मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

भारतीय साहित्य की अवधारणा

[प्रो. ऋषभ देव शर्मा के कक्षा-व्याख्यान पर आधारित]

मनुष्य विविध देशकाल में भाषा, साहित्य और संस्कृति का सृजन और विकास करता आया है जिसमें अनेक प्रकार की विविधताएँ, भिन्नताएँ और समानताएँ पाईं जाती हैं. इन भिन्नताओं और समानताओं का अध्ययन क्रमशः व्यतिरेकी अध्ययन और तुलनात्मक साहित्य की दिशा में प्रेरित करता है. मैथ्यू आर्नल्ड ने इसी आधार पर तुलनात्मक विश्व साहित्य की संकल्पना प्रस्तुत की थी. उनके अनुसार आलोचक को विश्व साहित्य में जो कुछ भी श्रेष्ठतम और महनीय है उसका अध्ययन, मनन और प्रचार करना चाहिए ताकि प्राणवान और सत्य विचारों की धारा प्रवाहित की जा सके. ऐसा करने से विभिन्न भाषाओं के साहित्य में विद्यमान समान मूल्यों को खोजा जा सकता है.

भारतीय साहित्य की पहचान : एकता और आत्मज्ञान : 

विश्व साहित्य की भाँति ही तुलनात्मक अध्ययन का एक बहुत व्यापक क्षेत्र भारतीय साहित्य है. वस्तुतः साहित्य मनुष्य की आतंरिक अनुभूतियों और संवेदनाओं का अभिव्यक्त रूप होता है. यह माना जाता है कि मानव की आतंरिक भावनाएँ समान होती हैं. उसकी महसूस करने तथा भाव प्रकट करने की शक्ति भी सार्वभौमिक है. शोक, हर्ष, घृणा, क्रोध, प्रेम और वात्सल्य जैसे अनेक भाव विश्व मानव में समान पाए जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप साहित्य का मूलभूत ढाँचा सभी भाषाओं में एक-सा ही दिखाई देता है. यदि भारत की बात की जाए तो यह ध्यान में रखना होगा कि यह देश बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक देश है. अर्थात भारत की अलग-अलग भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया है या लिखा जा रहा है उसमें थोड़ी बहुत भिन्नता के साथ अधिकतर एकता या समानता की स्थिति दिखाई पड़ती है. विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य की यह एकता या समानता ही भारतीय साहित्य की अवधारणा का केंद्रबिंदु है. इसी के साथ पांडेय शशि भूषण शीतांशु का यह मत भी जोड़ लें तो बात और भी परिपूर्ण  हो जाएगी कि "भारतीय साहित्य का अर्थ हुआ आत्मज्ञान को सृजित करने, प्रस्तुत करने और प्रदान करने वाला साहित्य."

भारतीय साहित्य का विस्तार/ व्यापकता : 

भारतीय साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत और व्यापक है. प्रो.दिलीप सिंह के अनुसार, “भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जिन 22 भाषाओं और बोलियों का उल्लेख है, उनका साहित्य अत्यंत संवृद्ध है और यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो इन सभी भाषाओं में साहित्यिक धाराएं लगभग समानांतर रूप में प्रवाहित मिलती हैं. इसके साथ ही इन सभी भाषाओं का राष्ट्रीय चेतना और उसमें आने वाले परिवर्तनों के साथ एक-सा संबंध रहा है तथा ये सभी राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे परिवर्तनों से एक-सा प्रभावित रही हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की सभी भाषाएँ और उनका साहित्य भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ प्रतीत होता है इसीलिए भारत की इन भिन्न भाषाओं में लिखे गए साहित्य को भारतीय साहित्य कहा गया है.” 

यहाँ यह जानना आवश्यक है कि साहित्यिक धारा, विचारधाराएँ, प्रवृत्तियाँ और सामाजिक सरोकार के धरातल पर भारतीय साहित्य में जो समानताएँ मिलती हैं उन्हें ‘भारतीयता’ (Indianness) के तत्व या घटक कहा जा सकता है. 

भारतीय साहित्य और सामासिक संस्कृति : 

भारतीय साहित्य की यह अंतर्निहित भारतीयता भारत की संस्कृति का प्रतिबिंब है. भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता में विद्यमान एकता को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, सर्वेपल्ली राधाकृष्णन और डॉ.राजेंद्र प्रसाद आदि ने बड़ी सूक्ष्मता से पहचाना है. ऊपर से हमें भारत के अलग-अलग प्रांतों और समुदायों की संस्कृति में कुछ भेद दिखाई देते हैं लेकिन यदि गहराई से देखा जाए तो संस्कृति के मूलाधार भारत के सभी समुदायों में समानता लिए हुए दिखाई देते हैं. यदि रीति-रिवाज, पूजा-पाठ, मेले-त्यौहार, शिष्टाचार, खानपान को संस्कृति का सामान्य आधार माना जाए तो भारतीय साहित्य की तरह ही भारतीय संस्कृति की भी अवधारणा स्पष्ट हो सकती है. मुस्लिम शासकों तथा यूरोपियन शासकों के आगमन से भारतीय संस्कृति को कुछ नए आयाम भी मिले. ऐसी स्थिति में भारतीय संस्कृति का स्वरूप केवल हिंदू संस्कृति तक सीमित न रहकर विस्तृत हुआ. ये बाहरी संस्कृतियाँ क्रमशः भारत की मूल संस्कृति में घुलने मिलने लगीं और मिली-जुली संस्कृति का अनूठा मिश्रण तैयार हुआ जिसका प्रभाव सभी भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य पर पड़ा. 

यह स्पष्ट  है कि भाषा और साहित्य दोनों के भीतर उस भाषा समाज के सांस्कृतिक तत्व गुँथे रहते हैं. इसलिए तुलनात्मक भारतीय साहित्य का एक आयाम इन सांस्कृतिक तत्वों की समानता और विषमता के विवेचन का भी हो सकता है. जैसा कि राबर्ट फॉर्स्ट ने कहा था कि मनुष्य के स्वभाव में चिंतन की प्रवृत्ति के साथ साथ तुलना की प्रवृत्ति भी जैविक स्तर पर ही निहित होती है इसलिए साहित्य के क्षेत्र में भी तुलना स्वाभाविक है. तुलनात्मक भारतीय साहित्य इसी प्रवृत्ति का प्रतिफलन है. 

भारतीय साहित्य : परंपरा का महत्व : 

भारतीय साहित्य के स्वरूप निर्धारण में विभिन्न भाषाओं के साहित्य की परंपरा के अध्ययन का बड़ा महत्व है. उदाहरण के लिए जब हम सूरदास के काव्य का अध्ययन करते हैं तो पीछे जाकर उस परंपरा को भी देखते हैं जो मध्यकाल में एक व्यापक प्रवृत्ति के रूप में पूरे भारत को उसकी सभी भाषाओं को प्रभावित किए हुए थी. इसी प्रकार मध्यकालीन रामकथा की परंपरा को समझने के लिए वाल्मीकि की रामायण’, कालिदास के ‘रघुवंश’ और भवभूति के ‘उत्तररामचरित’ को देखना जरूरी है. यही नहीं आधुनिक काल में भी अनेक साहित्यिक कृतियाँ अपनी मूल प्रेरणा प्राचीन वाङ्माय से प्राप्त करती हैं. यही कारण है कि भारतीय साहित्य के आकर ग्रंथों के रूप में ‘रामायण’, ‘महाभारत’ और ‘कथा सरित्सागर’ का समान रूप से उल्लेख किया जाता है. परंपरा के अध्ययन से ही हम उन कारणों और परिणामों की सटीक व्याख्या कर पाते हैं जो विभिन्न साहित्यों में पाई जाने वाली एक समान प्रवृत्तियों से जुड़े हैं. हम देखते हैं कि नवजागरण काल में सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में कमोबेश एक जैसी आधुनिक चेतना का प्रसार हुआ. यही वह काल था जब भारत ने सदियों पुराणी सामाजिक और राजनैतिक गुलामी के कारणों को पहचानकर उनसे मुक्त होना शुरू किया. बंगला में बंकिमचंद्र चटर्जी और रवींद्र नाथ टैगोर, हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र, तमिल में सुब्रह्मण्य भारती और तेलुगु में गुरजाडा अप्पाराव जैसे रचनाकारों की एक समान का चेतना का आधार यह नवजागरण था. इसी प्रकार जिस काल में हिंदी साहित्य छायावादी चेतना से अनुप्राणित था उसी काल में तेलुगु की भाववादी कविता भी वैसी ही चेतना से स्फूर्त थी. हिंदी में प्रगतिवाद और तेलुगु में अभ्युदय का आगमन एक साथ हुआ – अन्य सभी भारतीय भाषाओं में भी ऐसा ही हुआ. भारतीय साहित्य का अध्ययन करते हुए हम ऐसे ही समान प्रेरणा बिंदुओं, सरोकारों और प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हैं. 

कुलमिलाकर जैसा कि सर्वेपल्ली राधाकृष्णन ने आर्केस्ट्रा का दृष्टांत देकर समझाया था कि जिस प्रकार भिन्न-भिन्न वाद्य लेकर वाद्यवृंद मंच पर आता है तो उसमें भिन्नता दिखाई देती है लेकिन जब सभी वादक अपने अपने वाद्य पर एक ही राग छेड़ते हैं तो भिन्नता का यह भाव मिट जाता है और एकता स्थापित हो जाती है. भारतीय साहित्य वस्तुतः साहित्य के माध्यम से इसी सामासिक संस्कृति अथवा भारतीयता की खोज करता है.

संदर्भ ग्रंथ - 
१. शोध प्रविधि- डॉ. दिलीप सिंह एवं डॉ. ऋषभ देव शर्मा; 
२.तुलनात्मक साहित्य की भूमिका -डॉ.इंद्र नाथ चौधुरी . 
३. आलोचना के सिद्धांत - डॉ.शिवदान सिंह चौहान.  
४. भारतीय साहित्य : अवधारणा, समन्वय और सादृश्यता - जगदीश यादव.

3 टिप्‍पणियां:

daya kumari ने कहा…

"bhartiy sahity ki avdharna" ki sundar abhivyakti ki gyi hai!

daya kumari ने कहा…

"bhartiy sahity ki avdharna" ki
sundar abhivyakti kigyi hai!

daya kumari ने कहा…

"bhartiy sahity ki avdharna" ki
sundar abhivyakti kigyi hai!