शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ - रामावतार त्यागी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है
पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है
आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है
(ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है, रामावतर त्यागी)

इन पंक्तियों के रचनाकार हैं सुप्रसिद्ध गीतकार रामावतार त्यागी (17 मार्च, 1925-12 अप्रैल 1985)। उनका जन्म मुरादाबाद जिले (उत्तर प्रदेश) के कुरकावली ग्राम में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा 10 साल की उम्र में शुरू हुई थी। हिंदी साहित्य जगत में वे ‘पीड़ा के गायक’ के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन वे आस्था और जिजीविषा के कवि भी हैं, जो इस दुनिया को बेहतर बनाने के सपने देखा करते थे। रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि “दर्द की छोटी-सी टीस, मगर, पता नहीं, वह कहाँ से उठती और कहाँ जाकर विलीन हो जाती है। उमंग का एक मतवाला झोंका जो आता तो बड़ी नरमी से है, मगर, सारी वाटिका के भीतर एक सिहरन-सी दौड़ जाती है। किसी नन्हीं उंगली की एक हल्की-सी चोट पड़ती तो एक तार पर है, किंतु जीवन-वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठते हैं।” (रामधारी सिंह दिनकर, भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ. 6)। जी हाँ, रामावतार त्यागी की कविताओं में वह शक्ति है जो पाठकों के हृदय को झंकृत कर देती है।

रामावतार त्यागी की काव्य कृतियों में नया खून (1953), आठवाँ स्वर (1958), मैं दिल्ली हूँ (1959), सपना महक उठे (1965), गुलाब और बबूल वन (1973), गाता हुआ दर्द (1982), लहू के चार कतरे (1984), गीत बोलते हैं (1986, मरणोपरांत प्रकाशित) आदि उल्लेखनीय हैं। उन्होंने महाकवि कालिदास रचित ‘मेघदूत’ का काव्यानुवाद भी किया और कविता के अलावा उन्होंने उपन्यास (समाधान और राम झरोखा), पत्र साहित्य (चरित्रहीन के पत्र) और कहानियाँ (राष्ट्रीय एकता की कहानियाँ) भी रचीं। समाज (मासिक) और प्रगति (त्रैमासिक) पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

भावुक गीतकार रामावतार त्यागी अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे। उनके गीतों में उनके जीवन के अनुभवों को देखा जा सकता है। वे अपनी अनुभूतियों को गीतों में पिरोते हैं। उनके व्यक्ति रूप और कवि रूप में से किसी एक की उपेक्षा करके दूसरे को समझ ही नहीं सकते। कहने का अर्थ है कि दोनों एक-दूसरे में इस तरह समाहित हैं कि एक के अभाव में दूसरा अधूरा लगेगा। उनके व्यक्तित्व के संबंध में डॉ. शेरजंग गर्ग लिखते हैं कि “पहली मुलाकात में कठिन-सा लगने वाला व्यक्तित्व जब खुल जाता था, तो बहुत जल्दी आत्मीय बन जाता था। बात-बात पर जुमले कसना, बहुत धीमे-धीमे मुस्कराते हुए हँसना और वेशभूषा में कतई सामान्य-सा लगना त्यागी के व्यक्तित्व को बहुत असामान्य बनाते थे।” (सं. शेरजंग गर्ग, भूमिका, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ.11)। वे यह भी कहते हैं कि उनके काव्य पाठ में भी कोई विशेष आकर्षण नहीं होता था, लेकिन उनकी कविताओं और गीतों में निहित भावुकता, पीड़ा और संघर्ष की बानगी अंतर्मन को झकझोरने में समर्थ थीं।

रामावतार त्यागी हमेशा नए प्रयोग करते हैं। डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय यह मानते हैं कि त्यागी की कविताओं में मानव मूर्ति मुस्कुराकर उभरती है। वे आगे यह कहते हैं कि इसके निर्माण में समष्टिमूलक नए मानव मूल्य हैं। (अति-आधुनिक हिंदी काव्य में यथार्थवाद, विश्वंभरनाथ उपाध्याय, समालोचक, फरवरी 1959, पृ.117)।

त्यागी जी कह उठते हैं कि-

मेरे गीत रहें जीवन भर कारावास भोगतें,
लेकिन मैं गुमराह स्वर्ण को अपनी कलम नहीं बेचूँगा!

उक्त पंक्तियों को पढ़ते समय भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ’ अनायास ही स्मरण हो आई। उसमें मिश्र जी कहते हैं - 'जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।/ मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ;/ मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत बेचता हूँ।’ कहा जाता है कि मिश्र जी ने पश्चात्ताप स्वरूप इन पंक्तियों को रचा था। साहित्य की दुनिया में यह कविता आत्म व्यंग्य का उदाहरण बन गई। त्यागी जी भी आहत होकर पलटवार के रूप में लिखा है -

सुन लो गीत बेचने वाले
ओ सौदागर, ओ व्यापारी
अपने भरे भरे लोचन से तुमने कितने गीत लिखे हैं?
शब्दों के रेशमी नमूने
देख लिए अब माल दिखाओ
कोई गीत जड़ें हो तुमने
जिस पर तीनों कला दिखाओ
बातें करते हुए पवन से तुमने कितने गीत लिखे हैं?

रामावतार त्यागी को जो नजदीक से जानते हैं, वे उनके व्यक्तित्व के बारे में सटीक रूप से कह सकते हैं। वे अक्खड़, तुनक मिजाज और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। अतः वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि -

मेरी खुशियों को चाहे जब जिंदा मरघट में दफना दो,
लेकिन मैं बदचलन पतन को अपना जनम नहीं बेचूँगा।
दीपक बिक सकता है जिसका
अंतर ज्योतिर्मान नहीं है
पर अंगारे को खरीदना
दुनिया में आसान नहीं है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें रामावतार त्यागी के गीत बेहद पसंद हैं। “उसके रोने, उसके हँसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहाँ तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है, जो मन को मोह लेती है।” (भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ. 6)। त्यागी की कविताओं पर चर्चा करते हुए दिनकर जी ने तीन बातों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। निःसंदेह ये बातें रामावतार त्यागी की कविता को समझने में सहायक सिद्ध होंगी -

● महादेवी और बच्चन ने जो परंपरा चलाई वह जनता को अब भी पसंद है। वही परंपरा नीरज, त्यागी, वीरेंद्र, राही आदि कवियों के भीतर से अपना प्रसार कर रही है।

● बच्चन तक हिंदी गीतों के छंद केवल हिंदी के छंद से लगते थे, अब वे उर्दू के पास पहुँच रहे हैं। भाषा भी इन गीतों की हिंदुस्तानी रूप ले रही है। कहाँ है हिंदी में रिवाइवलिज़्म? यह तो रिवाइवलिज़्म के ठीक विपरीत चलने वाली धारा है।

● तीसरी बात यह है कि जिस ओर से प्रयोगवादी कवि अपना नूतन प्रयोग कर रहे हैं, उसी ओर से इस पीढ़ी के अनेक नव कवि गीतों में अपना अंतर उंडेल रहे हैं। यह ठीक है कि नए आलोचकों ने अपनी आशा प्रयोगवाद से बाँध रखी है, किंतु, जनता का प्रेम आज भी इन गीतों पर ही बरस रहा है। (रामधारी सिंह दिनकर, भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ.6-7)।

रामावतार त्यागी के गीतों को ध्यान से पढ़ने पर यह बात स्पष्ट होती है कि वे दुनिया वालों को चुनौती दे रहे हैं। वे समाज के जटिल बंधनों को तोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। वे कहते हैं -

मैं तो तोड़ मोड़ के बंधन
अपने गाँव चला जाऊँगा
तुम आकर्षक संबंधों का,
आँचल बुनते रह जाओगे।

वस्तुतः हम सब प्रेम के दो पक्ष - वियोग और संयोग - के बारे में काफी पढ़ चुके हैं। मध्यकालीन कविताओं में इन दोनों रूपों को देख भी चुके हैं। पर प्रेम का एक और पक्ष है - विश्व शांति का। जिंदगी से प्रेम करने वाला व्यक्ति युद्ध का विरोध अवश्य करेगा, लेकिन जहाँ युद्ध अनिवार्य है वहाँ वह जरूर गुहार लगाएगा, जनता को चेताएगा यह कहकर कि ‘लेकिन युद्ध तो अनिवार्य है।’ रामावतार त्यागी का संवेदनशील हृदय उस जन-मानस के साथ है जो सबके लिए अन्न पैदा करता है, पर खुद दो जून रोटी के लिए कर्ज के तले दब जाता है। ‘किसान दिवस’ (23 दिसंबर) पर लिखी उनकी एक कविता का अंश देखें -

जुलूसों और नारों से।
प्रदर्शन या प्रचारों से,
न कोई देश जीता है,
सभाएँ बंद कर, चल खेत में या कारखानों में,
सिपाही के लिए कपड़े, जवानों के लिए रोटी,
सभाएँ बन नहीं सकती, लगी है जान की बाजी,
यह तो वक्त है कुछ काम कर, कुछ काम कर प्यारे,
विवादों को उठाने से,
न कोई देश जीता है

रामावतार त्यागी अपने अनूठे तेवर और अंदाज के लिए जाने जाते हैं। वे निराशा की स्थिति में भी आशा का संचार करवाना चाहते हैं। इसीलिए कह गए -

ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
इक हसरत थी कि आँचल का मुझे प्यार मिले
मैंने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले

रामावतार त्यागी के गीतों में उनके जीवन-दर्शन को भी देखा जा सकता है। इनके अलावा किसी और कवि या गीतकार यह कहने का साहस नहीं कर पाया कि

मुझको पैदा किया संसार में दो लाशों ने
और बर्बाद किया क़ौम के अय्याशों ने
तेरे दामन में बस मौत से ज़्यादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
जो भी तस्वीर बनाता हूँ बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

‘जिंदगी और तूफान’ फिल्म के गीत ‘ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है’ ने रामावतार त्यागी की प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए थे। कहा जाता है कि त्यागी ने इसके बाद फिल्मों के लिए गीत लिखना स्वीकार नहीं किया। फिक्र तौंसवी का यह कथन उल्लेखनीय है कि “त्यागी ने फिल्मी दुनिया को एक हसीन और दिलचस्प गीत देकर तलाक दे दिया। कहने लगा, हम शायर हैं भड़भूँजे नहीं है। और बंबई का फिल्म स्टार सौदागरों का स्टार है। वह गुड, बेसन, चीनी, मूँगफली और शायरी सबको मार्केट का माल समझते हैं। मैं अब कभी उधर का रुख नहीं करूँगा।” (सं. शेरजंग गर्ग, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ. 7)

कहने की जरूरत नहीं कि दर्द किसी भी व्यक्ति को इस तरह माँजता है कि वह औरों के दुख-दर्द को समझने में समर्थ हो जाता है। इतना ही नहीं, उसे उनकी पीड़ा के सामने अपनी पीड़ा बहुत छोटी नजर आती है-

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से
मैंने अकसर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है।
कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से
पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से
रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से
मैंने अकसर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥

आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने रामावतार त्यागी को ‘गीतों के राजकुमार’ कहकर संबोधित किया है। सच में वे गीतों के राजकुमार ही हैं। उन्होंने नए समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को पहचान लिया था -

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ;
मत बुझाओ!
जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी!

×××

मैं जहाँ धर दूँ क़दम वह राजपथ है;
मत मिटाओ!
पाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!

×××

मैं बहारों का अकेला वंशधर हूँ
मत सुखाओ!
मैं खिलूँगा, तब नई बगिया खिलेगी!

रामावतार त्यागी के गीतों के संबंध में रमेश गौड़ कहते हैं कि “त्यागी के गीत किसी व्यक्ति विशेष का विलाप न होकर पूरे समाज की आज की स्थिति को वाणी देते हैं। और जो लोग मुझसे सहमत नहीं हैं, उनसे अत्यंत विनम्र शब्दों में पूछना चाहता हूँ कि जब वह कहता है, ‘ठोकर सह बोलूँ नहीं इतना मुझे संयम न दो’ या ‘मेरे अधर न कम झुलसे हैं मेरी प्यास न हरगिज कम हैं’ तो क्या वह एक व्यक्ति के रूप में बोलता है?” (सं. शेरजंग गर्ग, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ.9)। सच भी है, उनके गीत व्यक्तिगत गाथा नहीं, बल्कि ‘जिंदगी निर्माण की जीवन-कथा है।’

रामावतार त्यागी के गीतों में मानव जीवन से जुड़े तमाम आयामों को देखा जा सकता है। एक ओर उनके गीतों में शहर का कोलाहल है तो दूसरी ओर गाँव की स्मृतियाँ -

तन बचाने चले थे कि मन खो गया
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया
घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही
और सब कुछ है वातावरण खो गया
यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया
गाँव का जो दिया था वचन खो गया

रामावतार त्यागी यह जानते हैं कि इस संसार में मनुष्य को भी बेजान वस्तु की तरह खरीदने की होड़ लगी हुई है। ऐसे में मनुष्य का ईमान डगमगाने लगेगा तो आश्चर्य की बात नहीं है। पर त्यागी जी कहते हैं -

दूकानों में होड़ लगी है
ईमानों को खरीदने की
रेगिस्तानों ने जिद पकड़ी
उद्यानों को खरीदने की
मेरे दर्पण को यदि संभव हो तो खंड खंड कर डालो
लेकिन मैं तन की इच्छा पर मन का नियम नहीं बेचूँगा।

त्यागी जी के गीतों में जहाँ एक ओर पर-दुख कातरता है, मनुष्यता है, संवेदनशीलता है, वहीं दूसरी ओर उनके गीतों में आस्था और जिजीविषा है। कवि का आत्मविश्वास यह कहने में संकोच नहीं करता कि-

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाए अपनी ही नजर में
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए

त्यागी जी की कविताओं में जीवन संघर्ष के साथ-साथ भ्रष्ट तंत्र के प्रति विद्रोह भी मुखरित है। जहाँ मानव विरोधी शक्तियाँ प्रबल होती जा रही हैं वहाँ गीतकार बेईमान समय के सामने अपना अहं नहीं बेचना चाहता और दृढ़ संकल्प लेता है, यह कहकर कि-

मेरे सपनों को सूली पर लटका दो तुम बड़ी खुशी से
पर मैं बेईमान समय को अपना अहं नहीं बेचूँगा।

×××

सूनी काल कोठारी में ही सारी उम्र बिता दूँगा
लेकिन किसी मोह को अपने कवि का धरम नहीं बेचूँगा।

समाज में चारों ओर व्याप्त विसंगतियों और विद्रूपताओं को देखकर रामावतार त्यागी आक्रोश से भर उठते हैं और घोषित करते हैं -

देश के समुद्र में बूँद-बूँद डाल दो
दुश्मनों को देश की जमीन से निकाल दो
तेज और भाइयो तेज करो आग को
आंधियाँ न सोख लें देश के चिराग को
भाल से खरोंच दो स्याह-स्याह दाग को
नाच-नाच युद्ध में झूम-झूम ताल दो,
दुश्मनों को देश की जमीन से निकाल दो

मानव मन की गहन अनुभूतियों को गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाले रामावतार त्यागी जिजीविषा और आस्था के कवि हैं। वे आत्मविश्वास के साथ मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध रहे और आजीवन एक ऐसे इंसान की तलाश करते रहे जो-

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

कहना ही होगा कि रामावतार त्यागी आस्था, जिजीविषा, संवेदना, स्वाभिमान, देशप्रेम, मानवीय गंध की प्यास, मूल्य, गाँव, शहर, प्रेम, विरह, पीड़ा, संघर्ष, रूढ़िवादी मानसिकता के प्रति विद्रोह आदि सुंदर मानकों को गीत-माला में पिरोने वाले रचनाकार हैं। समझौतों के शहर में रहने के बावजूद उन्होंने अपने अंदर गाँव को जीवित रखा। वे भाग्य पर नहीं, कर्म पर विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार ‘बनाने के लिए हमने स्वयं किस्मत बनाई है’ और इस राह में ‘विफलता मात्र पूँजी है, निराशा ही कमाई है’ तथा ‘जलन से दोस्ती है’ और ‘उलझनों से आशनाई’। उनकी लड़ाई किसी और से नहीं बल्कि अपने अस्तित्व से ही है। उनका कवि मन न विरोधों की चिंता करता है और न ही बाधा के पग पर शीश धरता है। वह उन हमदर्दों से डरता है जो पीठ पीछे वार करता है। साफ दिखाई देने वाले शूलों से भयभीत नहीं है, पर ‘फूलों की उत्कंठित मुसकानों से डरता’ है; ‘राम के तन से मिट्टी नोचकर रावण की मूर्ति गढ़ने वालों’ से डरता है! ‘दर्द तो वह अनमोल धन है, जो सबके भाग्य में नहीं होता।’ त्यागी जी ऐसे दर्द को गले लगाते हैं जो इंसान को इंसान बनाए रखने में सहायक हो। वे बार-बार यह कहते हैं कि-

पूरी तरह टूटे बिना
दुख का मजा आता नहीं
आधी तड़प से गीत भी
पूरा लिखा जाता है।

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संदर्भ ग्रंथ

1. त्यागी, रामावतार (1958 प्रथम आवृत्ति). आठवाँ स्वर. दिल्ली : फ्रैंक ब्रदर्स एंड कंपनी

2. त्यागी, रामावतार (1959). मैं दिल्ली हूँ. दिल्ली : साहित्य संस्थान

3. त्यागी, रामावतार (1986 ). गीत बोलते हैं. दिल्ली : आत्माराम एंड संस

4. सं. गर्ग, शेरजंग (2006). हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी. नई दिल्ली : वाणी

5. प्र. सं. शर्मा, रामविलास (फरवरी 1959). समालोचक. द्वितीय वर्ष. अंक 1. जयपुर

मंगलवार, 19 जुलाई 2022

संपादकीय... साहित्य सृजन की समकालीनता

साहित्य सृजन की समकालीनता (ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ) 
 संपादन : डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
2022 
नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन 
ISBN : 978-81-7965-343-2

यों तो अमरत्व मनुष्य की चिरकालिक अभिलाषा है तथा मानव संस्कृति के विकास की तमाम यात्रा देश और काल की सीमाओं के पार जाने की इसी इच्छा का परिणाम है, लेकिन इस इच्छा की सिद्धि कोई भी व्यक्ति अथवा समाज अपने देशकाल से बद्ध और विद्ध हुए बिना शायद ही कर पाया हो । साहित्य सहित समस्त सृजनात्मक गतिविधियाँ काल के बीच से होकर ही उसके पार जाती हैं। इसका अर्थ है कि कालजयी होने से पहले किसी भी साहित्यकार और साहित्यिक कृति को समकाल की कसौटी पर खरा उतरना होता है। साहित्य-सृजन समकाल की सिद्धि के द्वारा अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। इसी में उसकी कृतार्थता और चरितार्थता निहित है। अतः समकालीनता वह प्रक्षेपण बिंदु है, जहाँ से कोई रचना कालमुक्त होने की दिशा में उड़ान भरती है। हमारा तो विचार है कि अमर और कालजयी होने की चिंता ही नहीं की जानी चाहिए- कभी कहीं कोई समानधर्मा मिलेगा तो रचना अपनी उत्तरजीविता सिद्ध करेगी ही! देखने वाली असली बात तो यही है कि अपने समय में किसी रचना और रचनाकार ने अपनी ज़िम्मेदारी किस हद तक निभाई और अपने देशकाल को कौन-सी दिशा देने का प्रयास किया।

बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी के संधिकाल में सृजनरत और इस ग्रंथ 'साहित्य सृजन की समकालीनता' के चरितनायक ईश्वर करुण समकालीनता की कसौटी पर खरे उतरने वाले रचनाकार हैं। इस ग्रंथ में उनके मित्रों, हितैषियों, पाठकों, समीक्षकों और प्रशंसकों ने अपने-अपने ढंग से उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, सेवा और प्रदेय का खुलासा और मूल्यांकन किया है। हमें विश्वास है कि यह ग्रंथ ईश्वर करुण के बहुआयामी साहित्यिक योगदान से हिंदी के व्यापक जगत को अवगत करा सकेगा और हिंदी साहित्य के इतिहास में उनके नाम को सही स्थान पर दर्ज कराने में सफल होगा।

इस ग्रंथ की प्रारंभिक योजना से लेकर वर्तमान रूप में प्रस्तुतीकरण तक अनेक मित्रों का भरपूर सारस्वत सहयोग और आशीष प्राप्त हुआ। इस हेतु सभी सम्मिलित रचनाकारों के प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। स्वयं चरितनायक ने हमारे आग्रह पर कृपापूर्वक बहुत सारी सामग्री उपलब्ध कराई, जिसके लिए धन्यवाद काफी छोटा शब्द है। ग्रंथ की सीमा के कारण काफी सामग्री को हम चाहकर भी शामिल नहीं कर सके। इसका मलाल तो है, पर यह उम्मीद भी है कि वह भी किसी अन्य ग्रंथ के रूप में भविष्य में पाठकों के सामने अवश्य आ सकेगी।

इस महत्वाकांक्षापूर्ण, अत्यंत उपादेय और पूर्णतः प्रासंगिक ग्रंथ को सुरुचिपूर्ण ढंग से, अत्यंत कम समय के भीतर, प्रकाशित करने के लिए तक्षशिला प्रकाशन, विशेष रूप से प्रिय बंधु कमल विष्ट बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं। प्रेम बना रहे !

-संपादकद्वय


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

और जितने दीप हैं, मैं सभी में हूँ!




[1]

                                        “मैं चला नजीबाबाद -
                                        नसीबाबाद समझकर आया
                                        सर्वत्र प्रेम ही पाया
                                        'गर मिलता भी है गरल
                                        उसे जगदीश निगल जाते हैं।” 
                                                                (प्रेमचंद्र जैन, गरल जगदीश निगल जाते हैं)।

सच में नजीबाबाद धन्य है। धन्य क्यों नहीं होगा, उसने ‘गुरु जी’ का असीम प्रेम जो पाया! ‘गुरु जी’! हाँ, इसी नाम से जाने जाते हैं डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी - मेरे गुरु के गुरु के गुरु। इस अर्थ में वे मेरे परदादा गुरु हुए। इस गुरु-शिष्य परंपरा के कारण ही मुझे परदादा गुरु का अहेतुक स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

जब 2015 में गुरु जी के सम्मान में ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ ग्रंथ की तैयारी हो रही थी, तो मुझे भी उस सारस्वत यज्ञ में गिलहरी के समान सहयोग करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2016 में जब ग्रंथ प्रकाशित होकर आया, तो उन्हें समर्पित करने का निश्चय किया गया था। 3 दिसंबर, 2016 को अभिनंदन समारोह का आयोजन दिल्ली में हुआ था। सुबह 8 बजे दिल्ली पहुँचना था। लेकिन मेरा भाग्य का खेल कि गाड़ी रात को 8 बजे दिल्ली स्टेशन पहुँची। मैं विचलित होती रही कि गुरु जी से मिले बिना ही मुझे वापस लौटना पड़ेगा। लेकिन देवराज जी और ऋषभदेव शर्मा जी ने मुझे हिम्मत नहीं हारने दी। जब आयोजन स्थल पहुँची तो देखा, गद्दी बिछे हुए मंच पर गुरु जी शांत मुद्रा में बैठे हुए थे, लेकिन चेहरे पर थोड़ी सी परेशानी दिखाई दी। मेरे कारण गुरु जी को परेशानी जो झेलनी पड़ी। पहली बार गुरु जी का साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ। (अखण्डमण्डलाकारम् व्याप्तम् येन चराचरम्। तत्पदम् दर्शितम् येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥)

गुरु जी का भरपूर आशीर्वाद बटोरकर मैं वापस हैदराबाद लौटी। उसके बाद से समय-समय पर गुरु जी से फोन पर बात हो ही जाती थी। त्योहार के दिन तो गुरु जी के फोन से नींद खुलती थी। उनके आशीर्वाद और स्नेह की वर्षा में मैं भीग चुकी हूँ। (कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आइ।/ अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराइ।) आज भले ही गुरु जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आत्मा हमारे साथ है और हमें असीसती रहती है। पग-पग पर उनकी उपस्थिति का अहसास होता है, क्योंकि गुरु जी के साथ आत्मिक रिश्ता जो बन गया था- जो अटूट है। गुरु जी के शब्दों में कहूँ तो -
                    ‘भावनाओं से जुड़ा प्रेम
                    अटूट होता है’ (प्रेमचंद्र जैन, प्रेम)

[2]

प्रेम के पीर

डॉ. प्रेमचंद्र जैन स्वाभिमानी, कर्मठ और अदम्य साहसी थे। उनके स्वभाव के संबंध में डॉ. देवराज का यह कथन उल्लेखनीय है- “स्वभाव से खिलंदड़ और हँसोड़।” (शर्मा:2016:61)। नित्यानंद मैठाणी कहते हैं कि शरीर से तो वे दुबले-पतले थे किंतु उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि सभी उनसे डरते थे। उनसे एक बार यदि कोई मिलते तो उन्हें आजीवन भूल नहीं सकते। ऐसे थे गुरु जी। अपरिचित व्यक्ति से भी ऐसे मिलते जैसे उन्हें बरसों से जानते हों। उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता और वत्सलता के संगम को देखा जा सकता है। उन्हें यदि प्रेम का 'पीर’ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं।

जैन परंपरा के मर्मज्ञ विद्वान थे डॉ. प्रेमचंद्र जैन। जैन धर्म अपनी मान्यताओं, स्थापनाओं, कर्मकांड और रूढ़ियों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन वे इस धर्म में घुस आए पाखंडों और रूढ़ियों का खुलकर विरोध करते थे। इतना ही नहीं, वे जैन लोगों के जीवन में जमी कुरीतियों की धज्जियाँ भी उड़ाते थे। वे धर्म को लोकहित-कारक के अर्थ में स्वीकारते थे। उनके अनुसार धर्म कर्तव्य है। वे बार-बार यही कहते थे कि “धर्म का लोकहित-कारक अर्थ ‘कर्तव्य’ को ही स्वीकार करना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम-ईसाई आदि संप्रदाय या मत मानने से विवादों को विराम देने का मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। मेरा इसी प्रकार का विश्वास है। कर्तव्य और धर्म शब्द प्रायः एक ही संदर्भ में प्रयुक्त करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।... मैं अपने अनुभव के आधार पर कहूँगा कि वर्तमान में धर्म और कर्तव्य की व्याख्या ही बदल गई। इसी के कारण व्यक्ति अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति घनघोर उपेक्षा के लिए लेशमात्र शर्मसार होने को तैयार नहीं है।” (शर्मा:2016:406)

प्रेमचंद्र जैन जीवन भर ढाई आखर प्रेम को ही महत्व देते रहे। उनके अनुसार “प्रेम सदैव अनुभूति परक रहा है, अतएव प्रेम को किसी परिभाषा के घेरे में अनुकूलित नहीं किया जा सकता। प्रेम मानव-स्वभाव की ही संपत्ति हो ऐसी बात नहीं है। वह तो पशु-पक्षियों में भी विद्यमान है और यदि प्रेम की सत्ता को प्राणिमात्र में भी स्वीकार किया जाए तो वह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।” (शर्मा:2016:139)। उनके अनुसार जिस व्यक्ति में प्रेम की पीर जागृत हो गई, उसका जीवन सार्थक है। वे भावनाओं से जुड़े हुए प्रेम को ही महत्व देते थे।

डॉ. प्रेमचंद्र जैन मानवता के पक्षधर थे। धर्म और संप्रदाय के कटघरे में वे फिट ही नहीं होते। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। वे सही अर्थों में सामाजिक थे। उनके गुणों के बारे में उन्हीं के शब्दों से जान लें - “ज़मीन का आदमी था, समाज से जुड़ा था। तमाम सारे छात्र-छात्राओं की समस्याएँ, उनके निदान और दूर करने के उपाय; विविध शैक्षणिक सामाजिक संस्थाओं में होने वाले समारोहों-आयोजनों में शिरकत करने के लिए; अपने अध्ययन-अध्यापन के उत्तरदायित्व को मनसा-वाचा-कर्मणा निभाते हुए समय देना - हर किसी के लिए संभव नहीं होता। मुझमें इसी प्रकार के बहुचर्चित गुण-दोष थे।” (शर्मा:2016:404)। अपने इन्हीं गुण-दोषों के कारण वे अपने विद्यार्थियों और नजीबाबाद वासियों के निकट थे और उन्हें बहुत प्रिय थे। नजीबाबाद में न ही उनका जन्म हुआ और न ही शिक्षा-दीक्षा। यह तो उनकी कर्मभूमि थी। लेकिन वे नजीबाबाद के ही होकर रह गए - उनका काबा और काशी यही नजीबाबाद था। उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि “यहाँ मेरे बस जाने या रुक जाने के निजी कारण हैं और पूर्णतः स्वांतः सुखाय हैं।” (शर्मा:2016:406)

[3]

सदैव तत्परता

डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें अदम्य जिजीविषा और कुछ करके दिखाने की भरपूर इच्छा शक्ति थी। यह बात उनके गुरु डॉ. शिवप्रसाद सिंह के कुछ पत्रों से भी स्पष्ट होती है- “तुम संकल्प को यथासमय सही ढंग से पूरा करने में सदैव तत्पर रहे हो।” (शर्मा:2016:330)। प्रेमचंद्र जैन कहते तो कुछ नहीं, बल्कि करके अवश्य दिखा देते थे। वे बहुत ही साहसी थे। वे जो कार्य हाथ में लेते थे, उसे पूरा करने तक दिन-रात एक कर देते थे। शिवप्रसाद सिंह के अभिनंदन ग्रंथ के लिए आलेख संग्रहीत करते समय उन्हें बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा। गुरु अपने शिष्य को परेशान होते नहीं देख सकते, इसीलिए शायद शिवप्रसाद सिंह ने उन्हें एक पत्र (8.8.88) लिखा था- “तुम इतना अस्वस्थ रहते हुए भी शिवप्रसाद नामक व्यक्ति के लिए क्यों छटपटा रहे हो? क्या किया शिवप्रसाद सिंह ने? पूरी ज़िंदगी बस एक अपढ़ गँवार व्यक्ति के अनुभव ही तो मिले- वह भी सिर्फ उन्हें जो अपने को पाठक कहते हैं।” (शर्मा:2016:331)। लेकिन प्रेमचंद्र जैन जिद्दी भी कम नहीं थे। उसी जिद के परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य जगत को शिवप्रसाद सिंह का अभिनंदन ग्रंथ ‘बीहड़ पथ के यात्री’ प्राप्त हुआ। (जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू। - मानस)

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गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई

प्रेमचंद्र जैन शिष्य वत्सल गुरु थे। माता-पिता से प्राप्त सुलभ संस्कारों के साथ-साथ गुरुजनों द्वारा प्रदत्त ज्ञानराशि से वे आजीवन बँधे रहे। उन्होंने स्वयं यह स्वीकृत और घोषित किया कि “गुरुवर डॉ. शिवप्रसाद सिंह और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व के नैकट्य से जो मूल मंत्र ग्रहण किए थे, वे मेरे अंतिम समय तक साथ रहेंगे।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रों में एक मूल मंत्र है- “अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता, तब तक स्वार्थ खंड सत्य है, मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहृत हो गया है, उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देखा पाता, वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रपूत वाक्यों से प्रेमचंद्र जैन हमेशा ही सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने की शक्ति प्राप्त करते रहे। इसीलिए शिष्यों के लिए दलित द्राक्षा की तरह अपने आपको निचोड़कर प्रस्तुत कर सके। वे शिक्षकों से यह प्रश्न करते थे कि “यदि वे स्वयं गहन अध्ययन पूर्वक कृपणता और पक्षपातयुक्त व्यवहार छोड़कर अपने उत्तरदायित्व का ईमानदारी से पालन करेंगे तो उन्हें उनके कार्य में क्यों बाधा आएगी?” (शर्मा:2016:407)। उनका मानना था कि शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच शिष्टाचार के मर्यादित आचरण के अतिरिक्त अन्य दूरियाँ नहीं होनी चाहिए। तभी एक स्वस्थ परंपरा पनपेगी।

प्रेमचंद्र जैन की कथनी और करनी में कहीं कोई अंतर नहीं दीखता। अपने शिष्यों के लिए वे कैसे गुरु थे, यह तो उन लोगों के वक्तव्यों से ही जाना जा सकता है। “गुरु जी के अध्यापन के समय कक्षा का वातावरण कभी बोझिल या उबाऊ नहीं रहता था। विषय को इतना रोचक बना देते थे कि कोई छात्र विषय से भटक नहीं सकता था। ... सारा ज्ञान छात्रों के मस्तिष्क में उड़ेलने का प्रयत्न करते थे और छात्र भी पूरे मनोयोग के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। छात्र दूसरे अध्यापकों की कक्षा अवश्य छोड़ देते थे किंतु गुरु जी की कक्षा छोड़ने का दुःसाहस कभी नहीं करते थे। दूसरी कक्षा के छात्र भी गुरु जी की कक्षा में बैठने का प्रयास करते थे।” (डॉ. निर्मल शर्मा)। “मैंने गुरु जी को कभी गुरु जी नहीं कहा, एक इकलौती शिष्या मैं ही हूँ, जिसने हमेशा उन्हें अंकल कहा।” (डॉ. हेमलता राठौर)। देवराज जी और गुरु जी तो हमेशा एक साथ ही पाए जाते थे। “नजीबाबाद के लोग बरसों यह विश्वास करते हुए रहे कि देवराज का पता करना है, तो गुरु जी से पूछो और गुरु जी के बारे में कुछ जानना है, तो देवराज से पूछो।” प्रेमचंद्र जैन की इस शिष्य वत्सलता को गुरु मंत्र की तरह डॉ. देवराज जैसे उनके शिष्यों ने भी अर्जित किया है। (गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥)

प्रेमचंद्र जैन माता-पिता और गुरुओं से प्राप्त संस्कारों का पालन आजीवन करते रहे। वे भविष्य की चिंता नहीं करते थे। शिष्यों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त गुरु के पास भविष्य के संबंध में सोचने का अवसर कहाँ होता! “अध्यापन में भी तीनों कालों में वर्तमान को सँवारने के लिए अधिकतम क्षमताओं का उपयोग करने पर बल दिया। मजबूत नींव, भूतकाल में तलाशने के बाद ही वर्तमान पर ध्यान केंद्रित कर लिया जाए तो भविष्य की चिंताओं को लादे रखना बुद्धिमत्ता नहीं है।” (शर्मा:2016:404)। यह उनकी दृढ़ मान्यता थी।

[5]

चश्म नम हैं मुफ़लिसों को देखकर

प्रेमचंद्र जैन परिवार और रिश्तों को महत्व देते थे। उनकी मान्यता है कि जब व्यक्ति आत्मिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं तो किसी भी तरह की समस्याएँ नहीं होतीं। एक समय ऐसा था जब भारत भर में संयुक्त परिवार की परंपरा को सामाजिक मान्यता मिली थी। लेकिन “अब उसके समाप्तप्राय हो जाने से पारिवारिक, कौटुंबिक, यहाँ तक कि वैयक्तिक समस्याएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। उधार ली गई व्यक्तिवादी संस्कृति स्वार्थपरता, असहिष्णुता, हिंसा तथा पाशविक आचरण को बढ़ावा देने में सहायक ही हुई है।” (शर्मा:2016:405)।

व्यक्ति स्वार्थलोलुप होता जा रहा है। मोह-माया में पड़कर इतना अंधा होता जा रहा है कि वह सही और गलत की पहचान ही नहीं कर पा रहा है। काला धन, चोर बाजारी, रिश्वत, महंगाई, बलात्कारियों की दुनिया है चारों ओर। प्रेमचंद्र जैन इस दुनिया को छोड़ आने की बात करते हैं। आदमी को आदमी की तरह जीने पर बल देते हैं। उनका मन विद्रूपताओं को देखकर व्यथित हो जाता है। उनकी दृष्टि में कोई हिंदू-मुस्लिम-ईसाई-जैन नहीं है, बल्कि सब केवल मनुष्य हैं। जब इन पर विपत्ति आती है, तो उनका मन द्रवित हो जाता है। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद जब अयोध्या में मंदिर तोड़ने की अघटनीय घटना हुई, तब नजीबाबाद में भी नाजुक स्थितियाँ पैदा हुईं। गुरु जी ने अपनी सूझबूझ से वहाँ शांति का वातावरण कायम किया। “फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को अहसास हो गया कि इस नगर में दंगा करवाना आसान काम नहीं है। .... नजीबाबाद हिंदू- मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों की आग में बरबाद होने से बच गया।” (शर्मा:2016:66)। वे आदमी को इनसान के रूप में बदलने के लिए आग्रह करते हैं। हैवानियत छोड़कर इनसानियत को अपनाने की अपील करते हैं। (शर्मा:2016:127)

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इष्ट फल

डॉ. प्रेमचंद्र जैन अपने दायित्व को बखूबी जानते थे। उन्होंने न ही अपने दायित्वों से मुँह मोड़ा और न ही पलायन का रास्ता अपनाया। शिक्षक- शिक्षार्थियों के बिगड़ते रिश्तों के बात जब आती, तो वे डंके की चोट पर कहते थे कि “हम सबको मिलकर इन परिवर्तनों पर गंभीरता से सोचने- विचारने और चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही जागरूक होना और जागरूक करना है। अब भी बिगड़ा कुछ नहीं है। अलबत्ता अपनी- अपनी स्वार्थपरता एवं प्रलोभन का नियंत्रण करना है। अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत दायित्वों को ईमानदारी से निभाने की आवश्यकता है। हमें राष्ट्रीय भावनाओं को शून्य होते देख वेदना होनी चाहिए और एक नागरिक के कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक का आपसी संबंध निकटता का रहेगा और वे अपने- अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहेंगे तो समस्याएँ स्वतः नज़र नहीं आएँगी। निःसंदेह शिक्षकों का उत्तरदायितव अपेक्षाकृत बड़ा है। प्रथमतः उन्हें कर्तव्यनिष्ठ, कर्मठ एवं सच्चरित्र होने की अनिवार्यता है।” (शर्मा:2016:434)। यदि कहीं भी कभी भी एक शिक्षक दुराचार में लिप्त पकड़ा जाएगा, तो समाज की निगाहें संपूर्ण शिक्षक जगत पर ही उठती हैं।

साहित्यकारों के दायित्व के संबंध में भी प्रेमचंद्र जैन का यह कथन उल्लेखनीय है कि 'जो उपेक्षित है, वह साहित्य का विषय होना ही चाहिए।' उनकी मान्यता थी कि “संवेदना ही कविता की जननी है। अपनी रचना को कवि संतानवत सँवारता, दुलारता और सहेजता है। न केवल इतना ही बल्कि उन्हें संरक्षित करना भी निजधर्म मानता है।” (शर्मा:2016:389)। शोषक की व्यथा से शोषित की व्यथा भिन्न और विकट होती है। इसलिए प्रेमचंद्र जैन सहृदयों से यह अपील करते हैं कि “इसी विकटता का, दो टूक उत्तर - / साहित्यकार का दायित्व है।” (प्रेमचंद्र जैन, अहसास)।

संवेदनाओं के अभाव में तो रचनाएँ जन्म ले ही नहीं सकतीं। संवेदना से ही साहित्यकार का अनुभूति कोश समृद्ध होगा। प्रेमचंद्र जैन का अनुभूति कोश बहुत समृद्ध था। वे कोरे भाग्यवाद में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी माँ की सीख उनके साथ चलती थी- ‘होकर सुख में मगन न फूले, दुख में कभी न घबरावे।’ वे अकेले चलते गए और लोग उनके साथ चलते गए और कारवां बनता गया -
                    आएगा सवेरा
                    अब नहीं हूँ मैं अकेला
                    और जितने दीप हैं
                     मैं सभी में हूँ
                    पी रहा हूँ सब अँधेरा
                    थको तुम मत मीत
                    मृत्यु से भयभीत
                    अमरत्व की श्रम की -
                    सदा ही जीत। 
                                    (नेह बाती चुक रही है)

‘गुरु जी’ अपने गुरु शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्राप्त गुरुमंत्र को हमें विरासत में दे गए- “चिंताएँ छोड़कर नियति से लड़ो ... लड़ना ही धर्म है। सारा जीवन बन जाए युद्ध। ... तभी मृत्यु का भय भाग जाता है।” 000

संदर्भ ग्रंथ-
  • शर्मा, ऋषभदेव सं. (2016). निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक. नजीबाबाद : परिलेख

द्रष्टव्य: इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 159-167.


बुधवार, 6 अप्रैल 2022

युद्ध के विरुद्ध 'तीसरी दुनिया'

आम तौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को विकास के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँट कर देखने का चलन रहा है - पहली विकसित, दूसरी विकासशील और तीसरी अविकसित। इसके अलावा 1990 से पहले तक दुनिया के दो शक्ति केंद्र थे - पूँजीवादी और साम्यवादी। गुट निरपेक्ष देश तीसरी दुनिया कहे जाते थे। लेकिन इन सब बातों से अनंत काबरा के ‘तीसरी दुनिया’ शीर्षक विवेच्य काव्य संग्रह की कविताओं को समझने में कोई खास सहायता नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि कविताएँ रची जाने के बाद संग्रह के नामकरण को तर्कसंगत दिखाने के लिए एक दार्शनिक भूमिका जोड़ दी गई। जिसका सार यह है कि इस संग्रह की कविताओं के केंद्र में ‘युद्ध’ है। इस सार का प्रसार ही कवि की ‘तीसरी दुनिया’ का अभिप्राय है। इससे पहले कि इस संग्रह की कविताओं पर आगे विचार किया जाए, यह कहना जरूरी है कि रूस के यूक्रेन पर हमले ने जिस तरह पूरी दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने लाकर खड़ा कर दिया है, उसे देखते हुए ‘तीसरी दुनिया’ की ये युद्ध केंद्रित कविताएँ आज बेहद प्रासंगिक प्रतीत होती हैं, भले ही इनका प्रकाशन 1988 में हुआ हो। किसी रचना और रचनाकार की रचनाधर्मिता की कसौटी यही है कि वह अपने रचना-काल के बाद भी प्रासंगिक रहे। इस दृष्टि से कवि अनंत काबरा जी के इस संग्रह की कविताएँ देश-काल का अतिक्रमण करने वाली सार्थक कविताएँ सिद्ध होती हैं। उदाहरण स्वरूप हम कुछ कविताएँ देखेंगे।

इतिहास के पन्नों को पलटने से स्पष्ट होता है कि अनादिकाल से युद्ध की विभीषिका चलती आ रही है। युद्ध के बाद चारों ओर विनाश के अलावा कुछ नहीं बचता। हर नया युद्ध विगत युद्ध से भयंकर होता है। परिणाम भी उसी तरह अधिक घातक होते हैं।

कवि यह बार-बार कहते हैं कि युद्ध के आग्रह ने असंतोष का बीज बो दिया है। खुशहाल धरती बंजर बन गई है। चारों ओर कंकाल ही कंकाल नज़र आते हैं। विश्व में जितने भी युद्ध हुए हों, हार तो इंसान की ही हुई है। कवि कहते हैं -
पचास वर्ष पूर्व का आदमी
असमंजस है! आज (तीसरी दुनिया, पृ.23)

युद्ध की यह विभीषिका संपूर्ण मानव जाति को नष्ट कर देगी। विश्व के नक्शे से कुछ देश गायब भी हो सकते हैं। इस संदर्भ में कवि कहते हैं कि -
विश्व के नक्शे पर से
कर जाएँगे कई हाशिये देश -
समर्पण की कई करुण संवेदनाएँ
घिरा देंगी
विश्व को दुखों के बादलों से
विकृति संघर्ष का संशय
फँस जाएगा युद्धों के दलदल में - (पृ. 20)

युद्ध के इस नृशंस तांडव के बाद मनुष्य भयभीत होकर दौड़ रहा है। मौत का डर उसे निगल रहा है। अपने अंदर की मानवता का गला घोंटकर वह नरसंहार कर रहा है। उसके लिए रिश्ते-नाते कोई मायने नहीं रखते। वह तो ‘पत्थर की मूर्ति’ बन बैठा है। कहीं कोई संवेदना नहीं बची है। वह ‘अविश्वास और तनाव भरे परिवेश’ में जी रहा है। ऐसे में कवि दम तोड़ती संवेदनाओं को बचाने की बात करते हैं -
संवेदना के सोपान
जिस उफनती नदी में
नाव पर सवार हैं
काश!
बच जाए वह
तभी तो
मेरे अधूरी इच्छा की तस्वीर
भर पाएगी। (पृ. 16)

यह सच है कि भयंकर विनाश के बाद भी कुछ देश अपने पूर्व वैभव को वापस निर्मित कर पाए। वैज्ञानिक प्रगति कर पाए। पर तीसरी दुनिया के उस प्राणी की स्थिति क्या है जो ‘हर पल जान हथेली पर लेकर सड़क के चौराहों पर घूम रहा है’ -
औद्योगिक वायु प्रदूषणों की गंध
साँसों में समेटा जा रहा है
तीसरी दुनिया में (पृ. 27)

इन कविताओं के माध्यम से कवि-मन यह प्रश्न उठा रहा है कि हम भावी पीढ़ी को कैसा वातावरण प्रदान कर रहे हैं? इन कविताओं में एक ओर ‘अणुबमों की खतरनाक होड़’ है तो दूसरी ओर ‘विषैला धुआँ’, ‘प्राणों का आर्तनाद’, ‘लाशों का ढेर’, ‘निराशा की बंदिश’, ‘हत्याओं का नृशंस दौर’, ‘शवों की सड़ांध’, ‘श्मशान बनते घर और बस्तियाँ’, ‘अत्याचार की वारदातें’, ‘संघर्ष का परिवेश’, ‘अभिलाषाओं की अर्थी’, ‘मौत की तनी हुई रस्सी’, ‘सांप्रदायिकता का विष’, ‘मानसिक कुंठाएँ’, ‘षड्यंत्र का स्रोत’, ‘गलतफहमियों की पगडंडी’, ‘सर्वत्र जीवन का आतंक’ द्रष्टव्य है। क्या ऐसा कोई देश है जहाँ युद्ध न लड़ा गया हो? क्या ऐसा कोई देश है जहाँ अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग न किया गया हो? क्या ऐसा कोई देश हैं जहाँ बच्चे सुरक्षित हों? ऐसे वातावरण में जन्म लेने के लिए भी बच्चा डर जाएगा।

कवि कहते हैं कि हथियारों के साथ-साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी विस्फोटक हो गया है। ‘दिमाग में फैलती जा रही है/ उस शव की बदबू/ जो बंद कमरे में/ कब मरा पता तक नहीं/ सड़ते विचार/ क्रियाकर्म के भी लायक नहीं।’ (पृ.112)

मेरा मानना है कि अनंत काबरा आस्था और सकारात्मकता के कवि हैं। वे इस विडंबना से भली भाँति परिचित हैं कि -
मनुष्य के अंतर्संबंध तोड़ने के लिए
युद्ध का होना जरूरी है (पृ.133)।

इसके बावजूद वे यही आशा करते हैं कि एक न एक दिन युद्ध की विकृतियाँ समाप्त हो जाएँगी और सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी। संवेदनशील कवि-मन युद्ध के भीषण उन्माद की परिस्थिति से मानव समाज को बचाना चाहता है; युद्ध को रोकना चाहता है। इसीलिए तो अनंत काबरा कहते हैं -
आगामी युद्ध रोका जा सकता है
भावी युद्ध टाला जा सकता है।
लेकिन हम रोकेंगे नहीं, टालेंगे नहीं,
पहुँचेंगे जब तक हम
किसी निश्चित निष्कर्ष पर
×××
युद्ध के बाद
जीवित होंगी
गर्भवतियाँ
अपंग बच्चों को जनने के लिए
पता नहीं -
कैसे जिएँगे वे आश्रयहीन बेचारे। (पृ.5)

इन कविताओं में सिर्फ युद्ध की विभीषिका ही नहीं, बल्कि शांत वातावरण में जीने की इच्छा को भी अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। 000

शनिवार, 1 जनवरी 2022

भारतीय संस्कृति का शीर्षासन


हिंदी साहित्य जगत में श्रीलाल शुक्ल और 'राग दरबारी' (1968) के एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि उन्होंने कुछ और लिखा ही नहीं। उन्होंने 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) को देखते-देखते कुछ दिनों तक 'अज्ञातवास' (1962) किया। उस समय उन्हें यह पता चला कि 'आदमी का जहर' (1972) क्या होता है तथा 'सीमाएँ टूटती हैं' (1973) तो घर केवल 'मकान' (1976) बन जाता है। 'पहला पड़ाव' (1987) के बारे में सोचते हुए जब 'बिस्रामपुर का संत' (1998) 'यहाँ से वहाँ' आगे बढ़ता है 'अगली शताब्दी का शहर' की खोज में तो उन्हें 'बब्बरसिंह और उसके साथी' (1999) मिल जाते हैं। तो वे सोचते हैं कि 'आओ बैठ लें कुछ देर'। जब 'राग-विराग' (2001) हो जाता है तो 'अंगद का पाँव' और 'कुंती देवी का झोला' लेकर 'उमराव नगर में कुछ दिन' 'मम्मीजी का गधा' 'कुछ जमीन पर कुछ हवा में' 'ख़बरों की जुगाली' करते हुए घूमता रहता है। 

अब 'राग दरबारी' पर हम थोड़ी सी चर्चा  करेंगे। 

1. पहले ‘राग दरबारी’ क्या है, यह देखें।

राग दरबारी तानसेन द्वारा बनाया हुआ राग है। तानसेन अकबर के दरबारी संगीतकार थे। शायद इसीलिए उनके बनाए हुए राग के साथ ‘दरबारी’ शब्द जुड़ गया। दरबार अर्थात राजा-महाराजा का दरबार। यह एक बहुत ही गंभीर राग है और इसे धीमी गति से गाया जाता है। संगीत के क्षेत्र में इसे बहुत ही कठिन राग माना जाता है। हर कोई इस राग में गा नहीं पाते। इसके लिए परिश्रम की आवश्यकता होती है। तेलुगु और तमिल भाषा की अनेक धार्मिक फिल्मों के गाने इसी राग में हैं। ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ फिल्म के टाइटल सॉन्ग का राग भी ‘दरबारी’ है।

2. यह तो हुई राग की चर्चा। अब हम श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ को भी देख लें।

इस उपन्यास का नाम तो ‘राग दरबारी’ है, लेकिन संगीत से इसका दूर-दूर तक भी कोई रिश्ता नहीं। तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि संगीत से कोई रिश्ता ही नहीं, तो इस उपन्यास का नामकरण राग दरबारी क्यों किया गया है?

इसका उत्तर हमें तभी मिलेगा जब हम ‘दरबार’ के बारे में जानेंगे। इस उपन्यास में चित्रित दरबार किसी राजा-महाराजा का नहीं है, बल्कि वैद्य जी का दरबार है। और वैद्य जी उस दरबार के सर्वेसर्वा है। उनकी आज्ञा के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता, क्योंकि वे गाँव की तमाम राजनीति के पीछे उपस्थित मास्टरमाइंड है। बहुत सोच समझकर तोल-तोल कर बात करने में माहिर हैं।

दरबारी राग धीमी गति से चलता है, लेकिन यह उपन्यास धीमी गति से नहीं चलता। श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्य का सहारा लेकर कथा को आगे बढ़ाया है। उपन्यास का शीर्षक भी दूसरा ही अर्थ देता है।

2010 में ‘उत्तर आधुनिकता और समकालीन विमर्श’ पर जब उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के हैदराबाद केंद्र में संगोष्ठी का आयोजन किया गया था, उस समय श्रद्धेय प्रो. गोपाल शर्मा जी ने देरिदा के अनेक सूत्र बताए थे। उसी प्रकार 2017 में ‘अँधेरे में : पुनर्पाठ’ शीर्षक पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा था, तो उन्होंने ‘अँधेरे में’ की जगत समीक्षा देरिदा की दृष्टि से की थी।

सहज शब्दों में कहना हो तो, देरिदाई सूत्रों में एक सूत्र है ‘सिर के बल खड़ा करना’। शीर्षासन करना। जब आप शीर्षासन करते हैं तो सिर जमीन पर टिका रहता है और पैर आसमान में लटकते रहते हैं। ज़रा कल्पना करके तो देखिए जब हम सब सिर के बल खड़े होंगे तो कैसा लगेगा। जी हाँ, विकृत लगेगा। श्रीलाल शुक्ल ने भारतीय संस्कृति को सिर के बल खड़ा कर दिया है अपने इस उपन्यास में।

भारतीय संस्कृति से मेरा अभिप्राय उन तमाम मूल्यों से है जो हमारे लिए आदर्श हैं। लेकिन आज ये मूल्य विकृत हो चुके हैं। इन विकृतियों से ही विडंबनाएँ पैदा होती हैं। इस उपन्यास में श्रीलाल शुक्ल ने इन विकृतियों को उजागर किया है, लेकिन व्यंग्य रूपी मिश्री की कोटिंग लगाकर। व्यंग्यकार सत्य की खोज नहीं, बल्कि झूठ और पाखंड की खोज करता है। व्यंग्य के टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुज़र कर ही व्यंग्यकार उन मूल्यों तक पहुँचता है, जो उत्कृष्ट साहित्य का अंतिम लक्ष्य हैं। इस उपन्यास के केंद्र में शिवपालगंज गाँव है और वैद्य जी का दरबार, जो पूरी तरह से छल और छद्म का अखाड़ा बना हुआ है। शिवपालगंज कोई गाँव नहीं है, यह तो भारतीय लोकतंत्र का प्रतीक है। व्यवस्था में निहित विकृतियों को कहे बिना श्रीलाल शुक्ल नहीं रह पाए। इन विकृतियों के एकाध उदाहरण देखें -

  • पहले के डाकू नदी-पहाड़ लाँघकर घर पर रुपया लेने आते थे, अब वे चाहते हैं कि कोई उन्हीं के घर जाकर रुपया दे आवे। (पृ. 16)
  • एक तो अछूतों के लिए चंदा कमाने की इमारत बनेगी। दूसरे, अस्पताल के लिए हैज़े का वार्ड बनेगा। वहाँ ज़मीन की कमी है। कॉलिज ही के आसपास टिप्पस से ये इमारतें बनवा लें ... फिर धीरे से हथिया लेंगे। (पृ.27)
आखिर यह कथा किसी शिवपालगंज की ही क्यों, किसी दिल्ली या किसी हैदराबाद की भी तो सकती है। लेकिन यदि ऐसा होता तो IAS या IPS या किसी उच्च अधिकारी या नेता को आलंबन बनाना पड़ता। लेखक को मालूम है कि व्यवस्था से लड़ने से कोई फायदा नहीं होगा, और तो और उल्टा लेने के देने पड़ सकते हैं। शायद इससे बचने के लिए ही श्रीलाल शुक्ल ने शिवपालगंज नामक एक काल्पनिक गाँव को गढ़ा और अपने समय की तमाम विकृतियों को उस पर आरोपित कर दिया। एक तरह से यह लेखकीय चतुराई है।