गुरुवार, 22 नवंबर 2012

महात्मा गांधी की हिंदी निष्ठा : दिनकर की दृष्टि से

गत दिनों (14 अक्टूबर 2012 को) दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (मद्रास) का 75 वाँ दीक्षांत समारोह चेन्नई में संपन्न हुआ. इस अवसर पर ‘अमृत स्मारिका’ का प्रकाशन किया गया है. हिंदी के प्रचार-प्रसार में दक्षिण भारत के लोगों एवं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के योगदान को रेखांकित करने वाले आलेखों को इस स्मारिका में संकलित किया गया है. यह स्मारिका वास्तव में संग्रहणीय बन पड़ी है. इस दस्तावेजी संकलन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है इसका प्रथम आलेख ‘गांधीजी और हिंदी प्रचार’ जिसके लेखक डॉ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं. 

राष्ट्रकवि दिनकर ने इस निबंध में यह याद दिलाया है कि गांधी युग से पूर्व स्वामी दयानंद और स्वामी श्रद्धानंद ने हिंदी को राष्ट्रभाषा और शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया था. 1918 में जब महात्मा गांधी हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर अधिवेशन के सभापति चुने गए तो उन्होंने दक्षिण में हिंदी के प्रचार के बारे में गहराई से विचार-विमर्श किया. उन्होंने महसूस किया कि अंतःप्रांतीय व्यवहार, राष्ट्रीय गतिविधि, कांग्रेस के अधिवेशन और उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी को स्वीकार करना अपरिहार्य है क्योंकि ऐसा करके ही भारत के जनसाधारण तक पहुँचा जा सकता है. गांधी जी इस विषय में कितने गंभीर थे इसका पता 29 मार्च 1918 के उनके भाषण से लगता है जिसमें उन्होंने कहा था कि यह भाषा का विषय बड़ा भारी और बड़ा ही महत्वपूर्ण है; यदि सब नेता सब काम छोड़कर इसी विषय पर लगें तो बस है. उन्होंने आगे जो बात कही उसे आज भी व्यावहारिक रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा था, ‘हमें ऐसा उद्योग करना चाहिए कि एक वर्ष में राजकीय सभाओं में, कांग्रेस में, प्रांतीय भाषाओं में और अन्य समाज और सम्मेलनों में अंग्रेज़ी का एक भी शब्द सुनाई नहीं पड़े. हम अंग्रेज़ी का व्यवहार बिलकुल त्याग दें. आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें.’ 

‘दिनकर’ जी ने आगे बताया है कि महात्मा गांधी हिंदी और उर्दू को दो अलग भाषाएँ नहीं मानते थे. उन्हें हिंदी न तो एकदम संस्कृतमयी स्वीकार थी और न एकदम फारसी से लदी ही. उनके लिए आदर्श हिंदी वह थी जिसे जनसमूह सहज में समझ लें. इसीलिए उन्होंने देहाती बोली को मधुर और अकृत्रिम माना. वे चाहते थे कि लिपि चाहे अरबी रहे अथवा नागरी, भाषा का रूप देहाती बोली वाला ही रहना चाहिए जो गंगा-यमुना के संगम सा शोभित और अचल रह सकता है. ‘दिनकर’ जी ने यह भी याद दिलाया है कि गांधी जी चाहते थे कि इस भाषा में फारसी और संस्कृत के प्रचलित शब्द सहज भाव से स्वीकार किए जाएँ ताकि यह हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन सके. इसे उन्होंने भारतवासियों की अंग्रेज़ी के मोह से मुक्ति के लिए भी आवश्यक माना. गांधी जी मानते थे कि अंग्रेज़ी का ज्ञान भारतवासियों के लिए बहुत आवश्यक है लेकिन किसी भाषा को उसका उचित स्थान देना एक बात है और उसकी जड़-पूजा करना दूसरी. इस संदर्भ में ‘दिनकर’ जी जोर देकर कहते हैं कि अंग्रेज़ी का उचित स्थान इस देश में लैंग्वेज ऑफ काम्प्रिहेंशन अथवा ज्ञान की एक भाषा भर का हो सकता. इसके अलावा शिक्षा और शासन के सारे कार्य भारतीय भाषा (जनता की भाषा) में होने चाहिए. आगे उन्होंने पुनः गांधी जी को उद्धृत किया है कि जब तक हम हिंदी भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रांतीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक हैं. 

दरअसल 1918 का इंदौर सम्मलेन हिंदी आंदोलन के लिए ही नहीं भारतीय संस्कृति की सामासिकता की दृष्टि से भी ऐतिहासिक महत्व का है. इस सम्मलेन में गांधी जी ने राष्ट्रभाषा की अपनी अवधारणा तो प्रस्तुत की ही यह प्रस्ताव भी रखा कि प्रति वर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने को प्रयाग जाएँ और हिंदी भाषा-भाषी 6 युवकों को दक्षिणी भाषाएँ सीखने तथा साथ साथ वहाँ हिंदी का प्रचार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएँ.  दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना पर कुछ वर्ष तक इस प्रकार का आदान-प्रदान चला भी, लेकिन बाद में रुक गया. लगभग एक शताब्दी बाद आज भी यह योजना उतनी ही प्रासंगिक और जरूरी है. अब इस आदान-प्रदान योजना में पूर्वोत्तर भारत को भी शामिल करना जरूरी है और संख्या को भी 6 के बजाय 60 से 600 तक बढ़ाया जा सकता है. इस प्रकार हिंदी के जो स्वयंसेवक तैयार होंगे वे भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रचारक बन सकेंगे. 

अपने आलेख में डॉ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने एक रोचक वाकये का जिक्र करते हुए लिखा है कि गांधी जी ने अपने सतत चलने वाले प्रचार से देश में वह हवा पैदा कर दी कि राष्ट्रीय सभा-सम्मेलनों में वक्ता जब अंग्रेज़ी में भाषण शुरू करते, तब अहिंदी-भाषी श्रोता भी ‘हिंदी-हिंदी’ का नारा लगाने लगते थे. इस नई हवा का असर देश के बड़े लोगों पर भी पड़ने लगा. 6 अप्रैल सन 1920 ई. को भावनगर (सौराष्ट्र) में गुजराती साहित्य परिषद का छठा अधिवेशन हुआ, जिसके सभापति श्री रवींद्रनाथ ठाकुर थे. इस सम्मेलन में अपना अध्यक्षीय भाषण गुरुदेव ने हिंदी में दिया था. भाषण के मुखबंध में उन्होंने कहा था कि “आपकी सेवा में खड़ा होकर विदेशीय भाषा कहूँ, यह हम चाहते नहीं. पर जिस प्रांत में मेरा घर है, वहाँ सभा में कहने लायक हिंदी का व्यवहार है नहीं. महात्मा गांधी महाराज की भी आज्ञा है हिंदी में कहने के लिए. यदि हम समर्थ होते, तब इससे बड़ा आनंद कुछ होता नहीं. असमर्थ होने पर भी आपकी सेवा में दो-चार बात हिंदी में बोलूँगा.” यही नहीं, यह सूचना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि 1925 में हिंदी साहित्य सम्मलेन के भरतपुर अधिवेशन में भी गुरुदेव पधारे थे और हिंदी में बोलकर हिंदी के पक्ष का समर्थन किया था. इतना ही नहीं ‘दिनकर’ जी ने इस आलेख में यह भी रेखांकित किया है कि ऐनी बसंट, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और ऐसी ही अनेक महापुरुषों की भाँति ई.वी.रामस्वामी नायकर (पेरियार) भी हिंदी प्रचार के अत्यंत उत्साही समर्थक रहे हैं. 

हम पुनः कहना चाहेंगे कि ‘दिनकर’ जी का उक्त आलेख ऐतिहासिक धरोहर के समान है जिसे ‘अमृत स्मारिका’ में प्रकाशित करके दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने आज की पीढ़ी की आँख खोलने का काम किया है. इस हेतु अमृत स्मारिका के प्रधान संपादक श्री आर.एफ.नीरलकट्टी एवं प्रबंध संपादक श्री आर. राजवेल अभिनंदनीय हैं. हमारे विचार से इस सामग्री का प्रचार-प्रसार भारत भर में किया जाना चाहिए. 

3 टिप्‍पणियां:

neelakantha ने कहा…

Thank you for the valuable information.. I want to know how can i get this copy..?

neelakantha ने कहा…

I want to have one copy of "Amritha Smarika". where can i get from? Can i get through VPP or not?

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

@ Shri Neelakantha ji,
You can contact the below address for getting more information about "Amrit Smarika 2012"

Shri R.Rajvel
general Secretary
Dakshin Bharat Hindi Prachar Sabha
T.Nagar
Chennai - 600 017