शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

अद्यतन संचार माध्यमों का स्वरूप : मास मीडिया में बढ़ता बाजारवाद



आरंभ में ही यह ध्यान दिलाना चाहूँगी कि अब से कुछ वर्ष पहले तक सार्वजनिक रूप से या संगोष्ठियों में मीडिया की भूमिका पर बहुत ही कम चर्चा की जाती थी. पर आज मीडिया विमर्श विधिवत एक नए ज्ञान क्षेत्र के रूप में हमारे सामने है. इस दिशा में यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन के रूप में दर्ज होगी. इस सामयिक और विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन करने के लिए यह महाविद्यालय और इसका हिंदी विभाग बधाई के पात्र हैं. 

हम आपस में विचार-विमर्श के लिए/ सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए विविध माध्यमों का उपयोग करते रहते हैं. मीडिया एक ऐसी व्यवस्था है जिसका विकास मनुष्य ने सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए किया है. भाषा और लिपि के विकास के साथ साथ मुद्रित माध्यम (प्रिंट मीडिया) सामने आया. धीरे धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विकास हुआ. रेडियो के बाद टेलीविजन और फिल्मों के आविष्कार ने स्थितियाँ बदल दीं. और अब सूचना संप्रेषण की विकास यात्रा में इंटरनेट के आविष्कार ने एक नया ही मोड उपस्थित कर दिया है. इस अद्यतन जनसंचार माध्यम से हम घर बैठे बैठे अपने कंप्यूटर पर संदेश टाइप करके कुछ ही क्षणों में उसे विश्व के कोने में विद्यमान जन समूह तक पहुँचा सकते हैं. फेसबुक, ब्लॉग, ट्विटर, वाट्सअप आदि इंटरनेट की ही देन हैं जिनके माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान अपूर्व त्वरित गति से हो रहा है. “लोगों द्वारा अपना सामाजिक दायरा बढ़ाने हेतु समूह बना कर आपसी सूचनाओं का आदान-प्रदान करने की सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाली ऐसी वेब साइट्स को लोगों ने सोशल मीडिया का नाम दिया. ये सोशल वेब साइट्स काफी लोकप्रिय हुईं और इनके उपयोगकर्ता बढ़ते गए और यह संख्या आज भी बढ़ती ही जा रही है. विश्व में पिछले कुछ वर्षों में हुए कई देशों के आंदोलनों में इस सोशल मीडिया का प्रभाव व उपयोगिता स्पष्ट देखी गई है.”(ज्ञानदर्पण). इसमें दो राय नहीं कि विश्व भर में सोशल मीडिया सूचनाएँ संप्रेषित करने का मुख्य माध्यम बन चुका है. 2014 के लोकसभा चुनाव ने भी इस माध्यम की भारत जैसे महादेश में उपादेयता को भलीभाँति प्रमाणित कर दिया है. 

यह ध्यान देने की बात है कि प्रवासी लोग अपनी मातृभूमि की खबर जानने के लिए इस सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं. यहाँ तक कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इस नए मीडिया पर निर्भर होना पड़ रहा है. विभिन्न वेबसाइटस, ऑडियो-वीडियो कोंफ्रेंस, चैट रूम्स, ईमेल, ऑनलाइन समूह, वेब विज्ञापन, वर्चुअल रियलीटी एन्विरोंमेंट्स, इंटरनेट टेलीफोनी, डिजिटल कैमरास और मोबाइल कंप्यूटिंग आदि इस नए सोशल मीडिया के अंतर्गत सम्मिलित हैं. अद्यतन न्यू मीडिया पारंपरिक मीडिया की तरह संगठित नहीं है. फिर भी इसकी एक विशेषता यह है कि इसका हर उपयोगकर्ता स्वयं पत्रकार है, स्वयं संपादक है, स्वयं प्रकाशक भी है. इससे इंटरनेट पर भारी मात्रा में कचरा लेखन और अराजकता की बाढ़ अवश्य आ गई है जिससे इस माध्यम की प्रामाणिकता और गंभीरता बाधित होती है. इसके बावजूद इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इसमें दी गई सूचना सिर्फ एक क्लिक में ही पूरे विश्व में पहुँच जाती है. कहा जाय तो इस अद्यतन मीडिया के कारण ही आज एक साधारण व्यक्ति को सर्व-सामान्य के समक्ष अपनी बात रखने का मौका मिला है. इसका सबसे सकारात्मक प्रयोग जन जागरण और सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जा सकता है. प्रकारंतर से, नव मीडिया ने संचार का लोकतंत्र संभव करके दिखा दिया है. 

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी विचारणीय है. वास्तव में मीडिया का काम है जनता और सरकार दोनों के सामने सच की तस्वीर पेश करना. मीडिया की आचार संहिताओं में यह कहा गया है कि उसे निष्पक्ष व निर्भीक तरीके से कार्य करना चाहिए न कि निर्णायक तरीके से. लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में मीडिया निर्णायक की भूमिका में नजर आ रहा है. कभी कभी हम यह भी देखते हैं कि टीवी और सोशल साइटों पर तथ्यों को इस तरह पेश किया जाता है जैसे कि मीडिया, मीडिया न होकर कोई अदालत हो. ओपीनियन लीडर और इमेज बिल्डर के रूप में अद्यतन संचार माध्मों का दुष्प्रयोग भी किसी से छिपा नहीं है. 

आज हर क्षेत्र में बाजारवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है. इस बढ़ते बाजारवाद के प्रभाव से मीडिया भी नहीं बच पाया है. इसमें संदेह नहीं कि भूमंडलीकरण ने बाजारवाद को मीडिया के पंखों पर ही बिठाकर दुनिया की सैर कराई है. आज मीडिया मिशन नहीं, व्यवसाय है. व्यावसायिक होते ही मीडिया ने खबरों को माल की तरह बेचना प्रारंभ कर दिया. यहाँ तक कहा जा सकता है कि मीडिया और बाजार ने तो महानायकों की परिभाषा भी बदल दी. वे रातों रात किसी को भी महानायक बना सकते हैं. आज वे निहित स्वार्थों के पोषक, राजनीति के संचालक और लोगों को गिराने तथा उठाने वाले बन गए हैं. उदारीकरण व नई आर्थिक नीतियों ने समाज व व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया है. मीडिया भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा. चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, उनके काम करने की शैली में आमूलचूल परिवर्तन आया है. पहले तो मीडिया मूल्यों और सरोकारों की बात करता था लेकिन अब वह प्रोफिट/ लाभ व पैसा कमाने की होड़ में शामिल हो गया है. पेड न्यूज ने तो और भी भ्रामक स्थिति पैदा कर दी है. इसके अलावा लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ में कोर्पोरेट का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है जो आने वाले समय में बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. दरअसल राजनैतिक और आर्थिक शक्तियाँ यह भली प्रकार जानती हैं कि जनसंचार माध्यम यदि जनता के हाथ में रहेंगे तो एक न एक दिन उनका प्रयोग जनता के अधिकारों के लड़ाई के लिए किया जाएगा. इसलिए ये शक्तियाँ ऐसा होने से पहले ही जनसंचार पर पूरी तरह हावी हो जाना चाहती हैं. सत्ता और पैसा जिनके पास है, वे मीडिया को अपने लिए इस्तेमाल करते हैं, कर रहे हैं – इसे लोकतंत्र के लिए श्रेयस्कर नहीं माना जा सकता. 

आज भले ही मीडिया का इतना विस्तार हो गया हो लेकिन इसका प्रारंभिक व पारंपरिक रूप मुनादी करने और नाटक खेलने का था. इसकी व्यापक संबोध्यता को देखते हुए ‘नाट्यशास्त्र’ में भरतमुनि ने जहां इसकी भाषा के मृदु, ललित, गूढ़ शब्दार्थ से हीन और जनपद सुखबोध्य होने की बात कही थी वहीं यह भी निर्देश दिया था कि जो चीज लोक रुचि एवं लोक मर्यादा के विरुद्ध हो उसका सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण नहीं करना चाहिए. यह बात मीडिया पर भी उतनी ही लागू है जितनी नाटक या ललित कलाओं पर, क्योंकि दोनों ही जनसंचार के माध्यम है. लेकिन आज मीडिया की रुचि किस में है! संचार मूल्य वहाँ है जहाँ कुछ गोपनीय है, सनसनीपूर्ण है; उत्तेजना, आक्रामकता और हिंसा आज बाजार और मीडिया दोनों के ही बीज शब्द बन गए हैं. 

अमेरिका के संदर्भ में डब्ल्यू जेम्स पोटर ने अपनी किताब ‘ऑन मीडिया वायलेंस’ में इस बात को उजागर किया कि ‘मीडिया एक अकेले इंसान से जुड़े अपराधों को रिपोर्ट करता ही रहता है. हिंसा से जुडी खबरों का इस्तेमाल कई बार जनता के मनोरंजन के लिए भी बखूबी किया जाता है. इस तरह से मीडिया असल जिंदगी में मौजूद हिंसा के तत्वों को परिभाषित करता है और इन संदेशों को अंतहीन प्रयासों के जरिए हमारी सोच में भरता रहता है.’ मीडिया विशेषज्ञ वर्तिका नंदा इस संदर्भ में कहती हैं कि ‘भले ही पोटर ने यह टिप्पणी अमेरिकी संदर्भ में की हो लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य पर भी यह सटीक लगती है.’ विशेषज्ञों का कहना है कि मीडिया में अपराध, उसमें भी विशेष रूप से बलात्कार, का कवरेज प्रथम श्रेणी पर है. टीवी चैनलों की सुर्खियों को ही देख लें – बलात्कारियों ने नाबालिग पर किया हमला अपराधी फरार, नाबालिग को बनाया अपनी भूख का निशान आदि, आदि, आदि. अपराधी तो हमेशा फरार होने में कामयाबी हासिल करता है. कभी कभी ऐसा लगता है कि मानो अपराधी को विशिष्ट सम्मान दिया जा रहा हो. इस तरह के कवरेज में हम अक्सर यह देखते हैं कि न ही अपराधी का नाम बताया जाता है और न ही उसका फोटो दिखाया जाता है. पर हाँ, उस लड़की का चेहरा मोजैक करके दिखाया जाता है, उसके घर का लॉन्ग शॉट दिखाया जाता है, कभी कभी तो उस लड़की के माँ-बाप के बारे में बताया जाता है. इतना काफी है उस लड़की के रिश्तेदारों को उसकी पहचान करवाने के लिए इससे बड़ी बेईमानी और क्या होगी? 

विज्ञापन और फिल्मों को ही देख लीजिए. ये रुचि का परिष्कार करने के बजाय रुचि में विकृति पैदा करने वाले होते जा रहे हैं. उदाहरण के लिए साहित्यिक कृतियों के रूपांतरण को ही लें. टीवी धारावाहिक या फिर कमर्शियल फिल्म के रूप में किसी साहित्यिक कृति का रूपांतरण करते समय इतना ज्यादा उत्तेजक मसाला भर दिया जाता है कि कृति का मूल उद्देश्य मिट जाता है. प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुआँ’ को याद करें. इस कहानी में प्रेमचंद ने इस वाक्य के माध्यम से भारत के गावों में शिक्षा के अभाव को रेखांकित किया है – गंगी “खराब पानी पीने से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती है.” लेकिन इस मूल सूत्र को इस कहानी के टीवी रूपांतरण में उड़ा दिया गया तथा इसे छोटे पर्दे पर अमीर-गरीब के वर्गभेद के स्थान पर सवर्ण-दलित के वर्णभेद की कहानी के रूप में पेश किया गया. इसी तरह ‘देवदास’ की बात भी की जा सकती है. शाहरुख खान की फिल्म ‘देवदास’ (2002) को यदि देखें तो यह शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ का व्यंग्य पाठ लगती है. इस फिल्म में पूरी तरह से उत्तरआधुनिक बाजारवाद झलकता है. मूल पाठ को तोड़ मरोड़ कर नया पाठ निर्मित किया गया है. इस फिल्म का हर सीन भव्य है. एक तरह से तो भव्यता अहम विषय बन गया. यह फिल्म पूरी तरह से बाजार की माँग के अनुरूप है. मूल कथा में पारो का परिवार निम्नवर्गीय था. लेकिन फिल्मकार ने उसे उच्चवर्गीय बना डाला. अर्थात साहित्य के साथ टीवी और सिनेमा बड़ी सफाई से अत्याचार कर रहे हैं – माध्यम की माँग के नाम पर. 

अंत में मुझे यह और कहना जरूरी लग रहा है कि अद्यतन मीडिया ने भाषा के रूप को भी बदल डाला है. आए दिन तरह तरह के भाषा रूप उभर रहे हैं. विज्ञापनों की नई शब्दावली (नो उल्लू बनाविंग) गढ़ने से लेकर लोक प्रतीकों और लोक मिथकों तक का नए ढंग से प्रयोग मीडिया कर रहा है. इससे हिंदी भाषा एक नया अक्षेत्रीय रूप उभर रहा है. इस तरह के प्रयोगों से मीडिया की भाषा में कोड मिश्रण व कोड परिवर्तन की प्रवृत्ति बढ़ चुकी है. “कोड परिवर्तन का मुख्य प्रकार्य यह होता है कि द्विभाषिक या बहुभाषिक व्यक्ति जो भाषाएँ जानता-समझता है, वे भाषा प्रयोग के विशेष संदर्भ (Context) और स्थिति (Situation) के अनुरूप बोलते समय ही परस्पर परिवर्तित होती रहती हैं.” (दिलीप सिंह, ‘भाषा प्रयोग की दिशा–दो’, हिंदी भाषा चिंतन, पृ. 109). इस प्रकार के भाषा मिश्रण के लिए भी कुछ सीमाएँ/ प्रतिबंध होते हैं. जैसे – “(1) एक भाषा के वाक्य में दूसरी भाषा का उपवाक्य मान्य नहीं है. (2) एक भाषा के दो वाक्यों के बीच दूसरी भाषा का संयोजक मान्य नहीं है. (3) एक भाषा के उपवाक्य के बाद दूसरी भाषा के उपवाक्य में समुच्चय बोधक दूसरी भाषा का ही होना चाहिए. (4) हिंदी के वाक्यों में अंग्रेजी के निर्धारक, क्रमसूचक, संख्यासूचक का प्रयोग अमान्य है.” (प्रो. दिलीप सिंह, ‘भाषा अध्ययन की आधुनिक संकल्पनाएँ,’ भाषा का संसार, पृ. 150). लेकिन मीडिया इन सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए आगे बढ़ चुका है. इस तरह उसने बाजार की भाषा अपना ली है. 

आज बाजार का इतना दबाव है कि सबको विवश होना पड़ रहा है. हम सब जानते हैं कि मीडिया का मूलभूत लक्ष्य सूचना, मनोरंजन और जनशिक्षा है. इन तीनों के बाद ही मुनाफ़ा कमाने का स्थान आता है. लेकिन विडंबना यह है कि आज मुनाफ़ा प्रथम स्थान पर है. यह अन्य लक्ष्यों पर हावी हो रहा है. यह भी कहा जा सकता है कि एक-दूसरे के साथ व्यावसायिक प्रतियोगिता की होड़ में मीडिया की अनुशासनहीनता और संवेदनहीनता बढ़ रही है तथा पत्रकारिता के मानदंड कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं. कहना होगा कि जहाँ एक तरफ अद्यतन मीडिया ने सूचना के लोकतंत्र को संभव बनाया है वहीं यह भी देखने में आ रहा है कि यह मीडिया जब पूँजीपति या सत्ता के हाथ में चला जाता है तो वह लोकतंत्र का वाहक न रहकर मुनाफे का माध्यम अर्थात बाजार का दास बन जाता है. 

(द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : 18 तथा 19 अक्टूबर 2014
श्री सिद्धरामेश्वर महाविद्यालय, कमलनगर)



1 टिप्पणी:

ARUN SATHI ने कहा…

विचारणीय