रविवार, 23 अक्तूबर 2011

ज्ञानपीठ पुरस्कृत दो कथाकार : अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल

वर्ष 2009  का 45 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार अमरकांत और श्रीलाल शुक्‍ल को संयुक्‍त रूप से दिया जा रहा है. ये दोनों ही हिंदी के प्रतिष्‍ठित साहित्यकार हैं निश्‍चय ही ये दोनों ही साहित्यकार लंबे समय समय से ज्ञानपीठ के सही दावेदार और हकदार रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि इन्हें यह सम्मान अपेक्षाकृत विलंब से मिल रहा है।


अमरकांत का जन्म उत्तर प्रदेश बलिया जिले के ग्राम भगलपुर (नगरा) में 01 जुलाई,1925 को हुआ। अनका वास्तविक नाम है श्रीराम। उनकी दादी उन्हें अमरकांत कहकर पुकारती थी, जिसे उन्होंने अपना साहित्यिक नाम अमर्कांत का आधार बनाया। अमरकांत हिंदी साहित्य को अनेक उपन्यास, कहानियाँ एवं बाल साहित्य के माध्यम से समृद्ध किया। उनके उपन्यासों में ‘सूखा पत्ता’ (1959), ‘ग्रामसेविका’, ‘कंटीले राह के फूल’, ‘आकाश पक्षी’ (1967), ‘काले उजले दिन’ (1969), ‘दीवार और आँगन’ (1969), ‘सुखी जीवी’, ‘बीच की दीवार’, ‘सुन्नर पांडे की पतोह’, ‘आँधी’, ‘सुदीराम’, ‘इन्हीं हथियारों से’ और ‘पराई डाल का पंछी’ आदि उल्लेखनीय हैं। ‘जिंदगी और जोंक’, ‘देश के लोग’, ‘मौत का नगर’, ‘कुहासा’, ‘तूफान’, ‘कला प्रेमी’ आदि उनके प्रसेद्ध कहानी संग्रह हैं। उपन्यास और कहानियों के अलावा अमरकांत ने बाल साहित्य का सृजन भी किया है। ‘खूँट में दाल’, ‘दो हिम्मती बच्चे’, ‘झगरू लाल का पैसा’ आदि इसी कोटि की रचनाएँ हैं।

अमरकांत की प्राथमिक शिक्षा नगरा में संपन्न हुई। 1942 में उन्होंने इंटरमीडियट की पढ़ाई अधूरी छोड़कर स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया। बाद में उन्होंने 1946 में सतीशचंद्र इंटर कॉलेज, बलिया से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की तथा इलाहाबाद विश्‍वविद्‍यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्‍त की। अम्रकांत प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल होकर कहानी लेखन को गति प्रदान की। वे सैनिक, अमृत, भारत, कहानी और मनोरमा आदि पत्र-पत्रिकाओं के संपादक भी रह चुके हैं। यहाँ हम उनकी वैचारिकता के आयामों को स्पष्‍ट करने का प्रयास करेंगे।

अमरकांत का रचना संसार वैविध्यपूर्ण है। उन्हें ‘रोमानी कथाकार’ मानते हुए डॉ.गोपाल राय ने कहा कि "अमरकांत के सभी उपन्यास रोमानी उपन्यासों के फार्मूलों पर आधारित हैं जिनमें क्रांति, प्रेम, विमाता के व्यवहार, परंपरागत आदर्शों की अनुगामिनी नारी की आस्था, रूढ़िग्रस्त निम्न मध्यवर्ग की जड़ता आदि का भावपूर्ण अंकन किया गया है। इन उपन्यासों में यत्र-तत्र सामाजिक प्रयोजन की बात कही गई है पर कथा संसार से उसकी तर्कसंगत पुष्‍टि नहीं होता। जीवंत अनुभूतियों के संस्पर्श और सामाजिक विसंगतियों की चेतना के अभाव के कारण अमरकांत के उपन्यास सर्जनात्मक दृष्‍टि से अत्यंत सामान्य हैं।" (हिंदी उपन्यास का इतिहास, गोपाल राय)।

वस्तुतः अमरकांत के साहित्य की मूल चिंता है आधुनिकता और परंपरा का द्वन्द्व। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में सामाजिक परिवर्तन को दर्शाया है। व्यक्‍ति स्वातंत्र्य और सामाजिक परिवर्तन की आवाज उनके साहित्य में सुनाई पड़ती है। सामाजिक और राजनैतिक जीवन में व्याप्‍त अराजकता के कारण व्यक्‍ति उसके व्यक्‍तित्व की रक्षा नहीं कर पाता। ऐसे समय में उसे जीवन की निरर्थकता को स्वीकारते हुए अलगाव की समस्या से जूझना पड़ता है। भारत में एक ओर यांत्रिक विकास है तो दूसरी ओर सामाजिक पिछड़ापन है। इस कारण अनेक विसंगतियों का जन्म हो रहा है। इन विसंगतियों में एक, समाज में व्याप्‍त जाति भेद को पछाड़ घोषित करते हुए अमरकांत कहते हैं - "जाति को मैं नहीं मानता; जाति एक सामाजिक ढकोसला है, अपने झूठे अहंकार का कमजोर किला। कुछ साधन-संपन्न लोगों ने कमजोरों को दबाना चाहा और इसके लिए उनकी सीमाएँ निश्‍चित कर दीं। इस संसार में दो ही जातियाँ हैं, एक अच्छे लोगों की और दूसरी बुरे लोगों की, एक साधन-संपन्न लोगों की और दूसरी साधन-विहीन लोगों की। क्या ब्राह्‍मण जाति में एक-से-एक कमीने, बदमाश, व्यभिचारी और लुच्चे नहीं भरे हैं? क्या और दूसरी जातियों में अच्छे लोग नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि ऊँची कही जानेवाली जातियों के लोग छिपकर कुकर्म करते हैं और फिर भी अपने को श्रेष्‍ठ समझते हैं? जाति के विभाजन...." (सूखा पत्ता; पृ.176)।

अमरकांत परंपरागत रूढ़ियों के खिलाफ है। रूढ़िपालन के नाम पर प्रेम का विरोध करने को असामाजिक और अनुचित मानता है। इस संदर्भ में वे कहते हैं कि "दोष समाज-रचना का है, जिसमें प्रेम फल-फूल ही नहीं सकता। इस समाज में और भी दुःख और पीड़ा है, उसके सामने अपनी पीड़ा का कोई महत्व नहीं, अपने को उसमें घुला-मिलाकर मारना तो कायरता है। ... खासकर उस आदमी के लिए जो पढ़ा-लिखा और समझदार हो।" (वही, पृ.200)। उनकी मान्यता है कि "जीवन में आगे बढ़ने के लिए संघर्ष और तकलीफ जरूरी है, और जो संघर्ष नहीं कर सकता, जो तकलीफ बरदाश्‍त नहीं कर सकता, उसका जीवन व्यर्थ है।" (वही, पृ.47)।

अमरकांत के उपन्यासों में नारी जीवन की त्रासदी का मार्मिक अंकन मिलता है। यदि स्त्री के संबंध में सामंती सोच को संक्षेप में सूत्रबद्ध करना हो तो वह यह है कि ‘न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।’ अर्थात्‌ स्त्री को स्वतंत्रता का अधिकार नहीं है चूँकि वह कमजोर है, अबला है। पर अमरकांत यही मानते हैं कि स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं। वे पूछते हैं कि "औरत मर्द में कोई ऊँचा नीचा थोड़े हैं? सभी बराबर हैं। जो काम मर्द कर सकते हैं, वही औरतें भी कर सकती हैं।" (आकाश पक्षी, पृ.79)।

सदियों से सामंती संस्कार ने स्त्री को शिक्षा से दूर रखा है क्योंकि स्त्री ने यदि शिक्षा प्राप्‍त कर ली तो वह रूढ़ियों के खिलाफ खड़ी हो सकती है। हमेशा यही कहा जाता है कि लड़कियाँ अधिकतर पढ़कर भी क्या करेंगी? कुछ लोग शिक्षा का गलत अर्थ निकालकर सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हैं। वे पढ़-लिख जाएँगे और अपनी योग्यता का झूठा प्रदर्शन करेंगे। गलत कामों में समय को बरबाद करेंगे। ऐसे लोग स्त्रियों और पुरुषों दोनों में मिल जाएँगे। पर शिक्षा का यह अर्थ कतई नहीं है। अमरकांत शिक्षा का अर्थ स्पष्‍ट करते हुए कहते हैं कि "शिक्षा का मतलब है मेहनती बनना, पुरानी गलत बातों के खिलाफ संघर्ष करना। इसके बिना जीवन एकदम बेकार हो जाता है। शिक्षा गलत बातें नहीं सिखाती, वह जीवन को हमेशा ऊँचा उठाती है।" (वही, पृ.80)।

आज का मनुष्‍य़ यांत्रिक पुर्जा बन गया है। इस पर आक्रोश व्यक्‍त करते हुए अमरकांत कहते हैं, "हम लोगों में जो गिरावट आ गई है वह केवल हमारी ही वजह से। आज हम आजाद नहीं है, मशीन के पुर्जे हैं जिनके दिल नहीं है, मन में आकांक्षाएँ नहीं है, रंगीन भविष्‍य की उमंग भी नहीं है।" (वही)।

उपन्यासों की भाँति ही अमरकांत की कहानियाँ भी उल्लेखनीय हैं। उनकी कहानियों का कथ्य बहुत महत्वपूर्ण होता है तथा शिल्प बड़ा अनगढ़। उनमें जिंदगी की पकड़ बड़ी मजबूत है। वे स्थितियों को गहराई से उतारते हैं। वस्तुतः सामाजि विसंगतियों के प्रति उनका व्यंग्य बड़ा तीखा होता है। नामवर सिंह के अनुसार ‘मर्मस्पर्शी व्यंग्यात्मकता’ उनकी काहानियों की केंद्रीय विशेषता है। इस दृष्‍टि से उनकी कालजयी  कहानी ‘दोपहर का भोजन’ उल्लेखनीय है। विश्‍व की तीन चौथाई आबादी आज भी गरीब व पिछड़ी हुई है। अमरकांत ने ‘दोपहर का भोजन’ के माध्यम से इसी बात की पुष्‍टी की है। उन्होंने यह भी दर्शाया है कि भारतीय जनता गरीब होने पर भी विचलित नहीं होती। परिस्थितियों का डटकार सामान करती है। कुलमिलाकार यह कहा जा सकता है कि अमरकांत प्रगतिशील चिंतन को भारतीय स्म्दर्भ में अभिव्यक्‍त करने वाले सफल कथाकार हैं।


अमरकांत की ही भाँति श्रीलाल शुक्ल ने भी अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को उकेरा है। श्रीलाल शुक्ल हिंदी साहित्य जगत में ‘राग दरबारी’ के लेखक के रूप में विख्यात हैं। वे अपने व्यंग्य लेखन के लिए जाने जाते हैं परंतु उन्हें सिर्फ व्यंग्यकार के रूप में देखना न्याय संगत नहीं होगा। वस्तुतः वे यथार्थ को उद्‍घाटित करने के लिए, सच और झूठ के बीच के फर्क स्पष्‍ट करने के लिए व्यंग्य का सहारा लेते हैं। यही उनकी रचना प्रविधि है। समाज में फैली मक्कारी, पाखंड, झूठ, विडंबना, राजनैतिक अवसरवादिता आदि की तस्वीर खींचने की बाध्यता कभी साहित्यकार को कार्टूनिस्ट बनाती है तो कभी फोटोग्राफर, तो कभी गंभीर चिंतक। श्रीलाल शुक्ल भी ऐसे हैं। उनके बारे में बताते हुए गिरिराज किशोर कहते हैं कि "साहित्य के संदर्भ में वे उदारमना भी हैं और ईमानादार भी। नए से नए लेखकों के बारे में लिखने में वे संकोच नहीं करते। साथ ही प्रशंसा करने में भी वे कंजूस नहीं।" (श्रीलाल शुक्ल : जीवन ही जीवन)।

श्रीलाल शुक्ल का जन्म 31 दिसंबर, 1925 को लखनऊ जनपद के अतरौली गाँव में हुआ। 1947 में इलाहाबाद विश्‍वविद्‍यालय से स्नतक की उपाधि प्राप्‍त की। तत्पश्‍चात उन्होंने भारत सरकार की सेवा की। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं - ‘सूनी घाट का सूरज’(1957), ‘अज्ञातवास’(1962), ‘राग दरबारी’(1968), ‘आदमी का जहर’(1972), ‘सीमाएँ टूटती हैं’(1973), ‘मकान’(1976), ‘पहला पड़ाव’(1987), ‘बिस्रामपुर का संत’(1998), ‘बब्बरसिंह और उसके साथी’(1999), ‘राग विराग’(2001)। ‘यह घर मेरी नहीं’(1979), ‘सुरक्षा और अन्य कहानियाँ’(1991), ‘इस उम्र में’(2003), ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’(2003) उनके चर्चित कहानी संग्रह हैं। ‘अंगद का पाँव’(1958), ‘यहाँ से वहाँ’(1970), `मेरी श्रेष्‍ठ व्यंग्य रचनाएँ’(1979), ‘उमरावनगर में कुछ दिन’(1986), ‘कुछ जमीन में कुछ हवा में’(1990), ‘आओ बैठ लें कुछ देरे’(1995), ‘आगली शताब्दी का शहर’(1996), ‘जहालत के पचास साल’(2003) और ‘खबरों की जुगाली’(2005) उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्‍त ‘अज्ञेय:कुछ रंग और कुछ राग’(1999, आलोचना), ‘भगवतीचरण वर्मा’(1989, विनिबंध) और ‘अमृतलाल नागर’(1994, विनिबंध) भी उल्लेखनीय हैं।

श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं का एक बड़ा हिस्सा गाँव के जीवन से संबंध रखता है। ग्रामीण जीवन के व्यापक अनुभव और निरंतर परिवर्तित होते परिदृश्‍य को उन्होंने बहुत गहराई से विश्‍लेषित किया है। यह भी कहा जा सकता है कि श्रीलाल शुक्ल ने जड़ों तक जाकर व्यापक रूप से समाज की छान बीन कर, उसकी नब्ज को पकड़ा है। इसीलिए यह ग्रामीण संसार उनके साहित्य में देखने को मिला है। उनके साहित्य की मूल पृष्‍ठभूमि ग्राम समाज है परंतु नगरीय जीवन की भी सभी छवियाँ उसमें देखने को मिलती हैं।

श्रीलाल शुक्ल ने साहित्य और जीवन के प्रति अपनी एक सहज धारणा का उल्लेख करते हुए कहा है कि "कथालेखन में मैं जीवन के कुछ मूलभूत नैतिक मूल्यों से प्रतिबद्ध होते हुए भी यथार्थ के प्रति बहुत आकृष्‍ट हूँ। पर यथार्थ की यह धारणा इकहरी नहीं है, वह बहुस्तरीय है और उसके सभी स्तर - आध्यात्मिक, आभ्यंतरिक, भौतिक आदि जटिल रूप से अंतर्गुम्फित हैं। उनकी समग्र रूप में पहचान और अनुभूति कहीं-कहीं रचना को जटिल भले ही बनाए, पर उस समग्रता की पकड़ ही रचना को श्रेष्‍ठता देती है। जैसे मनुष्‍य एक साथ कई स्तरों पर जीता है, वैंसे ही इस समग्रता की पहचान रचना को भी बहुस्तरीयता देती है।"

श्रीलाल शुक्ल की सूक्ष्म और पैनी दृष्‍टि व्यवस्था की छोटी-से-छोटी विकृति को भी सहज ही देख लेती है, परख लेती है। उन्होंने अपने लेखन को सिर्फ राजनीति पर ही केंद्रित नहीं होने दिया। शिक्षा के क्षेत्र की दुर्दशा पर भी उन्होंने व्यंग्य कसा। 1963 में प्रकाशित उनकी पहली रचना ‘धर्मयुग’ शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्‍त विसंगतियों पर आधारित है। व्यंग्य संग्रह ‘अंगद का पाँव’ और  उपन्यास ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ने इसे विस्तार दिया है।

देश के अनेक सकारी स्कूलों की स्थिति दयनीय है। उनके पास अच्छा भवन तक नहीं है। कहीं कहीं तो तंबुओं में कक्षाएँ चलाती हैं, अर्थात न्यूतम सुविधाओं का भी अभाव है। वे इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि "यही हाल ‘राग दरबारी’ के छंगामल विद्‍यालय इंटरमीडियेट कॉलेज का भी है, जहाँ से इंटरमीडियेट पास करनेवाले लड़के सिर्फ इमारत के आधार पर कह सकते हैं, सैनिटरी फिटिंग किस चिड़िया का नाम है। हमने विलायती तालीम तक देशी परंपरा में पाई है और इसीलिए हमें देखो, हम आज भी उतने ही प्राकृत हैं, हमारे इतना पढ़ लेने पर भी हमारा पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है।"

विडंबना यह है कि आज कल अध्यापक भी अध्यपन के अलावा सब कुछ करते हैं। ‘राग दरबारी’ के मास्टर मोतीराम की तरह वे कक्षा में पढ़ाते कम हैं और ज्यादा समय अपनी आटे की चक्‍की को समर्पित करते हैं। ज्यादात्र शिक्षक मोतीराम ही हैं, नाम भले ही कुछ भी हो। ट्‍यूशन लेते हैं, दुकान चलाते हैं और तरह तरह के निजी धंधे करते हैं। छात्रों को देने के लिए उनके पास समय कहाँ बचता है?

श्रीलाल शुक्ल ने अपने साहित्य के माध्यम से समसामयिक स्थितियों पर करारी चोट की है। वे कहते हैं कि ‘आज मानव समाज अपने पतन के लिए खुद जिम्‍मेदार है। आज वह खुलकर हँस नहीं सकता। हँसने के लिए भी ‘लाफिंग क्लब’ का सहारा लेना पड़ता है। शुद्ध हवा के लिए आक्सीजन पार्लर जाना पड़ता है। बंद बोत्ल का पानी पीना पड़ता है। इंस्टेंट फुड़ खाना पड़ता है। खेलने के लिए, एक-दूसरे से बात करने के लिए भी वक्‍त की कमी है।’ कुलमिलाकर यह कह सकते हैं कि श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में जीवन का संघर्ष है और उनका साहित्य सामाजिक सरोकारों से जुड़ा है।

अभिप्राय यह है कि अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल दोनों ही सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़े हुए तथा सामाजिक विकृतियों से विचलित ऐसे कथाकार हैं जो चाहते हैं कि भावी पीढ़ियों को इससे बेहतर समाज विरासत में मिलें; इसके लिए इन दोनों रचनाकारों ने उदात्त जीवन मूल्यों के प्रति पाठक में बेचैनी पैदा करने का सार्थक प्रयास किया है। निस्संदेह ज्ञानपीठ पुरस्कार इन्हें साझे में दिए जाने के बजाय अलग - अलग पूरा - पूरा दिया जाता, तो अधिक न्यायसंगत होता।

5 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए बधाई। उनके जीवन वृत्त पर अच्छा लेख लिखने के लिए बधाई॥

NISHA MAHARANA ने कहा…

good article.

मनीष कुमार ‘नीलू’ ने कहा…

इनके बारे में इतनी साड़ी जानकारी अपने दिया ...
बहुत सुन्दर लेख प्रस्तुत करने के लिए आभार
मौका मिले तो कभी मेरे ब्लॉग पे आये आपका स्वागत
है !

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर लेख प्रस्तुत करने के लिए आभार

डॉ.बी.बालाजी ने कहा…

अपने देश में प्रतिभा की पहचान देर से ही की जाती है. 'देर आए दुरुस्त आए'.अच्छा है, पूरी तरह से भूल नहीं
गए. लेख बढ़िया है. लिखते राहिए.