गुरुवार, 3 जनवरी 2019

समसामयिक हिंदी साहित्य : किन्नर विमर्श



(सं) बिश्नोई, मिलन (2018)
किन्नर विमर्श : साहित्य और समाज
कानपुर : विद्या प्रकाशन
ISBN : 978-93-86248-52-7
         - डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा


आज का समय विमर्शों का समय है। बहुकेंद्रीयता का समय है। स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक, वृद्ध और आदिवासी समुदाय परिधि को छोड़कर केंद्र में आ चुके हैं और अपने मूलभूत मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। किन्नर समुदाय भी हाशियापरक ज़िंदगी को छोड़कर अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है। यह एक ऐसा समुदाय है जो समाज के बीचों बीच उपस्थित है लेकिन उसका कोई अस्तित्व नहीं। रामायण और महाभारत काल से ही समाज में इस समुदाय की उपस्थिति दर्ज है पर ‘सभ्य समाज’ में तिरस्कार और अपमान का दंश झेलने के लिए विवश है। किन्नर उपहास का पात्र बनते हैं। लेकिन उनका मज़ाक उड़ाने वाले उनकी पीड़ा को नहीं समझते। 

किन्नर का नाम लेते ही सबके मन में एक अजीब सी भावना पैदा होती है। बस अड्डे पर, रेल डिब्बे में, स्टेशन या चौराहे पर किन्नरों के व्यवहार से त्रस्त व्यक्ति उनके मानवाधिकारों के बारे में सोचना तो दूर उनको देखते ही दूर भागने का प्रयास करता है। निर्मला भुराड़िया सहित अनेक साहित्यकारों ने यह प्रश्न उठाया है कि यदि प्रकृति ने उन लोगों को तयशुदा जेंडर नहीं दिया है तो इसमें उनका क्या दोष है? वे भी इनसान है अतः उन्हें मानवीय गरिमा का अधिकार क्यों प्राप्त नहीं हुआ? (भुराड़िया : 6)। इसमें संदेह नहीं कि किन्नर समुदाय को तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसीलिए इस समुदाय ने भी संवैधानिक रूप से अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया है और साहित्यकार भी इस समुदाय की समस्याओं को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं। 

संवेदनशील रचनाकारों ने कविता, कहानी और उपन्यास के माध्यम से किन्नरों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की है और कर रहे हैं, जबकि लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी’ (2015) में स्वानुभूति के माध्यम से किन्नर समुदाय के सच को उजागर किया है। 

हिंदी साहित्य को ध्यान से देखेंगे तो स्पष्ट होता है कि निराला ने अपने उपन्यास ‘कुल्ली भाट’ (1939) में समलैंगिक विमर्श के बीज बो दिए थे। यदि इस उपन्यास को ‘हिंदी में समलैंगिक विमर्श की पहली आहट सुनने-सुनाने वाला उपन्यास’ (शर्मा : 117) कहा जाए तो गलत नहीं होगा। शिवप्रसाद सिंह की कहानियाँ - बहाव वृत्ति और बिंदा महाराज किन्नर विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। दोनों ही कहानियों में किन्नरों की स्थिति और उनकी पीड़ा को दर्शाया गया है। वृंदावनलाल वर्मा का एकांकी ‘नीलकंठ’ का एक किन्नर पात्र जनता की सेवा हेतु एक सेना बनाना चाहता है ताकि सामाजिक संतुलन को बिगड़ने से बचाया जा सके। वह सत्य को पारिभाषित करते हुए कहता है कि अपने आपको धोखा न देना ही सत्य है। (वर्मा : 186)। 

शारीरिक रूप से विकलांगों को परिवार अपनाता है और समाज में भी उनके लिए तरह-तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं लेकिन ‘जेनेटिक’ (आनुवांशिक रूप से) विकलांगों को - किन्नरों को परिवार भी नहीं अपनाता। सामाजिक अवहेलना से बचने के लिए उस बच्चे को त्याग दिया जाता है। इसीलिए निवेदिता झा ‘किन्नर’ शीर्षक अपनी कविता में कहती हैं -               
  कोख तो तुम्हें भी जन्म देती है 
  अघोर प्रसव पीड़ा के बाद 
  पहली ही गोद तिरस्कार से फेर लेती है मुँह 
  माँ गले से फिर भी लगाती है 
  सबसे राजदुलारे 

इस संदर्भ में महेंद्र भीष्म के उपन्यास ‘किन्नर कथा’ (2011) का वह प्रसंग याद आता है जहाँ राजघराने में जन्मे किन्नर सोना उर्फ चंदा के राज़ को माँ अपनी ममता के कारण बहुत दिनों तक प्रकट नहीं होने देती। लेकिन जब यह पता चल जाता है कि सोना किन्नर है तो राजा जगतराज सिंह उसे मारने का आदेश देता है। महेंद्र भीष्म ने जगह जगह उस माँ की ममता और पीड़ा को उजागर किया है जिसकी संतान को किन्नर होने के कारण उससे दूर कर दिया जाता है। साथ ही उन्होंने यथार्थ स्थिति को भी अपनी टिप्पणी के माध्यम से स्पष्ट किया है - “संतान कैसी भी हो, उसमें शारीरिक, मानसिक कमी क्यों न हो, माता-पिता को अपनी संतान हर हाल में भली लगती है, प्यारी होती है, फिर भले ही वह संतान हिजड़ा ही क्यों न हो। फिर भी सामाजिक परिस्थितियों, खानदान की इज्जत-मर्यादा, झूठी शान के सामने अपने हिजड़े बच्चे से उसके जन्मदाता हर हाल में छुटकारा पा लेना चाहते हैं। यह एक कटु सत्य है।” (भीष्म अ : 45)। महेंद्र भीष्म का उपन्यास ‘मैं पायल’ (2016) किन्नर गुरु पायल सिंह के जीवन संघर्ष पर आधारित है। 

प्रदीप सौरभ की कृति ‘तीसरी ताली’ (2014) में गौतम अपने बेटे विनीत को कुछ दिनों तक लोगों की दृष्टि से बचाता है लेकिन अंततः सामाजिक अवहेलना के कारण उसे बच्चे को त्यागना पड़ता है। इस उपन्यास में रिपोर्ताज शैली में समलैंगिकता, गे मूवमेंट, लिंग परिवर्तन, अप्राकृतिक यौनात्मक जीवन शैली और असली-नकली किन्नरों की समस्याओं को व्यक्त किया गया है। 

चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा’ (2016) में एक माँ अपनी संतान को किन्नरों से दूर रखने की भरसक कोशिश करती दिखाई देती है और मजबूरी में विनोद को बिन्नी बनना पड़ता है। वह अपनी माँ के सपने को साकार बनाने की कोशिश करता है और अधूरेपन तथा कशमकश के बावजूद यह संकल्प लेता है कि ज़िंदगी में वह कुछ बनेगा और अपनी बिरादरी के लोगों को समाज में इज्जत दिलाने का प्रयास करेगा। 

इसी तरह कुसुम अंसल की कहानी ‘ई मुर्दन का गाँव’ में भी लैंगिक विकृति से पीड़ित लोगों की व्यथा को उजागर किया गया है। इस कहानी की पात्र सीलामा कहती है, “भाग्य की बात है, हम जब अलिंगी पैदा हुए हैं एसेक्सुयल, इसी से यहाँ रहने को मजबूर हैं।” (अंसल : 106)। कुसुम अंसल किन्नर गुरु जया के मुख से यह कहलवाती हैं कि जन्म तो किसी के बस की नहीं है अतः सबको जीने का अधिकार मिलना चाहिए। हमारे समाज में कहीं-कहीं किन्नरों को खुशी के मौक़े पर शुभ मानकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। शिशु के जन्म पर, विवाह के अवसर पर या गृह प्रवेश के वक्त किन्नरों का आशीर्वाद शुभ माना जाता है। ‘ई मुर्दन का गाँव’ की किन्नर गुरु जया कहती है, “बाँझ औरतें हमारे पास बच्चे की कामना से आती हैं और ताज्जुब, हमारा आशीर्वाद फलता भी है, किसी भी बच्चे का जन्म हमारे नाच-गाने के बिना पूरा नहीं होता। आशीर्वाद देते हैं तो गंदे-गंदे अल्फ़ाज़ फूहड़ से गाने भी गाते हैं।” (अंसल : 107)। 

नीरजा माधव के उपन्यास ‘यमदीप (2009) में मानवी और आनंद कुमार के माध्यम से किन्नरों से संबंधित ऐतिहासिक संदर्भों को रेखांकित करने के साथ-साथ उनकी समस्याओं एवं मानसिक यातनाओं को उजागर किया गया है। साथ ही किन्नरों की सामाजिक उपयोगिता की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है। नीरजा माधव यह कहती है कि यदि किन्नरों को बकाया धन की वसूली का काम सौंपा जाए तो वे चुटकी बजाकर वसूल कर लेंगे। (माधव : 6)। उनका यह मानना है कि यदि किन्नरों की अवहेलना करने के बजाय उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया जाए तो वे अपनी पारंपरिक भूमिका से बाहर आ सकेंगे और स्वतंत्र रूप से इज्जत से जीवनयापन कर सकेंगे। 

भगवंत अनमोल का उपन्यास ‘ज़िंदगी 50-50’ (2017) भी किन्नर विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय है। उपन्यास के नायक अनमोल के भाई हर्षा को किन्नर होने का दंश झेलना पड़ता है। अनमोल अपने पुत्र सूर्या को उस दंश से, उस पीड़ा से दूर रखने का संकल्प लेता है। उपन्यासकार ने दर्शाया है कि किसी भी व्यक्ति की ज़िंदगी पूर्ण नहीं होती। सबकी ज़िंदगी ‘फिफ़्टी-फिफ़्टी’ होती है, तो फिर किन्नरों को हेय दृष्टि से क्यों देखा जाता है? उन्हें भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन जीने का अधिकार देकर तो देखिए होता क्या है! 

किन्नर केंद्रित उपन्यासों में डॉ. अनसूया त्यागी के ‘मैं भी औरत हूँ’ (2005) का स्थान इस दृष्टि से दूसरे उपन्यासों से अलग महत्व वाला है कि इसकी लेखिका स्वयं स्त्रीरोग एवं प्रसूती विशेषज्ञ हैं। उन्होंने ऐसी दो बहनों की कहानी लिखी है जिन्हें स्वयं या उनके परिवार को लंबे समय तक उनके तृतीय लिंगी होने का आभास तक नहीं होता। पता चलने पर दोनों का ऑपरेशन कर उन्हें स्त्री रूप दिया जाता है। बड़ी बेटी तो पूर्णतः स्त्री बन जाती है और आगे चलकर संतान को भी जन्म देती है लेकिन छोटी बेटी के भीतर अंग अनुपस्थित होने के कारण वह संतान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होती। लेकिन सुखी दांपत्य जीवन जी पाती है। लेखिका ने जहाँ शरीर विज्ञान और चिकित्सा संबंधी विवरण शामिल किए हैं वहीं तृतीय लिंगी व्यक्ति की मानसिकता का भी खुलासा किया है। 

आजकल किन्नरों की समस्या, उनकी पीड़ा, उनकी संवेदना आदि को कथ्य बनाकर काफी उपन्यास और कहानियों का सृजन किया जा रहा है। मोनिका देवी के दो उपन्यास ‘अस्तित्व की तलाश में सिमरन’ (2018) और ‘हाँ मैं किन्नर हूँ : कांता भुआ’ (2018) किन्नरों की जीवन शैली पर आधारित हैं। विजेंद्र प्रताप सिंह और रवि कुमार गोंड द्वारा संपादित ‘कथा और किन्नर’ (2018) की 25 कहानियों में किन्नर समाज की व्यथा-कथा को उजागर करने के साथ-साथ किन्नरों के उत्थान के लिए भी मार्ग सुझाया गया है। लेकिन ज़्यादातर कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें किन्नरों के प्रति सहानुभूति की बातें हैं, जैसे – “आखिर तुम भी हमारी भाँति एक साधारण मनुष्य हो। तुम्हें भी खुलकर साँस लेने का अधिकार है। तुम्हें वे सारे अधिकार हैं जो इस सृष्टि में रहने वाले इंसानों को प्राप्त हैं।“ (ईशा शर्मा, वो... एक किन्नर; सिंह : 31), “देखो मैं तुम्हारा जीवन सुधारना चाहती हूँ, मैं तुम्हें अमेरिका भेजूँगी और वहाँ तुम्हें अपना जीवन गा बजा कर नहीं बिताना पड़ेगा। तुम भी हमारी तरह सबके बीच रह सकोगे।“ (अलका प्रमोद, इतनी देर में; सिंह : 39), “किसी बालक के किन्नर पैदा होने में उसका क्या दोष है, समाज उसे उपहास की दृष्टि से क्यों देखता है। उसने ऐसा कौन सा अपराध किया है? ... आखिर कब तक किन्नरों को समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाएगा?” (अखिलेक्ष निगम ‘अखिल’, आखिर कब तक?; सिंह : 45), “समाज को सुधारने से पहले अपने घर वालों के मन में किन्नर के प्रति सद्भावना लाना जरूरी है” (अजय कुमार चौधरी, वो किन्नर...; सिंह : 91)। प्रश्न है कि वास्तव में यदि किसी किन्नर का सामना करना पड़ जाए तो.... क्या उस वक्त भी हम इसी तरह की बातें करेंगे? 

घर-परिवार में यदि कोई बच्चा शारीरिक रूप से विकलांग पैदा होता है तो उसे अपनाने में माता-पिता नहीं हिचकते लेकिन किन्नर पैदा होने पर समाज के डर से उन्हें पैदा होते ही त्याग दिया जाता है। माँ की ममता भले ही उस बच्चे को अपनाने के लिए तैयार हो जाती है तो भी उसे ऐसा करने नहीं दिया जाता। सपना मांगलिक की कविता ‘हिजड़े की व्यथा’ में किन्नर जीवन की विडंबना का मार्मिक अंकन है– 
 लिंग त्रुटि क्या दोष माँ मेरा, काहे फिर तू रूठी 
 फेंक दिया दलदल में लाकर, ममता तेरी झूठी! 
 मेरे हक, खुशियाँ सब सपने, माँग रहा हूँ कबसे 
 छीन लिया इंसाँ का दर्जा, दुआ माँगते मुझसे।
............ ...... 
 जितना श्रापित मेरा जीवन, दुखद अधिक मर जाना 
 जूते चप्पल मार लाश को, कहते लौट न आना 

मनुष्य के जीवन में रिश्ते-नाते बहुत महत्व रखते हैं। किन्नर हो या साधारण बच्चा सभी रिश्तों के लिए तड़पते हैं। ऐसी स्थिति में यदि उस बच्चे को घर से बेघर कर दिया जाए और दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया जाए तो वह आतंकित होगा ही और दूसरों को भी आतंकित करेगा। ‘जेनेटिक डिफ़ेक्ट’ के कारण यदि कोई बच्चा किन्नर के रूप में पैदा होता है तो इसमें उसका क्या दोष है! उसे भी तो जीने का अधिकार है। आज समय के साथ सोच भी बदल रहा है। कुछ किन्नर पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। साथ ही दूसरों के लिए भी राह दिखा रहे हैं। वे भी हर क्षेत्र में सक्रिय हो रहे हैं; अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, हाशिया छोड़कर केंद्र में आ रहे हैं। फिर भी इस समाज को उन्हें अपनाने में वक्त लगेगा। 

संदर्भ ग्रंथ 
  1. अंसल, कुसुम (2018). मेरी दृष्टि तो मेरी है. नई दिल्ली : वाणी 
  2. त्यागी, अनसूया (2005). मैं भी औरत हूँ. नई दिल्ली : परमेश्वर 
  3. देवी, मोनिका (2018). अस्तित्व की तलाश में सिमरन. कानपुर : माया 
  4. देवी, मोनिका (2018). हाँ मैं किन्नर हूँ : कांता भुआ. कानपुर : माया 
  5. भीष्म, महेंद्र (अ : 2011). किन्नर कथा. नई दिल्ली : सामयिक 
  6. भीष्म, महेंद्र (2016) मैं पायल. कानपुर : अमन 
  7. भुराड़िया, निर्मला (2014). गुलाम मंडी. नई दिल्ली : सामयिक 
  8. माधव, नीरजा (2009). यमदीप. नई दिल्ली : सुनील साहित्य सदन 
  9. मुद्गल, चित्रा (2016). पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा. नई दिल्ली : वाणी 
  10. वर्मा, वृंदावनलाल. नीलकंठ 
  11. शर्मा, ऋषभ देव (2017). कथाकारों की दुनिया. नई दिल्ली : तक्षशिला 
  12. सं. सिंह, विजेंद्र प्रताप और रवि कुमार गोंड (2018). कथा और किन्नर. कानपुर : अमन 
  13. सिंह, विजेंद्र प्रताप (2017). हिंदी उपन्यासों के आइने में थर्ड जेंडर. कानपुर : अमन 
  14. सौरभ, प्रदीप (2014). तीसरी ताली. नई दिल्ली : वाणी 
  • (सं) बिश्नोई, मिलन (2018). किन्नर विमर्श : समाज और साहित्य. कानपुर : विद्या प्रकाशन. ISBN : 978-93-86248-52-7. में प्रकाशित। पृष्ठ : 292-296  

3 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

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Unknown ने कहा…

साधुवाद । मुझे फोन कीजिये 8004905043

Unknown ने कहा…

महेंद्र भीष्म 8004905043