शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की स्वीकार्यता के लिए छोटा सा कदम

14 सितंबर पर हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ ! 

पिछले दिनों 11 वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस में संपन्न हुआ। मॉरीशस के संबंध में यह बात ध्यान रखने जैसी है कि आधुनिक मॉरीशस के निर्माण में उन भारतवंशियों का आधारभूत योगदान है जिन्हें अंग्रेज़ शासन के दौरान जबर्दस्ती या झाँसा देकर एग्रीमंट के तहत वहाँ ले जाया गया था। उन मजदूरों ने अपने परिश्रम से उस जनशून्य स्थान को इतनी रौनकों से भर दिया कि आज दुनिया भर के पर्यटक और निवेशक मॉरीशस की ओर दौड़े चले जाते हैं। वे भारतवंशी अपने साथ प्रायः ‘रामचरितमानस’ का गुटका लेकर गए थे। इसी के सहारे उन्होंने अपनी बोली-बानी और संस्कृति को बचाकर रखा। पश्चिमीकरण की दौड़ में शामिल नई पीढ़ी के संदर्भ में पुरानी पीढ़ी वहाँ अब यह भी महसूस करने लगी है कि भाषा और संस्कृति उसकी पकड़ से छूटती जा रही है। इसके लिए मॉरीशस का अपनी जड़ों की तलाश में भारत की ओर देखना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि यदि भारत ‘माता’ है तो मॉरीशस ‘पुत्र’ है। इसलिए यदि मॉरीशस में भाषा और संस्कृति की पहचान को लेकर कोई समस्या है तो भारत की ज़िम्मेदारी है कि वह हिंदी और हिंदुस्तान की इस पहचान को वहाँ से फिसलने न दे। 11वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन इसी चिंता से दो-चार रहा। 

11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में चर्चा का केंद्रीय विषय ‘संस्कृति’ रखा गया था क्योंकि भाषा में संस्कृति गुंथी हुई होती है। उद्घाटन सत्र में ही इसीलिए भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्पष्ट किया कि भाषा और बोली जहाँ बची हुई है उसे कैसे बढ़ाया जाए और जहाँ लुप्त हो रही है उसे कैसे बचाया जाए। यह प्रश्न संस्कृति के भी प्रसार और संरक्षण का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि गिरमिटिया देशों में लुप्त हो रही हिंदी को बचाने की ज़िम्मेदारी भारत की है। भारत ने यह ज़िम्मेदारी संभाली है। उन्होंने यह भी याद दिलाया है कि सम्मेलन का पहले से ही यह लक्ष्य है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाया जा सके। उन्होंने बताया है कि इसके लिए आवश्यक सारा खर्च उठाने के लिए भारत तैयार है लेकिन प्रावधान यह है कि यह खर्च समर्थक देशों को मिलकर उठाना पड़ता है। उन्होंने आशा प्रकट की कि जब योग दिवस के लिए भारत 177 देशों का समर्थन हासिल कर सकता है तो फिर संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में हिंदी के लिए वह आवश्यक 129 देशों का समर्थन भी प्राप्त कर ही लेगा। 

विदेश मंत्री ने विश्व हिंदी सम्मेलन में यह सूचना साझा की कि संयुक्त राष्ट्र संघ की वेबसाइट पर हर शुक्रवार विश्व हिंदी समाचार प्रसारित करने की शुरूआत की गई है (https://m.soundcloud.com/un-news-hindi/weekly_bulletin)। यह कार्य प्रयोग के रूप में किया जा रहा है। यदि विश्व भर में इस समाचार बुलेटिन को पर्याप्त मात्रा में श्रोता प्राप्त होंगे तो इसे साप्ताहिक के स्थान पर दैनिक भी किया जा सकता है। हिंदी दिवस के अवसर पर हम अपने पाठकों से आग्रह करेंगे कि संयुक्त राष्ट्र के हर शुक्रवार को आने वाले हिंदी समाचार बुलेटिन को स्वयं भी प्रति सप्ताह सुने और अधिक से अधिक लोगों को दुनिया भर में इसे सुनने के लिए प्रेरित करें। यह छोटा सा कदम भी संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की स्वीकार्यता को और अधिक बढ़ाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। इसी प्रकार आप संयुक्त राष्ट्र के हिंदी ट्विटर एकाउंट @UNinHindi से भी जुड़ सकते हैं।

गुरुवार, 7 जून 2018

राम संस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी

डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, प्रधान संपादक.
राम संस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (2018).
पृष्ठ 144, मूल्य : 300 रु.
सरस्वती प्रकाशन, ए-483, कमरा नं. 965, रामश्याम अपार्टमेंट, उल्हासनगर, मुंबई.
“आज जिस दुनिया में हम जी रहे हैं वह तरह-तरह के मूल्य-संकटों को झेल रही है. एक ऐसे परिवेश का व निर्माण हुआ है जिसमें मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा हुआ दिखाई देता है. मनुष्य और मनुष्य तथा मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते इतने गड़बड़ा गए हैं कि न मन में शांति है और विश्व में. शक्ति और बल तो बहुत है पर या तो बिखरा हुआ है या गलत जगह इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली शक्तियों को भी समन्वय और सामंजस्य की आवश्यकता है. इसमें संदेह नहीं कि इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए जिस प्रकार के जीवन दर्शन और वैश्विक दृष्टि की दरकार है वह भारत के पास है; उसकी युगों से जाँची-परखी राम संस्कृति के रूप में.

“राम संस्कृति अपने मौलिक रूप में विश्व मानव की संस्कृति है जो शांति, सद्भाव, साहचर्य, सहयोग, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, न्याय, आत्मसमर्पण, लोकरक्षण और सर्वजन हित जैसे मूल्यों पर टिकी है. यह संस्कृति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की व्याख्या मनुष्य की मुक्ति को केंद्र में रखकर करती है. इस संस्कृति में अपने पुरुषार्थ द्वारा मनुष्य ही ईश्वरत्व को प्राप्त करता है, अवतार की कोटि में स्थान प्राप्त करता है. हजारों वर्ष से यह संस्कृति अपने केंद्र से बाहर फैलने के गुण के कारण दुनिया के जाने कौन कौन से दूरदराज देशों में पहुँची और वहाँ के लोगों के जीवन के हिसाब से तरह-तरह के रूपों में ढल गई. इस तरह राम संस्कृति कहीं चित्रकला के रूप में तो कहीं मूर्तिकला के रूप में, कहीं गीतों के रूप में तो कहीं कथाओं के रूप में, कहीं साहित्यिक कृतियों के रूप में तो कहीं लोगों की अपनी-अपनी रामलीलाओं के रूप में संपूर्ण विश्व में व्याप्त हुई. 

साथ ही इक्कीसवीं शताब्दी की ग्लोबल परिस्थितियां जहाँ राम संस्कृति को अपनाकर एक बेहतर दुनिया के निर्माण की ओर अग्रसर हो सकती हैं, वहीं वर्तमान विश्व में व्यापक वैचारिक आदान-प्रदान के लिए (भूतकाल में इस भूमिका को बखूबी निभा चुकी संस्कृत भाषा की उत्तराधिकारी भाषा) हिंदी को विश्वभाषा के रूप में वह सम्मान दिए जाने की वेला आ गई है जिसके लिए वह सर्वाधिक उपयुक्त पात्र है.” 

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान ‘बतुकम्मा’


[1] 

22 जून 2014 को भारत के 29वें राज्य के रूप में पुनर्गठित होने वाले राज्य ‘तेलंगाना’ अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जिन प्रतीकों को जोर शोर से नए सिरे से दुनिया के सामने रखा उनमें ‘बतुकम्मा’ पर्व का स्थान सर्वोपरि है। इसी कार्य योजना के तहत ‘बतुकम्मा’ का त्योहार 2014 से विराट स्तर पर राजकीय लोकपर्व के रूप में भव्यता के साथ मनाया जाने लगा है। 2016 में यह त्योहार ‘गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकोर्ड्स’ में दर्ज हो चुका है। यह त्योहार प्रकृति की सुंदरता और तेलंगाना के लोगों की सद्भावना का प्रतीक बन गया है। 

‘बतुकम्मा’ का संबंध देवी पूजा से है। यह त्योहार भाद्रपद मास की समाप्ति के दिन अर्थात पितृविसर्जनी अमावास्या से शुरू होता है। स्मरणीय है कि आश्विन मास में देश भर में शारदीय नवरात्र हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं और महिषासुरमर्दिनी दुर्गा की पूजा की जाती है। 

भारत के विभिन्न भागों में यह त्योहार अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। इस अवसर पर उत्तर भारत में रामलीला का आयोजन होता है तो गुजरात में डांडिया या गरबा का। यह पर्व आंध्र प्रदेश में दशहरे के रूप में मनाया जाता है तो तेलंगाना में ‘बतुकम्मा’ के नाम से प्रचलित है। महालय अमावस के दिन शुरू होकर यह पर्व दुर्गाष्टमी के दिन समाप्त होता है। ‘बतुकम्मा’ का अर्थ है ‘बतुकु अम्मा’। तेलुगु में ‘बतुकु’ जीवन का पर्याय है। अतः ‘बतुकम्मा’ का अर्थ हुआ जीव माता अथवा जीवनदायिनी माता। ‘बतुकु’ का एक और अर्थ जागरण भी है। यह माना जाता है कि इस पर्व के माध्यम से जीव अपने जीवन की रक्षा हेतु देवी को पुकारते हैं – ‘हे माँ जागो, रक्षा करो’। अतः ‘बतुकम्मा’ का एक अर्थ हुआ – ‘जागो और रक्षा करो, हे माँ !’ 

नौ दिनों तक चलने वाला फूलों का यह पर्व महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। देवी माँ – बतुकम्मा – को नौ दिन विविध नैवेद्य समर्पित किए जाते हैं। प्रति दिन के नैवेद्य के नाम पर ही उस दिन का विशेष पर्व नाम रखा गया है। पहले दिन को ‘एंगिली पुव्वुला बतुकम्मा’ कहा जाता है। इस दिन तिल से बनाए मिष्ठान्न का भोग चढाया जाता है दिन को ‘एंगिली पुव्वुला बतुकम्मा’ कहा जाता है। 

दूसरे दिन को ‘अटुकुला बतुकम्मा’ कहते हैं। और इस दिन चिवड़े का भोग लगता है। तीसरे दिन फीकी दाल (मुद्दापप्पु बतुकम्मा), चौथे दिन गीले चावल (नानबिय्यम बतुकम्मा), पाँचवे दिन उबले हुए चावल के आटे से बना हुआ दोसा (अट्ला बतुकम्मा), सातवें दिन चावल के आटे से बने हुए निंबौली के आकार के मुरुकुलु/ चकली (वेपकायल बतुकम्मा), आठवें दिन घी, मक्खन, तिल और गुड का मिश्रण (वेन्नमुद्दला बतुकम्मा) तथा नौवें दिन पाँच तरह के चावल – दही चावल, पुलिहोरा (इमली चावल), नींबू चावल, नारियल चावल तथा तिल चावल (सद्दुला बतुकम्मा) का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। लेकिन छठे दिन देवी को नैवेद्य नहीं चढ़ाया जाता क्योंकि यह माना जाता है कि उस दिन देवी माँ सबसे रूठकर बैठ जाती है। इस दिन को ‘अलिगिना (नाराज) बतुकम्मा’ कहा जाता है। अंतिम दिन (‘सद्दुला बतुकम्मा’) को ‘पेद्दा बतुकम्मा’ (बड़ी बतुकम्मा/ महाबतुकम्मा) भी कहा जाता है। इसके बाद होता है ‘बोड्डम्मा’ (गौरी) पूजन जिसके लिए तालाब की मिट्टी से माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती है। मान्यता है कि ‘बतुकम्मा’ का त्योहार वर्षा ऋतु के समाप्त होने का प्रतीक है और इस पर्व के अंतिम दिन गौरी (‘बोड्डम्मा’) पूजन द्वारा शरद ऋतु का स्वागत किया जाता है। 

भारत के अन्य अनेक पर्वों की भांति ‘बतुकम्मा’ भी कृषि संस्कृति का पर्व है। वर्षा ऋतु की सकुशल समाप्ति और उस दौरान जीवन की रक्षा के लिए देवी माँ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस हेतु ‘बतुकमा’ को विशेष रूप फूलों से सजाया जाता है। इसलिए इसे फूलों का त्योहार भी माना जाता है। बरसात में हर ओर हरियाली छा जाती है। तेलंगाना में इस मौसम में हर जगह मद्धम सफेद रंग के ‘गुनुका’ (सेलोसिया) के फूल खिल उठते हैं। बतुकम्मा को सजाने के लिए मुख्या रूप से इन्हीं फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इन्हें ‘बतुकम्मा के फूल’ कहा जाता है। इन फूलों के साथ-साथ तंगेडू (अमलतास), आक, कनेर, घास के फूलों का भी प्रयोग किया जाता है। पहले तो लोग इन फूलों को अपने आसपास के पेड़-पौधों से तोड़ लाते थे लेकिन आजकल जंगली फूलों के स्थान पर गेंदे, गुलाब, गुलदाउदी, गुड़हल और सजावटी फूलों का उपयोग किया जाने लगा है जो बाजार में मिल जाते हैं। 

अब एक नजर ‘बतुकम्मा’ मनाने की विधि पर। सबसे पहले पीतल का थाल लिया जाता है। इसे ‘तांबलम’ कहते हैं। इसमें गोबर से गोल वेदी बनाई जाती है। उस पर गुनुका के फूलों को इस तरह सजाया जाता है कि डंठल भीतर की ओर हो और बाहर फूल दिखाई दें। इन डंठलों पर फिर गोबर से सतह बनाई जाती है और उस पर फिर फूल सजाए जाते हैं। इस तरह परत दर परत पिरामिड आकार में फूलों को सजाया जाता है। शिखर पर कुम्हडे का फूल रखकर उस पर दीपक जलाया जाता है। फूल खुशहाली के प्रतीक हैं और दीपक प्रकाश का। इस संरचना को ही ‘बतुकम्मा’ कहा जाता है। आजकल गोबर के स्थान पर बेंत से पिरामिड आकार बनाया जाने लगा है और उसे रंगबिरंगे फूलों से सजाया जाता है। 

अष्टमी के दिन बतुकम्मा को लेकर स्त्रियाँ नदी किनारे पहुँचती हैं और बतुकम्मा के चारों ओर गोलाकार बनाकर गीत गाते हुए नाचती हैं – 
बतुकम्मा बतुकम्मा उय्यालो 
बंगारु बतुकम्मा उय्यालो 
पूवंटि इंतुलम उय्यालो 
मेमु एंतेंतो एदगालि उय्यालो 
बंतीपूलनिस्ता उय्यालो 
बंगारु मनसिव्वु उय्यालो.....। 
(बतुकम्मा बतुकम्मा झूला झूलो/ सवर्णमयी बतुकम्मा झूला झूलो/ सुमन सुकुमारी झूलो/ हम ऊँची पेंग बढ़ाएँ, झूलो/ गेंदे का हार चढाऊँगी, झूलो/ सोने का दिल दो, झूलो)। 

यह त्योहार मूलतः स्त्रियों का त्योहार है और इसके माध्यम से उनका बहनापा भी प्रकट होता है। गीत-संगीत और नृत्य के बाद ‘बतुकम्मा’ को नदी या तालाब में विसर्जित करते हैं और प्रसाद के रूप में ‘मलीदा’ (बाजरे और ज्वार की मिस्सी रोटी और गुड़) बाँटते हैं। 

‘बतुकम्मा’ त्योहार से संबंधित अनेक लोक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, चोल वंश के राजा धर्मांग और उनकी पत्नी सत्यवती की सौ शूरवीर संतानें युद्ध में एक साथ वीरगति को प्राप्त हो गईं तो राजा और रानी राजपाट त्यागकर वन में तपस्या करने चले गए। उन्होंने संतान की कामना से देवि माँ की आराधना की। देवि की कृपा से उनके एक बेटी हुई लेकिन जन्म से ही उसे तरह-तरह के खतरों का सामना करना पड़ा। तब उस बालिका का नाम ‘बतुकम्मा’ रखा गया क्योंकि वह संकटों के बावजूद उत्तरजीवन (सर्वाइवल) का प्रतीक बन गई थी। त्योहार के अवसर पर गए जाने वाले गीतों में इस कथा का भी उल्लेख किया जाता है। 

बतक्म्मा बतकम्मा उय्यालो, 
बंगारू बतकम्मा उय्यालो 
आनाटी कलाना उय्यालो, 
धर्मांगुडनु राजु उय्यालो 
आ राजु भार्यायु उय्यालो 
अति सत्यवती अंदुरु उय्यालो 
..... 
कलिकी लक्ष्मीनि गूर्ची उय्यालो 
गनता पोंदिरिंका उय्यालो 
.... 
सत्यवती गर्भमुना उय्यालो 
जनियिंचे श्रीलक्ष्मी उय्यालो। 
इस गीत में प्रिय कन्या बतुकम्मा को पालने या झूले में झुलाते हुए राजा धर्मांग और रानी सत्यवती के उल्लेख के साथ उन पर माँ लक्ष्मी की कृपा और वरद कन्या बतुकम्मा के जन्म की चर्चा की गई है।  

यही कारण है कि तेलंगाना क्षेत्र में आज भी यदि किसी घर में जन्म लेते ही बच्ची मर जाती है तो ऐसे माँ-बाप देवी माँ के दरबार में जाकर मन्नत माँगते हैं कि यदि बेटी जन्म लेगी तो उसका नाम ‘बतुकम्मा’ रखेंगे। 

एक और लोककथा भी प्रचलित है। बलात्कार से त्रस्त एक अबोध बालिका नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेती है। गाँव वाले उस बालिका को ‘बतुकम्मा’ (जीवित हो जाओ, माँ) कह कर आशीर्वाद देते हैं। लोग आज भी यह मानते हैं कि ‘बतुकम्मा’ किसी भी अबोध बालिका के साथ ऐसा कुकृत्य नहीं होने देगी। 

एक और मिथकीय कथा इस त्योहार से जुड़ी हुई है। वह यह कि दक्ष के यज्ञ में सती बिना बुलाए चली जाती हैं यह सोचकर कि गुरु और पिता के घर बिना बुलाए जाया जा सकता है। परंतु वहाँ दक्ष शिव की निंदा करते हैं तो सती इस अपमान को सह नहीं पाती और प्राण त्याग देती है। इसी की स्मृति में सती देवी के पुनः जीवित होने की कामना करते हुए फूल और हल्दी से गौरी माता की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है। 

बतुकम्मा से संबंधित एक ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है। वेमुलवाडा के राजा चालुक्य ने चोल राजा और राष्ट्रकूट राजा के बीच हुए युद्ध में राष्ट्रकूट राजा का साथ दिया था और 973 ई. में थैलापुदु द्वितीय ने राष्ट्रकूट के राजा कर्कुदु द्वितीय को हराकर दूसरा चालुक्य साम्राज्य स्थापित किया था जो आज का तेलंगाना है। वेमुलवाडा के साम्राज्य में राजराजेश्वर (भगवान शिव) का प्रसिद्ध मंदिर था। चोल राजा परांतक सुंदर राजराजेश्वर के परम भक्त थे। उन्होंने अपने बेटा का नाम भी राजराजा रखा था। राजराजा चोल (शासन काल 985 ई. - 1014 ई.) के बेटे राजेंद्र चोल ने राजराजेश्वर मंदिर तुड़वा कर वहाँ का शिवलिंग अपने पिटा को भेंट किया था। 1006 ई. में राजराजा चोल ने उस शिवलिंग के लिए मंदिर का निर्माण शुरू कराया। 1010 में बृहदीश्वर नाम से मंदिर की स्थापना हुई और वेमुलवाडा के शिवलिंग को तंजावूर बृहदीश्वर मंदिर में स्थापित कर दिया गया। इससे तेलंगाना के लोग काफी दुखी हुए। कहा जाता है कि तेलंगाना छोड़कर बृहदम्मा (पार्वती) दुखी थी अतः उस दुख को कम करने के लिए बतुकम्मा उत्सव की शुरूआत हुई। लोगों ने फूलों से बड़े पर्वत की आकृति बनाकर शिखर पर हल्दी से गौरम्मा बनाकर पूजा की और गीत-संगीत के साथ त्योहार मनाया । इस प्रकार यह पर्व एक हजार वर्ष से भी अधिक समय से प्रचलित है। 

तनिक गौर करें तो पाता चलता है कि ‘बतुकम्मा’ का त्योहार धरती, पानी और मनुष्य के आपसी संबंध का त्योहार है। बतुकम्मा के लिए प्रयुक्त फूलों में औषधीय गुण होते हैं जो पानी को स्वच्छ रखने में सहायक होते हैं। जहाँ ‘बतुकम्मा’ फूलों से सजाया जाता है वहीं ‘बोड्डम्मा’ को तालाब की मिट्टी से बनाया जाता है। माँ दुर्गा की मूर्ति को तालाब की मिट्टी से बनाकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा तालाब में इस कामना के साथ विसर्जित करते हैं कि वह हमेशा पानी से लबालब रहे। 

[2] 

तेलंगाना के साहित्यकार अपनी रचनाओं में इस पर्व का उल्लेख करना नहीं भूलते। हैदराबाद मुक्ति संग्राम पर आधारित किशोरीलाल व्यास ‘नीलकंठ’ ने उपन्यास ‘रज़ाकार’ (2005) में पृष्ठ 22 से 30 तक इस पर्व का अत्यंत मनोरम चित्रण किया है। नीचे हम उसीके कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। 

“नए नए कपड़ों में सजी ग्रामीण बालाएँ अपने अपने हाथों में रंग-बिरंगे फूलों के थाल लिए आई थीं। थालों को बीचोबीच सजाया गया। दीप जल उठे। ‘बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो’ के लोकगीत गूँज उठे और तालियों की थाप देती महिलाएँ वृत्ताकार वक्र में एक ही ताल पर कदम देती घूमने लगीं।“ 

“बतकम्मा उत्सव दशहरे से पहले नौ दिवस तक मनाया जाता है। शाम के समय महिलाएँ फूलों को सजा कर देवी बतकम्मा के गीत गाती रास खेलती हैं, खूब गाती-हँसती हैं, फिर फूल किसी नदी या तालाब में अर्पित कर दिए जाते हैं। सभी सामूहिक रूप से प्रसाद खाती हैं और अपने घर चली जाती हैं।“ 

“आश्विन के आते आते आकाश में बादलों के समूहों को पवन ग्वाला धकेल धकेल कर पहाड़ों के पार ले जाता, और निरभ्र आकाश से रेशम जैसी गुलाबी धूप झरती... और धूप में पकते हुए सुनहरे धान के खेतों पर पसर जाती। 

अब धान के खेत कटने लगते... कटे धान के कट्टों पर बैल चलते... और धान के बीजों के कुप्पों को देख देख कर किसानों की छातियाँ भी फूल कर कुप्पा होने लगतीं। 

ऐसे में शाम के समय तेलंगाना की बालाएँ जंगल से लाल, पीले, सफ़ेद फूल चुन लातीं... फूलों को एक लंबे मुकुट की आकृति में थालियों में सजाया जाता... छोटे छोटे पीतल के कटोरों या टिफ़िनों में पुटनालु, अटुकुलु, गुड़ जैसी खाने की सामग्री रख कर तालाब, नदी या नहर के किनारे थोड़ी सी सपाट जगह देख कर फूलों की थालियाँ बीच में सजा दी जातीं और फिर ग्राम बालाएँ, युवतियाँ और प्रौढ़ाएँ वर्तुलाकार में तालबद्ध, लयबद्ध तालियाँ बजाती उन फूलों की परिक्रमा करती सामूहिक स्वर में गाने लगतीं : ‘बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो/ बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो।‘ तो सारा परिसर उनके मधुर कलकंठ से गूँजने लगता। रंग-बिरंगे परिधान पहने कृष्णकाय, कृषकाय कृषक बालाएँ वृत्ताकार घूमने लगतीं तो रासलीला में घूमती रंग-बिरंगी गोपियों का रूप साकार हो उठता। लगता, तालियों का समूह फूलों के चारों ओर एक ताल, एक लय में घूम रहा है, फिर क्रमशः गीत बदलते... बोल बदलते... लय और ताल बदलते... तालियों की थाप बदलती... और इन सब के साथ कदमों की छाप बदलती। देवी बतकम्मा के गीतों और नृत्यभरी इस आराधना के बाद फूल नदी में बहा दिए जाते... बीच में प्रज्वलित दीपक रख दिए जाते... तब तक आकाश में अंधेरा घिर आता... तारे झाँकने लगते... लहरों पर तैरते फूलों के बीच टिमटिमाते दीप दूर दूर होने लगते। मानवीय आस्था के ये दीप, उत्साह और उत्सव के ये दीप, जिजीविषा के ये दीप सारे दुख-दरदों के बावजूद न जाने कितनी शताब्दियों से इसी तरह से नदी की लहरों पर छोड़े जाते रहे हैं और नदी भी निर्विकार भाव से न जाने कितनी शताब्दियों से मानवीय आस्था की इन किरणों को अपनी पयस्विनी छाती पर ढोती, उन्हें सम्मान देती आ रही है। फिर हँसती, खिलखिलाती कृषक बालाएँ प्रसादरूपी कलेवा करतीं... नदी का जल पीतीं और गाती हुई उल्लास भरे मन से अपने अपने घर लौटतीं। न जाने कितनी सदियों से बतकम्मा के ये उत्सव चले आ रहे थे। ‘बतकम्मा’ अर्थात ‘जीवन की देवी’। ऐसी देवी जो ‘मृत्योर्मा अमृतांगमयः’ का ग्राम्य रूप हो; जो मृत्यु नहीं, जीवन दान दे; जो मनुष्य की कामनाओं को, आकांक्षाओं को, इच्छाओं को, जिजीविषा का पयःपान कराए।“

  • 'प्रणाम पर्यटन'(वर्ष 2,अंक 1 अक्तूबर-दिसंबर 2017 में प्रकाशित) 


गुरुवार, 15 मार्च 2018

अनुवाद चिंतन पर एक परिपूर्ण दृष्टि


शर्मा, गोपाल (2017)/ अनुवाद : परंपरा और प्रयोग
नई दिल्ली : तक्षशिला
पृष्ठ : 423/ मूल्य : 900 


अनुवाद विज्ञान भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयोग क्षेत्र है। इसकी संकल्पना अत्यंत व्यापक है। अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन जैसे क्षेत्रों का विस्तार हो रहा है। अनुवाद विज्ञान को पाठ विश्लेषण तथा संकेत विज्ञान से जोड़कर भी देखा जाता है। पहले से ही अंग्रेजी में अनुवाद विज्ञान से संबंधित अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। हिंदी में भी अनुवाद की सिद्धांत और व्यवहार से संबंधित अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं क्योंकि स्नातक और सनातकोत्तर स्तर पर अनेक विश्वविद्यालयों में अनुवाद को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है। इन पुस्तकों में ज्यादातर अनुवाद की परिभाषा, स्वरूप, प्रक्रिया, क्षेत्र, प्रकार आदि से संबंधित सामग्री एवं तथ्यों में दुहराव दिखाई देता है। शोध ग्रंथों में भी प्रायः यही स्थिति है। लेकिन हाल ही में मुझे प्रो. गोपाल शर्मा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ (2017, नई दिल्ली : तक्षशिला) देखने और पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ तो ऐसा प्रतीत हुआ कि यही वह पुस्तक है जिसकी अनुवाद विज्ञान के अध्येताओं और हिंदी पाठकों को भी लंबे अरसे से तलाश थी। 

प्रो. गोपाल शर्मा इथियोपिया के अरबा मिंच विश्वविद्यालय में अंग्रेजी और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर हैं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में समान गति से आप शिक्षण, लेखन तथा अनुवाद कार्य करते हैं। आपकी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हैं – देरिदा : विखंडन की शब्दावली, समकालीन मीडिया लेखन, राजभाषा हिंदी : विचार और विश्लेषण, संप्रेषणपरक हिंदी भाषा शिक्षण, केंद्रीय हिंदी व्याकरण, अँधेरे में : देरिदा दृष्टि से एक जगत समीक्षा, एन आउटलाइन ऑफ जनरल लिंग्विस्टिक्स, एन इंटरोडक्शन टू लिटरेरी क्रिटिसिज़्म एंड थ्योरी, प्रेमचंद इन ट्रांस्लेशन, इंग्लिश इन इथोपिया : ईशूज एंड परस्पेक्टिव्ज, नेलसन मंडेला : दि अफ्रीकन गांधी, यूथ आइकन : नरेंद्र मोदी आदि। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से आपने प्रसिद्ध समाजभाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह के सफल निर्देशन में ‘सैद्धांतिक-अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान और हिंदी भाषा : प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का लेखन संदर्भ’ पर शोधकार्य किया है। सभा की मासिक पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ में वैनतेय शास्त्री के नाम से व्यंग्य लेखन भी किया है। 

‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ प्रो. गोपाल शर्मा की शोध दृष्टि और गहन चिंतन का सुपरिणाम है। अनुवाद अध्ययन और अध्यापन तथा शोध के लिए यह उपयोगी एवं महत्वपूर्ण पुस्तक है क्योंकि पहली बार अनुवाद अध्ययन का सर्वांगीण ढाँचा तथा अनुवाद परंपरा का भारतीय एवं पाश्चात्य परिदृश्य इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों के समक्ष उपस्थित हुआ है। इस पुस्तक के ब्लर्ब पर यह उल्लेख किया गया है कि ‘यह पुस्तक अनुवाद अध्ययन की पाश्चात्य व भारतीय परंपराओं, सिद्धांतों और अनुवादवेत्ताओं के लेखन का अद्यतन और विस्तृत विवेचन करते हुए उसके अधुनातन प्रयोगात्मक पक्ष को विशेषतापूर्वक प्रस्तुत करती है।‘ एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी., डिप्लोमा के छात्रों एवं शोधार्थियों के साथ-साथ प्राध्यापकों एवं शोध निर्देशकों को भी इस पुस्तक को आदि से अंत तक अक्षरशः पढ़ना चाहिए। 

‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ शीर्षक इस 423 पृष्ठों के महाकाय ग्रंथ में लेखक ने 14 शीर्षकों के अंतर्गत अनुवाद के वैश्विक परिदृश्य को समेटा है - (1) अनुवाद : महत्व, उद्देश्य, स्वरूप तथा क्षेत्र विस्तार, (2) अनुवाद : बहुस्तरीय व बहुआयामी परिभाषाएँ, (3) सफल अनुवादक की पहचान, (4) अनुवाद और भाषाविज्ञान, (5) अनुवाद की भारतीय परंपराएँ, (6) पाश्चात्य अनुवाद परंपरा, (7) प्रमुख अनुवाद चिंतक : भारतीय व पाश्चात्य, (8) समतुल्यता का सिद्धांत और अनुवाद, (9) उत्तर आधुनिकता और अनुवाद, (10) उत्तर उपनिवेशवाद और अनुवाद, (11) विखंडन और देरिदा की अनुवाद दृष्टि, (12) चित्रपट अनुवाद के विविध पक्ष, (13) मशीनी अनुवाद : उपलब्धियाँ, समस्याएँ और संभावनाएँ तथा (14) अनुवाद की नई सैद्धांतिकी। अंत में अनुवाद विज्ञान से संबंधित हिंदी और अंग्रेजी पुस्तकों की प्रामाणिक सूची भी सम्मिलित है जिसकी उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता। 

अनुवाद के महत्व को सिद्ध करते हुए गोपाल शर्मा कहते हैं कि ईसापूर्व भारतीय जीवन का पश्चिम से जो संबंध रहा वह केवल व्यापार का न होकर सांस्कृतिक आदान-प्रदान का था जिसमें अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। (पृ.13)। लेखक की मान्यता है कि भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना में अनुवाद सहायक था। अनुवाद केवल भाषा का अंतरण नहीं बल्कि सांस्कृतिक अंतरण है। इससे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक प्रगति भी जुड़ी हुई है। लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि “दाराशिकोह के उपनिषदों के अनुवाद से लेकर आज तक की परंपरा के महत्व को समझते हुए यह कहने में गर्व होना चाहिए कि इस क्षेत्र में भारतीय योगदान नगण्य नहीं, अपितु अग्रगण्य है।“ (पृ.14)। 

अनुवाद विज्ञान के छात्र, शोधार्थी एवं शोध निर्देशक प्रायः कैटफोर्ड, नाइडा और पीटर न्यूमार्क तथा रवींद्रनाथ श्रीवात्सव, सुरेश कुमार, कैलाश चंद्र भाटिया, भोलानाथ तिवारी के ही इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। इन विद्वानों के द्वारा प्रतिपादित परिभाषाओं को तोते की तरह रटते हैं और काम चला लेते हैं। इन परिभाषाओं से न आगे जाते हैं और न ही जाने की कोशिश करते हैं। प्रो. गोपाल शर्मा ने अपनी गहन अध्ययन दृष्टि का परिचय देते हुए अनुवाद की बहुस्तरीय एवं बहुआयामी परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। चीनी भाषाविद लोंग जिंग (Long Jixing) के हवाले से वे यह स्पष्ट करते हैं कि परिभाषाओं को केवल कालक्रमानुसार न देखकर बहुस्तरीय स्वरूप के आधार पर देखना उचित होगा। भाषावैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अनुवाद की अनेक परिभाषाएँ विस्तृत विवेचन के साथ इस पुस्तक में सम्मिलित हैं। यह अनेकविद संकल्पना इसलिए भी आवश्यक प्रतीत होती है कि वर्तमान युग की कोई भी गतिविधि अनुवाद के बिना नहीं चलती। “अनुवाद की कोई भी थ्योरी कभी पूर्ण नहीं होती और न ही पूर्णरूपेण व्यर्थ।“ (पृ.283)। गोपाल शर्मा अनुवाद को ‘पौधारोपण’ (transplantation) मानते हैं (पृ.283) और कहते हैं कि जिस तरह धरती पर पौधा जमाने के लिए काट-छाँट और कतर-ब्योंत की आवश्यकता होती है उसी तरह अनुवाद को जमाने के लिए भी करना होगा। 

उत्तर आधुनिकता, उत्तर उपनिवेशवाद तथा विखंडन के बारे में आजकल बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर संकल्पना अभी भी स्पष्ट नहीं हो सकी। देखा जाए तो संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद, फेमेनिज़्म आदि अनुवादों के माध्यम से ही सामने आए। इस संबंध में लेखक का कहना है कि “यदि सस्यूर और देरिदा को फ्रेंच से अंग्रेजी में अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत न किया जाता तो न संरचनावाद होता और न उत्तर संरचनावाद। न फ्रेंच फेमिनिज़्म से परिचय हो पाता, न जेंडर अध्ययन की नींव रखी जाती।“ (पृ.6)। ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ में पहली बार उत्तर आधुनिकता तथा उत्तर उपनिवेशवाद से अनुवाद के संबंध को रेखांकित किया गया है। आज के परिप्रेक्ष्य में हिंदी ‘बाजार-दोस्त’ और ‘कंप्यूटर-दोस्त’ भाषा (शर्मा, ऋषभदेव [2015], हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, नई दिल्ली : तक्षशिला, पृ. 183) बन चुकी है। ऐसी स्थिति में अनुवाद भी अब भाषाओं की सीमाओं से परे जाकर ‘मीडिया-अध्ययन’ और ‘मास कम्युनिकेशन’ तक पहुँच चुका है। (पृ.278)। लेखक ने यह स्मरण कराया है कि उनके बचपन में ‘रूसी से हिंदी में अनुवादित अनेक कृतियाँ नाम मात्र के मूल्य पर मिल जाया करती थीं।‘ (पृ.278)। मेरे पास आज भी रूसी से अंग्रेजी में और तेलुगु में अनूदित साहित्यिक कृतियाँ हैं जो रादुगा और प्रोग्रेस पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित हैं। उनमें से कुछ किताबों पर मात्र पाँच रुपए अंकित हैं और कुछ किताबों में तो मूल्य अंकित ही नहीं। 26 दिसंबर, 1991 से सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी साहित्य की वैसी उपलब्धता भी समाप्त हो गई है। आज अंग्रेजी का वर्चस्व है। अंग्रेजीतर भाषाओं के लेखक प्रायः यह समझते हैं कि यदि उनके साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद होता है तो उनका दर्जा भी बढ़ जाता है। जबकि प्रो. गोपाला शर्मा ने इसे एक उत्तर उपनिवेशी लक्षण माना है। 

उत्तर उपनिवेश काल में अनुवाद का महत्व बढ़ गया है। यदि उपनिवेशवादी ताकतों ने यह कहा कि ‘भारतीय भाषाओं में कुछ भी पठनीय व श्रेष्ठ नहीं है तो भारतीयों ने भी अपनी श्रेष्ठता का दावा करने के लिए अनुवाद को माध्यम बनाया।‘ (पृ.288)। अनुवाद कभी भी ‘वन वे ट्राफिक’ न होकर आदान-प्रदान होता है। (पृ.289)। भारत में 19वीं शती के प्रारंभ में जो ‘अनुवाद कार्य हुआ वह एक प्रकार से उपनिवेशी सोच का विस्तार है।‘ (पृ.290)। उल्लेखनीय है कि अनुवादकों को मार्ग सुझाने के साथ-साथ अनुवाद के क्षेत्र में निहित समस्याओं एवं सीमाओं का उल्लेख करते हुए विनय धारवाडकर ने अपने निबंध ‘ट्रांस्लेटिंग द मिलेनियम : इंडियन लिटरेचर इन ए ग्लोबल मार्केट’ में अनुवाद के लिए दस सूत्र निर्धारित किए हैं जिन पर इस पुस्तक में विचारोत्तेजक विमर्श सम्मिलित है। (पृ.297-298)। 

बाजार की ताकतों के सामने सब को झुकना ही पड़ रहा है। अनुवाद भी बाजार की ताकतों द्वारा संचालित है। प्रायः हम लोग यह पढ़ते आ रहे हैं कि अनुवादक वंचक होते हैं और अनुवाद दोयम दर्जे का कार्य। अनुवाद की लक्ष्य भाषा के अनुवादक की मातृभाषा से भिन्न होने पर यह खतरा और भी बढ़ जाता है। लेकिन प्रो. शर्मा याद दिलाते हैं कि देरिदा की दृष्टि से कोई भी अनुवाद दोयम नहीं होता। (पृ.311)। उनके अनुसार अनुवादक पाठक है और पाठक के साथ-साथ वह लेखक भी है और “यदि अनुवाद एक प्रकार का पठन कर्म है और या निर्वचन का प्रकार है तो वह दिए अर्थ का प्रतिस्थापन है।“ (पृ.312)। क्योंकि वे यह मानते हैं कि मूल अर्थ को खंडित करने के बावजूद एक नई टैक्स्ट या टैक्स्टों के नेटवर्क का निर्माण किया जा सकता है। (पृ.313)। ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ में मशीनी अनुवाद, सबटाइटलिंग, फिल्मों के संवाद की प्रकृति, डबिंग, अनुवाद और जेंडर आदि अनेकानेक विषयों पर काफी विस्तार से चर्चा निहित है। 

पाठकों के लिए गोपाल शर्मा द्वारा रेखांकित कुछ तथ्यों को सूत्र रूप में यहाँ दिया जा रहा है – 

Ø अनुवाद के माध्यम से हीनता ग्रंथ की जड़ मिट सकती है। (पृ.14)। 

Ø अनुवाद तो एक ‘पाठ’ या ‘संवाद’ होता है, उसे जीवन देना, या संजीवनी देना अनुवाद का दायित्व है। (पृ.204)। 

Ø उत्तर उपनिवेशी काल में अनुवाद का महत्व यह कहकर अभिव्यक्त किया जाता है कि उपनिवेशवाद और अनुवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इनमें अटूट संबंध है। (पृ.288)। 

Ø उपनिवेशी सिद्धांती अनुवाद को एक ऐसा माध्यम मानते हैं जिनमें उपनिवेश को अनुवाद का रूपक मानकर देखना प्रश्नांकित किया जाता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवादक मूल-कृतिकार का जरखरीद गुलाम नहीं वह भी एक सर्जक है। वह ऐसा सर्जक है जो मूलकृति को अन्य भाषा में ढालकर एक नई आकृति देता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवाद किसी कृति के साथ किया जाने वाला आत्मीय संवाद या संलाप है, प्रतिक्रिया है जिसमें अनुवादक स्वयंभू, स्वतंत्र, निर्भीक एवं सहृदय पाठक होता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवाद पर प्रतिबंध की कोई चेष्टा अलाभप्रद होगी। बेहतर होगा की कोई मध्यम मार्ग हो, समस्त परिक्षेत्र का आकलन व मूल्यांकन हो और जिसे भाभा ‘in-between space’ कहते हैं तथा जिसमें अनुवाद के साथ संस्कृति का जुड़ाव भी होता है वह रहे। (पृ.289)। 

Ø हर कृति का अनुवाद मूलकृति को परिष्कृत, परिमार्जित व परिवर्धित ही नहीं करता, वह नए अर्थ का निर्धारण भी करता है। (पृ.291)। 

Ø सांस्कृतिक और भाषाई विभाजन अनुवाद के मार्ग में बाधा है। (पृ.294)। 

Ø कंप्यूटर के पास स्मृति तो होती है, किंतु मानवीय मस्तिष्क की विचार प्रक्रिया को वह नहीं पा सकता। अतः अनुवाद में निहित सर्जनात्मकता अपना पुनःसर्जन की प्रक्रिया में कोई मशीन मानवीय मस्तिष्क का स्थान नहीं ले सकती। केवल सीधी-सादी सूचनाओं अथवा आँकड़ों का भाषांतरण तो यह असीम क्षमता से कर सकती है। (पृ.391)। 

Ø एक गंभीर (मूल) स्रोत टैक्स्ट सदैव पवित्र नहीं होती, और जब कोई टैक्स्ट किन्हीं पाठकों के लिए लिखी जाती है तो उन पाठकों को उससे भटकना नहीं चाहिए। (पृ.414)। 

अंत में इस ग्रंथ की उपादेयता के संदर्भ में यह तथ्य एक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसमें विद्वान लेखक ने देश विदेश के जिन अनेक अनुवादशास्त्रियों के सिद्धांतों और मत-मतांतरों पर विमर्श प्रस्तुत किया है उनमें रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, भोलानाथ तिवारी, सतीश कुमार रोहरा, कैलाश चंद्र भाटिया, एन.ई. विश्वनाथ अय्यर, सत्यव्रत, गार्गी गुप्त, श्रीपाद रघुनाथ जोशी, दिलीप सिंह, नगेंद्र, अज्ञेय, कृष्ण कुमार गोस्वामी, कैटफोर्ड, नाइडा, पीटर न्यूमार्क, एंड्रे लेफेवरे, पेट्रस डेनियलस हूटिअस, सुज़ेन बेसनेट, एल्स वियरा, गेंटजलेर, वॉल्टर बेंजामिन, देरिडा, शैरी साइमन, एमिली एप्टर, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक्, होमी भाभा जैसे अनेक महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। साथ ही न्यायसूत्र, मीमांसा, पाणिनि, शब्द रत्नावली, शब्द कल्पद्रुम की परंपरागत प्राचीन परिभाषाएँ भी सम्मिलित हैं। निष्कर्षतः, अनुवाद चिंतन या अनुवाद अध्ययन को परिपूर्णता प्रदान करने की दृष्टि से यह विमर्श अत्यंत श्लाघनीय है।