बुधवार, 20 अप्रैल 2011

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद


"ये आँखें ही अमर सपनों की हकी़क़त और

हकी़क़त का अमर सपना हैं

इन को देख पाना ही अपने आप को देखा पाना है, समझ

पाना है।" (शमशेर बहादुर सिंह, अम्‍न का राग)

शमशेर बहादुर सिंह का जन्‍म 13 जनवरी, 1911 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक गाँव एलम में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून तथा प्रयाग में हुई। वे हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी के विद्वान थे। इन तीनों ही भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। इसलिए तो वे कहते हैं कि "मैं उर्दू हिंदी का दोआब हूँ/ मैं वह आईना हूँ जिसमें आप हैं।"

शमशेर बहादुर सिंह को भली भाँति उनके साहित्य के माध्यम से जाना जा सकता है चूँकि उनका जीवन और साहित्य वस्तुतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पाखंड और दिखावा न तो उनके व्यक्‍तित्व में है और न ही उनके साहित्य में । उनका संसार निजीपन का संसार है। अनुभव का संसार है। जीवन ताप को सहकर वे सहज बने। यही सहजता उनके व्यक्‍तित्व और रचनाओं में मुखरित है। इसी के कारण उनके विचार भी उदात्त बने। वे हमेशा अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हैं और कहते हैं - "भूल कर जब राह - जब-जब राह... भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तुम ही आँख बन मेरे लिए।"

शमशेर का समूचा जीवन अभावों के कटघरे में बीता है पर वे कभी उफ तक नहीं की। हालात के आगे घुटने टेकना तो शायद वे जानते ही नहीं थे। शमशेर के साथ बिताए तीन वर्षों को याद करते हुए हेमराज मीणा बताते हैं कि "शमशेर जी साधारण चाय के स्थान पर हल्दी की चाय खुद बनाकर पीते थे और आर्थिक विपन्नता का आलम यह था कि घिसे और फटे हुए कुर्ते को हाथ से सिलकर काम चलाना पड़ता था।" ऐसी स्थिति में भी शमशेर टूटे नहीं, बिखरे नहीं। अड़िग होकर आगे बढ़ते रहें। यही आस्था और जिजीविषा उनकी रचनाओं में भी मुखरित है - "मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल/ जीवन:/ कण-समूह में हूँ मैं केवल/ एक कण।/ -कौन सहारा!/ मेरा कौन सहारा!"

कहा जाता है कि शमशेर बहादुर सिंह संकोची स्वभाव के थे। अतः वे अपने आपको रचनाओं के माध्यम से ही ज्यादातर अभिव्यक्‍त करते हैं - "बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी/ बात ही।/ ***/ दैन्य दानव। क्रूर स्थिति/ कंगाल बुद्धि मजूर घर भर।? एक जनता का - अमर घर/ एकता का स्वर।/ - अन्यथा स्वातंत्र्य इति।" ‘कुछ और कविताएँ’ की भूमिका में शमशेर ने स्वयं लिखा है कि "कवि का कर्म अपनी भावनाओं में , अपनी प्रेरणाओं में, अपने आंतरिक संस्कारों में समाज - सत्य के मर्म को ढालना - उसमें अपने को पाना है, और उस पाने को अपनी पूरी कलात्मक क्षमता से, पूरी सच्चाई के साथ व्यक्‍त करना है, जहाँ तक वह कर सकता है। मैं जितना महत्व ऐसी अभिव्यक्‍ति को देता हूँ - उतना उसके प्रकाशन को नहीं...।"

शमशेर संवेदनशील ही नहीं अपितु भावुक भी थे। नामवर सिंह ने उनकी भावुकता का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे एक बार नरेंद्र शर्मा की गिरफ्तारी की सूचना ने उन्हें विचलित कर दिया था। प्रेमलता वर्मा शमशेर के व्यक्‍तित्व के कुछ आयामों को सामने रखते हुए कहती हैं कि शमशेर की दुनिया ‘वाइब्रेंट’ थी। वे छलरहित मगर चुंबकीय आकर्षण वाले व्यक्‍ति थे। "शमशेर जी ऐसे ही मनुष्‍य थे, ऐसे ही रचनाकार थे। मानवीय संवेदना से भरपूर जिसे कोई भी आइडियोलोजी, एकपक्षीय आइडियोलोजी परास्त नहीं कर सकती थी। उनके जीवन मंथन की कमाई में कहीं लिंग भेद मौजूद न था। अपने मौलिक आदर्श पर चोट किए जाने पर वे उदास हो सकते थे, कड़वे कभी नहीं।" यही संवेदनशीलता और भावुकता शमशेर बहादुर सिंह की रचनाओं में भी द्रष्‍टव्य है। वे हमेशा कहा करते थे कि "कविता के माध्यम से मैंने प्यार करना - अधिक से अधिक चीजों को प्यार करना - सीखा है। मैं उसके द्वारा सौंदर्य तक पहुँचा हूँ।"

शमशेर बहादुर सिंह की प्रमुख रचनाएँ हैं - दोआब(1948), प्लाट का मोर्चा : काहानियों और स्केच(1952), कुछ कविताएँ(1959), कुछ और कविताएँ(1961), चुका भी हूँ नहीं मैं(1975), इतने पास अपने(1980), उदिता : अभिव्यक्‍ति का संघर्ष(1980), बात बोलेगी(1981), काल तुझसे होड़ है मेरी(1988), टूटी हुई बिखरी हुई(1990), कुछ गद्‍य रचनाएँ(1989) तथा कुछ और गद्‍य रचनाएँ (1992)। 

स्मरणीय है कि शमशेर ‘दूसरा सप्‍तक’ (1952) में सम्मिलित थे तथा उन्हें 1977 में ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का तुलसी पुरस्कार प्राप्‍त हुए थे। 1987 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें मैथिलीशरण गुप्‍त पुरस्कार और 1989 में कबीर प्ररस्कार से सम्मानित किया।

शमशेर का रचना संसार वैविध्यपूर्ण है। यह विविधता उनकी बहुआयामी प्रतिभा का संस्पर्श पाकार विराट हो उठती है। रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में "शमशेर की कविताओं में संगीत की मनःस्थिति बराबर चलती रहती है, जिसका संगमन बीच बीच में चित्रकला से होता है। कविता, संगीत और चित्रांकन की एक अद्‍भुत त्रिवेणी शमशेर के यहाँ प्रवाहित है।" शायद इसीलिए शमशेर ने भी कहा है कि "सारी कलाएँ एक - दूसरे में समोयी हुई हैं, हर कलाकृति दूसरी कलाकृति के अंदर से झाँकती है।" (दूसरा सप्‍तक, वक्‍तव्य)। वे यह भी कहते हैं कि "कला का संघर्ष समाज के संघर्ष से एकदम कोई अलग चीज़ नहीं हो सकती और इतिहास आज इन संघर्षों का साथ दे रहा है। सभी देशों में बेशक यहाँ भी दरअसल आज की कला का असली भेद और गुण उन लोक कलाकारों के पास है जो जन आंदोलनों में हिस्सा ले रहे हैं, टूटते हुए मध्यवर्ग के मुझ जैसे कवि उस भेद को पाने की कोशिश में लगे हुए हैं।" अतः वे अपने आप को यों अभिव्यक्‍त करते हैं - "खुश हूँ कि अकेला हूँ,/ कोई पास नहीं है.../ बजुज़ एक सुराही के,/ बजुज़ एक चटाई के,/ बजुज़ एक ज़रा से आकाश के,/ जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर..."

वस्तुतः शमशेर की कविताओं में मौन भी बोलता है। उनकी कविताओं में चीजें दिखाई देती हैं, बोलती भी हैं, कभी कभी चुप्पी भी साधती हैं। उनकी कविताओं में विलक्षणता दिखाई देती है। शमशेर अपनी कविताओं में अंतराल, विराम चिह्‍न, बिंदु, रिक्‍त स्थान, डैश आदि का प्रयोग करते हैं। इन्हें पूरी तरह से पकड़ पाना मुश्किल है। यह कहा जा सकता है कि जिस तरह से फिल्म निर्माता दृश्‍य प्रयोगों के माध्यम से दर्शकों के मन में स्पेस पैदा करता है उसी तरह शमशेर की कविता पठक के मन में स्पेस पैदा करती है। उनकी कविता ‘कथा मूल’ का एक अंश द्रष्‍टव्य है - "गाय - सानी। संधया। मुन्नी - मासी/ दूध! दूध! चूल्हा, आग, भूख।/ माँ,/ प्रेम।/ रोटी/ मृत्यु।" अगर इन शब्दों के चाक्षुष बिंबों को एक दूसरे से मिलाते जाएँगे तो विराट दृश्‍य की संरचना आँखों के सामने उपस्थित हो जाएगी।

शमशेर ने वैश्‍विक और भारतीय परंपराओं को अंतः सूत्रों से पिरोया है - "ये पूरब - पच्छिम मेरी आत्मा के ताने बाने हैं/ मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द/ लपेट लिया/ और मैं योरप और अमरीका की नर्म आँच की धूप - छाँव पर/ बहुत हौले-हौले नाच रहा हूँ/ सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं/ क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख - शांति का राग हूँ/ बहुत आदिम, बहुत अभिनव।"

शमशेर के काव्य शिल्प की विशेषता को रेखांकित करते हुए मुक्‍तिबोध ने लिखा है कि "अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का कोई मौलिक विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्‍ति उसीके मनस्तत्वों के आधार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हें के स्पर्श और गंध की हों।"

अनेक विद्वानों ने शमशेर को अनेक तरह से संबोधित किया है। मलयज के लिए वे ‘मूड्स के कवि’ हैं तो अज्ञेय के लिए ‘कवियों के कवि।’ रामस्वरूप चतुर्वेदी उन्हें ‘एब्स्ट्रैक्‍ट के कवि’ मानते हैं तो नामवर सिंह ‘सुंदरता के कवि।’ गोपाल कृष्‍ण कौल ने उन्हें ‘फार्मलिस्ट’ माना है तो मधुरेश उन्हें ‘तनाव और अंतर्द्वन्द्वों के कवि’ मानते हैं। विजय देव नारायण साही ने उन्हें ‘बिंबों का कवि’ घोषित किया है तो सत्यकाम ने ‘कवियों का पुंज’ तक कह दिया है। पर शमशेर कहते हैं - 

" मैं समय की लंबी आह

मौन लंबी आह...

होना था - समझना न था कुछ भी शमशेर...

आत्मा है

अखिल की हठ - सी..."

4 टिप्‍पणियां:

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

शमशेर बहादुर सिंह पर इस विचारपूर्ण परिचयात्मक लेख के लिए हार्दिक बधाई...

cmpershad ने कहा…

हिंदी-उर्दू के इस दोआब की जन्मशती पर सुंदर लेख द्वारा विस्तृत जानकारी के लिए आभार नीरजा जी :)

arpanadipti ने कहा…

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद । बढियाँ प्रस्तुति डॉ. साहिबा बधाई

arpanadipti ने कहा…

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद । बढियाँ प्रस्तुति डॉ. साहिबा बधाई