"दुःख सबको माँजता है
और
चाहे स्वयं मुक्ति देना वह न जाने, किंतु
जिनको माँजता है
उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें।"
(अज्ञेय, ‘दूध का चाँद’, आँगन के पार द्वार)
ये पंक्तियाँ अज्ञेय की जीवन दृष्टि और रचना दृष्टि का आधार हैं और केंद्रबिंदु भी। ‘अज्ञेय’ के उपनाम से विख्यात सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन प्रयोगवाद और नई कविता के विशिष्ट कवि, क्रांतिकारी विचारक, लेखक और पत्रकार रहें। उनका जन्म 7 मार्च, 1911 को देवरिया जिले के कसिया (कुशीनगर) गाँव में हुआ, इसीलिए इस वर्ष उनकी जन्मशताब्दी मनाई जा रही है।
‘अज्ञेय’ अर्थात ‘जो जाना नहीं जा सके!’ विश्वनाथ तिवारी उन्हें ‘चिंतक रचनाकार’ मानते हैं तो कृष्ण बलदेव वैद ‘खूबसूरत नकाबपोश’। अज्ञेय के कई उपनाम हैं। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन नाम वे गद्य लेखक तथा संपादक के नाते प्रयुक्त करते थे जबकि सृजनात्मक लेखन ‘अज्ञेय’ के नाम से करते थे। उनके अन्य उपनाम हैं - श्रीवत्स, कुट्टिचातन, गजानन पंडित, डॉ.अबुल लतीफ और समाजद्रोही नं. वन।
वस्तुतः अज्ञेय की रचनाएँ उनके संवेदनशील कवि व्यक्तित्व और वैचारिक मानस की संवाहिका है। उनका चिंतन पक्ष समृद्ध एवं मौलिक है। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से जनमानस में चेतना जगाने के साथ साथ भारतीय संस्कृति और सभ्यता को उजागर किया है। उन्होंने मानवीय मूल्यों की कसौटी पर व्यक्ति, समाज, संस्कृति और साहित्य को कसा है। इसीलिए वे कहते हैं "दूर दूर दूर... मैं वहाँ हूँ।/ यह नहीं कि मैं भागता हूँ :/ मैं सेतु हूँ -/ जो है और जो होगा दोनों को मिलाता हूँ -/ मैं हूँ, मैं यहाँ हूँ,/ पर सेतु हूँ इसलिए / दूर दूर दूर ... मैं वहाँ हूँ। / यह जो मिट्टी गोड़ता है/ कोदई खाता है और गेहूँ खिलता है/ उसकी मैं साधना हूँ।/ यह जो गिट्टी फोड़ता है / मड़िया में रहता है और महलों को बनाता है/ उसकी मैं व्यथा हूँ।" (अज्ञेय,मैं वहाँ हूँ)।
यह सर्वविदित है कि अज्ञेय ‘शब्द’ को सर्वाधिक महत्व देते हैं। उनकी मान्यता है कि काव्य भी शब्द ही है। उन्होंने स्वयं घोषणा की है कि उनकी खोज भाषा नहीं, केवल शब्दों की खोज है। उनका अपना चिंतन है, दृष्टिकोण है और अपनी सोच है; अतः वे कहते हैं - "कवि जो होंगे हों, जो कुछ करते हैं करें / प्रयोजन मेरा बस इतना है - /ये दोनों जो / सदा एक दूसरे से तन कर रहते हैं, / कब, कैसे, किस आलोक - स्फुरण में / इन्हें मिला दूँ - / दोनों जो हैं बंधु, सखा, चिर सहचर मेरे।" (अज्ञेय, ‘शब्द और सत्य’, अरी ओ करुणा प्रभामयी)। इसी तरह तेलुगु के अभ्युदय कवि दाशरथी कृष्णमाचार्य भी कहते हैं कि "मंचि कवित्वम् ए भाषलो उँटे अदि ना भाषा / मंचि कवि एवरैते अतडु ना मित्रुडु।? ई कविता सौधम् पुष्पक विमानम् वंटिदि / अन्नि भाषाला वारू रंडि... पुष्पक विमानम्लो / आनंद लोकाला संचारानिकी।" (अच्छी कविता जिस भाषा में होगी वह मेरी भाषा है। अच्छे कवि मेरे मित्र हैं। काव्य सृजन एक पुष्पक विमान के समान है। सभी भाषा वाले आइए... इस पुष्पक विमान में बैठकर रस मग्न होकर विहार करें। - दाशरथी कृष्णमाचार्य; कविता पुष्पकम्)।
अज्ञेय अपने परिवेश के प्रति जागरूक हैं। इसीलिए तो वे कहते हैं, "खड़ा हूँ तो वहाँ जहाँ मैं स्वयं भी केवल परिवेश हूँ और मूल्य भी केवल परिवेश है।" वे इतने जागरूक कवि हैं कि वे कहते हैं, "आधुनिक युग मशीन युग है। मशीन के विस्तार से प्राचीन समाज व्यवस्था और संस्कृति नष्ट हो रही है।" उन्होंने इसी बात को अपनी कविता ‘औद्योगिक बस्ती’ में उजागर किया है - "यंत्र हमें दलते हैं / और हम अपने को छलते हैं / थोड़ा और खट लो / थोड़ा और पिस लो।" अज्ञेय के समकालीन तेलुगु के कवि श्री श्री (श्रीरंगम् श्रीनिवास राव) ने भी अपनी कविता ‘चेदु पाटा’ (कडुवा गीत) में यह स्पष्ट किया है कि "मनमंता बानिसलम् / गानुगलम् पीनुगलम् / वेनुका दगा मुंदु दगा / कुडि एडमला दगा दगा।" ( हम सब गुलाम हैं/ कोल्हू हैं, मुर्दे हैं / पीछे भी छल है, आगे भी छल है/ दाएँ भी और बाएँ भी छल ही छल हैं। ; श्री श्री ; महाप्रस्थानम्, ‘चेदु पाटा’ - कडुवा गीत)।
अज्ञेय भारतीय साहित्य, समाज और संस्कृति पर विशेष रूप से बल देने वाले विलक्षण व्यक्तित्व के धनी हैं.
" अल्ला रे अल्ला
होता न मनुष्य मैं, होता करमकल्ला.
रूखे कर्म जीवन से उलझता न पल्ला.
चाहता न काम कुछ, माँगता न दाम कुछ
करता न काम कुछ, बैठता निठल्ला-
अल्ला रे अल्ला-" (अज्ञेय, एक आटोग्राफ)
2 टिप्पणियां:
‘अज्ञेय’ पर शोधपरक सार्थक लेख....
ऐसा प्यारा ‘समाजद्रोही’ साहित्य को बार बार मिले ... भले ही अज्ञेय बन कर। बहुत बढिया सूचनापरक लेख पढाने के लिए आभार डॉ. नीरजा जी॥
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