बुधवार, 22 जनवरी 2014

FEELINGS

Sometime before
Trees dozed and were motionless
Wind disappeared
Your memories stroked my thoughts
Your whisper lingered in my ears
Some-sort of anxiety smouldered in me
Trees spread their branches
Blossoms spread delicate fragrance
Breeze became soothing
A strong feeling aroused in me. 

तुम ... ?


कौन हो तुम?
कौन हूँ मैं?
एक हुए इस अनंत विश्व में

तुम नहीं जानते
कि मेरे लिए तुम क्या हो!

मेरे हृदय की पुकार हो तुम
मन की  प्यास बुझाने वाले हो तुम
मुझे मुझसे मिलाने वाले हो तुम

                                                     तुम नहीं मिलते तो ...... ? 

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

अशआर अशरफ गिल के, पसंद ऋषभ देव शर्मा की


'शब्द सुगंध' के तत्वावधान में 20 जनवरी 2014 को राजस्थानी स्नातक संघ (हैदराबाद) के प्रेक्षागार में अमेरिका से पधारे पाकिस्तान मूल के वरिष्ठ साहित्यकार अशरफ़ गिल की उर्दू गज़लों के हिंदी रूपांतर को प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लोकार्पित किया. इस अवसर पर उन्होंने विस्तार से अशरफ गिल की गज़लों के कथ्य, शिल्प और काव्यभाषा का विवेचन किया. उन्होंने पाँच श्रेणियों में बाँटकर कवि के कुछ शेरों को उदाहरण के रूप में भी पेश किया जिन्हें पाठकों के रसास्वादन के लिए यहाँ उद्धृत किया जा रहा है.  









अशरफ गिल के चुनिंदा अशआर
मुहब्बत
  1. जो बस रही है कसक बनके मेरे सीने में
     तुझे वो पेश मुहब्बत, करूँ करूँ न करूँ
 
  1. ज़रा इस ने देखा जो दरिया की जानिब
     तो पानी को भी इस ने प्यासा किया है
 
  1. इश्क से ‘अशरफ़’ ना घबराया कोई
     इश्क की गरचे है कीमत ज़िंदगी
 
  1. खुदा रा ! न तुम अपनी आदत बदलना
     सितम से तिरे दिल को आराम आए
 
  1. सुनसान थे वीरान थे आमद से तेरी पेशतर
     तूने दरखशां कर दिए मेरी गली के रास्ते 
  1. ‘अशरफ़’ इस दुनिया की रस्में करते करते अपने बस में
     हर आशिक़ ने जान गंवाई फिर भी मुहब्बत रास न आई
 
  1. तुझे याद करने के शौक में, कई रोग जां को लगा लिए
     तुझे भूलने की लगन में भी, कई दर्द सीने में पल गए
 
  1. हमेशा अश्क ख़्वाहिश जुस्तजू की आड़ में ‘अशरफ़’
     मिरी यादों की बस्ती में बसी अक्सर गलतफ़हमी !
 
  1. व आप से जब तलक आशनाई न थी
     ज़िन्दगानी मिरी मुसकुराई न थी
 
  1. जो लोग मुहब्बत की इबादत नहीं करते
     वो लोग इबादत से मुहब्बत नहीं करते
 
  1. यहाँ यार कोई भी जब मिला, वो मिला के हाथ जुदा हुआ
     जो किसी ने मुझसे बुरा किया, मेरे वास्ते वो भला हुआ
 
  1. इश्क का नाम दूसरा है जुनून
     रोज़ बढ़ता है, कम नहीं होता

व्यक्ति
  1. उसकी हर पल नई कहानी है
     आदमी ! आज की ख़बर ही नहीं
 
  1. कल तलक जिस में रह न पाएँगे
     उसको अपना मकान कहते हैं
 
  1. अगरचे चलते-चलते थक गया हूँ
     मगर फिर भी मुसलसल चल रहा हूँ
 
  1. ज़रूरतों से मुझे बांध कर जहाँ वाले
     मिरी ज़बान को पाबंदियों से कसते हैं
 
  1. दुश्मन बनाने को हमें कोशिश नहीं करना पड़ी
     हमवार यारों ने किए बेगानगी के रास्ते
 
  1. दोस्ती को पड़ रही हैं दुश्मनी की आदतें
     और यकीं से उठ रहा सभी का एतबार है
 
  1. वो इश्क है बे मतलब, वो प्यार है बे मानी
     इंसान का जो ऊंचा, मेयार न कर पाए
 
  1. मालूम न था हम पे ही तनकीद करेगा
     जिस से भी सलीके या शराफ़त से मिलेंगे
 
समाज/ राजनीति
  1. जो मुल्क ऐटम बना रहे हैं, वुह मुफ़लिसी को बढ़ा रहे हैं
     दिलों की धरती हसीन तर है, दिलों का नक्शा बदल के देखें
 
  1. ऐसी नगरी में भला कैसे रहें क्योंकर रहें
     जिसमें हो हर आदमी ही आदमी से डर गया?
 
  1. कितने मज़ाहिब मुखतलिफ है मुखतलिफ सब की रविश
     लेकिन रवां अल्लाह की जानिब सभी के रास्ते
 
  1. पास रखिए, ना यह नेमतें
     गर हंसी आए मुसकाइए 
  1. पकड़िए हाथ भी सूझ से
     सोचकर हाथ पकड़ाइए
 
  1. मैं वोट मर्ज़ी के इक रहनुमा को दे बैठा
     तभी हुकूमती दरबारियों की ज़द में हूँ
 
  1. मैं कर्बला हूँ जो प्यासों को पानी दे ना सका
     तभी मैं रोज़ ही बमबारियों की ज़द में हूँ
 
  1. अखबार की हर सुर्खी यूँ सुर्ख लगे हर दिन
     सतरों के बदन छलनी अलफ़ाज़ के सर ज़ख्मी 
  1. खोखली ऐसी हुकूमत की जड़ें हैं जिसने
     एक तराज़ू को भी तलवार बना के छोड़ा
 
  1. हथियार हथिया लो मगर कर पाओगे वापिस कभी?
     बदले में मासूमों की जो मासूमियत जाती रही
 
  1. तिजोरी थी अमीरों की भरी जानी
     पसीना बस ग़रीबों ने बहाना था
 
  1. इनसान का तो साँस भी लेना मुहाल है
     चारों तरफ़ फ़ज़ाओं में बारूद है यहाँ
 
  1. ऐटमी मुल्क का सोचें जो ये खुशहाल लगे
     पर यहाँ भूख से मरते है न जाने कितने

जिंदगी

  1. तुझ को बच्चों से भी मैं रखता अज़ीज़
     जानता गर तेरी बाबत ज़िंदगी
 
  1. वही ज़िन्दगानी मिरी हुई, मेरे हुक्म पर जो चली रुकी
     जो बिखर गई ना सिमट सकी, वही आप लोगों के नाम है
 
  1. एक खेल है जीना मरना भी
     बस आना जाना होता है
 
  1. रो ज़ाना बाप बनके डराती है ज़िन्दगी
     माँ बन के ख़ौफ़ दिल से मिटाती है ज़िन्दगी
 

कथन भंगिमा
  1. वह मेरे इज़हार-ए-उलफ़त पर यूं घबरा से गए
     पौ फटे जैसे अंधेरा रोशनी से डर गया
 
  1. याद की खेती सूख न जाए
     अक्सर आँखें तर करता हूँ
 
  1. मैं आंधी और अंधेरे का हूँ साथी
     दीया हूँ ! बुझ रहा हूँ जल रहा हूँ
 
  1. खुदा भी मुसतरद कैसे करेगा
     कि मैं इंसान हूँ माँ की दुआ हूँ?
 
  1. चाहता हूँ मैं तेरी नज़दीकी
     तू मगर मुझ से से फ़ासिला माँगे
 
  1. मेरी आँखों की चुभन शायद हो कम
     आप नज़रों से अगर सहलाइए 
  1. सुन के या पढ़ के ही जानोगे मेरे अशआर में
     रंग हैं अनमोल यकता ज़ायका मौजूद है
 
  1. महफ़िल-ए-गिल में जब जी करे
     आइए जाइए आइए जाइए
 
  1. प्यार तूफ़ान है आंधी है गरजता बादल
     जो सुझाई क्या, दिखाई भी नहीं देता है
 
  1. न तिरी वफ़ा थी नसीब में, न तिरी नज़र का करम हुआ
     ये तो खुदफ़रेबी का खेल था, जो हम आसरों से बहल गए
 
  1. उस की आँखें तरकर डालें
     जिससे आँख मिलाएं आँसू
 
  1. जता के प्यार तुम को कर लिया नाराज़, उफ़ तौबा !
     तुम्हारे रूठ जाने से तो थी बेहतर गलतफ़हमी ! 
  1. अपनी मर्ज़ी से हुआ शहर में सूरज तकसीम
     मेरी बारी है तो अब रात हुई जाती है
 
  1. आँखों की ख़ताओं के बदले
     दिल पर जुरमाना होता है
 
  1. जिस उम्र में आँखें मिलती हैं
     क्या ख़ूब ज़माना होता है
 
  1. एक दिन ये ख़ामुशी से घर को छोड़ जाएगी
     सांस ! जो मकान-ए-जिस्म में किराएदार है
 
  1. मिरा जिस वक्त हँसने का ज़माना था
     ज़माने को इसी दम ही रुलाना था
 
  1. खिलौनों की तरह पाबंद हम तेरी रज़ा के
     हमारी किस्मतों पर है फकत तेरा इजारा
 
  1. प्यार है हादसे का नाम अगर
     फिर ज़रूर एक हादसा कीजे
 
  1. कभी गम में माँ याद आयी है ‘अशरफ़’
     कभी उलझनों में खुदा याद आया
कविता

  1. होता रहेगा खुद-बखुद अशआर का नुज़ूल
     आएंगे जब वो बज़्म में होगी गज़ल तमाम
 
  1. ‘अशरफ़’ कुबूलियत नहीं पाता वही कलाम
     जो ख़ासो आम से नहीं होता है हमकलाम

सोमवार, 20 जनवरी 2014

हिंदी की दशा और दिशा

‘हिंदी की दशा और दिशा’
डॉ. सुधेश
2013,
 मेट्रो बुक्स, 1/2, गली नं. 5, पांडव रोड, विश्वास नगर,
शाहदरा, दिल्ली – 110032,
पृष्ठ – 135, मूल्य – रु.250
कहा जाता है कि भाषा संप्रेषण का सशक्त साधन है. जीवंतता, यादृच्छिकता, स्वायत्तता तथा लचीलापन भाषा के कुछ प्रमुख लक्षण हैं. भाषा वह चीज है जिसके माध्यम से हम बातचीत कर सकते हैं, तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं, किसी का स्वागत कर सकते हैं तथा किसी को विदाई दे सकते हैं. अर्थात जीवन के जितने भी दैनिक कार्य व्यापार हैं, गतिविधियाँ हैं उन्हें भाषा के माध्यम से संपन्न किया जा सकता है. भाषा ही व्यक्ति को समाज और समाज को विश्व नीड़ बनाती है. बहुभाषी समाज को राष्ट्र बनाने में भी भाषा की बड़ी भूमिका है. स्वातंत्र्य आंदोलन के पुरोधाओं ने महसूस किया था कि भारत जैसे बहुभाषिक देश में एक ऐसी संपर्क भाषा चाहिए जो संपूर्ण भारतीयों को एकसूत्र में बाँध सके. पहले यह काम संस्कृत के जिम्मे था और बाद में इसे हिंदी ने निभाया. इसीलिए स्वतंत्रता संघर्ष के दौर में हिंदी जानना देशप्रेम का एक लक्षण बन गया. लेकिन इसके लिए कोई बाध्यता की बात नहीं थी. लोग हिंदी के प्रति आकृष्ट होते गए. हिंदी देश की संपर्क भाषा बनी. 

महात्मा गांधी ने 1917 में भरूंच में गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में राष्ट्रभाषा के लिए कुछ कसौटियों की पहचान की थी - 

1. अमलदारों (सरकारी कर्मचारियों) के लिए आसान होनी चाहिए.
2. अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली सरल भाषा होनी चाहिए.
3. उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवहार हो सकना चाहिए.
4. राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए.
5. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या अस्थायी स्थिति पर जोर न दिया जाए.

हिंदी इन कसौटियों पर खरी उतरी. यही वजह रही कि आज़ाद होने पर भारत संघ ने राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकृति दी. उस संवैधानिक प्रावधान को यथार्थ रूप प्रदान करने के निमित्त प्रतिवर्ष 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ तो मनाया ही जाता है, साथ ही इसे विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ भी मनाया जाता है. 

हिंदी की दशा और दिशा, विश्व बाजार में हिंदी, हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी आदि के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है तथा बहुत कुछ लिखा भी जाता है. संगोष्ठियों का आयोजन भी किया जाता है. निःसंदेह हिंदी किसी एक प्रांत या क्षेत्र विशेष की भाषा नहीं है अपितु वह हिंद की भाषा है, हिंदुस्तान की भाषा है. साहित्यिक हिंदी और बोलचाल की हिंदी में भिन्नता होती है और यह स्वाभाविक है. बोलचाल की हिंदी वास्तव में बोली मिश्रित भाषा है. शिक्षित, अशिक्षित, अर्धशिक्षित, औपचारिक, अनौपचारिक, क्षेत्रीय, शहरी, ग्रामीण आदि प्रयोक्ता और परिस्थिति के भेद के कारण इसके अनेक स्तर होते हैं. व्यवसाय के कारण भी लोगों की भाषा तथा बोली पर काफी प्रभाव पड़ा है और पड़ रहा है. 

स्मरणीय है कि उच्च हिंदी, उच्च उर्दू और हिंदुस्तानी हिंदी भाषा की ही तीन शैलियाँ हैं. उच्च हिंदी तत्सम प्रधान शैली है तो उच्च उर्दू अरबी-फारसी प्रधान शैली. हिंदुस्तानी इन दोनों का मिश्रित रूप है. समाजभाषाविज्ञान की शब्दावली में कहें तो ये तीनों शैलियाँ हिंदी भाषा के तीन रजिस्टर्स हैं - विशिष्ट प्रयुक्ति क्षेत्र. हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है तो उर्दू को फारसी-अरबी लिपि में. लेकिन साहित्य की परंपरा की भिन्नता के कारण लोग हिंदी और उर्दू को दो अलग भाषाओं के रूप में भी देखते हैं. यदि बोलचाल की भाषा पर ध्यन दें तो यह बात स्पष्ट होती है कि बोलचाल की भाषा में खुलापन ज्यादा है तथा बोलचाल की हिंदी और उर्दू में कोई स्पष्ट अंतर दिखाई नहीं देता. अनेक स्रोतों से आए शब्दों के मिश्रण से बोलचाल की हिंदी जीवंत बन जाती है. भूमंडलीकरण और प्रौद्योगिकी के इस दौर में बाजार ने भी भाषा को काफी प्रभावित किया है. एक गतिशील भाषा होने के कारण हिंदी इन प्रभावों के अनुसार स्वयं को ढाल रही है. इसमें दो राय नहीं है कि - “हिंदी भारत की आत्मा ही नहीं, धड़कन भी है. यह भारत के व्यापक भू-भाग में फैली शिष्ट और साहित्यिक भाषा है. इसकी अनेक आंचलिक बोलियाँ हैं. इन बोलियों का हिंदी भाषा पर प्रभाव या उपभाषाओं का प्रभाव तथाकथित ‘हिंदी भाषा क्षेत्र’ के मौखिक व्यवहार में और इस क्षेत्र के साहित्यकारों के सर्जनात्मक लेखन में भी स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है. वैज्ञानिक, शैक्षणिक, सामाजिक और ज्ञान-विज्ञान के विस्तार के साथ जीवंत भाषा हिंदी के नए-नए रूप उभरे हैं. इन रूपों के प्रचलन से हिंदी में नए शब्दों, नई अभिव्यक्तियों, नए सह-संबंधों का आगमन हुआ है, इनके प्रयोग की दिशाएँ खुली हैं और इन्हें सामाजिक स्वीकार्यता मिली है. इस तरह हिंदी भाषा निरंतर गतिशील भाषा है.” (प्रो. दिलीप सिंह, ‘हिंदी भाषा का अंतरराष्ट्रीय संदर्भ’, हिंदी भाषा चिंतन, पृ. 276). पूरी दुनिया के लोग आज हिंदी भाषा की ओर आकर्षित ही रहे हैं क्योंकि “भारत की राष्ट्रभाषा तथा भारतीय जीवन की साक्षी भाषा होने के कारण पूरी दुनिया के लोग इस बात को भलीभाँति समझते हैं कि भारत और भारतीय संस्कृति को समझने में हिंदी की अहम भूमिका है.” (वही, पृ. 286). 

हाल ही में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नै द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय विश्व हिंदी सम्मलेन में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ. उस सम्मलेन में दो सत्र ‘विदेशों में हिंदी का स्वरूप’ तथा ‘भूमंडलीकरण एवं प्रौद्योगिकी व भाषाएँ’ पर क्रेंदित थे. अतः उन विषयों से संबंधित सामग्री की खोज करते समय मेरे हाथ डॉ. सुधेश की पुस्तक ‘हिंदी की दशा और दिशा’ (2013)लग गई. वैसे तो हिंदी भाषा, उसका उद्भव और विकास, उसकी ऐतिहासिकता, उसका स्वरूप, उसकी विभिन्न प्रयुक्तियों का परिचय आदि से संबंधित अनेकानेक किताबें हैं जिनमें बहुत सारी पुस्तकें ऐसी हैं जो भाषाविज्ञान के शोधार्थियों और अध्यापकों के लिए आकर ग्रंथ के समान हैं परंतु यह पुस्तक अपनी सहजता, सुबोधता और निर्भ्रांतता के कारण ध्यान आकर्षित करती है. 

इस पुस्तक (हिंदी की दशा और दिशा) में हिंदी भाषा से संबंधित अट्ठारह निबंधों को दो खंडों में सम्मिलित किया गया है. पहले खंड में हिंदी को भारतीय संदर्भ में देखा और परखा गया है तथा दूसरे खंड में विदेशों के संदर्भ में. पहले खंड में भाषायी स्वाभिमान का प्रश्न, बोलचाल की हिंदी का बदलता स्वरूप, संचार माध्यमों में हिंदी, हिंदी की समस्याएँ और चुनौतियाँ, आज की हिंदी आलोचना की भाषा, वैश्वीकरण और हिंदी, विज्ञापन और हिंदी, सूचना क्रांति और हिंदी प्रकाशन, हिंदी का वर्तमान, हिंदी का भविष्य, भविष्य की हिंदी, हिंदी और उसके छद्म शुभचिंतक शामिल हैं. दूसरे खंड में ब्रिटेन में हिंदी की दुर्गति, इटली में हिंदी, दक्षिणी कोरिया में हिंदी, यूरोप में हिंदी की स्थिति, विदेशों में हिंदी का अध्ययन, विदेशों में हिंदी के अध्ययन की समस्याएँ सम्मिलित हैं. लेखक ने यद्यपि प्राक्कथन में यह स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपने अनुभवों के आधर पर टिप्पणियाँ की हैं तथा कुछ निष्कर्ष निकाले हैं अतः यह आवश्यक नहीं है कि सब उनके निष्कर्षों से सहमत हों तथापि उनके निष्कर्ष प्रायः इतने साढ़े हुए और सुचिंतित है कि उनसे सहमत ही हुआ जा सकता है. 

भाषा चाहे हिंदी हो या अन्य भारतीय भाषाएँ हो या फिर विदेशी भाषाएँ, अपने प्रयोक्ता समूह, समाज अथवा देश की अस्मिता की प्रतीक होती हैं. लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने भी कहा है कि “राष्ट्र के एकीकरण के लिए सर्वमान्य भाषा से अधिक बलशाली कोई तत्व नहीं.” अपनी भाषा के प्रति प्रेम और गौरव की भावना न हो तो देश की अस्मिता खतरे में पड़ सकती है. “भाषायी स्वाभिमान केवल भावना और आत्मसंतोष का विषय नहीं है. उसके लिए कर्तव्य-बोध और व्यवहार की भी आवश्यकता है.” (डॉ. सुधेश, ‘भाषायी स्वाभिमान का प्रश्न’, हिंदी की दशा और दिशा, पृ. 11). स्मरणीय है कि बोलचाल की हिंदी में अनेक भाषाओं के शब्दों का मिश्रण पाया जाता है. कुछ लोग भले ही कहें कि बोलचाल की हिंदी का स्तर गिर रहा है लेकिन इस मिश्रित भाषा में एक खास मिठास है. समाजभाषाविज्ञान भी यह मानता है कि समाज में व्यवहृत भाषा एकरूप न होकर विषमरूपी है. अतः शब्दों, वाक्यों आदि का बहुकोडीय मिश्रण स्वाभाविक है. हिंदी भाषा की मिठास के बारे अमीर खुसरो का कथन याद आ रहा है – “अगर आप सच पूछें तो मैं हिंदुस्तान का तोता हूँ; अगर आप मिठास के साथ मुझसे बात करना चाहें तो ‘हिंदवी’ में बात कीजिए.” हाँ, इस मिश्रण के लिए भी कुछ नियम है. यदि गलत शब्दों का सहप्रयोग करेंगे तो हास्यास्पद हो सकता है.

आज भूमंडलीकरण और प्रौद्योगिकी के कारण विश्व की भाषाएँ प्रभावित हो रही हैं. हिंदी भाषा पर भी यह प्रभाव स्पष्ट झलकता है. नए क्षेत्रों में जाने के लिए यह जरूरी भी है. जैसे कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था “हमारे सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है हमारी भाषा को अनजान क्षेत्रों में ले जाना. राष्ट्रभाषा के प्रचार को मैं राष्ट्रीयता का अंग मानता हूँ. हमारी राष्ट्रभाषा की गंगा में देशी और विदेशी शब्द मिलकर एक हो जाएँगे.” डॉ. सुधेश भी इस मत के समर्थक प्रतीत होते हैं. उनकी पुस्तक की कुछ स्थापनाएँ आपके विचारार्थ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं - 

  • हिंदी के विदेशी विद्वान अपनी अपनी भाषा में ही हिंदी भाषा और साहित्य के बारे में लिखते हैं. इसका कारण उनका भाषायी स्वाभिमान ही है. भारतीयों में यह भाषायी स्वाभिमान प्रायः नहीं मिलता. (पृ. 14) 
  • हिंदी के मिश्रण का क्रम जारी है. इससे हिंदी की शब्द संपदा बढ़ती है, उसकी अभिव्यंजना शक्ति का विकास होता है. (पृ. 23) 
  • बोलचाल की हिंदी एक तरह की नहीं होगी. उसके अनेक रूप और उसकी अनेक शैलियाँ होगी. उन्हें अशुद्ध कह कर उनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए. व्याकरण सम्मत भाषा की माँग लिखित भाषा या साहित्यिक भाषा से जानी चाहिए. (पृ. 23) 
  • अप्रचलित, अनगढ़ विदेशी शब्दों के भार से हिंदी को बोझिल बनाना सर्वथा अनुचित है. (पृ. 26) 
  • अंग्रेजी पर आधारित सूचना प्रौद्योगिकी का यदि भारत भी हिस्सेदार होगा तो उस की राजनीति, उसकी व्यापारिक नीतियों, सुरक्षा नीतियों आदि तक नव उपनिवेशवादियों की पहुँच होगी, जिसके कारण भारत को अपनी उन नीतियों पर चलने में बड़ी कठिनाइयाँ होंगी. अतः सूचना प्रौद्योगिकी का विकास अपनी भाषा में करना अत्यंत आवश्यक है. (पृ. 44) 
  • आलोचना की भाषा में अंग्रेजी शब्दों की ठूंसठास की प्रवृत्ति यह संकेत देती है कि हिंदी एक लचर भाषा है, जिसे अंग्रेजी शब्दों की बैसाखी चाहिए. (पृ. 51) 
  • हिंदी और भारतीय भाषाओं के विद्वानों, लेखकों, कम्पयूटर विशेषज्ञों, तकनीकी विशेषज्ञों को संयुक्त रूप से अपनी भाषाओं के हित में काम करना होगा. हिंदी का हित भारतीय भाषाओं से अलग नहीं है. वैश्वीकरण और सूचनाक्रांति के दौर में हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाएँ भी पिछड़ रही हैं. अंग्रेजी का वर्चस्व सब को दबा रहा है इसलिए सब भारतीय भाषाओं के हितैषियों को एकजुट होकर अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती देनी चाहिए. (पृ. 59)