मंगलवार, 30 अक्तूबर 2018

चाणक्य वार्ता सम्मान - 2018

'चाणक्य वार्ता' का तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश विशेषांक का लोकार्पण 
28 अक्टूबर, 2018 को हैदराबाद गच्चिबावली में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एंड हॉस्पिटालिटी मैनेजमेंट में अपराह्न 3.30 बजे आयोजित 'चाणक्य वार्ता' के 'तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश विशेषांक' का विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का निमंत्रण देते हुए पत्रिका के संपादक डॉ.अमित जैन ने फोन किया था तो मैंने उनसे कहा कि मैं कार्यक्रम में जरूर आऊँगी क्योंकि नई दिल्ली से हैदराबाद आकर तेलंगाना और आंध्र से संबंधित विशेषांक का विमोचन करना हम हैदराबादवासियों के लिए गौरव की बात है। उस कार्यक्रम में उपस्थित रहना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने यह भी सूचना दी कि विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए संस्थाओं और व्यक्तियों का सम्मान भी किया जाएगा। बातों-बातों में उन्होंने मुझसे कहा कि तेलुगु साहित्य लेखन और हिंदी अध्यापन के लिए 'आचार्य चाणक्य सम्मान - 2018' के लिए चार-पाँच व्यक्तियों ने मेरा नाम नामित किया है और इस सम्मान के लिए मेरा नाम चयनित किया गया है तो मैं निःशब्द हो गई।

डॉ. अमित जैन,
संपादक 'चाणक्य वार्ता' 
कार्यक्रम भव्य था। जब मैं समारोह स्थल पर पहुँची तो एक क्षण के लिए मुझे लगा कि कहीं मैं गलत स्थान पर तो नहीं पहुँच गई। लेकिन जब अंदर पहुँचकर बैनर देखा तो निश्चिंत हुई। इतने में डॉ. अमित जैन जी से मुलाकात हो गई। पहली बार मिले लेकिन उनकी आत्मीयता के कारण ऐसा नहीं लगा कि हम अपरिचित थे। 

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के आते ही कार्यक्रम शुरू हुआ। लक्ष्मीनारायण भाला की अध्यक्षता में संपन्न इस कार्यक्रम में स्वामी परिपूर्णानंद, डॉ. कृष्ण चंद्र चौराड़िया, डॉ. अमित जैन, डॉ. नरेंद्र, धनराज भांभी व अन्य उपस्थित रहें। 'चाणक्य वार्ता' के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश विशेषांक का लोकार्पण हुआ। सम्मान कार्यक्रम शुरू हुआ। विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान हेतु चार संस्थाओं को, हिंदी और तेलुगु साहित्य के विभिन्न विद्वानों को तथा मीडियाकर्मियों को लगभग 25 लोगों को सम्मानित किया गया। 

दक्षिण में हिंदी प्रचार-प्रसार करके घर-घर में हिंदी की मशाल जलाकर असंख्य विद्यार्थियों को हिंदी सीखने का अवसर प्रदान करने हेतु दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद को 'आचार्य चाणक्य सम्मान - 2018' से सम्मानित किया गया। सभा के प्रतिनिधि के रूप में सचिव सी. एस. होसगौडर ने यह सम्मान स्वीकार किया।

अश्विनी कुमार चौबे के हाथों 
'आचार्या चाणक्य सम्मान - 2018' स्वीकार करते हुए 
प्रो. ऋषभ देव शर्मा 

श्रद्धेय गुरुवर प्रो. ऋषभ देव शर्मा को हिंदी साहित्य लेखन, शोध एवं हिंदी प्रचार हेतु सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र, लघुकथाकार पवित्रा अग्रवाल, चित्रकार नरेंद्र राय और हास्य-व्यंग्य कवि वेणुगोपाल भट्टड के साथ मुझे भी सम्मानित किया गया।
अश्विनी कुमार चौबे के हाथों सम्मान स्वीकार करते हुए 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की स्वीकार्यता के लिए छोटा सा कदम

14 सितंबर पर हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ ! 

पिछले दिनों 11 वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस में संपन्न हुआ। मॉरीशस के संबंध में यह बात ध्यान रखने जैसी है कि आधुनिक मॉरीशस के निर्माण में उन भारतवंशियों का आधारभूत योगदान है जिन्हें अंग्रेज़ शासन के दौरान जबर्दस्ती या झाँसा देकर एग्रीमंट के तहत वहाँ ले जाया गया था। उन मजदूरों ने अपने परिश्रम से उस जनशून्य स्थान को इतनी रौनकों से भर दिया कि आज दुनिया भर के पर्यटक और निवेशक मॉरीशस की ओर दौड़े चले जाते हैं। वे भारतवंशी अपने साथ प्रायः ‘रामचरितमानस’ का गुटका लेकर गए थे। इसी के सहारे उन्होंने अपनी बोली-बानी और संस्कृति को बचाकर रखा। पश्चिमीकरण की दौड़ में शामिल नई पीढ़ी के संदर्भ में पुरानी पीढ़ी वहाँ अब यह भी महसूस करने लगी है कि भाषा और संस्कृति उसकी पकड़ से छूटती जा रही है। इसके लिए मॉरीशस का अपनी जड़ों की तलाश में भारत की ओर देखना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि यदि भारत ‘माता’ है तो मॉरीशस ‘पुत्र’ है। इसलिए यदि मॉरीशस में भाषा और संस्कृति की पहचान को लेकर कोई समस्या है तो भारत की ज़िम्मेदारी है कि वह हिंदी और हिंदुस्तान की इस पहचान को वहाँ से फिसलने न दे। 11वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन इसी चिंता से दो-चार रहा। 

11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में चर्चा का केंद्रीय विषय ‘संस्कृति’ रखा गया था क्योंकि भाषा में संस्कृति गुंथी हुई होती है। उद्घाटन सत्र में ही इसीलिए भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्पष्ट किया कि भाषा और बोली जहाँ बची हुई है उसे कैसे बढ़ाया जाए और जहाँ लुप्त हो रही है उसे कैसे बचाया जाए। यह प्रश्न संस्कृति के भी प्रसार और संरक्षण का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि गिरमिटिया देशों में लुप्त हो रही हिंदी को बचाने की ज़िम्मेदारी भारत की है। भारत ने यह ज़िम्मेदारी संभाली है। उन्होंने यह भी याद दिलाया है कि सम्मेलन का पहले से ही यह लक्ष्य है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाया जा सके। उन्होंने बताया है कि इसके लिए आवश्यक सारा खर्च उठाने के लिए भारत तैयार है लेकिन प्रावधान यह है कि यह खर्च समर्थक देशों को मिलकर उठाना पड़ता है। उन्होंने आशा प्रकट की कि जब योग दिवस के लिए भारत 177 देशों का समर्थन हासिल कर सकता है तो फिर संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में हिंदी के लिए वह आवश्यक 129 देशों का समर्थन भी प्राप्त कर ही लेगा। 

विदेश मंत्री ने विश्व हिंदी सम्मेलन में यह सूचना साझा की कि संयुक्त राष्ट्र संघ की वेबसाइट पर हर शुक्रवार विश्व हिंदी समाचार प्रसारित करने की शुरूआत की गई है (https://m.soundcloud.com/un-news-hindi/weekly_bulletin)। यह कार्य प्रयोग के रूप में किया जा रहा है। यदि विश्व भर में इस समाचार बुलेटिन को पर्याप्त मात्रा में श्रोता प्राप्त होंगे तो इसे साप्ताहिक के स्थान पर दैनिक भी किया जा सकता है। हिंदी दिवस के अवसर पर हम अपने पाठकों से आग्रह करेंगे कि संयुक्त राष्ट्र के हर शुक्रवार को आने वाले हिंदी समाचार बुलेटिन को स्वयं भी प्रति सप्ताह सुने और अधिक से अधिक लोगों को दुनिया भर में इसे सुनने के लिए प्रेरित करें। यह छोटा सा कदम भी संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की स्वीकार्यता को और अधिक बढ़ाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। इसी प्रकार आप संयुक्त राष्ट्र के हिंदी ट्विटर एकाउंट @UNinHindi से भी जुड़ सकते हैं।

गुरुवार, 7 जून 2018

राम संस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी

डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, प्रधान संपादक.
राम संस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (2018).
पृष्ठ 144, मूल्य : 300 रु.
सरस्वती प्रकाशन, ए-483, कमरा नं. 965, रामश्याम अपार्टमेंट, उल्हासनगर, मुंबई.
“आज जिस दुनिया में हम जी रहे हैं वह तरह-तरह के मूल्य-संकटों को झेल रही है. एक ऐसे परिवेश का व निर्माण हुआ है जिसमें मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा हुआ दिखाई देता है. मनुष्य और मनुष्य तथा मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते इतने गड़बड़ा गए हैं कि न मन में शांति है और विश्व में. शक्ति और बल तो बहुत है पर या तो बिखरा हुआ है या गलत जगह इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली शक्तियों को भी समन्वय और सामंजस्य की आवश्यकता है. इसमें संदेह नहीं कि इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए जिस प्रकार के जीवन दर्शन और वैश्विक दृष्टि की दरकार है वह भारत के पास है; उसकी युगों से जाँची-परखी राम संस्कृति के रूप में.

“राम संस्कृति अपने मौलिक रूप में विश्व मानव की संस्कृति है जो शांति, सद्भाव, साहचर्य, सहयोग, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, न्याय, आत्मसमर्पण, लोकरक्षण और सर्वजन हित जैसे मूल्यों पर टिकी है. यह संस्कृति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की व्याख्या मनुष्य की मुक्ति को केंद्र में रखकर करती है. इस संस्कृति में अपने पुरुषार्थ द्वारा मनुष्य ही ईश्वरत्व को प्राप्त करता है, अवतार की कोटि में स्थान प्राप्त करता है. हजारों वर्ष से यह संस्कृति अपने केंद्र से बाहर फैलने के गुण के कारण दुनिया के जाने कौन कौन से दूरदराज देशों में पहुँची और वहाँ के लोगों के जीवन के हिसाब से तरह-तरह के रूपों में ढल गई. इस तरह राम संस्कृति कहीं चित्रकला के रूप में तो कहीं मूर्तिकला के रूप में, कहीं गीतों के रूप में तो कहीं कथाओं के रूप में, कहीं साहित्यिक कृतियों के रूप में तो कहीं लोगों की अपनी-अपनी रामलीलाओं के रूप में संपूर्ण विश्व में व्याप्त हुई. 

साथ ही इक्कीसवीं शताब्दी की ग्लोबल परिस्थितियां जहाँ राम संस्कृति को अपनाकर एक बेहतर दुनिया के निर्माण की ओर अग्रसर हो सकती हैं, वहीं वर्तमान विश्व में व्यापक वैचारिक आदान-प्रदान के लिए (भूतकाल में इस भूमिका को बखूबी निभा चुकी संस्कृत भाषा की उत्तराधिकारी भाषा) हिंदी को विश्वभाषा के रूप में वह सम्मान दिए जाने की वेला आ गई है जिसके लिए वह सर्वाधिक उपयुक्त पात्र है.” 

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान ‘बतुकम्मा’


[1] 

22 जून 2014 को भारत के 29वें राज्य के रूप में पुनर्गठित होने वाले राज्य ‘तेलंगाना’ अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जिन प्रतीकों को जोर शोर से नए सिरे से दुनिया के सामने रखा उनमें ‘बतुकम्मा’ पर्व का स्थान सर्वोपरि है। इसी कार्य योजना के तहत ‘बतुकम्मा’ का त्योहार 2014 से विराट स्तर पर राजकीय लोकपर्व के रूप में भव्यता के साथ मनाया जाने लगा है। 2016 में यह त्योहार ‘गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकोर्ड्स’ में दर्ज हो चुका है। यह त्योहार प्रकृति की सुंदरता और तेलंगाना के लोगों की सद्भावना का प्रतीक बन गया है। 

‘बतुकम्मा’ का संबंध देवी पूजा से है। यह त्योहार भाद्रपद मास की समाप्ति के दिन अर्थात पितृविसर्जनी अमावास्या से शुरू होता है। स्मरणीय है कि आश्विन मास में देश भर में शारदीय नवरात्र हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं और महिषासुरमर्दिनी दुर्गा की पूजा की जाती है। 

भारत के विभिन्न भागों में यह त्योहार अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। इस अवसर पर उत्तर भारत में रामलीला का आयोजन होता है तो गुजरात में डांडिया या गरबा का। यह पर्व आंध्र प्रदेश में दशहरे के रूप में मनाया जाता है तो तेलंगाना में ‘बतुकम्मा’ के नाम से प्रचलित है। महालय अमावस के दिन शुरू होकर यह पर्व दुर्गाष्टमी के दिन समाप्त होता है। ‘बतुकम्मा’ का अर्थ है ‘बतुकु अम्मा’। तेलुगु में ‘बतुकु’ जीवन का पर्याय है। अतः ‘बतुकम्मा’ का अर्थ हुआ जीव माता अथवा जीवनदायिनी माता। ‘बतुकु’ का एक और अर्थ जागरण भी है। यह माना जाता है कि इस पर्व के माध्यम से जीव अपने जीवन की रक्षा हेतु देवी को पुकारते हैं – ‘हे माँ जागो, रक्षा करो’। अतः ‘बतुकम्मा’ का एक अर्थ हुआ – ‘जागो और रक्षा करो, हे माँ !’ 

नौ दिनों तक चलने वाला फूलों का यह पर्व महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। देवी माँ – बतुकम्मा – को नौ दिन विविध नैवेद्य समर्पित किए जाते हैं। प्रति दिन के नैवेद्य के नाम पर ही उस दिन का विशेष पर्व नाम रखा गया है। पहले दिन को ‘एंगिली पुव्वुला बतुकम्मा’ कहा जाता है। इस दिन तिल से बनाए मिष्ठान्न का भोग चढाया जाता है दिन को ‘एंगिली पुव्वुला बतुकम्मा’ कहा जाता है। 

दूसरे दिन को ‘अटुकुला बतुकम्मा’ कहते हैं। और इस दिन चिवड़े का भोग लगता है। तीसरे दिन फीकी दाल (मुद्दापप्पु बतुकम्मा), चौथे दिन गीले चावल (नानबिय्यम बतुकम्मा), पाँचवे दिन उबले हुए चावल के आटे से बना हुआ दोसा (अट्ला बतुकम्मा), सातवें दिन चावल के आटे से बने हुए निंबौली के आकार के मुरुकुलु/ चकली (वेपकायल बतुकम्मा), आठवें दिन घी, मक्खन, तिल और गुड का मिश्रण (वेन्नमुद्दला बतुकम्मा) तथा नौवें दिन पाँच तरह के चावल – दही चावल, पुलिहोरा (इमली चावल), नींबू चावल, नारियल चावल तथा तिल चावल (सद्दुला बतुकम्मा) का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। लेकिन छठे दिन देवी को नैवेद्य नहीं चढ़ाया जाता क्योंकि यह माना जाता है कि उस दिन देवी माँ सबसे रूठकर बैठ जाती है। इस दिन को ‘अलिगिना (नाराज) बतुकम्मा’ कहा जाता है। अंतिम दिन (‘सद्दुला बतुकम्मा’) को ‘पेद्दा बतुकम्मा’ (बड़ी बतुकम्मा/ महाबतुकम्मा) भी कहा जाता है। इसके बाद होता है ‘बोड्डम्मा’ (गौरी) पूजन जिसके लिए तालाब की मिट्टी से माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती है। मान्यता है कि ‘बतुकम्मा’ का त्योहार वर्षा ऋतु के समाप्त होने का प्रतीक है और इस पर्व के अंतिम दिन गौरी (‘बोड्डम्मा’) पूजन द्वारा शरद ऋतु का स्वागत किया जाता है। 

भारत के अन्य अनेक पर्वों की भांति ‘बतुकम्मा’ भी कृषि संस्कृति का पर्व है। वर्षा ऋतु की सकुशल समाप्ति और उस दौरान जीवन की रक्षा के लिए देवी माँ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस हेतु ‘बतुकमा’ को विशेष रूप फूलों से सजाया जाता है। इसलिए इसे फूलों का त्योहार भी माना जाता है। बरसात में हर ओर हरियाली छा जाती है। तेलंगाना में इस मौसम में हर जगह मद्धम सफेद रंग के ‘गुनुका’ (सेलोसिया) के फूल खिल उठते हैं। बतुकम्मा को सजाने के लिए मुख्या रूप से इन्हीं फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इन्हें ‘बतुकम्मा के फूल’ कहा जाता है। इन फूलों के साथ-साथ तंगेडू (अमलतास), आक, कनेर, घास के फूलों का भी प्रयोग किया जाता है। पहले तो लोग इन फूलों को अपने आसपास के पेड़-पौधों से तोड़ लाते थे लेकिन आजकल जंगली फूलों के स्थान पर गेंदे, गुलाब, गुलदाउदी, गुड़हल और सजावटी फूलों का उपयोग किया जाने लगा है जो बाजार में मिल जाते हैं। 

अब एक नजर ‘बतुकम्मा’ मनाने की विधि पर। सबसे पहले पीतल का थाल लिया जाता है। इसे ‘तांबलम’ कहते हैं। इसमें गोबर से गोल वेदी बनाई जाती है। उस पर गुनुका के फूलों को इस तरह सजाया जाता है कि डंठल भीतर की ओर हो और बाहर फूल दिखाई दें। इन डंठलों पर फिर गोबर से सतह बनाई जाती है और उस पर फिर फूल सजाए जाते हैं। इस तरह परत दर परत पिरामिड आकार में फूलों को सजाया जाता है। शिखर पर कुम्हडे का फूल रखकर उस पर दीपक जलाया जाता है। फूल खुशहाली के प्रतीक हैं और दीपक प्रकाश का। इस संरचना को ही ‘बतुकम्मा’ कहा जाता है। आजकल गोबर के स्थान पर बेंत से पिरामिड आकार बनाया जाने लगा है और उसे रंगबिरंगे फूलों से सजाया जाता है। 

अष्टमी के दिन बतुकम्मा को लेकर स्त्रियाँ नदी किनारे पहुँचती हैं और बतुकम्मा के चारों ओर गोलाकार बनाकर गीत गाते हुए नाचती हैं – 
बतुकम्मा बतुकम्मा उय्यालो 
बंगारु बतुकम्मा उय्यालो 
पूवंटि इंतुलम उय्यालो 
मेमु एंतेंतो एदगालि उय्यालो 
बंतीपूलनिस्ता उय्यालो 
बंगारु मनसिव्वु उय्यालो.....। 
(बतुकम्मा बतुकम्मा झूला झूलो/ सवर्णमयी बतुकम्मा झूला झूलो/ सुमन सुकुमारी झूलो/ हम ऊँची पेंग बढ़ाएँ, झूलो/ गेंदे का हार चढाऊँगी, झूलो/ सोने का दिल दो, झूलो)। 

यह त्योहार मूलतः स्त्रियों का त्योहार है और इसके माध्यम से उनका बहनापा भी प्रकट होता है। गीत-संगीत और नृत्य के बाद ‘बतुकम्मा’ को नदी या तालाब में विसर्जित करते हैं और प्रसाद के रूप में ‘मलीदा’ (बाजरे और ज्वार की मिस्सी रोटी और गुड़) बाँटते हैं। 

‘बतुकम्मा’ त्योहार से संबंधित अनेक लोक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, चोल वंश के राजा धर्मांग और उनकी पत्नी सत्यवती की सौ शूरवीर संतानें युद्ध में एक साथ वीरगति को प्राप्त हो गईं तो राजा और रानी राजपाट त्यागकर वन में तपस्या करने चले गए। उन्होंने संतान की कामना से देवि माँ की आराधना की। देवि की कृपा से उनके एक बेटी हुई लेकिन जन्म से ही उसे तरह-तरह के खतरों का सामना करना पड़ा। तब उस बालिका का नाम ‘बतुकम्मा’ रखा गया क्योंकि वह संकटों के बावजूद उत्तरजीवन (सर्वाइवल) का प्रतीक बन गई थी। त्योहार के अवसर पर गए जाने वाले गीतों में इस कथा का भी उल्लेख किया जाता है। 

बतक्म्मा बतकम्मा उय्यालो, 
बंगारू बतकम्मा उय्यालो 
आनाटी कलाना उय्यालो, 
धर्मांगुडनु राजु उय्यालो 
आ राजु भार्यायु उय्यालो 
अति सत्यवती अंदुरु उय्यालो 
..... 
कलिकी लक्ष्मीनि गूर्ची उय्यालो 
गनता पोंदिरिंका उय्यालो 
.... 
सत्यवती गर्भमुना उय्यालो 
जनियिंचे श्रीलक्ष्मी उय्यालो। 
इस गीत में प्रिय कन्या बतुकम्मा को पालने या झूले में झुलाते हुए राजा धर्मांग और रानी सत्यवती के उल्लेख के साथ उन पर माँ लक्ष्मी की कृपा और वरद कन्या बतुकम्मा के जन्म की चर्चा की गई है।  

यही कारण है कि तेलंगाना क्षेत्र में आज भी यदि किसी घर में जन्म लेते ही बच्ची मर जाती है तो ऐसे माँ-बाप देवी माँ के दरबार में जाकर मन्नत माँगते हैं कि यदि बेटी जन्म लेगी तो उसका नाम ‘बतुकम्मा’ रखेंगे। 

एक और लोककथा भी प्रचलित है। बलात्कार से त्रस्त एक अबोध बालिका नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेती है। गाँव वाले उस बालिका को ‘बतुकम्मा’ (जीवित हो जाओ, माँ) कह कर आशीर्वाद देते हैं। लोग आज भी यह मानते हैं कि ‘बतुकम्मा’ किसी भी अबोध बालिका के साथ ऐसा कुकृत्य नहीं होने देगी। 

एक और मिथकीय कथा इस त्योहार से जुड़ी हुई है। वह यह कि दक्ष के यज्ञ में सती बिना बुलाए चली जाती हैं यह सोचकर कि गुरु और पिता के घर बिना बुलाए जाया जा सकता है। परंतु वहाँ दक्ष शिव की निंदा करते हैं तो सती इस अपमान को सह नहीं पाती और प्राण त्याग देती है। इसी की स्मृति में सती देवी के पुनः जीवित होने की कामना करते हुए फूल और हल्दी से गौरी माता की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है। 

बतुकम्मा से संबंधित एक ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है। वेमुलवाडा के राजा चालुक्य ने चोल राजा और राष्ट्रकूट राजा के बीच हुए युद्ध में राष्ट्रकूट राजा का साथ दिया था और 973 ई. में थैलापुदु द्वितीय ने राष्ट्रकूट के राजा कर्कुदु द्वितीय को हराकर दूसरा चालुक्य साम्राज्य स्थापित किया था जो आज का तेलंगाना है। वेमुलवाडा के साम्राज्य में राजराजेश्वर (भगवान शिव) का प्रसिद्ध मंदिर था। चोल राजा परांतक सुंदर राजराजेश्वर के परम भक्त थे। उन्होंने अपने बेटा का नाम भी राजराजा रखा था। राजराजा चोल (शासन काल 985 ई. - 1014 ई.) के बेटे राजेंद्र चोल ने राजराजेश्वर मंदिर तुड़वा कर वहाँ का शिवलिंग अपने पिटा को भेंट किया था। 1006 ई. में राजराजा चोल ने उस शिवलिंग के लिए मंदिर का निर्माण शुरू कराया। 1010 में बृहदीश्वर नाम से मंदिर की स्थापना हुई और वेमुलवाडा के शिवलिंग को तंजावूर बृहदीश्वर मंदिर में स्थापित कर दिया गया। इससे तेलंगाना के लोग काफी दुखी हुए। कहा जाता है कि तेलंगाना छोड़कर बृहदम्मा (पार्वती) दुखी थी अतः उस दुख को कम करने के लिए बतुकम्मा उत्सव की शुरूआत हुई। लोगों ने फूलों से बड़े पर्वत की आकृति बनाकर शिखर पर हल्दी से गौरम्मा बनाकर पूजा की और गीत-संगीत के साथ त्योहार मनाया । इस प्रकार यह पर्व एक हजार वर्ष से भी अधिक समय से प्रचलित है। 

तनिक गौर करें तो पाता चलता है कि ‘बतुकम्मा’ का त्योहार धरती, पानी और मनुष्य के आपसी संबंध का त्योहार है। बतुकम्मा के लिए प्रयुक्त फूलों में औषधीय गुण होते हैं जो पानी को स्वच्छ रखने में सहायक होते हैं। जहाँ ‘बतुकम्मा’ फूलों से सजाया जाता है वहीं ‘बोड्डम्मा’ को तालाब की मिट्टी से बनाया जाता है। माँ दुर्गा की मूर्ति को तालाब की मिट्टी से बनाकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा तालाब में इस कामना के साथ विसर्जित करते हैं कि वह हमेशा पानी से लबालब रहे। 

[2] 

तेलंगाना के साहित्यकार अपनी रचनाओं में इस पर्व का उल्लेख करना नहीं भूलते। हैदराबाद मुक्ति संग्राम पर आधारित किशोरीलाल व्यास ‘नीलकंठ’ ने उपन्यास ‘रज़ाकार’ (2005) में पृष्ठ 22 से 30 तक इस पर्व का अत्यंत मनोरम चित्रण किया है। नीचे हम उसीके कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। 

“नए नए कपड़ों में सजी ग्रामीण बालाएँ अपने अपने हाथों में रंग-बिरंगे फूलों के थाल लिए आई थीं। थालों को बीचोबीच सजाया गया। दीप जल उठे। ‘बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो’ के लोकगीत गूँज उठे और तालियों की थाप देती महिलाएँ वृत्ताकार वक्र में एक ही ताल पर कदम देती घूमने लगीं।“ 

“बतकम्मा उत्सव दशहरे से पहले नौ दिवस तक मनाया जाता है। शाम के समय महिलाएँ फूलों को सजा कर देवी बतकम्मा के गीत गाती रास खेलती हैं, खूब गाती-हँसती हैं, फिर फूल किसी नदी या तालाब में अर्पित कर दिए जाते हैं। सभी सामूहिक रूप से प्रसाद खाती हैं और अपने घर चली जाती हैं।“ 

“आश्विन के आते आते आकाश में बादलों के समूहों को पवन ग्वाला धकेल धकेल कर पहाड़ों के पार ले जाता, और निरभ्र आकाश से रेशम जैसी गुलाबी धूप झरती... और धूप में पकते हुए सुनहरे धान के खेतों पर पसर जाती। 

अब धान के खेत कटने लगते... कटे धान के कट्टों पर बैल चलते... और धान के बीजों के कुप्पों को देख देख कर किसानों की छातियाँ भी फूल कर कुप्पा होने लगतीं। 

ऐसे में शाम के समय तेलंगाना की बालाएँ जंगल से लाल, पीले, सफ़ेद फूल चुन लातीं... फूलों को एक लंबे मुकुट की आकृति में थालियों में सजाया जाता... छोटे छोटे पीतल के कटोरों या टिफ़िनों में पुटनालु, अटुकुलु, गुड़ जैसी खाने की सामग्री रख कर तालाब, नदी या नहर के किनारे थोड़ी सी सपाट जगह देख कर फूलों की थालियाँ बीच में सजा दी जातीं और फिर ग्राम बालाएँ, युवतियाँ और प्रौढ़ाएँ वर्तुलाकार में तालबद्ध, लयबद्ध तालियाँ बजाती उन फूलों की परिक्रमा करती सामूहिक स्वर में गाने लगतीं : ‘बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो/ बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो।‘ तो सारा परिसर उनके मधुर कलकंठ से गूँजने लगता। रंग-बिरंगे परिधान पहने कृष्णकाय, कृषकाय कृषक बालाएँ वृत्ताकार घूमने लगतीं तो रासलीला में घूमती रंग-बिरंगी गोपियों का रूप साकार हो उठता। लगता, तालियों का समूह फूलों के चारों ओर एक ताल, एक लय में घूम रहा है, फिर क्रमशः गीत बदलते... बोल बदलते... लय और ताल बदलते... तालियों की थाप बदलती... और इन सब के साथ कदमों की छाप बदलती। देवी बतकम्मा के गीतों और नृत्यभरी इस आराधना के बाद फूल नदी में बहा दिए जाते... बीच में प्रज्वलित दीपक रख दिए जाते... तब तक आकाश में अंधेरा घिर आता... तारे झाँकने लगते... लहरों पर तैरते फूलों के बीच टिमटिमाते दीप दूर दूर होने लगते। मानवीय आस्था के ये दीप, उत्साह और उत्सव के ये दीप, जिजीविषा के ये दीप सारे दुख-दरदों के बावजूद न जाने कितनी शताब्दियों से इसी तरह से नदी की लहरों पर छोड़े जाते रहे हैं और नदी भी निर्विकार भाव से न जाने कितनी शताब्दियों से मानवीय आस्था की इन किरणों को अपनी पयस्विनी छाती पर ढोती, उन्हें सम्मान देती आ रही है। फिर हँसती, खिलखिलाती कृषक बालाएँ प्रसादरूपी कलेवा करतीं... नदी का जल पीतीं और गाती हुई उल्लास भरे मन से अपने अपने घर लौटतीं। न जाने कितनी सदियों से बतकम्मा के ये उत्सव चले आ रहे थे। ‘बतकम्मा’ अर्थात ‘जीवन की देवी’। ऐसी देवी जो ‘मृत्योर्मा अमृतांगमयः’ का ग्राम्य रूप हो; जो मृत्यु नहीं, जीवन दान दे; जो मनुष्य की कामनाओं को, आकांक्षाओं को, इच्छाओं को, जिजीविषा का पयःपान कराए।“

  • 'प्रणाम पर्यटन'(वर्ष 2,अंक 1 अक्तूबर-दिसंबर 2017 में प्रकाशित)