मंगलवार, 15 मार्च 2011

इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ...



आज की नारी न तो कामायनी की श्रद्धा मात्र है और न इड़ा मात्र ही। इड़ा और श्रद्धा उसके व्यक्‍तित्व के दो पहलू हैं - समान रूप से आवश्‍यक और समान रूप से महत्वपूर्ण। जब तक स्त्री को श्रद्धा और इड़ा में विभाजित करके देखा जाता रहेगा, ऐसा हर दर्शन अधूरा रहेगा। स्त्री को उसके व्यक्‍तित्व की पूर्णता में समग्र मानवी के रूप में देखे बिना उसके बारे में फ़तवे जारी करना न्याय संगत नहीं है।

इंदिरा गांधी ने एक जगह कहा था कि ‘भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही स्त्री को कई अधिकार प्राप्‍त हैं। इसलिए अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ स्त्री अधिकारों के लिए उस तरह के संघर्ष की आवश्यकता  नहीं है।’ अतः भारतीय संदर्भ में स्त्री की छवि कई प्रसंगों में दुर्बल न होकार सक्षम ही प्रतीत होती है।’ हाँ, यह सर्वविदित है कि भारत में कई बाह्‍य आक्रमण हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय संस्कृति में कई अन्य देशों की संस्कृति आकर सम्मिलित हुईं तथा स्त्रियों पर कुछ पहरे लगने भी शुरू हुए। यहाँ भिन्न भिन्न वर्ग, धर्म और संप्रदाय की स्त्रियों की भिन्न भिन्न दशाएँ देखने को मिलती हैं। यह एक आम धारणा बन चुकी है कि मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल के आरंभ तक भारत में स्त्रियों की दशा सोचनीय रही लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली और नई प्रौद्योगिकी ने स्त्री को बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक स्तर पर सचेत किया है। अतः आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ स्त्री न पहुँची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘दि सब्जेक्शन ऑफ विमैन’ (1869) में स्त्रियों की कानूनी असमानता को चुनौती दी है। उनकी मान्यता थी कि ‘स्त्रियों के लिए मताधिकार का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है।’ संयुक्‍त राष्‍ट्र के महासचिव कॉफी अन्नान के अनुसार ‘प्रजातांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज की अवधारणा को क्रियान्वित करने के लिए सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक स्तर पर जेंडर समानता और महिलाओं का सशक्‍तीकरण महत्वपूर्ण कदम है।’ स्त्रियों के लिए मताधिकार का संवैधानिक अधिकार तो प्राप्‍त हुआ लेकिन आज भी वह अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत है। दूसरी ओर ‘हिंदू कोड बिल’ ने भारतीय नारी की स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई। इस समस्त संघर्ष और चेतना का ब्यौरा हमें सहज रूप से साहित्यिक कृतियों में भी देखने को मिलता है।

संवेदनशील साहित्यकारों ने स्त्री की जागरूकता का चित्रण किया है। साहित्य में स्त्री के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों रूपों का चित्रण प्राप्‍त होता है। आदिकालीन हिंदी साहित्य में नारी के अपूर्व सौंदर्य का वर्णन पाया जाता है। भक्‍तिकालीन साहित्य में उसके वैराग्यजनित कुंठाओं का चित्रण है तो रीतिकालीन साहित्य में वह पुरुष की विलासिता का पात्र बन गई। आधुनिक साहित्य में नारी को अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करते देखा जा सकता है तथा समकालीन साहित्य में स्त्री की ‘बोल्डनेस’ को।

हिंदी साहित्यकारों की भाँति तेलुगु साहित्यकारों ने भी स्त्री के अनेक रूपों और उनसे जुड़े अनेक मुद्‍दों का चित्रण किया है। कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु और गुरजाडा अप्पाराव जैसे साहित्यकारों ने स्त्री की समस्याओं को लेकर अनेक रचनाएँ की हैं। स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से तेलुगु साहित्य में गुडिपाटी वेंकट चलम्‌ की रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री को अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य किया। उनकी रचनाओं में ‘कन्नीटी कालुवा’ (अश्रुधारा), ‘अदृष्‍टम्‌’ (किस्मत), ‘हंपी कन्यलू’ (हंपी की कन्याएँ) और ‘वेंकट चलम्‌ कथलू’ (वेंकट चलम्‌ की कहानियाँ) आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इसी क्रम में कोडवटीगंटी कुटुंबराव की रचनाओं को भी स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी कृतियों में स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता से जुड़े मुद्‍दों को उकेरा है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं ‘आडा जन्मा’ (स्त्री जन्म), ‘लेचिपोइना मनिषी’ (भागा हुआ मनुष्य) और ‘कुलम्‌ लेनी पिल्ला’ (निम्न जाति की लड़की) आदि।

चलम्‌ और कुटुंबराव के साहित्य से प्रेरणा पाकर अनेक स्त्रियों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। इतना ही नहीं अनेक पुरुष साहित्यकारों के साथ साथ महिला रचनाकारों ने भी उनसे प्रभावित होकर अपने सृजनात्मक लेखन द्वारा समाज में स्त्री की दशा को बदलने की आवाज उठाई।

भावात्मक कहानियाँ लिखने में जहाँ अडवि बापिराजु, चिंता दीक्षितुलु और वेलूरि शिवराम शास्त्री प्रसिद्ध हैं वहीं लेखिकाओं में कनुपर्ति वरलक्ष्‍म्मा, इल्लिंदल्लि सरस्वती देवी, मालती चंदूर, अब्बूरि छायादेवी तथा कोम्मूरि पद्‍मावती देवी आदि विख्यात हैं। इन महिला रचनाकारों ने भोगे हुए यथार्थ को कलात्मक बिंबों द्वारा अपनी रचनाओं में अभिव्यक्‍त किया है।

आज वह जमाना नहीं रहा जब स्त्री की दुनिया चूल्हा-चक्की तक सीमित थी। अब वह घर-परिवार के साथ साथ समाज की भी संरक्षक बन गई है। कोंडेपूडि निर्मला, ओल्गा, वसंता कन्नाभिरान्‌, पद्‍मलता, एन.अरुणा, वाणी रंगाराव, घंटसाला निर्मला, शाहजहाना, वकुलाभरनम्‌ ललिता और के.गीता जैसी अनेक कवयित्रियों ने भुक्‍तभोगी के रूप में स्त्री जीवन के यथार्थ के साथ साथ अपने समकालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को भी अपनी रचनाओं में विचारोत्तेजक रूप में प्रस्तुत किया है।

महाकवि श्रीश्री का कथन है कि ‘कविता के लिए हर कोई छोटी चीज भी उपयोगी है।’ इसी तथ्य को आज की समकालीन स्त्री रचनाकार चरितार्थ कर रही हैं। वे अपनी अभिव्यक्‍ति के लिए छोटे से छोटे बिंब, प्रतीक, घटना और विचार को सशक्‍त रूप से प्रयोग कर रही हैं। एन.अरुणा ने अपनी कविता ‘सुई’ के माध्यम से यह स्पष्‍ट किया है कि सुई स्त्री जीवन और सृजनात्मक मानसिकता का वह प्रकार है जो बेटी को अपनी माँ से विरासत में प्राप्‍त होता है। सुई को कवयित्री ने प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता के धागों से पिरोती है - "इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फटते भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-विभेदों को/ रफ़ू करना चाहती हूँ/ चीथड़ों में फिरनेवाले लोगों के लिए/ हर चबूतरे पर/ सिलाई मशीन बनना चाहती हूँ।/ ***/ आर-पार न सूझनेवाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में / मेरी सुई है/ और लोकों की समष्‍टि के लिए खुला कांतिनेत्र।" (एन.अरुणा, ‘सुई’, मौन भी बोलता है; पृ.53-54)।

स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करने के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। जैसे समान क्षतिपूर्ति अधिनियम 1976; बाल विवाह प्रतिबंध नियम 1929, संशोधित 1987; हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और महिला आरक्षण विधेयक आदि। फिर भी स्त्री का जीवन संघर्षपूर्ण है। उसे अक्सर यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि तुम लड़की हो। अपनी सीमा में रहो। एन. रजिया बेगम ने अपनी कविता ‘अलागे अन्नारू’ (ऐसे ही कहते थे) में इसी बात को स्प्ष्‍ट किया है - "बाल्यम्‌लो/ ‘चिन्न पिल्लवी नीकेम तेलुसु कूर्चो!’ अन्नारू/ यौवनम्‌लो/ ‘उडुकुरक्‍तम्‌ मंची चेडु तेलीदु कूर्चो! अनारू/ वृद्धाप्यम्‌लो/ ‘मुसल्‌दानिवी इंकेम्‌ चेस्ताव कूर्चो!’ अनारू/ अवकाहसम्‌ रानन्दुकु कोपंगा लेदु नाकु/ कूर्चोनी, कूर्चोनी बद्‌धकम्‌ वच्चिनंदुके बाधगा उन्दि।" (‘बचपन में  यह कहकर चुप कराया गया कि तुम बच्ची हो, तुम्हें क्या पता। यौवन में कहा गया कि जोश में हो, अच्छे और बुरे की पहचान नहीं है, चुप बैठो। और वार्धक्य में यह कहकर एक कोने में बिठा दिया ‍गया कि बूढ़ी हो, अब क्या कर सकती हो। कुछ करने के लिए मौका प्राप्‍त न होने के कारण क्रोधित नहीं हूँ, पर बैठे बैठे उकताहट ने घेर लिया है। यही मेरी वेदना है।’ - एस.रजिया बेगम, अलागे अन्नारू (ऐसे ही कहते थे), नीलि मेघालू (नीला मेघ) (सं) ओल्गा; पृ.58)।

पुरुष सदैव से स्त्रियों की कुंठा, निराशा, इच्छा और प्रेम आदि के बारे में तो लिखता आया है लेकिन वह निजीकरण (प्रसव वेदना और मासिकधर्म) जिसे स्त्री ही स्वयं अनुभव कर सकती है, उसकी भाषिक और सच्ची अभिव्यक्‍ति स्त्रियाँ ही कर सकती हैं। तेलुगु की अनेक कवयित्रियों ने इस सर्वथा निजी अनुभव को सटीक अभिव्यक्‍ति प्रदान की हैं। 

आज की स्त्री पूरी तरह से बदल चुकी है। जहाँ मनुस्मृति में यह कहा गया है कि स्त्री की कौमार्य अवस्था में पिता, यौवनावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं वहीं आज की स्त्री कहती है कि "सुना है पुराने जमाने में गांधारी नाम की एक महान पतिव्रता थी, जिसका पति जन्मांध था। उसने अपनी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँध ली कि उसे वह दुनिया दिखाई न दें, जिसे उसका पति नहीं देख सकता। इस ज़माने में अगर आप ऐसा सोचेंगे कि हम बिना पट्टी बाँधे आपकी मनमानी देखें, चुपचाप रहें, तो यह संभव नहीं है।" (डी.कामेश्वरी, ‘आज की नारी’; आज की नारी’ पृ.58)|

वैज्ञानिक तर्कों ने भी यह साबित कर दिया है कि कई प्रसंगों में पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक समझदार, भावुक और मानवीय गुणों से संपन्न है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा के निबंध ‘युद्ध और नारी’ के  कुछ अंश याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ‘जहाँ पुरुष एक बरगद का पेड़ है, वहीं स्त्री एक कोम्ल लता।’ वे आगे कहती हैं कि ‘स्त्री ने यदि पुरुष के विरुद्ध हथियार उठा लिया तो पूरी दुनिया का सर्वनाश हो जाएगा।’ अतः जो समाज स्त्री को एक बोझ समझकर उसके पैदा होने से पहले ही उसकी भ्रूण हत्या करने की ओर अग्रसर हैं, उन्हें थोड़ी देर के लिए आज की स्त्री की शक्‍ति को एक बार परख लेना समीचीन होगा।

अनेक स्त्रियों ने अपने अनुभूत यथार्थ को सर्जनात्मक अभिव्यक्‍ति दी है। उनमें से कुछ ने और एक कदम आगे बढ़कर इस सर्जनात्मक चेतना को वैचारिक रूप प्रदान करने के लिए कई संस्थाओं का निर्माण किया है। उदाहरणार्थ तेलुगु की प्रसिद्ध कवयित्री ओल्गा (1950) ने स्त्री संबंधी रचनात्मक साहित्य ही नहीं लिखा बल्कि उस साहित्य को जन आंदोलन का रूप देने हेतु ‘अस्मिता’ (Feminist Voluntary Organization) की स्थापना भी की। ऐसी और भी अनेक संस्थाएँ सामाजिक परिवर्तन के लिए अहर्निश प्रयासरत हैं। 

स्मस्णीय है कि मानव-अधिकारों की बात करना ही स्त्री-अधिकारों की बात करना है; स्त्री-अधिकार कोई अलग वस्तु नहीं है :-
"हमें उड़ने को
पंख नहीं चाहिए।
बस हमारे पैरों की
बेड़ियाँ खोल दो॥" 

- ८.३.२०११ 



7 टिप्‍पणियां:

: केवल राम : ने कहा…

आपका आलेख गहन चिंतन और अध्ययन का परिणाम है ..आपने बहुत बारीकी से नारी जीवन एक प्रत्येक पक्ष पर प्रकाश डाला है ..आपका आभार इस विचारणीय आलेख के लिए

: केवल राम : ने कहा…

कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...
वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया .

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आपका ब्लॉग बहुत सुंदर है....

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक लेखन ...
आपको होली पर फागुनी शुभकामनायें..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रिय गुर्रमकोंडा नीरजा जी
सस्नेह अभिवादन !

"इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूं..."
आलेख बहुत पसंद आया । आप हिंदी में श्रेष्ठ सृजन कर रही हैं , यह बहुत सुखद् है ।

हमें उड़ने को पंख नहीं चाहिए , बस हमारे पैरों की बेड़ियां खोल दो ।

नारी की स्थिति को ले'कर आपने अच्छा विवेचन किया है । संक्षिप्त होने के उपरांत आलेख में आपने उठाए गए विषय पर बहुत विद्वता से विवेचन किया है ।
हार्दिक बधाई !


♥होली की शुभकामनाएं ! मंगलकामनाएं !♥


- राजेन्द्र स्वर्णकार

muskan ने कहा…

आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक लेखन|
होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक लेखन ..