शनिवार, 4 जुलाई 2015

‘चाँद’ का ‘फांसी’ अंक

हो जाता है शक्तिहीन जब, शासन अतिशय अविनय से।
लखता है जग बलिदानों की, पूर्ण विजय तब विस्मय से।।

‘चाँद’ का ‘फांसी’ अंक 
'चाँद' का 'फाँसी'  अंक
राधाकृष्ण प्रकाशन
1988 पहला पुस्तकाकार संस्करण
1997 द्वितीय आवृत्ति 

                              फाँसी के फंदे में डाकू कह, जो फाँसे जाते हैं;
                              उनसे बढ़कर उन लोगों को, हम अपराधी पाते हैं।
                              निरपराध जनता का रण में, जो नित रुधिर बहाते हैं; 
                              नर-घातक नृशंस हैं फिर भी, जो नरपाल कहाते हैं। 
                                                     दमन निरत दुश्मन के मन पर, क्या अधिकार जमाया है?
                                                      अगणित अबलाओं का तूने विधवा-वेश बनाया है!! 
                                                ***                              ***
                           तूने क्रूर दृष्टि से अपनी, कितने ही घर घाले हैं; 
                           अमित अशक्त अबोध सरल शिशु हा अनाथ कर डाले हैं!
                          बंधुहीन हा बंधु अनेकों, पड़कर तेरे पाले हैं, 
                         पुत्रहीन कर वृद्ध पिता को, किए स्वकर मुख काले हैं।
                                                  अरी निश्चरी सर्वनाश का, यह क्या भाव समाया है?
                                                  अगणित अबलाओं का तूने विधवा-वेश बनाया है!! 
                                                                     (‘एक राष्ट्रीय आत्मा’, फाँसी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 226) 

[1]

2006 में पत्रकारिता डिप्लोमा करते समय भारतीय पत्रिकारिता का इतिहास, प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने नाम, संपादकों के नाम आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की. उसी अवधि में कक्षा में ‘चाँद’ के ‘मारवाड़ी’ और ‘फाँसी’ अंक तथा ‘हिंदू पंच’ के ‘बलिदानी’ अंक के बारे में भी जानने का मौक़ा मिला था. लेकिन उस अवधि में उन पत्रिकाओं को पढ़ना तो दूर की बात देखा तक नहीं. लाइब्रेरी में पत्रकारिता की पुस्तकें खोजते समय एक-दो बार देखा भी, पर विशेष ध्यान नहीं दिया. लेकिन पिछले दिनों जब ‘मनमीत’ और ‘शार्प रिपोर्टर’ के संपादक अरविंद कुमार सिंह और परिलेख प्रकाशन के संस्थापक अमन कुमार त्यागी हैदराबाद आए तो मैं उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की लाइब्रेरी दिखाने ले गई. अरविंद कुमार सिंह थोड़ी देर में ‘फाँसी अंक’ के साथ प्रकट हुए. उसे देखकर मैं चौंक उठी. हम लोगों ने उस अंक की जीरॉक्स भी करवा ली. अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि ‘शार्प रिपोर्टर’ के पत्रकारिता विशेषांक के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है तो अमन कुमार त्यागी ने सुझाया कि इस पर एक छोटा-सा लेख हो जाए तो अच्छा बन पड़ेगा. उन दोनों के आग्रह से मैंने इस अंक को पढ़ना शुरू किया. पढ़ने से बहुत सारे तथ्य सामने आए. भारतीय दंड व्यवस्था और कानून के बारे में जाना ही उसके साथ ही देश-विदेश की क्रांतियों और फाँसी के विभिन्न तरीकों से भी अवगत हुई. पढ़ते समय मेरा पूरा शरीर काँप उठा. ‘चाँद’ के इस ऐतिहासिक ‘फाँसी’ अंक के बारे में आपसे कुछ साझा करना चाहती हूँ. 

[2]

साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘चाँद’ का महत्वपूर्ण स्थान है. 1922 में इस पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रारंभ हुआ था. रामरख सिंह सहगल, महादेवी वर्मा आदि इसके संपादक रहे. पत्रिका में संपादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान नियत था. ‘फाँसी’ अंक [नवंबर 1928] के ‘संपादकीय विचार’ शीर्षक स्तंभ में संपादक की यह टिप्पणी सोचने पर बाध्य करती है – ‘समाज अपराधियों को तैयार करता है. अपराधी उसके यंत्र हैं, जो उसे पूरा करते हैं. सामाजिक वातावरण अपराध के उगने का क्षेत्र है. अपराधी तो एक बीज-जंतु है, जो क्षेत्र पाने पर उग पड़ता है. प्रत्येक समाज अपने योग्य अपराधी उत्पन्न कर लेता है. अपराध की समस्या में सामाजिक कारणों का व्यक्त करना शक्य नहीं.’ (संपादकीय विचार, ‘अपराध का विकास’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 6). राजनैतिक अपराधियों के बारे में कहा गया है कि ‘ये अपराधी निस्संदेह उच्च श्रेणी के होते हैं और इनके उद्देश्य तात्कालिक समाज-स्थिति के विपरीत होते हैं. राजनैतिक अपराधी क्रांतिवाद के प्रवर्तक होते हैं. क्रांतिवाद की प्रवृत्ति में उनकी उच्च परार्थ-वृत्ति ही अधिक होती है.’ (वही). 

यह भी ध्यान देने की बात है कि ‘चाँद’ के संपादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे. इसके साथ ही कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित करते थे जो समाज में स्त्रियों की स्थिति को उजागर करते थे. इसमें साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनैतिक विषय स्थान पाते थे. ‘चाँद’ के ‘फाँसी’ अंक में ‘दुबे की चिट्ठी’ नाम से प्रकाशित एक पत्र का छोटा-सा अंश देखें – 
                    ‘अजी संपादक जी महाराज, 
                                             जयराम जी की! 
                  आप ‘फाँसी-अंक’ निकालने जा रहे हैं? फाँसी पर इतनी खफगी? आखिर आप फाँसी से इतने नाराज                    क्यों हैं, पहले यह बताइए!’ 

इस पर संपादकीय टिप्पणी इस प्रकार है – 
‘मेरी क्षुद्र-बुद्धि में तो यही आता है कि फाँसी का दंड अनावश्यक होने के साथ ही साथ हिंसा तथा बर्बरता का द्योतक है. इसके विरुद्ध पाश्चात्य देशों के अनेक विद्वानों ने बहुत-कुछ लिखा है. अनेक पाश्चात्य  देशों में मृत्यु-दंड की अमानुषिक प्रथा उठती जा रही है. इस संबंध में प्रभावशाली आंदोलन हो रहे हैं! जब संसार अन्य बातों में सभ्यता की मूर्ति बन रहा है तो भारतवर्ष को इस विषय में सभ्यता का परिचय देना  चाहिए.’ (दुबे की चिट्ठी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 162) 

[3]

स्मरणीय है कि ‘फाँसी’ अंक का ऐतिहासिक महत्व है. पत्रिका के तेवर के बारे में क्या कहना. ‘फाँसी’ अंक पढ़ने से पता चलता है कि इसका तेवर तो ऐसा है कि बड़े बड़ों तक को चुनौती देने में कोई हिचक नहीं. इस संदर्भ में नरेशचंद्र चतुर्वेदी का कथन उल्लेखनीय है – ‘यों तो ‘चाँद’ अपनी विचारोत्तेजक शैली एवं नए भावबोध के कारण सभी से अलग विशिष्ट प्रकार का मासिक पत्र था. देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सभी प्रकार की सामग्री को इसमें प्रकाशित किया जाता था. अंग्रेजी राज के विरुद्ध भी उसका दृष्टिकोण बहुत साफ था और मैं समझता हूँ ‘फाँसी’ अंक उसी की चरम परिणति था. ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक जैसे प्रसिद्ध हुआ था उसी प्रकार ‘चाँद’ का ‘मारवाड़ी’ अंक भी बड़ा प्रसिद्ध हुआ था, परंतु तब अपने ही भाइयों के एक वर्ग और जाति के विरुद्ध सामग्री होने के कारण उसको वह स्थान नहीं मिल पाया जो ‘फाँसी’ अंक को मिला.’ (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, भूमिका, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1988 पहला पुस्तकाकार संस्करण, 1997 द्वितीय आवृत्ति). 

[4]

1928 नवंबर में दीवाली के अवसर पर ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक प्रकाशित हुआ था जो सवा तीन सौ पृष्ठों का था. यह ‘चाँद’ के सातवें वर्ष का प्रथम अंक था. इस अंक में फाँसी पर चढ़ाए गए शहीद पत्रकारों के जीवनवृत्त तो हैं ही, साथ ही फ्रांस की स्त्रियों, यूरोप, स्कॉटलैन्ड, रोम आदि प्रसिद्ध देशों के नायक-नायिकाओं के बलिदानों की कहानी से संबंधित सामग्री, विभिन्न देशों की क्रांतियों का इतिहास और उनके चित्र भी अंकित हैं. फ्रांस की राज्यक्रांति, 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता विद्रोह, प्राणदंड की क्रूरता आदि की जानकारी भी उपलब्ध है. यह अंक वास्तव में दस्तावेजी महत्व का है. इस अंक में भले ही ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खुला विद्रोह और बगावत की बात नहीं कही गई परंतु इस अंक में संकलित सामग्री प्रामाणिक, ऐतिहासिक और मार्मिक सामग्री है जो प्रकारांतर से विद्रोह और बगावत को बढ़ाने वाली है. इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने ‘चाँद’ के इस अंक को ज़ब्त कर लिया था. इस अंक का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि अमर शहीद सरदार भगतसिंह ने छद्म नाम से इस अंक में अनके लेख लिखे हैं. ध्यान देने की बात है कि बलवंत सिंह, युवक और विद्रोह आदि छद्मनामों से भगत सिंह ‘मतवाला’, ‘प्रताप’ आदि अनेक पत्रिकाओं में लेख लिखते थे. 

‘फाँसी अंक में जो महत्वपूर्ण सामग्री संकलित है उसे पाठक यदि ध्यान से पढ़ेंगे तो यह भलीभाँति समझ सकेंगे कि देश की आजादी के लिए कुर्बान होने वाले अनेक साहसी वीरों ने कैसे अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, कैसे उनके विचार थे और अपने देश के भविष्य को वे कैसा देखते थे. इस अंक में कई ऐसी विशेषताएँ भी हैं जो स्मरण करने योग्य हैं. क्रांतिकारियों ने अपने को गोपन रखकर यह प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करने के लिए किस तरह का जोखिम उठाया होगा! यह कम आश्चर्य की बात नहीं है. उनके बाद उनके संबंध में सही जानकारी देने वाले भी तो नहीं रह जाते. इस अंक में जिन आधुनिक फाँसी चढ़ने वाले वीरों का ब्यौरा दिया गया है 'उनमें से कुछ रेखाचित्र सरदार भगतसिंह ने जेल की काल-कोठारी से लिखकर भेजे थे. उन्होंने डॉ. मथुरासिंह और बलवंत सिंह के छद्म नामों से भी कुछ लेख लिखे थे. इस प्रकार की बहुत-सी सामग्री इस अंक में है. (आलेखों के) नीचे जो नाम दिए गए हैं, वे छद्म नाम हैं और उनके बारे में यह कहना कठिन है कि उनमें से कौन-से सरदार भगतसिंह के हैं और कौन-से अन्य व्यक्तियों के हैं.’ (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, भूमिका) 

[5] 

‘फाँसी’ अंक ने एक ओर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए प्राणों का बलिदान आवश्यक माना है तो दूसरी ओर भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में प्राणदंड/ फाँसी को क्रूर, अमानुषिक और पाशविक व्यवहार घोषित किया है. यही इस अंक का मूल स्वर है. इस अंक का संपादकीय निश्चित ही क्रांति के व्यावहारिक पहलू की सार्थकता को सिद्ध करता है. संपादकीय का शीर्षक है ‘क्रांतिवाद’. उसका एक अंश यहाँ प्रस्तुत करना समीचीन होगा. ‘फाँसी’ अंक के संपादक के रूप में आचार्य चतुरसेन शास्त्री यह लिखते हैं कि ‘क्रांति एक स्थिर सत्य है. पर यह बात सर्वथा असंभव है कि सत्य सब अवस्थाओं में मधुर और दर्शनीय हो. भावनाओं का मूल्य वास्तव में विपत्ति है, और कोई भी सद्भावना उतनी ही ऊँची उतरती है, जितनी कि विपत्तियों में वह स्थायी रहती है. सद्भावनाएँ भी कभी-कभी देखने में कुत्सित और भीषण हो जाती हैं. जैसे खोटे सोने से खोटापन निकालने को जब उसे तेज़ाब में पकाते हैं, तब उसका जैसा वीभत्स, मैला और भीषण रूप बनता है, वैसे ही जब सत्य कलुषित स्वार्थों से पद-दलित होता है तो विशुद्ध होने के लिए सत्य को भीषण बनना पड़ता है. क्रांति भी सत्य का एक भीषण रूप है. वह चाहे जैसी भयानक क्यों न हो, सदा सत्य की पवित्रता और शांति की पुनर्रचना के लिए ही होती है. ‘क्रांति’ एक बड़ा डरावना शब्द है. शांतिप्रिय लोग, चाहे वे कितने ही संपन्न और सशक्त क्यों न हों, क्रांति के नाम से डरते हैं. कोई राजसत्ता चाहे कैसी ही उदार क्यों न हो, उसने क्रांति को तत्क्षण बलपूर्वक दबा देने के लिए कड़े से कड़े कानून पहले ही से बना रक्खे हैं. मतलब यह कि राजा और प्रजा दोनों ही क्रांति के नाम से काँपते हैं और क्रांति के बीज को तत्काल नष्ट कर देने में सबसे अधिक व्यग्रता तथा तत्परता दिखाते हैं. इतना सब है, फिर भी संसार के सभी सभ्य राज्यों में – अच्छे से अच्छे ज़मानों में, भारी से भारी शक्ति के सामने समय-समय पर क्रांति बराबर हुई, और यद्यपि तत्कालीन सत्ताधारियों ने क्रांति के नेताओं को फाँसी देने, सूली पर चढ़ाने, गर्दन काटने, जीता जलाने, विष पिलाने और आजन्म कारावास के निर्दय और चरमसीमा के दुःख दिए हैं, परंतु बाद में इतिहास ने उन्हें मुक्तकंठ से धर्मात्मा और निर्दोष माना है.’ (संपादकीय विचार, ‘क्रांतिवाद,’ ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 8,9).

[6]

‘फाँसी’! मात्र कल्पना से ही पूरा शरीर काँप उठता है. इतिहास गवाह है कि इंग्लैंड में ‘6 वर्ष का बालक ढाई आने का रंग चुराने के अपराध में फाँसी पर चढ़ाया गया था!’ (संपादकीय विचार, ‘फाँसी’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 13). यहाँ तक कि भेड़ें और पोस्ट-ऑफिस की चिट्ठियाँ चुराने के अपराध में भी व्यक्तियों को फाँसी पर लटका दिया जाता था!!! आज भी फाँसी की सजा का औचित्य विवाद का ही विषय है. ‘फाँसी’ अंक में प्रकाशित ‘फाँसी के भिन्न-भिन्न तरीके’ (रमेशप्रसाद) शीर्षक लेख फाँसी देने की क्रूर प्रथा को आँखों के सामने चित्रों के माध्यम से उकेरता है. 12 चित्र हैं. अर्थात 12 अलग-अलग अमानुषिक तरीके. ‘कहा जाता है कि 600 प्रकार के फाँसी देने के यंत्र आविष्कृत हुए हैं और उनमें कई तो बड़े विचित्र हैं.’ (रमेशप्रसाद, ‘फाँसी के भिन्न-भिन्न रूप’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 142). फाँसी देने का अर्थ है मनुष्य का प्राण हरण. अक्सर फिल्मों में दिखाते हैं - गले में रस्सी डालकर, कुत्तों या मगरमच्छों से नुचवाकर, पत्थरों से मारकर, जीवित समाधि बनाकर, विष पिलाकर, सिर पर पानी डालकर, गरम तेल की कड़ाही में डालकर, पानी में डुबोकर, क्रॉस में लटकाकर, घोड़ों के पीछे बाँधकर, कीलों पर सुलाकर आदि आदि आदि तरीकों से व्यक्ति को मरने की कोशिश की जाती है. स्त्रियों को फाँसी देने के लिए ‘डकिंग स्टूल’ का प्रयोग किया जाता था. इस तरीके में अपराधी को एक कुर्सी पर बैठा दिया जाता था और कुर्सी को अपराधी सहित पानी में डुबोकर बाहर निकाला जाता था. पानी में अपराधी को रखने का समय धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था. अंत में जल समाधि. कितनी भयानक यातना. ध्यान देने की बात है कि इतना होने पर भी देशभक्त क्रांतिकारी अपने प्राणों की आहुति देने से पीछे नहीं हटे. लेखकों/पत्रकारों ने भी बराबर अपनी लेखनी के माध्यम से सरकार को चुनौती दी. आने वाली पीढ़ी के समक्ष अद्भुत मिसाल कायम की. 

[7]

स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ पुरुष ही नहीं थे महिलाएँ भी थीं. हर क्षेत्र में उस समय स्त्री सशक्त थी. देश की आजादी के लिए अपने आपको होम करने में अग्रणी थी. ‘फाँसी’ अंक में 1857 के कुछ संस्मरण भी दर्ज हैं. उन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि कैसे अंग्रेजी सेना ने गाँवों को जलाकर श्मसान बना दिया, बगावत का संदेश फैलाने वाले हिंदुस्तानी सिपाहियों को तोप से कैसे उड़ा दिया गया और असहाय स्त्रियों और बच्चों का संहार कैसे किया गया. इतिहास-लेखक जॉन का संस्मरण पढ़कर मेरा मन द्रवित हो उठा. वे लिखते हैं, ‘बूढ़ी औरतों और बच्चों का उसी तरह वध किया गया है, जिस प्रकार उन लोगों का, जो विप्लव के दोषी थे. इन लोगों को सोच-समझकर फाँसी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें उनके गाँव के अंदर जलाकर मार डाला गया; शायद कहीं-कहीं उन्हें इत्तिफाकिया गोली से भी उड़ा दिया गया. *** सड़कों के चौरास्तों पर और बाजारों में जो लाशें टंगी हुई थीं, उनको उतारने में सूर्योदय से सूर्यास्त तक मुर्दे ढोने वाली आठ-आठ गाडियाँ बराबर तीन-तीन महीने तक लगी रहीं और इस प्रकार एक स्थान पर छह हजार मनुष्यों को झटपट खतम करके परलोक भेज दिया गया.’ (सन 57 के कुछ संस्मरण, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 149-150). अंग्रेजों ने ही नहीं बल्कि भारतवासियों ने भी अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों की हत्या की. 15 जुलाई, सन 57 की इस घटना को भारतीय विप्लवकारियों के नाम पर सदा के लिए कलंक के रूप में याद किया जाता है. ‘बीबीगढ़ (कानपुर) के 125 अंग्रेज कैदी स्त्रियाँ और बच्चे कत्ल कर डाले गए और 16 तारीख को सवेरे उनकी लाशें एक कुँए में डाल दी गईं.’ (वही, पृ. 156). बूढ़े, स्त्रियाँ और बच्चे चाहे अंग्रेज हों या भारतीय, वे तो असहाय और निरीह होते हैं. उनका वध करना सच में शर्मनाक बात है. 

[8]

रघुवीर सिंह का आलेख ‘फ्रांस की राज्यक्रांति के कुछ रक्त रंजित पृष्ठ’ तथा त्रिलोचन पंत का आलेख ‘फ्रांस में स्त्रियों का प्राण-दंड’ पढ़ें तो फ्रांस के रक्त रंजित इतिहास का पता चलता है. शोलित कोर्दे, मेरी आंत्वानते, मादाम रोलाँ आदि को फ़्रांस की क्रांति में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी. उस समय तो तत्कालीन शासक खून के प्यासे थे. फाँसी देना या किसी को मौत के घाट उतराना उनके लिए आम बात थी. लेकिन क्रांतिकारी निडर थे. हर देश में हर समय क्रांतिकारी निडर होकर अपने लक्ष्य पर डटे रहे. आजादी से पहले तत्कालीन पत्रकारों ने भी ईमानदारी, निडरता और देशभक्ति का प्रमाण दिया. फाँसी के डर से वे अपने लक्ष्य से नहीं भटके बल्कि खुशी-खुशी फाँसी के तख्ते पर चढ़ गए और बलिदान हो गए. 

                                   देश-दृष्टि में, माता के चरणों का मैं अनुरागी था।
                                                   देश-द्रोहियों के विचार से, मैं केवल दुर्भागी था।।
                                   माता पर मरने वालों की, नज़रों में मैं त्यागी था।
                                                  निरंकुशों के लिए अगर मैं, कुछ था तो बस बागी था।।

                                  देश-प्रेम के मतवाले कब, झुके फाँसियों के भय से।
                                                 कौन शक्तियाँ हटा सकी हैं, उन वीरों को निश्चय से।।
                                  हो जाता है शक्तिहीन जब, शासन अतिशय अविनय से।
                                                 लखता है जग बलिदानों की, पूर्ण विजय तब विस्मय से।।

                                  वीर शहीदों के शोणित से, राष्ट्र-महल निर्माण हुए।
                                                उत्पीड़क बन राजकुलों के, भाग्य-दीप निर्वाण हुए।।
                                  माता के चरणों पर अर्पित, जिन देशों के प्राण हुए।।
                                                रहे न पल भर पराधीन फिर, प्राप्त उन्हें कल्याण हुए।।
                                                                                              (शोभाराम जी ‘धेनुसेवक’, फाँसी के तख्ते से) 

1 टिप्पणी:

Mahavir Uttranchali ने कहा…

Dear Sir / Madam ji,

Read my Article on Chand Fansi Ank (Published also "Harigandha" Monthly from Hariyana)

http://www.swargvibha.in/aalekh/all_aalekh/fanshiank.html