्रासदी उनके साहित्य में दिखाई पड़ती है. उनके साहित्य के विविध आयामों को स्पष्ट करते हुए मान्धाता राय कहते हैं कि “विवेकी राय ने जिन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों को प्रस्तुत किया है, उनमें मेहनतकश वर्ग का अमानवीय शोषण एवं उत्पीड़न, गाँव की आपसी फूट के चलते आत्मीयता और भाईचारे की समाप्ति, गाँव के सहज-सरल जीवन में कुटिल राजनीति का प्रवेश और उसकी खलनायिका-सदृश भूमिका, दहेज, अस्पृश्यता आदि रूढ़ियों का दबाव मुख्य है.” (मान्धाता राय, ‘प्राकरणिकी’, विवेकी राय और उनका सृजन-संसार, वाराणसी : विश्वविद्यालय प्रकाशन, (सं) मान्धाता राय, 2007, पृ. x). विवेकी राय जनपक्षधर थे. उनकी सहानुभूति पिसते वर्ग के साथ था. उन्होंने आर्थिक और सामाजिक शोषण के प्रति आवाज उठाते समय अत्याचारों के प्रति अपनी नाराजगी और वितृष्णा को भी नहीं छिपाते. 

विवेकी राय ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने ग्राम-जीवन को अपने व्यक्तित्व के साथ-सतह साहित्य में संजोकर रखा था. उनके साहित्य में ‘बबूल’ है तो ‘गंवाई गंध गुलाब’, ‘रजनीगंधा’ भी है और ‘नई कोयल’ भी. कहने का आशय है कि उनके साहित्य का फलक विस्तृत है. उनके लेखन की पृष्ठभूमि वस्तुतः गाँव ही है. इस संदर्भ में उन्होंने स्वयं कहा है कि “मेरे लेखन की पृष्ठभूमि ग्राम जीवन होना मेरी ईमानदारी का तकाजा रहा है क्योंकि इसे मैंने दीर्घकाल तक जिया और भोगा है.” (विवेकी राय, ‘आधुनिक भारत का चेहरा धुंधग्रस्त है,’ संवाद चलता रहे, कृपाशंकर चौबे, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 1995, पृ. 96). इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंने गाँव के बाहर देखा ही नहीं. इस संदर्भ में विवेकी राय क्या कहते हैं ज़रा देखें – “ऐसा नहीं है कि मैंने गाँव के बाहर नहीं देखा है. वास्तविकता यह है कि गाँव की जमीन पर खड़े होकर मैंने आधुनिक जन-जीवन को समग्र रूप में देखा है और आत्मसात कर उसे अभिव्यक्ति दी है. यदि आप गाँव के बाहर का अर्थ नगर मानते हैं तो आपको यह भी मानना पड़ेगा कि नगर के कोण से आप समग्र भारतीय जीवन को उभारने का दावा तो कर सकते हैं किंतु वास्तव में यह दावा अधूरा होगा क्योंकि भारतीय जीवन की आत्मा गाँव है.” (वही, पृ. 97). उनके साहित्य पर दृष्टि केंद्रित करने से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने जो कुछ कहा है उन्हें अपने साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है. उनके कथासाहित्य में चित्रित गाँव संपूर्ण भारत के स्वातंत्र्योत्तर गाँवों का प्रतिनिधि करते हैं. 

विवेकी राय समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के प्रति आक्रोश व्यक्त करते थे. विशेष रूप से शिक्षा जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार के संबंध में वे अत्यंत चिंतित दिखाई पड़ते थे. वे कहा करते थे कि “यह एक दुखद सर्वमान्य तथ्य है कि स्वतंत्र भारत में उत्तरोत्तर द्रुतगति से शिक्षा का ह्रास हुआ है और अब वह पूरी तरह नष्ट हो गई है. देश में पहले अशिक्षित ईमानदार लोग अधिक थे और अब शिक्षित बेईमानों की बाढ़ आ गई है. वर्तमान व्यवस्था के रहते शिक्षा सुधार की कोई उम्मीद नहीं है.” (वही, पृ. 98). 

जनता के पक्षधर विवेकी राय का लेखन ग्राम संस्कृति और श्रम संस्कृति को समर्पित है और बड़ी ललक से अपने पाठक से सहज संबंध स्थापित करने में समर्थ है. विवेकी राय ने साहित्यकार के मूल धर्म का सर्वत्र निर्वाह किया क्योंकि उन्होंने मूल्य-चिंतन से कहीं विमुख नहीं हुए. वे स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श की घोषणाएँ करते गली-गली और मंच-मंच नहीं घूमते, लेकिन वास्तविकता यह है कि समाज के इन दोनों ही वर्गों के शोषण और दमन से वे भीतर तक विचलित होते थे और एक साहित्यकार के रूप में इनके साथ अपनी पक्षधरता लेखन के माध्यम से प्रमाणित करते थे. कहना होगा कि उपन्यास हो या कहानी, निबंध हो या समीक्षा, संस्मरण हो या पत्र, उनके लखन में लोकजीवन और लोकभाषा अपनी पूर्ण ठसक के साथ विद्यमान है. उनकी लेखकीय प्रतिभा के संबंध में सत्यकाम ने कहा था कि “जिस भाषा के पास विवेकी राय जैसे लेखक हों उस भाषा के अवरुद्ध और स्थिर होने का भी ख़तरा नहीं. लोकभाषा के रूप में नित्य नए प्रपात इससे मिल रहे हैं और इसका बल बढ़ा रहे हैं. विवेकी राय के लेखन का रस वस्तुतः लोकरस है, जो उनके लेखन में ही नहीं, उनके व्यक्तित्व में भी झलकता है.” (सत्यकाम, ‘तब मैंने हिंदी-अखबार लेना शुरू किया’, विवेकी राय और उनका सृजन-संसार, (सं) मान्धाता राय, वाराणसी : विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2007, पृ. 142). यदि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है तो विवेकी राय का व्यक्तित्व और कृतित्व यह बतलाता है कि भारत के गाँव उनकी आत्मा में बसते हैं. लोकभाषा और लोक-संस्कृति के ऐसे सजग प्रहरी का जाना साहित्य जगत के लिए वास्तव में अपूरणीय क्षति है.

शनिवार, 26 नवंबर 2016

[ई-पीजी पाठशाला : गुर्रमकोंडा नीरजा : ई-पाठ : 6] लोक सुभाषितों में लोक मानस और समाज



ई-पाठ लेखक : 

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा.

प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद

प्रस्तुतकर्ता :

डॉ. आनंद वर्धन शर्मा,

प्रतिकुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

[ई-पीजी पाठशाला : गुर्रमकोंडा नीरजा : ई-पाठ : 5] लोक साहित्य के अध्ययन की पाश्चात्य परंपराः स्वरूप और धाराएँ



ई-पाठ लेखक : 
डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा.
प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद
प्रस्तुतकर्ता :
डॉ. देवराज,
अधिष्ठाता, अनुवाद विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा