रविवार, 16 जून 2019

स्वीकृति वक्तव्य : डॉ. सी. नारायण रेड्डी साहित्य पुरस्कार-2019


समारोह की अध्यक्ष आदरणीया प्रो. शुभदा वांजपे जी, मुख्य अतिथि श्रद्धेय डॉ. नंदिनी सिद्दा रेड्डी जी, राइटर्स एंड जर्नलिस्ट्स असोसिएशन ऑफ इंडिया, तेलंगाना इकाई के महासचिव श्री देवाप्रसाद मयला जी, कादंबिनी क्लब, हैदराबाद एवं आथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, हैदराबाद चैप्टर की संयोजक परम आदरणीया डॉ. अहिल्या मिश्र जी, मंचासीन विद्वज्जन, सभागार में उपस्थित साहित्य प्रेमियो.... 

यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है कि ‘डॉ. सी. नारायण रेड्डी साहित्य पुरस्कार-2019’ के लिए मुझे चुना गया है। इस हेतु मैं पुरस्कार समिति के सदस्यों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करती हूँ। मैं इस पुरस्कार को विनम्रतापूर्वक शिरोधार्य करती हूँ। मेरे लिए यह सम्मान समस्त तेलुगु एवं हिंदी साहित्यिक जगत के स्नेह और आशीर्वाद का प्रतीक है। 

यह क्षण मेरे लिए अविस्मरणीय क्षण है। मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि कभी मुझे डॉ. सी. नारायण रेड्डी के नाम से प्रवर्तित पुरस्कार प्राप्त होगा। 

मैं इस अवसर पर नारायण रेड्डी जी से जुड़ी हुई कुछ स्मृतियों को आपसे साझा करना चाहती हूँ। लगभग 40 वर्ष की दोस्ती थी मेरे पिताजी श्री गुर्रमकोंडा श्रीकांत और डॉ. सी. नारायण रेड्डी जी की। दोनों ने मिलकर साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन भी किया था। दोनों ही साहित्यकार होने के कारण घंटों चर्चा-परिचर्चा में बिताते थे। समय का पता ही नहीं चलता था उन्हें। साहित्य से लेकर राजनीति तक तमाम बातें होती थीं। 1992 में मुझे पहली बार नारायण रेड्डी जी के दर्शन का सौभाग्य मिला - रवींद्र भारती के सांस्कृतिक विभाग में। पिताजी और नारायण रेड्डी जी चर्चा कर रहे थे और मैं बस उनकी बातें सुन रही थी। अचानक अपनी बात रोककर नारायण रेड्डी जी ने मुझसे तेलुगु में प्रश्न किया तो मैंने अंग्रेजी में उत्तर दिया। तो एकदम गुस्से में आ गए और पिताजी को डाँटने लगे। तब पिताजी ने कहा कि ‘तमिलनाडु में पली-बढ़ी होने से यह तमिल जानती है। तेलुगु भी समझ तो सकती है लेकिन उसमें बात नहीं कर सकती। अंग्रेजी और हिंदी में जवाब देती है।’ तब नारायण रेड्डी जी ने मुझ से हिंदी में बात की और कहा ‘यह अच्छी बात नहीं है बेटा। देखो! आपके कारण पिताजी को आज मेरे सामने शर्मिंदा होना पड़ा। कल किसी और के सामने होना पड़ेगा। इसलिए मातृभाषा सीखो। माँ को सम्मान दो।’ उसके बाद मैंने अपने आप से वादा कर लिया था कि मेरे कारण पिताजी को कभी शर्मिंदा न होना पड़े। 

उस दिन नारायण रेड्डी जी ने अपनी प्रसिद्ध काव्य पंक्तियाँ सुनाई – ‘नड़का ना तल्लि/ परुगु ना तंड्री/ समता ना भाषा/ कविता ना श्वासा।’ (गति मेरी माँ है/ प्रयाण मेरा पिता/ समता मेरी भाषा है/ कविता मेरी साँस)। नारायण रेड्डी जी की बातों से मैं बेहद प्रेरित हुई। उसके बाद तेलुगु बोलना ही नहीं, लिखना-पढ़ना भी सीख गई। आज मैं तेलुगु साहित्य को यथाशक्ति हिंदी पाठकों के समक्ष लाने का कार्य कर रही हूँ – सेतुबंध में गिलहरी बनकर। तेलुगु साहित्य पर केंद्रित मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दोनों ही कृतियाँ सरकारी अनुदान से प्रकाशित हुई हैं। पहली पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ परिलेख हिंदी साधक सम्मान से पुरस्कृत है तो दूसरी पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ केंद्रीय हिंदी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के ‘हिंदीतर भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार’ से पुरस्कृत है। वर्तमान मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी की एक पुस्तक का हिंदी से तेलुगु में और तेलुगु साहित्यकार कालोजी की कुछ कविताओं का हिंदी में अनुवाद करने का भी सुअवसर मुझे मिला है। मुझे सदा तेलुगु साहित्य पर हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले अपने गुरुवर श्रद्धेय प्रो.ऋषभदेव शर्मा जी के प्रति मैं आजीवन ऋणी रहूँगी। 

तीन चार विभिन्न अवसरों पर नारायण रेड्डी जी से मुलाक़ात हुई। उनके साथ मंच साझा करने का अप्रतिम अवसर भी प्राप्त हुआ। 2009 में जब पिताजी को श्रीश्री सम्मान प्राप्त हुआ तो मैं उनके साथ कार्यक्रम में गई। मुख्य अतिथि थे डॉ. सी. नारायण रेड्डी जी। पिताजी ने मेरी ओर इशारा करते हुए उनसे पूछा ‘इसे पहचाना?’ तो रेड्डी जी ने कहा – ‘हाँ, मैंने कुछ कार्यक्रमों में तेलुगु पुस्तकों की समीक्षा करते हुए इनको सुना है। अच्छी समीक्षक है। लग रहा है कि दोनों भाषाओं पर अधिकार पाने की कोशिश कर रही है।’ तब पिताजी ने हँसते हुए कहा – ‘यह तो मेरी वही बेटी है जिसके कारण आपने मुझे डाँटा था।’ बेहद खुश होकर मेरी पीठ थपथपाते हुए उन्होंने कहा – ‘अच्छा; तेलुगु सीख गई! पिता का नाम रोशन करेगी।’ आज मेरे पिताजी होते तो वे बहुत ही प्रसन्न होते। 

‘डॉ. सी. नारायण रेड्डी साहित्य पुरस्कार’ मिलने से मेरी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। अब मुझे पहले से ज्यादा साहित्य की सेवा करनी होगी। मैंने कभी नियमित रूप से नहीं लिखा है। कविता तो मैं तभी लिखती हूँ जब मेरे अंदर कुछ संघर्ष चलता है। गद्य की भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। लेकिन मेरी ज़िम्मेदारी अब आप लोगों ने बढ़ा दी है। 

सिनारे ने अपनी एक कविता में ज़ोर देकर कहा था - 

‘एक बादल का हस्ताक्षर उसकी बारिश की बूँदों में पाया जाता है 
एक पेड़ का हस्ताक्षर उसकी कोमल पत्तियों में पाया जाता है 
मेरे हस्ताक्षर के लिए दस्तावेजों की तलाश व्यर्थ है 
मेरे मन का हस्ताक्षर मेरी काव्य कृतियों में पाया जाता है’ 

तो मैं उन्हीं की इन पंक्तियों को साक्षी मानकर आप सबके समक्ष आज संकल्प लेती हूँ कि मैं निरंतर लिखूँगी और हिंदी तथा तेलुगु के लिए आजीवन काम करूँगी। 

मैं सभी आयोजकों, अतिथियों और पुरस्कार चयन समिति के सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ। 

अंत में सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात है कि आज ‘फादर्स डे’ है। इस दिन यह पुरस्कार ग्रहण करते हुए मैं सचमुच भावविह्वल हूँ। और यह सम्मान मैं अपने माता-पिता की स्मृति को समर्पित कर रही हूँ। 

धन्यवाद। 
- गुर्रमकोंडा नीरजा

रविवार, 2 जून 2019

प्रतिरोध में उठता मन : रमणिका गुप्ता


                                                           
"हमने तो कलियाँ माँगी ही नहीं
काँटे ही माँगे
पर वो भी नहीं मिले
यह न मिलने का अहसास
जब सालता है
तो काँटों से भी अधिक गहरा चुभ जाता है
तब
प्रतिरोध में उठ जाता है मन-
भाले की नोकों से अधिक मारक बनकर"

... कहने वाली बेबाक साहित्यकार रमणिका गुप्ता का जन्म 22 अप्रैल, 1930 को सुनाम (पंजाब) में हुआ था। उन्होंने अपने पिता से उदारता और माता से जिद्दी स्वभाव अर्जित की। अपनी आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की। 

रमणिका गुप्ता ने आजीवन आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के उत्थान हेतु कार्य किया। स्त्रियों की मुक्ति के संदर्भ में उनका कथन उल्लेखनीय है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि "जब मैं स्त्री मुक्ति का नाम भी नहीं सुनी थी, तभी से स्त्री के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रही हूँ। घर से ही मैंने नौकरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी है।" स्त्री विमर्श का दिशा निर्धारित करते हुए उन्होंने कहा है कि - "स्त्री विमर्श ने औरत में वस्तु से व्यक्ति बनने की समझ पैदा की है। स्त्री विमर्श से स्त्रियों में आटोनामी यानी स्वायत्तता की इच्छा जगी है। उनमें निर्णय लेने की शक्ति पनपी है। हालांकि इतना ही काफी नहीं है क्योंकि अब भी और बहुत कुछ करना बाकी है। भारत की 99 प्रतिशत स्त्रियाँ सुहाग-भाग पति-परमेश्वर, पारिवारिक इज्जत की अवधारणओं से ग्रस्त हैं। ये अवधारणाएँ एक ग्रंथि की सीमा तक पहुँच चुकी हैं, उनके अंतर्मन में कुंडली जमाकर बैठी हुई हैं। हमें इनसे निजात पानी है तो अपने को इनसे मुक्त करना ही होगा।" (गुप्ता, रमणिका. स्त्री मुक्ति, संघर्ष और इतिहास, नई दिल्ली : सामयिक प्रकाशन. पृ.66) 

रमणिका गुप्ता की कृतियों में (कविता संग्रह) भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूँ, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदम से आदमी तक, विज्ञापन बनते कवि, कैसे करोगे बँटवारा इतिहास का, निज घरे परदेसी, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल : एक कविता यात्रा, आम आदमी के लिए, खूँटे, अब और तब, गीत-अगीत; (उपन्यास) सीता, मौसी; (कहानी संग्रह) बहू जुठाई; (गद्य पुस्तकें) कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे, दलित चेतना : साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण-वाम के कठघरे और दलित साहित्य, असम नरसंहार : एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज; (आत्मकथा) हादसे, आपहुदरी उल्लेखनीय हैं। उत्कृष्ठ साहित्य के लिए वे अनेक सम्मानों एवं पुरस्कारों से अलंकृत हो चुकी हैं। 

रमणिका गुप्ता ने स्वयंसेवी कार्यकर्ता एवं साहित्यकार के रूप में हमेशा ही स्त्री, आदिवासी, दलित और मजदूरों के मुद्दों को उकेरा। उनके साहित्य को ध्यान से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने आदि से अंत तक मुक्ति की कामनी की। अनेक रूपों एवं आयामों में यह मुक्ति उनके साहित्य में निहित है। अपनी कविता ‘मैं आजाद हुई हूँ’ में वे कहती हैं कि "हाँ! डरो मत! आओ न!/ भीतर चले आओ तुम/ अब तुम पर कोई खिड़कियाँ/ बंद करने वाला नहीं है/ अब मैं अपने वश में हूँ/ किसी और के नहीं/ इसलिए रुको मत/ मैं आजाद हुई हूँ।" 

रमणिका गुप्ता जो भी लिखती हैं बेबाक लिखती हैं। वे हमेशा विवादों के कटघरे में खड़ी रही। उनका कहना है कि पुरुषों का आर्थिक दोहन होता है तो स्त्रियों का दैहिक दोहन होता है। वे कहती हैं कि "हम राजनीतिक तौर पर आजाद तो चुके हैं, पहनावे में भी पश्चिम की नकल कर रहे हैं किंतु सोच के स्तर पर विशेषकर स्त्री और सेक्स के बिंदु पर, हमारी मानसिकता मध्यवर्गीय ही है – बल्कि कहा जाए तो 16वीं सदी की मानसिकता ही हम आज भी ढो रहे हैं। हम सूडोमॉडर्न हैं – मॉडर्न नहीं।" (गुप्ता, रमणिका. 2005. हादसे. नई दिल्ली : राधाकृष्ण पेपरबैक्स) 

रमणिका गुप्ता ने एक साक्षात्कार में स्त्रियों की स्थिति के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि "देश में लाखों की संख्या में जो महिलाएँ खेतों में खटती हैं वे हमसे ज्यादा स्वतंत्र हैं। मध्य वर्ग की स्त्री को क्या चाहिए वर्जनाओं से मुक्ति, काम करने की छूट, स्वावलंबी बनने की छूट। निम्न वर्ग की स्त्रियाँ पहले से ही स्वावलंबी हैं। कई बार वो पति से ज्यादा कमाती हैं। बच्चों को पालती हैं। उनको छूट है शादी करने की, छोड़ने की और दूसरा मर्द करने की। पर उनके यहाँ दबाव दूसरी तरह के हैं। वहाँ दबंग हावी हैं। उच्च वर्ग की बात करें तो यहाँ की महिला या तो बिजनेस वीमेन है या फिर वे ड्राइंग रूम डॉटर्स हैं। वो उसी में खुश हैं। हमारी 90 फीसदी औरतें अपनी गुलामी का जश्न मनाती हैं। वो सुहाग, पति परमेश्वर जैसी बातों में रहती हैं। निम्न वर्ग में बलात्कार होता है तो जुल्म होता है और हमारे यहाँ बलात्कार होता है तो इज्जत लुटती है। इज्जत का सिंड्रोम शुचिता, कुंवारीं लड़की, इसका सिंड्रोम औरत को गुलाम बनाए रखता है। परिवार ने महिलाओं को पुरुष के नजरिये से सोचने वाला बना दिया है। कामकाजी महिला अपने पति से मार खाती है, डॉक्टर महिला मजार-मंदिर पर जाकर लड़के की माँग करती है। परिवार के टूटने से ही स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार होगा। वह स्वतंत्र बनेगी, बाहर निकलेगी, काम करेगी तब कहीं जाकर वह अपनी इज्जत करना सीखेगी। जब वह अपनी इज्जत करेगी तभी दूसरे भी उसका सम्मान करेंगे।" 

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे’ के संबंध में सीताराम येचुरी का कहना है कि ‘हादसे’ मुठभेड़ों की शृंखला है। सुकृता पॉल रमणिका गुप्ता को व्यक्ति के बजाए संस्था के रूप में रेखांकित करते हुआ कहती हैं कि यदि उन्होंने आत्मकथा (हादसे) में खुद को ‘कोयले की रानी’ और ‘पानी की रानी’ बताती हैं तो इसके पीछे का तथ्य यह है कि उन्होंने झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कोयले और पानी के लिए संघर्ष किया था। रमणिका गुप्ती की कथनी और करनी में अंतर नहीं दीखती। वे आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ हमेशा लड़ती रहीं। 

‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के माध्यम से रमणिका गुप्त ने हाशियेकृत समाजों के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। इसकी शुरूआत उन्होंने 1986 में त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हजारीबाग से की थी। बाद में इसका प्रकाशन दिल्ली से होने लगा और 2013 अक्टूबर से मासिक के रूप में परिवर्तित हुई। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की सृजनशीलता को प्लेटफार्म प्रदान करना था। स्त्री अधिकारों के संघर्षरत रमणिका गुप्ता 27 मार्च, 2019 को पंचतत्व में विलीन हुई। स्त्री, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक की मुक्ति की कामना करने वाली रमणिका गुप्ता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं।

मंगलवार, 21 मई 2019

हरित विमर्श की प्रस्तावना

प्रकृति और मनुष्य एक दूसरे से संबद्ध है। प्रकृति का अर्थ है संपूर्ण भौतिक वातावरण अथवा पर्यावरण। मनुष्य तथा प्राकृतिक पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना सृष्टि के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सामंजस्य में रहें तथा कोई भी किसी पर हावी न हो या एक-दूसरे को नष्ट न करे। पुराने जमाने में मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित थीं। अतः वह पर्यावरण के दोहन की बात सपने में भी नहीं सोच सकता था। लेकिन सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने प्रकृति का दोहन करना सीखा। सृष्टि का सबसे अधिक योग्य और बुद्धिमान सृजन होने के कारण मनुष्य ने यह भ्रम पाल लिया कि वह सारी सृष्टि का एक मात्र मालिक है और उसके अलावा सृष्टि में जो कुछ भी है सब उसके उपभोग के लिए है। इसलिए उसने पर्यावरण का अंधाधुंध उपभोग किया। इस तरह प्राकृतिक संसाधनों के व्यापक दुरुपयोग ने मनुष्य को विनाश के कगार पर लाकर छोड़ दिया है। पिछले कुछ दशकों से पर्यावरण के क्षरण और प्रदूषण ने मानव समाज के लिए खतरा पैदा किया है। मनुष्य सुख-सुविधाओं के लिए पर्यावरण को प्रदूषित करके कुछ समय के लिए यह सोच सकता है कि उसने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है लेकिन उसे याद रखना चाहिए कि जब प्रकृति बदला लेगी तो उसका सामना करना मनुष्य के लिए संभव नहीं होगा – ‘प्रकृति रही दुर्जेय/ पराजित थे हम सब अपने मद में।‘ (जयशंकर प्रसाद. कामायनी)। 

मनुष्य जब पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करता है तो वह अपना रुद्र रूप प्रदर्शित करती ही है। पौराणिक भाषा में इस स्थिति को प्रलय कहा गया है। ‘कामायनी’ के आरंभ में प्रकृति के भयानक रूप का वर्णन है जिसमें जल-प्रलय के बाद सब कुछ नष्ट हो जाता है। जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ के प्रथम सर्ग में जिस प्रलय का चित्रण किया है उसके पीछे प्राकृतिक संपदा के अबाध उपभोग और पर्यावरण के संतुलन के प्रति देव जाति का अवज्ञापूर्ण आचरण निहित है। कहना अनुचित न होगा कि इस दृष्टांत के माध्यम से प्रसाद ने अविवेकपूर्वक प्रकृति के दोहन की उपभोगवादी संस्कृति के विनाश की भविष्यवाणी की है। इसे बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य में पर्यावरण विमर्श का सार्थक उद्घोष माना जा सकता है। यही वह समय था जब भारतीय समाज आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति के संपर्क में आ रहा था और साथ ही उसके परिवार से लेकर परिवेश तक पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को देख और समझ भी रहा था। 

पुरुषप्रधान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में प्रकृति और स्त्री दोनों को एक-दूसरे के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। आदर्श स्थिति तो यह होनी चाहिए थी कि इन दोनों के साथ सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्व रखते हुए सभ्यता का विकास किया जाता। धरती और स्त्री दोनों को पूजनीय मानने के पीछे शायद यही दृष्टि रही हो। सामान्यतः धरती को स्त्री के समान और स्त्री को धरती के समान माना जाता रहा है। लेकिन अधिकार और सत्ता की अपार इच्छा पुरुषवादी व्यवस्थाओं के चरित्र को शोषण की मनोवृत्ति से संपन्न करती रही है। इस मनोवृत्ति के कारण ही पुरुष केन्द्रित समाज का विकास पर्यावरण और स्त्री के निरनटर दोहन पर टिका है। इस दोहन के पीछे पुरुष की आधिपत्य की भावना है। ‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद पुरुष के इस सत्तावादी व्यवहार के प्रति भी ध्यान आकर्षित करते हैं। मनु जब इड़ा से दुर्व्यवहार करता है तो देव-शक्तियाँ क्रोध से भर जाती हैं – ‘उधर गगन में क्षुब्ध हुई सब देव-शक्तियाँ क्रोध-भरी,/ रुद्र-नयन खुल गया अचानक – व्याकुल काँप रही नगरी,/ अतिचारी था स्वयं प्रजापति, देव अभी शिव बने रहें!/ नहीं, इसी से चढ़ी शिंजिनी अजगव पर प्रतिशोध भरी।‘ (जयशंकर प्रसाद. कामायनी, स्वप्न, पृ.69)। इसे पर्यावरण विमर्श की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा ईकोफेमिनिज़्म (स्त्रीवादी पर्यावरण विमर्श) की आहट के रूप में विश्लेषित किया जा सकता है। 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि उपभोक्तावादी संस्कृति ने एक ओर तो पर्यावरण को नष्ट किया तथा दूसरी ओर स्त्री को ‘उपभोग की वस्तु’ बना डाला। मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ रही हैं कि “अपने नफे के लिए साधारण आवश्यकता की वस्तुओं के दाम चढ़ा सके, अपने माल की खपत कराने के लिए युद्ध करा दे, गोला-बारूद और युद्ध सामग्री बनाकर दुर्बल राष्ट्रों का दमन कराए।“ (प्रेमचंद, महाजनी व्यवस्था)। ‘गोदान’ में प्रेमचंद कहते हैं कि “धन-लोभ ने मानव भावों को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लिया है। कुलीनता और शराफत, गुण और कमाल की कसौटी पैसा, और केवल पैसा है। .... यह हवा इतनी जहरीली हो गई है कि इसमें जीवित रहना कठिन होता जा रहा है।“ (प्रेमचंद, गोदान)। 

मनुष्य इतना स्वार्थी बन चुका है कि उपजाऊ जमीन को भी नष्ट करके उसके स्थान पर कारख़ाने ही कारखाने खड़े कर दिए हैं जिससे पर्यावरणीय संतुलन ध्वस्त हो गया है। प्रेमचंद इस ओर ‘रंगभूमि’ (1925) में पहले ही संकेत कर गए हैं। सूरदास कहता है कि “जमीन जाएगी तो इसके साथ ही मेरी जान भी जाएगी।“ जब जॉन सेवक जमीन के लिए मुँह माँगा दाम देने के लिए सूरदास से सौदा करने लगता है तो सूरदास कहता है “इस जमीन से मुहल्लेवालों का बड़ा उपकार होता है। कहीं एक अंगुल भर चरी नहीं है। आस-पास के सब ढोर यहीं चरने आते हैं। बेच दूँगा तो ढोरों के लिए कोई ठिकाना न होगा।“ उसे किसी भी स्थिति में यह स्वीकार नहीं है कि, “कारखाने के लिए बेचारी गउएँ मारी-मारी फिरें!” (प्रेमचंद, रंगभूमि)। लेकिन बीसवीं शताब्दी का पूरा इतिहास गवाह है कि दुनिया भर में सूरदास की यह आवाज दबा दी गई और औद्योगीकरण ने विजय प्राप्त की। 

औद्योगीकरण के साथ ही शहरीकरण की होड़ लगी। अब तो स्मार्ट शहरों की बात की जा रही है। लेकिन इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि हरियाली की कीमत पर पत्थर के जंगल खड़े होने से दुनिया भर को ग्लोबल वार्मिंग का खतरा झेलना पड़ रहा है। ओज़ोन की पर्त में छेद होते जा रहे हैं। नदियों की तुलना में समुद्र ऊँचा होता जा रहा है। ये सब उस प्रलय की ओर ही इशारा करने वाली घटनाएँ हैं जिसके मूल में पर्यावरण का अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण निहित है। पर्यावरण के संरक्षण के प्रति उदासीन मनुष्य जाती अपने आपको एक ऐसी सड़ांध से घेरती जा रही है जो फेफड़ों में जाकर मनुष्य के अस्तित्व की जड़ों को खोखला करने वाली है। दरअसल, पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले स्रोतों को पहचानने और वहीं उसका निराकरण करने की आवश्यकता कल भी थी और आज भी है। प्रेमचंद ने अपने उपन्यास ‘कमभूमि’ (1932) में प्रतीकात्मक शैली में इस ओर इशारा किया है - “गली में बड़ी दुर्गंध थी। गंदे पानी के नाले दोनों तरह बह रहे थे। घर प्रायः सभी कच्चे थे। गरीबों का मुहल्ला था। शहरों के बाज़ारों और गलियों में कितना अंतर है! एक फूल है – सुंदर, स्वच्छ, सुगंधमय; दूसरी जड़ है – कीचड़ और दुर्गंध से भरी टेढ़ी-मेढ़ी; लेकिन क्या फूल को मालूम है कि उसकी हस्ती जड़ से है?” (प्रेमचंद. कर्मभूमि)। यहाँ यह संकेत निहित है कि ग्रामीण परिवेश और पर्यावरण यदि स्वस्थ नहीं रहेगा तो शहरी परिवेश भी एक न एक दिन प्रदूषित हो ही जाएगा। अतः शहर केंद्रित आधुनिक सभ्यता को अपनी जड़ें पहचान कर गाँवों को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने की चिंता करनी ही चाहिए। हम कह सकते हैं कि यह पर्यावरण विमर्श का ग्राम केंद्रित मॉडल हो सकता है। 

प्रकृति के दोहन से उतपन्न समस्याओं के कारण एक नया अध्ययन क्षेत्र उपस्थित हुआ जिसे ईकोक्रिटिसिज़्म कहा जाता है। हिंदी में इसके लिए पारिस्थितिकी और पर्यावरण विमर्श जैसे शब्द प्रचलन में हैं। ये दोनों ही अनूदित नामकरण क्रमशः अपारदर्शी और अपर्याप्त प्रतीत हो गए हैं। इनकी तुलना में प्रो. गोपाल शर्मा द्वारा अपने एक निबंध ‘ईकोक्रिटिसिज़्म : हरित विमर्श की अवधारणा’ में ईकोक्रिटिसिज़्म के लिए प्रस्तावित ‘हरित विमर्श’ अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी और सटीक है। जिसका केंद्रीय लक्ष्य है - संस्कृति और प्रकृति के बीच संबंधों पर पुनर्विचार। यह लक्ष्य ‘हरित विमर्श’ द्वारा बेहतर ढंग से संप्रेषित हो सकता है। 

दरअसल, सांस्कृतिक परिदृश्य का अनिवार्य संबंध भौतिक परिदृश्य अर्थात भूगोल से होता है। इसमें भी संदेह नहीं कि प्रकृति को काटछांट कर ही मनुष्य ने तथाकथित संस्कृति का निर्माण किया है। जब तक मनुष्य प्रकृति के साथ घनिष्ठ आत्मीय संबंध का निर्वाह करता है तब तक पर्यावरण के लिए कोई खतरा नहीं होता। दुर्भाग्य यह है कि अपनी सुख सुविधाओं को बढ़ाने के लिए मनुष्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ प्रकृति से अलग होता गया। परिणामस्वरूप प्राकृतिक पर्यावरण धीरे-धीरे कृत्रिम वातावरण में बदलता गया। इसका अर्थ है कि पर्यावरण संकट इस कारण नहीं है कि ईकोसिस्टम कैसे कार्य करता है बल्कि इसके लिए हमारी नैतिक प्रणाली की खामियाँ जिम्मेदार हैं। 

आज हम प्रदूषित वातावरण में जी रहे हैं। प्राणवायु के स्थान पर मौत की हवा अपनी साँसों में भर रहे हैं। पल-पल हवाएँ खराब होती जा रही हैं। प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को ऐसी स्थिति में पर्यावरण दोहन का विरोध करने लिए उठा खड़ा होना होगा। 

तेलुगु साहित्य 2016 : एक सर्वेक्षण

2016 में तेलुगु साहित्य की विभिन्न विधाओं में प्रभूत लेखन सामने आया। पाठकीय रुझान की दृष्टि से कथा साहित्य केंद्रीय विधा बना हुआ है। संस्मरण और आत्मकथा भी तेलुगु के लेखकों और पाठकों की प्रिय विधाएँ हैं। इस वर्ष भी इन विधाओं में रोचक कृतियाँ सामने आईं। समीक्षा और फिल्म विषयक लेखन के साथ ही मीडिया के प्रभाव विषयक पुस्तकें भी पर्याप्त चर्चित रहीं। 

यह निर्विवाद सत्य है कि संपूर्ण भारतवर्ष में लोककथा की अत्यंत समृद्ध परंपरा रही है। लोककथाएँ लोक के कंठ से फूटती हैं और उनमें संवेदनाओं के साथ-साथ सृजनात्मकता का सम्मिश्रण होता है। इन्हीं लोककथाओं से प्रेरित होकर मनुष्य कहानियों को अक्षरबद्ध करने लगा ताकि यह संपदा पीढ़ी दर पीढ़ी अक्षुण्ण रहे। ‘टी तोटला आदिवासुलु चेप्पिना कथलु’ (चाय बागान के आदिवासियों की कथाएँ)[1] शीर्षक कहानी संग्रह में संकलित 16 कहानियाँ दार्जिलिंग के चाय बागान में कार्यरत आदिवासियों द्वारा कही गई लोककथाएँ हैं। सामान्या ने इन लोककथाओं को अक्षरबद्ध किया है ताकि यह विरासत लुप्त न हो जाए। इन कहानियों के माध्यम से आदिवासी जीवनशैली, रीति-रिवाज, संस्कार आदि के संबंध में जानकारी उपलब्ध होती है। आज उत्तर आधुनिक संदर्भ में आदिवासियों को केंद्र में रखकर कहानियाँ एवं उपन्यास लिखे जा रहे हैं, शोधकार्य कार्य हो रहे हैं और आलोचनात्मक ग्रंथ पाठकों के सामने आ रहे हैं। इस दृष्टि से बालगोपाल कृत ‘आदिवासुलु : वैद्यम, संस्कृति, अनचिवेता’ (आदिवासी : चिकित्सा, संस्कृति और दमन)[2], ‘आदिवासुलु : चट्टालु, अभिवृद्धि’ (आदिवासी : न्याय और अभिवृद्धि)[3] उल्लेखनीय हैं। 

आज के साहित्यकार अपने चारों ओर निहित परिवेश से कथासूत्र ग्रहण करते हैं और थोड़ा बहुत कल्पना के योग से कहानी बुनते हैं। कोम्मिशेट्टि मोहन कृत ‘पूला परिमलम’ (फूलों की सुगंध)[4] शीर्षक कहानी संग्रह में कुल 12 कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों में मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ-साथ निम्नवर्ग के लोगों की समस्याओं का चित्रण भी है। इन कहानियों को पढ़ते समय पाठक को ऐसा लगता है कि वह इन पात्रों से भलीभाँति परिचित है। इस संग्रह में संकलित कहानी ‘वाग्दानम’ (वादा) में कहानीकार ने यह दर्शाया है कि शराब के शिकंजे में फँसे हुए व्यक्ति के परिवार को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। पार्वतम्मा का पति शिवय्या शराबी है। इस आदत से छुटकारा दिलाने के लिए वह प्रयत्न करती है। पति के व्यसन से त्रस्त पार्वतम्मा पति को कोसती रहती है, गुस्से में आकर पीटती भी है। लेकिन शराबी पति शराब छोड़ने का नाम नहीं लेता, तो वह प्यार से समझाती है कि उसके स्वास्थ्य के लिए शराब हानिकारक है। पत्नी का दिल रखने के लिए वह शराब छोड़ने का नाटक करता है। इतने में सरकार घोषणा करती है कि शराब पर रोक लगाई जा रहा है। यह सुनकर शिवय्या अपने आपको रोक नहीं पाता और भगवान की मनौती हेतु रखे हुए पैसों को लेकर शराब पीने चला जाता है यह कहकर कि इसके बाद गलती से भी वह कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाएगा। शिवय्या रात को नशे में घर आता है और सुबह मृत पाया जाता है। कहानी का अंत पत्नी के विलाप से होता है - ‘उन्होंने अपना वादा पूरा किया।’ यहाँ कहानीकार ने यह दर्शाया है कि शिवय्या की खुली हुई आँखें मानो कह रही हों कि ‘मैं शराब को कभी हाथ नहीं लगाऊँगा। यह मेरा वादा है।’ 

शहरीकरण, एकल परिवार, कम आय आदि से समाज जूझ रहा है। जहाँ बूढ़े माता-पिता अपनी संतान के साथ रह सकते हैं, वहाँ तो फिर भी खैर है; परंतु जहाँ युवक गाँव छोड़कर शहर जा रहे हैं, वहाँ परिस्थिति बहुत गंभीर है। कोम्मिशेट्टि मोहन कृत ‘पूला परिमलम’ (फूलों की सुगंध) कहानी संग्रह में संकलित कहानी ‘ओ हो... अलागा!’ (अ हा... ऐसा है क्या!) इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इसमें वृद्धों की मनोदशा, उनके आयुजनित बड़प्पन, बहू के रूखा व्यवहार और बेटे की निरूपायता को बखूबी दर्शाया गया है। बेटा चाहते हुए भी माता-पिता को अपने साथ शहर में रख नहीं सकता। जब बूढ़े माता-पिता बेटे-बहू से मिलने गाँव से शहर आते हैं तो उनके प्रति बहू का व्यवहार ठीक नहीं रहता लेकिन बेटा कुछ नहीं कर सकता। जब वह दीपावली के अवसर पर माता-पिता के लिए भी नए वस्त्र लाता है तो बहू हंगामा कर देती है। तीर्थयात्रा के लिए निकले माता-पिता भगवान के पास चले जाते हैं। बरसी के दिन बहू वही नए कपड़े उनकी तस्वीर के समक्ष लाकर रखती है तो उनके बेटे के पूछने पर जवाब देती है कि नए कपड़े दादा-दादी के लिए हैं। यह सुनकर वह नन्हा बालक कहता है, ‘अच्छा! ऐसा है क्या! लेकिन दादा-दादी तो नहीं रहे, फिर कपड़े कौन पहनेंगे माँ?’ जीते जी वृद्ध माता-पिता को न तो सम्मान प्राप्त हुआ और न ही प्यार, लेकिन मरने के बाद नए कपड़े अर्पित किए जाने पर कहानीकार ने छोटे बच्चे के माध्यम से व्यंग्य कसा है। इस कहानी संग्रह में संकलित परीक्षा, स्वार्थम (स्वार्थ), वारसत्वम (विरासत), अम्मायिलु... जिंदाबाद... (लड़कियाँ.. जिंदाबाद), पूल परिमलम (फूलों की सुगंध), प्रयाणम (यात्रा) आदि कहानियों के कथासूत्र और चरित्र हमारे इर्द-गिर्द उपस्थित हैं और रोज़ ही हमारा उनसे आमना-सामना होता रहता है। 

पोतूरी विजयलक्ष्मी कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके 20 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और समसामयिक मुद्दों पर 250 से भी अधिक कहानियाँ। उनके ‘पूर्वी’[5] शीर्षक कहानी संग्रह में कुल 16 कहानियाँ सम्मिलित हैं। इस संग्रह की शीर्ष कहानी ‘पूर्वी’ एक ऐसी युवती की कहानी है जिसका जन्म पूर्वी भारत में होता है और विवाह तेलुगुभाषी युवक से। एक दुर्घटना में पति का निधन हो जाता है। बीमाराशि सास-ससुर को देने के उद्देश्य से पूर्वी उनकी खोज में आंध्र प्रदेश जाती है और अपने सास-ससुर से मिलती है। इस संग्रह में संकलित सुखांतम (सुखांत), प्रेमिकुला रोजु (प्रेमियों के दिन), श्रीदेवी अम्मगारि मामिडी तोरणम (श्रीदेवी माता के आम का तोरण) आदि कहानियों में परिवेश चित्रण की दृष्टि से तेलुगु भाषासमाज और संस्कृति की प्रामाणिक छवियाँ ध्यान खींचती हैं। 

परिमला सोमशेखर की कहानियाँ स्त्री विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। ‘परिमला सोमशेखर कथलु’ (परिमला सोमशेखर की कहानियाँ)[6] शीर्षक संग्रह में संकलित 42 कहानियाँ प्रमुख रूप से स्त्री प्रधान कहानियाँ हैं जो परंपरागत रूढ़ियों के प्रति स्त्री को विद्रोह करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन कहानियों में स्त्री सशक्तीकरण को भलीभाँति देखा जा सकता है। परिमला सोमशेखर की कहानियों के स्त्री पात्र एक ओर परंपरागत रूढ़ियों को मानने वाले हैं तो दूसरी ओर स्त्री-आचार संहिता को तोड़ने वाले भी हैं। इन कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री के प्रति पुरुष की मानसिकता, पुरुष के प्रति स्त्री की मानसिकता, स्त्री संघर्ष और आक्रोश को भी रेखांकित जा सकता है। 

प्रसन्नकुमार सर्राजु की कहानियों में हास्य और व्यंग्य का सम्मिश्रण है। ‘प्रसन्नकुमार सर्राजु कथलु-2’ (प्रसन्नकुमार सर्राजु की कहानियाँ-2)[7] शीर्षक कहानी संग्रह में कुल 12 कहानियाँ संकलित हैं। ये कहानियाँ पाठकों के चहरे पर मुस्कान लाने के साथ-साथ उन्हें सोचने पर भी बाध्य करती हैं। उदाहरण के लिए ‘डॉनल भूगर्भ शत्रुत्वम’ (माफिया की शत्रुता) शीर्षक कहानी सिनेमा जगत पर व्यंग्य कसती है। यह कहानी दर्शाती है कि किस तरह सिनेमा को अंडरवर्ल्ड माफिया संचालित कर रहा है। ‘ए टेल ऑफ इंडियन सिनेमा’ शीर्षक कहानी इस ओर संकेत करती है कि सिनेमा को उद्योग के रूप में परिवर्तित करके सरकार कैसे मुनाफा अर्जित कर रही है। 

शेख हुसैन सत्याग्नि की कहानियाँ सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं, सांप्रदायिक ताकतों एवं राजनैतिक षड्यंत्रों के खिलाफ आवाज उठाने वाली कहानियाँ हैं।[8] देवुलपल्लि कृष्णमूर्ति ने तेलुगु समाज के उपेक्षित वर्ग ‘दासरी’ की जीवनशैली को अपनी कहानी ‘यक्षगानम’ (यक्षगान) में चित्रित किया है तथा ‘मृत्युंजयुडु’ (मृत्युंजय) शीर्षक कहानी में निजाम शासन के विरोध में किए गए आंदोलन का चित्रण किया है। ऐसी अनेक सामाजिक कहानियों का समुच्चय है देवुलपल्लि कृष्णमूर्ति की पुस्तक ‘यक्षगानम’ (यक्षगान)।[9]

2 जून, 2014 को तेलंगाना राज्य का गठन हुआ। तत्पश्चात तेलंगाना के साहित्यकार तेलंगाना का इतिहास, तेलंगाना का साहित्य, संस्कृति और उससे जुड़े आंदोलनों को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। तेलुगु साहित्य के इतिहास का भी पुनर्लेखन किया जा रहा है। प्रसिद्ध पत्रकार और आलोचक प्रतापरेड्डी द्वारा समय-समय पर तेलंगाना संस्कृति और साहित्येतिहास आदि विषयों पर लिखे गए आलोचनात्मक लेखों का संकलन है ‘तेलंगाना साहित्योद्यमालु (तेलंगाना के साहित्यिक आंदोलन)।[10] वाई. यानालु ने अपनी आलोचनात्मक पुस्तक ‘तेलंगाना चरित्र, संस्कृति वारसत्वम’ (तेलंगाना : ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत)[11] में तेलंगाना से संबद्ध अनेकानेक आंदोलन एवं सांस्कृतिक विरासत को साझा किया है। 

क़ासिम ने तेलंगाना आंदोलन से संबंधित अनेक कविताएँ लिखी हैं। तेलंगाना की जनता की व्यथा-कथा को उन्होंने अभिव्यक्त किया है। के कहते हैं कि ‘साठ वर्ष के अज्ञातवास के बाद/ दूध की धारा बन प्रवाहित हो रहा है तेलंगाना।’ (मेरा तेलंगाना)। ‘क़ासिम कवित्वम’ (क़ासिम की कविता)[12] काव्य संग्रह में 96 कविताएँ सम्मिलित हैं जिनमें 3 लंबी कविताएँ भी शामिल हैं। डॉ. देवराजु महाराजु ने ‘गुडिसे गुंडे’ (झोंपड़ी का हृदय)[13] शीर्षक कविता संग्रह में तेलंगाना की क्षेत्रीय बोली का प्रयोग किया है। यह तेलंगाना की क्षेत्रीय बोली में लिखित प्रथम काव्य संग्रह है। 

चाहे कविता हो या कथासाहित्य, संस्मरण हो या जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज और यात्रावृत्त; विभिन्न विधाओं में साहित्यकार अपनी स्मृतियों एवं अनुभूतियों को अभिव्यक्त करता है। जहाँ कविता, कथा आदि में कल्पना के लिए खुला आकाश होता है, वहीं आत्मकथा आदि विधाएँ अकाल्पनिक विधाएँ हैं जो मूलतः स्मरणाधारित हैं। तेलुगु में इस कोटि की कृतियों की समृद्ध परंपरा बन चुकी है। इसी क्रम में, प्रसिद्ध तेलुगु साहित्यकार बुच्चिबाबु की धर्मपत्नी शिवराजु सुब्बलक्ष्मी की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘मा ज्ञापकालु’ (हमारी स्मृतियाँ)[14] संस्मरण के साथ-साथ आत्मकथा भी है। 12वर्ष की आयु में उनका विवाह बुच्चिबाबु से संपन्न हुआ। संतानहीन रहे लेकिन कभी चिंतित नहीं हुए। दोनों एक-दूसरे के लिए संतान बने। बुच्चिबाबु ने सुब्बलक्ष्मी को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया और सृजनात्मक लेखन के क्षेत्र में प्रोत्साहित किया। नाटककार, कवि, कथाकार, चित्रकार और आलोचक के रूप में तेलुगु पाठक बुच्चिबाबु से परिचित तो हैं ही, लेकिन सुब्बलक्ष्मी ने अपनी पुस्तक के माध्यम से उनके भीतर निहित ममता, वात्सल्य, करुणा और प्रेम के विविध पक्षों को उजागर किया है। 

विजयनागिरेड्डी मूलतः चिकित्सक थे। हर व्यक्ति को उत्तम चिकित्सा उपलब्ध कराने की दृष्टि से उन्होंने चेन्नई में ‘विजया हॉस्पिटल’ की स्थापना की। सिनेमा के प्रति रुचि के कारण उन्होंने ‘विजया संस्था’ की स्थापना की और अनेक सफल फिल्मों के निर्माता-निर्देशक बने तथा अनेक लोगों को जीविका प्रदान की। ‘विजया पब्लिकेशंस’ की स्थापना करके उन्होंने ‘चंदामामा’ के साथ-साथ अनेक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का दायित्व भी निभाया। विजयनागिरेड्डी ने जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए अनेक छोटे-मोटे व्यापार भी किए। उनके सुपुत्र विश्वनाथ रेड्डी ‘विश्वम’ ने अपने पिता के जीवन से संबद्ध छोटी-छोटी घटनाओं के साथ-साथ पिता के साथ गुजारी मधुर स्मृतियों को ‘नन्नातो नेनु (पिताजी के साथ मैं)[15] शीर्षक पुस्तक में संजोया है। इस पुस्तक के माध्यम से तमिल, तेलुगु, कन्नड और मलयालम फ़िल्मी जगत की अनेक छोटी-बड़ी हस्तियों की जानकारी भी उपलब्ध होती है। यह पुस्तक जीवनी के साथ-साथ संस्मरण भी है। 

आज की युवा पीढ़ी पुराने साहित्यकारों और उनके साहित्य से परिचित नहीं है। इस दृष्टि से पुराने साहित्य एवं साहित्यकारों पर फिर से दृष्टि केंद्रित की जा रही है। कालिपाका मधुसूदन ने अपनी आलोचनात्मक कृति ‘चंदाला केशवदासु : जीवितम-साहित्यम’ (चंदाला केशवदासु : व्यक्तित्व और कृतित्व)[16] में खम्मम जिला (तेलंगाना) के जक्कपल्लि गाँव में 1876 को जन्मे केशवदास के प्रदेय पर प्रकाश डाला है। इस पुस्तक से यह तथ्य सामने आता है कि केशवदास ने तेलुगु की प्रथम ‘टाकी फिल्म’ भक्तप्रह्लाद (1931) के लिए पदों की रचना की थी। ‘श्रीकृष्ण तुलाभारम’ (1966) फिल्म के लिए उनके द्वारा लिखे गए गीत आज भी तेलुगु पाठकों के हृदय में अंकित हैं। नाटककार, अभिनेता, गीतकार और अवधानी के रूप में भी उन्होंने ख्याति अर्जित की। 

‘बुच्चिबाबु साहित्य व्यासालु’ (बुच्चिबाबु के साहित्यिक निबंध)[17] शीर्षक निबंध संग्रह नवतेलंगाना पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित है। इसमें बुच्चिबाबु द्वारा समय-समय पर लिखे गए अंग्रेजी साहित्य से संबंधित शोधपरक आलेख संकलित हैं। इसी तरह प्रसिद्ध नाटककार और कथाकार सिंगराजु लिंगमूर्ति की रचनाएँ भी दो खंडों में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं।[18] ‘प्रजासेवालो नागिरेड्डी (जनसेवा में नागिरेड्डी)[19] शीर्षक पुस्तक में चेरुकूरि सत्यनारायण ने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक नागिरेड्डी के जीवन पर प्रकाश डाला है। ओलेटि श्रीनिवासभानु की पुस्तक ‘एल.वी.प्रसाद जीवित प्रस्थानम’ (एल.वी.प्रसाद की जीवन यात्रा)[20] में एल.वी.प्रसाद के जीवन पर प्रकाश डाला गया है। जयधीर तिरुमलराव ने अलिशेट्टि प्रभाकर की कविताओं को संगृहीत किया है।[21] डॉ. पेद्दी रामाराव ने अपनी पुस्तक ‘यवनिका’[22] में रंगमंच से संबंधित अनेक विषयों का विश्लेषण किया है। इस पुस्तक में संकलित 34 आलेखों में तेलुगु नाटक साहित्य की विकास यात्रा, नाट्यकर्मियों का संक्षिप्त परिचय, रंगमंच के विभिन्न तत्व, नाटक प्रदर्शनी आदि की सैद्धांतिक चर्चा के साथ-साथ व्यावहारिक चर्चा भी सम्मिलित है। 

समाज में व्याप्त विसंगतियों, विद्रूपताओं एवं राजनैतिक षड्यंत्रों के प्रति जनता को जागृत करने के लिए कविहृदय धड़कता रहता है। कवि के समक्ष यह भी प्रश्न खड़ा होना स्वाभाविक है कि कविता किस तरह समाज को प्रभावित कर सकती है और कितने लोग कविता पढ़ने में रुचि प्रदर्शित करते हैं? इस तरह के अनेक प्रश्नों से जूझता हुआ कविमन उनके उत्तर की तलाश करता रहता है। एन. वेणुगोपाल की पुस्तक ‘कवित्वमतो मुलाकात’ (कविता से मुलाकात)[23] में इस तरह के अनेक प्रश्नों के समाधान निहित हैं और वेणुगोपाल की मौलिक कविताओं के साथ ही माओ, पाब्लो नेरुदा, कैफ़ी आज़मी, देवीप्रसाद मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि की कविताओं का अनुवाद भी सम्मिलित है। 

जापानी काव्यविधा हाइकू को तेलुगु साहित्यकारों ने भी अपनाया है। हाइकू में 5,7,5 अक्षरों के माध्यम से बिंब निर्माण किया जाता है। तेलुगु साहित्य में इस विधा को लिखने वालों में बी.वी.वी. प्रसाद का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपने हाइकू ‘बी.वी.वी. प्रसाद हाइकूलु (बी.वी.वी. प्रसाद के हाइकू)[24] शीर्षक पुस्तक में संकलित किए हैं। वासिरेड्डी पब्लिकेशंस ने एम.एस.नायुडु की कविताओं को ‘गालि अद्दम’[25] (हवा दर्पण) शीर्षक से प्रकाशित किया है। 

कविता, कहानी, आलोचना और संस्मरण साहित्य के साथ-साथ तेलुगु साहित्य यात्रावृत्त क्षेत्र में भी समृद्ध है। ’मा केरल यात्रा’ (हमारी केरल की यात्रा)[26] शीर्षक यात्रावृत्त में मुत्तेवी रवींद्रनाथ ने केरल के भौगोलिक और प्राकृतिक परिवेश के साथ-साथ वहाँ के लोगों की जीवन शैली, खान-पान, वेश-भूषा, संस्कृति तथा केरल से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं का भी उल्लेख किया है। इसी प्रकार राजेश वेमूरि ने यूरोप की भौगोलिक एवं प्राकृतिक शोभा के साथ-साथ वहाँ के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक यथार्थ की जानकारी अपनी पुस्तक ‘ना ऐरोपा यात्रा’ (मेरी यूरोप की यात्रा)[27] में रोचक ढंग से प्रस्तुत की है। 

इस वर्ष में तेलुगु में पत्रकारिता और फिल्म जगत से भी संबंधित कई पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्तियों को हमेशा यातना का शिकार होना पड़ता है; फर्जी केस में फँसकर उम्रकैद की सजा भुगतनी पड़ती है या फाँसी पर लटकना पड़ सकता है। मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र पर लगाए इल्जाम से लेकर आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम नक्सल केस तक अनेकानेक फर्जी केसों, षड्यंत्रों, पुलिस मुठभेड़ों आदि का विवरण, दंड भुगतने वालों की जानकारी, साक्षात्कार आदि का ब्यौरा प्रमाणों के साथ ‘सूर्योदयम कुट्रकादु’ (सूर्योदय षड्यंत्र नहीं है)[28] शीर्षक ग्रंथ में संकलित किया गया है। अन्नम श्रीधर बाचि कार्टून चित्रों के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों एवं राजनैतिक दावपेंच पर व्यंग्य कसते हैं। उनके कार्टून चित्रों का संकलन है ‘बाचि कार्टूनलु’ (बाचि के कार्टून)।[29] इसके अलावा दाशरथि कृष्णामाचार्युलु (22.7.1925-5.11.1987) द्वारा लिखित तेलुगु सिनेमा के प्रसिद्ध गीत ‘दाशरथि सिनेमा पाटला पंदिरी’ (दाशरथि के फिल्मी गीत)[30] शीर्षक पुस्तक में सम्मिलित हैं। 

मौलिक रचनाओं के साथ-साथ अनूदित रचनाएँ भी प्रकाशित हुई हैं। राहुल सांकृत्यायन कृत ‘बहुरंगी मधुपुरी’ (कहानी संग्रह) का तेलुगु अनुवाद ‘मधुपुरी’[31] शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। सर ऑथर कॉनेन डॉयल कृत ‘शरलॉक होम्स’ का के. बी. गोपालम ने ‘एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स-1'[32], ‘एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स-2’[33] के रूप में तेलुगु में अनुवाद किया है। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के काव्य संग्रह ‘संघर्ष जारी है’ का तेलुगु में भागवतुल हेमलता ने ‘सागुतुन्ना समरम’[34] शीर्षक से अनुवाद किया है। इस संग्रह में राष्ट्रीय अस्मिता की कविताएँ संकलित हैं. इन कविताओं में कवि ने वर्तमान व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था, समाज, राष्ट्र और मानव कल्याण की चिंताएँ व्यक्त की हैं. 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि वर्ष 2016 तेलुगु साहित्य की दृष्टि से पर्याप्त वैविध्यपूर्ण और गंभीर कृतियों के प्रकाशन की वर्ष रहा है। यह भी देखा जा सकता है कि इधर अकाल्पनिक गद्य विधाओं के प्रति तेलुगु लेखक और प्रकाशक अपेक्षाकृत अधिक रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं। 

संदर्भ 

[1] टी तोटला आदिवासुलु चेप्पिना कथलु (चाय बागान के आदिवासियों की कथाएँ, 2016)/ सामन्या/ पृष्ठ 92/ मूल्य : रु. 120 

[2] आदिवासुलु : वैद्यम, संस्कृति, अनचिवेता (आदिवासी : चिकित्सा, संस्कृति और दमन, 2016)/ बालगोपाल/ पृष्ठ 150/ मूल्य : रु. 100/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नव तेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[3] आदिवासुलु : चट्टालु, अभिवृद्धि (आदिवासी : न्याय और अभिवृद्धि, 2016), बालगोपाल/ पृष्ठ 176/ मूल्य : रु. 130/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नव तेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[4] पूला परिमलम (फूलों की सुगंध, 2016)/ डॉ. कोम्मिशेट्टि मोहन/ मूल्य : रु.100/ पृष्ठ 88/ प्रतियों के लिए संपर्क सूत्र : सरस्वती मोहनम, 24/327-4, अमृता गार्डन्स, पावरहाउस स्ट्रीट, प्रोद्दुटूरू – 516360, कड़पा जिला (आंध्र प्रदेश), मोबाइल : 09441323170 

[5] पूर्वी (2016)/ पोतूरी विजयलक्ष्मी/ 130 पृष्ठ/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-27637729 

[6] परिमला सोमशेखर कथलु (परिमला सोमशेखर की कहानियाँ, 2016)/ परिमला सोमशेखर/ पृष्ठ 460/ मूल्य : रु. 280/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नवचेतना पब्लिशर्स, हैदराबाद 

[7] प्रसन्नकुमार सर्राजु कथलु-2 (प्रसन्नकुमार सर्राजु की कहानियाँ-2, 2016)/ मूल्य : रु. 100/ पृष्ठ 137/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : : 09849026928 

[8] सत्याग्नि कथलु (सत्याग्नि की कहानियाँ, 2016)/ शेख हुसैन सत्याग्नि/ पृष्ठ : 173/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09866040810 

[9] यक्षगानम (यक्षगान, 2016), देवुलपल्ली कृष्णमूर्ति/ पृष्ठ : 152/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-23521849 

[10] तेलंगाना साहित्योद्यमालु (तेलंगाना के साहित्यिक आंदोलन, 2016)/ कासुला प्रतापरेड्डी/ पृष्ठ 430/ मूल्य : 275/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : श्री वेंकटरमण बुक डिस्ट्रिब्यूटर्स, हैदराबाद 

[11] तेलंगाना चरित्र, संस्कृति वारसत्वम (तेलंगाना : ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत, 2016)/ वाई. यानालु/ पृष्ठ 430/ मूल्य : 399/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 07396586170 

[12] क़ासिम कवित्वम (क़ासिम की कविता, 2016)/ क़ासिम/ पृष्ठ 266/ मूल्य : रु. 140 

[13] गुडिसे गुंडे (झोंपड़ी का हृदय, 2016)/ डॉ. देवराजु महाराजु/ पृष्ठ : 66/ मूल्य : रु. 60 

[14] मा ज्ञापकालु (हमारी स्मृतियाँ, 2016)/ शिवराजु सुब्बलक्ष्मी/ मूल्य : रु.100/ पृष्ठ 142/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : विशालांध्र पब्लिशिंग हाउस 

[15] नन्नतो नेनु (पिताजी के साथ मैं)/ विश्वम/ मूल : रु. 100/ पृष्ठ 280/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : विजया पब्लिकेशंस, चेन्नई, 040-23652007 

[16] चंदाला केशवदासु : जीवितम-साहित्यम (चंदाला केशवदासु : व्यक्तित्व और कृतित्व, 2016)/ कालिपाका मधुसूदन/ पृष्ठ 48/ मूल्य : रु. 40/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नवचेतना बुक हाउस, हैदराबाद 

[17] बुच्चिबाबु साहित्य व्यासालु (बुच्चिबाबु के साहित्यिक निबंध)/ पृष्ठ 245/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियों के लिए संपर्क सूत्र : नवतेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[18] सिंगराजु लिंगराजु रचनलु (सिंगराजु लिंगराजु की रचनाएँ, 2016), भाग 1, पृष्ठ 243/ मूल्य : रु. 170/ भाग 2, पृष्ठ 270/ मूल्य : 175, प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नवचेतना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[19] प्रजासेवलो नागिरेड्डी (जनसेवा में नागिरेड्डी, 2016)/ चेरुकूरि सत्यनारायण/ पृष्ठ 500/ मूल्य : रु. 50/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09848631604 

[20] एल.वी.प्रसाद जीवित प्रस्थानम (एल.वी.प्रसाद की जीवन यात्रा, 2016)/ ओलेटि श्रीनिवासभानु/ पृष्ठ 210/ मूल्य : रु. 250/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09848506964 

[21] अलिशेट्टि प्रभाकर कविता (अलिशेट्टी प्रभाकर की कविता, 2016)/ संपादक जयधीर तिरुमलराव, निजाम वेंकटेशम और बी. नरसन/ पृष्ठ 350/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09440128169 

[22] यवनिका/ 2016/ डॉ. पेद्दी रामाराव/ पृष्ठ 200/ मूल्य : रु. 200 

[23] कवित्वमतो मुलाकात (कविता से मुलाकात, 2016)/ एन. वेणुगोपाल/ पृष्ठ 206/ रु. 120 

[24] बी.वी.वी. प्रसाद हाइकूलु (बी.वी.वी. प्रसाद की हाइकू, 2016)/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 90/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : वासिरेड्डी पब्लिकेशंस, बी-2 टेलीकॉम क्वार्टर्स, कोत्त्पेट, हैदराबाद – 500060 

[25] गालि अद्दम (हवा दर्पण, 2016)/ एम.एस.नायुडु/ पृष्ठ : 182/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : वासिरेड्डी पब्लिकेशंस, हैदराबाद, मोबाइल : 09000528717 

[26] मा केरल यात्रा (हमारी केरल की यात्रा, 2016)/ मुत्तेवी रवींद्रनाथ/ पृष्ठ 256/ मूल्य : रु. 250/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-24224458 

[27] ना ऐरोपा यात्रा (मेरी यूरोप की यात्रा, 2016)/ राजेश वेमूरि/ पृष्ठ 184/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-23325979 

[28] सूर्योदयम कुट्रकादु (सूर्योदय षड्यंत्र नहीं है, 2016)/ चेरुकूरि सत्यनारायण/ पृष्ठ 508/ मूल्यः रु. 90 

[29] बाचि कार्टूनलु (बाचि के कार्टून, 2016)/ अन्नम श्रीधर बाचि/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : बाचि, हैदराबाद, फोन : 040-24042847 

[30] दाशरथि सिनेमा पाटला पंदिरी (दाशरथि के फिल्मी गीत, 2016)/ प्रधान संपादक : के. प्रभाकर/ पृष्ठ : 350/ मूल्य : 326/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : के. विमलारानी, 104, ब्लॉक 1, डॉ. प्रभाकररेड्डी चित्रपुरी कॉलोनी, मणिकोंडा जागीर, राजेंद्रनगर मंडल, हैदराबाद – 500008 

[31] मधुपुरी/ हिंदी मूल : राहुल सांकृत्यायन, तेलुगु अनुवाद : कविनि आलूरि/ पृष्ठ 272/ मूल्य : रु. 200/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : विशालांध्र पब्लिशिंग हाउस 

[32] एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स-1/ मूल : सर ऑथर कॉनेन डॉयल, तेलुगू अनुवाद : के. बी. गोपालम/ पृष्ठ 206/ मूल्य : रु. 100/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : क्रिएटिव लाइंस, हैदराबाद, 09848065658 

[33] एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स -2/ मूल : सर ऑथर कॉनेन डॉयल, तेलुगू अनुवाद : के. बी. गोपालम/ पृष्ठ 220/ मूल्य : रु. 100/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : क्रिएटिव लाइंस, हैदराबाद, 09848065658 

[34] सागुतुन्ना समरम (संघर्ष जारी है, 2016)/ हिंदी मूल : डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’/ तेलुगु अनुवाद : डॉ. भागवतुल हेमलता/ पृष्ठ 135/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : डॉ. भागवतुल हेमलता, फ्लैट नं. 403, साई रामप्रसाद अपार्टमेंट्स, ओल्ड प्रतिभानिकेतन स्ट्रीट, माछवरम, विजयवाडा – 520004, मोबाइल : 09492437606