बुधवार, 6 अप्रैल 2011

शमशेर शताब्दी समारोह याद रहेगा


(Photos by dr.balaji, radhakrishna & self)


३०-३१ मार्च, २०११ को आयोजित शमशेर शताब्दी समारोह से मैंने बेहद लाभ उठाया है| दोनों दिन संगोष्ठी स्थल पर किसी मेले जैसा दृश्य था| हैदराबाद में गंगा - जमुनी तहजीब को देखने का अवसर प्राप्त हुआ| 

नामवर जी को सुनने और उनसे मिलने का जो अवसर प्राप्त हुआ है इसे मैं कभी भूल नहीं सकती| इतना ही नहीं इस संगोष्ठी के कारण मुझे अनेक विद्वानों से परिचय और विचार विमर्श का जो अवसर मिला वह हैदराबाद जैसे शहर में रहते हुए प्रायः सुलभ नहीं होता| 

विद्यार्थी जीवन में तो मैंने सिर्फ शमशेर के बारे में परीक्षा की दृष्टि से ही कामचलाऊ सा कुछ पढ़ा था, वह भी कुछ कविताएँ, पर इस संगोष्ठी के कारण मैं शमशेर की गद्य रचनाओं से भी परिचित हो पाई| यह वास्तव में बहुत बड़ी उपलब्धि है| अगर यह कहूँ कि डॉ.अर्जुन चव्हाण और डॉ. रोहिताश्व का ग्यारहवें घंटे में आने से मुकर जाना मेरे लिए अच्छा ही रहा तो गलत न होगा. उनके न आ पाने के कारण डॉ. मृत्युंजय सिंह को और मुझे गद्य और कहानी पर परचा तैयार करने को कहा गया. डरते डरते रात भर बैठकर विभागाध्यक्ष जी के आदेश का पालन किया. प्रस्तुति पर सभी ने जो प्रोत्साहन दिया उसे कभी भूल न सकूंगी. 

मैंने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि विद्वानों के समक्ष शमशेर की कहानियों पर शोध पत्र प्रस्तुत करने का अवसर मुझे प्राप्त होगा| इस बहाने ही सही मुझे शमशेर की कहानी `प्लाट का मोर्चा' पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ| 

इन यादों को कभी भूल नहीं सकती|

समारोह की विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

सामासिक संस्कृति के साहित्य साधक बालशौरि रेड्डी


स्वतंत्रता सेनानी एवं वरिष्‍ठ पत्रकार, ‘दक्षिण समाचार’ के संस्थापक-संपादक मुनींद्र जी (1925-2010) की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी स्मृति में आयोजित वार्षिक व्याख्यान माला के अंतर्गत 16 अप्रैल, 2011 को ‘हमारा समय’ विषय पर प्रख्यात साहित्यकार और ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी व्याख्यान देंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्‍ठ लेखक डॉ.बालशौरि रेड्डी करेंगे। यहाँ डॉ.बालशौरि रेड्डी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला जा रहा है।


दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार-प्रसार में वरिष्‍ठ लेखक बालशौरि रेड्डी का योगदान सराहनीय है। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, समीक्षा, आलोचना आदि साहित्यिक विधाओं के माध्यम से दक्षिण भारत की संस्कृति को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का काम किया है। मौलिक लेखन के साथ साथ अनुवादों क माध्यम से भी उन्होंने दक्षिण और उत्तर के भेद को मिटाने का प्रयास किया है।

बालशौरि रेड्डी का जन्म 1 जुलाई, 1928 को गोल्लल गूडूर (कडपा जिला, आंध्र प्रदेश) में हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा ग्रामीण परिवेश में ही संपन्न हुई। 1946 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की रजत जयंती के अवसर पर संस्था के आजीवन संस्थापक राष्‍ट्रपिता महात्मा गांधी चेन्नई आए थे। उनके भाषण से प्रभावित और प्रेरित होकार बालशौरि रेड्डी ने हिंदी प्रचार-प्रसार करने का निश्‍चय किया। इसे क्रियान्वित करने हेतु वे हिंदी में उच्च शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए उत्तर भारत गए। 1948 में काशी परीक्षा केंद्र से ‘साहित्यालंकार’ की उपाधि प्राप्‍त की और 1949 में इलाहाबाद से ‘साहित्यरत्‍न’ की। तत्पश्‍चात्‌ चेन्नई वापस आकार उन्होंने लगभग दस साल तक दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रशिक्षण महाविद्‍यालय में सेवा की।

1948 में जब बालशौरि रेड्डी वाराणसी में थे तब उनका ध्यान साहित्य की ओर आकर्षित हुआ। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रमर’, कमलापति त्रिपाठी और गंगाधर मिश्र के प्रोत्साहन तथा सहयोग से वे साहित्य सृजन की ओर उन्मुख हुए। इस संबंध में वे अक्सर कहा करते हैं कि "लेखन की प्रेरणा मुझे भ्रमर जी ने दी। उन्होंने मेरी आरंभिक रचनाओं को ‘ग्राम संसार’ में छापा। निराला जी, त्रिपाठी जी तथा मिश्र जी का स्नेह और प्रोत्साहन मैं भूल नहीं सकता। साहित्य के क्षेत्र में मेरा पदार्पण बड़े ही नाटकीय ढंग से हुआ। मैंने अपनी 20 वर्ष की आयु तक कभी लिखने की कोशिश नहीं की और न ही लिखने की इच्छा रही। विंध्याचल समीपवर्ती प्रकृति ने मुझे लिखने की प्रेरणा दी। प्रकृति की उस अपूर्व सुषमा व सौंदर्य की आराधना करते समय मेरी अनुभूतियाँ अभिव्यक्‍त होने की तड़प उठी। प्रारंभ से मैंने हिंदी में ही लिखा है। ‘ग्राम संसार’ और ‘संसार’ में मेरी प्रारंभिक रचनाएँ छपीं।"

भारतीय संस्कृति जड़ न होकर प्रगतिशील रही है और इसका एक सुनिश्‍चित इतिहास है। भारतीय संस्कृति असांप्रदायिक है और इसमें अखिल भारतीय भावना निहित है। किसी राष्‍ट्र के सांस्कृतिक विकास में उसकी भाषा, वहाँ का वाड्‌.मय, वहाँ का दर्शन तथा वहाँ की ललित कलाएँ अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। भारत की संस्कृति तथा सभ्यता अतिप्राचीन है। आवश्‍यकता इस बात की है कि इसे किशोर वय बालकों तक अवश्‍य पहुँचाया जाए, साथ ही नव शिक्षित प्रौढ़ों को भी इससे परिचित कराया जाए, ताकि वे अपने वर्तमान और भविष्‍य को सुखद बनाने के लिए दिशा प्राप्‍त कर सकें। इसी उद्‍देश्‍य की पूर्ति के लिए रेड्डी जी ने आंध्र, तमिलनाडु तथा कर्नाटक राज्यों से संबंधित संस्कृति, सभ्यता आदि की चर्चा अपनी औपन्यासिक कृतियों में की है।

पाश्‍चात्य देशों की तुलना में भारत में आज भी बाल साहित्य की कमी है। इस क्षेत्र में बालशौरि रेड्डी का प्रयास सराहनीय है। 1966 से ‘चंदामामा’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने बाल साहित्य लेखन को आगे बढ़ाया। उनकी मान्यता है कि देश का भविष्‍य बच्चों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास पर ही निर्भर होता है। इसी उद्‍देश्‍य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने हिंदी पाठकों के लिए ‘तेलुगु की लोक कथाएँ’, ‘आंध्र के महापुरुष’, ‘तेनाली राम के लतीफे’, ‘तेनाली राम के नए लतीफे’, ‘तेनाली राम की हास्य कहानियाँ’, ‘बुद्धू से बुद्धिमान’, ‘न्याय की कहानियाँ, ‘आदर्श जीवनियाँ’ और ‘आमुक्‍त माल्यदा’ जैसी बालोपयोगी रचनाएँ कलात्मक रूप से प्रस्तुत कीं।

मूलतः बालशौरि रेड्डी उपन्यासकार के रूप में विख्यात हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में शबरी, जिंदगी की राह, यह बस्ती : ये लोग, भग्न सीमाएँ, बैरिस्टर, स्वप्‍न और सत्य, प्रकाश और परछाई, लकुमा, धरती मेरी माँ, वीर केसरी, प्रोफेसर, दावानल और तेलुगु साहित्य का इतिहास आदि उल्लेखनीय हैं। इतना ही नहीं उन्होंने तेलुगु की अनेक प्रसिद्ध रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया है। पत्रकारिता उनका प्रिय क्षेत्र है। उन्होंने तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास से हिंदी जगत से परिचित कराने के लिए भी प्रशंसनीय प्रयास किया है। हिंदी जगत के समक्ष शीघ्र ही तेलुगु पत्रकारिता का इतिहास मुद्रित रूप में प्रस्तुत होगा।

साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित बालशौरि रेड्डी ने अपने लेखन का मुख्य उद्‍देश्‍य यही रखा है कि आंध्र के इतिहास, उसकी सभ्यता व संस्कृति से हिंदी जगत परिचित हो। भारतीय भाषाओं के समन्वयन और सामासिक संस्कृति के रूपगठन की दशा में बालशौरि रेड्डी का यह योगदान सराहनीय है। *



सोमवार, 28 मार्च 2011

कुछ तो बच ही जाएगा...


अशोक वाजपेयी के हैदराबाद  आगमन पर विशेष

"समय, मुझे सिखाओ
कैसे भर जाता है घाव, पर
एक अदृश्‍य फाँस दुखती रहती है
जीवन भर।
**** ****
समय, अंधेरे में हाथ थामने,
सुनसान में गुनगुनाहट भरने,
सहारा देने, धीरज बँधाने,
अडिग रहने, साथ चलने और लड़ने का
कोई भूलाबिसरा पुराना गीत तुम्हें याद हो
तो समय गाओ, 
ताकि यह समय,
यह अंधेरा,
यह भारी
यह असह्‌य समय कटे।" (अशोक वाजपेयी, समय से अनुरोध)

‘दक्षिण समाचार’ के संस्थापक संपादक मुनींद्र जी की प्रथम पुण्यतिथि (16 अप्रैल, 2011) के अवसर पर हैदराबाद में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रसंग में प्रख्यात हिंदी साहित्यकार और ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के चेयरमैन अशोक वाजपेयी हैदराबाद पधार रहे हैं। आदरणीय प्रफुल्ल मुनींद्र ने फोन करके कहा कि इस अवसर पर प्रकाशन के लिए व्याख्यानमाला के वक्ता यानी अशोक वाजपेयी पर एक परिचयात्मक आलेख चाहिए| आदेश टालना संभव न था अतः यह लेख लिखा गया|

नई कविता के सशक्‍त कवि, संपादक, आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी, 1941 को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में हुआ। वे चिंतकमिजाज और संवेदनशील कवि हैं। उनकी कविताओं में समसामयिक परिस्थितियाँ दृष्‍टिगत होती हैं। वे अपने समय और समाज, जिसे वे अपना पड़ोस कहते हैं, की सच्चाइयों के प्रति सजग और संवेदनशील हैं। उनकी कविताओं में विषयवैविध्य है। परंपरा और आधुनिकता, प्रेम, अनुभूति, जिजीविषा, आस्था, समाज, समय, शब्द, पूर्वज, कलाएँ, घर, पड़ोस, मृत्यु, कुंठा, अकेलापन और मनुष्‍य की नियति आदि उनकी कविताओं में विशेष रूप से दिखाई पड़ते हैं।

अशोक वाजपेयी ने सागर विश्‍वविद्‍यालय से बी.ए. और नई दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्‍त की हैं। तत्पश्‍चात वे दो साल तक ध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत रहे। 1965 में वे भारतीय प्रशासन सेवा में शामिल हुए। उन्होंने मध्यप्रदेश शासन के अनेक विभागों में सचिव के रूप में अपनी सेवाएँ दी। 1992 में भारत सरकार के संस्कृति विभाग में संयुक्‍त सचिव बने। उस समय उन्होंने साहित्य और कलाओं के राष्‍ट्रीय, अंतरराष्‍ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अनेक आयोजन भी किए। इतना ही नहीं वे भारत भवन (भोपाल), कालिदास अकादमी, उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद आदि अनेक संस्थाओं के संस्थापक और संचालक भी रह चुके हैं। भारतीय प्रशासन सेवा कार्यों के साथ साथ वाजपेयी जी ने अपने सृजनात्मक लेखन को लगातार जारी रखा है।

अशोक वाजपेयी की प्रमुख रचनाओं में ‘शहर अब भी संभावना है’(1966), ‘एक पतंग अनंत में’(1984), ‘अगर इतने में ’(1986), ‘तत्पुरुष’(1989), ‘कहीं नहीं वहीं’(1991), ‘बहुरि अकेला’(1992), ‘थोड़ी जगह’(1994), ‘घास में दुबका आकाश’(1994), ‘होना पृथ्वी न होना आकाश’(1994), ‘आविन्यों’(1995), ‘अभी कुछ और’(1988),‘समय के पास समय’(2000), ‘इबारत से गिरी मात्राएँ’(2002), ‘उजाला एक मंदिर बनाता है’(2002), पुरखों की परछाई में धूप’(2003), कुछ रफ़ू कुछ थिगड़े’(2004), ‘उम्मीद का दूसरा नाम’(2004), ‘कुछ पूर्वग्रह’(1984) और  समय से बाहर’(1994) आदि कृतियाँ शामिल हैं। अशोक वाजपेयी  ने ‘समवेत’, ‘समास, ‘पूर्वग्रह’ ‘पहचान’, ‘बहुवचन’ और कविता एशिया(अंग्रेज़ी) आदि प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के संपादक के रूप में ब्भी पर्याप्‍त ख्याति अर्जित की हैं।

वाजपेयी जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार(1994) और दयावती मोदी कविशेखर सम्मान(1994) मिले हैं। पोलिश सरकार ने उन्हें अपने सम्मान ‘आफ़िसर आव्‌ द आर्डर आव्‌ क्रास’(2004) और फ्रेंच सरकार ने ‘आफ़िसर आव्‌ द आर्डर आव्‌ आर्ट्स एवं लैटर्स’(2005) से गौरवान्वित किया है।

अशोक वाजपेयी की काव्य प्रकृति को स्पष्‍ट करते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी ने कहा है कि "तीखे व्यंग्य विद्रूप के युग में अशोक वाजपेयी बड़ी कोमल और सुकुमार मनःस्थिति के कवि हैं।" वे अपने परिवेश से इतने जुड़े हुए हैं कि उनकी रचनाओं में वह स्वतः ही मुखरित होता है। इसीलिए उनको ‘पड़ोस के कवि’ के रूप में जाना जाता है। वे समय के महत्व को जानते हैं और वे समय के साथ चलते हैं और कहते हैं कि 
"अगर वक्‍़त मिला होता
तो मैं दुनिया को कुछ बदलने की कोशिश करता।
आपकी दुनिया को, नहीं,
अपनी दुनिया को,
जिसको सँभालने-समझने
और बिखरने से बचाने में ही वक्‍़त बीत गया।" (अगर वक्‍़त मिला होता)।

जब समाज एक साँचे में जकड़ जाता है तो संवेदनशील हृदय का संत्रस्त होना स्वाभाविक है चूँकि उस परिस्थिति में सबसे पहले सृजनात्मकता नष्‍ट हो जाती है। इसीलिए अशोक वाजपेयी स्वस्थ समाज की कामना करते हुए कहते हैं कि 
"हमें हार-जीत का कौशल नहीं
जीने की सीदी-सादी हिकमतें चाहिए
और उसके लिए थोड़ा-सा इतिहास काफ़ी है।" (थोड़ा-सा इतिहास)।

अशोक वाजपेयी आस्था के कवि हैं। वस्तुतः भारतीय मनीषा इसी बात पर विश्‍वास करती है। इसलिए वे कहते हैं कि
"अपनी गाड़ी में ले जाएगी
लादकर मृत्यु सारा अंबार और अटाला
पर छूट ही जाएगी 
एक टुटही मेज़ और बाल्टी -

सब चले जाएँगे
सुख-दुख, धैर्य और लालच
सुंदरता और पवित्रता
पर प्रार्थना के अंतिम अक्षय शब्द की तरह
बची रह जाएगी कामना -

सब कुछ नष्‍ट नहीं होगा,
कुछ तो बच ही जाएगा।" (कुछ तो)।

वे आगे यह भी कहते हैं कि
"अगर बच सका 
तो वही बचेगा
हम सबसे थोड़ा-सा आदमी -
***** ****
जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
***** ****
जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है," (थोड़ा-सा)।

अशोक वाजपेयी कवि के साथ साथ आलोचक भी हैं। उनकी पक्षधरता मनुष्य के सामने उपस्थित संकटों की पहचान में निहित है -
"हमें खुद ही पता नहीं है
हम इतने सारे सच
उठाए चल रहे हैं

अपने समय का सच,
अपने समय में आदमी के धीरे-धीरे
गायब हो जाने का सच,
चीज़ों, लालच और डाह के बढ़ जाने
और जगह के कम होते जाने का सच
दिन-ब-दिन भरोसा न किए जाने का सच।" (धूल की तरह सच)।

किसी भी रचनाकार के व्यक्‍तित्व को पहचानना है तो उनकी रचनाओं को परखना होगा। अशोक वाजपेयी की कविताओं को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि वे आत्मचेतना के कलाकार हैं। उनकी मान्यता है कि एक जागरूक बुद्धिजीवी के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि अपनी समकालीन दुनिया में उसे बौद्धिक चुनौतियाँ दी जाना बंद हो जाएँ। वे मानवीयता के खोजी हैं -
"पदाघात से
खिलता है अशोक का फूल

बिखरते हैं रंग
होती है सुबह 

पृथ्वी मनाती है मोद
पदाघात से! (पदाघात)।


मंगलवार, 15 मार्च 2011

इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ...



आज की नारी न तो कामायनी की श्रद्धा मात्र है और न इड़ा मात्र ही। इड़ा और श्रद्धा उसके व्यक्‍तित्व के दो पहलू हैं - समान रूप से आवश्‍यक और समान रूप से महत्वपूर्ण। जब तक स्त्री को श्रद्धा और इड़ा में विभाजित करके देखा जाता रहेगा, ऐसा हर दर्शन अधूरा रहेगा। स्त्री को उसके व्यक्‍तित्व की पूर्णता में समग्र मानवी के रूप में देखे बिना उसके बारे में फ़तवे जारी करना न्याय संगत नहीं है।

इंदिरा गांधी ने एक जगह कहा था कि ‘भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही स्त्री को कई अधिकार प्राप्‍त हैं। इसलिए अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ स्त्री अधिकारों के लिए उस तरह के संघर्ष की आवश्यकता  नहीं है।’ अतः भारतीय संदर्भ में स्त्री की छवि कई प्रसंगों में दुर्बल न होकार सक्षम ही प्रतीत होती है।’ हाँ, यह सर्वविदित है कि भारत में कई बाह्‍य आक्रमण हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय संस्कृति में कई अन्य देशों की संस्कृति आकर सम्मिलित हुईं तथा स्त्रियों पर कुछ पहरे लगने भी शुरू हुए। यहाँ भिन्न भिन्न वर्ग, धर्म और संप्रदाय की स्त्रियों की भिन्न भिन्न दशाएँ देखने को मिलती हैं। यह एक आम धारणा बन चुकी है कि मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल के आरंभ तक भारत में स्त्रियों की दशा सोचनीय रही लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली और नई प्रौद्योगिकी ने स्त्री को बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक स्तर पर सचेत किया है। अतः आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ स्त्री न पहुँची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘दि सब्जेक्शन ऑफ विमैन’ (1869) में स्त्रियों की कानूनी असमानता को चुनौती दी है। उनकी मान्यता थी कि ‘स्त्रियों के लिए मताधिकार का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है।’ संयुक्‍त राष्‍ट्र के महासचिव कॉफी अन्नान के अनुसार ‘प्रजातांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज की अवधारणा को क्रियान्वित करने के लिए सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक स्तर पर जेंडर समानता और महिलाओं का सशक्‍तीकरण महत्वपूर्ण कदम है।’ स्त्रियों के लिए मताधिकार का संवैधानिक अधिकार तो प्राप्‍त हुआ लेकिन आज भी वह अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत है। दूसरी ओर ‘हिंदू कोड बिल’ ने भारतीय नारी की स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई। इस समस्त संघर्ष और चेतना का ब्यौरा हमें सहज रूप से साहित्यिक कृतियों में भी देखने को मिलता है।

संवेदनशील साहित्यकारों ने स्त्री की जागरूकता का चित्रण किया है। साहित्य में स्त्री के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों रूपों का चित्रण प्राप्‍त होता है। आदिकालीन हिंदी साहित्य में नारी के अपूर्व सौंदर्य का वर्णन पाया जाता है। भक्‍तिकालीन साहित्य में उसके वैराग्यजनित कुंठाओं का चित्रण है तो रीतिकालीन साहित्य में वह पुरुष की विलासिता का पात्र बन गई। आधुनिक साहित्य में नारी को अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करते देखा जा सकता है तथा समकालीन साहित्य में स्त्री की ‘बोल्डनेस’ को।

हिंदी साहित्यकारों की भाँति तेलुगु साहित्यकारों ने भी स्त्री के अनेक रूपों और उनसे जुड़े अनेक मुद्‍दों का चित्रण किया है। कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु और गुरजाडा अप्पाराव जैसे साहित्यकारों ने स्त्री की समस्याओं को लेकर अनेक रचनाएँ की हैं। स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से तेलुगु साहित्य में गुडिपाटी वेंकट चलम्‌ की रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री को अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य किया। उनकी रचनाओं में ‘कन्नीटी कालुवा’ (अश्रुधारा), ‘अदृष्‍टम्‌’ (किस्मत), ‘हंपी कन्यलू’ (हंपी की कन्याएँ) और ‘वेंकट चलम्‌ कथलू’ (वेंकट चलम्‌ की कहानियाँ) आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इसी क्रम में कोडवटीगंटी कुटुंबराव की रचनाओं को भी स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी कृतियों में स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता से जुड़े मुद्‍दों को उकेरा है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं ‘आडा जन्मा’ (स्त्री जन्म), ‘लेचिपोइना मनिषी’ (भागा हुआ मनुष्य) और ‘कुलम्‌ लेनी पिल्ला’ (निम्न जाति की लड़की) आदि।

चलम्‌ और कुटुंबराव के साहित्य से प्रेरणा पाकर अनेक स्त्रियों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। इतना ही नहीं अनेक पुरुष साहित्यकारों के साथ साथ महिला रचनाकारों ने भी उनसे प्रभावित होकर अपने सृजनात्मक लेखन द्वारा समाज में स्त्री की दशा को बदलने की आवाज उठाई।

भावात्मक कहानियाँ लिखने में जहाँ अडवि बापिराजु, चिंता दीक्षितुलु और वेलूरि शिवराम शास्त्री प्रसिद्ध हैं वहीं लेखिकाओं में कनुपर्ति वरलक्ष्‍म्मा, इल्लिंदल्लि सरस्वती देवी, मालती चंदूर, अब्बूरि छायादेवी तथा कोम्मूरि पद्‍मावती देवी आदि विख्यात हैं। इन महिला रचनाकारों ने भोगे हुए यथार्थ को कलात्मक बिंबों द्वारा अपनी रचनाओं में अभिव्यक्‍त किया है।

आज वह जमाना नहीं रहा जब स्त्री की दुनिया चूल्हा-चक्की तक सीमित थी। अब वह घर-परिवार के साथ साथ समाज की भी संरक्षक बन गई है। कोंडेपूडि निर्मला, ओल्गा, वसंता कन्नाभिरान्‌, पद्‍मलता, एन.अरुणा, वाणी रंगाराव, घंटसाला निर्मला, शाहजहाना, वकुलाभरनम्‌ ललिता और के.गीता जैसी अनेक कवयित्रियों ने भुक्‍तभोगी के रूप में स्त्री जीवन के यथार्थ के साथ साथ अपने समकालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को भी अपनी रचनाओं में विचारोत्तेजक रूप में प्रस्तुत किया है।

महाकवि श्रीश्री का कथन है कि ‘कविता के लिए हर कोई छोटी चीज भी उपयोगी है।’ इसी तथ्य को आज की समकालीन स्त्री रचनाकार चरितार्थ कर रही हैं। वे अपनी अभिव्यक्‍ति के लिए छोटे से छोटे बिंब, प्रतीक, घटना और विचार को सशक्‍त रूप से प्रयोग कर रही हैं। एन.अरुणा ने अपनी कविता ‘सुई’ के माध्यम से यह स्पष्‍ट किया है कि सुई स्त्री जीवन और सृजनात्मक मानसिकता का वह प्रकार है जो बेटी को अपनी माँ से विरासत में प्राप्‍त होता है। सुई को कवयित्री ने प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता के धागों से पिरोती है - "इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फटते भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-विभेदों को/ रफ़ू करना चाहती हूँ/ चीथड़ों में फिरनेवाले लोगों के लिए/ हर चबूतरे पर/ सिलाई मशीन बनना चाहती हूँ।/ ***/ आर-पार न सूझनेवाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में / मेरी सुई है/ और लोकों की समष्‍टि के लिए खुला कांतिनेत्र।" (एन.अरुणा, ‘सुई’, मौन भी बोलता है; पृ.53-54)।

स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करने के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। जैसे समान क्षतिपूर्ति अधिनियम 1976; बाल विवाह प्रतिबंध नियम 1929, संशोधित 1987; हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और महिला आरक्षण विधेयक आदि। फिर भी स्त्री का जीवन संघर्षपूर्ण है। उसे अक्सर यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि तुम लड़की हो। अपनी सीमा में रहो। एन. रजिया बेगम ने अपनी कविता ‘अलागे अन्नारू’ (ऐसे ही कहते थे) में इसी बात को स्प्ष्‍ट किया है - "बाल्यम्‌लो/ ‘चिन्न पिल्लवी नीकेम तेलुसु कूर्चो!’ अन्नारू/ यौवनम्‌लो/ ‘उडुकुरक्‍तम्‌ मंची चेडु तेलीदु कूर्चो! अनारू/ वृद्धाप्यम्‌लो/ ‘मुसल्‌दानिवी इंकेम्‌ चेस्ताव कूर्चो!’ अनारू/ अवकाहसम्‌ रानन्दुकु कोपंगा लेदु नाकु/ कूर्चोनी, कूर्चोनी बद्‌धकम्‌ वच्चिनंदुके बाधगा उन्दि।" (‘बचपन में  यह कहकर चुप कराया गया कि तुम बच्ची हो, तुम्हें क्या पता। यौवन में कहा गया कि जोश में हो, अच्छे और बुरे की पहचान नहीं है, चुप बैठो। और वार्धक्य में यह कहकर एक कोने में बिठा दिया ‍गया कि बूढ़ी हो, अब क्या कर सकती हो। कुछ करने के लिए मौका प्राप्‍त न होने के कारण क्रोधित नहीं हूँ, पर बैठे बैठे उकताहट ने घेर लिया है। यही मेरी वेदना है।’ - एस.रजिया बेगम, अलागे अन्नारू (ऐसे ही कहते थे), नीलि मेघालू (नीला मेघ) (सं) ओल्गा; पृ.58)।

पुरुष सदैव से स्त्रियों की कुंठा, निराशा, इच्छा और प्रेम आदि के बारे में तो लिखता आया है लेकिन वह निजीकरण (प्रसव वेदना और मासिकधर्म) जिसे स्त्री ही स्वयं अनुभव कर सकती है, उसकी भाषिक और सच्ची अभिव्यक्‍ति स्त्रियाँ ही कर सकती हैं। तेलुगु की अनेक कवयित्रियों ने इस सर्वथा निजी अनुभव को सटीक अभिव्यक्‍ति प्रदान की हैं। 

आज की स्त्री पूरी तरह से बदल चुकी है। जहाँ मनुस्मृति में यह कहा गया है कि स्त्री की कौमार्य अवस्था में पिता, यौवनावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं वहीं आज की स्त्री कहती है कि "सुना है पुराने जमाने में गांधारी नाम की एक महान पतिव्रता थी, जिसका पति जन्मांध था। उसने अपनी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँध ली कि उसे वह दुनिया दिखाई न दें, जिसे उसका पति नहीं देख सकता। इस ज़माने में अगर आप ऐसा सोचेंगे कि हम बिना पट्टी बाँधे आपकी मनमानी देखें, चुपचाप रहें, तो यह संभव नहीं है।" (डी.कामेश्वरी, ‘आज की नारी’; आज की नारी’ पृ.58)|

वैज्ञानिक तर्कों ने भी यह साबित कर दिया है कि कई प्रसंगों में पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक समझदार, भावुक और मानवीय गुणों से संपन्न है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा के निबंध ‘युद्ध और नारी’ के  कुछ अंश याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ‘जहाँ पुरुष एक बरगद का पेड़ है, वहीं स्त्री एक कोम्ल लता।’ वे आगे कहती हैं कि ‘स्त्री ने यदि पुरुष के विरुद्ध हथियार उठा लिया तो पूरी दुनिया का सर्वनाश हो जाएगा।’ अतः जो समाज स्त्री को एक बोझ समझकर उसके पैदा होने से पहले ही उसकी भ्रूण हत्या करने की ओर अग्रसर हैं, उन्हें थोड़ी देर के लिए आज की स्त्री की शक्‍ति को एक बार परख लेना समीचीन होगा।

अनेक स्त्रियों ने अपने अनुभूत यथार्थ को सर्जनात्मक अभिव्यक्‍ति दी है। उनमें से कुछ ने और एक कदम आगे बढ़कर इस सर्जनात्मक चेतना को वैचारिक रूप प्रदान करने के लिए कई संस्थाओं का निर्माण किया है। उदाहरणार्थ तेलुगु की प्रसिद्ध कवयित्री ओल्गा (1950) ने स्त्री संबंधी रचनात्मक साहित्य ही नहीं लिखा बल्कि उस साहित्य को जन आंदोलन का रूप देने हेतु ‘अस्मिता’ (Feminist Voluntary Organization) की स्थापना भी की। ऐसी और भी अनेक संस्थाएँ सामाजिक परिवर्तन के लिए अहर्निश प्रयासरत हैं। 

स्मस्णीय है कि मानव-अधिकारों की बात करना ही स्त्री-अधिकारों की बात करना है; स्त्री-अधिकार कोई अलग वस्तु नहीं है :-
"हमें उड़ने को
पंख नहीं चाहिए।
बस हमारे पैरों की
बेड़ियाँ खोल दो॥" 

- ८.३.२०११