शनिवार, 23 जून 2012

जनकवि वेमना



”आत्मशुद्धि लेनि आचारामदियेला ?
भांडशुद्धि लेनि पाकमेला ?
चित्तशुद्धि लेनि शिवपूजलेलारा ?
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(आत्मशुद्धि के बिना आचरण कैसा ?/ पात्र शुद्धि के बिना पकाना कैसा ?/ चित्तशुद्धि के बिना शिवपूजा कैसी ?/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.)

प्रायः वेमना को योगी या संत के रूप में याद किया जाता है लेकिन वास्तव में वे महाकवि हैं, जनकवि हैं. वेमना ने तत्कालीन समाज के प्रति विद्रोह किया. उनके पदों में विद्रोही स्वर गूँज उठता है. उनके पदों को आगे देखेंगे. पहले वेमना के जन्म और समय के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त कर लें.

युग प्रवर्तक वेमना की जन्मतिथि को लेकर काफी वाद-विवाद है. कुछ विद्वान उन्हें 15 वीं शती के कवि मानते हैं तो कुछ विद्वान 16 वीं शती और 17 वीं शती के कवि मानते हैं. स्मरणीय है कि फ्रेंच विद्वान जे.ए.डुबोई (J.A.Dubois) ने 1792 से 1823 तक भारत में रहकर हिंदुओं के रीति-रिवाज, संस्कार, संस्कृति, मान्यताओं आदि के बारे में अपने महाकाय ग्रंथ Hindus Manners, Customs and Ceremonies’ (1806) में विस्तार से लिखा है. सर्वप्रथम उन्होंने ही वेमना के पदों के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि वेमना के पदों में माधुर्य के साथ साथ तत्कालीन भ्रष्ट समाज के प्रति विद्रोह का स्वर है.  

वेमना के पदों को संकलित करके उन्हें मुद्रित रूप में लाने का श्रेय चार्ल्स फिलिप ब्राउन को जाता है. डुबोई की पुस्तक में वेमना के बारे में पढ़कर ब्राउन इतने प्रभावित हो गए कि लगातार 18 वर्ष तक वेमना पर शोध करते रहे. उन्होंने उनके जीवन से संबंधित अनेक बातों पर प्रकाश डाला. उनके मतानुसार वेमना 17 वीं शती के कवि हैं. ब्राउन ने अपनी किताब My Discovery of Vemana’ (1824) में स्पष्ट किया है कि – It is said that in verse 707 he has fixed the date of birth which is believed to have been his own. This date coincides with A.D. 1652. The date is given in the cycle of sixty years, but which cycle is intended is unknown. Many verses, however, prove satisfactorily that he wrote in the latter part of the seventh century when the Mohamedans were governors of that part of India.”  (डॉ. एन. गोपि, प्रजाकवि वेमना, पृ.सं. 66 से उद्धृत).  वेमना पर शोध करते समय ब्राउन को तेलुगु में कोई किताब उपलब्ध नहीं हुई. इस पर वे कहते हैं कि - I did not possess a single Telugu Volume, but ignorant as I was of all the poets in the language, the Abbe Dubois in his ‘Account of the Hindus’, has acquainted me with the name of Vemana, a rustic epigrammatist. I was led to pursue and translate the verses of Vemana; about as long as Scotts Marmion, 1866.” (डॉ.एन.गोपि, प्रजाकवि वेमना, पृ.सं. 65 से उद्धृत).

वेमना की जन्मतिथि के निर्धारण के लिए इतिहासकारों ने निम्नलिखित पद को आधार बनाया है –
“नंदन संवत्सरमुना  
पोंदुगा कार्तीक शुद्ध पुन्नम नाडुन्
विन्द्याद्रि सेतु बंधना
संदुना नोका वीरुडेला सरसुना वेमा.”
(नंदन नाम संवत्सर में/ शुद्ध कार्तिक पूर्णिमा के दिन/ विन्ध्य और हिमाद्रि के बीच/ एक वीर है वेमा.)

तेलुगु कैलेंडर के अनुसार यह संवत्सर हर साठ साल के बाद पुनः आता है. वेमना के पद में नंदन नाम संवत्सर का उल्लेख है. 1652, 1712 और 1772 नंदन संवत्सर हैं. ब्राउन 1652 को ही वेमना की जन्मतिथि मानते हैं तथा अनेक विद्वानों ने इसे ही प्रामाणिक माना है. यह भी ध्यान देने की बात है कि 2012 भी नंदन नाम संवत्सर ही है अर्थात यह वर्ष वेमना का 360 वाँ वर्ष है.

वेमना का जन्म रेड्डी वंश में हुआ था. आंध्र प्रदेश में रेड्डी संपन्न जाति है. जिस तरह वेमना की जन्मतिथि को लेकर मतभेद है उसी तरह उनके जन्म स्थान के संबंध में भी मतभेद है. वेमना के ही एक अन्य पद से यह अनुमान लगाया जाता है कि वे रायलसीमा के कोंडावीडु के मूका चिंतापल्ले गाँव के निवासी थे –
“ऊरू कोंडावीडु, वुनिकी पश्चिमवीदी
मूका चिंतापल्ले मोदटि इल्लू
एड्डे रेड्डी कुलमदेमनी तेलुपुदु
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(शहर कोंडावीडु, जो पश्चिम दिशा में है/ मूका चिंतापल्ले मेरा पहला घर है/ वंश तो है रेड्डी पर क्या बताऊँ / विश्वदाभिराम सुनरे वेमा).

कहा जाता है कि कदिरी जिले में स्थित काटूरुपल्ले नामक गाँव में शरवरी नामक संवत्सर में रामनवमी के दिन वेमना की मृत्यु हुई. आज भी काटूरुपल्ले में वेमना की समाधि विद्यमान है. वैसे जन्मतिथि, जन्मस्थान, जाति, कुल-गोत्र आदि के विवाद में कुछ नहीं धरा है. असल बात यह है कि वेमना तब भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं.

वेमना के पदों में तत्कालीन समाज को भली-भांति देखा जा सकता है. उनके पद लोकभाषा की धरोहर हैं. वेमना के उद्गारों में लोकजीवन, भक्ति, ज्ञान, नीति, सदाचार आदि मुखरित हैं. अन्तःसाक्ष्य के आधार पर कहा जाता है कि योगी बनने से पूर्व वेमना भी भोगलिप्सा में प्रवृत्त थे. बचपन में ही माँ का स्वर्गवास हो गया अतः घर में वे सबके लाड़ले थे. तत्कालीन समाज में वेश्यावृत्ति चरमोत्कर्ष पर थी. संपन्न लोगों के लिए वेश्याओं के पास जाना शान समझा जाता था. अपने यौवनकाल में वेमना भी एक वेश्या के प्रति आसक्त थे. उस वेश्या को प्रसन्न करने के लिए वेमना ने अपनी भाभी से गहने माँगे. वेमना को सही दिशा में लाने और उस वेश्या से छुटकारा दिलाने के लिए उनकी भाभी ने उन्हें गहने इस शर्त पर दिए कि वे गहने पहनने के बाद वेश्या के नग्न रूप का दर्शन अवश्य करें. पूर्णतः नग्न स्त्रीदेह को देखने के बाद वेमना का स्त्रीदेह के प्रति मोहभंग हो गया और उन्होंने सांसारिक सुख त्याग दिया.

जैसा कि पहले ही संकेत किया गया है, वेमना के पदों में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियाँ मुखरित हैं. इतना ही नहीं उनमें भौगोलिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और लोक जीवन भी निहित है. उन्होंने अपने पदों में अपने अनुभव को अभिव्यक्त किया है, विशेष रूप से ‘कंद’, ‘तेटा गीति’ और ‘आटावेलदि’ नामक छंदों में. वेमना आशु कवि हैं. उनके पदों में चार पंक्तियाँ होती हैं. प्रथम तीन पंक्तियों में कोई-न-कोई सूक्ति अवश्य होती है और अंतिम पंक्ति में आत्मसंबोधन निहित है. यह आत्मसंबोधन एक तरह से वेमना के पदों की विशेषता है. उदाहरण के लिए देखें –

“पसुल वन्ने वेरु पालोक वर्णमौ
बुष्प जाति वेरु पूज योकटे
दर्शनंबु वेरु दैवंबु योक्कटे
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(पशुओं के वर्ण है अलग अलग, दूध का वर्ण एक है/ पुष्प-जाति है अलग अलग, पूजा तो एक है/ रूप है अलग अलग, देव तो एक ही है/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा).  

तत्कालीन समाज में संपन्न लोगों के बड़े बड़े घर होते थे. उन घरों के चारों ओर बड़े बड़े फाटक, पेड़-पौधे आदि हुआ करते थे. वेमना कहते हैं कि संपन्न वर्ग बड़े बड़े आलीशान घर बनाते हैं और उस घर की सुंदरता को देखकर ऐंठते रहते हैं लेकिन उन्हें पता नहीं है कि उनका दंभ टूट सकता है–
”चेट्टू चेमा गोट्टी चुट्टू गोडालू बेट्टी
इट्टूनट्टू पेद्दा इल्लू गट्टी
मित्तिपडूनु नरुडू मीदि चेटेरुगका
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(पेड़-पौधे लगाकर चारों ओर दीवार बनाकर/ इधर-उधर बड़े बड़े घर बनाकर/ ऐंठता रहता है मनुष्य आनेवाली विपत्ति को न जानकर/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा).

वेमना ने अपने समय के ग्रामीण परिवेश को बखूबी उजागर किया है. उन्होंने तत्कालीन आंध्र प्रदेश के गाँवों और ग्रामीण जनता की गाथा का अंकन अपने पदों में किया है. वेमना के हर पद में लोक है. लोकभाषा ही उनकी शक्ति है. वे अपनी मिट्टी से गहरे जुड़े हुए रचनाकार हैं. इसीलिए वे कहते हैं –
“वेल्य भूमि तल्ली वितन्नमु तंड्री
पंटलरया सुतुलु पाडिपरमु
धर्ममु तनपालि दैवमु सिद्धमु
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(उर्वर भूमि है माँ बीज है पिता/ उनकी फसल हैं बच्चे/ सदाचरण है उनका संरक्षक/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.).

उस जमाने में जमींदारी प्रथा थी. जमींदार किसानों को ऋण देकर उनका खून चूसते थे. ऋण न चुका पाने के कारण किसानों को जमींदार के यहाँ ‘पालेरू’ (बंधुआ मजदूर) बनकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी काम करना पड़ता था. कुछ लोग निरुपायता और मजबूरी की स्थिति में अपनी जमीन छोड़कर दूसरे प्रदेश में जा बसते थे. वेमना ने उन जमींदारों, दलालों और अधिकारियों पर तीखा प्रहार किया जो किसानों के श्रम का शोषण करते थे और उनसे उनकी भूमि छीन रहे थे –
“भूपति कृपनम्मी भूमि तेरुचुवाडू
प्रजला युसुरु दाकि पडुनु पिदपा
येगुरवेयि बंति येंदाका निल्चुरा
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(जमींदार की कृपा पर भूमि को छीननेवाले/ जनता की आह से बाद में नीचे गिरोगे/ ऊपर फेंकी  हुई गेंद कब तक रुकेगी / विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.)

वेमना ने देखा कि हमारा समाज जाति के नाम पर विभाजित है. वेमना के समय में भी गाँवों में जाति के नाम पर अलग अलग बस्तियाँ हुआ करती थीं. यह स्थिति आज भी आंध्र प्रदेश के गाँवों में देखी जा सकती है - धोबी बस्ती, कुम्हार बस्ती, भंगी बस्ती आदि. ग्राम जीवन में धोबी को अधिक महत्व दिया जाता है. यह भी एक मान्यता है कि यदि अन्नप्राशन के समय बच्चे को पहले धोबी के हाथ से अन्न खिलाया जाए तो शुभ होगा. वेमना कहते हैं कि धोबी सिर्फ कपड़ों का मैल साफ नहीं करता बल्कि समाज का मैल भी साफ करता है –
“चाकिवाडू कोका चीकाकू पडजेसि
मैलबुच्चि मंचि मडुपु जेयु
बुद्धि चेप्पु वाडु गुद्धिते नेमया !
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(धोबी साड़ी को घिस घिस कर/ मैल निकालकर साफ सुथरा बनाता है;/ सद्बुद्धि देने वाला अगर घूँसा भी मारे तो क्या !/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.).

वेमना यह मानते हैं कि किसी को जन्म और जाति के आधार पर नहीं आंका जा सकता अपितु  गुण के आधार पर ही किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता की पहचान होती है –
“गुणमुलु कलवानि कुल मेंचगा नेल
गुणमुलु कलिगनेनि कोटि सेयु
गुणमुलेका युन्न गुड्डी गुव्वयु लेदु
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(सद्गुणी व्यक्ति की जाति पूछने की क्या आवश्यकता/ उनके अच्छे गुण ही उन्हें गौरव दिलाएंगे/ गुणहीन है फूटी कौड़ी के बराबर/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.) इस पद को पढ़ते समय स्वतः ही कबीर का प्रसिद्ध दोहा याद आना स्वाभाविक है – “जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान, मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान.”

सज्जन के गुणों का परिचय देते हुए वेमना कहते हैं कि –
“मृग मदंबू चूड मीद नल्ल्गनुंडु
बरिढविल्लु दानि परिमळंबु
गुरुवुलैन वारि गुणमु लीलागुरा
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”  
(कस्तूरी मृग ऊपर से काला है/ उसकी सुगंध दूर दूर तक व्याप्त है/ गुरु के गुण भी ऐसे ही हैं/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.).

इसी तरह एक और उदाहरण देखें –
“मीरपगिंजा चूड मीद नल्ल्गनुंडु
कोरिकि चूड लोना चुरुकुमनुनु
सज्जनुलगुवारि सारमिट्लुंडुरा
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(मिर्च ऊपर से काली है/ काटने पर तीखी है/ सज्जन का सार भी ऐसा ही है/ विश्वदाभिराम सुनारे वेमा).

वेमना जाति-पांत और छुआछूत के विरोधी थे. उनके मतानुसार सब एक ही जाति के हैं और वह है मानव जाति. वस्तुतः मानवता ही वेमना का मत है. वे विश्वमानव की कल्पना करते हैं. इसीलिए वे कहते हैं कि –
“कुलमु चेताबट्टि गुंपिंचा नेटिकि
पादु उन्न चोटा प्रबलु वित्तु
एटि कुलम्बिंका येक्कडि द्विजुडया
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(जाति को हाथ में पकड़कर इतराना किसलिए/ अनुकूल स्थिति में बीज अंकुरित होते हैं/ कैसी  जाति कैसा ब्राह्मण/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा).

वेमना जाति प्रथा के निर्मूलन के पक्षधर थे. वी.आर. नरुला ने अपनी पुस्तक ‘वेमना’ में यह स्पष्ट किया है कि As a social philosopher, Vemana is an advocate of human equality. He believes fervently that there can be no equality so long as the caste system, with its many gradations and degradations, its totems and taboos, is not done away with.” (डॉ.एन.गोपि; प्रजाकवि वेमना, पृ.सं.175 से उद्धृत).

वेमना ने तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों को भी बखूबी उजागर किया है. वेमना राज्याश्रय का विरोध करते हैं चूँकि कुछ ऐसे राजा थे जो कवियों को देय धन को भी हड़प लेते थे और उन्हें निस्सहाय छोड़ देते थे. ऐसी व्यवस्था की तुलना उन्होंने आवारा और कटखने कुत्ते से  करते हुए कहा है कि –
“गंडमैन दोंगा कवुला सोम्मेगवेसी
कंडा कावाराना कड़िय बलिसी
गंडुकुक्का वलेनु काटुकु दिरुगुनु
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(राजा ही चोर बनकर कवियों का धन लूटे/ बाहुबल दिखाकर शक्ति प्रदर्शन करे/ आवारा कुत्ते की तरह काटने को तैयार!/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.). इससे यह स्पष्ट होता है कि जब समाज में अनीति बढ़ती है तब योग्यता का अपमान होता है, उसका तिरस्कार होता है. फलतः कुशासन का जन्म होना स्वाभाविक है.    

वेमना ने एक पद के माध्यम से यह बताया है कि यदि सत्ता अयोग्य के हाथों लगा जाए तो मर्कट नीति ही होगी-
“क्रोति नोनर देच्चि क्रोत्ता पट्टमु गट्टि
कोंडमृच्चु लेल्ल गोल्चिनट्लु
नीतिहीनु नोद्दा निर्भाग्युलंदरू
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(बंदर को ले आकर राजतिलक करके/ सब मर्कट मिलकर उसका गुणगान करते हैं / नीतिहीन के निकट सब निर्भाग्य हैं/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.).

वेमना के पदों में सांस्कृतिक पक्ष भी विद्यमान है. तत्कालीन समाज में स्त्री-पुरुष की वेशभूषा विशिष्ट थी. वेमना की कविता से ज्ञात होता है कि पुरुष पगड़ी पहनते थे. संपन्न लोगों की पगड़ियों में मोती और नग होते थे. इतना ही नहीं वे मोती और नग जड़ित आभूषण पहनते थे – जैसे झुमके, अंगूठी, कड़े, मालाएँ आदि. देखिए वेमना ने एक संपन्न व्यक्ति का चित्र कैसे खींचा है-
“पाग पच्चडमु पैकि कूसंबुनु
पोगुलुंगरमुलु बोज्ज कडुपू....”
(पगड़ी के ऊपर मरकत जड़े हुए/ झुमके, अंगूठी और थुलथुल पेट ...).

पुरुष अपने हाथों में कड़े पहनते थे (“मोंडिवानिकेला मुन्जेती कडियालू?”; जिद्दी के हाथों में कड़े क्यों हों?). स्त्री और पुरुष, दोनों ही, कानों में झुमके पहनते थे. संपन्न लोगों के आभूषणों में नग और मोती होते थे तो गरीब लोगों के आभूषणों में नग और मोती के स्थान पर साधारण मनके होते थे.

वेशभूषा ही नहीं संस्कार भी लोक का ही अंग है. आंध्र प्रदेश में सगोत्र विवाह (consanguineous marriage)  की प्रथा रही है. तमिलों में यह प्रथा नहीं है. इसका वर्णन वेमना के इस पद में प्राप्त होता है –
“मेनमामा बिड्डा मेरिसि पेंड्लामाए
अरवलंदु चेल्लेलायेनदियु
वलसिना पुण्यंबु वलदन्न दोषंबु
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(मामा की बेटी हुई पत्नी/ तमिलों में तो बहन हुई/ शादी करें तो पुण्य, न तो दोष/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.) आंध्र में पहले मातृसत्तात्मक व्यवस्था थी. वस्तुतः इस तरह के विवाह इसलिए संपन्न करवाए जाते थे कि घर की संपत्ति घर में ही रहे.

पत्नी के गुलाम होकर अपने कर्तव्यों को ठोकर मारने वाले पुत्र हर काल में पाए जाते हैं –
“तल्लिदंड्रुलपयि दयलेनि पुत्रुंडु
पुट्टेनेमि वाडु गिट्टेनेमि
यिंट बुट्टि पेरिगि यिल्लालि बंटुरा
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(माँ-बाप के प्रति निर्दय पुत्र/ चाहे जिए या मरे/ घर में पला-पुसा पर स्त्री का गुलाम हुआ/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.)

एक जमाने में संयुक्त परिवार दिखाई देते थे. लेकिन धीरे धीरे पारिवारिक विघटन होने लगा और एकल परिवार सामने आया. पारिवारिक विघटन के अनेक कारण हो सकते हैं. अविवेक उनमें से एक कारण है अतः वेमना कहते हैं कि -
“आलि माटलु विनि अन्नदम्मुलू बासि
वेरुबड्डा वाडु वेर्री वाडु
कुक्का तोका बट्टि गोदावरीदुना
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(पत्नी की बातों में आकर भाई-भाई लड़कर/ एक-दूसरे से जुदा होने वाले मूर्ख हैं/ कुत्ते की पूँछ को पकड़कर गोदावरी को पार करना क्या संभव है/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.)

लेकिन इन पदों के आधार पर वेमना को स्त्री विरोधी करार नहीं दिया जा सकता. असल में वेमना का यह आशय कतई नहीं है कि पत्नी को छोड़ दें. वे तो यहाँ तक कहते हैं कि –
“कामि गानिवाडु कवि गाडु रविगाडु
कामि गाका मोक्ष कामि गाडु
कामि ऐना वाडु कवि अउनु रवि अउनु
विश्वदाभिरामा विनुरा वेमा.”
(जो कामी नहीं है वह न कवि है न रवि/ काम के बिना मोक्ष की सिद्धि नहीं होगी/ जो कामी है वह कवि भी है और रवि भी/ विश्वदाभिराम सुनरे वेमा.).

इसके अलावा वेमना के पदों में शैव और वैष्णव दर्शन भी दर्शनीय है. परंतु जो चीज हमें आज के संदर्भ में पुनः पुनः वेमना के पदों पर चिंतन-मनन के लिए प्रेरित करती है वह यह है कि वे मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, जात-पांत, ऊँच-नीच, अस्पृश्यता आदि का खंडन करते हैं तथा उनकी दृष्टि में मानवता ही सबसे श्रेष्ठ जीवनमूल्य है.  

1 टिप्पणी:

ऋषभ देव शर्मा ने कहा…

आपका विस्तृत आलेख पढते हुए अचानक याद आया कि कई वर्ष पहले मैंने भी 'वेमना शती' की भूमिका लिखी थी. खोजने पर वह आलेख 'ऋषभ उवाच' पर मिल गया.

लिंक-
http://rishabhuvach.blogspot.in/2009/08/blog-post_05.html