मंगलवार, 19 जुलाई 2022

संपादकीय... साहित्य सृजन की समकालीनता

साहित्य सृजन की समकालीनता (ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ) 
 संपादन : डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
2022 
नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन 
ISBN : 978-81-7965-343-2

यों तो अमरत्व मनुष्य की चिरकालिक अभिलाषा है तथा मानव संस्कृति के विकास की तमाम यात्रा देश और काल की सीमाओं के पार जाने की इसी इच्छा का परिणाम है, लेकिन इस इच्छा की सिद्धि कोई भी व्यक्ति अथवा समाज अपने देशकाल से बद्ध और विद्ध हुए बिना शायद ही कर पाया हो । साहित्य सहित समस्त सृजनात्मक गतिविधियाँ काल के बीच से होकर ही उसके पार जाती हैं। इसका अर्थ है कि कालजयी होने से पहले किसी भी साहित्यकार और साहित्यिक कृति को समकाल की कसौटी पर खरा उतरना होता है। साहित्य-सृजन समकाल की सिद्धि के द्वारा अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। इसी में उसकी कृतार्थता और चरितार्थता निहित है। अतः समकालीनता वह प्रक्षेपण बिंदु है, जहाँ से कोई रचना कालमुक्त होने की दिशा में उड़ान भरती है। हमारा तो विचार है कि अमर और कालजयी होने की चिंता ही नहीं की जानी चाहिए- कभी कहीं कोई समानधर्मा मिलेगा तो रचना अपनी उत्तरजीविता सिद्ध करेगी ही! देखने वाली असली बात तो यही है कि अपने समय में किसी रचना और रचनाकार ने अपनी ज़िम्मेदारी किस हद तक निभाई और अपने देशकाल को कौन-सी दिशा देने का प्रयास किया।

बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी के संधिकाल में सृजनरत और इस ग्रंथ 'साहित्य सृजन की समकालीनता' के चरितनायक ईश्वर करुण समकालीनता की कसौटी पर खरे उतरने वाले रचनाकार हैं। इस ग्रंथ में उनके मित्रों, हितैषियों, पाठकों, समीक्षकों और प्रशंसकों ने अपने-अपने ढंग से उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, सेवा और प्रदेय का खुलासा और मूल्यांकन किया है। हमें विश्वास है कि यह ग्रंथ ईश्वर करुण के बहुआयामी साहित्यिक योगदान से हिंदी के व्यापक जगत को अवगत करा सकेगा और हिंदी साहित्य के इतिहास में उनके नाम को सही स्थान पर दर्ज कराने में सफल होगा।

इस ग्रंथ की प्रारंभिक योजना से लेकर वर्तमान रूप में प्रस्तुतीकरण तक अनेक मित्रों का भरपूर सारस्वत सहयोग और आशीष प्राप्त हुआ। इस हेतु सभी सम्मिलित रचनाकारों के प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। स्वयं चरितनायक ने हमारे आग्रह पर कृपापूर्वक बहुत सारी सामग्री उपलब्ध कराई, जिसके लिए धन्यवाद काफी छोटा शब्द है। ग्रंथ की सीमा के कारण काफी सामग्री को हम चाहकर भी शामिल नहीं कर सके। इसका मलाल तो है, पर यह उम्मीद भी है कि वह भी किसी अन्य ग्रंथ के रूप में भविष्य में पाठकों के सामने अवश्य आ सकेगी।

इस महत्वाकांक्षापूर्ण, अत्यंत उपादेय और पूर्णतः प्रासंगिक ग्रंथ को सुरुचिपूर्ण ढंग से, अत्यंत कम समय के भीतर, प्रकाशित करने के लिए तक्षशिला प्रकाशन, विशेष रूप से प्रिय बंधु कमल विष्ट बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं। प्रेम बना रहे !

-संपादकद्वय