शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

पहले अन्न-वस्त्र की व्यवस्था करो, फिर भागवत सुनना-सुनाना

‘’तुम लोग क्या कर रहे हो? ... जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? ...किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशीगीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी-जान से तडप रहे हो - यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुंड के झुंड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ' रोटी दो, रोटी दो ' चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड-मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि 'हाँ' तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पीछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क वाले युवकों का, पशुओं का नहीं।‘’ - स्वामी विवेकानंद. 

स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी, 1863 – 4 जुलाई 1902) भारतीय नवजागरण काल के उन पुरोधाओं में है जिन्होंने दबी-कुचली भारतीय अस्मिता को उसकी मौलिक तेजस्विता पुनः प्रदान की और दुनिया को बताया कि ज्ञान-विज्ञान, चिंतन-दर्शन, साहित्य-वाङ्मय और भौतिक-आधिभौतिक सभी क्षेत्रों में भारतीय सभ्यता अग्रणी रही है. वे ऐसे संस्कृति पुरुष हैं जिन्होंने भारत की लंबी गुलामी के कारणों को भी विवेचित किया और भारतीयों की अकर्मण्यता पर आक्रोश भी व्यक्त किया. नवजागरणकालीन सामाजिक नेता के नाते विवेकानंद ने युवा वर्ग को उपनिषद की वाणी में संबोधित करते हुए उठने, जागरूक रहने और कर्मठ जीवन जीने के लिए सचेत किया. यही कारण है कि देशकाल की सीमाओं के परे युवा वर्ग को सकारात्मक चिंतन से ओतप्रोत करने के लिए आज भी उनकी वाणी अत्यंत प्रासंगिक है. 

स्वामी विवेकानंद ने युवा पीढ़ी के सामने सदा सकारात्मक सोच का आदर्श रखा. वे मानते थे कि निषेधात्मक विचार लोगों को दुर्बल बना देते हैं जब कि सकारात्मक विचार मनुष्यत्व का संचार करते हैं और व्यक्ति को अपने पैरों पर खडा होना सिखाते हैं. उनकी मान्यता थी कि राष्ट्र निर्माण के लिए चरित्रवान युवकों की आवश्यकता होती है और सद्चरित्रता की नींव शिक्षा द्वारा मजबूत बनाई जा सकती है. इसलिए वे चाहते थे कि राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुसार शिक्षा में परिवर्तन होना चाहिए. जानकारी और बोध का अंतर करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि तुम केवल पाँच ही परखे हुए विचार आत्मसात कर उनके अनुसार अपने जीवन और चरित्र का निर्माण कर लेते हो, तो तुम एक पूरे ग्रंथालय को कंठस्थ करने वाले की अपेक्षा अधिक शिक्षित हो. यदि शिक्षा का अर्थ जानकारी ही होता, तब तो पुस्तकालय संसार में सब से बड़े संत हो जाते और विश्वकोश महान ऋषि बन जाते. 

आधुनिक संदर्भ में यह याद रखना उपयोगी हो सकता है कि विवेकानंद भारतीय संस्कृति के जड़ और रूढ़ अंशों को बाहर निकाल फेंकने के पक्षधर थे. उन्होंने देखा कि अभिजात उच्च वर्णों ने अपने स्वार्थ के लिए समाज को इस तरह विभाजित कर रखा है कि मनुष्य मनुष्य का दास बना हुआ है. उन्होंने अफ़सोस ज़ाहिर किया कि हमारे अभिजात पूर्वज साधारण जन समुदाय को ज़माने से पैरों तले कुचलते रहे जिस कारण वे बेचारे एकदम इतने असहाय हो गए कि अपने आप को मनुष्य मानना भी भूल गए. देश की युवा शक्ति का आह्वान करते हुए इसीलिए विवेकानंद ने कहा कि इस बात को हमेशा ध्यान रखो कि राष्ट्र झोंपडियों में बस्ता है. किसान, जूते बनाने वाले, मेहतर और भारत के ऐसे ही निचले वर्गों में तुमसे कहीं ज्यादा काम करने और स्वावलंबन की क्षमता है. वे लोग युग-युग में चुपचाप काम करते रहे हैं. वे ही है, जो इस देश की समस्त संपदा के उत्पादक हैं. फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की. अभिजात वर्ग को सचेत करते हुए विवेकानंद ने यहाँ तक कहा कि तुम लोगों ने अब तक इस जनता को दबाया है, अब उनकी बारी है और तुम लोग रोजगार की तलाश में भटकते-भटकते नष्ट हो जाओगे, क्योंकि यही तुम्हारे जीवन का सर्वस्व बन गया है. 

उल्लेखनीय है कि अपने एक व्याख्यान में जातिभेद का खंडन करते हुए विवेकानंद ने कहा कि - भारत के इन दीन-हीन लोगों को, इन पददलित जाती के लोगों को, उनका अपना वास्तविक रूप समझा देना परमावश्यक है. जात-पाँत का भेद छोड़कर, कमजोर और मजबूत का विचार छोड़कर, हर एक स्त्री-पुरुष को, प्रत्येक बालक-बालिका को, यह संदेश सुनाओ और सिखाओ कि ऊँच-नीच, अमीर-गरीब और बड़े-छोटे, सभी में उसी एक अनंत आत्मा का निवास है, जो सर्वव्यापी है; इसलिए सभी लोग महान तथा सभी लोग साधु हो सकते हैं. आओ हम प्रत्येक व्यक्ति में घोषित करें – उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत – ‘उठो, जागो और जब तक तुम अपने अंतिम ध्येय तक नहीं पहुँच जाते, तब तक चैन न लो.’ 

विवेकानंद के इस संदेश को अगर हम कोरा आध्यात्मिक संदेश मान लेंगे तो बड़ी भूल होगी. अध्यात्म से पहले वे भारतीयों को भौतिक उपलब्धियों के क्षेत्र में, अन्न-वस्त्र के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए करते हैं. उन्होंने एक स्थान पर पूछा है, ‘अन्न-वस्त्र की कमी और उसकी चिंता से देश बुरी अवस्था में चला जा रहा है – इसके लिए तुम लोग क्या कर रहे हो?’ और दृढ़ शब्दों में निर्देश दिया है, ‘फेंक दो अपने शास्त्र-वास्त्र गंगा जी में. देश के लोगों को पहले अन्न की व्यवस्था करने का उपाय सिखा दो. इसके बाद उन्हें भागवत का पाठ सुनाना. कर्मतत्परता के द्वारा इहलोक का अभाव दूर न होने तक कोई धर्म की कथा ध्यान से न सुनेगा. इसीलिए कहता हूँ, पहले अपने में अंतर्निहित आत्मविश्वास को जाग्रत कर, फिर देश के समस्त व्यक्तियों में जितना संभव हो, उस शक्ति के प्रति विश्वास जगाओ. पहले अन्न की व्यवस्था कर, बाद में उन्हें धर्म प्राप्त करने की शिक्षा देना. अब अधिक बैठे रहने का समय नहीं – कब किसकी मृत्यु होगी, कौन कह सकता है?’ 

स्वामी विवेकानंद ने हर प्रकार की धर्मान्धता और शोषण का विरोध किया. यहाँ तक कि शिकागो में दिए 1893 के विश्व धर्म महासभा के संबोधन में भी उन्होंने बड़ी तड़प के साथ यह कहा था कि सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं. वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं. यदि ये बीभत्स चुड़ैलें न होतीं, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता. कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमारा प्यारा भारत वर्ष आज भी सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता रूपी इन तीन चुड़ैलों के शिकंजों में फँसा हुआ है जिनसे मुक्त होने के लिए विवेकानंद के मानवता और राष्ट्रीयता का समन्वय करने वाले विचारों की आज पहले से ज्यादा जरूरत है.

1 टिप्पणी:

ARUN SATHI ने कहा…

KAB HOGA SWAMI JI KA BHARAT NIRMIT