शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान ‘बतुकम्मा’


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22 जून 2014 को भारत के 29वें राज्य के रूप में पुनर्गठित होने वाले राज्य ‘तेलंगाना’ अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जिन प्रतीकों को जोर शोर से नए सिरे से दुनिया के सामने रखा उनमें ‘बतुकम्मा’ पर्व का स्थान सर्वोपरि है। इसी कार्य योजना के तहत ‘बतुकम्मा’ का त्योहार 2014 से विराट स्तर पर राजकीय लोकपर्व के रूप में भव्यता के साथ मनाया जाने लगा है। 2016 में यह त्योहार ‘गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकोर्ड्स’ में दर्ज हो चुका है। यह त्योहार प्रकृति की सुंदरता और तेलंगाना के लोगों की सद्भावना का प्रतीक बन गया है। 

‘बतुकम्मा’ का संबंध देवी पूजा से है। यह त्योहार भाद्रपद मास की समाप्ति के दिन अर्थात पितृविसर्जनी अमावास्या से शुरू होता है। स्मरणीय है कि आश्विन मास में देश भर में शारदीय नवरात्र हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं और महिषासुरमर्दिनी दुर्गा की पूजा की जाती है। 

भारत के विभिन्न भागों में यह त्योहार अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। इस अवसर पर उत्तर भारत में रामलीला का आयोजन होता है तो गुजरात में डांडिया या गरबा का। यह पर्व आंध्र प्रदेश में दशहरे के रूप में मनाया जाता है तो तेलंगाना में ‘बतुकम्मा’ के नाम से प्रचलित है। महालय अमावस के दिन शुरू होकर यह पर्व दुर्गाष्टमी के दिन समाप्त होता है। ‘बतुकम्मा’ का अर्थ है ‘बतुकु अम्मा’। तेलुगु में ‘बतुकु’ जीवन का पर्याय है। अतः ‘बतुकम्मा’ का अर्थ हुआ जीव माता अथवा जीवनदायिनी माता। ‘बतुकु’ का एक और अर्थ जागरण भी है। यह माना जाता है कि इस पर्व के माध्यम से जीव अपने जीवन की रक्षा हेतु देवी को पुकारते हैं – ‘हे माँ जागो, रक्षा करो’। अतः ‘बतुकम्मा’ का एक अर्थ हुआ – ‘जागो और रक्षा करो, हे माँ !’ 

नौ दिनों तक चलने वाला फूलों का यह पर्व महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। देवी माँ – बतुकम्मा – को नौ दिन विविध नैवेद्य समर्पित किए जाते हैं। प्रति दिन के नैवेद्य के नाम पर ही उस दिन का विशेष पर्व नाम रखा गया है। पहले दिन को ‘एंगिली पुव्वुला बतुकम्मा’ कहा जाता है। इस दिन तिल से बनाए मिष्ठान्न का भोग चढाया जाता है दिन को ‘एंगिली पुव्वुला बतुकम्मा’ कहा जाता है। 

दूसरे दिन को ‘अटुकुला बतुकम्मा’ कहते हैं। और इस दिन चिवड़े का भोग लगता है। तीसरे दिन फीकी दाल (मुद्दापप्पु बतुकम्मा), चौथे दिन गीले चावल (नानबिय्यम बतुकम्मा), पाँचवे दिन उबले हुए चावल के आटे से बना हुआ दोसा (अट्ला बतुकम्मा), सातवें दिन चावल के आटे से बने हुए निंबौली के आकार के मुरुकुलु/ चकली (वेपकायल बतुकम्मा), आठवें दिन घी, मक्खन, तिल और गुड का मिश्रण (वेन्नमुद्दला बतुकम्मा) तथा नौवें दिन पाँच तरह के चावल – दही चावल, पुलिहोरा (इमली चावल), नींबू चावल, नारियल चावल तथा तिल चावल (सद्दुला बतुकम्मा) का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। लेकिन छठे दिन देवी को नैवेद्य नहीं चढ़ाया जाता क्योंकि यह माना जाता है कि उस दिन देवी माँ सबसे रूठकर बैठ जाती है। इस दिन को ‘अलिगिना (नाराज) बतुकम्मा’ कहा जाता है। अंतिम दिन (‘सद्दुला बतुकम्मा’) को ‘पेद्दा बतुकम्मा’ (बड़ी बतुकम्मा/ महाबतुकम्मा) भी कहा जाता है। इसके बाद होता है ‘बोड्डम्मा’ (गौरी) पूजन जिसके लिए तालाब की मिट्टी से माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती है। मान्यता है कि ‘बतुकम्मा’ का त्योहार वर्षा ऋतु के समाप्त होने का प्रतीक है और इस पर्व के अंतिम दिन गौरी (‘बोड्डम्मा’) पूजन द्वारा शरद ऋतु का स्वागत किया जाता है। 

भारत के अन्य अनेक पर्वों की भांति ‘बतुकम्मा’ भी कृषि संस्कृति का पर्व है। वर्षा ऋतु की सकुशल समाप्ति और उस दौरान जीवन की रक्षा के लिए देवी माँ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस हेतु ‘बतुकमा’ को विशेष रूप फूलों से सजाया जाता है। इसलिए इसे फूलों का त्योहार भी माना जाता है। बरसात में हर ओर हरियाली छा जाती है। तेलंगाना में इस मौसम में हर जगह मद्धम सफेद रंग के ‘गुनुका’ (सेलोसिया) के फूल खिल उठते हैं। बतुकम्मा को सजाने के लिए मुख्या रूप से इन्हीं फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इन्हें ‘बतुकम्मा के फूल’ कहा जाता है। इन फूलों के साथ-साथ तंगेडू (अमलतास), आक, कनेर, घास के फूलों का भी प्रयोग किया जाता है। पहले तो लोग इन फूलों को अपने आसपास के पेड़-पौधों से तोड़ लाते थे लेकिन आजकल जंगली फूलों के स्थान पर गेंदे, गुलाब, गुलदाउदी, गुड़हल और सजावटी फूलों का उपयोग किया जाने लगा है जो बाजार में मिल जाते हैं। 

अब एक नजर ‘बतुकम्मा’ मनाने की विधि पर। सबसे पहले पीतल का थाल लिया जाता है। इसे ‘तांबलम’ कहते हैं। इसमें गोबर से गोल वेदी बनाई जाती है। उस पर गुनुका के फूलों को इस तरह सजाया जाता है कि डंठल भीतर की ओर हो और बाहर फूल दिखाई दें। इन डंठलों पर फिर गोबर से सतह बनाई जाती है और उस पर फिर फूल सजाए जाते हैं। इस तरह परत दर परत पिरामिड आकार में फूलों को सजाया जाता है। शिखर पर कुम्हडे का फूल रखकर उस पर दीपक जलाया जाता है। फूल खुशहाली के प्रतीक हैं और दीपक प्रकाश का। इस संरचना को ही ‘बतुकम्मा’ कहा जाता है। आजकल गोबर के स्थान पर बेंत से पिरामिड आकार बनाया जाने लगा है और उसे रंगबिरंगे फूलों से सजाया जाता है। 

अष्टमी के दिन बतुकम्मा को लेकर स्त्रियाँ नदी किनारे पहुँचती हैं और बतुकम्मा के चारों ओर गोलाकार बनाकर गीत गाते हुए नाचती हैं – 
बतुकम्मा बतुकम्मा उय्यालो 
बंगारु बतुकम्मा उय्यालो 
पूवंटि इंतुलम उय्यालो 
मेमु एंतेंतो एदगालि उय्यालो 
बंतीपूलनिस्ता उय्यालो 
बंगारु मनसिव्वु उय्यालो.....। 
(बतुकम्मा बतुकम्मा झूला झूलो/ सवर्णमयी बतुकम्मा झूला झूलो/ सुमन सुकुमारी झूलो/ हम ऊँची पेंग बढ़ाएँ, झूलो/ गेंदे का हार चढाऊँगी, झूलो/ सोने का दिल दो, झूलो)। 

यह त्योहार मूलतः स्त्रियों का त्योहार है और इसके माध्यम से उनका बहनापा भी प्रकट होता है। गीत-संगीत और नृत्य के बाद ‘बतुकम्मा’ को नदी या तालाब में विसर्जित करते हैं और प्रसाद के रूप में ‘मलीदा’ (बाजरे और ज्वार की मिस्सी रोटी और गुड़) बाँटते हैं। 

‘बतुकम्मा’ त्योहार से संबंधित अनेक लोक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, चोल वंश के राजा धर्मांग और उनकी पत्नी सत्यवती की सौ शूरवीर संतानें युद्ध में एक साथ वीरगति को प्राप्त हो गईं तो राजा और रानी राजपाट त्यागकर वन में तपस्या करने चले गए। उन्होंने संतान की कामना से देवि माँ की आराधना की। देवि की कृपा से उनके एक बेटी हुई लेकिन जन्म से ही उसे तरह-तरह के खतरों का सामना करना पड़ा। तब उस बालिका का नाम ‘बतुकम्मा’ रखा गया क्योंकि वह संकटों के बावजूद उत्तरजीवन (सर्वाइवल) का प्रतीक बन गई थी। त्योहार के अवसर पर गए जाने वाले गीतों में इस कथा का भी उल्लेख किया जाता है। 

बतक्म्मा बतकम्मा उय्यालो, 
बंगारू बतकम्मा उय्यालो 
आनाटी कलाना उय्यालो, 
धर्मांगुडनु राजु उय्यालो 
आ राजु भार्यायु उय्यालो 
अति सत्यवती अंदुरु उय्यालो 
..... 
कलिकी लक्ष्मीनि गूर्ची उय्यालो 
गनता पोंदिरिंका उय्यालो 
.... 
सत्यवती गर्भमुना उय्यालो 
जनियिंचे श्रीलक्ष्मी उय्यालो। 
इस गीत में प्रिय कन्या बतुकम्मा को पालने या झूले में झुलाते हुए राजा धर्मांग और रानी सत्यवती के उल्लेख के साथ उन पर माँ लक्ष्मी की कृपा और वरद कन्या बतुकम्मा के जन्म की चर्चा की गई है।  

यही कारण है कि तेलंगाना क्षेत्र में आज भी यदि किसी घर में जन्म लेते ही बच्ची मर जाती है तो ऐसे माँ-बाप देवी माँ के दरबार में जाकर मन्नत माँगते हैं कि यदि बेटी जन्म लेगी तो उसका नाम ‘बतुकम्मा’ रखेंगे। 

एक और लोककथा भी प्रचलित है। बलात्कार से त्रस्त एक अबोध बालिका नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेती है। गाँव वाले उस बालिका को ‘बतुकम्मा’ (जीवित हो जाओ, माँ) कह कर आशीर्वाद देते हैं। लोग आज भी यह मानते हैं कि ‘बतुकम्मा’ किसी भी अबोध बालिका के साथ ऐसा कुकृत्य नहीं होने देगी। 

एक और मिथकीय कथा इस त्योहार से जुड़ी हुई है। वह यह कि दक्ष के यज्ञ में सती बिना बुलाए चली जाती हैं यह सोचकर कि गुरु और पिता के घर बिना बुलाए जाया जा सकता है। परंतु वहाँ दक्ष शिव की निंदा करते हैं तो सती इस अपमान को सह नहीं पाती और प्राण त्याग देती है। इसी की स्मृति में सती देवी के पुनः जीवित होने की कामना करते हुए फूल और हल्दी से गौरी माता की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है। 

बतुकम्मा से संबंधित एक ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है। वेमुलवाडा के राजा चालुक्य ने चोल राजा और राष्ट्रकूट राजा के बीच हुए युद्ध में राष्ट्रकूट राजा का साथ दिया था और 973 ई. में थैलापुदु द्वितीय ने राष्ट्रकूट के राजा कर्कुदु द्वितीय को हराकर दूसरा चालुक्य साम्राज्य स्थापित किया था जो आज का तेलंगाना है। वेमुलवाडा के साम्राज्य में राजराजेश्वर (भगवान शिव) का प्रसिद्ध मंदिर था। चोल राजा परांतक सुंदर राजराजेश्वर के परम भक्त थे। उन्होंने अपने बेटा का नाम भी राजराजा रखा था। राजराजा चोल (शासन काल 985 ई. - 1014 ई.) के बेटे राजेंद्र चोल ने राजराजेश्वर मंदिर तुड़वा कर वहाँ का शिवलिंग अपने पिटा को भेंट किया था। 1006 ई. में राजराजा चोल ने उस शिवलिंग के लिए मंदिर का निर्माण शुरू कराया। 1010 में बृहदीश्वर नाम से मंदिर की स्थापना हुई और वेमुलवाडा के शिवलिंग को तंजावूर बृहदीश्वर मंदिर में स्थापित कर दिया गया। इससे तेलंगाना के लोग काफी दुखी हुए। कहा जाता है कि तेलंगाना छोड़कर बृहदम्मा (पार्वती) दुखी थी अतः उस दुख को कम करने के लिए बतुकम्मा उत्सव की शुरूआत हुई। लोगों ने फूलों से बड़े पर्वत की आकृति बनाकर शिखर पर हल्दी से गौरम्मा बनाकर पूजा की और गीत-संगीत के साथ त्योहार मनाया । इस प्रकार यह पर्व एक हजार वर्ष से भी अधिक समय से प्रचलित है। 

तनिक गौर करें तो पाता चलता है कि ‘बतुकम्मा’ का त्योहार धरती, पानी और मनुष्य के आपसी संबंध का त्योहार है। बतुकम्मा के लिए प्रयुक्त फूलों में औषधीय गुण होते हैं जो पानी को स्वच्छ रखने में सहायक होते हैं। जहाँ ‘बतुकम्मा’ फूलों से सजाया जाता है वहीं ‘बोड्डम्मा’ को तालाब की मिट्टी से बनाया जाता है। माँ दुर्गा की मूर्ति को तालाब की मिट्टी से बनाकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा तालाब में इस कामना के साथ विसर्जित करते हैं कि वह हमेशा पानी से लबालब रहे। 

[2] 

तेलंगाना के साहित्यकार अपनी रचनाओं में इस पर्व का उल्लेख करना नहीं भूलते। हैदराबाद मुक्ति संग्राम पर आधारित किशोरीलाल व्यास ‘नीलकंठ’ ने उपन्यास ‘रज़ाकार’ (2005) में पृष्ठ 22 से 30 तक इस पर्व का अत्यंत मनोरम चित्रण किया है। नीचे हम उसीके कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। 

“नए नए कपड़ों में सजी ग्रामीण बालाएँ अपने अपने हाथों में रंग-बिरंगे फूलों के थाल लिए आई थीं। थालों को बीचोबीच सजाया गया। दीप जल उठे। ‘बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो’ के लोकगीत गूँज उठे और तालियों की थाप देती महिलाएँ वृत्ताकार वक्र में एक ही ताल पर कदम देती घूमने लगीं।“ 

“बतकम्मा उत्सव दशहरे से पहले नौ दिवस तक मनाया जाता है। शाम के समय महिलाएँ फूलों को सजा कर देवी बतकम्मा के गीत गाती रास खेलती हैं, खूब गाती-हँसती हैं, फिर फूल किसी नदी या तालाब में अर्पित कर दिए जाते हैं। सभी सामूहिक रूप से प्रसाद खाती हैं और अपने घर चली जाती हैं।“ 

“आश्विन के आते आते आकाश में बादलों के समूहों को पवन ग्वाला धकेल धकेल कर पहाड़ों के पार ले जाता, और निरभ्र आकाश से रेशम जैसी गुलाबी धूप झरती... और धूप में पकते हुए सुनहरे धान के खेतों पर पसर जाती। 

अब धान के खेत कटने लगते... कटे धान के कट्टों पर बैल चलते... और धान के बीजों के कुप्पों को देख देख कर किसानों की छातियाँ भी फूल कर कुप्पा होने लगतीं। 

ऐसे में शाम के समय तेलंगाना की बालाएँ जंगल से लाल, पीले, सफ़ेद फूल चुन लातीं... फूलों को एक लंबे मुकुट की आकृति में थालियों में सजाया जाता... छोटे छोटे पीतल के कटोरों या टिफ़िनों में पुटनालु, अटुकुलु, गुड़ जैसी खाने की सामग्री रख कर तालाब, नदी या नहर के किनारे थोड़ी सी सपाट जगह देख कर फूलों की थालियाँ बीच में सजा दी जातीं और फिर ग्राम बालाएँ, युवतियाँ और प्रौढ़ाएँ वर्तुलाकार में तालबद्ध, लयबद्ध तालियाँ बजाती उन फूलों की परिक्रमा करती सामूहिक स्वर में गाने लगतीं : ‘बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो/ बतकम्मा बतकम्मा विय्यालो।‘ तो सारा परिसर उनके मधुर कलकंठ से गूँजने लगता। रंग-बिरंगे परिधान पहने कृष्णकाय, कृषकाय कृषक बालाएँ वृत्ताकार घूमने लगतीं तो रासलीला में घूमती रंग-बिरंगी गोपियों का रूप साकार हो उठता। लगता, तालियों का समूह फूलों के चारों ओर एक ताल, एक लय में घूम रहा है, फिर क्रमशः गीत बदलते... बोल बदलते... लय और ताल बदलते... तालियों की थाप बदलती... और इन सब के साथ कदमों की छाप बदलती। देवी बतकम्मा के गीतों और नृत्यभरी इस आराधना के बाद फूल नदी में बहा दिए जाते... बीच में प्रज्वलित दीपक रख दिए जाते... तब तक आकाश में अंधेरा घिर आता... तारे झाँकने लगते... लहरों पर तैरते फूलों के बीच टिमटिमाते दीप दूर दूर होने लगते। मानवीय आस्था के ये दीप, उत्साह और उत्सव के ये दीप, जिजीविषा के ये दीप सारे दुख-दरदों के बावजूद न जाने कितनी शताब्दियों से इसी तरह से नदी की लहरों पर छोड़े जाते रहे हैं और नदी भी निर्विकार भाव से न जाने कितनी शताब्दियों से मानवीय आस्था की इन किरणों को अपनी पयस्विनी छाती पर ढोती, उन्हें सम्मान देती आ रही है। फिर हँसती, खिलखिलाती कृषक बालाएँ प्रसादरूपी कलेवा करतीं... नदी का जल पीतीं और गाती हुई उल्लास भरे मन से अपने अपने घर लौटतीं। न जाने कितनी सदियों से बतकम्मा के ये उत्सव चले आ रहे थे। ‘बतकम्मा’ अर्थात ‘जीवन की देवी’। ऐसी देवी जो ‘मृत्योर्मा अमृतांगमयः’ का ग्राम्य रूप हो; जो मृत्यु नहीं, जीवन दान दे; जो मनुष्य की कामनाओं को, आकांक्षाओं को, इच्छाओं को, जिजीविषा का पयःपान कराए।“

  • 'प्रणाम पर्यटन'(वर्ष 2,अंक 1 अक्तूबर-दिसंबर 2017 में प्रकाशित) 


गुरुवार, 15 मार्च 2018

अनुवाद चिंतन पर एक परिपूर्ण दृष्टि


शर्मा, गोपाल (2017)/ अनुवाद : परंपरा और प्रयोग
नई दिल्ली : तक्षशिला
पृष्ठ : 423/ मूल्य : 900 


अनुवाद विज्ञान भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयोग क्षेत्र है। इसकी संकल्पना अत्यंत व्यापक है। अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन जैसे क्षेत्रों का विस्तार हो रहा है। अनुवाद विज्ञान को पाठ विश्लेषण तथा संकेत विज्ञान से जोड़कर भी देखा जाता है। पहले से ही अंग्रेजी में अनुवाद विज्ञान से संबंधित अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। हिंदी में भी अनुवाद की सिद्धांत और व्यवहार से संबंधित अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं क्योंकि स्नातक और सनातकोत्तर स्तर पर अनेक विश्वविद्यालयों में अनुवाद को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है। इन पुस्तकों में ज्यादातर अनुवाद की परिभाषा, स्वरूप, प्रक्रिया, क्षेत्र, प्रकार आदि से संबंधित सामग्री एवं तथ्यों में दुहराव दिखाई देता है। शोध ग्रंथों में भी प्रायः यही स्थिति है। लेकिन हाल ही में मुझे प्रो. गोपाल शर्मा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ (2017, नई दिल्ली : तक्षशिला) देखने और पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ तो ऐसा प्रतीत हुआ कि यही वह पुस्तक है जिसकी अनुवाद विज्ञान के अध्येताओं और हिंदी पाठकों को भी लंबे अरसे से तलाश थी। 

प्रो. गोपाल शर्मा इथियोपिया के अरबा मिंच विश्वविद्यालय में अंग्रेजी और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर हैं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में समान गति से आप शिक्षण, लेखन तथा अनुवाद कार्य करते हैं। आपकी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हैं – देरिदा : विखंडन की शब्दावली, समकालीन मीडिया लेखन, राजभाषा हिंदी : विचार और विश्लेषण, संप्रेषणपरक हिंदी भाषा शिक्षण, केंद्रीय हिंदी व्याकरण, अँधेरे में : देरिदा दृष्टि से एक जगत समीक्षा, एन आउटलाइन ऑफ जनरल लिंग्विस्टिक्स, एन इंटरोडक्शन टू लिटरेरी क्रिटिसिज़्म एंड थ्योरी, प्रेमचंद इन ट्रांस्लेशन, इंग्लिश इन इथोपिया : ईशूज एंड परस्पेक्टिव्ज, नेलसन मंडेला : दि अफ्रीकन गांधी, यूथ आइकन : नरेंद्र मोदी आदि। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से आपने प्रसिद्ध समाजभाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह के सफल निर्देशन में ‘सैद्धांतिक-अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान और हिंदी भाषा : प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का लेखन संदर्भ’ पर शोधकार्य किया है। सभा की मासिक पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ में वैनतेय शास्त्री के नाम से व्यंग्य लेखन भी किया है। 

‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ प्रो. गोपाल शर्मा की शोध दृष्टि और गहन चिंतन का सुपरिणाम है। अनुवाद अध्ययन और अध्यापन तथा शोध के लिए यह उपयोगी एवं महत्वपूर्ण पुस्तक है क्योंकि पहली बार अनुवाद अध्ययन का सर्वांगीण ढाँचा तथा अनुवाद परंपरा का भारतीय एवं पाश्चात्य परिदृश्य इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों के समक्ष उपस्थित हुआ है। इस पुस्तक के ब्लर्ब पर यह उल्लेख किया गया है कि ‘यह पुस्तक अनुवाद अध्ययन की पाश्चात्य व भारतीय परंपराओं, सिद्धांतों और अनुवादवेत्ताओं के लेखन का अद्यतन और विस्तृत विवेचन करते हुए उसके अधुनातन प्रयोगात्मक पक्ष को विशेषतापूर्वक प्रस्तुत करती है।‘ एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी., डिप्लोमा के छात्रों एवं शोधार्थियों के साथ-साथ प्राध्यापकों एवं शोध निर्देशकों को भी इस पुस्तक को आदि से अंत तक अक्षरशः पढ़ना चाहिए। 

‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ शीर्षक इस 423 पृष्ठों के महाकाय ग्रंथ में लेखक ने 14 शीर्षकों के अंतर्गत अनुवाद के वैश्विक परिदृश्य को समेटा है - (1) अनुवाद : महत्व, उद्देश्य, स्वरूप तथा क्षेत्र विस्तार, (2) अनुवाद : बहुस्तरीय व बहुआयामी परिभाषाएँ, (3) सफल अनुवादक की पहचान, (4) अनुवाद और भाषाविज्ञान, (5) अनुवाद की भारतीय परंपराएँ, (6) पाश्चात्य अनुवाद परंपरा, (7) प्रमुख अनुवाद चिंतक : भारतीय व पाश्चात्य, (8) समतुल्यता का सिद्धांत और अनुवाद, (9) उत्तर आधुनिकता और अनुवाद, (10) उत्तर उपनिवेशवाद और अनुवाद, (11) विखंडन और देरिदा की अनुवाद दृष्टि, (12) चित्रपट अनुवाद के विविध पक्ष, (13) मशीनी अनुवाद : उपलब्धियाँ, समस्याएँ और संभावनाएँ तथा (14) अनुवाद की नई सैद्धांतिकी। अंत में अनुवाद विज्ञान से संबंधित हिंदी और अंग्रेजी पुस्तकों की प्रामाणिक सूची भी सम्मिलित है जिसकी उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता। 

अनुवाद के महत्व को सिद्ध करते हुए गोपाल शर्मा कहते हैं कि ईसापूर्व भारतीय जीवन का पश्चिम से जो संबंध रहा वह केवल व्यापार का न होकर सांस्कृतिक आदान-प्रदान का था जिसमें अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। (पृ.13)। लेखक की मान्यता है कि भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना में अनुवाद सहायक था। अनुवाद केवल भाषा का अंतरण नहीं बल्कि सांस्कृतिक अंतरण है। इससे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक प्रगति भी जुड़ी हुई है। लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि “दाराशिकोह के उपनिषदों के अनुवाद से लेकर आज तक की परंपरा के महत्व को समझते हुए यह कहने में गर्व होना चाहिए कि इस क्षेत्र में भारतीय योगदान नगण्य नहीं, अपितु अग्रगण्य है।“ (पृ.14)। 

अनुवाद विज्ञान के छात्र, शोधार्थी एवं शोध निर्देशक प्रायः कैटफोर्ड, नाइडा और पीटर न्यूमार्क तथा रवींद्रनाथ श्रीवात्सव, सुरेश कुमार, कैलाश चंद्र भाटिया, भोलानाथ तिवारी के ही इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। इन विद्वानों के द्वारा प्रतिपादित परिभाषाओं को तोते की तरह रटते हैं और काम चला लेते हैं। इन परिभाषाओं से न आगे जाते हैं और न ही जाने की कोशिश करते हैं। प्रो. गोपाल शर्मा ने अपनी गहन अध्ययन दृष्टि का परिचय देते हुए अनुवाद की बहुस्तरीय एवं बहुआयामी परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। चीनी भाषाविद लोंग जिंग (Long Jixing) के हवाले से वे यह स्पष्ट करते हैं कि परिभाषाओं को केवल कालक्रमानुसार न देखकर बहुस्तरीय स्वरूप के आधार पर देखना उचित होगा। भाषावैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अनुवाद की अनेक परिभाषाएँ विस्तृत विवेचन के साथ इस पुस्तक में सम्मिलित हैं। यह अनेकविद संकल्पना इसलिए भी आवश्यक प्रतीत होती है कि वर्तमान युग की कोई भी गतिविधि अनुवाद के बिना नहीं चलती। “अनुवाद की कोई भी थ्योरी कभी पूर्ण नहीं होती और न ही पूर्णरूपेण व्यर्थ।“ (पृ.283)। गोपाल शर्मा अनुवाद को ‘पौधारोपण’ (transplantation) मानते हैं (पृ.283) और कहते हैं कि जिस तरह धरती पर पौधा जमाने के लिए काट-छाँट और कतर-ब्योंत की आवश्यकता होती है उसी तरह अनुवाद को जमाने के लिए भी करना होगा। 

उत्तर आधुनिकता, उत्तर उपनिवेशवाद तथा विखंडन के बारे में आजकल बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर संकल्पना अभी भी स्पष्ट नहीं हो सकी। देखा जाए तो संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद, फेमेनिज़्म आदि अनुवादों के माध्यम से ही सामने आए। इस संबंध में लेखक का कहना है कि “यदि सस्यूर और देरिदा को फ्रेंच से अंग्रेजी में अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत न किया जाता तो न संरचनावाद होता और न उत्तर संरचनावाद। न फ्रेंच फेमिनिज़्म से परिचय हो पाता, न जेंडर अध्ययन की नींव रखी जाती।“ (पृ.6)। ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ में पहली बार उत्तर आधुनिकता तथा उत्तर उपनिवेशवाद से अनुवाद के संबंध को रेखांकित किया गया है। आज के परिप्रेक्ष्य में हिंदी ‘बाजार-दोस्त’ और ‘कंप्यूटर-दोस्त’ भाषा (शर्मा, ऋषभदेव [2015], हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, नई दिल्ली : तक्षशिला, पृ. 183) बन चुकी है। ऐसी स्थिति में अनुवाद भी अब भाषाओं की सीमाओं से परे जाकर ‘मीडिया-अध्ययन’ और ‘मास कम्युनिकेशन’ तक पहुँच चुका है। (पृ.278)। लेखक ने यह स्मरण कराया है कि उनके बचपन में ‘रूसी से हिंदी में अनुवादित अनेक कृतियाँ नाम मात्र के मूल्य पर मिल जाया करती थीं।‘ (पृ.278)। मेरे पास आज भी रूसी से अंग्रेजी में और तेलुगु में अनूदित साहित्यिक कृतियाँ हैं जो रादुगा और प्रोग्रेस पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित हैं। उनमें से कुछ किताबों पर मात्र पाँच रुपए अंकित हैं और कुछ किताबों में तो मूल्य अंकित ही नहीं। 26 दिसंबर, 1991 से सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी साहित्य की वैसी उपलब्धता भी समाप्त हो गई है। आज अंग्रेजी का वर्चस्व है। अंग्रेजीतर भाषाओं के लेखक प्रायः यह समझते हैं कि यदि उनके साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद होता है तो उनका दर्जा भी बढ़ जाता है। जबकि प्रो. गोपाला शर्मा ने इसे एक उत्तर उपनिवेशी लक्षण माना है। 

उत्तर उपनिवेश काल में अनुवाद का महत्व बढ़ गया है। यदि उपनिवेशवादी ताकतों ने यह कहा कि ‘भारतीय भाषाओं में कुछ भी पठनीय व श्रेष्ठ नहीं है तो भारतीयों ने भी अपनी श्रेष्ठता का दावा करने के लिए अनुवाद को माध्यम बनाया।‘ (पृ.288)। अनुवाद कभी भी ‘वन वे ट्राफिक’ न होकर आदान-प्रदान होता है। (पृ.289)। भारत में 19वीं शती के प्रारंभ में जो ‘अनुवाद कार्य हुआ वह एक प्रकार से उपनिवेशी सोच का विस्तार है।‘ (पृ.290)। उल्लेखनीय है कि अनुवादकों को मार्ग सुझाने के साथ-साथ अनुवाद के क्षेत्र में निहित समस्याओं एवं सीमाओं का उल्लेख करते हुए विनय धारवाडकर ने अपने निबंध ‘ट्रांस्लेटिंग द मिलेनियम : इंडियन लिटरेचर इन ए ग्लोबल मार्केट’ में अनुवाद के लिए दस सूत्र निर्धारित किए हैं जिन पर इस पुस्तक में विचारोत्तेजक विमर्श सम्मिलित है। (पृ.297-298)। 

बाजार की ताकतों के सामने सब को झुकना ही पड़ रहा है। अनुवाद भी बाजार की ताकतों द्वारा संचालित है। प्रायः हम लोग यह पढ़ते आ रहे हैं कि अनुवादक वंचक होते हैं और अनुवाद दोयम दर्जे का कार्य। अनुवाद की लक्ष्य भाषा के अनुवादक की मातृभाषा से भिन्न होने पर यह खतरा और भी बढ़ जाता है। लेकिन प्रो. शर्मा याद दिलाते हैं कि देरिदा की दृष्टि से कोई भी अनुवाद दोयम नहीं होता। (पृ.311)। उनके अनुसार अनुवादक पाठक है और पाठक के साथ-साथ वह लेखक भी है और “यदि अनुवाद एक प्रकार का पठन कर्म है और या निर्वचन का प्रकार है तो वह दिए अर्थ का प्रतिस्थापन है।“ (पृ.312)। क्योंकि वे यह मानते हैं कि मूल अर्थ को खंडित करने के बावजूद एक नई टैक्स्ट या टैक्स्टों के नेटवर्क का निर्माण किया जा सकता है। (पृ.313)। ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ में मशीनी अनुवाद, सबटाइटलिंग, फिल्मों के संवाद की प्रकृति, डबिंग, अनुवाद और जेंडर आदि अनेकानेक विषयों पर काफी विस्तार से चर्चा निहित है। 

पाठकों के लिए गोपाल शर्मा द्वारा रेखांकित कुछ तथ्यों को सूत्र रूप में यहाँ दिया जा रहा है – 

Ø अनुवाद के माध्यम से हीनता ग्रंथ की जड़ मिट सकती है। (पृ.14)। 

Ø अनुवाद तो एक ‘पाठ’ या ‘संवाद’ होता है, उसे जीवन देना, या संजीवनी देना अनुवाद का दायित्व है। (पृ.204)। 

Ø उत्तर उपनिवेशी काल में अनुवाद का महत्व यह कहकर अभिव्यक्त किया जाता है कि उपनिवेशवाद और अनुवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इनमें अटूट संबंध है। (पृ.288)। 

Ø उपनिवेशी सिद्धांती अनुवाद को एक ऐसा माध्यम मानते हैं जिनमें उपनिवेश को अनुवाद का रूपक मानकर देखना प्रश्नांकित किया जाता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवादक मूल-कृतिकार का जरखरीद गुलाम नहीं वह भी एक सर्जक है। वह ऐसा सर्जक है जो मूलकृति को अन्य भाषा में ढालकर एक नई आकृति देता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवाद किसी कृति के साथ किया जाने वाला आत्मीय संवाद या संलाप है, प्रतिक्रिया है जिसमें अनुवादक स्वयंभू, स्वतंत्र, निर्भीक एवं सहृदय पाठक होता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवाद पर प्रतिबंध की कोई चेष्टा अलाभप्रद होगी। बेहतर होगा की कोई मध्यम मार्ग हो, समस्त परिक्षेत्र का आकलन व मूल्यांकन हो और जिसे भाभा ‘in-between space’ कहते हैं तथा जिसमें अनुवाद के साथ संस्कृति का जुड़ाव भी होता है वह रहे। (पृ.289)। 

Ø हर कृति का अनुवाद मूलकृति को परिष्कृत, परिमार्जित व परिवर्धित ही नहीं करता, वह नए अर्थ का निर्धारण भी करता है। (पृ.291)। 

Ø सांस्कृतिक और भाषाई विभाजन अनुवाद के मार्ग में बाधा है। (पृ.294)। 

Ø कंप्यूटर के पास स्मृति तो होती है, किंतु मानवीय मस्तिष्क की विचार प्रक्रिया को वह नहीं पा सकता। अतः अनुवाद में निहित सर्जनात्मकता अपना पुनःसर्जन की प्रक्रिया में कोई मशीन मानवीय मस्तिष्क का स्थान नहीं ले सकती। केवल सीधी-सादी सूचनाओं अथवा आँकड़ों का भाषांतरण तो यह असीम क्षमता से कर सकती है। (पृ.391)। 

Ø एक गंभीर (मूल) स्रोत टैक्स्ट सदैव पवित्र नहीं होती, और जब कोई टैक्स्ट किन्हीं पाठकों के लिए लिखी जाती है तो उन पाठकों को उससे भटकना नहीं चाहिए। (पृ.414)। 

अंत में इस ग्रंथ की उपादेयता के संदर्भ में यह तथ्य एक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसमें विद्वान लेखक ने देश विदेश के जिन अनेक अनुवादशास्त्रियों के सिद्धांतों और मत-मतांतरों पर विमर्श प्रस्तुत किया है उनमें रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, भोलानाथ तिवारी, सतीश कुमार रोहरा, कैलाश चंद्र भाटिया, एन.ई. विश्वनाथ अय्यर, सत्यव्रत, गार्गी गुप्त, श्रीपाद रघुनाथ जोशी, दिलीप सिंह, नगेंद्र, अज्ञेय, कृष्ण कुमार गोस्वामी, कैटफोर्ड, नाइडा, पीटर न्यूमार्क, एंड्रे लेफेवरे, पेट्रस डेनियलस हूटिअस, सुज़ेन बेसनेट, एल्स वियरा, गेंटजलेर, वॉल्टर बेंजामिन, देरिडा, शैरी साइमन, एमिली एप्टर, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक्, होमी भाभा जैसे अनेक महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। साथ ही न्यायसूत्र, मीमांसा, पाणिनि, शब्द रत्नावली, शब्द कल्पद्रुम की परंपरागत प्राचीन परिभाषाएँ भी सम्मिलित हैं। निष्कर्षतः, अनुवाद चिंतन या अनुवाद अध्ययन को परिपूर्णता प्रदान करने की दृष्टि से यह विमर्श अत्यंत श्लाघनीय है।

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018


2 फरवरी 2018 को मुझे बैंक स्ट्रीट, कोठी, हैदराबाद में स्थित भारतीय स्टेट बैंक के स्थानीय प्रधान कार्यालय में नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (बैंक) और भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM BANK) के तत्वावधान में आयोजित हिंदी संगोष्ठी और हिंदी समाचार वाचन प्रतियोगिता में बतौर मुख्य वक्ता और निर्णायक भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। एक दिन पहले भारतीय निर्यात-आयात बैंक के मुख्य प्रबंधक श्री अमरेंद्र कुमार ने मुझे फोन पर सूचना दी कि मुझे इस आयोजन ‘ग क्षेत्र में हिंदी शिक्षण और प्रशिक्षण’ के संबंध में बात करनी होगी। अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए भी मैं आमतौर पर बिना तैयारी के नहीं जाती हूँ। लेकिन इस संगोष्ठी में बिना तैयारी के ही जाना पड़ गया। मैं तो मन ही मन डर रही थी क्योंकि मुझे बैंक राजभाषा अधिकारियों को संबोधित करना था।


उद्घाटन सत्र 10.30 बजे शुरू हुआ। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय स्टेट बैंक के महाप्रबंधक श्री प्रबोध पारिख ने कहा कि भाषा में सरलता और लचीलापन होना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया किया कि तकनीकी शब्दावली का प्रयोग करना चाहिए लेकिन इतना भी नहीं कि भाषा की बोधगम्यता ही समाप्त हो जाए और भाषा जटिल बन जाए। उन्होंने आगे यह चिंता व्यक्त की कि आजकल हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी शब्द हिंदी शब्दों को अपदस्थ कर रहे हैं। उन्होंने चर्चा के लिए यह विषय छेड़ दिया कि इस तरह का भाषा मिश्रण क्या हिंदी समाज के लिए श्रेयस्कर है! 

इस अवसर पर भारतीय निर्यात-आयात बैंक के उप महाप्रबंधक श्री नवेंदु वाजपेयी, भारतीय स्टेट बैंक के महाप्रबंधक और नराकास के महासचिव डॉ. विष्णुभगवान शर्मा, भारतीय निर्यात-आयात बैंक के मुख्य प्रबंधक श्री अमरेंद्र कुमार मंचासीन थे। हैदराबाद के विभिन्न बैंकों से मुख्य प्रबंधक, सहायक महाप्रबंधक, महाप्रबंधक उपस्थित रहे। 

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में ‘स्वतंत्र वार्ता’ के पत्रकार और एवी कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शशिकांत मिश्र ने ‘अखबारों में हिंदी का बदलता स्वरूप : कल, आज और कल’ पर अपने विचार व्यक्त किए तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (ISRO) से संबद्ध वैज्ञानिक एवं ‘शिक्षा’ तथा ‘ज्ञानम’ संस्थाओं के संस्थापक डॉ. टी.पी. शशिकुमार ने ‘वर्क, लाइफ, बैलेंस’ के संबंध में अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हर नागरिक की ज़िंदगी में ‘क्षण’ महत्वपूर्ण है क्योंकि संतोष के पल क्षणिक होते हैं तो उन्हें पहचानना जरूरी है सुखी ज़िंदगी जीने के लिए।

भोजन अवकाश के उपरांत विष्णु भगवान शर्मा ने संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण तथा प्रश्नावली भरने में आवश्यक सावधानियों के संबंध में विस्तार से अधिकारियों को समझाया। 

उसके पश्चात मेरी पारी थी। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बात कहाँ से शुरू करूँ। उस समय मुझे मेरे गुरुजी श्रद्धेय प्रो. ऋषभदेव शर्मा की बात याद आई। वे हमेशा यही कहा करते हैं कि कहीं से भी शुरू कीजिए वही शुरूआत हो जाती है। इसी तर्ज पर मैंने अपनी बात शुरू कर दी। उसीका सार संक्षेप मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। 

सबसे पहले मैंने अपनी बात ‘भाषा’ से शुरू की। भाषा को हम दो प्रकार से विभाजित कर सकते हैं – LGP (Language for General Purposes/ सामान्य प्रयोजनों की भाषा – अर्थात दैनंदिन जीवन की संप्रेषण संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली सामान्य संप्रेषण की भाषा) और LSP (Language for Specific/ Special Purposes/ प्रयोजनमूलक भाषा)। विशेष प्रयोजनों के लिए हमें विशेष भाषा की जरूरत पड़ती है. प्रयोग क्षेत्र के अनुसार प्रयोजनमूलक भाषा रूप विकसित होते हैं। प्रयोजनमूलक भाषा रोजीरोटी से संबंधित भाषा है। आज के बदलते परिप्रेक्ष्य में परंपरागत पाठ्यक्रमों के अलावा प्रयोजनपरक पाठ्यक्रमों की आवश्यकता है। अर्थात बैंकों, कार्यालयों आदि में प्रयुक्त भाषा के साथ-साथ मंच संचालन, एंकरिंग के कार्यक्रम चलाने तक की भाषिक प्रयुक्ति को सिखाना जरूरी है। ‘पढ़ाई के साथ कमाई’ की योजना जोड़ी जाएँ तो विद्यार्थी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ जरूर सीखेंगे। विविध व्यवसायों में काम आने वाली भाषा से संबंधित पाठ्यक्रम भी चलाना आवश्यका है। जैसे - मेडिकल हिंदी, बैंकिंग हिंदी, इंजीनियरिंग हिंदी, प्रबंधकों के लिए हिंदी आदि। 

उत्तर भारत में हिंदी प्रथम भाषा है लेकिन दक्षिण भारत में हिंदी दूसरी या तीसरी भाषा है। ऐसी स्थिति में समस्याएँ होती ही हैं। बुनियादी शिक्षा कमजोर होती जा रही है। सरलीकरण के तर्ज पर बच्चों को मूलभूत अवधारणाएँ नहीं समझा रहे हैं। हमारी पीढ़ी को अध्यापकों ने तो इंद्रधनुष के सात रंगों को अंग्रेजी में याद रखने के लिए ‘विब्गयोर’ को याद रखना सिखाया है – वायोलेट, इंडिगो, ब्ल्यू, ग्रीन, येल्लो, ऑरेंगे और रेड। लेकिन सरलीकरण की प्रक्रिया इतनी सरल हो चुकी है कि वायोलेट और इंडिगो का स्थान पर्पल और पिंक ने ले लिया है। बच्चे भी अब यही रट रहे हैं। मेरी 8 वर्षीय बेटी जब यह गाना गा रही थी – ‘रेड, ऑरेंगे, येल्लो, ग्रीन, ब्ल्यू, पर्पल एंड पिंक मेक्स रेनबो कलर्स’ तो मैं अवाक रह गई। आखिर सरलीकरण को अपनाते अपनाते हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं। 

भाषा सीखने के लिए सबसे पहले उस भाषिक समुदाय की संस्कृति और पृष्ठभूमि को जानना अनिवार्य है। भाषिक अभिव्यक्ति को जानना अनिवार्य है। भाषा की कम जानकारी होने के कारण छात्र प्रायः इस प्रकार की त्रुटियाँ करते हैं – 

उदाहरण के लिए He ‘Hardly’ works. इस वाक्य का अनुवाद कुछ छात्र इस प्रकार करते हैं – वह कठोर परिश्रम करता है। जबकि इस का आशय है कि अमुक व्यक्ति कामचोर है। वह कभीकभार ही काम करता है। 

‘Well’ equipped hospitals – कुओं से सुसज्जित अस्पताल (संसाधन युक्त अस्पताल)। I am feeling ‘chilly’ – मुझे मिर्ची लग रही है। (मेरे तो कुल्फी जमी जा रही है या मुझे ठंड लग रही है)। 

एक कविता को देखें – I saw a black crow/ sitting on a hemlock tree/ showering dew drops upon me.’ इस कविता में प्रयुक्त शब्द सभी परिचित शब्द हैं। इसका सामान्य रूप से अनुवाद इस तरह किया जा सकता है – मैंने देखा एक काला कौआ/ हेमलोक पेड़ पर बैठा हुआ/ मुझ पर छिड़क रहा है ओस की बूँदें।‘ 

लेकिन इस कविता में निहित प्रतीकार्थ को समझना होगा। इसके लिए स्रोत भाषा की संस्कृति को समझना आवश्यक है। अब ध्यान से रेखांकित शब्दों को देखिए hemlock tree – यह एक विषैला वृक्ष है। कविता में यह शब्द मृत्यु का प्रतीक है।  black – काला रंग शोक का संकेत देता है। crow priest का प्रतीक है और dew drops पवित्र जल का प्रतीक है। अब देखिए पहले जो चित्र आपकी आँखों के सामने उपस्थित हुआ वह तो गायब ही है, अब तो दूसरा ही चित्र है।  

भाषाओं में अनेक ऐसे शब्द पाए जातें हैं जो अपने मूल अर्थ से भिन्न अर्थ का बोध कराते हैं। उदहारण के लिए ‘मामू’ शब्द को ही लें। यह रिश्ते-नाते की शब्दावली है। माँ के भाई। जबकि मुम्बइया हिंदी में पुलिस वाले के लिए ‘मामू’ कहा जाता है। तेलुगु में भी इस तरह का प्रयोग पाया जाता है। तेलुगु भाषा समाज में ससुराल के लिए कभी-कभी ‘श्रीकृष्ण जन्मस्थान’ का प्रयोग भी किया जाता है।    
             
इसीलिए हम बार बार यही कहते हैं कि कार्यालयीन हिंदी, बैंकिंग हिंदी, मौसम विज्ञान की हिंदी हो या फिर साहित्यिक हिंदी जब तक विषय की जानकारी नहीं होगी, संकल्पनाओं की जानकारी नहीं होगी, भाषिक परिवेश की जानकारी नहीं होगी, संस्कृति की जानकारी नहीं होगी तब तक समस्याओं का निदान होना असंभाव है। इस तरह की समस्याएँ सिर्फ ‘ग’ क्षेत्र में ही नहीं ‘क’ और ‘ख’ क्षेत्र में भी उपस्थित हो सकती हैं।
धन्यवाद।

शनिवार, 13 जनवरी 2018

ओ मेरे पिता !



श्री गुर्रमकोंडा श्रीकांत 
जन्म : 5 अगस्त, 1939 
निधन ; 12 जनवरी, 2018 



तुम ऊपर से कठोर दीखते हो 


पर अंदर से बहुत ही कोमल हो

अपने जज्बात को रोक लेते हो

कभी अपना प्यार व्यक्त नहीं करते



अपनी जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते

घर की बागडोर संभालते-संभालते

दिन-रात एक कर देते हो

अपनी छोटी-छोटी खुशियों को भी त्याग देते हो



सुख-शय्या को त्याग

अपना सब कुछ दाँव पर लगा

खून-पसीना सींचकर

खुशियाँ उगाते हमारे लिए



जूझते रहे तकलीफों से चट्टान बनकर

अहसास तक होने न दिया

छिपाए रहे मन में लाखों घाव

आँखों से बहने न दिया



पापा !

आज भी मुझे याद है तुम्हारा

गंभीर चेहरा, निश्छल आँखें

डाँट-फटकार और कठोर अनुशासन



पर पापा, आज मैं पहचान गई हूँ

उस चेहरे के पीछे से झाँकती हँसी को

फटकार और अनुशासन के पीछे

तुम्हारे अपार स्नेह को



कभी जब मैं डर जाती थी अँधेरे से

तुम सूर्य बन जाते थे

रोती थी तो गोद में ले

दुलराते थे

कंधों पर बिठाकर घुमाते थे

परियों की कहानी सुनाकर सुलाते थे



जब-जब मैं हालात से टूटी हूँ

तुमने ही संजीवनी पिलाई है

जब भी घायल होकर पीछे हटी हूँ

शस्त्र देकर शक्ति बढ़ाई है



तुम्हीं ने व्यवस्था दी मेरे जीवन को

चिड़िया को तूफान से भिड़ना सिखाया

दिखाया पहचान बनाने का मार्ग

मूर्छित स्वाभिमान को जगाया



काल को पीछे धकेलते

जिजीविषा से भरे

तुम ही तो हो सच्चे योद्धा

धरती के सुंदरतम पुरुष,



मेरे पापा!