गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

छत्तीसगढ़ की भाषाओं का व्यापक सर्वेक्षण

 भाषा सर्वेक्षणलेखक : डॉ. रामनिवास साहूपृष्ठ : 278/
 
मूल्य : रु. 85संस्करण : 2017, द्वितीय संस्करण
प्रकाशक : आलेख प्रकाशन, दिल्ली  
भारत के एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को मान्यता प्राप्त हुए कुछ ही वर्ष हुए हैं. परंतु यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ भाषा संपदा के लिए भी लंबे समय से जिज्ञासा और शोध का क्षेत्र रहा है. यहाँ हिंदी के साथ विभिन्न वनवासी जनजातीय समुदायों में मुंडा भाषाएँ प्रचलित हैं जिनके भीतर 9 अलग-अलग मातृभाषाएँ आती हैं. जैसे-जैसे आधुनिक विकास वहाँ पहुँच रहा है, वैसे-वैसे ये समुदाय जल-जंगल-जमीन से बेदखल होते जा रहे हैं. इस विस्थापन की कड़ी मार मातृभाषाओं के रूप में प्रयुक्त इन मुंडा भाषाओं पर रही है और तेजी से ये सभी लुप्त होने के कगार पर पहुँच रही हैं. ऐसी स्थिति में भाषावैज्ञानिकों से लेकर समाजशास्त्रियों तक की रुचि इन भाषाओं के प्रति बढ़ गई है. इस दिशा में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से संबद्ध डॉ. रामनिवास साहू की पुस्तक ‘भाषा सर्वेक्षण’ (2017) एक ताजा प्रयास के रूप में सामने आई है. 

डॉ. रामनिवास साहू ने इस पुस्तक के माध्यम से भाषा सर्वेक्षण के चुनौतीपूर्ण कार्य को एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र - छत्तीसगढ़ - में फैली हुई 9 मुंडा भाषाओं (खरिया, महतो, माझी, कोरवा, मुंडारी, बिरहोड़, तूरी, ब्रिजिआ और कोड़ाकु) के संदर्भ में अत्यंत श्रमपूर्वक संपन्न किया है. मुंडा आदि 9 भाषाओं का यह सर्वेक्षण भाषाविज्ञान के अध्येताओं के अलावा सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यंत रोचक है तथा इन भाषाओं से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान करने के अलावा कई भ्रांतियों को दूर करने की दृष्टि से भी उपयोगी है।

लेखक ने छत्तीसगढ़ की मुंडा भाषाओं के इस सर्वेक्षण के अपने अनुभवों को भी रोचक ढंग से कलमबद्ध किया है. वे बताते हैं कि अपने क्षेत्र-कार्य के दौरान प्रथम सोपान में जहाँ ‘चिरई-झुंझ’ जैसे अगम्य वनों के झुरमुटों में फँसा था, वहीं द्वितीय सोपान में रायगढ़ जिले के उत्तर-पूर्वांचल स्थित जशपुरनगर की मनोरम्य भूमि एवं पश्चिमोत्तरांचल स्थित कैलाश-नाथेश्वर गुफा की वन-वसुधा का दर्शन भी हुआ. इसी तरह अंतिम सोपान में चुटईपाट के शीर्ष तक पहुँच कर विभिन्न पहाडियों से ठिठोली करने का भी अवसर प्राप्त हुआ. सर्वेक्षण के दौरान पहाड़ और जंगल के गाँवों में लेखक ने भूख का मारक अनुभव भी पाया. साखो ग्राम में एक रात लेखक दर-दर भटकता फिरा; किंतु एक पसर भर (पाव भर) चावल तक नहीं मिला, जिससे रात आँतें मरोड़ बिताई, फिर अगले दिन ग्यारह कि.मी. दूर जाने पर अमेरबहार ग्राम में चावल मिला और सब्जी के नाम पर एक तो कच्चे आम की चटनी मिली, फिर नमक की डली. शयन के लिए तो सर्वत्र झड़ा हुआ भू-खंड मिलता, जहाँ दरी बिछाते ही शयन-स्थल का चयन हो जाता अथवा कहीं धान का पुआल मिल जाता तो वही गद्दीनुमा बिस्तर बन जाता. साखो ग्राम में तो ग्रीष्मावकाश होने के कारण नदी की रेत पर लेखक ने रात बिताई.

कुल मिलाकर यह एक रोचक और ज्ञानवर्धक ग्रंथ है. 

समाज और संस्कृति के फलक पर छत्तीसगढ़ का ‘भाषा सर्वेक्षण’

भाषा सर्वेक्षण/ लेखक : डॉ. रामनिवास साहू/ पृष्ठ : 278/ 
मूल्य : रु. 85/ संस्करण : 2017, द्वितीय संस्करण/
 प्रकाशक : आलेख प्रकाशन, दिल्ली 

भाषा और भाषाविज्ञान को आम तौर पर कठिन और रसहीन विषय माना जाता है। इनका नाम सुनते ही छात्र और शोधार्थियों की तो हालत ही खराब हो जाती है। इस काल्पनिक भय का कारण विषय की आधारभूत संकल्पनाओं की जानकारी के अभाव में निहित है। यदि यह गाँठ खुल जाए तो भाषा अध्ययन अत्यंत रोचक विषय प्रतीत होता है। 

डॉ. रामनिवास साहू (1954) का भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के अनुदान से प्रकाशित ग्रंथ ‘भाषा सर्वेक्षण’ (2017, द्वितीय संस्करण) इसका जीवंत प्रमाण है। इस 278 पृष्ठों की शोधपरक कृति में छत्तीसगढ़ में प्रचलित मुंडा भाषाओं का भाषावैज्ञानिक पद्धति के अनुरूप सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। इस सर्वेक्षण के लिए उन्होंने क्षेत्रकार्य को आधार बनाया है।

भारत जैसे बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक देश में अनेक भाषायी कोड विद्यमान हैं। अलग-अलग सामाजिक बोलियाँ और क्षेत्रीय बोलियाँ (regional dialects) हैं जिनके भीतर भी विभिन्न विकल्प (variations) प्राप्त होते हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो क्षेत्रीय बोलियाँ बहुत ही संपन्न होती हैं तथा इनके सारे सांस्कृतिक तत्व जन जीवन के साथ विकसित होते हैं। ये सांस्कृतिक तत्व ही संबंधित समुदाय की भाषिक संस्कृति का गठन करते हैं। 

यह भी देखा जा सकता है कि हर व्यक्ति की बोली एक-दूसरे से भिन्न है। किसी बोली या भाषा के जितने बोलने वाले होते हैं उसकी उतनी ही व्यक्तिबोलियाँ होती हैं। विभिन्न भाषाविदों ने इन बोलियों एवं भाषाओं का सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है। भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण का सर्वप्रथम प्रयास 1030ई. में अलबरूनी ने किया था। आगे चलकर 1888 से 1903 तक 15 वर्षों की अवधि में जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भारतवर्ष के भाषा सर्वेक्षण का कार्य किया जो 21 जिल्दों में प्रकाशित है – ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ नाम से। इसमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों का सविस्तार सर्वेक्षण शामिल है। साथ ही भाषाविज्ञान और व्याकरण संबंधी सामग्री भी। 

डॉ. रामनिवास साहू ने विवेच्य ग्रंथ के माध्यम से भाषा सर्वेक्षण के इस चुनौतीपूर्ण कार्य को एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र के संदर्भ में आगे बढ़ाने वाला कार्य किया है। इस ग्रंथ में छत्तीसगढ़ में फैली हुई 9 मुंडा भाषाओं (खरिया, महतो, माझी, कोरवा, मुंडारी, बिरहोड़, तूरी, ब्रिजिआ और कोड़ाकु) का सर्वेक्षण, वर्गीकरण, विश्लेषण तथा तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस अत्यंत श्रमसाध्य कार्य में, कितने वर्ष लगे वे ही बता सकते हैं। 

मुंडा आदि 9 भाषाओं का यह सर्वेक्षण भाषाविज्ञान के अध्येताओं के अलावा सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यंत रोचक है तथा इन भषाओं से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान करने के अलावा कई भ्रांतियों को दूर करने की दृष्टि से भी उपयोगी है। अतः इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने पर भी फिर से पढ़ने की इच्छा होती है विषय को गहराई से जानने के लिए। 

विवेच्य पुस्तक ‘भाषा सर्वेक्षण’ में चार खंड हैं। ‘भूमिका’ शीर्षक प्रथम खंड में भाषा सर्वेक्षण के पूर्वकार्य को प्रस्तुत किया गया है। साथ ही भारतवर्ष के मुंडा भाषी क्षेत्र, छत्तीसगढ़ के भाषापरिवार एवं मुंडा भाषाओं का परिचय तथा मुंडा भाषियों का नृतात्विक परिचय भी समाहित है। ‘भाषा सर्वेक्षण’ शीर्षक दूसरे खंड में छत्तीसगढ़ की मुंडा भाषाओं का सर्वेक्षण है। इस खंड में लेखक ने सर्वेक्षण के लिए प्रयुक्त कार्यपद्धति, सर्वेक्षण के दौरान उनके अनुभव, मुंडा भाषियों के समुदायों की जानकारी, सर्वेक्षण की कसौटियाँ, विविध बोली क्षेत्रों का विवेचन प्रस्तुत किया है। ‘विश्लेषण’ शीर्षक तीसरे खंड में सर्वेक्षण के आधार पर संकलित सामग्री का विश्लेषण भाषिक इकाइयों के आधार पर किया गया है। चौथे खंड में ग्रियर्सन और सुधिभूषण भट्टाचार्य आदि की पूर्वसामग्रियों का पुनर्मूल्यांकन प्रस्तुत करते हुए डॉ. साहू ने यह प्रतिपादित किया है कि “कालक्रमानुसार अन्य भाषाओं का व्यापक प्रभाव इन पर (मुंडा भाषाओं पर) पड़ा है, फलतः आर्य भाषापरिवार की क्षेत्रीय मातृभाषाओं के तत्व इनमें समाहित होते गए हैं।“ (पृ. 226)। इस खंड में उन्होंने मुंडा भाषा परिवार की समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए यह चिंता वक्त की है कि मुंडा भाषापरिवार की समस्त मातृभाषाएँ संकटग्रस्त हैं, अधिकांश मरणासन्न हैं। यदि इनके संरक्षण हेतु कदम नहीं उठाया गया तो ये मातृभाषाएँ विलुप्त हो जाएँगी। विद्वान लेखक ने इस क्षेत्रकार्य में सम्मिलित शब्द एवं वाक्य इकाइयों की सूची प्रस्तुत तथा सर्वेक्षित मुंडा भाषाओं का शब्दस्तरीय तुलनात्मक अध्ययन दो अत्यंत उपादेय परिशिष्टों के रूप में प्रस्तुत किया है।

मुंडा समुदायों की संस्कृति :-
इस पुस्तक की पठनीयता और उपयोगिता इसमें शामिल मुंडा भाषियों की संस्कृति के परिचय के कारण और भी बढ़ गई है। लेखक ने यह जानकारी दी है कि मुंडा भाषी समुदायों के सभी वर्गों में पितृसत्तात्मक पारिवारिक व्यवस्था मिलती है। उनके अनुसार, मुंडा भाषियों के सभी समुदायों में बहुपत्नी विवाह स्वीकृत है, लेकिन इस विवाह पद्धति के भी नियम हैं – जैसे पत्नी के बांझ हो जाने, या उसकी मृत्यु हो जाने अथवा किसी परपुरुष के साथ भाग जाने की स्थिति में ही कोई पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है। मुंडा समुदायों में विधवा विवाह की व्यवस्था भी है। तूरी, बिरहोड एवं मुंडा समुदायों में विधवा विवाह स्वीकृत है लेकिन खरिया, ब्रिजिआ, महतो एवं माझी में विधवा को शेष जीवन मायके में ही व्यतीत करना होता है। कोड़ाकु तथा कोरवा समुदायों में विधवा विवाह को सामाजिक व्यवस्था का उल्लंघन माना जाता है तथा अर्थदंड के साथ-साथ सामाजिक भोज देने के बाद ही ऐसे स्त्री-पुरुष को समुदाय में शामिल किया जा सकता है। 

यह ग्रंथ मुंडाभाषी समुदायों की विवाह प्रणाली के बारे में भी रोचक जानकारी देता है। खरिया, तूरी, ब्रिजिआ, महतो, माझी जैसे कुछ समुदायों में विवाह प्रणाली निम्नवर्गीय हिंदुओं जैसी ही है। कुछ ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके मुंडा भाषियों की विवाह प्रणाली भिन्न है। बिरहोड़ समुदाय में जब लड़के का जन्म होता है, तो सारे परिवार के सदस्यों का ध्यान उसकी ‘दुल्हन’ लाने की सभी शर्तों को पूरा करने हेतु केंद्रित हो जाता है। तब से ही परिवार के पारिश्रमिक का कुछ अंश उसकी आवश्यकता पूर्ति हेतु संचित होता रहता है। उस लड़के के “युवा होने तक ‘वधू मूल्य’ चुकाने, ‘बेंदरा झोर’ बाँटने, ‘कर्मानाचा’ का निमंत्रण देने हेतु संचित राशि जब पूर्ण नहीं हो पाती, तब शेष धन जुटाने की अपेक्षा में ‘बंधक मजदूरी’ करनी पड़ जाती है।“ (पृ. 50)। विवाह के बाद वर पक्ष की ओर से वधू को लेने आए बारातियों एवं स्वजातियों को दिया जाने वाला सहभोज है ‘बेंदरा झोर’। बंदरों का मांस खिलाना एवं सूप बाँटना इसकी विशेषता है। ‘कर्मानाचा’ ऐसी सांस्कृतिक पद्धति है जहाँ विवाहोपरांत गौना लाने के समय का सहभोज है. इसमें तीन, पाँच अथवा सात दिनों तक सामूहिक नृत्य का निमंत्रण शामिल होता है। इस अवसर पर वर-वधू के समक्ष जीवन के हर पहलू की व्याख्या की जाती है। 

बिरहोड़ समुदाय में संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है। खरिया, तूरी, ब्रिजिआ, मुंडा आदि समुदायों में माता-पिता द्वारा विवाह संपन्न किए जाते हैं जबकि कोड़ाकु, कोरवा, महतो, माझी समुदायों में युवक-युवतियों को वर-वधू चुनने की स्वतंत्रता होती है। कोडाकु समुदाय में ‘शूंदो’ प्रथा (युवा सम्मेलन) का आयोजन किया जाता है जहाँ युवक-युवतियों को मनपसंद जोड़ी चुनने की स्वतंत्रता रहती है। 

मुंडा भाषाओं का भाषिक विश्लेषण :-
प्रत्येक समाज में अनेक भाषाएँ और बोलियाँ होती हैं। एक ही क्षेत्र में प्रत्येक समाज की अलग-अलग बोली हो सकती है। प्रत्येक भाषा/ बोली किसी न किसी अन्य भाषा/बोली से जहाँ कुछ बिंदुओं पर समानता रखती है, वहीं उनमें कुछ संरचनात्मक असमानताएँ भी प्राप्त होती हैं। दो भाषाओं व बोलियों के बीच निहित असमान बिंदुओं को उद्घाटित करने में व्यतिरेकी विश्लेषण सहायक होता है। लेखक ने विवेच्य ग्रंथ के 146 पृष्ठों वाले तीसरे खंड में मुंडा भाषा परिवार की नौ मातृभाषाओं का व्यतिरेकी विश्लेषण प्रस्तुत किया है जिसमें स्वनिमिक, रूप, रूपस्वन तथा शब्द स्तरीय विश्लेषण शामिल है। 

स्वनिमिक विश्लेषण :-

यह विश्लेषण उच्चरित एवं कथ्य सामग्री पर आधारित है। स्वर और व्यंजन ध्वनियों का विश्लेषण करके लेखक ने यह सिद्ध किया है कि (1) मुंडा भाषाओं में तीन स्वर (इ, उ तथा आ) अत्यधिक सशक्त हैं, (2) मुंडा भाषाओं में अघोष-सघोष के भेद विरोधी युग्म के कारण बनते हैं, (3) कुछ वर्गों की ध्वनियों में अल्पप्राण और महाप्राण के आधार पर भेद विद्यमान हैं, (4) उच्चारण की कठिनाई के कारण मुंडा भाषाओं में सह-व्यंजन युक्त शब्द लुप्त हो रहे हैं, (5) मुंडा भाषाओं में सुर वाक्य स्तर पर अनुतान का भाग होता है, (6) प्रत्येक अक्षर पर बलाघात की कोई न कोई मात्रा पड़ती है, (7) द्वित्व अक्षरों के बाद दीर्घता विद्यमान रहती है, (7) स्वर अपना अस्तित्व खोए बिना ही द्वयाक्षरिक तथा बड़े शब्दों में स्वर संयोग स्थापित करते हैं (पृ. 105-106)।

रूप स्तरीय विश्लेषण :-
रूप स्तरीय अध्ययन में यह ध्यान रखा गया है कि “रूपिम मुंडा भाषा के परिप्रेक्ष्य में न होकर समस्त मातृभाषाओं की अपनी-अपनी सीमा परिप्रेक्ष्य में हो.” (पृ. 147). संज्ञा, लिंग, वचन, कारक, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, काल एवं योजक शब्दों का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि (1) मुंडा भाषाएँ अश्लिष्ट योगात्मक प्रकृति की हैं. अतः इनमें अर्थतत्व और संबंधतत्व के योग होने पर भी दोनों का अस्तित्व स्पष्ट दिखाई देता है, (2) सर्वेक्षित मुंडा भाषाओं में आदि, मध्य एवं अंत्य तीनों प्रकार के प्रत्यय मिलते हैं, (3) मुंडा भाषाओं में संज्ञा या तो रूढ़ होती है अथवा यौगिक. समस्त संज्ञा पदों में कारक, वचन और लिंग के प्रत्यय संयोग से यौगिक संज्ञा रूपायित होती है, (4) मुंडा भाषाओं में तीन प्रकार के लिंग हैं – स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसकलिंग – जो शब्दों के अर्थ पर आधारित हैं, (5) तीन प्रकार के वचन हैं – एकवचन, द्विवचन और बहुवचन, (6) कारक विधान सरल है. कर्ता और कर्म कारक की अभिव्यक्ति अर्थपरक होती है, (7) पाँच प्रकार के सर्वनाम होते हैं – पुरुषवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, संबंधवाचक और प्रश्नवाचक. (पृ. 147-213). साथ ही विवेचित मुंडाभाषाओं का रूपस्वनिम विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है. यह स्पष्ट किया गया है कि “मुंडा भाषाओं में रूपस्वनिमिक (स्वनिम एवं रूपिम के बीच की स्थिति) परिवर्तन यदाकदा ही संभावित होता है. सामान्यतया प्रत्यय-संयोग के बिंदु पर यह घटित होता है.” (पृ. 216).

शब्द स्तरीय विश्लेषण :- 
मुंडा भाषाओं में प्राप्त शब्दों को लेखक ने दो प्रकारों में विभाजित किया है – (1) आकर और (2) आदत्त (आगत). आगत शब्दों के स्रोत हैं हिंदी और अंग्रेजी. वे बताते हैं कि मुंडा भाषाओं के आकर शब्द विशेष संपन्न न होते हुए भी मुंडा जन ने अपने सरल एवं परंपरागत जीवन की गतिविधियों को अभिव्यक्त करने हेतु पूर्णतः सक्षम शब्दों को गढ़ने में कोई कमी नहीं की है. ऐसे शब्दों में प्रगतिशीलता और सजीवता भी है. संपर्क का दायरा बढ़ने के साथ ही ये आगत शब्दों की सहायता से अपने शब्द भंडार को वैभवयुक्त बनाते चले जा रहे हैं. (पृ. 218). 

ग्रंथ के मूल्यांकन संबंधी खंड में लेखक ने ध्यान दिलाया है कि मुंडा भाषाएँ संकटग्रस्त और मरणासन्न भाषाएँ हैं क्योंकि इनके प्रयोक्ता समुदायों को आधुनिक जीवनधारा से जुड़ने के लिए जंगल और जमीन से विस्थापित होना पड़ रहा है. इस विस्थापन के मातृभाषाओं पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को लेखक ने एक समस्या क्षेत्र की भाँति पाठक समाज के सामने प्रस्तुत किया है. इस प्रकार यह ग्रंथ केवल भाषाविज्ञान ही नहीं, नृवंशविज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र की दृष्टि से भी पर्याप्त विचारणीय सामग्री से परिपूर्ण है. 

रविवार, 3 दिसंबर 2017

दिनकर की उर्वशी पर पुराणों का प्रभाव

डॉ. सुनीति/ दिनकर की उर्वशी : स्रोत एवं मौलिक उद्भावना (2017)
 मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/ मूल्य : रु. 600/ पृष्ठ 394



“रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी, 
क्योंकि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है।“ (उर्वशी, पृ. 45-46) 

इस उद्घोष पर आधारित काव्य रूपक ‘उर्वशी’ पुराण प्रसिद्ध उर्वशी और पुरुरवा की कथा पर आधारित है। दिनकर की इस रचना पर अनेक समीक्षात्मक कृतियाँ उपलब्ध हैं। यही नहीं, हैदराबाद शहर को यह श्रेय भी प्राप्त है कि यहाँ से निकलने वाली अद्वितीय पत्रिका ‘कल्पना’ ने अपने 4 अंकों में उर्वशी और उससे जुड़े विवाद पर धारावाहिक सामग्री प्रकाशित की थी. आज लोकार्पित हो रही डॉ. सुनीति की शोधपूर्ण कृति ‘दिनकर की उर्वशी : स्रोत एवं मौलिक उद्भावना’ (2017) इस चर्चा को एक नया आयाम देने वाली कृति है. 

लेखिका ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक दिनकर की ‘उर्वशी’ के स्रोत और कवि की मौलिक उद्भावनाओं को रेखांकित किया है। आमुख में लेखिका ने स्वयं इस बात को स्पष्ट किया है कि “नारी के विविध रूपों का समन्वय एवं उसके ममता से भरे भावों को जिस अनोखे एवं यथार्थ रूप में ‘उर्वशी’ में प्रस्तुत किया गया है, उस प्रभाव की अभिव्यक्ति ही, प्रस्तुत ग्रंथ की पृष्ठभूमि रही है।“ (आमुख)

इस शोधग्रंथ में 9 अध्याय हैं। पहले अध्याय में वेदों में निहित उर्वशी-पुरुरवा की कहानी को रेखांकित करते हुए लेखिका कहती हैं कि वेदों में उर्वशी आख्यान सृष्टि विद्या के वैज्ञानिक तथ्य को प्रकट करने वाला आख्यान प्रतीत होता है। आगे तीन अध्यायों में उन्होंने क्रमशः उर्वशी के पौराणिक स्वरूप, संस्कृत साहित्य में निहित उर्वशी की कथा तथा कवींद्र रवींद्र, योगिराज अरविंद और जयशंकर प्रसाद के साहित्य में प्रस्तुत उर्वशी के रूपों का मूल्यांकन करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि “पौराणिक काव्यों में फैला हुआ उर्वशी का कथानक आधुनिक युग में भी अपनी सरसता को लिए विविध रूप में अपना सौंदर्य बिखेर रहा है। इन सभी बिखरे रूपों का एक उत्कृष्टतम रूप दिनकर की उर्वशी में सहज ही प्रतिभासित होता है।“ (पृ. 185)। आगे के 5 अध्यायों में डॉ. सुनीति ने दिनकर की ‘उर्वशी’ की कथावस्तु, चरित्र चित्रण, दार्शनिक रूप, काम और मनोविज्ञान के सामंजस्य आदि को रेखांकित करते हुए प्रतिपादित किया है कि ‘उर्वशी’ एक ऐसा काव्य है जो रस से रहस्य में प्रवेश करता है और काम के द्वारा मोक्ष का द्वार खटखटाता है। लेखिका यह भी कहती हैं कि “युगों-युगों तक ‘उर्वशी’ महाकाव्य, नर-नारी की चिरंतन कामगत समस्याओं को सुलझाता, जीवन को सँवारता, मानव में उस अद्भुत शक्ति का संचरण करेगा, जिससे कि मानव अपने मूलभूत गुणों के कारण गौरवान्वित हो सके.” (पृ. 388) 

यों तो इस ग्रंथ के सभी अध्याय अत्यंत गहन हैं जिन्हें बार-बार पढ़े जाने की जरूरत है। लेकिन अध्याय 2 जिसका शीर्षक ‘उर्वशी का पौराणिक स्वरूप’ है, खास तौर पर ध्यान खींचता है। इस अध्याय में भारतीय पौराणिक वाङ्मय में उर्वशी-पुरुरवा के आख्यान का अत्यंत रोचक अनुशीलन किया गया है। वास्तव में उर्वशी और पुरुरवा की कहानी दुनिया की सबसे पुरानी प्रेम कहानी है जिसमें अप्सरा और मनुष्य का प्रणय दर्शाया गया है। यह कहानी ऋग्वेद से चलकर पुराणों और कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम’ से होती हुई दिनकर के काव्य रूपक ‘उर्वशी’ तक पहुँचती है। इस अध्याय में लेखिका ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि दिनकर ने पुराणों में वर्णित उर्वशी-पुरुरवा के कथानक को अंशतः ही ग्रहण किया है क्योंकि उर्वशी द्वारा तीन शर्तें रखना, मेषों का अपहरण, गंधर्वों का वरदान आदि अनेक घटनाओं को दिनकर ने छुआ तक नहीं है। डॉ. सुनीति को लिखे हुए पत्र में दिनकर ने स्वयं इस बात को स्पष्ट किया है कि महर्षि अरविंद ने उर्वशी को आत्मा के आध्यात्मिक उद्देश्य के रूप में चित्रित किया है। जब उर्वशी चली जाती है तो पुरुरवा उसे खोजता हुआ हिमालय की घाटियों में भटकता फिरता है। भरत के शाप को दिनकर उर्वशी के चले जाने का कारण मानते हैं। दिनकर की दृष्टि में पुरुरवा सनातन नर का प्रतीक है और उर्वशी सनातन नारी का। उन्होंने ‘उर्वशी’ की भूमिका में इस बात को रेखांकित किया है कि वैदिक आख्यान की पुनरावृत्ति अथवा वैदिक प्रसंग का प्रत्यावर्तन उनका ध्येय नहीं है। (उर्वशी, भूमिका)

इस दूसरे अध्याय का सबसे बड़ा महत्व यही है कि दिनकर की उर्वशी के परंपरागत स्वरूप और आधुनिक उद्भावनाओं को इस चाभी के बिना खोला नहीं जा सकता।

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

प्रवासी कथाकार देवी नागरानी की मूल्य चेतना

अविभाजित भारत के कराची में ईस्वी सन 1941 में जन्मी देवी नागरानी मूलतः सिंधीभाषी प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं. उनके परिवार को 1947 में विभाजन की त्रासदी के कारण विस्थापित होना पड़ा जो अनेक पड़ावों को पार करते हुए दक्षिण भारत में हैदराबाद में बस गया. वहीं स्कूल और कॉलेज स्तर की शिक्षा प्राप्त की. फिर अध्यापन से जुड़ गईं - पहले मुंबई, फिर शिकागो और अंत में न्यू जर्सी. देवी नागरानी ने जिंदगी के हर मोड पर कुछ न कुछ सीखा है. वे हर नए अनुभव को नया जन्म मानने वाली लेखिका हैं. उन्होंने जीवनानुभवों की रोशनी में अपने भीतर की सृजनात्मक शक्ति को पहचाना. अलग-अलग पडावों के बसने-उखाड़ने-फिर बसने की जद्दोजहद के दौरान ‘’कुछ सीखा कुछ सिखाया – कुछ के लिए मायस्त्रा (मास्टरनी) बनी, कुछ मेरे गुरु बन गए.” (ई-कल्पना). और इस तरह देवी नागरानी शिक्षक के रूप में न्यू जर्सी के विद्यार्थियों को हिंदी भाषा के साथ-साथ भारतीय दर्शन और संस्कृति से भी परिचित कराने लगीं. 

देवी नागरानी का व्यक्तित्व सौम्य है. वे मृदुभाषी हैं और उनकी सोच सकारात्मक. उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं दीखता. हर पड़ाव पर जो अनुभव प्राप्त किए उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने साहित्य को माध्यम बनाया. इस संदर्भ में उनका यह मत उल्लेखनीय है – “1972 से टीचर होने के नाते पढ़ती-पढ़ाती रही हूँ और सही मायनों में जिंदगी की किताब के पन्ने नित नए मुझे एक नया सबक पढ़ा जाते हैं. कलम तो मात्र एक जरिया है, अपने अंदर की भावनाओं को भी समुद्र की गहराइयों से ऊपर सतह पर लाने का. इसे मैं रब की देन मानती हूँ, शायद इसलिए, जब हमारे पास कोई नहीं होता तो यह सहारा लिखने का एक साथी बनकर रहनुमा बन जाता है.” (वही). 

यों तो देवी नागरानी की सबसे प्रिय विधा गज़ल है. सिंधी और हिंदी में उनके कई मौलिक गज़ल संग्रह प्रकाशित हैं. ‘चरागे-ए-दिल,’ ‘दिल से दिल तक,’ ‘लौ दर्दे दिल की,’ ‘दीवाने-ए-दिल से,’ ‘सहन-ए-दिल मंजरे आम पर होगा’ आदि हिंदी गज़ल संग्रह हैं तो ‘गम में भोगी खुशी,’ ‘गज़ल’ और ‘आस की शम्अ’ आदि सिंधी के. गज़ल को वे अपनी सखी मानती हैं और कहती हैं, “कलम मेरी तन्हाइयों का साथी और गज़ल मेरी सखी! इनके संग सफर करते मेरे भीतर की नारी ने थपेड़े झेलने के बाद बसना, निखरना और महकना सीख लिया है. अब कभी गद्य लिखना शुरू करती हूँ तो पद्य का स्वरूप उसमें झाँकता हुआ नज़र आता है. यह भी लेखन कला का एक अंश है.”(वही). लेकिन कहानी लिखने में भी उनका मन खूब रमता है. सिंधी में लिखी हुई अपनी मौलिक कहानियों का हिंदी में तथा हिंदी की कहानियोँ का सिंधी में वे स्वयं अनुवाद करती हैं. वे अनेक संस्थानों एवं संगठनों द्वारा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों तथा पुरस्कारों से भी सम्मानित एवं पुरस्कृत हो चुकी हैं. 

देवी नागरानी साहित्य की सामाजिक प्रयोजनीयता की पक्षधर हैं. वे उस साहित्य को उत्कृष्ट मानती हैं जो जीवन पथ पर आती-जाती हर क्रिया को पहचानने में पाठक की मदद कर सके और साथ ही उसके भीतर उचित-अनुचित का विवेक जगा सके. उनके अनुसार साहित्यकार का उद्देश्य यह भी होता है कि अपनी लेखनी के माध्यम से पाठकों को भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने के लिए बाध्य करे तथा उच्च मूल्यों को स्थापित करे. वे साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने की हिमायती हैं. उनकी यह मनुष्यकेंद्रित मूल्य दृष्टि उनकी कहानियों में भी गुंथी हुई है जो एक प्रवासी भारतीय साहित्यकार की भारतीय मूल्यों के प्रति सजगता का जीवंत प्रमाण है. स्पष्ट है कि साहित्यकार तो प्रवासी हो सकता है लेकिन साहित्य नहीं. न्यू जर्सी में रहते हुए भी देवी नागरानी का मन भारतीय है. उनकी कहानियों में पाश्चात्य एवं भारतीय परिवेश का द्वंद्व तो है ही, साथ ही भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय संस्कृति विद्यमान है. 

देवी नागरानी की लघुकथओँ और कहानियों को पढ़ने से पता चलता है कि वे अपने परिचित परिवेश से विषयवस्तु का चयन करती हैं तथा तदनुरूप पात्रों का सृजन करती हैं. उनकी हर कहानी मूल्यकेंद्रित है जिससे अमेरिका में बसी लेखिका के भारतीय मानस का पता मिलता है. इस मानस की जड़ें भारतीय जीवन दर्शन, अध्यात्म और मूल्यकेंद्रित भारतीय संस्कृति में निहित हैं. देवी नागरानी बार-बार इस बात को रेखांकित करती हैं कि पाठक की मानसिकता एवं समाज की उपयोगिता को दृष्टि में रखकर साहित्य का सृजन करना अनिवार्य है ताकि पाठक की बौद्धिकता का विकास हो और स्वस्थ समाज का निर्माण हो. वे भारतीय एवं पाश्चात्य परंपरा में निहित मूल्यों का समन्वय करती हैं क्योंकि पाश्चात्य परंपरा ऐहिक, सामाजिक एवं बुद्धिवादी है तो भारतीय मूल्य चिंतन आध्यात्मिक अनुभूति में निहित है. 

देवी नागरानी मानती हैं कि आज बाजारवाद ने मनुष्य को इतना प्रभावित कर दिया है कि वह बाजार के हाथों कठपुतली बनता जा रहा है. उसके लिए सब कुछ बिकाऊ है, यहाँ तक कि स्वयं मनुष्य और उसकी भावनाएँ भी. बाजारवादी मानसिकता ने स्त्रियों की स्थिति को दयनीय बना दिया है. वह केवल भोग्या बन गई है. संवेदनशील साहित्यकार स्त्री के वस्तुकरण को सह नहीं सकता. देवी नागरानी की कहानी ‘शिला’ की केंद्रीय पात्र शिला समीर के प्यार में अंधी होकर अपनी पढ़ाई छोड़कर उससे विवाह करके लेती है, लेकिन समीर तूलिका पर रंग बिखेरकर उसकी तस्वीरों को सजाता था और सुंदरता के दीवाने उन तस्वीरों को खरीदते थे. समीर को दौलत का नशा चढ़ता गया और शिला “किसी पत्थर की मूर्ति की तरह उसकी प्रेरणा बनकर घंटों उसके सामने बैठती” (देवी नागरानी (2016), शिला, ऐसा भी होता है, दिल्ली : शिलालेख, पृ. 31). समीर उसे “एक निर्जीव रंग-बिरंगी पेंटिंग समझ कर स्वार्थ की वेदी पर चढ़ाने के नए रास्ते ढूँढ़ता रहा.” (वही). देवी नागरानी स्त्री की इस स्थिति से विचलित होती हैं. वे बार-बार यह प्रश्न करती हैं कि “क्या पुरुष प्रधान समाज में औरत अपनी कोई पहचान नहीं पाती?”( नई माँ, ऐसा भी होता है, पृ. 175). वे इस बात को रेखांकित करती हैं कि स्त्री को अपनी निर्णयात्मक सोच और भावनाओं पर पूरा अधिकार होना चाहिए. 

बदलते जीवन मूल्यों के कारण स्त्री की स्थिति दयनीय होती जा रही है. इस समाज में स्त्री कहीं भी सुरक्षित नहीं है. उसको मात्र देह मानकर उसके साथ जानवरों की तरह व्यवहार किया जा रहा है. ‘खून की होली’ शीर्षक कहानी की सलोनी को कुछ दरिंदे नोचकर, कुचलकर लावारिस की तरह उसकी लाश को बेरहमी से फेंक जाते हैं. सलोनी, आयशा, आरुषी, निर्भया और न जाने कितनी लड़कियों को गिद्धों का शिकार होना पड़ेगा? देवी नागरानी पाठकों के समक्ष प्रश्न उठाती हैं कि “क्या हसीन होना अभिशाप है? क्यों सौंदर्य को कुचलकर मसला जाता है, रौंदा जाता है, फूल की तरह?” (खून की होली, ऐसा भी होता है, पृ. 81). आगे वे यह भी टिप्पणी करती हैं कि देह का सौदा करने वाले दरिंदे अपने ज़मीर को ज़िंदा कहाँ रख पाते हैं! वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें जन्म देने वाली माँ भी स्त्री है. (वही, पृ. 84). प्रायः स्त्री को किसी और की गलती के कारण समाज में अपमानित होना पड़ता है, ठोकर खानी पड़ती है. गरीब स्त्री की स्थिति तो और भी सोचनीय है क्योंकि पुरुष की नजरें हर वक्त उसका पीछा करती रहती हैं. जब वह अपने अधिकारों की माँग करने लगती है तो तोहमत के सिवाय उसे कुछ हाथ नहीं लगता. ‘वसीयत’ कहानी की दुर्गावती की माँ उसे पिता का नाम दिलाने के लिए आँचल फैलाती है तो वह “वासना का दरिंदा, लफ्जों से रिश्ते तोलता रहा, तोहमत पर तोहमत लगाता रहा, पर माँ की झोली में अपने ही बच्चे के लिए पिता का नाम तक न डाल सका.” (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 74). गलती चाहे किसी की भी हो लेकिन यह संकीर्ण समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता है, उसे ही सजा देता है.

स्त्री-सम्मान रूपी उदात्त जीवनमूल्य के क्षरण से लेखिका अत्यंत क्षुब्ध प्रतीत होती हैं. गरीबी के कारण कई लड़कियों का जीवन समय से पहले ही समाप्त हो जाता रहा है. उनके सुनहरे सपने चकनाचूर होते रहे हैं. भले ही जमींदारी प्रथा समाप्त हो चुकी है लेकिन आज भी समाज में गरीबों को कर्ज के तले दबकर बेटियों का सौदा करना पड़ रहा है. इसी बात को ‘सज़ा या रिहाई’ (पृ.66) शीर्षक कहानी में रेखांकित किया गया है. भले ही हम कह लें कि यह समय स्त्री सशक्तीकरण का समय है लेकिन इस तथ्य से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज भी यह समाज स्त्री को कमतर ही आँकता है. अकेली स्त्री को देखकर पुरुष भेड़िया बन जाता है. रक्षा करने के बजाय निरीह स्त्री की अस्मत को पुलिस ही दागदार बना दे तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है? इसी बात को ‘जंग जारी है’ (पृ. 53) शीर्षक कहानी के माध्यम से उकेरा गया है. अनेक स्त्रीवादी विमर्शकार और साहित्यकार स्त्री मुक्ति को लेकर अनेक बातें करते हैं लेकिन स्त्री मुक्ति केवल अपने शरीर पर अधिकार होने तक सीमित नहीं है. यह तो केवल प्राथमिक चीज है. असली चीज है स्त्री के मानवाधिकार. जर्मेन ग्रीयर भी यही कहती हैं कि स्त्री मुक्ति का अर्थ यदि मरदाना भूमिका अपनाना लगाया जाए तो बर्बादी के अलावा कुछ नहीं. (बधिया स्त्री, पृ. 106). मानवाधिकारों के इस संघर्ष में स्त्री-पुरुष के बीच प्रतियोगिता नहीं सद्भाव होना चाहिए. 

आज समाज में मूल्यहीनता चरम पर है. रिश्ते भी मूल्य खोते जा रहे हैं, खोखले होते जा रहे हैं. रिश्तों को जबरन निभाया नहीं जा सकता. यदि ऐसी स्थिति आ जाए तो जिंदगी बोझ बन सकती है. इस दृष्टि से ‘और मैं बड़ी हो गई’, ‘रिश्तों की उलझन’, ‘नई माँ’, ‘बेमतलब के रिश्ते’, ‘आखरी पड़ाव’, ‘सजा या रिहाई’ और ‘वसीयत’ उल्लेखनीय कहानियाँ हैं. देवी नागरानी ने इन कहानियों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि रिश्ते-नाते एक दिन में नहीं बनते, इन्हें न ही किसी पर थोपा जा सकता है और न ही जबरन निभाया जा सकता है. वे यह चिंता व्यक्त करती हैं कि आज की बाजारवादी संस्कृति के कारण “रिश्तों का टूटना और जुड़ना एक व्यावहारिक चलन-सा बन गया है.” (नई माँ, ऐसा भी होता है, पृ. 172). जो रिश्ते स्वयं को गुमराह होने से नहीं बचा पाते, ऐसे रिश्ते भावी पीढ़ी को क्या पहचान दे पाएँगे? ‘वसीयत’ शीर्षक कहानी के माध्यम से लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि “रिश्तों में अगर निभाने से ज्यादा झेलने तक की नौबत आ जाए, तो मुलायम रिश्तों में नागफनियाँ उग आती हैं.” (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 79) तथा “रिश्तों की बुनियाद भी एक ऐसे ही मधुर व शबनमी प्यार की मोहताज होती है, जो अपनेपन के छुहाव से आलिंगन में ले ले, जो मर्यादा की सीमाओं में रहकर घर के भीतर-बाहर सुकून भर दे, और राहत भरी दुआओं से उस आँगन को गुलशन बना दे.” (वही, पृ. 71), “जो रिश्ते भेद भाव की दलदल में धँसकर कुरूप हो जाते हैं, उनकी बदबू साँसों में घुटन पैदा कर देती है.” (आखरी पड़ाव, ऐसा भी होता है, पृ. 62). 

आज का समय मानव सभ्यता के इतिहास में अब तक का सबसे जटिल समय है. जटिल इसलिए कि रिश्ते-नातों से भी व्यापार किया जा रहा है. यहाँ तक कि माँ की ममता को भी मुनाफे की दृष्टि से ही देखा जा रहा है. जब तक माता-पिता से आर्थिक लाभ हो तब तक ही बच्चे उनकी सुन रहे हैं. माता-पिता को सिर्फ धन कमाने के यंत्र के रूप में ही देख रहे हैं. जैसे ही वृद्धावस्था दस्तक देने लगती है वैसे ही उन्हें घर की दहलीज से वृद्धाश्रमों की दहलीज तक का सफर करना पड़ता है. इस स्थिति पर आक्रोश व्यक्त करते हुए देवी नागरानी कहती हैं कि ऐसा सफर “एक कसैलेपन का स्वाद मुँह में भर देता है. उम्र भर जिस वृक्ष की शाखों से घर-आँगन फला-फूला, आज वही आधार निराधार, बिना परिचय खड़ा है. माना उम्र की पगडंडी बड़ी ही संकरी है, यह भी माना कि इस दौर और उस दौर में दरार जब चौड़ी हो जाती है तो एक गहरे खालीपन को महसूस किया जाता है. इसी फासले को पाटने के लिए ममता को स्वार्थ की ईंटों में चुनवा दिया जाता है.” (वही, पृ. 59). समाज में दिन-ब-दिन मानवता का क्षरण होता जा रहा है. पाशविकता, अमानवीयता चरम पर है. भाषा, जाति, वर्ग, संप्रदाय, नस्ल, वर्ण आदि के नाम पर केवल देश ही नहीं बँट रहा है बल्कि मानवीयता भी बँट रही है. जिंदगी बँट गई, मनुष्य बँट गया है, ममता बाँटी जा रही है, हर चीज को टुकड़ों में बाँटकर बाजार में बेचा जा रहा है. देवी नागरानी कहती हैं कि “वृद्धों को हाशिए पर ले जाने का पहला कारण है समाज में पारिवारिक संस्था के संदर्भ में सोच का बदलाव.” (वही, पृ. 64). वे यह प्रश्न करती हैं कि जहाँ दो पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती हैं वहीं तीसरी बुजुर्ग पीढ़ी क्यों नहीं रह सकती? यह हर किसी को सोचना चाहिए क्योंकि वार्धक्य से कोई नहीं बच सकता. 

निःसंदेह कोई साहित्य, कोई विमर्श ऐसा मूल्य नहीं गढ़ता जिससे समाज के दो अनिवार्य वर्ग परस्पर शत्रु बन जाएँ. देवी नागरानी की कहानियों में यदि बार-बार मनुष्यता, आदमीयत, इंसानियत आदि शब्दों का प्रयोग पाया जाता है तो यह स्वाभाविक ही है. इससे यही स्पष्ट होता है कि वे मानवता को महत्व देती हैं तथा मनुष्य और मनुष्य के बीच पाशविकता को समाप्त करना चाहती है. उनके कुछ प्रयोग देखें – “आदमीयत दलों में विभाजित हो रही है, देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, जी रहे हैं, भोग रहे हैं, पर कुछ कर नहीं पा रहे हैं? (आख़री पड़ाव, ऐसा भी होता है, पृ. 63). “इंसानियत का पाठ पढ़ने वाले इंसानों के दिलों के रोशनदान खुले रहे, अँधेरा छँट गया, रोशन जमीर जगमगा उठे!” (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 80). “मानवता शायद यहीं चूक जाती है कि उनको जन्म देने वाली नारी उनके घरों की धरोहर है.” (वही, पृ. 84), “मानवता जहाँ अपने अर्थों पर पूरी नहीं उतरती शायद वहीँ जवाबदारी का अंत हो जाता है.” (घुटन भरा कोहरा, ऐसा भी होता है, पृ. 127). ‘आदमीयत/ इंसानियत/ मानवता’ और भी अनेक स्थलों पर पुनरावृत्ति से पता चलता है कि मानव-मूल्य लेखिका की चिंता का मूल विषय है. 

भारतीय संस्कृति मूलतः धर्मं और अध्यात्म केंद्रित है. धर्म और अध्यात्म का अभिप्राय यहाँ पूजापद्धति और संप्रदाय विशेष नहीं, बल्कि कर्तव्य से है जिसमें आचरण की पारदर्शिता निहित है. भौतिकतावाद अपने आकर्षण के बावजूद प्रवास में भी भारतीय मानस को अध्यात्म के संस्कार से विलग नहीं कर पाता क्योंकि “हमारे संस्कार हमारी नींव हैं जिनकी जड़ें बहुत मजबूत हैं, इसलिए आसानी से यहाँ की रोशन राहें हमें बहुत जल्दी गुमराह नहीं कर पातीं. शायद हर हिंदुस्तानी की यही प्रतिक्रया हो, क्योंकि हमारी सभ्यता, संस्कृति परिवार से शुरू होकर परिवार पर खतम होती है.” (बेमतलब के रिश्ते, ऐसा भी होता है, पृ. 22). भारतीय संस्कृति कुटुंब संस्कृति है. संयुक्त परिवारों को महत्व देती है. इसके विपरीत पाश्चात्य संस्कृति व्यक्ति केंद्रित है. भारतीय संस्कृति भोग का विरोध नहीं करती बल्कि यह संदेश देती है कि भोग में भी विवेक का होना आवश्यक है. इसीलिए विवाह संस्था को महत्व दिया जाता है और दांपत्य को जन्मों का संबंध माना जाता है. वहीँ पाश्चात्य संस्कृति में परिवार और विवाह को बंधन या अनुबंध माना जाता है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधक सिद्ध होते हैं. विवाह के स्थान पर सहजीवन को भी वहां व्यापक स्वीकृति प्राप्त है. ‘बेमतलब के रिश्ते’ कहानी की क्रिस्टी तीन वर्षों तक अपने पुरुष-मित्र के साथ सहजीवन कायम रखती है और उसके बच्चे की माँ बन जाती है. क्रिस्टी की दोस्त रमा बच्चे के बारे में जानकर जब शादी की बात करती है तो क्रिस्टी कहती हैं, “शादी करना कोई ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, और न ही मैं यह उम्मीद रखती हूँ कि वह मेरे इस बच्चे का बाप बनता फिरे या मेरा पति होने का दावा करे. मैं आजाद हूँ, आजाद रहना चाहती हूँ, कोई नया बंधन मुझे जकड़े यह मुझे मंजूर नहीं.” (वही). रमा क्रिस्टी के इस जवाब से आहत हो जाती है क्योंकि विदेश में रहने के बावजूद रमा की सोच भारतीय ही है और वह भारत की सभ्यता-संस्कृति से गहरे जुड़ी हुई है. भारतीयों की भावनाएँ परिवार और परिवेश से जुड़ी रहती हैं. देवी नागरानी टिप्पणी करती हैं कि “आजाद देश के आजाद लोगों को हर तरह की आजादी है, पर आजादी का सही इस्तेमाल करना पाबंदी के दायरे में होता है. जंजीरों की जकड़न से आजाद होकर हम फिर भी कितने गुलाम रहते हैं, अपनी ख्वाहिशों के, अपने मन की आशाओं और आकांक्षाओं के, और इसी आजादी की कीमत भी हमें उतनी ही बड़ी चुकानी पड़ती है. आजादी का दूसरा छोर है बंधन, और बंधन की परिधि में रहकर जो आजादी हम इस्तेमाल करते हैं, चाहे वह शरीर से जुड़ी हो या मन से, वह हमारे अस्तित्व को अच्छे बुरे तजुर्बों से सजाकर परिपक्वता बख्शती है.” (वही, पृ. 23-24). पाश्चात्य संस्कृति में एक-दूसरे के पार्टनर्स को बदलने को भी गलत नहीं बल्कि फैशन और सभ्यता माना जाता है. मनोरंजन के तौर पर लोग देर रात की पार्टियों में यह सब करते ही रहते हैं. इसी बात को ‘आजादी की कीमत’ शीर्षक कहानी में उकेरा गया है. (वही, पृ. 88). 

देवी नागरानी की कहानियों में स्त्री की बेबसी, वस्तुकरण, अकेलेपन, द्वंद्व, आक्रोश, आत्मविश्वास, जिजीविषा आदि के वैविध्यपूर्ण पाठ निहित हैं तथापि इन कहानियों का केंद्रबिंदु ‘मूल्य’ है. हर सरोकार को मूल्य की दृष्टि से ही उकेरा गया है. कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं – 

(1) स्त्री की बेबसी का पाठ  
  •  उसकी मुस्कुराहट पर भी कर्फ़्यू लाफा हुआ है. (ऐसा भी होता है, पृ. 18). 
  •  चाहे-अनचाहे अहसासों के साथ जीना पड़ता है, कहीं कहीं तो अक्सर धक्के मारकर जिंदगी की गाड़ी को चलाना पड़ता है. (और मैं बड़ी हो गई, ऐसा भी होता है, पृ. 40). 
  •  माँ कुछ कह न पाई, शायद उसे हर आहट पर एक अनचाहा डर सामने आता हुआ नज़र दिखाई दे रहा है. (वही, पृ. 42).
  •  ये कहाँ का इंसाफ है कि मैं अपने बच्चे को देख नहीं सकती? देखते हुए उसे छू नहीं सकती? उसके मुलायम शरीर को महसूस नहीं कर सकती? उसे अपने आलिंगन में भर नहीं सकती, क्यों, पर क्यों? मैं उसकी माँ हूँ, मुझे ये किसी सज़ा दी जा रही है? (ममता, ऐसा भी होता है, पृ. 44). 
(2) द्वंद्व का पाठ 

  •  हादसों को अपनी जिंदगी की सार्थकता समझते हैं. इसी उलझन के दौर में जूझकर सिमटती रही दुर्गावती, ‘क्या करे और क्या न करे’ की कशमकश में खुद अपने आप से भी दूर होती रही. (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 72). 
(3) अकेलेपन का पाठ 

  • यह तन्हाई भी कितनी नीरस है जो इंसान को यादों की गहरी वादियों की अँधेरी गुफाओं में ले जाती है. (जियो और जीने दो, ऐसा भी होता है, पृ. 158)
देवी नागरानी की कथाभाषा में सूक्ति-गठन की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है. इन सूक्तियों का मूलस्वर भी मूल्यबोध से ही निःसृत है. उदाहरण के लिए: अपनेपन की रोशनी में गैरत का अँधेरा गुम हो गया (पृ. 19)/ संस्कृति आचरण की माँग करती है (पृ. 22)/ तकदीर तो पानी का एक रेला है जो बहता जाता है (पृ.24)/ नदी में उफान जब वेग पकड़ लेता है तो कौन बाँध को रोक पाता है? (पृ. 47)/ वक्त सबको सब कुछ सिखा देता है (पृ. 165)/ छत व मकान घर नहीं होते (पृ. 71) आदि. 

निष्कर्षतः, यह कहा जा सकता है कि प्रवासी कहानीकार देवी नागरानी की कहानियों में भारतीय संस्कार में रचे-पगे उदात्त मानवीय मूल्य अंतर्निहित हैं. समाज में व्याप्त अमानुषिक प्रवृत्ति के खिलाफ देवी नागरानी सरल संप्रेषणीय भाषा का व्यवहार करते हुए सुदृढ़ आवाज उठाती हैं, पाठकों को सचेत करती हैं तथा स्थितियों को सुधारने की गुहार लगाती हैं. उनकी कहानियों में विश्वबंधुत्व की भावना निहित है जिसकी जड़ें भारतीय अध्यात्म के तंतुओं से सृजित हैं. 

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