गुरुवार, 15 सितंबर 2011

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में हिंदी दिवस





हिंदी-दिवस जनभाषा की गौरव-प्रतिष्ठा का दिन है - डॉ. राधेश्याम शुक्ल 

हैदराबाद, १४ सितंबर २०११.

आज यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अंतर्गत उच्च शिक्षा और शोध संस्थान , बी एड प्रशिक्षण महाविद्यालय तथा हिंदी प्रचारक प्रशिक्षण महाविद्यालय ने संयुक्त रूप से हिंदी समारोह  मनाया जिसके अंतर्गत स्वतंत्र वार्ता के संपादक एवं भाषा चिंतक डॉ. राधेश्याम शुक्ल का विशेष व्याख्यान आयोजित  किया गया.

अपने संबोधन में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने विस्तार से भारत के भाषा परिदृश्य की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि हिंदी कोई क्षेत्रीय या साम्प्रदायिक भाषा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से ''हिंदी'' शब्द सभी भारतीय भाषाओँ  का द्योतक  है. उन्होंने  भाषा और संस्कृति के अटूट सम्बन्ध की चर्चा करते हुए यह प्रतिपादित किया कि भारत की संस्कृति संगम-संस्कृति है तथा हिंदी उस को अभिव्यक्त करने वाली संगम-भाषा है.

डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने जोर देकर कहा कि हिंदी-दिवस इस कारण अत्यंत गौरवशाली राष्ट्रीय पर्व है कि इस दिन दुनिया भर में पहली बार किसी जनभाषा को राष्ट्र की  राजभाषा का संवैधानिक दर्ज़ा मिला.उन्होंने हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की सेवाओं को अतुलनीय मानते हुए इसके समर्पित हिंदी कार्यकर्ताओं की सराहना की.

समारोह की अध्यक्षता उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने की. संपर्क अधिकारी एस के हलेमनी, सचिव डॉ. पी ए राधाकृष्णन , बी एड कालिज की प्राचार्य डॉ. सीता नायुडू तथा प्रचारक प्राचार्य डॉ उमा रानी ने भी छात्रों और शोधार्थियों को संबोधित किया.

आरम्भ में सरस्वती-दीप प्रज्वलित किया गया और छात्राध्यापिकाओं ने मंगलाचरण किया.ए जी श्रीराम , डॉ. साहिरा बानू बोरगल एवं अन्य प्राध्यापकों ने अतिथियों का स्वागत किया.डॉ. बलविंदर कौर ने भारत के गृह मंत्री पी. चिदंबरम के संदेशका वाचन किया.

इस अवसर पर दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ. पेरीशेट्टी श्रीनिवास राव को आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी का युवा हिंदी लेखक  पुरस्कार प्राप्त होने के उपलक्ष्य में सम्मानित भी किया गया. 

समारोह का संचालन डॉ. जी. नीरजा ने तथा संयोजन डॉ. मृत्युंजय  सिंह ने किया.  राष्ट्रगान के साथ समारोह संपन्न हुआ. 

5 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

विचारोत्तेजक व्याख्यान रहा डॉ. राधेश्याम शुक्ल जी का। आशा है भारतीय भाषी उनके इस आशय को समझेंगे कि हिंदी से तात्पर्य सभी भारतीय भाषाओं से है और उन्हें एकजुट होकर अपनी अपनी भाषा को समृद्ध भी करना है और राष्ट्रभाषा से जुड़ना है। राष्ट्रभाषा किसी एक क्षेत्र की भाषा नहीं है, इसे समझने के लिए उत्तर-दक्षिण और हिंदी-अहिंदी का भेद मिटाना होगा।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति...

डॉ.बी.बालाजी ने कहा…

इस विषय पर अर्थात 'हिंदी' भाषा के संदर्भ में डॉ राधेश्याम शुक्ल जी के तीन लेख स्वतन्त्र वार्ता में भी विस्तार से प्रकाशित हुए हैं 'ये हिंदी किस भाषा का नाम है?' के शीर्षक से. उनका व्याख्यान और वे लेख बड़े ही ज्ञान वर्धक हैं. हिंदी भाषा को लेकर जो भ्रम का क्षेत्र वाद चलाया जाता है उस भ्रम को मिटाने, समाप्त करने के लिए ये लेख अच्छे आधार बन सकते हैं.

वाकई 'हिंदी' किसी एक प्रांत विशेष की भाषा नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की सारी भाषाएँ हिंदी हैं. इसे स्वीकारने और समझने-समझाने में हमें अब देर नहीं करनी चाहिए.साथ ही, जिस हिंदी को 'राजभाषा' का दर्जा मिला हुआ है उसे पूर्ण रूप से 'राजभाषा' बनाने के लिए भी हलचल शुरू कर देनी चाहिए. इसके लिए हमें 'अनिश्चित काल' के माया जाल को काट फेंकना होगा.

हिंदी दिवस और अच्छी प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएं.

NISHA MAHARANA ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति.

NISHA MAHARANA ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति..