बुधवार, 24 दिसंबर 2014

स्मृतियों में बसी गंगा की तरंग

9 जून 2014. 
रात की नींद गायब. कल नजीबाबाद जो जाना है ‘परिलेख हिंदी साधक सम्मान’ लेने. इसकी कल्पना भी नहीं की थी. 

10 जून 2014.
सुबह के चार बजे. तैयार हो गई और ठीक पाँच बजे माँ-पापा, भाई और तीन साल की बेटी से विदा लेकर पति के साथ घर से हैदराबाद नामपल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ी. 5.40 तक स्टेशन पहुँच गई और ठीक छह बजकर पाँच मिनट पर गाड़ी ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया. सफर बहुत अच्छा रहा. ठीक सामने की सीट पर एक सरदार जी और उनकी पत्नी रमणिक कौर जी (यही नाम बताया उन्होंने) थे. समय बीतता गया और ऐसे ही हम लोगों के बीच सहज वार्तालाप शुरू हुआ. वे दोनों अमृतसर जा रहे थे गुरुद्वारे का दर्शन करने. वार्तालाप से बहुत ही सरल और मिलनसार लगे. नागपुर स्टेशन पर इंजिनियरिंग और सी.ए. के कुछ विद्यार्थियों की टोली चढ़ी. वे मनाली जी रहे थे. उसमें एक व्यक्ति अपने परिवार (पत्नी और आठ साल की बेटी) को भी साथ लेकर जा रहा था. रात भर वे लोग मस्ती करते रहे. सफर में थकान महसूस ही नहीं हुई. जब भी कमर में दर्द होने लगता था तो ऊपर बर्थ पर जाकर सो जाती थी. पहली बार उत्तर की ओर यात्रा कर रही थी. 

आंध्र प्रदेश – अरे बाबा अब तो यह क्षेत्र तेलंगाना हो गया. जब तक गाड़ी तेलंगाना क्षेत्र में चल रही थी तब तक भौगोलिक परिवेश कुछ और था. जैसे जैसे गाड़ी महाराष्ट्र में पहुँची धीरे धीरे भौगोलिक परिस्थिति बदल गई. तेलंगाना के क्षेत्र में सूखे पेड़ दिखाई दे रहे थे. कहीं कहीं बंजर भूमि थी तो कहीं कहीं बुआई के लिए तैयार भूमि दिख पडी. नीम, ताड़, आम, छोटे खजूर और बरगद के पेड़ तो हैं ही, हर जगह टीक और बबूल के वृक्ष भी हैं. गर्मी का तो पता नहीं चला क्योंकि वातानुकूलित कोच में बैठकर यात्रा कर रही थी. महाराष्ट्र में पहुँचते ही मौसम बदला सा गया. बारिश की बूँदें भी गिरीं. नागपुर से जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, संतरे के बाग ही बाग थे. जगह जगह पर आम के बाग थे. पहाड़ों के बीच से जब गाड़ी गुज़री तो बहुत ही अच्छा लगा. कहीं कहीं तो गाड़ी सुरंग से गुज़री. कहीं जंगल था, तो कहीं पहाड़, कहीं सपाट भूमि तो कहीं घाटी. देखने लायक है भारत की प्राकृतिक संपदा. 

11 जून 2014

गाड़ी सुबह 9 बजे के आस-पास दिल्ली पहुँची. पापा के शिष्य अगस्टिन जी गाड़ी लेकर स्टेशन पहुँच गए हमें लेने. हम स्टेशन से सीधे आई.एस.बी.टी. - कश्मीरी गेट पहुँच गए और वहाँ से नजीबाबाद जाने वाली बस में चढ़ गए. ड्राइवर की सीट के पीछे वाली सीट खाली थी तो वहीं आराम से बैठ गए. बस चल पड़ी नजीबाबाद की ओर. जैसे ही बस दिल्ली के बाहर पहुँची तो रास्ते में लीची और रसीले आम दिख गए. हैदराबाद में तो लीची एकदम सूखी होती हैं. लेकिन यहाँ बड़ी बड़ी लाल-लाल रसीली लीची. देखते ही मन ललचाने लगा. बस आगे बढ़ती गई और मैं दोनों तरफ के पेड़-पौधों को देखने लगी. फलों से लदे हुए आम और लीची के पेड़. वाह! क्या बात है! बस रुकने का नाम नहीं ले रही थी. दोपहर हो गई और भूख लग रही थी तो खजूर खाते हुए गए. हैदराबाद से ही लिए थे साथ. मेरठ पार करने के बाद ड्राइवर ने एक ढाबे के पास बस रोक दी और हम सब वहाँ उतरे और ठंडे पानी से मुँह धोया तो मानो जान में जान आ गई. फिर हमने वहाँ चटपटी चाट का मजा लिया, शिकंजी भी पी और फिर आकर बस में विराज गए. रास्ते में अनेक छोटे छोटे गाँव थे. उनके नाम बड़े ही मजेदार लगे. जैसे – भैंसा, फिटकरी, चौलापुरा, इंचौली, बहसूमा, कौल, झुनझुनी, सदपुर, सैफपुर, रामराज, बहसुमा, भगवंतपुरम, मीराँपुर, डाबका, पठानपुरा, मलियाना, पुट्ठा, कुंडा, पतला, निवाडा आदि. मतलब यह है कि दक्षिण के स्थान नामों के अभ्यासी मन को ये नाम बहुत नए और रोचक लगे! और हाँ, ट्रकों व दूसरे वाहनों पर मजेदार स्लोगन भी पढ़ने को मिले. एक ट्रक पर लिखा हुआ था ‘हँस मत पगली प्यार हो जाएगा.’

एक मजेदार बात. एक यात्री को कहीं उतरना था पर ड्राइवर ने बस उसके वांछित स्थान पर नहीं रोकी. यात्री ने कटाक्ष पूर्वक ड्राइवर को संबोधित किया - ‘अपणे घर ही ले कै जागा क्या?’ ड्राइवर भी हाजिर जवाब निकाला. बोला – ‘क्या, मेरा कान बजै? कंडक्टर सै सिट्टी ना बजवा सकै था क्या?’ यह है हमारी लोक बोलियों के बतरस की संपदा जो शहरों की नकली भाषा से गायब है. एक व्यक्ति हाजमे की गोलियाँ बेच रहा था. उसके बेचने का तरीका भी भा गया. वह लोकभाषा (कौरवी) में लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था. क्या रेटॉरिक थी उसकी भाषा में. तब समझ में आया कि दिलीप सर क्यों कहते हैं कि भाषा का असली व्यवहार उसके प्रयोक्ता समाज में रहकर ही सीखा जा सकता है. 

होटल ब्ल्यू डाइमंड में 
नजीबाबाद पहुँचते पहुँचते पाँच बज गए. वहाँ बस स्टैंड के पास आयोजक हमारे स्वागत में खड़े थे. रिक्शा कर लिए गए. चेन्नै, हैदराबाद और आंध्र प्रदेश के रिक्शों से यहाँ के रिक्शे अलग ही थे. बहुत बरसों के बाद रिक्शे पर चढ़ी तो मजा आ गया. ब्ल्यू डाइमंड होटल पहुँचे. होटल में डॉ. रजनी शर्मा, डॉ. सुशील कुमार त्यागी, आकाशवाणी के ताहिर महमूद और प्रदीप सिंह ने अगवानी की.

भाई अमन कुमार त्यागी के परिवार के साथ 

थोड़ी देर आराम करने के बाद शाम को वहाँ से परिलेख कला एवं संस्कृति समिति, नजीबाबाद के संस्थापक भाई अमन कुमार त्यागी के घर पहुँचे. वहाँ उनका पूरा परिवार स्वागत में जुटा हुआ था. भाभी और बच्चे (अक्षि और तन्मय), डॉ. सुशील कुमार त्यागी आदि. खाना लाजवाब था. खाने के बाद होटल की ओर पैदल चल पड़े. चाँदनी रात थी. रेलवे स्टेशन क्रॉस करके जाना था. ब्रिज पर चढ़कर स्टेशन पार करते समय निर्मल आकाश में चंद्रमा की मनमोहक छटा निहारने योग्य थी. हम लोगों ने चाँदनी में कुछ फोटोग्राफी भी की. पूरे समय अमन भाई जाने कहाँ-कहाँ के रोचक किस्से सुनाते रहे. बड़े ठहरे से अंदाज में बात करते हैं अमन जी – कोई जल्दी नहीं, कोई तनाव नहीं! 

12 जून 2014. 

सुबह सुबह आँख खुल गई तो हम तैयार हो गए. डॉ. रजनी शर्मा के सुपुत्र आ गए और डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी
डॉ. रजनी शर्मा की पोती गौरी  
तथा डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी के साथ हमें अपने घर ले गए नाश्ते पर. गरमा गरम जलेबी और ब्रेड रोल के साथ लस्सी. मजा आ गया. सच कहूँ तो सुबह सुबह इस तरह का नाश्ता पहली बार किया. वहाँ से फिर होटल लौटे. थोड़ी ही देर में रुड़की से श्रद्धेय गुरुवर डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी आए. अरुण जी मुझे बेटी मानते हैं. ईमेल और फोन पर तो उनसे बातचीत होती रहती थी पर प्रत्यक्ष दर्शन पहली बार हुए. इतने में वहाँ ‘अमर उजाला’ के संवाददाता पहुँच गए और हम लोगों के साक्षात्कार लिए. अमन भाई ने आकाशवाणी – नजीबाबाद में रिकॉर्डिंग की भी व्यवस्था की थी; यों बाद में डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी हम सबको सीधे आकशवाणी भवन ले गए. पहले डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी की रिकॉर्डिंग हुई बाद में मेरी. मैंने ‘हिंदी तथा तेलुगु के प्रमुख संतों की रचनाओं में अंतःसंबंध’ शीर्षक वार्ता प्रस्तुत की. उधर अमन कुमार त्यागी जी के घर उनके पिताजी (श्री महेंद्र अश्क जी), माताजी और अन्य परिवारी जन हमारी प्रतीक्षा में बैठे थे. 

खाना खाते खाते तीन बज गए तो हम तुरंत होटल की ओर निकल पड़े चूँकि 4 बजे से परिलेख कला एवं संस्कृति समिति तथा लोक समन्वय समिति, नजीबाबाद का सम्मान समारोह था. 4 बजे के आसपास हम समारोह स्थल पहुँच चुके थे. बढ़िया बैनर लगा हुआ था – बैनर पर अपना और अपनी पुस्तक का चित्र देखकर मैं रोमांचित तो हुई, विचलित भी हो उठी – मैं इस सबकी अधिकारी हूँ भी या नहीं! 


सम्मान कार्यक्रम समाप्त होते होते आठ बज ही चुके थे. हम सब सीधे अमन भाई के घर पहुँचे. खाना खाकर वहाँ से होटल की ओर प्रस्थान. सब कुछ सपने जैसा लग रहा था. सचमुच मैंने अपने अत्यंत साधारण सी हिंदी सेवा के लिए इतनी स्वीकृति और सम्मान की न तो आशा की थी, न अपेक्षा. यह सब मुझे अनायास ही मिला रहा है – मेरे मातापिता और गुरुजन के आशीर्वाद से! 

13 जून 2014 

ठीक 7 बजे राजकुमार जी हाजिर हो गए हमें अपने घर ले जाने. आदरणीय राजकुमार जी के बारे में यह बताना जरूरी है कि प्रो. देवराज जी के अनन्य और घनिष्ठ मित्र हैं और प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी के प्रति भी वैसा ही स्नेहभाव रखते हैं. किस्सागोई में राजकुमार जी अमन जी से इक्कीस निकले. हमें इर्द गिर्द बिठाकर घर के बुजुर्ग की तरह जाने कितनी ‘ऐतिहासिक’ वारदातें उन्होंने सुना डालीं. उनसे ही मुझे ‘साहित्य कुंभ’ तथा ‘साहित्य मंथन’ की ऐतिहासिकता का पता चला. वहाँ से हम गुरुवर डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी के घर जाने वाले थे लेकिन कुछ ऐसी अप्रत्याशित स्थितियाँ आ गईं कि जा न सके. और इस तरह नजीबाबाद का हमारी यह सारस्वत यात्रा अधूरी रह गई. 

फिर कार्यक्रम बना कण्वऋषि आश्रम जाने का. पहले यह तय किया गया था कि आश्रम देखकर वहाँ से रुड़की और वहाँ से खतौली जाएँगे. दरअसल, भाई अमन कुमार त्यागी ने जब कहा था कि परिलेख सम्मान ग्रहण करने के लिए नजीबाबाद आना होगा तो मैंने गर्मी में इतनी लंबी यात्रा के डर से आनाकानी शुरू कर दी थी. इस पर उन्होंने मुझे ललचाने की कोशिश की. दो लालच दिए. एक - आपको इस बहाने हरिद्वार और गंगा स्नान का भी पुण्य मिल जाएगा. दो - शायद आपको नहीं पता कि नजीबाबाद के एकदम पास में कोटद्वार में कण्व ऋषि का आश्रम है जो दुष्यंत और शकुंतला की प्रणय कथा से जुड़ा है. यहाँ आएँगी तो वहाँ भी चलेंगे. 

अमन भाई ने अपना वादा निभाया. गंगा स्नान भी कराया और कण्व आश्रम भी दिखाया. साथ में थे अमन भाई,
तन्मय 
उनकी बहुत प्यारी बिटिया अक्षि, चपल और अत्यंत प्रिय बेटा तन्मय, मनमीत के संपादक अरविंद कुमार जी, दिल्ली से आए हुए पत्रकार उपेंद्र जी, गुरुकुल कांगड़ी ज्वालापुर के डॉ. सुशील कुमार त्यागी. डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा तो मेरे अभिभावक की तरह आए ही थे. इन सबके साथ मालिनी नदी के किनारे फैले कण्व आश्रम में जाना रोमांचकारी अनुभव रहा. दो ट्रकों को रोकने की शक्ति का प्रमाण दे चुके ‘पावर योगी’ जयंत जी (आधुनिक भीम) का दर्शन और भी रोमांचक रहा. उन्होंने स्वयं सारे क्षेत्र का संदर्शन कराया. 
अर्जुन के साथ 

नन्हे लंगूर अर्जुन को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी जो अक्षि और तन्मय को घुड़की देने के बाद चुपके से मेरी गोद में आ बैठा था और इशारे कर करके कभी सिर, कभी पीठ, कभी बगल को खुजवाता रहा था. 

हरिद्वार पहुँचकर गंगा स्नान का पुण्य भी प्राप्त किया. हरिद्वार पहुँची तो मन प्रफुल्लित हो उठा. वहाँ तक जाकर गंगा स्नान किए बिना वापस आना कैसे संभव हो सकता है! हर की पौड़ी पहुँचकर गंगा नदी को नमन किया और जलप्रवाह में धीरे धीरे प्रवेश किया तो शीतल गंगाजल के स्पर्श से तन और मन आनंद से भर उठे. मुझे ऐसा लगा कि मानो माँ का कोमल स्पर्श है. सच कहूँ तो पहले डुबकी लगाने में डर रही थी लेकिन जब यह देखा कि छोटे-छोटे बच्चे गंगा स्नान का आनंद उठा रहे हैं तो मन के भीतर से आवाज आई कि चलो आगे बढ़ो. बस एक सांस में तीन डुबकी लगा ही दी. गंगा की वह पुलक भरी तरंग सदा सदा के लिए स्मृतियों में बस गई है. 

रुड़की पहुँचने से पहले गुरुकुल कांगड़ी गए – डॉ. सुशील कुमार त्यागी जी के घर. वहाँ से रुड़की. डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी के भतीजे आशीष जी और पंकज जी ने गर्मजोशी से अगवानी की. उनके साथ ही श्रद्धेय डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण जी के घर जाना हुआ. अरुण जी और उनकी श्रीमती जी की जिंदादिली देखकर बड़ी प्रेरणा और ऊर्जा जैसी मिलती लगी. कभी कभी सोचती हूँ कि ये लोग बड़ी बड़ी उपलब्धियों और प्रकांड विद्वत्ता के बावजूद इतने सरल, निश्छल और बालसुलभ स्वभाव वाले कैसे रह लेते हैं! वहाँ से खतौली की ओर चल पड़े. गंगा जी तो साथ साथ चल रही थीं. एक जगह पर सर ने कहा, देखो, यहाँ गंग नहर और गंगा नदी ऊपर नीचे हैं! बहुत खूब! पल भर में ही गाड़ी क्रास हो चकी थी. 

आराध्या 
पूरी यात्रा के दौरान पूर्णिमा मै’म से लीची, चाट, कुल्फी आदि की बातें होती रहीं. खतौली पहुँचने से आशीष जी और पंकज जी ने पुरकाजी में एक जगह गाड़ी रोकी और गरमागरम चाट खिलाई. खतौली पहुँचकर घर के पास ही कुल्फी की दूकान पर मलाईदार कुल्फी का आनंद लिया. अरे हाँ, इससे पहले रुड़की में भी तो एक बड़ा गिलास लस्सी का भरपूर मजा लिया था. आशीष और पंकज का सेन्स ऑफ ह्यूमर तो कमाल का है. रास्ते भर मस्ती करते हुए चले. वाह, मजा आ गया! पूर्णिमा मैडम ने परिवार के सदस्यों से परिचय कराया. आशीष जी की बेटी आराध्या ने तो मेरा मन ही मोह लिया. तस्वीरें लेने की कोशिश की तो पहले मुँह इधर-उधर करती रही बिलकुल मेरी बेटी की तरह. पर थोड़ी ही देर में पोज देना शुरू कर दिए. यही स्नेह का नाता तो हमें जीवित रखता है! 

मैंने सोचा था कि रात का खाना स्किप कर दूँ. पर मुझसे नहीं हुआ. गरमागरम रोटियाँ (शायद मिस्सी रोटी), सब्जी, अचार. स्वादिष्ट भोजन. पेट भरके खाया और आराम से सो गई. 

पूरी यात्रा के दौरान मुझे एक पल के लिए भी यह अहसास नहीं हुआ कि मैं अपने घर छोड़कर कहीं अजनबियों के बीच गई हूँ. सब अपने ही थे. आत्मीय. 

14 जून 2014 

खतौली से दिल्ली की ओर प्रस्थान. सर और आशीष जी आए मुझे बस में बिठाने के लिए. साथ में नन्ही आराध्या भी थी. हाइवे पर बस रोककर, मुझे विधिवत बिठाकर, ड्राइवर को बताकर, तसल्ली करके ही आशीष जी बस से उतारे. बस तेजी से दिल्ली की ओर जा रही थी. उस वक्त मुझे ऐसा लगा कि अपनों से कटकर कहीं दूर जा रही हूँ.

दिल्ली में अगस्टिन आ गए. एपी भवन पहुँचने से पहले रास्ते में लाल किला घूमकर देखा. भोजनोपरांत पार्लियामेंट, इंडिया गेट आदि. फिर रात की गाड़ी से हैदराबाद की वापसी.



1 टिप्पणी:

Dr.manju sharma ने कहा…

सुन्दर यात्रा वृतांत |