सोमवार, 1 नवंबर 2010

गुरुजाडा वेंकटअप्पाराव और कालजयी नाटक ‘कन्याशुल्कम्‌’



"देशमुनु प्रेमिंचुमन्ना,
मंचि यन्नदि पेंचुमन्ना।
वट्टि माटलु कट्टि बेट्टोया,
गट्टि मेल्‌ त‍लबेट्टवोया॥"
(देश से प्यार करो,/ अच्छाई को बढ़ाओ।/ झूठे आश्‍वासन देना बंद करो,/ आचरण करना सीखो।)

आधुनिक तेलुगु साहित्य में कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु के बाद कालजयी नाटक ‘कन्याशुल्कम्‌’ (कन्याशुल्क) के रचनाकार गुरुजाडा वेंकटअप्पाराव को युग प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्‍त कन्याशुल्क, बाल विवाह, वेश्‍यावृत्ती, सती प्रथा, अनमेल विवाह और वृद्ध विवाह जैसी सामाजिक विद्रूपताओं के उन्मूलन हेतु अपनी आवाज बुलंद की।

गुरजाड का जन्म 21 सितंबर, 1861 को विशाखपट्टनम जिले के रायवरम्‌ गाँव में हुआ। 1886 में विजयनगर महाराजा डिग्री कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्‍त की। तत्पश्‍चात्‌ उन्होंने विजयनगर डिप्टी कलेक्‍ट्रेट के कार्यालय में क्लर्क के रूप में कार्यभार संभाला। लेकिन उनकी रचनाशीलता और साहित्यिक प्रतिभा से अवगत विजयनगर साम्राज्य के संस्थानाधीश राजा आनंदगजपति ने विजयनगर कॉलेज में अंग्रेज़ी प्राध्यापक के रूप में उन्हें नियुक्‍त किया। गुरजाडा ने अध्यापक के रूप में भी विशेष ख्याति अर्जित की।

गुरजाडा के समय में आम जनता की स्थिति दयनीय थी। चारों ओर सामाजिक विसंगतियाँ विकराल रूप धारण किए हुए थीं। उन परिस्थितियों से उद्वेलित होकर उन्होंने ‘कन्याशुल्कम्‌’ नाटक का सृजन किया। इस नाटक को लिखने के पीछे निहित मूल उद्‍देश्‍य को उन्होंने स्वयं स्पष्‍ट किया है - "श्रीमान विजयनगर के महाराजा के आदेश पर विशाखपट्टनम के ब्राह्‍मण परिवारों में जितने विवाह हुए, उनकी तालिका दस वर्ष पहले तैयार की गई थी। संबंधित व्यक्‍ति कन्याशुल्क लेने की बात स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। इसलिए वह तालिका पूर्ण नहीं हुई। फिर भी, वह तालिका एक कीमती और दिलचस्प दस्तावेज बन गई। प्रमाणित विवाहों की संख्या 1084 तक पहुँच गई जिसका औसत प्रति वर्ष 344 पड़ता है। इनमें निन्यान्वे बालिकाएँ उम्र में पाचँ वर्ष की, 44 बालिकाएँ चार वर्ष की, 36 लड़कियाँ तीन वर्ष की, 6 लड़कियाँ दो वर्ष की और तीन लड़कियाँ एक वर्ष की थीं जब वे विवाह के सूत्र में बंध गईं। प्रत्येक के लिए रु.350/- से लेकर रु.400/- तक का मूल्य कन्याशुल्क के रूप में लिया गया। यह सुनकर आश्‍चर्य होगा कि कभी कभी गर्भस्थ शिशुओं के लिए भी मोल-तोल किया जाता था। यह निंदनीय है। समाज के लिए अपमानजनक है। ऐसी कुरीतियों की ओर इशारा करने और नैतिक आदर्शों का प्राचार करने से बढ़कर साहित्य का और कोई प्रयोजन नहीं है। साधारण जनता जब तक पढ़ी-लिखी नहीं होती, तब तक उसे प्रभावित करने के लिए रंगमंच को छोड़कर और कोई साधन नहीं है। इन्हीं विचारों ने मुझे ‘कन्याशुल्क’ नाटक लिखने की प्रेरणा दी।" (गुरजाडा वेंकटअप्पाराव, ‘कन्याशुल्कम्‌’, भूमिका (प्रथम संस्करण)

आधुनिक तेलुगु साहित्य के प्रथम दृश्‍य काव्य ‘कन्याशुल्कम्‌’ को गुरजाडा ने 1892 में लिखकर मंचित कराया था। 1897 में इसका प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ। 118 सालों के बाद भी तेलुगु साहित्यिक क्षेत्र में इस नाटक की लोकप्रियता अप्रतिम है। गुरजाडा ने इतिवृत्तात्मकता को तोड़कर बोलचाल की भाषा का जीवंत रूप अंकित किया है। इस संबंध में उन्होंने स्वयं कहा है कि "मैंने इस नाटक की रचना बोलचाल की भाषा में की। केवल इसलिए नहीं कि साहित्यिक भाषा की अपेक्षा सामान्य जनता की समझ में आएगी बल्कि इस विश्‍वास से कि यह तेलुगु में हास्यरस की शैली के लिए उपयुक्‍त है।... यह आक्षेप किया जाता है कि ग्राम्य भाषा का प्रयोग साहित्यिक रचना के गौरव का नाश कर डालता है। लेकिन यह ऐसी आलोचना है जिसकी ओर आजकल किसी को ध्यान देने की आवश्‍कता नहीं है। प्राचीन भाषाओं के वैयाकरणों की इच्छा-अनिच्छाओं को छोड़कर भाषाविज्ञान के विकास ने ग्राम्य भाषा की उपयोगिता को सही सिद्ध किया है।"(वही)

लेखक ने इस कालजयी नाटक की रचना तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप की हैं। इस संदर्भ में निडदवोलु वेंकटराव का कथन द्रष्‍टव्य है - "कन्याशुल्कम्‌ केवलम्‌ नाटकमे कदु, इदि तेलुगु प्रजला राजनैतिका, सामाजिका, सांस्कृतिका जीवितानिकी निलुवुटद्‍दम्‌। वर्तमाना समाजमुलो नाटुकुपोयिना सांघिका दुराचाराले काका स्वदेशी मरियु विदेशी संस्कृतला मध्या संघर्षनवल्ला उत्पन्नैमैना सामाजिक परिस्थितुला तो पाटु चरित्रनु निरूपिंचे निघंटुवु। सामान्य वाडुका भाषालो रचिंचिनंदुना ये पद्‍यमु व्यर्थमु कादु।" ((सं) आचार्य नागभूषण शर्मा, डॉ.एटुकूरी प्रसाद; कन्याशुल्कम्‌:नूरेल्ला समालोचना; पृ.782-783)। {‘कन्याशुल्कम्‌’ नाटक महज नाटक नहीं है, बल्कि वह तेलुगु जनता की राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का प्रतिबिंब है। वर्तमान समाज में जड़ें जमा चुकी विसंगतियों के साथ साथ भारतीय और पाश्‍चात्य संस्कृतियों के बीच द्वन्द्व के फलस्वरूप उत्पन्न सामाजिक परिस्थितियों और इतिहास को उजागर करनेवाला ज्ञान कोश है। सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग होने के कारण इसमें प्रयुक्‍त शब्द व्यर्थ नहीं है।}।

स्मरण रहे कि भारतीय संस्कृति में पत्‍नी के देहांत के बाद वयोवृद्ध ब्राह्‍मण धार्मिक अनुष्‍ठान संपन्न नहीं कर सकते हैं। अतः वे लोग किसी अल्प आयुवाली कन्या के माता-पिता को धन का प्रलोभन देकर विवाह करते थे। शुल्क अदा करके कन्याओं को विक्रय करने की कुप्रथा उस समय के समाज में आम बात थी। विशेष रूप से यह प्रथा आंध्र प्रदेश के विशाख और गोदावरी जिले में प्रचलित थी। फलस्वरूप बाल विवाह और बाल विधवाओं की समस्याएँ चारों ओर व्याप्‍त थीं। गुरजाडा ने ‘कन्याशुल्कम्‌’ नाटक में इन्हीं समस्याओं का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। गुरजाडा के इस नाटक के पात्र अग्निहोत्रावधानी, लुब्धावधानी, वेंकटेशम्‌, गिरीशम्‌, वेंकम्मा, बुच्चम्मा, मधुरवाणी आदि तेलुगु जनमानस में घर कर बैठ गए हैं।

धनलोभी अग्निहोत्रावधानी अपनी बड़ी बेटी बुच्चम्मा की शादी एक बूढ़े से कर देता है। वह कुछ ही दिनों में विधवा हो जाती है। इतना होने के बावजूद पिता अपनी दूसरी बेटी की शादी सत्तर वर्षीय लुब्धावधानी से करने को तैयार हो जाता है। उसकी पत्‍नी वेंकम्मा उसे धमकाती है कि वह आत्महत्या कर लेगी पर अग्निहोत्रावधानी टस से मस नहीं होता। तत्कालीन समाज में ऐसे लोभी अनेक थे जिन्हें केवल पैसों का मोह था। वास्तव में इस नाटक में ऐसे लोगों पर लेखक ने प्रहार किया है।

गिरीशम्‌ ढ़ोंगी, धोखेबाज और मक्कार व्यक्‍ति है जो अपनी अधकचरी अंग्रेज़ी जानकारी से सब को आकर्षित करने का प्रयास करता रहता है। वह बुच्चम्मा की ओर आकर्षित होता है और उसे अपने मोहजाल में फँसाने की कोशिश करता रहता है। शेक्सपीयर की कविताओं का अनुसरण करते हुए वह वेंकटेशम्‌ को निम्नलिखित कविता सुनाता है - "I love the widow - however she be,/ married again or single free/ Bathing and praying/ or frisking and playing/ A model of saintliness,/ or model of calmliness,/ what were the Earth,/ But for her birth?/ The Widow!" (गुरुजाडा अप्पाराव, कन्याशुल्कम्‌, पृ.40)। अंततः वह बुच्चम्मा को भगाकर जाता है। लेखक ने गिरीशम्‌ के माध्यम से यह निरूपित किया है कि ढोंगी, धोखेबाज और अर्द्धशिक्षित व्यक्‍तियों से समाज को खतरा है। इस पात्र के मुख से लेखक ने जो ‘पंच लाइन, (Punch Line) कहलवाई है- "डामिट कथा अड्डम तिरिगिंदि" (डैमिट कहानी उलट गई), वह आज भी तेलुगु जनता के मुख से अनायास ही फूट पड़ती है। धूम्रपान करना युवाओं के लिए फैशन बन चुका है, अतः गिरीशम्‌ कहता है कि "प्रोगा त्रागनिवाडु दुन्नै पुट्टुनु" (धूम्रपान न करनेवाला बैल के रूप में जन्म लेगा)। पीनेवालों के लिए तो बस बहाना चाहिए। इसलिए गिरीशम्‌ कहता है कि "इसके धुँए के सामने गुग्गुल, अगरबत्तीए आदि किस काम के? लाओ तंबाकू...(सूँघकर) वाह, बढ़िया तंबाकू है। सचमुच कंट्री लाइफ में मज़ा है, बेस्ट टुबाको, बेस्ट दही, बढ़िया घी, इसलिए पोयट्स ‘कंट्री लाइफ, कंट्री लाइफ’ कहकर, उसके लिए तड़पते रहते हैं।" (गुरजाडा अप्पाराव, ‘कन्याशुल्कम्‌’; हिंदी अनुवाद; पृ.39)|

तत्कालीन समाज में व्याप्‍त वेश्‍यावृत्ति का भी यथार्थ चित्रण इस नाटक में उपल्ब्ध है। मधुरवाणी के माध्यम से गुरजाडा ने वेश्‍या जीवन की वास्तविकता को उजगर किया है। कोई स्त्री जन्मजात वेश्‍या नहीं होती। परिस्थितियों के कारण मजबूर होकर उसे कभी कभी इस गर्त में डूबना पड़ता है। इसके लिए समाज ही गुनहगार है। लेखक ने एक ओर वेश्‍यावृत्ति पर कुठाराघात किया है और दूसरी ओर यह भी दर्शाया है कि वेश्‍याओं में भी नैतिक मूल्य होते हैं। उन्होंने मधुरवाणी के माध्यम से अपने विचार व्यक्‍त किए हैं कि ‘चाहे स्त्री हो या पुरुष, दोनों में नैतिकता होना अनिवार्य है।’

भाषा की दृष्‍टि से भी यह नाटक अत्यंत समृद्ध है। इसमें विशाखपट्टनम्‌ और विजयनगर जिले में प्रयुक्‍त आंचलिक भाषा का प्रयोग पाया जाता है। इसमें वैदिक ब्राह्‍मणों की भाषा और सामन्य जनता की व्यावहारिक भाषा का समन्वय रूप है।

‘कन्याशुल्कम्‌’ की प्रासंगिकता को देखकर अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया है -

कन्नड - 1930 - के.कृष्‍णय्यम्‌ जी
तमिल - 1964 - एम.जगन्नाथ राज
हिंदी - 1987 - एम.बी.वी.आर.शर्मा
हिंदी - 199 - डॉ.भीमसेन निर्मल
फ्रेंच - 1960-61 - हेन्नी हेन्री आल्बर्ट
रूसी - 1962 - पेर अनिचेवा अग्रानिन
अंग्रेज़ी - 1964 - एस.एन.जयंती
अंगेज़ी - 1976 - एस.जी.मूर्ति, के.रमेश (संक्षिप्‍त रूप)

गुरजाडा अप्पाराव नाटककार के साथ साथ सफल कवि और कहानीकार भी हैं। उनकी कविताओं में मानव, पूर्णम्मा, मुत्यालासरालु (मोतियों के हार), नीलगिरि पाटलु (1909, नीलगिरि के गीत), कासुलु (1910, पैसे), देशभक्‍ति (1910), सारंगधर काव्य, सत्यवती शतकम्‌ (सत्यवती शतक), उमापति अर्चना (1911, उमापति (शिव) की अर्चना), कन्यका (1912,कन्या), सुभद्रा (1913-14) आदि उल्लेखनीय हैं। कहानियों में दिद्‍दुबाटु (सुधार), मेटिल्डा, संस्कर्ता हृदयमु (समाज सुधारक का हृदय), मी पेरेमिटि (आपका नाम क्या है) और पेद्‍द मसीदु (बड़ा मस्जिद) आदि सम्मिलित हैं।

आधुनिक तेलुगु साहित्य के युगप्रवर्तक गुरजाडा वेंकटअप्पाराव का निधन 30 नवंबर, 1915 को हुआ। लेकिन आज भी वे तेलुगु जनता के हृदय में गिरीशम्‌ और मधुरवाणी जैसे पात्रों के माध्यम से अमर हैं।

1 टिप्पणी:

cmpershad ने कहा…

एक कालजयी नाटक की सुंदर व्याख्या करता लेख॥ बधाई स्वीकारें डॊ. नीरजा जी