मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

व्यतिरेकी भाषाविज्ञान के आधार एवं उपयोगिता

  • व्यतिरेकी विश्लेषण अंग्रेज़ी के ‘कॉन्ट्रास्टिव एनालिसिस’ शब्द का हिंदी पर्याय है. 
  • वूर्फ़ नामक विद्वान ने भाषाओं की भिन्नताओं पर प्रकाश डालने वाले तुलनात्मक अध्ययन के लिए ‘व्यतिरीकी विश्लेषण’ (कॉन्ट्रास्टिव एनालिसिस) शब्द का प्रयोग किया है. 
  • व्यतिरेकी भाषाविज्ञान अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की शाखा है.
  • प्रत्येक भाषा किसी न किसी अन्य भाषा से जहाँ कुछ बिंदुओं पर समानता रखती है वहीं उनमें कुछ संरचनात्मक असमानताएँ भी अवश्य प्राप्त होती हैं। 
  • दो भाषाओं की संरचनात्मक व्यवस्था के मध्य प्राप्त असमान बिंदुओं को उद्घाटित करने के लिए व्यतिरेकी विश्लेषण का प्रयोग किया जाता है। 
  • व्यतिरेकी भाषाविज्ञान भाषा शिक्षण की व्यावहारिक पद्धति है. 
  • इसमें किसी भाषा युग्म के समानताओं और व्यतिरेकों के बारे में विश्लेषण करके भाषा को सुगम बनाने पर जोर दिया जाता है. 
  • इसे  ‘कॉन्ट्रास्टिव लिंग्विस्टिक्स कहते हैं और कभी कभी डिफरेंशियल लिंग्विस्टिक्स भी कहा जाता है. 
  • व्यतिरेकी भाषाविज्ञान का उदय द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सैनिकों को उन देशों की भाषाएँ सिखाने के उद्देश्य से हुआ जहाँ वे लड़ने जा रहे थे. 
  • अन्य भाषा शिक्षण की बढ़ती माँग ने ही व्यतिरेकी भाषाविज्ञान को जन्म दिया है. 
  • इसको एक व्यवस्थित शाखा के रूप में विकसित कराने का श्रेय अमेरिकी भाषाविज्ञानियों – चार्ल्स सी. फ्रीज और राबर्ट लेडो को जाता है. 
  • 1957 में प्रकाशित राबर्ट लेडो (31 मई, 1915 - 11 दिसंबर, 1995) की पुस्तक ‘लिंग्विस्टिक्स एक्रास कल्चर्स’ व्यतिरेकी भाषाविज्ञान का आकर ग्रंथ माना जाता है. 
  • व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से पाठ्यक्रम के निर्माता तथा शिक्षक अपने कार्यों को योजनाबद्ध कर सकते हैं और सुनिश्चित पाठ्य सामग्री तैयार कर सकते हैं, पाठ्य बिंदुओं का चयन कर सकते है, शिक्षार्थी की कठिनाईयों को जान सकते हैं, त्रुटियों को दूर कर सकते हैं. 
व्यतिरेकी विश्लेषण : परिभाषाएँ 

Ø किन्हीं दो चीज़ों की तुलना करते हुए उनमें विषमता का विश्लेषण करना व्यतिरेकी विश्लेषण कहलाता है. 

Ø दोनों भाषाओं की व्यवस्थित तुलना के द्वारा समान, असमान और अर्धसमान तत्वों के कारण भाषा शिक्षण में व्याघात की स्थिति पैदा होती है. अतः इस व्याघात की स्थिति को दूर करने के लिए व्यतिरेकी विश्लेषण की सहायता ली जाती है. (difficulties in learning a language can be predicted on the basis of a systematic comparison of the system of the learner’s first language (its grammar, phonology and lexicon) with the system of a second language.) - राबर्ट लेडो, चार्ल्स सी. फ्रीज 

Ø Contrastive Analysis is a linguistic enterprise aimed at producing inverted (i.e. contrastive, not comparative) two – valued typologies (a C.A. is always concerned with a pair of languages), and founded on the assumption that languages can be compared. – Carl James 

Ø In the study of foreign language learning, the identification of points of structural similarity and difference between two languages is defined as Contrastive Analysis. – Crystal 

Ø Contrastive Analysis is an inductive investigative approach based on the distinctive elements in the language. 

Ø Contrastive Analysis is a device or predicting points of difficulty and some of the errors that learners will make. – Otler 

Ø Contrastive Analysis is a branch of applied linguistics devoted to the investigation of the ‘gravitational pull of mother tongue’ as a factor in second language learning. – N.Krishnaswamy 

Ø Contrastive Analysis is a method of analyzing the structure of any two languages with a view to estimate the differential aspects of their systems, irrespective of their genetic affinity of level of development. – Dr.V.Geetha Kumari  

Ø ध्वनि, लिपि, व्याकरण, शब्द, अर्थ, वाक्य और संस्कृति जैसे विभिन्न स्तरों पर दो भाषाओं की संरचनाओं की परस्पर तुलना कर उनमें समान और असमान तत्वों का विश्लेषण करना व्यतिरेकी विश्लेषण कहलाता है. – प्रो.सूरजभान सिंह 

Ø दो या दो से अधिक भाषाओं के सभी स्तरों पर तुलनात्मक अध्ययन द्वारा समानताओं और असमानताओं के निकालने को व्यतिरेकी विश्लेषण कहते हैं. – डॉ.भोलानाथ तिवारी 

Ø भाषा विश्लेषण की यह तकनीक, जिसके द्वारा भाषाओं में व्यतिरेक इंगित किया जाता है, व्यतिरेकी विश्लेषण कहलाती है. – डॉ.ललित मोहन बहुगुणा 

Ø भाषा विश्लेषण में जहाँ दो भाषाओं में व्यतिरेक/ असमानताएँ सूचित की जाती हैं, यह व्यतिरेकी विश्लेषण कहलाता है. – डॉ.शंकर बुंदेले 

व्यतिरेकी विश्लेषण : उपयोगिता 

  • अन्य भाषा शिक्षण के लिए पाठ्य सामग्री निर्माण करना. 
  • स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा में निहित समानताओं और असमानताओं की तुलना करके पाठ्य बिंदुओं का चयन करना. 
  • शिक्षार्थी की शिक्षण समस्याओं को समझना. 
  • शिक्षण विधियों का आविष्कार करना. 
  • त्रुटियों का निदान करना. 

व्यतिरेकी विश्लेषण : उद्देश्य 

व्यतिरेकी विश्लेषण के मुख्य उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ.सूरजभान सिंह ने अपनी पुस्तक ‘अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवाद व्याकरण’ में निम्नलिखित तथ्यों को स्पष्ट किया है - 

  • दो भाषाओं के बीच असमान और अर्धसमान तत्वों का पता लगाना, जिससे भाषा सीखने या अनुवाद करने में उन स्थलों पर ख़ास ध्यान दिया जा सकता है जहाँ असमान संरचनाओं के कारण त्रुटि या मातृभाषा व्याघात की संभावना अधिक होती है. 
  • व्यतिरेकी विश्लेषण के परिणामों से अनुवादक स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा के उन संवेदनशील स्थलों का पहले से अनुमान कर सकता है जहाँ असमान संरचनाओं तथा नियमों के कारण अनुवादक मातृभाषा व्याघात या अन्य कारणों से गलती कर सकता है. इस प्रकार वह लक्ष्य भाषा की संरचना और शैली की स्वाभाविक प्रकृति को पहचान कर कृत्रिम और असहज अनुवाद से बच सकता है. 
  • व्यतिरेकी विश्लेषण के फलस्वरूप उसे एक से अधिक समानार्थी अभिव्यक्तियाँ उपलब्ध होती है, जिससे वह संदर्भ के अनुसार उपयुक्त विकल्प का चयन कर सकता है और अनुवाद में मूल पाठ की सूक्ष्म अर्थ छटाओं को सुरक्षित रख सकता है. 
  • एम.जी.चतुर्वेदी के अनुसार मातृभाषा अथवा लक्ष्य भाषा व्याघात के विश्लेषण के लिए, दो भाषाओं की तथा उनकी संरचनाओं के सभी स्तरों पर तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए, दोनों भाषाओं के समान, अर्धसमान तथा असमान प्रयोगों को पहचानने के लिए, पाठ्यक्रम निर्माण के लिए, त्रुटि विश्लेषण के लिए और लक्ष्य भाषा शिक्षण के लिए व्यतिरेकी विश्लेषण का प्रयोग होता है. 

व्यतिरेकी भाषाविज्ञान की मूल स्थापनाएँ 

  • अन्य भाषा शिक्षण में भाषा सीखने वाले की स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा में निहित व्यतिरेकों की तुलना. 
  • अन्य भाषा शिक्षण के लिए सबसे अधिक प्रभावी सामग्री वही है जो भाषा सीखने वाले की स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा का व्यतिरेकी विश्लेषण समान रूप से वैज्ञानिक पद्धति से करने में सक्षम हो तथा सही पाठ्य बिंदुओं का चयन कर सके. 
  • जो शिक्षक शिक्षार्थी की स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा की वैज्ञानिक पद्धति से तुलना करने की क्षमता रखता है, वह शिक्षार्थी की शिक्षण समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है और समस्याओं का समाधान कर सकता है. 

वस्तुतः विविध प्रमुख भाषाओं के संरचनाओं का व्यतिरेकी विश्लेषण किया जाता है. यह विश्लेषण अनेक स्तरों पर कर सकते हैं. जैसे – दोनों भाषाओं की ध्वनि व्यवस्था, व्याकरण, शब्दावली एवं लेखन व्यवस्थाओं की तुलना प्रस्तुत करना. इस तुलना का मुख्य उद्देश्य दोनों भाषाओं में निहित ऐसी समानताओं और असमानताओं पर प्रकाश डालना, दोनों भाषाओं को सीखने वालों में पैदा होने वाली मनोवैज्ञानिक उलझनों को दूर करना. 

व्यतिरेकी विश्लेषण : अनुप्रयोग का क्षेत्र 

व्यतिरेकी विश्लेषण का प्रयोग मुख्यतः भाषा शिक्षण और अनुवाद में होता है. वस्तुतः व्यतिरेकी विश्लेषण का जन्म भाषा शिक्षण के संदर्भ में हुआ. 

(1) भाषा शिक्षण 

डॉ.भोलानाथ तिवारी का कथन है कि “प्रायः यह समझा जाता है कि व्यतिरेकी विश्लेषण से अन्य भाषा शिक्षण में ही सहायता मिलती है, किंतु मातृभाषा शिक्षण में भी यह उपयोगी है क्योंकि कक्षा में भाषा का मानक स्वरूप ही सिखाया जाता है. इस संदर्भ में ध्यान देना चाहिए कि जिन उपभाषाओं/ बोलियों के क्षेत्रों से विद्यार्थी आ रहे हैं और उनमें क्या समानताएँ/ असमानताएँ हैं. उसे भाषा के शुद्ध प्रयोगों से परिचित कराना है, स्वीकृत वाक्य रचना का प्रयोग करना सिखाना है. अतः व्यतिरेकी विश्लेषण अन्य भाषा शिक्षण में ही नहीं, मातृभाषा शिक्षण में भी उपयोगी सिद्ध होता है. 

(2) अनुवाद 

व्यतिरेकी विश्लेषण और अनुवाद दोनों का ही संबंध दो भाषाओं से होता है – एक स्रोत भाषा और दूसरी लक्ष्य भाषा. अनुवाद में स्रोत भाषा पाठ को लक्ष्य भाषा में रूपांतरित किया जाता है जबकि व्यतिरेकी विश्लेषण में स्रोत भाषा की संरचना का लक्ष्य भाषा की संरचना के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है. इसके बाद दोनों भाषाओं की व्यतिरेकों/ भिन्नताओं को स्पष्ट किया जाता है. स्रोत भाषा के किसी कथन के लिए लक्ष्य भाषा में जब एकाधिक समानार्थक विकल्प सामने आते हैं, तब अनुवादक उपयुक्तता के आधार पर किसी एक विकल्प का चयन करता है. 

राबर्ट लेडो द्वारा प्रतिपादित छह मानदंड  

विकल्प चयन की  प्रक्रिया में व्यतिरेकी विश्लेषण का ही आश्रय लिया जाता है. अतः व्यतिरेकी विश्लेषण को अनुवाद का साधन माना जाता है. भाषाविद् राबर्ट लेडो द्वारा प्रतिपादित छह मानदंड निम्नलिखित हैं – 

(1) रूप एवं अर्थ में समानता 

(2) रूपगत समानता और अर्थगत भिन्नता 

(3) रूपगत भिन्नता एंव अर्थगत समानता 

(4) भिन्न रूप एंव भिन्न अर्थ वाले शब्द 

(5) समान रूप और भिन्न रूपरचना एंव सहप्रयोग वाले शब्द 

(6) समान कोशीय एवं भिन्न लक्ष्यार्थ वाले शब्द 


Ø रूप एवं अर्थ में समानता 

इस वर्ग में उन शब्दों को रखा जाता है जो स्रोत भाषा एवं लक्ष्य भाषा में ध्वनि अथवा लिपि तथा अर्थ के स्तर पर समान होते हैं. इस वर्ग में आने वाले शब्द समान अथवा भिन्न मूल के हो सकते हैं. जैसे -कोठी, शहर, दीवार, कमरा, सन्नाटा आदि. 

Ø रूपगत समानता और अर्थगत भिन्नता 

दो भाषाओं में प्राप्त समतुल्य शब्दों के मध्य कभी-कभी सूक्ष्म अर्थ समानता होती है तो कभी सूक्ष्म भिन्नता दृष्टिगत होती है. अनेक शब्दों में पूर्ण अर्थगत भिन्नता भी दिखाई देती है. शोध के क्रम में कुछ ऐसे शब्द प्राप्त हुए हैं जिनमें रूपगत समानता किंतु अर्थगत भिन्नता व्याप्त है. 

शब्द                                                         अर्थ 

                                          हिंदी                                  उर्दू 

सहन                              बर्दाश्त करना                      आँगन 

सुदूर                               अधिक दूर                        जारी होना 

बेल                            एक प्रकार का फल                फावड़ा / कुदाल 

माली                      बाग का रखवाला                         धन संबंध 

Ø रूपगत भिन्नता एंव अर्थगत समानता 

दो भाषाओं के मध्य पाए जाने वाले ऐसे शब्द जिनमें रूपगत भिन्नता एवं अर्थगत समानता होती है, इस वर्ग में रखे जाते हैं. एक ही भाषा के इस प्रकार के शब्दों को पर्यायवाची की संज्ञा दी जाती है. 

हिंदी                     उर्दू                 अंग्रेज़ी 

पेड़                  दरख़्त                 Tree 

जाँच               मुआयना         To Check 

Ø भिन्न रूप एंव भिन्न अर्थ वाले शब्द 

प्रत्येक भाषा के शब्द-समूह का एक बड़ा भाग उस भाषिक समुदाय की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है. प्रत्येक भाषा-भाषी के खान-पान, वेश-भूषा, विचार, रीति, मान्यता तथा धार्मिक सोच से जुड़े ये शब्द हर भाषा के अपने होते है. भिन्न रूप एंव भिन्न अर्थ’ वर्ग के शब्द सांस्कृतिक परिस्थिति से ही संबंध रखते हैं. इन शब्दों को लक्ष्य भाषा का बोलने वाला पूर्ण रूप से समझने में असमर्थ होता है. यथा — 

हिंदी — पूजा, ब्रह्मचारी, सन्यासी, नवरात्र, पतिव्रता आदि. 
उर्दू — बुर्का, काज़ी, ताबूत, मज़ार, नमाज आदि. 
अंग्रेज़ी – Altar, Prayer, Priest etc

उपर्युक्त भाषाओं के शब्दों पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि इस वर्ग में आने वाले शब्दों के मध्य हिंदी-उर्दू-अंग्रेज़ी में समानता नहीं है. इन शब्दों का यथावत प्रयोग किया जाता है चूँकि इन भाषाओं में सांस्कृतिक भिन्नता है इसलिए उनकी सांस्कृतिक शब्दावली में भी भिन्नता मिलती है. 

Ø समान रूप और भिन्न रूपरचना एंव सहप्रयोग वाले शब्द 

प्रायः भाषाओं में कतिपय ऐसे शब्द प्राप्त होते हैं जिनमें रूप एवं अर्थ के स्तर पर समानता होती है परंतु रूपरचना व सहप्रयोग के स्तर पर असमानता दृष्टिगत होती है. 

Ø दोनों भाषाओं में बहुवचन के दो रूप मिलते हैं - सामान्य और विकारी — 

हिंदी  -  एकवचन – मंजिल, मकान, कागज़
        बहुवचन - साधारण – मंजिलें, मकान, कागज़ 
                विकारी – मंजिलों, मकानों, कागजों 

उर्दू   -   एकवचन – मंज़िल, मकान, कागज़ 
                 बहुवचन - साधारण – मंज़िलें, मकान, कागज़ 
                                                  मनाज़िल, मकानात, कागज़ात
                                  विकारी – मंजिलों, मकानों, कागज़ों 

अंग्रेज़ी -  एकवचन – Destination, House, Paper 
               बहुवचन  – Destinations, Houses, Papers 

ऊपर दिए गए उर्दू बहुवचन शब्द हिंदी बहुवचन बनाने के नियम से भिन्न हैं प्रायः उर्दू के कुछ शब्द जो कि हिंदी में भी प्रयुक्त होते हैं. उन शब्दों को हिंदी भाषी या जिन व्यक्तियों को उर्दू का सूक्ष्म ज्ञान है वे लोग उर्दू शब्द में ‘ओ’ विकारी प्रत्यय का प्रयोग बहुवचन बनाने के लिए करते हैं, यथा ‘काग़ज़’ उर्दू शब्द है जिसका बहुवचन ‘काग़ज़ात’ होता है किंतु हिंदी में ‘काग़ज़ात’ के स्थान पर ‘कागजों’ बहुवचन का प्रयोग किया जाता है. 

‘मुहावरे’ प्रत्येक भाषा का एक अभिन्न अंग हैं. अरूढ़िगत सहप्रयोग से मुहावरे विशेष अर्थ को प्रस्तुत करते हैं. मुहावरों का अनुवाद करना एक जटिल कार्य है. हिंदी के मुहावरे पेट में चूहे कूदना, अपनी खिचड़ी अलग पकाना आदि का अनुवाद करना संभव नहीं है. इसी प्रकार उर्दू के मुहावरों का अनुवाद भी कठिन है, जैसे— बुत बन जाना, हलफ़ उठाना, ज़ख़्म पर नमक छिड़कना, ईद का चाँद होना, तालीम हुक़्म करना आदि. अंग्रेज़ी भाषा की प्रकृति इन दोनों भाषाओं से भिन्न है. अतः अंग्रेज़ी मुहावारों और लोकोक्तियों को भी लक्ष्य भाषा में अनूदित करना कठिन कार्य है. जैसे – Adam’s Apple, Herculean Task, 

सहप्रयोग के उपवर्ग में पुनरुक्ति का महत्वपूर्ण योगदान होता है. किसी शाब्दिक इकाई का पुनः पूर्ण या आंशिक प्रयोग जो कि नए अर्थ का बोध कराए उसे पुनरुक्ति की संज्ञा दी जाती है. 

1. पूर्ण पुनरुक्ति 

इस वर्ग में दो समान शब्दों का प्रयोग किया जाता है और पूरी रचना से एक नया अर्थ दिखाई देता है, जैसे — 

हिंदी                                          उर्दू 

कभी-कभी                   बाज़-औक़ात / गाहे-ब-गाहे 

धीरे-धीरे                      आहिस्ता-आहिस्ता 

जल्दी से जल्दी                जल्द-अज़-जल्द 

2. आंशिक पुनरुक्ति 

जब शब्द के किसी भाग को पुनः प्रयोग में लाया जाए तो यह प्रक्रिया आंशिक पुनरुक्ति कहलाती है, उदाहरणार्थ— 

हिंदी                                         उर्दू

अपने-आप                     ख़ुद-ब-ख़ुद

बात-चीत                      गुफ़्तगू / बात-चीत

हल्का-फुल्का                 हल्का-फुल्का

आल्थी-पाल्थी             आलती-पालती 

समान कोशीय एवं भिन्न लक्ष्यार्थ वाले शब्द 

प्रायः भाषाओं में अनेक ऐसे शब्द पाए जाते हैं जो अपने मूल अर्थ से भिन्न या अधिक अर्थ का बोध कराते हैं. हिंदी-उर्दू में इस प्रकार के कई उदाहरण दृष्टिगत होते हैं जो अपने मूल अर्थ से भिन्न या अधिक अर्थ का बोध कराते है. 

‘मामू’ शब्द नाते-रिश्ते की शब्दावली में माँ के भाई के लिए प्रयोग में आता है जब कि मुम्बइया हिंदी में या बोलचाल की हिंदी में पुलिस वालों को ‘मामू’ कहा जाता है। 

‘हफ़्ता’ शब्द का अर्थ सप्ताह होता है किंतु अपराध जगत में ‘अवैधानिक रूप से लिए गए कर’ को हफ़्ता कहते है. 

हिंदी धातु ‘फेंक’ का बोलचाल की भाषा में भिन्न लक्ष्यार्थ में प्रयोग मिलता है, यथा — वह फेंक रहा है. यहाँ ‘फेंक’ का अर्थ ‘गप मारना’ है. 

उपर्युक्त उदाहरणों से ज्ञात होता है कि समान कोशीय एंव भिन्न लक्ष्यार्थ वाले शब्दों के स्तर पर हिंदी-उर्दू में समानता एंव असमानता विद्यमान है. इस वर्ग में आने वाले शब्दों का अनुवाद करना एक जटिल कार्य है क्योंकि ऐसे शब्द अपने मूल अर्थ से भिन्न लक्ष्यार्थ का बोध कराते हैं. 

दो बोलियों के प्रयोगकर्ता जब परस्पर वार्तालाप करते समय एक दूसरे का आशय के साथ-साथ उन बोलियों का साधिकार प्रयोग करने में समर्थ होते हैं तो यह स्थिति ‘पारस्परिक बोधगम्यता’ (Mutual Intelligibility) के नाम से जानी जाती है. दो बोलियों के मध्य यह स्थिति मिलती है किंतु दो भाषाओं के बीच ‘पारस्परिक बोधगम्यता’ नहीं होती है. वास्तव में ‘पारस्परिक बोधगम्यता’ का अभाव ही दो भाषाओं की स्वतंत्र अस्मिता का परिचायक कहा जाता है. 

अतः यह कहा जा सकता है कि व्यतिरेकी विश्लेषण वह आधार है जिसके माध्यम से दो भाषाओं की संरचनाओं को इस तरह आमने - सामने रखा जा सकता है कि उनमें निहित व्यतिरेकों का शिक्षार्थी आसानी से समझ सकें ताकि अन्य भाषा सीखते समय मातृभाषा के कारण उत्पन्न होने वाली त्रुटियों को दूर किया जा सके.

संदर्भ ग्रंथ 
व्यतिरेकी भाषाविज्ञान  - विजयराघव रेड्डी
व्यतिरेकी भाषाविज्ञान - भोलानाथ तिवारी 
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान - रवींद्रनाथ श्रीवास्तव 

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