शनिवार, 21 मई 2011

वीरशलिंगम्‌ पंतुलु : आंध्र के भारतेंदु



आधुनिक तेलुगु साहित्य के ‘गद्‍य ब्रह्‍मा’ के नाम से विख्यात कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु (16 अप्रैल, 1848 - 27 मई, 1919) का जन्म राजमहेंद्रवरम्‌ (अब राजमंड्री) में हुआ। उनका बाल्यकाल विपन्नता में गुजरा जिससे उन्होंने विषम परिस्थितियों का सामना करना सीखा। इतना ही नहीं उन्होंने अपने अंदर की जिजीविषा को हमेशा जगाए रखा। 

वीरेशलिंगम्‌ के युग में अर्थात 19 वीं शती के अंतिम चरण में संपूर्ण देश में सांस्कृतिक जागरण की लहर दौड़ रही थी। सामंती ढाँचा टूट चुका था। देश में संवेदनशील मध्यवर्ग तैयार हो गया था जो व्याप्क राष्‍ट्रीय और सामाजिक हितों की दृष्‍टि से सोचने लगा था। इस वर्ग ने यह अनुभव किया कि सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में सुधार की आवश्‍कता है। जिस तरह हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु हरिश्‍चंद्र इस प्रगतिशील चेतना के प्रतिनिधि हैं उसी तरह कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु तेलुगु साहित्य के इतिहास में प्रगतिशील चेतना के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने समाज सुधार के कार्यों, भाषणों और साहित्य के माध्यम से जागरण का संदेश दिया।

सनातनपंथी ब्राह्‍मण परिवार में जन्मे वीरेशलिंगम्‌ जाति-पांति के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने जाति विरोध  आंदोलन का सूत्रपात किया। जिस तरह राजा राम मोहन राय ने ब्राह्‍म समाज की स्थापना की उसी तरह आंध्र प्रदेश में सर्वप्रथम कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु ने ब्राह्‍म समाज की स्थापना की। उन्होंने 1887 में राजमंड्री में ‘ब्राह्‍मो मंदिर’ की स्थापना की।

तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर वीरेशलिंगम्‌ ने जनता को  चिर निद्रा से जगाया, चेताया, स्त्री सशक्‍तीकरण को प्रोत्साहित किया, स्त्री शिक्षा पर बल दिया, बाल विवाह का खंडन किया, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और जमींदारी प्रथा का विरोध किया। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर दिखाई नहीं देता। उन्होंने 11 दिसंबर, 1881 को प्रथम विधवा पुनर्विवाह संपन्न करवाया जिसके कारण उनकी कीर्ति देश-विदेश में फैल गई। उनके सेवा कार्यों से प्रभावित होकर ईश्‍वरचंद्र विद्‍यासागर ने भी उन्हें बधाई दी।

वीरेशलिंगम्‌ का जीवन लक्ष्य आदर्श नहीं बल्कि आचरण है। इसीलिए उन्होंने विधवा आश्रमों की स्थापना की। स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए 1874 में राजमंड्री के समीप धवलेश्‍वरम्‌ में और 1884 में इन्निसपेटा (राजमंड्री) में बालिकाओं के लिए पाठशालाओं की स्थापना की। इतना ही नहीं, स्त्री को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए ‘विवेकवर्धनी’ (1874), ‘सतीहितबोधनी’, ‘सत्यवादी’, ‘चिंतामणि’ आदि पत्र-पत्रिकाएँ आरंभ कीं। वस्तुतः ‘विवेकवर्धनी’ पत्रिका का मुख्य उद्‍देश्‍य ही था - समाज में व्याप्‍त राजनैतिक विसंगतियों, भ्रष्‍टाचार, घूसखोरी, वेश्‍या वृत्ति, जात-पांत, छुआछूत, बाल विवाह, सांप्रदायिकता और सती प्रथा का उन्मूलन।

वीरेशलिंगम्‌ की अपार समाज सेवा से प्रभावित होकर राजगोपालाचारी (राजाजी) ने यह कहा कि "वीरेशलिंगम्‌ अवतरिंचि आंध्र जातिनि चैतन्यवंतम्‌ चेयकपोते आंध्र देशम्‌, आंध्र प्रजलु ईनाडुन्ना स्थितिलो उंडेवारु कारु। क्रियाशीलता, महासाहसम्‌, दूरदृष्‍टिगल जातीय महनीयुल्लो आयना ओकडु। असत्यान्नि धैर्यंगा एदुरुकोनडम्‌लो अभ्यूदय मार्गम्‌लो वीराधिवीरुलै साहसन्नि प्रदर्शिंचाडु।" (वीरेशलिंगम्‌ ने आंध्र की जनता को यदि चेताया नहीं होता तो शायद वह इस स्थिति में नहीं रहती जिस स्थिति में वह आज है। वीरेशलिंगम्‌ क्रियाशीलता, साहस और दूरदृष्‍टि से युक्‍त महनीयों में से एक हैं। उन्होंने असत्य का खुलकर विरोध किया और प्रगतिशील मार्ग पार चल पड़े।)। वेंकट रघुपति के शब्दों में यदि कहें तो "वीरेशलिंगम्‌ बहुमेधावुला समैक्‍यमूर्ति।" (वीरेशलिंगम्‌ अनेक विद्वानों का समुच्चय है।)। मादेव गोविंद रानडे के अनुसार तो ‘वीरेशलिंगम्‌ दक्षिण के ईश्‍वरचंद्र विद्‍यासागर हैं।’

वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु अपने परिवेश से जुड़े साहित्यकार के रूप में समादृत हैं। समाज सुधार के लिए उन्होंने साहित्य को साधन के रूप में अपनाया। उनकी मान्यता है कि "केवलम्‌ पुस्ताकुलु व्रासि प्रचुरिंचडम्‌लो प्रयोजनम्‌ लेदु। मनम्‌ नम्मिना सत्यान्नि लोकानिकि चाटि कार्यरूपमलो चूपगल धैर्यसाहसान्‍नी प्रदर्शिंचडम्‌ चाला अवसरम्‌।" (केवल किताबें लिखकर प्रकाशित करने से कोई लाभ नहीं होगा। जिस सत्य को हम मानते हैं उसे धैर्य और साहस के साथ आचरण में रखना अनिवार्य है।)।

वीरेशलिंगम्‌ ने अपनी साहित्यिक यात्रा प्रबंध काव्यों से शुरू की। उनकी प्रमुख प्रारंभिक प्रबंध रचनाएँ हैं - मार्कंडेय शतकम्‌ (1868-69), गोपाल शतकम्‌ (1868-69), रसिक जन मनोरंजनम्‌ (1879-71), शुद्धांध्र निर्‌‍ओष्ठ्य निर्वचन नैषधम्‌ (1871), शुद्धांध्र उत्तर रामायण (1872) आदि उल्लेखनीय हैं। ‘शुद्धांध्र निर्‌‍ओष्ठ्य निर्वचन नैषधम्‌’ में ओष्‍ठ्‌य ध्वनियों (प,फ,ब,भ,म) का प्रयोग नहीं किया गया है। 1895 में उन्होंने ‘सरस्वती नारद विलापमु’ (सरस्वती नारद संवाद) में वाक्‌देवी सरस्वती और देव ऋषि नारद के बीच काल्पनिक संवाद का सृजन लघुकाव्य के रूप में किया। इसमें उन्होंने सरस्वती और नारद के बीच संवादों के माध्यम से वाग्विदग्धता, कृत्रिम अलंकार, झूठे आडंबर आदि पर विचार विमर्श किया। इस काव्य को पढ़ने से स्पेंसर कृत ‘टियर्स आफ दी म्यूसस’ की याद दिलाने वाला माना जाता है। उन्होंने शृंगार परक काव्यों का भी सृजन किया है।

वीरेशलिंगम्‌ आशु कविता की ओर भी उन्मुख हुए। तेलुगु साहित्य में आशु कविता अवधान विधा के रूप में उपलब्ध है। यह विधा तेलुगु साहित्य की अनुपम और विलक्षण देन है। इस प्रक्रिया में कवि एक ही समय में अनेक अंशों/प्रश्‍नों का समाधान छंदोबद्ध काव्य के रूप में करता है। यह एक तरह से बौद्धिक व्यायाम है। इस विधा के अनेक प्रकार हैं -  अष्‍टावधान, शतावधान, सहस्रावधान, द्विसहस्रावधान, पंच सहस्रावधान, नवरस नवावधान, अलंकार अष्‍टावधान और समस्या पूर्ति आदि।

चेन्नई से प्रकाशित पत्रिका ‘दि पब्लिक ओपीनियन’ (मासिक) में वीरेशलिंगम्‌ कृत ‘उत्तर रामायण’ की समीक्षा प्रकाशित हुई जिसमें उनके वाक्‌ वैचित्र्य, ग्रांथिक तेलुगु पर अधिकार, कवि प्रतिभा, मधुर शैली और औदात्य भाव की खुलकार प्रशंसा की गई। द्रष्टव्य है कि वीरेशलिंगम्‌ ने कभी भी अपने से पहले की रचनाओं को लेकर असंतोष व्यक्‍त नहीं किया, पर ऐसा लगता है कि उनका कवि हृदय तत्कालीन परिस्थितियों से उद्वेलित और असंतुष्‍ट है। इसीलिए वे छंदोबद्ध कविता को त्यागकर गद्‍य की ओर मुड़े और व्यावहारिक शैली को अपनाकर तत्कालीन परिस्थितियों को अपने साहित्य में सशक्‍त रूप में उकेरा।

वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु संस्कृत, तेलुगु और अंग्रेजी के विद्वान थे। उन्होंने यह अनुभव किया कि संस्कृतनिष्‍ठ और छंदोबद्ध रचनाएँ आम जनता की समझ से परे हैं। जिस तरह भारतेंदु हरिश्‍चंद्र और ईश्‍वरचंद्र विद्‍यासागर ने व्यावहारिक भाषा प्रयोग पर बल दिया था, ठीक उसी तरह वीरेशलिम्गम्‌ पंतुलु ने भी व्यावहारिक भाषा प्रयोग पर बल दिया। इतना ही नहीं, वे आम बोलचाल के प्रचलित शब्दों के साथ साथ नई शब्दावली की खोज की ओर भी प्रवृत्त हुए। उनकी मान्यता है कि "भाषा योक्का मुख्य प्रयोजनम्‌ भाव व्यक्‍तीकरणम्‌। रचनलो भाषा एंता सरलंगा, एंता स्पष्‍टंगा उंटे भाव व्यक्‍तीकरण अंते सूटिगा वुंटुंदि।" (भाषा का मुख्य प्रयोजन भाव की अभिव्यक्‍ति है। अतः सरल और स्पष्‍ट भाषा प्रयोग से भावाभिव्यक्‍ति भी स्पष्‍ट होगी।)।

वीरेशलिंगम का रचना संसार व्‍यापक है। प्रबंध काव्यों के अतिरिक्‍त उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में नीति चंद्रिका (पंचतंत्र का अनुवाद, 1874), नीति दीपिका (100 कविताओं का संकलन; 1875), कामडी आफ एरर्स (शेक्सपीयर के नाटक का पद्‍यानुवाद, 1875), अभाग्योपाख्यानम्‌ (अभाग्य का आख्यान, व्यंग्य रचना, 1876), पदार्थ विवेक शास्त्रमु (रसायन शास्त्र, प्रश्‍नोत्तर शैली में, 1877-78), ब्रह्‍म विवाह (तेलुगु साहित्य का प्रथम सामाजिक नाटक, 1878), चमत्कार रत्‍नावली (कामडी आफ एरर्स का गद्‍यानुवाद,1880), वेनीस वर्तक चरित्र्मु, (द मर्चेंट आफ वेनीस का अनुवाद, असंपूर्ण, 1880), शाकुंतलम्‌ (अभिज्ञान शाकुंतल का नाटकानुवाद, 1883), राजशेखर चरित्रमु ( राजशेखर का इतिहास, तेलुगु साहित्य का प्रथम उपन्यास, 1880), चंद्रमति चरित्र (चंद्रमति का इतिहास, स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से लिखी गई कहानी, 1884), मालविकाग्नि मित्रमु (मालविकाग्नि मित्र का नाटकानुवाद, 1885), सत्य हरिश्‍चंद्र (पौराणिक नाटक, 1886), शरीर शास्त्रमु (शरीर विज्ञान, संग्रहीत, 1884), हास्य संजीवनी (1888),  सत्यराजा पूर्व देशी यात्रलु (सत्यराज के पूर्वी देशी यात्राएँ, गुलिवर्स ट्रावलस् का अनुवाद, 1893-94), ज्योतिष शास्त्र संग्रह (1895), सरस्वती नारद विलापमु (सरस्वती नारद संवाद, 1895), राजा राममोहन राय चरित्रमु (राजा राममोहन राय का इतिहास,1896), स्वीय चरित्रमु (आत्मकथा, 1913)  आदि कृतियाँ शामिल हैं।

आधुनिक तेलुगु गद्‍य साहित्य के प्रवर्तक वीरेशलिंगम्‌ ने प्रथम उपन्यासकार, प्रथम नाटककार और आधुनिक पत्रकारिता के प्रवर्तक के रूप मे ख्याति अर्जित की है। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रथम उपन्‍यास और उपन्यासकार के बारे में काफी मतभेद है। उसी तरह तेलुगु साहित्य के इतिहास में भी प्रथम उपन्यास और उपन्यासकार के बारे में मतभेद है। कुछ विद्वान नरहरि गोपाल कृष्‍णम्‌ शेट्टी कृत ‘श्री रंगराज चरित्रमु’ (श्री रंगराज का इतिहास, 1872) को तेलुगु का प्रथम उपन्यास मानते हैं, लेकिन लेखक ने अपनी रचना के संबंध में स्वयं कहा है कि "ई रचना हिंदुवुला आचारमुलनु तेलुपु नवीन प्रबंधम्‌। ई रचना कुला मतालकु अतीतंगायुंडि प्रेमकु प्राधान्यतनु इच्चिंदी।" (यह रचना वस्तुतः हिंदुओं के रीति रिवाजों को व्यक्‍त करनेवाली नवीन प्रबंध काव्य है तथा जाति-पांति के विरुद्ध प्रेम भावना को प्रधानता देनेवाली है।)। इसका दूसरा नाम है ‘सोनाबाई परिणयमु’ (सोनाबाई का परिणय)। इसके विपरीत कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु कृत ‘राजशेखर चरित्र’ (राजशेखर का इतिहास, 1880) में आधुनिक उपन्यास के तत्व विद्‍यमान हैं। अतः इस उपन्यास को ही तेलुगु के प्रथम उपन्यास माना गया है। इसके माध्यम से लेखक ने तत्कालीन हिंदुओं की जीवन शैली, उनकी संस्कृति, रीति रिवाज, अंधविश्‍वास, स्त्रियों की मनोदशा आदि को उकेरा है। यह उपन्यास अंग्रेजी में ‘फार्च्यून्स आफ दी व्हील’ के नाम से अनूदित है।

तेलुगु का प्रथम नाटक किसे माना जाए, इस विषय में भी काफी मतभेद हैं। कुछ विद्वान कोराडा रामचंद्र शास्त्री कृत ‘मंजरी मधुकरीयम्‌’ (1861) को तेलुगु साहित्य के प्रथम नाटक मानते हैं, लेकिन इसमें आधुनिक नाटक के तत्व नहीं हैं अतः वीरेशलिंगम्‌ कृत ‘ब्रह्‍म विवाहमु’ (ब्रह्‍म विवाह, 1876) को यह ख्याति प्राप्‍त है। यह एक व्यंग्यपूर्ण सामाजिक नाटक है। तत्कालीन समाज में यह प्रथा प्रचलित थी कि किसी भी विधि विधान या अनुष्‍ठान को संपन्न करने के लिए पत्‍नी के सहयोग की आवश्‍यकता होती है। इस नाटक का मुख्य पात्र पेद्‍दैया (बड़े साहब) विधुर है। तीसरी पत्‍नी के देहांत के पश्‍चात्‌ वह तीन साल की मासूम बच्ची से विवाह करता है। माँ-बाप भी धन के लालच में अपनी बच्ची का सौदा करते हैं। नाटककार ने इन सब पर करारा प्रहार किया है।

आधुनि तेलुगु साहित्य के गद्‍य ब्रह्‍मा, प्रथम उपन्यासकार, प्रथम नाटककार, प्रथम आत्मकथाकार, व्यावहारिक भाषा आंदोलन के प्रवर्तक कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु के बारे में चिलकमर्ति लक्ष्मी नरसिंहम्‌ ने निम्नलिखित उद्‍गार व्यक्‍त किए थे जो आज भी उनकी समाधी पर चिह्‍नित है - 
"तना देहमु, तना गेहमु,
तना कालमु तना धनम्‌भु तना विद्‍या
जगज्जनुलके विनियोगिंचिना
घनुडी वीरेशलिंगकवि जनुलारा!"
(अपना तन, मन, धन, निवास, समय और विद्‍या सब कुछ जनता के हित के लिए निछावर करनेवाले महापुरुष हैं वीरेशलिंगम्‌।)।


अतिरिक्त जानकारी के लिए देखें -




5 टिप्‍पणियां:

mahendra srivastava ने कहा…

आपके ब्लाग पर जब भी आता हूं, काफी समय देना मजबूरी हो जाती है। जानकारी तो मिलती ही है, सोचता हूं कैसे इसे संभाल कर रखूं। बहुत बहुत बधाई।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

वीरेशलिंगम पंतुलु पर अच्छी जानकारी। इसी प्रकार तेलुगु के साहित्यकारों का परिचय कराते रहें ताकि हिंदी भाषियों को इस भाषा और साहित्यकारों का परिचय मिलता रहे। यदि सम्भव हो तो फ़ांट थोडा बड़ा रखें ताकि पढ़ने में सुविधा हो॥

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

@ महेंद्र जी,
बहुत बहुत धन्यवाद.

ऋषभ Rishabha ने कहा…

'स्रवंति' के संपादकीय के बहाने तेलुगु साहित्यकारों पर आपके लेख हिंदी पाठकों के बड़े काम के हैं. आप जैसे तेलुगु और हिंदी जानने वाले कलमकारों से हिंदीजगत इस प्रकार के योगदान की अपेक्षा रखता भी है.असल में तो यह राष्ट्रीय महत्त्व का काम है.

बधाई!

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

वीरशलिंगम्‌ पंतुलु जी के बारे में अमूल्य जानकारी देने के लिए आभार...

विगत दिनों मैं कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति एवं केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय,भारत सरकार के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक कार्यक्रम में बेंगलुरु गई थी। वहां हिन्दी के प्रति लगाव और समर्पण देख कर मन गदगद हो गया।