बुधवार, 9 मार्च 2011

मृत्यु शैय्‍या


"मृतं शरीरमृत्युज्य काष्‍ठलोष्‍ठसमं क्षितौ।
विमुखाः बान्धवाःयान्ति धर्मस्तमनुगच्छति॥" (मनुस्मृति, 4/243)

(मृतक के शरीर को बेकार लकड़ी अथवा मिट्टी के ढेले के समान ही निरर्थक समझकर धरती पर छोड़कर (गाड़ अथवा जलाकर) बंधु-बांधव वापस लौट जाते हैं। उस समय धर्म ही जीव का साथ निभाता है, वही उसका अनुगमन करता है।)

मनुष्‍य इस संसार में अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही संसार से विदा लेता है। जन्म और मृत्यु का यह चक्र निरंतर चलता ही रहता है। अनंत काबरा (1960) ने अपनी पुस्तक ‘मृत्यु शैया’ (कविता संग्रह; 2010) में जीवन की त्रासदी अर्थात मृत्यु के विभिन्न रूपों को उजागर किया है। इस रचना के उद्‍देश्य को स्पष्‍ट करते हुए स्वयं कवि ने कहा है कि "जीवन के साथ मृत्यु का पथ अभी जुड़ा है।... कब कोई कौन से काल में काल का ग्रास बन जाए यही समझाने की एक सहज कोशिश के अतिरिक्‍त कुछ नहीं । हर हालातों में बिछी हर कदम पर सजी मृत्यु शैय्या प्रायश्‍चित का भी अवसर दे, इस पर संशय की परतें चढ़ी हुई हैं। इन्हीं परतों को खोलना, आशंकाओं को गिनना  इन कविताओं का नैतिक धर्म है जो मानवता के मापदंड़ों पर अपने शिलालेखों को गिनती हुई मिलती हैं। ...जीवन की त्रासदी का यह सत्य अब तक आँख मिचौली खेल यहाँ-वहाँ छिपता रहा। उसे पकड़कर कान मरोड़कर आपके सम्मुख रख रहा हूँ।" (भूमिका)।

भारतीय संस्कृति के अनुसार यह कहा जाता है कि मानव शरीर कर्मों के फल से प्राप्‍त होता है। मनुष्‍य को भगवान ने विवेक की शक्‍ति दी है, सोचने-समझने की शक्‍ति प्रदान की है। इसीलिए मनुष्‍य पशु से भिन्न है। उसके जीवन में वस्तुतः तीन अवस्थाएँ हैं - बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था। कवि ने अपने कविता संग्रह में इन तीनों अवस्थाओं में घटित होनेवाली घटनाओं को उजागर करने के साथ साथ मृत्यु के विभिन्न  रूपों अर्थात आकस्मिक मृत्यु, संदेहात्मक मृत्यु, दुर्घटनाग्रस्त मौत, प्राकृतिक मृत्यु और मृत्युबोध आदि को रेखांकित किया है। इतना ही नहीं इन कविताओं में परंपरा और आधुनिकता का द्वन्द्व भी विद्‍यमान है। कवि ने जीवन में व्याप्‍त अनेकानेक समस्याओं जैसे कन्या भ्रूण हत्या, विधवा समस्या,वृद्धावस्था की समस्या, रोगी की मानसिकता, प्रसव पीड़ा आदि को भी उकेरा है।

आज के जीवन में संत्रास और भय की स्थिति उत्पन्न हो गई है। आधुनिक मानव अपनों से तथा अपने आप से भी इतना दूर होता जा रहा है कि आत्मीयता  और संवेदशीलता छटपटाने लगी है। आज मानव मन को मृत्यु का सत्य स्फष्‍ट हो गया  है। इसके हृदय में मुत्युबोध की भावना व्याप्‍त हो गई है - "घुटन और बौखलाहट की खीझ के बीच/ जीवन के घुप्प अंधेरे में/ राहों को तलाशने/ केवल शेष संभावनाओं की प्रतीक्षा में/ मृत्यु आकर नोंच ले/ मेरी सांसों को/ एक ही झटके में/ और लूट ले देह की क्रिया को/ और ले चले/ इस प्रयाण से महाप्रयाण की ओर" (पृ.2)|

मनुष्य  जब मृत्यु का साक्षात्‌ दर्शन कर लेता है तब वह मृत्यु के विषय में सोचता-विचारता है। कवि का कथन है  कि जन्म और मृत्यु जन्म जन्मांतरों से एक दूसरे से बँधे हैं - "जहाँ जीवन का वर/ मृत्यु की वधू बन/ जन्म ज्न्मांत्रों से/ एक दूजे के लिए/ हमेशा नए रूपों में  ब्याही है।" (पृ.175)।

मानव जीवन क्षणभंगुर है। इसलिए कवि कहता है कि "एक झटके में टूटता जीवन/ समय की चक्कियों में पीस/ जीवन पर कोल्हू के बैल की तरह/ धानी के चक्कर काटता रहा।" (पृ.24)| वे यह भी कहते हैं कि "जीवन के बीज से/ मृत्यु के पुष्‍प तक की यात्रा/ कई अवरोधों को पार  करती है/ इसी जीवन की सुगंध को/ कहाँ-कहाँ तक फैलाओगे/ यह हम पर निर्भर है।" (पृ.84)।

मृत्यु कब, कहाँ, कैसे, क्यों और किस तरह होती है यह कहना कठिन है। जिस तरह छिपकली कीट को पलक झपकते ही अपना आहार बना लेती है, उसी तरह एक ही क्षण में मनुष्‍य मौत के मुँह में जा सकता है - "भविष्य से मुँह चुरा/ बैठते हैं दीवार पर/ ललचाई छिपकली/ लिपलिपाती जुबान से/ धीरे-धीरे/ दबे पाँवों से/ जकड़ लेती है/ उस कीड को - उस कीट को/ पलक झपकते ही/ अपने आहार के लिए/ काल का ग्रास बना/ निगल लेती है/ एक ही क्षण में / और अनसोच भविष्‍य/ एक झटके में तोड़ता है दम/ उसके पैर  की मृत्यु शैय्या पर।" (पृ.1)|

भारतीय मान्यता है कि जन्म लेने के लिए जीव को मरना आवश्‍क है। इसी तथ्य को उजागर करते हुए कवि कहते हैं कि "जन्म लेनेवाले के लिए/ नितांत आवश्‍क है मृत्यु/ मिले वरदान भी/ नहीं शोक पाए हैं जीवन को/ हिरण्यकश्यप हो या भस्मासुर/ राम कृष्‍ण भी आकर लौट गए/ यह जीवन का शास्वत सत्य है।" (पृ.99)।

गीता में भी कहा गया है कि ‘देह से तादात्म्य मानने से ही मनुष्‍य अपने को मरनेवाला समझता है। देह के संबंध से होनेवाले संपूर्ण दुःखों में सबसे बड़ा दुःख मृत्यु ही माना गया है। अतः कवि कहता है कि "मृत्यु शैय्या पर लेटा असहाय शरीर/ निरीह आँखों के भाव लिए/ भीतर से काँपते हुए/ औरों की अनदेखी से/ दी हुई प्रताड़नाओं से/ पीड़ा के आभास में लिपट/ जलाता है।" (पृ.145)|

कहा जाता है कि चिंता चिता के समान है। चिंताग्रस्त व्यक्‍ति को चिता की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि वह चिंता की आग में ही झुलस जाता है - "जीवित शरीर की/ जीवित भावनाएँ बहुत पहले ही/ घोषित कर चुकी है अपनी मृत्यु की/ अब जो जलता है रह-रहकर/ वह चिंता का शरीर/ चिता के लिए नहीं तरसता।" (पृ.145)।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में मानव जीवन संकटपूर्ण बन गया है। ऐसी स्थिति में जहाँ मृत्यु की नंगी तलवार सिर पर लटकती दिखाई देती है, वहाँ जीवित रहने की आकांक्षा भी बलवती हो उठती है - "मरणासन्न देह की मृत्यु शैय्या/ प्रेम का दुलार पाते ही/ जिजीविषा को जागृत करती है/ और कष्‍टी देह/ भभकी किरण की लौ बन। जीवन ज्योति जलते हुए/ कुछ पलों के लिए ही सही/ मृत्यु के अंधेरों को/ धैर्य की लाठी से भगाता है।" (पृ.12)।

पहले ही इस बात की ओर संकेत किया जा चुका है कि इस कविता संग्रह में मृत्युबोध और मृत्यु के विविध रूपों के साथ साथ कवि ने कन्या भ्रूण हत्या और वृद्धावस्था की समस्याओं की ओर भी ध्यान आकृष्‍ट किया है।

यह सर्वविदित है कि कन्या भ्रूण हत्या जघन्य अपराध है लेकिन कुछ लोग गर्भस्त अथवा नवजात बालिका का जीवन इसलिए मिटा देते हैं कि वह एक लड़की है| गर्भपात निरीह असहाय प्राणी की बर्बर हत्या की करुण कहानी है और सामाजिक पतन की चरम सीमा का द्‍योतक भी है। इसकी ओर संकेत करते हुए कवि कहते हैं कि "गर्भ में पलता शिशु/ अपने मूल अस्तित्व अंड को छोड़ता हुआ/ आंवल में लिपट कर जकड़ा/ सांसों को लेता और छोड़ता हुआ/ सृष्‍टि के रहस्य को जानने आतुर/प्रयास में/ अपने अस्तित्व को भूल/ जब मारा जाता है/ गर्भ के भीतर/ जीवन रक्षकों के द्वारा।" (पृ.6)|

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सिर्फ प्रेम की परिभाषा ही नहीं बल्कि ममत्व की परिभाषा भी बदल गई है। कवि कहता है कि "माँ शब्द/ ममत्व की रक्षा करने के बाद भी नीलाम होता गया।" (पृ.7)|

व्यक्‍ति युवावस्था से वृद्धावस्था में जब कदम रखता है तब उसका शारीरिक बल क्षीण हो जाता है और वह हर तरह से कमजोर हो जाता है। सब लोग उसे अनुपयोगी और बोझ समझने लगते हैं। अतः वार्धक्‍य में जीवन दूबर लगने लगता है। मृत्यु की इंतजार में वह अतीत की यादों के सहारे दिन काटता रहता है - "बुढ़ापे का थका शरीर/ मृत्यु शैय्या पर उन पलों को गिनता है/ देखता है/ जहाँ उसके अतीत ने/ शौर्यता के पाठ पढ़े/ वृद्धावस्था पर संशय लगाने ।" (पॄ.40)|

निःसंदेह अनंत काबरा की इस पुस्तक में जीवन की त्रासदी का साक्षात्‌ दर्शन निहित है।

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  • मृत्यु शैय्या (कविता संग्रह)/ अनंत काबरा/ 2010 (प्रथम संस्करण)/ अकादमिक प्रतिभा; 42, एकता अपार्टमेंट, गीता कॉलोनी, दिल्ली - 110 031/ पृष्‍ठ -176/ मूल्य - रु.300/-


2 टिप्‍पणियां:

cmpershad ने कहा…

अनन्त काबरा की कृति पर सार्थक चर्चा के लिए बधाई स्वीकारें॥

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

धन्यवाद गुरूजी|

आपकी टिप्पणी मेरे जैसे अल्पज्ञ के लिए ऊर्जा है|