मंगलवार, 19 जुलाई 2022

संपादकीय... साहित्य सृजन की समकालीनता

साहित्य सृजन की समकालीनता (ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ) 
 संपादन : डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
2022 
नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन 
ISBN : 978-81-7965-343-2

यों तो अमरत्व मनुष्य की चिरकालिक अभिलाषा है तथा मानव संस्कृति के विकास की तमाम यात्रा देश और काल की सीमाओं के पार जाने की इसी इच्छा का परिणाम है, लेकिन इस इच्छा की सिद्धि कोई भी व्यक्ति अथवा समाज अपने देशकाल से बद्ध और विद्ध हुए बिना शायद ही कर पाया हो । साहित्य सहित समस्त सृजनात्मक गतिविधियाँ काल के बीच से होकर ही उसके पार जाती हैं। इसका अर्थ है कि कालजयी होने से पहले किसी भी साहित्यकार और साहित्यिक कृति को समकाल की कसौटी पर खरा उतरना होता है। साहित्य-सृजन समकाल की सिद्धि के द्वारा अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। इसी में उसकी कृतार्थता और चरितार्थता निहित है। अतः समकालीनता वह प्रक्षेपण बिंदु है, जहाँ से कोई रचना कालमुक्त होने की दिशा में उड़ान भरती है। हमारा तो विचार है कि अमर और कालजयी होने की चिंता ही नहीं की जानी चाहिए- कभी कहीं कोई समानधर्मा मिलेगा तो रचना अपनी उत्तरजीविता सिद्ध करेगी ही! देखने वाली असली बात तो यही है कि अपने समय में किसी रचना और रचनाकार ने अपनी ज़िम्मेदारी किस हद तक निभाई और अपने देशकाल को कौन-सी दिशा देने का प्रयास किया।

बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी के संधिकाल में सृजनरत और इस ग्रंथ 'साहित्य सृजन की समकालीनता' के चरितनायक ईश्वर करुण समकालीनता की कसौटी पर खरे उतरने वाले रचनाकार हैं। इस ग्रंथ में उनके मित्रों, हितैषियों, पाठकों, समीक्षकों और प्रशंसकों ने अपने-अपने ढंग से उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, सेवा और प्रदेय का खुलासा और मूल्यांकन किया है। हमें विश्वास है कि यह ग्रंथ ईश्वर करुण के बहुआयामी साहित्यिक योगदान से हिंदी के व्यापक जगत को अवगत करा सकेगा और हिंदी साहित्य के इतिहास में उनके नाम को सही स्थान पर दर्ज कराने में सफल होगा।

इस ग्रंथ की प्रारंभिक योजना से लेकर वर्तमान रूप में प्रस्तुतीकरण तक अनेक मित्रों का भरपूर सारस्वत सहयोग और आशीष प्राप्त हुआ। इस हेतु सभी सम्मिलित रचनाकारों के प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। स्वयं चरितनायक ने हमारे आग्रह पर कृपापूर्वक बहुत सारी सामग्री उपलब्ध कराई, जिसके लिए धन्यवाद काफी छोटा शब्द है। ग्रंथ की सीमा के कारण काफी सामग्री को हम चाहकर भी शामिल नहीं कर सके। इसका मलाल तो है, पर यह उम्मीद भी है कि वह भी किसी अन्य ग्रंथ के रूप में भविष्य में पाठकों के सामने अवश्य आ सकेगी।

इस महत्वाकांक्षापूर्ण, अत्यंत उपादेय और पूर्णतः प्रासंगिक ग्रंथ को सुरुचिपूर्ण ढंग से, अत्यंत कम समय के भीतर, प्रकाशित करने के लिए तक्षशिला प्रकाशन, विशेष रूप से प्रिय बंधु कमल विष्ट बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं। प्रेम बना रहे !

-संपादकद्वय


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

और जितने दीप हैं, मैं सभी में हूँ!




[1]

                                        “मैं चला नजीबाबाद -
                                        नसीबाबाद समझकर आया
                                        सर्वत्र प्रेम ही पाया
                                        'गर मिलता भी है गरल
                                        उसे जगदीश निगल जाते हैं।” 
                                                                (प्रेमचंद्र जैन, गरल जगदीश निगल जाते हैं)।

सच में नजीबाबाद धन्य है। धन्य क्यों नहीं होगा, उसने ‘गुरु जी’ का असीम प्रेम जो पाया! ‘गुरु जी’! हाँ, इसी नाम से जाने जाते हैं डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी - मेरे गुरु के गुरु के गुरु। इस अर्थ में वे मेरे परदादा गुरु हुए। इस गुरु-शिष्य परंपरा के कारण ही मुझे परदादा गुरु का अहेतुक स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

जब 2015 में गुरु जी के सम्मान में ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ ग्रंथ की तैयारी हो रही थी, तो मुझे भी उस सारस्वत यज्ञ में गिलहरी के समान सहयोग करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2016 में जब ग्रंथ प्रकाशित होकर आया, तो उन्हें समर्पित करने का निश्चय किया गया था। 3 दिसंबर, 2016 को अभिनंदन समारोह का आयोजन दिल्ली में हुआ था। सुबह 8 बजे दिल्ली पहुँचना था। लेकिन मेरा भाग्य का खेल कि गाड़ी रात को 8 बजे दिल्ली स्टेशन पहुँची। मैं विचलित होती रही कि गुरु जी से मिले बिना ही मुझे वापस लौटना पड़ेगा। लेकिन देवराज जी और ऋषभदेव शर्मा जी ने मुझे हिम्मत नहीं हारने दी। जब आयोजन स्थल पहुँची तो देखा, गद्दी बिछे हुए मंच पर गुरु जी शांत मुद्रा में बैठे हुए थे, लेकिन चेहरे पर थोड़ी सी परेशानी दिखाई दी। मेरे कारण गुरु जी को परेशानी जो झेलनी पड़ी। पहली बार गुरु जी का साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ। (अखण्डमण्डलाकारम् व्याप्तम् येन चराचरम्। तत्पदम् दर्शितम् येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥)

गुरु जी का भरपूर आशीर्वाद बटोरकर मैं वापस हैदराबाद लौटी। उसके बाद से समय-समय पर गुरु जी से फोन पर बात हो ही जाती थी। त्योहार के दिन तो गुरु जी के फोन से नींद खुलती थी। उनके आशीर्वाद और स्नेह की वर्षा में मैं भीग चुकी हूँ। (कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आइ।/ अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराइ।) आज भले ही गुरु जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आत्मा हमारे साथ है और हमें असीसती रहती है। पग-पग पर उनकी उपस्थिति का अहसास होता है, क्योंकि गुरु जी के साथ आत्मिक रिश्ता जो बन गया था- जो अटूट है। गुरु जी के शब्दों में कहूँ तो -
                    ‘भावनाओं से जुड़ा प्रेम
                    अटूट होता है’ (प्रेमचंद्र जैन, प्रेम)

[2]

प्रेम के पीर

डॉ. प्रेमचंद्र जैन स्वाभिमानी, कर्मठ और अदम्य साहसी थे। उनके स्वभाव के संबंध में डॉ. देवराज का यह कथन उल्लेखनीय है- “स्वभाव से खिलंदड़ और हँसोड़।” (शर्मा:2016:61)। नित्यानंद मैठाणी कहते हैं कि शरीर से तो वे दुबले-पतले थे किंतु उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि सभी उनसे डरते थे। उनसे एक बार यदि कोई मिलते तो उन्हें आजीवन भूल नहीं सकते। ऐसे थे गुरु जी। अपरिचित व्यक्ति से भी ऐसे मिलते जैसे उन्हें बरसों से जानते हों। उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता और वत्सलता के संगम को देखा जा सकता है। उन्हें यदि प्रेम का 'पीर’ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं।

जैन परंपरा के मर्मज्ञ विद्वान थे डॉ. प्रेमचंद्र जैन। जैन धर्म अपनी मान्यताओं, स्थापनाओं, कर्मकांड और रूढ़ियों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन वे इस धर्म में घुस आए पाखंडों और रूढ़ियों का खुलकर विरोध करते थे। इतना ही नहीं, वे जैन लोगों के जीवन में जमी कुरीतियों की धज्जियाँ भी उड़ाते थे। वे धर्म को लोकहित-कारक के अर्थ में स्वीकारते थे। उनके अनुसार धर्म कर्तव्य है। वे बार-बार यही कहते थे कि “धर्म का लोकहित-कारक अर्थ ‘कर्तव्य’ को ही स्वीकार करना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम-ईसाई आदि संप्रदाय या मत मानने से विवादों को विराम देने का मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। मेरा इसी प्रकार का विश्वास है। कर्तव्य और धर्म शब्द प्रायः एक ही संदर्भ में प्रयुक्त करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।... मैं अपने अनुभव के आधार पर कहूँगा कि वर्तमान में धर्म और कर्तव्य की व्याख्या ही बदल गई। इसी के कारण व्यक्ति अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति घनघोर उपेक्षा के लिए लेशमात्र शर्मसार होने को तैयार नहीं है।” (शर्मा:2016:406)

प्रेमचंद्र जैन जीवन भर ढाई आखर प्रेम को ही महत्व देते रहे। उनके अनुसार “प्रेम सदैव अनुभूति परक रहा है, अतएव प्रेम को किसी परिभाषा के घेरे में अनुकूलित नहीं किया जा सकता। प्रेम मानव-स्वभाव की ही संपत्ति हो ऐसी बात नहीं है। वह तो पशु-पक्षियों में भी विद्यमान है और यदि प्रेम की सत्ता को प्राणिमात्र में भी स्वीकार किया जाए तो वह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।” (शर्मा:2016:139)। उनके अनुसार जिस व्यक्ति में प्रेम की पीर जागृत हो गई, उसका जीवन सार्थक है। वे भावनाओं से जुड़े हुए प्रेम को ही महत्व देते थे।

डॉ. प्रेमचंद्र जैन मानवता के पक्षधर थे। धर्म और संप्रदाय के कटघरे में वे फिट ही नहीं होते। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। वे सही अर्थों में सामाजिक थे। उनके गुणों के बारे में उन्हीं के शब्दों से जान लें - “ज़मीन का आदमी था, समाज से जुड़ा था। तमाम सारे छात्र-छात्राओं की समस्याएँ, उनके निदान और दूर करने के उपाय; विविध शैक्षणिक सामाजिक संस्थाओं में होने वाले समारोहों-आयोजनों में शिरकत करने के लिए; अपने अध्ययन-अध्यापन के उत्तरदायित्व को मनसा-वाचा-कर्मणा निभाते हुए समय देना - हर किसी के लिए संभव नहीं होता। मुझमें इसी प्रकार के बहुचर्चित गुण-दोष थे।” (शर्मा:2016:404)। अपने इन्हीं गुण-दोषों के कारण वे अपने विद्यार्थियों और नजीबाबाद वासियों के निकट थे और उन्हें बहुत प्रिय थे। नजीबाबाद में न ही उनका जन्म हुआ और न ही शिक्षा-दीक्षा। यह तो उनकी कर्मभूमि थी। लेकिन वे नजीबाबाद के ही होकर रह गए - उनका काबा और काशी यही नजीबाबाद था। उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि “यहाँ मेरे बस जाने या रुक जाने के निजी कारण हैं और पूर्णतः स्वांतः सुखाय हैं।” (शर्मा:2016:406)

[3]

सदैव तत्परता

डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें अदम्य जिजीविषा और कुछ करके दिखाने की भरपूर इच्छा शक्ति थी। यह बात उनके गुरु डॉ. शिवप्रसाद सिंह के कुछ पत्रों से भी स्पष्ट होती है- “तुम संकल्प को यथासमय सही ढंग से पूरा करने में सदैव तत्पर रहे हो।” (शर्मा:2016:330)। प्रेमचंद्र जैन कहते तो कुछ नहीं, बल्कि करके अवश्य दिखा देते थे। वे बहुत ही साहसी थे। वे जो कार्य हाथ में लेते थे, उसे पूरा करने तक दिन-रात एक कर देते थे। शिवप्रसाद सिंह के अभिनंदन ग्रंथ के लिए आलेख संग्रहीत करते समय उन्हें बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा। गुरु अपने शिष्य को परेशान होते नहीं देख सकते, इसीलिए शायद शिवप्रसाद सिंह ने उन्हें एक पत्र (8.8.88) लिखा था- “तुम इतना अस्वस्थ रहते हुए भी शिवप्रसाद नामक व्यक्ति के लिए क्यों छटपटा रहे हो? क्या किया शिवप्रसाद सिंह ने? पूरी ज़िंदगी बस एक अपढ़ गँवार व्यक्ति के अनुभव ही तो मिले- वह भी सिर्फ उन्हें जो अपने को पाठक कहते हैं।” (शर्मा:2016:331)। लेकिन प्रेमचंद्र जैन जिद्दी भी कम नहीं थे। उसी जिद के परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य जगत को शिवप्रसाद सिंह का अभिनंदन ग्रंथ ‘बीहड़ पथ के यात्री’ प्राप्त हुआ। (जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू। - मानस)

[4]

गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई

प्रेमचंद्र जैन शिष्य वत्सल गुरु थे। माता-पिता से प्राप्त सुलभ संस्कारों के साथ-साथ गुरुजनों द्वारा प्रदत्त ज्ञानराशि से वे आजीवन बँधे रहे। उन्होंने स्वयं यह स्वीकृत और घोषित किया कि “गुरुवर डॉ. शिवप्रसाद सिंह और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व के नैकट्य से जो मूल मंत्र ग्रहण किए थे, वे मेरे अंतिम समय तक साथ रहेंगे।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रों में एक मूल मंत्र है- “अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता, तब तक स्वार्थ खंड सत्य है, मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहृत हो गया है, उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देखा पाता, वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रपूत वाक्यों से प्रेमचंद्र जैन हमेशा ही सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने की शक्ति प्राप्त करते रहे। इसीलिए शिष्यों के लिए दलित द्राक्षा की तरह अपने आपको निचोड़कर प्रस्तुत कर सके। वे शिक्षकों से यह प्रश्न करते थे कि “यदि वे स्वयं गहन अध्ययन पूर्वक कृपणता और पक्षपातयुक्त व्यवहार छोड़कर अपने उत्तरदायित्व का ईमानदारी से पालन करेंगे तो उन्हें उनके कार्य में क्यों बाधा आएगी?” (शर्मा:2016:407)। उनका मानना था कि शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच शिष्टाचार के मर्यादित आचरण के अतिरिक्त अन्य दूरियाँ नहीं होनी चाहिए। तभी एक स्वस्थ परंपरा पनपेगी।

प्रेमचंद्र जैन की कथनी और करनी में कहीं कोई अंतर नहीं दीखता। अपने शिष्यों के लिए वे कैसे गुरु थे, यह तो उन लोगों के वक्तव्यों से ही जाना जा सकता है। “गुरु जी के अध्यापन के समय कक्षा का वातावरण कभी बोझिल या उबाऊ नहीं रहता था। विषय को इतना रोचक बना देते थे कि कोई छात्र विषय से भटक नहीं सकता था। ... सारा ज्ञान छात्रों के मस्तिष्क में उड़ेलने का प्रयत्न करते थे और छात्र भी पूरे मनोयोग के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। छात्र दूसरे अध्यापकों की कक्षा अवश्य छोड़ देते थे किंतु गुरु जी की कक्षा छोड़ने का दुःसाहस कभी नहीं करते थे। दूसरी कक्षा के छात्र भी गुरु जी की कक्षा में बैठने का प्रयास करते थे।” (डॉ. निर्मल शर्मा)। “मैंने गुरु जी को कभी गुरु जी नहीं कहा, एक इकलौती शिष्या मैं ही हूँ, जिसने हमेशा उन्हें अंकल कहा।” (डॉ. हेमलता राठौर)। देवराज जी और गुरु जी तो हमेशा एक साथ ही पाए जाते थे। “नजीबाबाद के लोग बरसों यह विश्वास करते हुए रहे कि देवराज का पता करना है, तो गुरु जी से पूछो और गुरु जी के बारे में कुछ जानना है, तो देवराज से पूछो।” प्रेमचंद्र जैन की इस शिष्य वत्सलता को गुरु मंत्र की तरह डॉ. देवराज जैसे उनके शिष्यों ने भी अर्जित किया है। (गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥)

प्रेमचंद्र जैन माता-पिता और गुरुओं से प्राप्त संस्कारों का पालन आजीवन करते रहे। वे भविष्य की चिंता नहीं करते थे। शिष्यों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त गुरु के पास भविष्य के संबंध में सोचने का अवसर कहाँ होता! “अध्यापन में भी तीनों कालों में वर्तमान को सँवारने के लिए अधिकतम क्षमताओं का उपयोग करने पर बल दिया। मजबूत नींव, भूतकाल में तलाशने के बाद ही वर्तमान पर ध्यान केंद्रित कर लिया जाए तो भविष्य की चिंताओं को लादे रखना बुद्धिमत्ता नहीं है।” (शर्मा:2016:404)। यह उनकी दृढ़ मान्यता थी।

[5]

चश्म नम हैं मुफ़लिसों को देखकर

प्रेमचंद्र जैन परिवार और रिश्तों को महत्व देते थे। उनकी मान्यता है कि जब व्यक्ति आत्मिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं तो किसी भी तरह की समस्याएँ नहीं होतीं। एक समय ऐसा था जब भारत भर में संयुक्त परिवार की परंपरा को सामाजिक मान्यता मिली थी। लेकिन “अब उसके समाप्तप्राय हो जाने से पारिवारिक, कौटुंबिक, यहाँ तक कि वैयक्तिक समस्याएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। उधार ली गई व्यक्तिवादी संस्कृति स्वार्थपरता, असहिष्णुता, हिंसा तथा पाशविक आचरण को बढ़ावा देने में सहायक ही हुई है।” (शर्मा:2016:405)।

व्यक्ति स्वार्थलोलुप होता जा रहा है। मोह-माया में पड़कर इतना अंधा होता जा रहा है कि वह सही और गलत की पहचान ही नहीं कर पा रहा है। काला धन, चोर बाजारी, रिश्वत, महंगाई, बलात्कारियों की दुनिया है चारों ओर। प्रेमचंद्र जैन इस दुनिया को छोड़ आने की बात करते हैं। आदमी को आदमी की तरह जीने पर बल देते हैं। उनका मन विद्रूपताओं को देखकर व्यथित हो जाता है। उनकी दृष्टि में कोई हिंदू-मुस्लिम-ईसाई-जैन नहीं है, बल्कि सब केवल मनुष्य हैं। जब इन पर विपत्ति आती है, तो उनका मन द्रवित हो जाता है। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद जब अयोध्या में मंदिर तोड़ने की अघटनीय घटना हुई, तब नजीबाबाद में भी नाजुक स्थितियाँ पैदा हुईं। गुरु जी ने अपनी सूझबूझ से वहाँ शांति का वातावरण कायम किया। “फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को अहसास हो गया कि इस नगर में दंगा करवाना आसान काम नहीं है। .... नजीबाबाद हिंदू- मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों की आग में बरबाद होने से बच गया।” (शर्मा:2016:66)। वे आदमी को इनसान के रूप में बदलने के लिए आग्रह करते हैं। हैवानियत छोड़कर इनसानियत को अपनाने की अपील करते हैं। (शर्मा:2016:127)

[6]

इष्ट फल

डॉ. प्रेमचंद्र जैन अपने दायित्व को बखूबी जानते थे। उन्होंने न ही अपने दायित्वों से मुँह मोड़ा और न ही पलायन का रास्ता अपनाया। शिक्षक- शिक्षार्थियों के बिगड़ते रिश्तों के बात जब आती, तो वे डंके की चोट पर कहते थे कि “हम सबको मिलकर इन परिवर्तनों पर गंभीरता से सोचने- विचारने और चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही जागरूक होना और जागरूक करना है। अब भी बिगड़ा कुछ नहीं है। अलबत्ता अपनी- अपनी स्वार्थपरता एवं प्रलोभन का नियंत्रण करना है। अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत दायित्वों को ईमानदारी से निभाने की आवश्यकता है। हमें राष्ट्रीय भावनाओं को शून्य होते देख वेदना होनी चाहिए और एक नागरिक के कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक का आपसी संबंध निकटता का रहेगा और वे अपने- अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहेंगे तो समस्याएँ स्वतः नज़र नहीं आएँगी। निःसंदेह शिक्षकों का उत्तरदायितव अपेक्षाकृत बड़ा है। प्रथमतः उन्हें कर्तव्यनिष्ठ, कर्मठ एवं सच्चरित्र होने की अनिवार्यता है।” (शर्मा:2016:434)। यदि कहीं भी कभी भी एक शिक्षक दुराचार में लिप्त पकड़ा जाएगा, तो समाज की निगाहें संपूर्ण शिक्षक जगत पर ही उठती हैं।

साहित्यकारों के दायित्व के संबंध में भी प्रेमचंद्र जैन का यह कथन उल्लेखनीय है कि 'जो उपेक्षित है, वह साहित्य का विषय होना ही चाहिए।' उनकी मान्यता थी कि “संवेदना ही कविता की जननी है। अपनी रचना को कवि संतानवत सँवारता, दुलारता और सहेजता है। न केवल इतना ही बल्कि उन्हें संरक्षित करना भी निजधर्म मानता है।” (शर्मा:2016:389)। शोषक की व्यथा से शोषित की व्यथा भिन्न और विकट होती है। इसलिए प्रेमचंद्र जैन सहृदयों से यह अपील करते हैं कि “इसी विकटता का, दो टूक उत्तर - / साहित्यकार का दायित्व है।” (प्रेमचंद्र जैन, अहसास)।

संवेदनाओं के अभाव में तो रचनाएँ जन्म ले ही नहीं सकतीं। संवेदना से ही साहित्यकार का अनुभूति कोश समृद्ध होगा। प्रेमचंद्र जैन का अनुभूति कोश बहुत समृद्ध था। वे कोरे भाग्यवाद में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी माँ की सीख उनके साथ चलती थी- ‘होकर सुख में मगन न फूले, दुख में कभी न घबरावे।’ वे अकेले चलते गए और लोग उनके साथ चलते गए और कारवां बनता गया -
                    आएगा सवेरा
                    अब नहीं हूँ मैं अकेला
                    और जितने दीप हैं
                     मैं सभी में हूँ
                    पी रहा हूँ सब अँधेरा
                    थको तुम मत मीत
                    मृत्यु से भयभीत
                    अमरत्व की श्रम की -
                    सदा ही जीत। 
                                    (नेह बाती चुक रही है)

‘गुरु जी’ अपने गुरु शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्राप्त गुरुमंत्र को हमें विरासत में दे गए- “चिंताएँ छोड़कर नियति से लड़ो ... लड़ना ही धर्म है। सारा जीवन बन जाए युद्ध। ... तभी मृत्यु का भय भाग जाता है।” 000

संदर्भ ग्रंथ-
  • शर्मा, ऋषभदेव सं. (2016). निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक. नजीबाबाद : परिलेख

द्रष्टव्य: इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 159-167.


बुधवार, 6 अप्रैल 2022

युद्ध के विरुद्ध 'तीसरी दुनिया'

आम तौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को विकास के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँट कर देखने का चलन रहा है - पहली विकसित, दूसरी विकासशील और तीसरी अविकसित। इसके अलावा 1990 से पहले तक दुनिया के दो शक्ति केंद्र थे - पूँजीवादी और साम्यवादी। गुट निरपेक्ष देश तीसरी दुनिया कहे जाते थे। लेकिन इन सब बातों से अनंत काबरा के ‘तीसरी दुनिया’ शीर्षक विवेच्य काव्य संग्रह की कविताओं को समझने में कोई खास सहायता नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि कविताएँ रची जाने के बाद संग्रह के नामकरण को तर्कसंगत दिखाने के लिए एक दार्शनिक भूमिका जोड़ दी गई। जिसका सार यह है कि इस संग्रह की कविताओं के केंद्र में ‘युद्ध’ है। इस सार का प्रसार ही कवि की ‘तीसरी दुनिया’ का अभिप्राय है। इससे पहले कि इस संग्रह की कविताओं पर आगे विचार किया जाए, यह कहना जरूरी है कि रूस के यूक्रेन पर हमले ने जिस तरह पूरी दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने लाकर खड़ा कर दिया है, उसे देखते हुए ‘तीसरी दुनिया’ की ये युद्ध केंद्रित कविताएँ आज बेहद प्रासंगिक प्रतीत होती हैं, भले ही इनका प्रकाशन 1988 में हुआ हो। किसी रचना और रचनाकार की रचनाधर्मिता की कसौटी यही है कि वह अपने रचना-काल के बाद भी प्रासंगिक रहे। इस दृष्टि से कवि अनंत काबरा जी के इस संग्रह की कविताएँ देश-काल का अतिक्रमण करने वाली सार्थक कविताएँ सिद्ध होती हैं। उदाहरण स्वरूप हम कुछ कविताएँ देखेंगे।

इतिहास के पन्नों को पलटने से स्पष्ट होता है कि अनादिकाल से युद्ध की विभीषिका चलती आ रही है। युद्ध के बाद चारों ओर विनाश के अलावा कुछ नहीं बचता। हर नया युद्ध विगत युद्ध से भयंकर होता है। परिणाम भी उसी तरह अधिक घातक होते हैं।

कवि यह बार-बार कहते हैं कि युद्ध के आग्रह ने असंतोष का बीज बो दिया है। खुशहाल धरती बंजर बन गई है। चारों ओर कंकाल ही कंकाल नज़र आते हैं। विश्व में जितने भी युद्ध हुए हों, हार तो इंसान की ही हुई है। कवि कहते हैं -
पचास वर्ष पूर्व का आदमी
असमंजस है! आज (तीसरी दुनिया, पृ.23)

युद्ध की यह विभीषिका संपूर्ण मानव जाति को नष्ट कर देगी। विश्व के नक्शे से कुछ देश गायब भी हो सकते हैं। इस संदर्भ में कवि कहते हैं कि -
विश्व के नक्शे पर से
कर जाएँगे कई हाशिये देश -
समर्पण की कई करुण संवेदनाएँ
घिरा देंगी
विश्व को दुखों के बादलों से
विकृति संघर्ष का संशय
फँस जाएगा युद्धों के दलदल में - (पृ. 20)

युद्ध के इस नृशंस तांडव के बाद मनुष्य भयभीत होकर दौड़ रहा है। मौत का डर उसे निगल रहा है। अपने अंदर की मानवता का गला घोंटकर वह नरसंहार कर रहा है। उसके लिए रिश्ते-नाते कोई मायने नहीं रखते। वह तो ‘पत्थर की मूर्ति’ बन बैठा है। कहीं कोई संवेदना नहीं बची है। वह ‘अविश्वास और तनाव भरे परिवेश’ में जी रहा है। ऐसे में कवि दम तोड़ती संवेदनाओं को बचाने की बात करते हैं -
संवेदना के सोपान
जिस उफनती नदी में
नाव पर सवार हैं
काश!
बच जाए वह
तभी तो
मेरे अधूरी इच्छा की तस्वीर
भर पाएगी। (पृ. 16)

यह सच है कि भयंकर विनाश के बाद भी कुछ देश अपने पूर्व वैभव को वापस निर्मित कर पाए। वैज्ञानिक प्रगति कर पाए। पर तीसरी दुनिया के उस प्राणी की स्थिति क्या है जो ‘हर पल जान हथेली पर लेकर सड़क के चौराहों पर घूम रहा है’ -
औद्योगिक वायु प्रदूषणों की गंध
साँसों में समेटा जा रहा है
तीसरी दुनिया में (पृ. 27)

इन कविताओं के माध्यम से कवि-मन यह प्रश्न उठा रहा है कि हम भावी पीढ़ी को कैसा वातावरण प्रदान कर रहे हैं? इन कविताओं में एक ओर ‘अणुबमों की खतरनाक होड़’ है तो दूसरी ओर ‘विषैला धुआँ’, ‘प्राणों का आर्तनाद’, ‘लाशों का ढेर’, ‘निराशा की बंदिश’, ‘हत्याओं का नृशंस दौर’, ‘शवों की सड़ांध’, ‘श्मशान बनते घर और बस्तियाँ’, ‘अत्याचार की वारदातें’, ‘संघर्ष का परिवेश’, ‘अभिलाषाओं की अर्थी’, ‘मौत की तनी हुई रस्सी’, ‘सांप्रदायिकता का विष’, ‘मानसिक कुंठाएँ’, ‘षड्यंत्र का स्रोत’, ‘गलतफहमियों की पगडंडी’, ‘सर्वत्र जीवन का आतंक’ द्रष्टव्य है। क्या ऐसा कोई देश है जहाँ युद्ध न लड़ा गया हो? क्या ऐसा कोई देश है जहाँ अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग न किया गया हो? क्या ऐसा कोई देश हैं जहाँ बच्चे सुरक्षित हों? ऐसे वातावरण में जन्म लेने के लिए भी बच्चा डर जाएगा।

कवि कहते हैं कि हथियारों के साथ-साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी विस्फोटक हो गया है। ‘दिमाग में फैलती जा रही है/ उस शव की बदबू/ जो बंद कमरे में/ कब मरा पता तक नहीं/ सड़ते विचार/ क्रियाकर्म के भी लायक नहीं।’ (पृ.112)

मेरा मानना है कि अनंत काबरा आस्था और सकारात्मकता के कवि हैं। वे इस विडंबना से भली भाँति परिचित हैं कि -
मनुष्य के अंतर्संबंध तोड़ने के लिए
युद्ध का होना जरूरी है (पृ.133)।

इसके बावजूद वे यही आशा करते हैं कि एक न एक दिन युद्ध की विकृतियाँ समाप्त हो जाएँगी और सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी। संवेदनशील कवि-मन युद्ध के भीषण उन्माद की परिस्थिति से मानव समाज को बचाना चाहता है; युद्ध को रोकना चाहता है। इसीलिए तो अनंत काबरा कहते हैं -
आगामी युद्ध रोका जा सकता है
भावी युद्ध टाला जा सकता है।
लेकिन हम रोकेंगे नहीं, टालेंगे नहीं,
पहुँचेंगे जब तक हम
किसी निश्चित निष्कर्ष पर
×××
युद्ध के बाद
जीवित होंगी
गर्भवतियाँ
अपंग बच्चों को जनने के लिए
पता नहीं -
कैसे जिएँगे वे आश्रयहीन बेचारे। (पृ.5)

इन कविताओं में सिर्फ युद्ध की विभीषिका ही नहीं, बल्कि शांत वातावरण में जीने की इच्छा को भी अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। 000

शुक्रवार, 25 मार्च 2022

मुझे नहीं मरना है कभी : नरेश मेहता



अब जो निश्चित रूप से अपने बारे में पता है
वह यह कि
मुझे नहीं मरना है
कभी -

कहकर घोषणा करने वाले ‘नई कविता’ के प्रमुख हस्ताक्षर नरेश मेहता का यह 'शताब्दी वर्ष' है। उनका जन्म 15 फरवरी, 1922 को मालवा के कस्बे शाजापुर में हुआ। उनका वास्तविक नाम था पूर्णशंकर। नरसिंहगढ़ की राजमाता ने उनकी काव्य प्रतिभा से प्रसन्न होकर उन्हें ‘नरेश’ उपनाम दिया था। इस उपनाम से पूर्णशंकर इतना प्रभावित हो गए कि इस नाम को अपना लिया। आगे चलकर वे नरेश मेहता के नाम से प्रसिद्ध हुए। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक जगह यह उल्लेख किया कि नरेश मेहता अपने नाम के आगे ‘श्री’ लगाना पसंद करते थे। यों, अनेक स्थलों पर उनका नाम 'श्रीनरेश मेहता' भी मिलता है।

नरेश मेहता ने काशी विश्वविद्यालय से एमए की उपाधि अर्जित की थी। विद्यार्थी जीवन से ही वे अनेक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सेना में भर्ती होकर देश के लिए संघर्ष भी किया था। आकाशवाणी में अधिकारी के रूप में नौकरी की थी। अपने प्रगतिशील विचारों के कारण 1953 में वे सरकारी नौकरी से मुक्त हो गए। उसके बाद उन्होंने निरंतर साहित्य सृजन में ही समय बिताया। इस संदर्भ में ममता मेहता का यह कथन द्रष्टव्य है - “रेडियो की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने रेडियो की या अन्य कोई नौकरी करने का विचार अपने मन से निकालकर इलाहाबाद में रहते हुए स्वयं को रचनाकर्म के लिए समर्पित कर दिया था।” (समावर्तन, सितंबर 2017, पृ.15)

नरेश मेहता के संबंध में रामस्वरूप चतुर्वेदी का कहना है कि वे प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चितेरे हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिंदी काव्य का इतिहास’ में नरेश मेहता और शमशेर बहादुर सिंह की तुलना करते हुए लिखा है कि “दोनों आरंभिक रचना-काल में मार्क्स के चिंतन को स्वीकार करते हैं, तथा लंबे समय तक साम्यवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। बाद में दोनों अध्यात्म की ओर उन्मुख होते हैं, नरेश काफी पहले विस्तार में, शमशेर महज संकेतात्मक रूप में।” (पृ.104)।

नरेश मेहता भारतीयता की अपनी गहरी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। भारतीयता के संदर्भ में केशवचंद्र वर्मा से बात करते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीयता की तलाश “स्वतंत्रता के बाद और तेज हो गई, क्योंकि तब हमें उसी रास्ते अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र की मान्यता दिलाने की बाध्यता हो गई।” (मेरे साक्षात्कार, पृ.18)

नरेश मेहता किसी भी ‘वाद’ के कटघरे में न ही अपने आपको रखते थे और न ही अपनी कविता को। वे अपनी कविता को संकीर्णता से बचाए रखना चाहते थे। बनपाखी सुनो (1957), बोलने दो चीड़ को (1962), मेरा समर्पित एकांत (1962), उत्सवा (1979), तुम मेरा मौन हो (1982), अरण्या (1985), आखिर समुद्र से तात्पर्य (1988), पिछले दिनों नंगे पैरों (1990), देखना एक दिन (1991), चैत्या (1993), समिधा (दो खंड, 2000) आदि उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह हैं। संशय की एक रात (1962), महाप्रस्थान (1965), प्रवाद पर्व (1977), शबरी (1979) और प्रार्थना पुरुष (1985) प्रसिद्ध खंड काव्य हैं। उन्होंने 1936 से कविता लिखना शुरू किया था। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के माध्यम से वे पाठकों के सामने आए। प्रभाकर श्रोत्रिय उन्हें ‘मधुकरी के कवि’ मानते थे।

काव्य एक गंभीर सृजनात्मक प्रक्रिया है। कविता को समझने के लिए पाठक को भी उसी भावभूमि में उतरना ही होगा जिस भावभूमि में कवि विराजमान है, नहीं तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। कविता के संदर्भ में नरेश मेहता का यह कथन उल्लेखनीय है - “काव्य हमारे लिए केवल मनोरंजन या तात्कालिक प्रतिक्रिया अथवा फतवेबाजी है तो काव्य की इस प्रकृति, स्वरूप और सत्ता को जानने में कोई खास परेशानी नहीं होगी, लेकिन यदि वह हमारे लिए एक गंभीर सृजनात्मक कर्म अथवा रचनात्मक दायित्व अथवा संज्ञा है जिससे हम अनिवार्य रूप से ग्रथित हैं, तो हमारी जिज्ञासा और पड़ताल का दायरा भी अधिक गहन और विशाल होगा। *** यदि काव्य की कोई मुद्रा संभव है तो वह ‘अर्धनारीश्वर’ जैसी होगी।” (चैत्या, पृ.7)

नरेश मेहता का अपना जीवन दर्शन था। उनकी पत्नी ममता मेहता ने अपनी पुस्तक ‘उत्सव पुरुष : श्रीनरेश मेहता’ में लिखा है कि अकसर नरेश मेहता यह कहते थे कि किसी बात की चिंता नहीं करनी चाहिए। उनकी इन बातों से उनकी वैचारिकता को समझा जा सकता है - ‘क्या यह काफी नहीं कि अगर चार व्यक्ति आपको गलत समझते हैं तो चार व्यक्ति आपको सही भी समझते हैं। जिस तरह प्रकृति में असंतुलन नहीं है, वैसे ही समाज में भी संतुलन बना रहता है। ऊपर वाला अपनी सृष्टि में बराबर संतुलन बनाए रखता है। प्रकृति में देखो, जहाँ विशाल पर्वत हैं, वहाँ धरती के समानांतर बहने वाली नदी है। यदि कठोर चट्टानें हैं तो मसृण माटी भी है। ऊँचे-ऊँचे विशाल देवदारु वृक्ष हैं तो छोटी-छोटी घास भी हैं। बस, ऐसा ही संतुलन समाज में भी है। हमें चिंता नहीं करनी चाहिए।’ (पृ.26-27)।

नरेश मेहता कभी भी इस बात से चिंतित नहीं होते थे कि लोग उनके बारे में क्या सोच रहे हैं और क्या कह रहे हैं। वे कभी किसी बात की सफाई नहीं देते थे। लोगों पर ही छोड़ देते थे। इस संदर्भ में ममता मेहता कहती हैं कि “असल में अपने पक्ष में, अपनी सफाई देने में इनका विश्वास ही नहीं था। साहित्यिक जीवन में भी अपने प्रति फैले भ्रम को दूर करने का इन्होंने कभी कोई प्रयत्न नहीं किया - न बोलकर, न लिखकर। इनकी मान्यता थी कि कई बार जब सामने वाला आपको गलत मान लेता है तो फिर वह आपकी हर बात को उसी नजरिए से देखता है, चाहे वह आपकी ओर से दी गई सफाई ही क्यों न हो। दुनिया की कोई सफाई आपके प्रति उसके दृष्टिकोण को उस समय तो नहीं ही बदल सकती। इसलिए उसके पीछे समय और शक्ति का अपव्यय करने की क्या आवश्यकता? अगर सामने वाले में आपके प्रति थोड़ी-सी सदाशयता होगी तो समय के साथ उसकी गलतफहमी अपने आप दूर हो जाएगी। और अगर न हो तो न सही, क्या फर्क पड़ता है।” (उत्सव पुरुष : श्रीनरेश मेहता, पृ.26)

‘हम अनिकेत’ में नरेश मेहता ने लिखा है कि “जीवन किसी भी उपन्यास से कहीं अधिक औपन्यासिक होता है।” रवींद्र कालिया से बातचीत करते हुए उन्होंने एक बार कहा था कि उनके लिए जीवन कविता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अम्बीशन्स पर उनका विश्वास नहीं। “मुझ पर जो लांछन बार-बार लगाया जाता है - वह सही भी होगा, मुझे कोई आपत्ति नहीं - कि साहब इनकी तो प्रोजेक पोएट्री है। ठीक है। बेसिकली मेरी सारी मानसिक तैयारी एक कवि की है।” (रवींद्र कालिया, स्मृतियों की जन्मपत्री, पृ.119)

नरेश मेहता मूलतः कवि हैं। उनकी कविताओं में असंख्य प्रकृति चित्रों को देखा जा सकता है। आकाश, बादल, सूरज, चाँद, नदी, झील, पर्वत, हिमालय, जंगल, आम्रछाँह, घाटियाँ, पृथ्वी, फूल, वृक्ष आदि अनेक रूपों में उपस्थित होते हैं। इस संदर्भ में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का यह कथन उल्लेखनीय है - “नरेश जी की कविता में असंख्य प्रकृति चित्रों को देखकर लगता है जैसे कवि मन पर प्रकृति का जादू है। जहाँ प्राकृतिक दृश्य आते हैं उनका वर्णन कवि बड़े उल्लास के साथ करता है।” उदाहरण के लिए देखें उनकी कविता ‘किरन-धेनुएँ’। इसमें प्रातः काल के रूपक को देखा जा सकता है, साथ ही श्रम संस्कृति को भी -

“उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला।

******

बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ’ धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।”

नरेश मेहता प्रकृति को ही सर्वोपरि मानते थे। इसीलिए वे कहते हैं -

“प्रकृति से बड़ा
कोई व्‍यक्ति नहीं होता
कोई शास्‍त्र नहीं होता, पार्थ।”

नरेश मेहता की कविता में प्रकृति ही नहीं, रिश्ते भी मुखरता के साथ विद्यमान है। उनकी कविता ‘माँ’ हृदयस्पर्शी है-

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी-
पर, जो भी
जहाँ भी लीपता होता है
गोबर के घर-आँगन,
जो भी
जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना,
जो भी
जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है
मेथी की भाजी,
जो भी
जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है
दूर तक का पथ-
वही,
हाँ, वही है माँ!!

नरेश मेहता के लिए “रचना प्रतिश्रुति है अपने भोगे हुए उस अनुभव की- जिसे हमने अपने से पृथक की प्राप्ति के लिए वाणी दी।” ‘संशय की एक रात’ में उन्होंने युद्ध और शांति की प्रतिष्ठा की है -

तुम्हें लड़ना युद्ध
अपने से नहीं
अनास्था से नहीं
संशय व्यक्तित्व से भी नहीं
असत्य से

‘संशय की एक रात’ में उन्होंने मानवीय अस्तित्व की चिंता को भी दिखाया है -

कितने ही लघु हो
इससे क्या?
सार्थक हैं।
स्वत्व है हमारा
कर्म हमारी जलती हुई आँखों में
बंधी हुई मुट्ठी में
भींचे हुए ओठों में

नरेश मेहता का मानना है कि लूट-खसोट, युद्ध, षड्यंत्र होते ही रहेंगे, तो एक दिन मानव का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। संपन्न होने का अर्थ है मनुष्य का स्वत्वहीन होना। इसी प्रकार ‘प्रवाद पर्व’ में उन्होंने राम के यथार्थवादी दृष्टिकोण को सामयिक संदर्भों से परख कर जीवन मूल्यों की स्थापना की है-

क्या यही है मनुष्य का प्रारब्ध? कि
कर्म
निर्मम कर्म
केवल असंग कर्म करता ही चला जाए?

‘महाप्रस्थान’ में नरेश मेहता ने व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न उठाने के साथ-साथ राज्य व्यवस्था में पनपते विकारों को उजागर किया है -

या उसे इतना विवश, पंगु बना दे कि
उनका अग्नि व्यक्तित्व
राज्य-व्यवस्था की निरंकुशता को कभी चुनौती न दे पाए।

नरेश मेहता के व्यक्तित्व के संबंध में ममता मेहता का यह कथन उल्लेखनीय है- “नरेश जी उस प्रजाति के व्यक्ति थे, जिस प्रजाति को रचनाकर्म संस्कार के रूप में मिला है। वे अंदर से कोमल हृदय प्रेमी जीव थे और दुख-दर्द में संघर्ष को देखते थे। उनके चिंतन का संसार असीमित था और वे बरामदे में बैठकर घंटों आसमान की तरफ देखा करते थे। उनकी मूल मानसिकता कवि की थी।” (समावर्तन, सितंबर 2017, पृ.15)।

यह सच है कि नरेश मेहता मूलतः कवि हैं पर उन्होंने गद्य साहित्य का भी सृजन किया। ‘डूबते मस्तूल’ (1954), ‘यह पथ बंधु था’ (1963), ‘धूमकेतु : एक श्रुति’ (1962), ‘नदी यशस्वी है’ (1964), ‘दो एकांत’ (1964), ‘प्रथम फाल्गुन’ (1968), ‘उत्तरकथा’ भाग-1, भाग-2 (1979 से 1982) आदि उनके उपन्यास हैं, तो ‘तथापि’ (1962), ‘एक समर्पित महिला’ (1965), ‘जलसाघर और अन्य कहानियाँ’ (1980) कहानी संग्रह। (नाटक) ‘सुबह के घंटे’ (1955), ‘खंडित यात्राएँ’ (1962), (रेडियो एकांकी) ‘सनोवर के फूल’ (1962), ‘पिछली रात की बरफ़’ (1962), (यात्रावृत्त) ‘साधु न चलै जमात’ (1991), (संस्मरण) ‘प्रदक्षिणा : अपने समय की’, (आलोचना) ‘काव्य का वैष्णव व्यक्तित्व’ (1972), ‘मुक्तिबोध : एक अवधूत कविता’ (1987), ‘शब्द पुरुष : अज्ञेय’ (1988), ‘काव्यात्मकता दिक्काल’ (1991), ‘हम अनिकेत’, (संपादन) ‘वाग्देवी’, ‘गांधी गाथा’, ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन का इतिहास’ आदि उल्लेखनीय गद्य कृतियाँ हैं।

गद्य लेखन के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए नरेश मेहता ने कहा कि “मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि कभी गद्य भी लिखूँगा। घटनाओं में अपने आपको बाँध पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है, इसलिए मेरी कहानी में कोई घटना नहीं होती।” (रवींद्र कालिया, स्मृतियों की जन्मपत्री, पृ.120)। उन्होंने अपने सृजनात्मक लेखन से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। इस योगदान के लिए उन्हें सारस्वत सम्मान (1983), मध्यप्रदेश शिखर सम्मान (1984), उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान : भारत भारती सम्मान (1985), मंगला पारितोषक (1886), साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1988) और भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1992) आदि से सम्मानित किया गया।

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करते समय उनके द्वारा दिए गए वक्तव्य के अंश को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है-

आज का मनुष्य भयाक्रांत है, इसी करण वह इतना हिंसक और आक्रांत हो उठा है कि वह सब कुछ पादाक्रांत कर डालना चाहता है। भय के वलयों में व्यष्टि और सृष्टि ही नहीं बल्कि समष्टि के अस्तित्व का भी प्रश्न उत्तरोत्तर गहराता जा रहा है। यह मदांध स्थिति आज के सर्जनात्मकता के किसी भी पूर्व काल के संकल्प और प्रतिश्रुति से भी बड़ा संकल्प और प्रतिश्रुति चाहती है। और वह तभी संभव है जब स्वयं कवि और सर्जक निर्भय हो। कवि और काव्य को अपनी इस केंद्रीयता को समझना ही होगा कि उसकी वाणी ही चैत्य-वाणी है, उसका स्वर ही आश्वस्ति का स्वर है, अतः सृष्टि के इस छंद-महोत्सव में काव्य को ही दक्षिणावर्त शंख बनना होगा।

जाने अनजाने योग दिया जिनने
वे सब वरेण्य हैं
मुझ अपात्र के निर्माता हैं
मनुज देह में वे स्मयक हैं।