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मंगलवार, 20 मई 2025

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर : योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण (7 जनवरी, 1941-9 मई, 2025) 

प्रतिष्ठित कवि, कथाकार, बाल साहित्यकार, समीक्षक, शिक्षाविद, स्तंभ लेखक और मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं प्राकृत तथा अपभ्रंश के विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ (7 जनवरी, 1941) का निधन 9 मई, 2025 को हो गया।

डॉ. ‘अरुण’ ने अपभ्रंश भाषा और जैन साहित्य के गहन अध्येता तथा व्याख्याकार के रूप में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतविद्या (इंडोलॉजी) के क्षेत्र में उल्लेखनीय तथा अविस्मरणीय योगदान किया है। इस दृष्टि से उनकी ‘अपभ्रंश’, ‘पुष्पदंत’, ‘जैन रामकाव्य और महाकवि स्वयंभूदेव प्रणीत पउमचरिउ’, ‘जैन रामायण की कहानियाँ’, ‘जैन कहानियाँ’, ‘स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र’ तथा ‘प्राकृत-अपभ्रंश इतिहास दर्शन’ जैसी कृतियाँ अपना सानी नहीं रखतीं। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

एम.ए. (हिंदी), साहित्य रत्न, पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधियों से अलंकृत डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ जीवट व्यक्तित्व के धनी थे। जैन रामकथा के अंतर्गत स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र : तुलनात्मक अनुशीलन, स्वयंभू प्रणीत ’पउमचरिउ’ में समाज, संस्कृत एवं दर्शन की अभिव्यंजना पर उन्होंने पीएचडी और डीलिट की उपाधियाँ अर्जित कीं। शंभू दयाल कॉलेज, ग़ाज़ियाबाद (मेरठ विश्वविद्यालय), बी.एस.एम. (स्नातकोत्तर) कॉलेज, रुड़की (मेरठ विश्वविद्यालय), पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज, पीलीभीत (एम.जे.पी. रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली) आदि में अध्यापन कार्य से जुड़े रहे। उनके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने शोधोपाधियाँ अर्जित कीं।

डॉ. ‘अरुण’ की सतत साधना का सम्मान करते हुए 1975 में उन्हें थियोसोफ़िकल सोसायटी, अड्यार (चेन्नई) ने यूनिवर्सल ब्रदरहुड अवार्ड प्रदान किया। अन्य अनेक सम्मानों-पुरस्कारों के अतिरिक्त उन्हें 2006 में अपभ्रंश साहित्य अकादमी, जयपुर ने ‘स्वयंभू सम्मान’ से तथा 28 जनवरी, 2019 को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने ‘भाषा सम्मान’ से अलंकृत किया। 2010 में दूसरी बार ‘स्वयंभू सम्मान’ से अलंकृत हुए। साथ ही, भारतविद्या के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने ‘स्वामी विवेकानंद पुरस्कार’, ‘तुलसी सम्मान’ और ‘विद्यानिवासमिश्र स्मृति सम्मान’ भी प्रदान किए। अन्य अनेक संस्थानों ने भी उन्हें सम्मानित कर गौरव का अनुभव किया।

अपभ्रंश साहित्य के विद्वान के रूप में प्रख्यात ‘अरुण’ जी ने मौलिक पुस्तकों के साथ-साथ अनेक संपादित पुस्तकें, अनूदित पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित करके पाठकों का मार्गदर्शन किया। ‘आशा कभी न छोड़िए’, ‘आशा जीवित है’, ‘अक्षर अक्षर हो अमर’, ‘अँधियारों से लड़ना सीखें’, ‘बहती नदी हो जाइए’, ‘जीवन-अमृत’, ‘वैदुष्यमणि विद्योत्तमा’ आदि उनकी काव्य कृतियाँ उल्लेखनीय हैं।

‘अरुण’ जी आशावादी थे। जीवन को हमेशा एक नई दृष्टि से देखते थे। परेशानियाँ हर किसी के सामने उपस्थित होती हैं। ‘अरुण’ जी ने भी इन परेशानियों का सामना किया, पर हँसते-हँसते कहते हैं – ‘परेशानियाँ बहुत हैं/ हँस कर टालो यार/ कुछ को डालो वक़्त पर/ यह जीवन का सार।’ उनके भीतर की जिजीविषा को उनकी कविताओं में तथा उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियों में भी देखा जा सकता है। वे हमेशा अपने आप पर भोरसा रखने के लिए कहते हैं क्योंकि ‘हैं जिन्हें खुद पर भरोसा, पाते हैं मंजिल वही,/ उनकी हिम्मत तो कभी, मिटती नहीं है दोस्तो।'


‘अरुण’ जी हमेशा ही मानवीय संबंधों और मूल्यों को महत्व देते थे। वे जहाँ भी जाते थे वहाँ के लोगों से एक आत्मीय रिश्ता बना लेते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। वे सबके दुख-दर्द में शामिल हो जाते थे। वे अपने दिल का दरवाजा खोलकर सबके दर्द को अपना समझकर आगे बढ़ते थे और लोगों को ढाढ़स बँधाते थे – ‘दिल का दरवाजा खुला है, आइए, आ जाइए/ हम भी बंदे आपके हैं, यह यकीं ले आइए।’ ‘सबका दर्द समझकर् अपना, सहते आए सदा से हम/ नश्वर जग को अपना ही घर, कहते आए सदा से हम।’

‘अरुण’ जी अपने आसपास के वातावरण को प्रेममय बना ही डालते थे। वे कबीर की इस उक्ति को बार-बार दोहराते थे और आज के इस अमानवीय संसार को देखकर चिंतित होते हुए कहते थे– ‘पढ़ी किताबें सारी हमने, ‘ढाई आखर’ भूल गए/ दौलत कर झूले पर देखो, दुनिया वाले झूल गए।’ वे ढाई आखर प्रेम को अत्यंत महत्व देते हैं, क्योंकि आज दुनिया में हर व्यक्ति मुखौटा पहनकर जी रहा है, ऐसे में सच्चा प्यार मिलना मुश्किल है। अतः अरुण जी कहते हैं कि ‘प्यार जहाँ मिलता सखे,/ जाएँ वहाँ जरूर।/ प्यार अनूठी चीज़ है,/ तोड़े व्यर्थ गुरूर।’

आज दुनिया लोभ और स्वार्थ से भरी हुई है। ऐसी स्थिति में प्रेम, भाईचारा आदि गायब ही हो जाते हैं। ‘अरुण’ जी लोभ को मनुष्य का परम शत्रु मानते थे और धैर्य को अस्त्र बनाने के लिए कहते थे, ताकि इस लोभ को जीता जा सके – ‘लोभ महा शत्रु मनुज का,/ इससे लड़ा न जाय।/ लोभ शत्रु को जीतो सखे,/ धैर्य को अस्त्र बनाय।’

आज सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हर एक के पास धन-दौलत, सोना-चाँदी, ऐश्वर्य के अनेकानेक साधनों की बाढ़ है, लेकिन संवेदनाएँ खो गई हैं, लगता है मर-सी गई हैं। ‘अरुण’ जी इससे चिंतित रहते थे। अतः उनकी रचनाएँ हमें इस संकट से रू-ब-रू कराती हैं। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘अब बचाना आदमीयत, हो गया अनिवार्य-सा/ वरना सब कुछ खत्म खुद ही, आदमी कर जाएगा।’

यह नफ़रतों का दौर है। मूल्यों का ह्रास चरम पर है। नफरत, छल, कपट, बेईमानी, ईर्ष्या आदि का साम्राज्य चारों तरह फैल रहा है। ‘अरुण’ जी यह प्रश्न उठाते हैं कि ‘नफ़रतों का दौर ये कब तक चलेगा/ आदमी खुद को भला कब तक छलेगा?’ इस तरह की स्थितियों में सामान्य जनता का निराश होना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। इसी तर्ज पर निराशा की घड़ी में भी आशा को जगाए रखने की हिम्मत देते हुए वे कहते हैं कि ‘हो निराशा की घड़ी गहरी भले ही/ दृढ़ इरादा है तो हर रास्ता फलेगा।’ अरुण जी के भीतर अपार आत्मविश्वास और जिजीविषा गुँथी हुई मिलती हैं। अपने जीवनकाल में उन्होंने तमाम उलझनों को हँसते हुए झेला। विकट परिस्थितियों में भी वे टूटे नहीं बल्कि कुंदन की तरह तपकर सोना बन गए – ‘तपकर ही कुंदन बनता है, सोना इस दुनिया में,/ आ जाती वो आभा दुनिया जिसकी दीवानी है।’

‘अरुण’ जी बच्चों को बहुत पसंद करते थे। अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ‘मेरा बचपन संघर्षों का साक्षी रहा, जिन्होंने कभी-कभी तो मेरी कल्पनाओं को चूर-चूर करके रख दिया, लेकिन बचपन में ही सौभाग्य से मुझे स्वामी विवेकानंद का जीवन-दर्शन पढ़ने को मिला, जिसने मेरी लहूलुहान हुई कल्पनाओं में कब हिम्मत, साहस और आशा को अमृत-सा मरहम लगाकर मुझमें जूझने की ताकत भर दी, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे हर सफलता संघर्षों के बाद, निराशा के जंगल में बिछे कष्ट के नुकीले काँटों से जूझ कर ही मिली है।’ इसीलिए उनकी रचनाओं का मूल स्वर हिम्मत से आगे बढ़ने और निराशा के घटाटोप में एक दीपक जलाए रखने की उत्कट अभिलाषा का रहा है। इसीलिए वे कहते हैं – ‘जीवन में अब अभाव को, अड़चन न मानिए/ साधन अगर नहीं हैं तो साधन बनाइए।’ ‘कोई काम नहीं है मुश्किल, अगर इरादा पक्का/ पर्वत झुक जाते हैं आगे, मंजिल सब मिल जाएँ।’

‘अरुण’ जी कहा करते थे कि मृत्यु जीवन का परम सत्य है। जिस तरह जीवन को खुशी-खुशी अपनाते हैं, उसी तरह मृत्यु को भी अपनाना चाहिए। भारतीय संस्कृति का सूत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय...’ उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है। बहुत बार मृत्य उनके निकट आई लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण हार मानकर चुपचाप चली गई। परंतु इस बार 9 मई को मृत्यु दबे पाँव आई और जीत हासिल करके चली गई। ‘अरुण’ जी ने मृत्यु को भी हँसते-हँसते स्वागत किया।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा विशेष रूप से हैदराबाद शाखा के प्रति ‘अरुण’ जी का रुझान अविस्मरणीय है। 2015 में जब ‘मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' : अर्धशती समारोह' विषयक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हैदराबाद शाखा द्वारा किया गया था, उस वक्त हृदयाघात से पीड़ित होने के बावजूद, डॉक्टरों से अनुमति लेकर वे उस समारोह में पहुँचे और अपने साथ डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को भी हैदराबाद ले आए। तीनों दिन सुबह से लेकर शाम तक चर्चा-परिचर्चा में भाग लिए और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किए। ऐसे जीवट व्यक्ति थे ‘अरुण’ जी। उनके मार्गदर्शन में हैदराबाद सभा में अनेक ऐसी संगोष्ठियों का आयोजन किया गया है।

‘स्रवंति’ पत्रिका के साथ ‘अरुण’ जी का विशेष लगाव था। पत्रिका में उनकी रचनाएँ नियमित प्रकाशित हुईं हैं। कविता, गीत, गजल आदि के साथ-साथ उनके समसामयिक विचार समय-समय पर प्रकाशित हुए। ‘स्रवंति’ का नया अंक मिलते ही वे एक संदेश अवश्य भेजते थे उस अंक से संबंधित। उनकी टिप्पणी बहुत ही महत्वपूर्ण होती थी, पत्रिका की गुणवत्ता को बनाए रखने में। यदि अंक प्रकाशित होने में विलंब हो जाता, तो फोन करके विलंब का कारण पूछ ही लेते थे। 


‘अरुण’ जी सही अर्थों में ‘स्रवंति’ पत्रिका के परामर्शदाता हैं। ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को उनकी ही बातों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ –
मर गए तो किसने देखा, बादशाहों की तरफ
गीत लेकिन हम फकीरों का जमाना गाएगा

मौत उनकी है जो दुनिया लूटने को आए हैं
बाँट कर अमृत जगत में तू अमर हो जाएगा

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर
बाद तेरे नाम तेरा यह जहाँ दोहराएगा

शुक्रवार, 7 जून 2024

भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?


जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

इन पंक्तियों को पढ़कर क्या कोई पाठक सहज ही अनुमान नहीं लगा सकता है कि इन पंक्तियों के रचनाकार कौन हैं? इन पंक्तियों को पढ़कर पंत, बच्चन, भगवती चरण वर्मा अथवा शमशेर का नाम ले भी सकते हैं; लेकिन ये पंक्तियाँ ‘क्रांतिकारी की कथा’ कहने वाले भोलाराम के जीव की ओर सबका ध्यान खींचने वाले व्यंग्य को विधा के रूप में दर्जा दिलाने वाले व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की हैं।

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 को होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में हुई। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे नागपुर गए। अध्ययन के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र में उतरे, लेकिन बाद में नौकरी करने के बजाय लेखक बनकर जीवनयापन करना श्रेयस्कर समझा। हिंदी ही नहीं, किसी भी भाषा में महज लेखन के माध्यम से आजीविका जुटाना आसान काम नहीं है। लेकिन परसाई जी जीवनपर्यंत अपने निर्णय पर अटल रहे। उन्होंने ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। यह पत्रिका उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वे अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से गौरवान्वित हुए।

परसाई जी के साहित्य का केंद्रीय तत्व है व्यंग्य। उनकी साहित्यिक कृतियों में कहानी, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार आदि विधाओं का समुच्चय देखा जा सकता है। आमतौर पर व्यंग्य को एक शैली के रूप में देखा जाता था, लेकिन हरिशंकर परसाई ने उसे एक अलग स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया। आस-पास घटित घटनाओं एवं व्याप्त विसंगतियों को देखकर जब कोई व्यक्ति भीतर से उद्वेलित हो उठता है, तो उसकी कलम से ‘सदाचार का ताबीज’, ‘बेईमानी की परत’, ‘न्याय का दरवाजा’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘आवारा भीड़ के खतरे’, ‘हरिजन को पीटने का यज्ञ’ जैसी रचनाओं का सृजन स्वाभाविक है। इस संबंध में श्रीलाल शुक्ल का यह कथन उल्लेखनीय है – “परसाई विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सुस्पष्ट विचारों को आधार बनाकर उन्होंने राजनीतिक व्यंग्य को एक खास दिशा दी और गुणवत्ता में नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं।” (श्रीलाल शुक्ल, कुछ साहित्य चर्चा, पृ.216)

हरिशंकर परसाई की लेखन शैली नितांत निजी है। वे यह नहीं मानते कि साहित्य सृजन के लिए किसी पारंपरिक ढाँचे को ही अपनाना पड़ेगा। वे तो रूढ़ियों को तोड़ने पर बल देते थे। वे हमेशा यही कहा करते थे कि ‘सत्य शुभ हो, अशुभ हो, काला हो, सफेद हो – साहित्य उसी से बनता है।’ (हरिशंकर परसाई, देश के लिए दीवाने आये)। परसाई आम आदमी की जिंदगी में व्याप्त विसंगतियों से इस कदर बेचैन हो उठते हैं कि उनका अंतस कराह उठता है। उन्होंने स्वयं कहा है कि “मैं निहायत बेचैन मन का घोर संवेदनशील आदमी हूँ। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता। इसलिए गर्दिश नियति है।” (सं. कमलेश्वर, गर्दिश के दिन, पृ.128)।

हिंदी साहित्य को धारदार व्यंग्य के माध्यम से समृद्ध करने वाले, पाठकों को हँसाने वाले, चुटकी लेने का मौका न छोड़ने वाले हरिशंकर परसाई के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानना हो तो उनके द्वारा लिखी हुई उनकी कहानी को ही पढ़ना होगा। जी हाँ! परसाई की कहानी अपनी जुबानी! (उनके इस बयान के सब सूत्र ‘गर्दिश के दिन’ में छिपे हैं।) तो, सुनिए!

मैं हरिशंकर परसाई! एक शताब्दी के बाद आपके सामने आ रहा हूँ। ‘घायल बसंत’ को देखकर डर गया था। इसलिए ‘भोलाराम का जीव’ बनकर अपने आपको छुपा लिया था। ‘ठिठुरता गणतंत्र’ को देखकर ‘शिकायत मुझे भी है’, लेकिन क्या कर सकता हूँ! लाचार हूँ न! यहाँ तो सबकी ‘अपनी अपनी बीमारी’ है। सब के सब ‘भेड़ें और भेड़िये’ ही तो हैं। ‘बेईमानी की परत’ खोलने में सफल हो सकता हूँ क्या? ‘तुलसीदास चंदन घिसें’ तो मैं क्या ‘तिरछी रेखाएँ’ नहीं खींच सकता! करना तो बहुत कुछ चाहता हूँ। करने के लिए इस संसार में बहुत कुछ है, लेकिन जब जब मैं ‘पाखंड का अध्यात्म’ देखता हूँ तब तब बेचैन हो उठता हूँ। मेरी अंतरात्मा पुकारने लगती है ‘सुनो भाई साधो’। पर मेरी आवाज जनता तक नहीं पहुँचती। ‘एक मध्यवर्गीय कुत्ता’ कर क्या सकता है भला! सोच रहा हूँ कि ‘जैसे उनके दिन फिर’ मेरे भी फिरेंगे। ‘सुदामा का चावल लेकर ‘बस की यात्रा’ करूँगा और ‘क्रांतिकारी की कथा’ लिखूँगा पर ‘समझौता’ नहीं करूँगा।

यादें तो मेरे पास बहुत हैं। आपकी दिलचस्पी किस बात में है? क्या आप जानना चाहते हो कि हरिशंकर परसाई नामक यह आदमी जो हँसता है, मस्ती करता है, जो तीखा है, कटु है – इसकी अपनी जिंदगी कैसी है? यह कब गिरा? कब उठा? कैसे टूटा? कैसे फिर से जुड़ा? जानने की इच्छा है! मैं तो एक निहायत कटु निर्मम और ‘धोबीपछाड़’ आदमी हूँ। बचपन में मुझे जिस घटना ने तोड़ा, पहले उसके बारे में ही बताऊँगा। बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। शायद 1936 या 37 होगा। उस वक़्तशायद मैं आठवीं में पढ़ रहा था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में रहने चली गई थी। हम नहीं गए थे। माँ सख्त बीमार थी। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। सब लोग जा चुके थे। कस्बा वीरान हो चुका था। भाँय-भाँय करते पूरे आसपास में हमारे घर में ही चहल-पहल थी। काली रातें। इनमें हमारे घर जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गए थे। ऐसी स्थिति में तो रात के सन्नाटे में हमारी ही आवाजें हमें डरावनी लगती थीं। वह रात भयंकर थी। उसे याद कर रहा हूँ, तो आज भी मेरी आत्मा काँप रही है। मरणासन्न माँ के सामने हम आरती गा रहे थे। गाते गाते पिताजी सिसकने लगे, माँ बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपका रही है और हम रो रहे हैं। यह रोज रोज की बात हो गई। पिताजी, चाचा जी और एक-दो रिश्तेदार लाठी-बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूमकर पहरा देते। ऐसे भयंकर वातावरण में एक रात माँ हम सब को बिलखते छोड़कर कहीं दूर चली गई। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया। कुत्ते भी सिमटकर आ गए कहीं से योगदान देने। पाँच भाई-बहनों में माँ की मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था – सबसे बड़ा जो हूँ! प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं। जिस आतंक, निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे, उसके सही अंकन के लिए हिम्मत चाहिए। हममें से कोई इस कदर टूटे नहीं थे, जिस कदर पिताजी टूटे थे।

दिन बीतते गए। मैं पढ़ाई और नौकरी में व्यस्त हो गया। मेट्रिक हुआ कि नहीं जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता था। चूहे, बिच्छू और साँपों ने खूब काटा, लेकिन ज़हरमोहरा मुझे शुरू में ही मिल गया था। इसलिए ‘बेचारा परसाई’ का मौका ही नहीं आने दिया। मुझे दिखाऊ सहानुभूति से बेहद नफरत है। अभी भी है। दिखाऊ सहानुभूति दिखाने वालों को चाँटा मार देने की इच्छा होती है। फिर स्कूल में मास्टरी की थी। टीचिंग ट्रेनिंग और फिर नौकरी की तलाश। पिताजी अपनी अंतिम साँसें गिन रहे थे। परिस्थितियों के कारण मैं अनिश्चय में जी लेना सीख ही गया।

मैं बहुत भावुक, संवेदनशील और बेचैन तबीयत का आदमी हूँ। सामान्य स्वभाव का आदमी ठंडे-ठंडे जिम्मेदारियाँ भी निभा लेता है। दुनिया से तालमेल भी बिठा लेता है। व्यक्तित्वहीन नौकारीपेशी आदमी की तरह जिंदगी साधारण संतोष से भी गुजार लेता है। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मैं अपने व्यक्तित्व और चेतना की रक्षा करने में जुट गया। तब मैंने सोचा ही नहीं था कि लेखक बनूँगा। पर मैं अपने विशिष्ट व्यक्तित्व की रक्षा तब भी करना चाहता था। मैंने अपने आपको समझाया – हे परसाई! किसी से मत डरो! ‘भीतर तुम जो भी हो, जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी के साथ निभाओ। यदि जिम्मेदारी के साथ निभाओगे तो नष्ट हो जाओगे।’ अपने से बाहर निकल आओ। दुनिया देखो, समझो और हँसो!

मैं डरा नहीं। ‘लोगों से नहीं डरा, तो नौकरियाँ गईं। लाभ गए, पद गए, ईनाम गए। पहले अपने दुखों के प्रति सम्मोहन था। अपने आपको दुखी मानकर मनवाकर आदमी राहत भी पा लेता है। बहुत लोग अपने लिए ‘बेचारा’ शब्द सुनकर संतुष्ट हो जाते हैं। अपार आनंद का अनुभव करने लगते हैं। मुझे भी पहले ऐसा ही लगा। आखिर मैं भी एक साधारण इंसान ही तो हूँ। पर मैंने आस-पास देखा। तब मुझे लगा ‘इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा! इतने विकट संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष!’ इन सब परिस्थितियों के बीच मेरे भीतर लेखक कैसे जन्मा यह सोचता हूँ तो कुछ सूझता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैंने दुनिया से लड़ने के लिए लेखन को एक हथियार के रूप में अपनाया। इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा। ‘अपने को अविशिष्ट होने से बचाने के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया। पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दुख के जाल से निकल गया।’ इस संसार में दुखी, अन्याय से पीड़ित तथा शोषित और भी हैं। अतः मैंने अपने आपको विस्तार दिया। मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना संपन्न हूँ। यहीं से व्यंग्य लेखक ‘पर-साई’ का जन्म हुआ।

इस संसार में सर्वत्र मनुष्य किसी न किसी रूप में संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ‘मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता।’ पाप से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य छटपटाता रहता है। पर बड़ी लड़ाई केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। ‘अकेले वही सुखी हैं जो लड़ना ही नहीं चाहते। न उनके मन में सवाल उठते हैं, न शंका उठती है। ये जब-तब सिर्फ शिकायत कर लेते हैं। शिकायत भी सुख देती है। और वे ज्यादा सुखी हो जाते हैं।’ कबीर ने ठीक ही कहा है – ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै/ दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।’ जागने वाले का रोना कभी खत्म नहीं होता। व्यंग्य लेखक की गर्दिश भी कभी खत्म नहीं होगी। मेरी गर्दिश सौ सालों के बाद भी ताजा है। इस भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

2024! हरिशंकर परसाई का जन्मशताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर उनको याद करके उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ। 

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

गुमनामी के अँधेरे में से रा यात्री की यात्रा

साहित्यिक जगत में से रा यात्री के नाम से प्रसिद्ध सेवा राम अग्रवाल 17 नवंबर, 2023 को कभी न लौटने वाली महायात्रा पर प्रस्थान कर गए। उत्तर प्रदेश के जनपद मुज़फ़्फ़रनगर के गाँव जड़ोदा में 1933 में जन्मे सेवा राम की साहित्यिक यात्रा कविताओं के माध्यम से शुरू हुई थी। उसके बाद यह यात्रा तेज गति चलती रही। उनकी पहली कहानी है ‘गर्द गुबार’ जो प्रसिद्ध कहानी पत्रिका ‘नई कहानी’ में प्रकाशित हुई और पहला कहानी संग्रह है ‘दूसरे चहरे’ (1971)। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मुजफ्फरनगर में हुई। तत्पश्चात आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान (1955) और हिंदी साहित्य (1957) में एम.ए. की उपाधि अर्जित की। सागर विश्वविद्यालय से शोधकार्य संपन्न करके उन्होंने अपनी आजीविका अध्यापन से शुरू की।

से रा यात्री प्रसाद, महादेवी वर्मा, निराला, पंत, बच्चन और नरेंद्र शर्मा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों से प्रभावित थे। वे बेहद संवेदनशील कथाकार थे। समसामयिक सामाजिक एवं राजनैतिक परिदृश्य को देखकर वे चिंता व्यक्त करते थे। उनका व्यक्तिव बहुत सरल था। उनकी सरलता एवं सादगी का एकमात्र कारण यह है कि वे जमीन से जुड़े साहित्यकार थे। कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य और संस्मरण विधाओं में उन्होंने अपनी लेखनी चलाई।

से रा यात्री सचमुच साहित्य के ‘सेरा’ (शेरा) थे। उनकी किताबों का संसार विशाल है। उनकी लेखनी से दराजों में बंद दस्तावेज, लौटते हुए, कई अँधेरों के पार, अपरिचित शेष, चाँदनी के आरपार, बीच की दरार, टूटते दायरे, चादर के बाहर, प्यासी नदी, भटका मेघ, आकाशचारी, आत्मदाह, बावजूद, अंतहीन, प्रथम परिचय, जली रस्सी, युद्ध अविराम, दिशाहारा, बेदखल अतीत, सुबह की तलाश, घर न घाट, आखिरी पड़ाव, एक जिंदगी और, अनदेखे पुल, कलंदर, सुरंग के बाहर जैसे उपन्यासों का सृजन हुआ। साथ ही केवल पिता, धरातल, अकर्मक क्रिया, टापू पर अकेले, दूसरे चेहरे, अलग-अलग अस्वीकार, काल विदूषक, सिलसिला, खंडित संवाद, नया संबंध, भूख तथा अन्य कहानियाँ, अभयदान, पुल टूटते हुए, विरोधी स्वर, खारिज और बेदखल, परजीवी जैसे कहानी संग्रहों में संकलित कहानियाँ पाठकों को सोचने पर बाध्य करती हैं। किस्सा एक खरगोश का, दुनिया मेरे आगे उनके प्रमुख व्यंग्य संग्रह हैं। लौटना एक वाकिफ उम्र का संस्मरण है। वे सफल संपादक भी थे। उन्होंने मासिक ‘वर्तमान साहित्य’ का सफल संपादन किया था। इतनी महत्वपूर्ण कृतियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के बावजूद यात्री जी कहते हैं कि ‘मैं मैं को नहीं लिख पाया। यहाँ आकर मेरी शक्ति खत्म हो गई। जहाँ मुझे स्वयं को लिखना था... ये जो मैंने सब लिखा है, ये तो दिशांतर है।’

से रा यात्री अनेक सम्मानों से सम्मानित हुए। जैसे राजस्थान पत्रिका, जयपुर द्वारा वर्ष 1998 में ‘विरोधी स्वर’ कहानी के लिए पुरस्कृत हुए। राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, डूंगरगढ़, राजस्थान द्वारा 1993 में ‘साहित्यश्री’ सम्मान से अलंकृत हुए। सावित्री देवी चैरिटेबल ट्रस्ट, गाजियाबाद द्वारा 1986 में पुरस्कृत हुए। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा कथा संग्रह ‘धरातल’ (1979), ‘सिलसिला’ (1980), ‘अकर्मक क्रिया’ (1980), ‘अभयदान’ (1979) तथा संस्मरण ‘लौटना एक वाकिफ उम्र का’ (1998) के लिए पुरस्कृत हुए। यात्री जी 2006 में साहित्य भूषण, 2007 में समन्वय द्वारा सारस्वत सम्मान, 2011 में महात्मा गांधी साहित्य सम्मान तथा 2017 में पीटरबर्ग्स अमेरिका के सेतु शिखर सम्मान से भी अलंकृत हुए।

यात्री जी ने भले ही अपनी साहित्यिक यात्रा कविता से शुरू की, लेकिन बहुत जल्दी ही उसकी सीमा को देखते हुए उन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया। उसके बाद उपन्यास, संस्मरण आदि एक के बाद एक लिखते रहे। उनके कवि रूप को उनकी कहानियों और उपन्यासों में भी जीवित देखा जा सकता है। उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की है। यात्री जी का जीवन बहुत ही सरल और पारदर्शी रहा। उनके बाह्य व्यक्तित्व का रेखाचित्र रवींद्र कालिया ने कुछ इस तरह खींचा है – ‘ऊँचा कद, गोरा रंग, काले बाल, चोगे की तरह लंबा घुटनों से नीचे तक सफेद कुर्ता, ढीला पायजामा, कंधे पर समाजवादी झोला, पीछे-पीछे कुत्तों की लंबी कतार, गाजियाबाद की किसी सड़क पर लंबे-लंबे डग भरता हुआ ऐसा कोई आदमी दिखाई दे जाय तो समझ लेना लीजिए, वह कहानीकार से रा यात्री है।’ (रवींद्र कालिया, कॉमरेड मोनालिज़ा तथा अन्य संस्मरण, पृ. 178)। यात्री जी अपने झोले में रोटी के टुकड़े रखते और उन टुकड़ों को रास्ते में कुत्तों को खिलाते। यह उनकी आदत थी। इसीलिए उनके पीछे कुत्तों की लंबी कतार लगी रहती। रवींद्र कालिया उन्हें ‘एक खुली किताब’ मानते हैं। यात्री जी उन ‘अनसंग हीरोज़’ के समान हैं जिनके बारे में लोग बहुत ही कम चर्चा करते हैं। उन्होंने कभी भी यह नहीं चाहा कि लोग उनकी तारीफ के पुल बाँधें। उन्होंने तो मस्त कलंदर की तरह ज़िंदगी बिताई थी।

यात्री जी की रचनाओं में समाज के हर तबके के दर्द को देखा जा सकता है। बच्चों की मानसिकता से लेकर वार्धक्य तक की स्थितियों को यात्री जी ने बखूबी उकेरा है। ‘दराजों में बंद दस्तावेज’ उनका पहला उपन्यास है। इसमें नायक-नायिका के मानसिक द्वंद्व का चित्रण है। ‘लौटे हुए’ में जीवन मूल्यों का निरूपण है। ‘दरारों के बीच’ में बेरोजगारी का चित्रण है। ‘कई अँधेरों के पार’ में मध्यवर्गीय मानसिकता है। ‘आत्मदाह’ में युवा पीढ़ी की पलायन करने की प्रवृत्ति को उजागर किया गया है। ‘उखड़े हुए’ शीर्षक कहानी में शिक्षण संस्था की आड़ में चल रहे शोषण-चक्र का खुलासा किया गया है। ‘किस्सा कोताह’ कहानी में अध्यापकों के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के प्रति कटाक्ष है तो ‘उजरत’ कहानी विद्यार्थी जीवन का दस्तावेज है। ‘जोंक’ में संकीर्ण मानसिकता का चित्रण है। इस प्रकार हर रचना में एक नई समस्या को देखा जा सकता है। उनकी रचनाओं के पात्र हमारे इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं। कभी-कभी तो हम स्वयं एक पात्र बनकर उपस्थित हो जाते हैं।

आज के रचनाकारों के संदर्भ में से रा यात्री का कहना है कि ‘...जोखिम नहीं है। लेखन के लिए एक प्रतिबद्धता होती है, कमिटमेंट होता है। विद आउट कमिटमेंट आप हैं कहाँ? ढोल है…। आज सबसे बड़ी कमी लेखन में कमिटमेंट की है। मैं जोखिम उठाता हूँ और अपने लेखन में रेखांकित करता हूँ।  सारे आजादी के जमाने की जो जद्दोजहद स्टैंड करती है… व्हाई गांधी स्टुड… गांधी क्यों खड़े रहे गए? गांधी इसलिए खड़े रह गए कि उनका शायद मंत्र था। आज कोई मंत्र नहीं है।’

आज संवेदनशून्यता हर दिशा में फैली हुई है। अपने काम के प्रति कमिटमेंट तो है ही नहीं। एक साक्षात्कार में जब उनसे यह पूछा गया कि क्या कोई और आप के बारे में उस तरह लिख सकते हैं जिस तरह आप चाहते हों तो उन्होंने कहा कि ‘मुझ पर 35 लोगों ने पीएचडी की है, लेकिन सब खोखलापन है। ‘उजरत’ कहानी का किसी ने कोई जिक्र नहीं किया। 35 स्कॉलर्स में से... एक ने भी जिक्र नहीं किया ‘उजरत’ का।’ ‘उजरत’ कहानी विद्यार्थी जीवन का जीवंत दस्तावेज है। ‘कितने बचने की कोशिश है, कितना सामने आने का जज्बा है, दोनों चीजें हैं इस कहानी में।’ उनकी बातों में एक संदेश और उनकी चिंता स्पष्ट रूप से मुखरित है। वह यह है कि आज के शोधार्थी महज उपाधि पाने के लिए काम कर रहे हैं, न कि कमिटमेंट से। फिर ऐसी उपाधि किस काम की! एक अलंकरण मात्र!!

आज की पीढ़ी को संदेश देते हुए यात्री जी कहते हैं कि ‘खूब पढ़ना चाहिए। क्लासिक पढ़ना चाहिए। प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए। रेणु को पढ़ना चाहिए। हिमांशु श्रीवास्तव को पढ़ना चाहिए। दिनकर की कविता पढ़नी चाहिए। 34 साल की उम्र में मेरी पहली कहानी छपी ‘धर्मयुग’ में। आज 34 साल की उम्र में 34 किताबें छप जाती हैं।’ हममें ऐसे कितने लोग हैं जो इन रचनाकारों को पूरा पढ़ पाए! पढ़ने का अर्थ यह नहीं कि किताबों के पन्नों को पढ़ लिया। यहाँ पढ़ने का अर्थ है उन किताबों में निहित संवेदनशील तत्वों को ग्रहण करना और अपने जीवन में उतारना। हम ऐसा नहीं करते। ऐसा करने के लिए समय किसके पास है! भागदौड़ की जिंदगी में हम अपने आपसे कटते जा रहे हैं।

सामाजिक विसंगतियों से विचलित यात्री जी हमेशा बेचैन रहे। अपने अंतिम दिनों में भी उनके अंदर यही बेचैनी थी, यही चिंता थी। 16 नवंबर, 2023 को से रा यात्री को अपनी सृजन यात्रा के लिए ‘दीपशिखा’ सम्मान से अलंकृत करने की घोषणा हुई। इस घोषणा के 24 घंटे में ही यात्री जी ‘कई अँधेरों के पार’ ‘गुमनामी के अँधेरे में’ ‘आखिरी पड़ाव’ पर पहुँचकर कभी वापस न लौटने की यात्रा पर निकल पड़े। जन सरोकारों के इस अप्रतिम यात्री को ‘स्रवंति’ की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है! 

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

सरलता का अपनापन!


छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी, 1889 - 15 नवंबर, 1937) कवि के साथ-साथ नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंध लेखक तथा संपादक थे। रामविलास शर्मा के अनुसार वे छायावाद के पहले कवि हैं। प्रसाद एक ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए साध्य को ही मुख्य मानते हैं। यही बात उन्होंने ‘चंद्रगुप्त’ नाटक में चाणक्य के मुख से कहलवाई है। प्रसाद ने जहाँ एक ओर गंभीर ऐतिहासिक साहित्य का सृजन किया है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति, देशप्रेम आदि का चित्रण बखूबी किया है। उनकी कहानियों में साहस-युक्त बाल चरित्र को भी देखा जा सकता है।

हर मनुष्य को बचपन की स्मृतियाँ आह्लादित करती हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बात करें तो जन्म से लेकर किशोरावस्था तक का समय बचपन कहलाता है। सामान्य रूप से कहें तो यह वह समय है जब मनुष्य बिना किसी भेद-भाव के, बिना किसी राग-द्वेष के हँसी-खुशी समय व्यतीत करता है। यह वह सुनहरा समय है जो जिंदगी को तनाव-मुक्त रखता है। इस अवस्था में न तो तनाव के बारे में पता रहता है और न ही सामाजिक विसंगतियों का ज्ञान रहता है। यदि कुछ होता है तो वह है सिर्फ और सिर्फ अल्हड़ खेल। उसी में नन्हे बच्चे भाव विभोर होकर नाचते हैं, गाते हैं, किलकते हैं, खिलखिलाते हैं। अपने चारों ओर खुशियों की सुगंध फैलाते हैं। यदि कहें कि बचपन सबसे मधुर और अविस्मरणीय क्षणों का पुंज है, तो गलत नहीं होगा। इसीलिए शायद जयशंकर प्रसाद भी कह गए - ‘तुम्हारी आँखों का बचपन!/ खेलता था जब अल्हड़ खेल,/ अजिर के उर में भरा कुलेल,/ हारता था हँस-हँस कर मन,/ आह रे वह व्यतीत जीवन!/ तुम्हारी आँखों का बचपन!/ साथ ले सहचर सरस वसंत,/ चंक्रमण करता मधुर दिगंत,/ गूँजता किलकारी निस्वन, पुलक उठता तब मलय-पवन/ तुम्हारी आँखों का बचपन!’ क्या आज भी ऐसा बचपन बचा हुआ है! यह तो सोचने की बात है। ‘आज भी है क्या नित्य किशोर-/ उसी क्रीड़ा में भाव विभोर-/ सरलता का वह अपनापन-/ आज भी है क्या मेरा धन!/ तुम्हारी आँखों का बचपन!’

सांसारिक दाव-पेंच के दबाव के कारण आज असमय ही बालकों का बचपन छिनता जा रहा है। बहुत बार परिस्थितियों के कारण किसी नन्ही सी जान को परिवार की जिम्मेदारी तक अपने कंधों पर उठानी पड़ जाती है। इस विसंगति को अपने समय में जयशंकर प्रसाद ने भी महसूस किया था। उनकी कहानी ‘छोटा जादूगर’ में यह दिखाया गया है कि एक छोटा सा बच्चा कितना हिम्मती है। वह परिस्थितियों का सामना साहस के साथ करता है। एक राहगीर से मेले में उसकी मुलाकात होती है। जब वह व्यक्ति उस छोटे से बच्चे के माता-पिता के बारे में पूछता है, तो वह कहता है कि ‘बाबूजी जेल में हैं’ देश के लिए और माँ बीमार। पिता के जेल जाने के बावजूद वह टूटता नहीं और अपनी बीमार माँ का भी ध्यान रखता है। जब वह राहगीर कहता है कि ऐसी परिस्थिति में वह तमाशा देख रहा है, तो वह झट से कहता है, ‘तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शर्बत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती!’ (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग iv, पृ. 264)। ऐसा कह पाना सबके लिए आसान नहीं। यह वही बहादुर बच्चा कह सकता है जिसने जिंदगी के खट्टे-मीठे लम्हों को जिया हो।

आजकल परिस्थितियों के कारण बच्चे जल्दी ही चतुर और सांसारिक बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया के कारण बच्चों का बचपन गुम होता जा रहा है। मासूमियत कोसों दूर है। प्रसाद जी के ज़माने में सोशल मीडिया तो न था, लेकिन राष्ट्र और समाज की परिस्थितियाँ अति विषम थीं। इसीलिए उन्होंने लिखा, ‘बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।’ (वही)। छोटा जादूगर छोटी उम्र में बीमार माँ के इलाज के लिए रास्ते में लोगों को जादू दिखाकर पैसा कमाने का काम करता है। जब उसकी माँ अंतिम साँसें ले रही होती है, तब भी वह जादू दिखाने चल पड़ता है। यह अंश पढ़ते समय पाठक द्रवित हुए बिना नहीं रह सकते।

‘छोटा जादूगर’ कहानी पढ़ते समय मानो ऐसा लगता है कि जयशंकर प्रसाद स्वयं पात्र बनकर उपस्थित हैं जो बाल मन को समझने का प्रयास कर रहे हैं। मेले में जब बच्चा जाता है, तो वहाँ चीजों को देखकर उसका मन ललचाता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन मेले में जाने के बावजूद बच्चा खिलौने या फिर मिठाइयों को खरीदने के बजाय, तमाशा देखने के बजाय घर-परिवार के बारे में, घर की जरूरतों के बारे में सोचता हो, तो तनिक रुक कर सोचना पड़ेगा। ‘छोटा जादूगर’ कहानी के बाल पात्र को भी मेले की चीजें अच्छी लगती हैं। वह कहता है - ‘मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।’ (वही, पृ. 266)। यह सब उस बच्चे ने बड़े गर्व और आत्मविश्वास के साथ कहा। जब वह बोल रहा था तब उसकी वाणी में कहीं भी रुकावट नहीं थी। यह उसके आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह मातृ-प्रेम को दर्शाने वाली अद्वितीय कहानी है। इस कहानी में जयशंकर प्रसाद ने परोक्ष रूप से स्वाधीनता संग्राम में जेल जाने वाले एक पात्र का उल्लेख किया है।

बच्चे मन के सच्चे होते हैं। छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाते हैं। उसी तरह छोटी सी बात पर दुखी भी हो जाते हैं, रूठते भी हैं, हंगामा भी करते हैं। कहने का अर्थ है कि बच्चे किसी एक मनोदशा में ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। एक ही क्षण में उनकी इच्छाएँ बदल जाती हैं। बच्चे आसानी से किसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उनके मन में अपार दया का भाव रहता है। कहा जाता है कि उनमें भगवान वास करते हैं। ‘गूदड़ साईं’ शीर्षक कहानी में प्रसाद जी ने साईं के माध्यम से यह कहा कि ‘मेरे पास, दूसरी कौन वस्तु है, जिसे देकर इस ‘रामरूप’ भगवान को प्रसन्न करता!’ (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ, पृ.16)। इस कहानी का नन्हा मोहन साईं को ‘गरीब और भिखमंगा जानकर माँ से अभिमान करके पिता की नजर बचाकर कुछ साग-रोटी लाकर दे देता, तब उस साईं के मुख पर पवित्र मैत्री के भावों का साम्राज्य हो जाता।’ (वही)।

जयशंकर प्रसाद मनुष्यता को प्रमुखता देने वाले साहित्यकार हैं। उनके समग्र साहित्य में इस तत्व को रेखांकित किया जा सकता है। उनके अनुसार जीवन की मुख्य संवेदनाएँ हैं मानवता और करुणा। ‘अनबोला’ एक ऐसी कहानी है जिसमें प्रसाद जी ने इन मानवीय संवेदनाओं को उकेरा है। इस कहानी में जग्गैय्या का मातृ-प्रेम दिखाया गया है। जग्गैय्या एक छोटा सा बालक है। पिता का साया बचपन में उठ गया था। उसके सिर पर तो सिर्फ ममतामयी माँ का हाथ था। “जग्गैय्या को केवल माँ थी, वह कामैया के पिता के यहाँ लगी-लिपटी रहती, अपना पेट पालती थी। कामैया की मछलियाँ ले जाकर बाजार में बेचना उसी का काम था।’ (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग iv, पृ.312)। एक दिन जाल में मछलियों के साथ-साथ समुद्री बाघ भी आ गया। ‘जग्गैय्या की माँ अपना काम करने की धुन में जाल में मछलियाँ पकड़कर दौरी में रख रही थी। समुद्री बाघ बालू की विस्तृत बेला में एक बार उछला। जग्गैय्या की माता का हाथ उसके मुँह में चला गया। कोलाहल मचा; पर बेकार! बेचारी का एक हाथ वह चबा गया।’ (वही, पृ.313)। जग्गैय्या अपनी मूर्च्छित माँ को उठाकर झोंपड़ी में ले चलता है। उसके मन में कामैया के पिता के लिए असीम क्रोध भर जाता है। अपनी माँ को कष्ट में देखकर वह सोचने लगता कि यदि उसके पास खुद की नाव होती तो माँ को आज यह दिन देखना न पड़ता। वह चाहते हुए भी अपनी माँ को बचा नहीं पाता। छोटी उम्र में ही माता-पिता की छाया से वंचित न जाने कितने जग्गैय्या जीवन-संघर्ष में अग्रसर हैं! ऐसी स्थिति में अपने जीवन यापन के लिए उन्हें काम करना ही पड़ता है। सेठ-साहूकार काम तो करवा लेते हैं, लेकिन पगार तो उन्हें नाममात्र के लिए ही देते हैं। बालश्रम कानूनन अपराध है, पर वे बच्चे कर ही क्या सकते हैं! प्रसाद की कहानी का मधुआ एक ऐसा ही पात्र है जो ‘कुँअर साहब का ओवरकोट लिए खेल में दिनभर साथ रहा। सात बजे लौटा तो और भी नई भजे तक कुछ काम करना पड़ा।’ (जयशंकर प्रसाद, प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. 91)। रोटी के बदले उसे लातें खाने को मिलीं। प्रसाद ने इस कहानी में यह दर्शाया है कि बालक मधुआ की ममता और निरीहता एक शराबी के भीतर क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘बालक चंद्रगुप्त’ एक छोटी सी ऐतिहासिक कहानी है। इस कहानी में उन्होंने रोचक ढंग से इतिहास के नायक चंद्रगुप्त के बचपन की झाँकी प्रस्तुत की है। बचपन में चंद्रगुप्त राजसी वैभव का अभिनय करता है। उस समय उसकी मुलाकात चाणक्य से होती है। भले ही यह दृश्य नाटकीय है, पर बहुत प्रभावी है। प्रसाद के बाल चरित्रों में जहाँ एक ओर प्रेम, करुणा, दया जैसी संवेदनाएँ हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें मातृप्रेम के साथ-साथ देशप्रेम जैसे राष्ट्रीय मूल्य भी निहित हैं।

रविवार, 29 जनवरी 2023

भारत की एकता की भाषा है हिंदी



भाषा सिर्फ आदान-प्रदान का साधन नहीं है, बल्कि वह प्रयोक्ता समाज की अस्मिता है। भाषा के अभाव में तो हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। भाषा ही वह माध्यम है जिसके कारण हम समाज से जुड़ते हैं। हिंदी भाषा ने आज अपना स्वरूप ऐसा बनाया है कि उसे सबको स्वीकारना ही पड़ा। ‘वह एक कोने की खड़ीबोली नहीं है। वह पुरइन के खड़े पत्ते की तरह से पूरे सरोवर में छा जाने वाली भाषा बन गई है।’ (विद्यानिवास मिश्र, साहित्य के सरोकार पृ.154)। भाषा व्यवहार में एकरूपी या समरूपी नहीं होती। भाषा की यह विविधता उसकी सजीवता का लक्षण है। इसी सजीवता का प्रयोग करके रचनाकार अपनी रचना में रंग लाता है।

ध्यान देने की बात है कि हिंदी की शक्ति उसकी जनपदीय भाषाएँ हैं। इनसे हिंदी निरंतर समृद्ध होती रहती है। हिंदी को सींखचों में जकड़कर रखना संभव नहीं है। शुद्धतावादी सिद्धांत काम नहीं करेगा। ‘भाषा की प्रवाहमयता की कीमत चुकाकर शुद्धता की बात’ सोचना मूर्खता है (विद्यानिवास मिश्र)। ऐसी शुद्धता किस काम की जिसमें न कोई प्रवाह है और न ही संप्रेषण। हिंदी में वह शक्ति निहित है जिसके कारण वह अन्य भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करती चलती है। इससे हिंदी की अस्मिता विस्तृत होती जा रही है। इतना ही नहीं, हिंदी में वह शक्ति है जो एक भाषा को दूसरी भाषा से और एक प्रांत को दूसरी प्रांत से जोड़ती है। हिंदी की एक सीमा में राजस्थान और पंजाब है तो दूसरी सीमा में बिहार। राजस्थान से बिहार तक के लोग अपने घरों में राजस्थानी, ब्रज, बुन्देली, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय भाषाएँ बोलते हैं, लेकिन व्यापक रूप से इनकी मातृभाषा हिंदी है। इन सबकी सामाजिक भाषा हिंदी है। शिक्षा से लेकर कामकाज तक हिंदी में ही होता है। यही विलक्षण बात है।

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे आसानी से सब समझ सकते हैं। मिथिला का कोई आदमी पंजाब जाए तो उसे पंजाबी समझने में दिक्कत हो सकती है और इसी प्रकार गुजरात का कोई आदमी असम जाए, तो असमिया समझने में दिक्कत हो सकती है और असम के लोगों को गुजराती समझने में, लेकिन हिंदी से काम चला सकते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है, जहाँ उद्योग फैलता है, वहाँ अलग भाषा समुदाय के लोग आकर बस जाते हैं। इन सबके बीच व्यवहार की भाषा हिंदी बन सकती है। इसीलिए महात्मा गांधी ने भी हिंदी को अपनाने पर बल दिया था। यह एक ऐसी भाषा है जो दूसरी भाषाओं को भी साथ लेकर चलती है। इसीलिए आजादी से पहले हिंदी को अंतःप्रांतीय संपर्क के लिए प्रयोग करने की बात भी आई। अनेक नेताओं ने इसका समर्थन भी किया। उनमें वे नेता प्रमुख थे, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं बल्कि बांग्ला थी। ‘हिंदी भारत की एकता की भाषा’ (रामधारी सिंह 'दिनकर') है। यह इस बात से भी प्रमाणित हो जाता है कि भारत में एक भाषा का साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद के माध्यम से आसानी से पहुँच रहा है और यह काम सबसे ज्यादा हिंदी के माध्यम से हो रहा है।

हिंदी प्रचार-प्रसार आंदोलन का अपना एक महत्व है। यह स्वतंत्रता आंदोलन का ही एक प्रमुख अंग रहा। उस समय महात्मा गांधी ने यह महसूस किया कि जब तक देश के सभी नागरिक एक नहीं होंगे, आपस में संप्रेषण स्थापित नहीं करेंगे तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर नहीं करेंगे तब तक आजादी की लड़ाई सफल नहीं हो सकती। समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का रास्ता अपनाया तो आम जनता के बीच संप्रेषण स्थापित करने के लिए एक ऐसी भाषा को सीखने पर बल दिया जिसे सब आसानी से समझ सकते हैं और बोल सकते हैं। यह भाषा संपूर्ण हिंदुस्तान की भाषा है – ‘हिंदी’। उन्होंने हिंदी का आंदोलन प्रारंभ किया। वस्तुतः वे हिंदी के माध्यम से देशवासियों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द कायम करना चाहते थे। गांधी जी से काफी लोग प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप हिंदीतर क्षेत्रों में लाखों लोगों ने हिंदी सीखकर हिंदी का परचम फहराया। “हिंदी प्रचार का काम देशभक्ति का ही काम है। हिंदी को हम इसलिए ऊपर उठा रहे हैं कि उसके साथ सभी भाषाओं का उत्थान हो। हिंदी एक प्रतीक है। असल में हमारा उद्देश्य सभी भाषाओं को ऊपर उठाना है, जिससे यह पूरा देश अपनी भाषाओं में सोच सके और सारी मनुष्य-जाति के लिए भारत की परंपरा में जो संदेश निहित है, उसे अपनी भाषाओं में उछाल सके।” (रामधारी सिंह 'दिनकर', संस्कृति, भाषा और राष्ट्र, पृ. 200)।

पड़ने लगती है पीयूष की शिर पर धारा।
हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा।
बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती।
कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती।
आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नाम ही।
इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही। (अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’)

मधुकरी के कवि : नरेश मेहता


वहन करो
ओ मन! वहन करो,
सहन करो पीड़ा!!

सृष्टिप्रिया पीड़ा है
कल्पवृक्ष–
दान समझ, शीश झुका

स्वीकारो–
ओ मन करपात्री! मधुकरि स्वीकारो!!
वहन करो, सहन करो,
ओ मन! वरण करो पीड़ा!!

ये पंक्तियाँ मधुकरी के कवि नरेश मेहता के अवचेतन को अंकित करने में सक्षम हैं। नरेश मेहता की कविताओं में इस बिंब को अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। वे परंपरा और आधुनिकता को एक साथ लेकर चलने वाले कवि हैं। वे एक सजग प्रयोगशील सर्जक के रूप में अपने आपको प्रतिष्ठित कर चुके थे। करुणाशंकर उपाध्याय का कहना है कि “नरेश ने काव्य के क्षेत्र में ‘दूसरा सप्तक’ से लेकर ‘मेरा समर्पित एकांत’ तक की यात्रा की है तो उपन्यास में ‘प्रथम फाल्गुन’ से लेकर ‘वह नदी यशस्वी है’ के किनारे तक जा पहुँचा है।” (आधुनिक कविता का पुनर्पाठ, पृ.175)। इस यात्रा के दौरान नरेश मेहता कहानियों और नाटकों से भी गुजरे।

‘बनपाखी सुनो’, ‘बोलने दो चीड़ को’ में संकलित कविताओं में कवि मन प्रकृति के निकट दिखाई देता है। प्राकृतिक सौंदर्य के अनेक उपमान उनकी कविताओं में देखे जा सकते हैं। ‘बाँसों के अनंत वृक्षों वाले/ उस अरण्य में’ कवि अपने आपको एक अनाम वानीर-वृक्ष घोषित करता है। उनकी कविताओं में जहाँ पीले फूल कनेर के दिखाई देते हैं वहीं दूसरी ओर नीलम वंशी से कुंकुम के स्वर गूँज उठते हैं। वसुधा मंत्रोच्चार से वासंती रथ का आह्वान करती है तो अमराई में दमयंती-सी पीली पूनम काँप उठती है। शॉल-सा कंधों पर पड़ा फाल्गुन चैत्र-सा तपने लगता है तो बैलों की घंटियाँ बोलने लगती हैं। पिघलते हिमवानों के बीच दूब का वर्ण खिल उठता है, इंद्रलोक की सीमा केसर के जल से सिंचित हो उठतीहै। उदयाचल से किरन-धेनुओं को हाँकता हुआ प्रभात का ग्वाला दीखता है। उनकी कविताओं में वैश्वानरी-गंध, गायत्री छंद, सावित्रियों के अरण्य-रास, औषधियों का आचमन, हिरण्यगर्भ, आकाशगंगा, पराब्रह्माण्ड, महापिण्ड आदि अनेक दार्शनिक एवं मिथकीय बिंबों को भी देखा जा सकता है। वे वस्तुतः प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से मनुष्य को गतिशील होने की प्रेरणा देते हैं।

मनुष्यता की रक्षा कवि नरेश मेहता का परम कर्तव्य है। वे हर व्यक्ति के भीतर के क्रंदन को लिपिबद्ध करना चाहते हैं। कमल किशोर गाइन्का से बात करते हुए उन्होंने कहा कि “विज्ञान और राजनीति ने मनुष्य को अकेला छोड़ दिया है। आज मनुष्य की जगह उत्पादन को ‘रिफाइंड’ करने की चेष्टा की जा रही है। इस तथाकथित आधुनिकता ने मनुष्य को न तो उदात्त बनाया है और न आनंद प्रदान किया है।” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 173)। वे यही मानते थे कि सभी मानवीय दुखों का मूल कारण भ्रष्ट राज्य व्यवस्था है – “मानवीय उदात्तताओं और करुणा के प्रतीक/ धर्म के प्रतिपालक नहीं हो सकते।”

प्रतीक्षा करो पुनः मनुष्य होने की : नरेश मेहता

सामने वाला यदि आवेग में
पशु हो गया हो
तो विवेक के रहते
प्रतीक्षा करो
उसके पुनः मनुष्‍य होने की

यह विचार नरेश मेहता का है। वे पीड़ित और शोषित मानव के बारे में सोचते थे। महलों में रहने वालों से उनके कवि का नाता नहीं। वे अपनी अनुभूतियों और अनुभवों के विस्तृत फलक को अपनी कृतियों में अंकित करते हैं। उनकी रचनाओं में मानवता के प्रति प्रेम और जीवन की वास्तविकताओं को देखा जा सकता है। उनके अनुसार ‘विवेकहीनता मनुष्य को पशु बना देता है’। विवेकशून्यता व्‍यक्‍ति के भीतर विचारशून्‍यता का अंधा कारागार निर्मित कर देती है। विडंबना है कि ‘व्‍यवस्‍था का मुकुट धारण करते ही किसी भी व्‍यक्‍ति का मनुष्‍यत्‍व नष्‍ट हो जाता है’।

नरेश मेहता मानवीय गुणों को महत्व देने वाले रचनाकार थे। वे इस बात पर बल देते थे कि इतिहास मानवीय उदात्‍तता से लिखा जाना चाहिए, न कि खड़ग से। उन्होंने ‘प्रवाद पर्व’ में कहा है कि ‘मानवीय स्वातंत्र्य/ मानवीय भाषा और/ मानवीय अभिव्‍यक्‍ति के/ प्रतिइतिहास का सामना/ वैसे ही/ मानवीय प्रतिगरिमा के साथ/ करना होगा, लक्ष्‍मण!/ प्रतिइतिहास को इतिहास से नहीं/ विनय से स्‍वीकारना होगा।’ यदि कहें कि नरेश मेहता मानववादी रचनाकार हैं तो गलत नहीं होगा। वे ‘प्रतिबद्धता’ शब्द को महज एक नारेबाजी के रूप में देखते हैं और कहते हैं कि प्रतिबद्धता एक राजनैतिक शब्द है। अतः वे इस शब्द से जुड़ने के लिए तैयार ही नहीं थे। डॉ. कमल किशोर गोयनका से बात करते समय उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि “मनुष्य की नियति यही है कि वह मनुष्यता और मिट्टी के आकर्षण में बँधा रहे। पृथ्वी और उस पर रहने वाला हमारा मानवीय समाज हमारी नियति है, अतः उसके लिए ‘प्रतिबद्धता’ जैसी एकांगी नारेबाजी की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं किसी भी कीमत पर ‘प्रतिबद्धता’ शब्द से जुड़ने को तैयार नहीं हूँ।” (नरेश मेहता, मेरे साक्षात्कार, पृ. 173)।

हम नरेश मेहता के कवि रूप से भली भाँति परिचित हैं। उनके गद्यकार रूप के बारे में प्रायः बहुत कम चर्चा होती है। जिस प्रकार कवि के रूप में वे सफल हुए, उसी प्रकार गद्यकार के रूप में भी वे सफल थे। वे लेखन को अनभिव्यक्त आइसबर्ग की टिप मानते हैं जो हमें दिखाई देती है। उनकी मान्यता है कि “जीवन की अनुभूति या अनुभवों के अतल जल के अंधकार में गहरे पैठे आइसबर्ग का वह विशाल वास्तविक स्वत्व हम कभी नहीं देख पाते हैं जो उस टिप को निरभ्र व्यक्त किए होता है। निश्चित ही वह टिप नहीं बल्कि ठंडे, अगम जलों में डूबा पसरा हिमखंड ही आइसबर्ग का वास्तविक सृजनात्मक स्वत्व है।” (नरेश मेहता, हम अनिकेतन, पृ.9)। सृजनात्मक क्षमता मनुष्य के भीतर जल में डूबा हुआ वह हिमखंड है जो दिखाई नहीं देता। उसे व्यक्त होने के लिए सही वातावरण चाहिए। ‘जीवन से अनाविल रूप में निबद्ध यह सृजनात्मकता’ ही नरेश मेहता के लेखे जीवन है जिसे धारण करना मनुष्य की नियति है, और भोगना प्रकृति। लेकिन जीवन की सृजनात्मक सत्ता या स्वरूप को ‘पूर्ण रूप’ से अभिव्यक्त करना असंभव है। सृजन और लेखन के बीच निहित सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि “जीवन की अनभिव्यक्त तथा अकथनीय सत्ता या स्वरूप, सृजन है। सृजन अनभिव्यक्त सत्ता है। लेखन, सृजन का संलाप रूप है। इसलिए सृजन को नहीं बल्कि लेखन को भाषा, अभिव्यक्ति, श्रोता, देश और काल सभी कुछ चाहिए होता है।” (वही, पृ.28)।

मनुष्य का जीवन अनुभव आधारित है। अनुभव देश-काल-वातावरण से परे होता है। वह तो बस घटित होता है। “वह तो एक निपात की भाँति केवल घटित होना जानता है। वह न तो सांसारिक है, न किसी प्रकार का निषेध।” (वही, पृ.25)। नरेश मेहता साहित्य को अपनी दृष्टि से समझना चाहते थे और अपना एक अलग पथ निर्मित करना चाहते थे। उनका जीवन संघर्षमय रहा। अतः वे जीवन के मूल्य को पहचानते थे। उनकी रचनाओं से गुजरते समय इस बात को महसूस किया जा सकता है।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ - रामावतार त्यागी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है
पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है
आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है
(ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है, रामावतर त्यागी)

इन पंक्तियों के रचनाकार हैं सुप्रसिद्ध गीतकार रामावतार त्यागी (17 मार्च, 1925-12 अप्रैल 1985)। उनका जन्म मुरादाबाद जिले (उत्तर प्रदेश) के कुरकावली ग्राम में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा 10 साल की उम्र में शुरू हुई थी। हिंदी साहित्य जगत में वे ‘पीड़ा के गायक’ के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन वे आस्था और जिजीविषा के कवि भी हैं, जो इस दुनिया को बेहतर बनाने के सपने देखा करते थे। रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि “दर्द की छोटी-सी टीस, मगर, पता नहीं, वह कहाँ से उठती और कहाँ जाकर विलीन हो जाती है। उमंग का एक मतवाला झोंका जो आता तो बड़ी नरमी से है, मगर, सारी वाटिका के भीतर एक सिहरन-सी दौड़ जाती है। किसी नन्हीं उंगली की एक हल्की-सी चोट पड़ती तो एक तार पर है, किंतु जीवन-वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठते हैं।” (रामधारी सिंह दिनकर, भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ. 6)। जी हाँ, रामावतार त्यागी की कविताओं में वह शक्ति है जो पाठकों के हृदय को झंकृत कर देती है।

रामावतार त्यागी की काव्य कृतियों में नया खून (1953), आठवाँ स्वर (1958), मैं दिल्ली हूँ (1959), सपना महक उठे (1965), गुलाब और बबूल वन (1973), गाता हुआ दर्द (1982), लहू के चार कतरे (1984), गीत बोलते हैं (1986, मरणोपरांत प्रकाशित) आदि उल्लेखनीय हैं। उन्होंने महाकवि कालिदास रचित ‘मेघदूत’ का काव्यानुवाद भी किया और कविता के अलावा उन्होंने उपन्यास (समाधान और राम झरोखा), पत्र साहित्य (चरित्रहीन के पत्र) और कहानियाँ (राष्ट्रीय एकता की कहानियाँ) भी रचीं। समाज (मासिक) और प्रगति (त्रैमासिक) पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

भावुक गीतकार रामावतार त्यागी अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे। उनके गीतों में उनके जीवन के अनुभवों को देखा जा सकता है। वे अपनी अनुभूतियों को गीतों में पिरोते हैं। उनके व्यक्ति रूप और कवि रूप में से किसी एक की उपेक्षा करके दूसरे को समझ ही नहीं सकते। कहने का अर्थ है कि दोनों एक-दूसरे में इस तरह समाहित हैं कि एक के अभाव में दूसरा अधूरा लगेगा। उनके व्यक्तित्व के संबंध में डॉ. शेरजंग गर्ग लिखते हैं कि “पहली मुलाकात में कठिन-सा लगने वाला व्यक्तित्व जब खुल जाता था, तो बहुत जल्दी आत्मीय बन जाता था। बात-बात पर जुमले कसना, बहुत धीमे-धीमे मुस्कराते हुए हँसना और वेशभूषा में कतई सामान्य-सा लगना त्यागी के व्यक्तित्व को बहुत असामान्य बनाते थे।” (सं. शेरजंग गर्ग, भूमिका, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ.11)। वे यह भी कहते हैं कि उनके काव्य पाठ में भी कोई विशेष आकर्षण नहीं होता था, लेकिन उनकी कविताओं और गीतों में निहित भावुकता, पीड़ा और संघर्ष की बानगी अंतर्मन को झकझोरने में समर्थ थीं।

रामावतार त्यागी हमेशा नए प्रयोग करते हैं। डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय यह मानते हैं कि त्यागी की कविताओं में मानव मूर्ति मुस्कुराकर उभरती है। वे आगे यह कहते हैं कि इसके निर्माण में समष्टिमूलक नए मानव मूल्य हैं। (अति-आधुनिक हिंदी काव्य में यथार्थवाद, विश्वंभरनाथ उपाध्याय, समालोचक, फरवरी 1959, पृ.117)।

त्यागी जी कह उठते हैं कि-

मेरे गीत रहें जीवन भर कारावास भोगतें,
लेकिन मैं गुमराह स्वर्ण को अपनी कलम नहीं बेचूँगा!

उक्त पंक्तियों को पढ़ते समय भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ’ अनायास ही स्मरण हो आई। उसमें मिश्र जी कहते हैं - 'जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।/ मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ;/ मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत बेचता हूँ।’ कहा जाता है कि मिश्र जी ने पश्चात्ताप स्वरूप इन पंक्तियों को रचा था। साहित्य की दुनिया में यह कविता आत्म व्यंग्य का उदाहरण बन गई। त्यागी जी भी आहत होकर पलटवार के रूप में लिखा है -

सुन लो गीत बेचने वाले
ओ सौदागर, ओ व्यापारी
अपने भरे भरे लोचन से तुमने कितने गीत लिखे हैं?
शब्दों के रेशमी नमूने
देख लिए अब माल दिखाओ
कोई गीत जड़ें हो तुमने
जिस पर तीनों कला दिखाओ
बातें करते हुए पवन से तुमने कितने गीत लिखे हैं?

रामावतार त्यागी को जो नजदीक से जानते हैं, वे उनके व्यक्तित्व के बारे में सटीक रूप से कह सकते हैं। वे अक्खड़, तुनक मिजाज और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। अतः वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि -

मेरी खुशियों को चाहे जब जिंदा मरघट में दफना दो,
लेकिन मैं बदचलन पतन को अपना जनम नहीं बेचूँगा।
दीपक बिक सकता है जिसका
अंतर ज्योतिर्मान नहीं है
पर अंगारे को खरीदना
दुनिया में आसान नहीं है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें रामावतार त्यागी के गीत बेहद पसंद हैं। “उसके रोने, उसके हँसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहाँ तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है, जो मन को मोह लेती है।” (भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ. 6)। त्यागी की कविताओं पर चर्चा करते हुए दिनकर जी ने तीन बातों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। निःसंदेह ये बातें रामावतार त्यागी की कविता को समझने में सहायक सिद्ध होंगी -

● महादेवी और बच्चन ने जो परंपरा चलाई वह जनता को अब भी पसंद है। वही परंपरा नीरज, त्यागी, वीरेंद्र, राही आदि कवियों के भीतर से अपना प्रसार कर रही है।

● बच्चन तक हिंदी गीतों के छंद केवल हिंदी के छंद से लगते थे, अब वे उर्दू के पास पहुँच रहे हैं। भाषा भी इन गीतों की हिंदुस्तानी रूप ले रही है। कहाँ है हिंदी में रिवाइवलिज़्म? यह तो रिवाइवलिज़्म के ठीक विपरीत चलने वाली धारा है।

● तीसरी बात यह है कि जिस ओर से प्रयोगवादी कवि अपना नूतन प्रयोग कर रहे हैं, उसी ओर से इस पीढ़ी के अनेक नव कवि गीतों में अपना अंतर उंडेल रहे हैं। यह ठीक है कि नए आलोचकों ने अपनी आशा प्रयोगवाद से बाँध रखी है, किंतु, जनता का प्रेम आज भी इन गीतों पर ही बरस रहा है। (रामधारी सिंह दिनकर, भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ.6-7)।

रामावतार त्यागी के गीतों को ध्यान से पढ़ने पर यह बात स्पष्ट होती है कि वे दुनिया वालों को चुनौती दे रहे हैं। वे समाज के जटिल बंधनों को तोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। वे कहते हैं -

मैं तो तोड़ मोड़ के बंधन
अपने गाँव चला जाऊँगा
तुम आकर्षक संबंधों का,
आँचल बुनते रह जाओगे।

वस्तुतः हम सब प्रेम के दो पक्ष - वियोग और संयोग - के बारे में काफी पढ़ चुके हैं। मध्यकालीन कविताओं में इन दोनों रूपों को देख भी चुके हैं। पर प्रेम का एक और पक्ष है - विश्व शांति का। जिंदगी से प्रेम करने वाला व्यक्ति युद्ध का विरोध अवश्य करेगा, लेकिन जहाँ युद्ध अनिवार्य है वहाँ वह जरूर गुहार लगाएगा, जनता को चेताएगा यह कहकर कि ‘लेकिन युद्ध तो अनिवार्य है।’ रामावतार त्यागी का संवेदनशील हृदय उस जन-मानस के साथ है जो सबके लिए अन्न पैदा करता है, पर खुद दो जून रोटी के लिए कर्ज के तले दब जाता है। ‘किसान दिवस’ (23 दिसंबर) पर लिखी उनकी एक कविता का अंश देखें -

जुलूसों और नारों से।
प्रदर्शन या प्रचारों से,
न कोई देश जीता है,
सभाएँ बंद कर, चल खेत में या कारखानों में,
सिपाही के लिए कपड़े, जवानों के लिए रोटी,
सभाएँ बन नहीं सकती, लगी है जान की बाजी,
यह तो वक्त है कुछ काम कर, कुछ काम कर प्यारे,
विवादों को उठाने से,
न कोई देश जीता है

रामावतार त्यागी अपने अनूठे तेवर और अंदाज के लिए जाने जाते हैं। वे निराशा की स्थिति में भी आशा का संचार करवाना चाहते हैं। इसीलिए कह गए -

ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
इक हसरत थी कि आँचल का मुझे प्यार मिले
मैंने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले

रामावतार त्यागी के गीतों में उनके जीवन-दर्शन को भी देखा जा सकता है। इनके अलावा किसी और कवि या गीतकार यह कहने का साहस नहीं कर पाया कि

मुझको पैदा किया संसार में दो लाशों ने
और बर्बाद किया क़ौम के अय्याशों ने
तेरे दामन में बस मौत से ज़्यादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
जो भी तस्वीर बनाता हूँ बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

‘जिंदगी और तूफान’ फिल्म के गीत ‘ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है’ ने रामावतार त्यागी की प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए थे। कहा जाता है कि त्यागी ने इसके बाद फिल्मों के लिए गीत लिखना स्वीकार नहीं किया। फिक्र तौंसवी का यह कथन उल्लेखनीय है कि “त्यागी ने फिल्मी दुनिया को एक हसीन और दिलचस्प गीत देकर तलाक दे दिया। कहने लगा, हम शायर हैं भड़भूँजे नहीं है। और बंबई का फिल्म स्टार सौदागरों का स्टार है। वह गुड, बेसन, चीनी, मूँगफली और शायरी सबको मार्केट का माल समझते हैं। मैं अब कभी उधर का रुख नहीं करूँगा।” (सं. शेरजंग गर्ग, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ. 7)

कहने की जरूरत नहीं कि दर्द किसी भी व्यक्ति को इस तरह माँजता है कि वह औरों के दुख-दर्द को समझने में समर्थ हो जाता है। इतना ही नहीं, उसे उनकी पीड़ा के सामने अपनी पीड़ा बहुत छोटी नजर आती है-

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से
मैंने अकसर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है।
कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से
पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से
रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से
मैंने अकसर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥

आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने रामावतार त्यागी को ‘गीतों के राजकुमार’ कहकर संबोधित किया है। सच में वे गीतों के राजकुमार ही हैं। उन्होंने नए समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को पहचान लिया था -

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ;
मत बुझाओ!
जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी!

×××

मैं जहाँ धर दूँ क़दम वह राजपथ है;
मत मिटाओ!
पाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!

×××

मैं बहारों का अकेला वंशधर हूँ
मत सुखाओ!
मैं खिलूँगा, तब नई बगिया खिलेगी!

रामावतार त्यागी के गीतों के संबंध में रमेश गौड़ कहते हैं कि “त्यागी के गीत किसी व्यक्ति विशेष का विलाप न होकर पूरे समाज की आज की स्थिति को वाणी देते हैं। और जो लोग मुझसे सहमत नहीं हैं, उनसे अत्यंत विनम्र शब्दों में पूछना चाहता हूँ कि जब वह कहता है, ‘ठोकर सह बोलूँ नहीं इतना मुझे संयम न दो’ या ‘मेरे अधर न कम झुलसे हैं मेरी प्यास न हरगिज कम हैं’ तो क्या वह एक व्यक्ति के रूप में बोलता है?” (सं. शेरजंग गर्ग, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ.9)। सच भी है, उनके गीत व्यक्तिगत गाथा नहीं, बल्कि ‘जिंदगी निर्माण की जीवन-कथा है।’

रामावतार त्यागी के गीतों में मानव जीवन से जुड़े तमाम आयामों को देखा जा सकता है। एक ओर उनके गीतों में शहर का कोलाहल है तो दूसरी ओर गाँव की स्मृतियाँ -

तन बचाने चले थे कि मन खो गया
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया
घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही
और सब कुछ है वातावरण खो गया
यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया
गाँव का जो दिया था वचन खो गया

रामावतार त्यागी यह जानते हैं कि इस संसार में मनुष्य को भी बेजान वस्तु की तरह खरीदने की होड़ लगी हुई है। ऐसे में मनुष्य का ईमान डगमगाने लगेगा तो आश्चर्य की बात नहीं है। पर त्यागी जी कहते हैं -

दूकानों में होड़ लगी है
ईमानों को खरीदने की
रेगिस्तानों ने जिद पकड़ी
उद्यानों को खरीदने की
मेरे दर्पण को यदि संभव हो तो खंड खंड कर डालो
लेकिन मैं तन की इच्छा पर मन का नियम नहीं बेचूँगा।

त्यागी जी के गीतों में जहाँ एक ओर पर-दुख कातरता है, मनुष्यता है, संवेदनशीलता है, वहीं दूसरी ओर उनके गीतों में आस्था और जिजीविषा है। कवि का आत्मविश्वास यह कहने में संकोच नहीं करता कि-

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाए अपनी ही नजर में
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए

त्यागी जी की कविताओं में जीवन संघर्ष के साथ-साथ भ्रष्ट तंत्र के प्रति विद्रोह भी मुखरित है। जहाँ मानव विरोधी शक्तियाँ प्रबल होती जा रही हैं वहाँ गीतकार बेईमान समय के सामने अपना अहं नहीं बेचना चाहता और दृढ़ संकल्प लेता है, यह कहकर कि-

मेरे सपनों को सूली पर लटका दो तुम बड़ी खुशी से
पर मैं बेईमान समय को अपना अहं नहीं बेचूँगा।

×××

सूनी काल कोठारी में ही सारी उम्र बिता दूँगा
लेकिन किसी मोह को अपने कवि का धरम नहीं बेचूँगा।

समाज में चारों ओर व्याप्त विसंगतियों और विद्रूपताओं को देखकर रामावतार त्यागी आक्रोश से भर उठते हैं और घोषित करते हैं -

देश के समुद्र में बूँद-बूँद डाल दो
दुश्मनों को देश की जमीन से निकाल दो
तेज और भाइयो तेज करो आग को
आंधियाँ न सोख लें देश के चिराग को
भाल से खरोंच दो स्याह-स्याह दाग को
नाच-नाच युद्ध में झूम-झूम ताल दो,
दुश्मनों को देश की जमीन से निकाल दो

मानव मन की गहन अनुभूतियों को गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाले रामावतार त्यागी जिजीविषा और आस्था के कवि हैं। वे आत्मविश्वास के साथ मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध रहे और आजीवन एक ऐसे इंसान की तलाश करते रहे जो-

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

कहना ही होगा कि रामावतार त्यागी आस्था, जिजीविषा, संवेदना, स्वाभिमान, देशप्रेम, मानवीय गंध की प्यास, मूल्य, गाँव, शहर, प्रेम, विरह, पीड़ा, संघर्ष, रूढ़िवादी मानसिकता के प्रति विद्रोह आदि सुंदर मानकों को गीत-माला में पिरोने वाले रचनाकार हैं। समझौतों के शहर में रहने के बावजूद उन्होंने अपने अंदर गाँव को जीवित रखा। वे भाग्य पर नहीं, कर्म पर विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार ‘बनाने के लिए हमने स्वयं किस्मत बनाई है’ और इस राह में ‘विफलता मात्र पूँजी है, निराशा ही कमाई है’ तथा ‘जलन से दोस्ती है’ और ‘उलझनों से आशनाई’। उनकी लड़ाई किसी और से नहीं बल्कि अपने अस्तित्व से ही है। उनका कवि मन न विरोधों की चिंता करता है और न ही बाधा के पग पर शीश धरता है। वह उन हमदर्दों से डरता है जो पीठ पीछे वार करता है। साफ दिखाई देने वाले शूलों से भयभीत नहीं है, पर ‘फूलों की उत्कंठित मुसकानों से डरता’ है; ‘राम के तन से मिट्टी नोचकर रावण की मूर्ति गढ़ने वालों’ से डरता है! ‘दर्द तो वह अनमोल धन है, जो सबके भाग्य में नहीं होता।’ त्यागी जी ऐसे दर्द को गले लगाते हैं जो इंसान को इंसान बनाए रखने में सहायक हो। वे बार-बार यह कहते हैं कि-

पूरी तरह टूटे बिना
दुख का मजा आता नहीं
आधी तड़प से गीत भी
पूरा लिखा जाता है।

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संदर्भ ग्रंथ

1. त्यागी, रामावतार (1958 प्रथम आवृत्ति). आठवाँ स्वर. दिल्ली : फ्रैंक ब्रदर्स एंड कंपनी

2. त्यागी, रामावतार (1959). मैं दिल्ली हूँ. दिल्ली : साहित्य संस्थान

3. त्यागी, रामावतार (1986 ). गीत बोलते हैं. दिल्ली : आत्माराम एंड संस

4. सं. गर्ग, शेरजंग (2006). हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी. नई दिल्ली : वाणी

5. प्र. सं. शर्मा, रामविलास (फरवरी 1959). समालोचक. द्वितीय वर्ष. अंक 1. जयपुर

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

कविता को समझने के लिए ....



तू काव्य :
सदा-वेष्टित यथार्थ
चिर-तनित,
भारहीन, गुरु,
अव्यय।

तू छलता है
पर हर छल में
तू और विशद, अभ्रान्त,
अनूठा होता जाता है। (अज्ञेय)

कविता सहृदय और संवेदनशील मनुष्य के मन की उपज है। इसे एक निश्चित परिभाषा में बाँधना कठिन कार्य है। फिर भी अनेक विद्वानों ने इसे पारिभाषित करने का प्रयास किया है। कविता को पारिभाषित करते हुए रामचंद्र शुक्ल ने अपने निबंध ‘कविता क्या है?’ में कहा है कि ‘कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है।’ काव्यशास्त्र में इन्हीं मनोवेगों को रस कहा जाता है।

भारतीय काव्यशास्त्रियों ने कवि और कविता को उदात्त माना है। भारतीय काव्यशास्त्र में कवि को महत्व दिया गया है। भरतमुनि समेत अनेक आचार्यों ने काव्य के गुणों की चर्चा की है। आनंदवर्धन ने तो कवि को प्रजापति कहा है (अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति)। पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो ने कविता को उन्माद कहा है, तो विलियम वर्ड्सवर्थ ने कविता को तीव्र मनोभावों का सहज उच्छलन कहा है। चाहे कोई भी कुछ भी कहे, साहित्य अथवा कविता व्यक्ति के आंतरिक मनोभावों की अभिव्यक्ति है। सृजनात्मकता का परिचायक है। कविता की शक्ति का एक बड़ा उदाहरण यह है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समय कविता ने जनमानस को जागृत करने का कार्य किया है। कवि के सामने अनेक तरह की चुनौतियाँ रहती हैं। जब तक पाठक काव्य-वस्तु में नहीं डूबेंगे, तब तक कविता के अर्थ को समझ नहीं पाएँगे। इस ‘डूबने’ की प्रक्रिया को विद्यानिवास मिश्र शब्दार्थ-व्यापार कहते हैं, ‘क्योंकि शब्द ही डूबने का प्रेरक भी है, शब्द ही तिरने का साधन भी।’ (विद्यानिवास मिश्र, रीतिविज्ञान, पृ. 35)। वे आगे यह कहते हैं कि ‘कविता बोलचाल की भाषा से ही नहीं, एकदम भदेसी एवं अंतरंग अनगढ़ बोलचाल की भाषा से शब्द लेने के लिए लाचार हो जाती है।’ (वही, पृ. 47)। कहने का तात्पर्य है कि कवियों की मानसिकता में जैसे-जैसे परिवर्तन होगा, वैसे-वैसे कविता के प्रतिमान बदलने लगेंगे। कविता को समझने के लिए सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता होती है। मेरे हाथ एक ऐसी पुस्तक लगी जो कविता को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है। ‘हिंदी कविता : अतीत से वर्तमान’ (2021) शीर्षक यह पुस्तक कविता को समझने के लिए सहायक सिद्ध होगी। साहित्य रत्नाकर, कानपुर से प्रकाशित इस पुस्तक के रचनाकार हैं प्रसिद्ध तेवरीकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा। इस पुस्तक को पढ़ते समय पाठकों में सहज जिज्ञासा जागृत होगी, क्योंकि इस पुस्तक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कवि महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है प्रवृत्तियाँ; और वे परिस्थितियाँ जिनके कारण प्रवृत्तियों का जन्म होता है।

इस पुस्तक में कुल आठ सोपान हैं। पहला सोपान है ‘नींव का परिवेश और विचारों की यात्रा’, जो विशेष रूप से 1950 के बाद की कविता को समझने में सहायक है। इसमें यह देखने को मिलता है कि 1950 से लेकर 1970 तक की काव्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है लोक जीवन और लोक संस्कृति तथा प्रकृति के साथ कविता का रागात्मक संबंध। इस कालखंड में अनेक काव्यांदोलन उभर कर सामने आए। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में परिस्थितियों के प्रति आक्रोश और नए रास्ते खोजने की चाहत को प्रमुख रूप से देखा जा सकता है, जिनके कारण काव्य-स्थितियाँ बदलीं और नई प्रवृत्तियों का जन्म हुआ। परिवर्तनों को प्रोत्साहन मिला। कवियों की मानसिकता बदलने लगी। ‘परंपरा और परिवेश के बीच संवाद-सेतु के रूप में कार्य करने वाला कवि जब दोनों को ही आत्मसात कर लेता है, तब उस युग की सच्ची कविता पैदा होती है।’ (पृ. 38)। सो, हुई।

कविता और राष्ट्रीयता का गहरा संबंध होता है। दोनों को अलग करके देखना कठिन कार्य है। ‘कविता जिस परंपरा से जीवन ग्रहण करती है, वह किसी समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा ही होती है।’ (पृ. 48)। साहित्य के विद्यार्थी यह भलीभाँति जानते हैं कि आठवें-नवें दशक की कविता का मूल स्वर यही ‘राष्ट्रीय चेतना’ है। इसे लेखक ने ‘देश के सिर से बहते हुए रक्त से कविता की बातचीत’ शीर्षक दूसरे सोपान में बखूबी उकेरा है। इसमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ‘कविता ने व्यक्ति को देश के एकदम निकट ले जाने की कोशिश की है, क्योंकि उसकी निकटता प्राप्त किए बिना निर्माण की संभावनाएँ क्षीण हो जाती हैं। ... राष्ट्र-निर्माण के लिए गाँव को समझना और उसके जीवन को पहचानना अनिवार्य है।’ (पृ. 57)।

आधुनिक समाज को नियंत्रित करने वाले दो प्रमुख तत्व हैं - विज्ञान और परंपरागत सामाजिक मान्यताएँ तथा मूल्य। स्वस्थ समाज के निर्माण में इन दोनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। 1970 के बाद की परिस्थितियों पर दृष्टि केंद्रित करने से यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक मूल्य तेजी से बदलने लगे। मूल्य-ह्रास की प्रक्रिया तेजी से शुरू हुई। इन परिस्थितियों ने कवि की रचनाशीलता को भी प्रभावित किया। परिणामस्वरूप कविता की प्रवृत्तियाँ बदलने लगीं। नई सभ्यता विकसित होने लगी। मनुष्य का जीवन दबावों के बीच फँस गया। ‘पारस्परिक प्रेम, सहानुभूति और परिचय के अभाव ने मनुष्य को एक कैलेंडर की शक्ल दे दी है, जिसमें वर्ष भर के समय का लेखा-जोखा तो होता है किंतु जीवंतता नहीं होती’ (पृ. 72), तो कवि पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित हुआ। जनपक्षधरता का गुण उभरकर सामने आने लगा। इसका खुलासा ‘सामाजिकता, परंपराबोध और कविता’ शीर्षक तीसरे सोपान में हुआ है।

‘कविता और राजनीति का आमना-सामना’ शीर्षक चौथे सोपान में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ‘कविता ने जनपक्षीय राजनैतिक मूल्यों को ग्रहण करके राजनीति के यथार्थ तथा जनता के मन के आक्रोश को मुख्य रूप से अभिव्यक्ति दी है।’ (पृ. 99)। आज़ादी के बाद देश में धीरे-धीरे कुर्सीधर्मी राजनीति पनपने लगी। ‘हिंसा’ इस कुर्सीधर्मी राजनीति का दूसरा चरित्र है। सन सत्तर के बाद देश भर में जो हिंसक घटनाएँ हुईं उनके पीछे राजनीति का हाथ है। जन-प्रतिनिधि ‘रक्षक’ के बदले ‘भक्षक’ बनने लगे। व्यक्ति केंद्रित राजनीति पनपने लगी। तानाशाही का उदय होने लगा। जनता का मोहभंग होने लगा। उनके स्वप्न बिखरने लगे। निरंकुशता बढ़ने लगी। ऐसी स्थिति में संघर्ष अनिवार्य था। 1970 के बाद की कविता ने इन परिस्थितियों को चित्रित ही नहीं किया, बल्कि इनके कारण उत्पन्न असंतोष और आक्रोश को भी अभिव्यक्त किया।

1960 के आस-पास हिंदी कविता के क्षेत्र में अनके काव्यांदोलन हुए। जैसे नवगीत, अकविता, अभिनव कविता या एण्टी कविता, ताजी कविता, सांप्रतिक कविता, अस्वीकृत कविता, सचेतन कविता, बीट कविता, विद्रोही कविता, युयुत्सावादी कविता, साठोत्तरी कविता, सहज कविता, सनातन सूर्योदयी कविता, अगीत, ग़ज़ल, तेवरी, मंत्र कविता आंदोलन आदि। इनमें से कुछ आंदोलन आठवें-नवें दशक की कविता के साथ भी चलते देखे जा सकते हैं। ‘आंदोलनों के मंच पर बोलती कविता’ शीर्षक पाँचवे सोपान में इन आंदोलनों और परिस्थितियों का परिचय सम्मिलित है, जो हर पाठक को जानना बेहद जरूरी है।

1970 के बाद कविता जिन सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित हुई उनसे ‘कविता की समग्र दृष्टि से साक्षात्कार’ शीर्षक सोपान में परिचित हुआ जा सकेगा। सत्तर के बाद की कविता के संबंध में कुछ आक्षेप हैं। जैसे वक्तव्य की प्रधानता, शहरी वातावरण की प्रधानता, भारतीय जीवन की ठोस चुनौतियों का अभाव आदि। परंतु इस सोपान में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘इस काल की कविता में जनवादी काव्यांदोलन नए तेवर और तैयारी के साथ उभरा। इन कविताओं में संघर्ष का तेवर मुख्य है और राजनीतिक तथा आर्थिक शोषण इनका उपजीव्य है।’ (पृ. 182)। उपलब्धियों की दृष्टि से इस दशक की कविता संपन्न कविता है।

इक्कीसवीं सदी की कविता में एक बार फिर कथात्मकता, छंद और लय की वापसी हुई। समकालीन रचनाधर्मिता के मर्म को जानना हो, तो ‘कविता की रचनाधार्मिता : जनपद और लोक’ शीर्षक सोपान से गुजरना काफ़ी है। लेखक ने यह प्रतिपादित किया है कि विश्वसनीयता, लोकचित्त, विचार, नई भाषा की तलाश आदि समकालीन रचनाधार्मिता के प्रमुख बिंदु हैं। उन्होंने यह भी निरूपित किया है कि इस कविता में स्थानीयता और तात्कालिकता के बावजूद सार्वभौमता और विश्वदृष्टि को साधा जा सका है।

उत्तर आधुनिक विकेंद्रीकरण के कारण समाज, राजनीति, साहित्य, कला और दर्शन आदि सभी क्षेत्रों में नए-नए खंड बन रहे हैं- स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, किन्नर, किसान, वृद्ध आदि। कहने का आशय है कि हाशिये के भीतर धकेले गए समुदाय अब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ‘उत्तर आधुनिकता के क्षितिज पर विमर्शों का इंद्रधनुष’ शीर्षक अंतिम सोपान में इस बात की गहन चर्चा करते हुए लेखक ने विशेष रूप से दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श पर केंद्रित कविता का आकलन किया है और निरूपित किया है कि बहुकेंद्रीयता नई सदी के आरंभिक दशकों की मुख्य परिस्थिति भी है, और प्रवृत्ति भी।

अंततः कहना ही होगा कि कविता के क्षेत्र में अनुसंधानरत शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए ‘हिंदी कविता : अतीत से वर्तमान’ निश्चित रूप से एक आकर ग्रंथ सिद्ध होगा। यह पुस्तक बहुत ही प्रासंगिक है। इस पुस्तक को ध्यान से पढ़ेंगे तो आप अनेक प्रवृत्तियों और उप-प्रवृत्तियों को जरूर चिह्नित कर सकेंगे। लेकिन इसके लिए परिश्रम करना ही होगा। जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ! (कबीर)। लेखक ने समकालीन कविता के सागर में गहरा गोता लगाकर ही ये मोती खोजे हैं।

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समीक्षित पुस्तक : हिंदी कविता : अतीत से वर्तमान तक
लेखक : ऋषभदेव शर्मा
प्रकाशन वर्ष : 2021
प्रकाशक : साहित्य रत्नाकर, कानपुर
पृष्ठ : 224
मूल्य : रु. 495/-

'महाबली' : संतन कहा सीकरी सों काम




यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि 2021 का प्रतिष्ठित व्यास सम्मान असग़र वजाहत (5 जुलाई, 1946) को उनके नाटक ‘महाबली’ (2019) के लिए प्रदान किया जा रहा है। ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से उन्हें हार्दिक अभिनंदन! स्मरणीय है कि वे हिंदी अकादमी दिल्ली के श्रेष्ठ नाटककार सम्मान (2009-10), संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (2014), दिल्ली हिंदी अकादमी के सर्वोच्च शलाका सम्मान (2016) से अलंकृत हो चुके हैं।

असग़र वजाहत सुप्रसिद्ध नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार और व्यंग्यकार हैं। अँधेरे से (1977), दिल्ली पहुँचना है (1983), स्विमिंग पूल (1990), सब कहाँ कुछ (1991), मैं हिंदू हूँ (2006), डेमोक्रेसिया (2010) आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं। मुश्किल काम (2010) और भीड़तंत्र (2018) लघुकथा संग्रह हैं। 10 प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी प्रिय कहानियाँ, पिचासी कहानियाँ और असग़र वजाहत : श्रेष्ठ कहानियाँ - उनकी चयनित कहानियों के संग्रह हैं। फ़िरंगी लौट आये, वीरगति (1981), इन्ना की आवाज़ (1986), समिधा, जिस लाहौर नहीं देख्या ओ जम्याइ नई (1991), गोडसे@गांधी.कॉम (2012), पाकिटमार रंगमंडल आदि उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। सबसे सस्ता गोश्त (2015) उनके 14 नुक्कड़ नाटकों का संग्रह है। सात आसमान (1996), पहर-दोपहर, कैसी आगी लगाई (2006), बरखा रचाई (2011), धरा अँकुराई (2014) उनके उपन्यास हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने आलोचना, धारावाहिक, यात्रावृत्तांत और पटकथाएँ भी लिखी हैं।

असग़र वजाहत ने लेखन की शुरूआत कहानी के माध्यम से की। इस पर प्रकाश डालते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि ‘सबसे पहले कहानी लिखी। उर्दू में लिखी पहली कहानी ‘वो बिक गई’ शहरे तमन्ना अख़बार में 1962-63 में अलीगढ़ में छपी थी।’ उनकी मान्यता है कि साहित्य को सार्थक दिशा नई चुनौतियों से मिलती है। रंगों से संवेदना प्रकट करना यदि कला है, तो शब्दों से संवेदना की अभिव्यक्ति लेखन है। उन्होंने इसी लेखन को अपना शस्त्र बनाया। अपने लेखन के संबंध उन्होंने कहा है, ‘अभिव्यक्ति या अपनी बात कहने और जो कुछ हमारे आस-पास हो रहा है इसका एक तरह से विरोध करने का जो कलात्मक जीवन हो सकता है या लोगों के बदलने और लोगों के अंदर कुछ इच्छाएँ जगाने की कोशिश की जा सकती है, उसके लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। इसके लिए मैंने लेखन को अपनाया।’ साहित्य में एक दौर ऐसा भी आया, जब अपशब्दों को यथार्थ की पहचान माना जाने लगा था। लेकिन असग़र वजाहत अपशब्दों के प्रयोग का यह कहकर खंडन करते हैं कि चटखारे के लिए अपशब्दों के प्रयोग कहानी को कमज़ोर व भद्दा बनाते हैं। अतः ऐसे प्रयोगों से साहित्यकार को बचना चाहिए।

असग़र वजाहत एक सफल नाटककार हैं। उन्हें यह पता है कि नाटक के माध्यम से न ही पैसा कमाया जा सकता है और न ही किसी का समर्थन, फिर भी उन्होंने इस विधा को सशक्त बनाया। उनका कहना है, ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि नाटक में न पैसा है, न प्रसिद्धि और न ही कोई सरकारी समर्थन या सहयोग। फिर भी नाटक लिख रहा हूँ। सिर्फ आत्माभिव्यक्ति और आत्म-संतुष्टि के लिए।’ आत्माभिव्यक्ति और आत्म-संतुष्टि के लिए लिखे गए नाटक ‘महाबली’ के कारण उन्हें आज व्यास सम्मान से पुरस्कृत किया जा रहा है।

‘महाबली’ नाटक के बारे में कहें तो यह नाटक सत्ता और कला के बीच के संबंधों पर आधारित है। इसमें मुगल सम्राट अकबर और तुलसीदास की बातचीत है जो सत्ता और कला के संबंधों पर विस्तृत प्रकाश डालती है। इस नाटक की भूमिका में स्वयं असग़र वजाहत ने इस बात की पुष्टि की है कि ‘सम्राट अकबर को अपने दरबार में प्रतिभाओं को जमा करने का शौक था। वह आज भी अपने नौ रत्नों के लिए जाना जाता है। नौ रत्नों के अतिरिक्त उसके दरबार में अलग-अलग प्रकार के विद्वान, धर्मशास्त्री, कलाविद् और हर क्षेत्र की प्रतिभाएँ दिखाई देती हैं। ऐसी स्थिति में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि सम्राट अकबर ने महाकवि तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाने की कोशिश की होगी। इतिहास में इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। नाटक में यह दर्शाया गया है कि सम्राट अकबार ने तुलसीदास को सीकरी बुलाया था और वे सीकरी नहीं गए। इस घटना के माध्यम से तुलसीदास और अकबर ही नहीं, बल्कि राजसत्ता और कला के पारस्परिक द्वंद्व को उभारा गया है।’

इतिहास में इसका कोई प्रमाण नहीं कि तुलसीदास और सम्राट अकबर दोनों की भेंट हुई थी। लेकिन असग़र वजाहत यह मानते हैं कि दोनों का मिलना जरूरी है। उन्होंने अपनी कल्पना को विस्तार दिया और दोनों के बीच संवाद स्थापित किया। और इस संवाद के माध्यम से उन्होंने लोकतंत्रीकरण, राजसत्ता और कला के संबंध में गहन विचार-विमर्श प्रस्तुत किए। वे नई पीढ़ी के रचनाकारों से यह अपील करते हैं कि ‘नई पीढ़ी के लेखकों को वही लिखना चाहिए जो वे पूरी तरह अनुभव करते हों। जिस पर उनका विश्वास हो। जो उन्हें दिल से निकली हुई बात लगती हो। नए लेखकों को किसी तरह का विशेष आग्रह लेकर नहीं चलना चाहिए।’

पुनश्च : दक्षिण भारत में असग़र वजाहत शोधार्थियों और शोध निर्देशकों में अति लोकप्रिय हस्ताक्षर हैं। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद केंद्र में ‘असग़र वजाहत के कहानी संग्रह ‘डेमोक्रेसिया’ में समकालीन बोध और व्यंग्य’ विषय पर मेरे ही निर्देशन में राहुल ने 2014 में लघुशोध प्रबंध प्रस्तुत किया था।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

साइबर अपराध, बच्चे और साहित्य



साइबर दुनिया की सबसे और जटिल समस्या है साइबर अपराध। मूल रूप से यह अवैध और जघन्य कार्य है। इसमें कंप्यूटर या तो उपकरण है या फिर लक्ष्य। इंटरनेट क्रांति के कारण हम आसानी से दुनिया भर से सूचनाएँ एक क्लिक में प्राप्त कर पा रहे हैं। इससे अनेक लाभ उठा सकते हैं, लेकिन मनुष्य का मस्तिष्क इतना विकृत हो चुका है कि वह साइबर पोर्नोग्राफ़ी, साइबर स्टाकिंग, ईमेल बम विस्फोट, वायरस अटैक, वेब जैकिंग आदि अपराध के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट का दुरुपयोग कर रहा है। ये सब तो अपनी जगह है ही, पर साइबर दुनिया का उपयोग बाल शोषण के लिए किया जा रहा है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस, बाल दिवस, विश्व बालश्रम विरोधी दिवस, बाल अधिकार दिवस, बाल सुरक्षा दिवस आदि मनाए जा रहे हैं और दूसरी ओर बच्चों का शोषण किया जा रहा है।

बाल शोषण अक्षम्य अपराध है। बाल मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए अनेक कानून हैं। फिर भी समाज से बाल शोषण को मिटाना असंभव हो रहा है। हर दिन बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराध सामने आ रहे हैं। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने बच्चों का सर्वेक्षण करवाया था। 53 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि वे किसी न किसी रूप से यौन शोषण के शिकार हुए हैं। उस अध्ययन से यह भी पता चला कि पाँच से 12 वर्ष तक की उम्र के छोटे बच्चे सबसे अधिक शिकार होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार बाल यौन शोषण संरक्षण कानून (पोक्सो) के तहत जहाँ वर्ष 2017 में 32,608 मामले दर्ज किए गए वहीं 2018 में इस कानून के तहत 39,827 मामले दर्ज किए गए। जब कि 2019 में 1,28,531 मामले दर्ज हुए। इससे यह स्पष्ट है कि कोरोना महामारी के समय बच्चों का शोषण दर बढ़ गया। बाल अधिकार संगठन ने कहा कि “हालांकि बच्चों के खिलाफ अपराधों की कुल संख्या में गिरावट आई है, लेकिन बाल विवाहों के मामलों में 50 प्रतिशत इजाफा हुआ है जबकि एक वर्ष में ऑनलाइन दुर्व्यवहार के मामलों में 400 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।” चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) की प्रीति महारा का कहना है कि यह चिंता का विषय तो है ही, पर लोग इसके बारे में सूचनाएँ दे रहे हैं जिससे एक सकारात्मक बात सामने आती है कि लोगों का कानून में विश्वास बढ़ रहा है।

साइबर शोषण सर्वसाधारण बात नहीं है, बल्कि चिंता का विषय है। जब प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से ऐसी खबरें सामने आती हैं तो एक क्षण के लिए हम सब संवेदनशील हो जाते हैं लेकिन अगले ही क्षण उसे भूल भी जाते हैं।

बच्चों के खिलाफ अपराध कोई नई बात नहीं है। फर्क बस इतना ही है कि आज यह बात सामने आ रही है। यह भी निर्विवाद सच है कि इस समाज में ऐसे अनेक माता-पिता हैं जो अपने बच्चों के साथ हुए शोषण को अनदेखा करते हैं या फिर दबा देते हैं। आजकल ऑनलाइन के माध्यम से ही पढ़ाई हो रही है। अतः बच्चों को साइबर अपराध के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। इसीलिए एनसीआरटी के द्वारा साइबर जागृति दिवस के तहत सभी स्कूली बच्चों को जागरूक करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। यह सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि अभिभावकों के लिए भी आवश्यक है।

शिक्षाविद या समाज सेवी ही नहीं बल्कि संवेदनशील साहित्यकारों ने भी इस ओर ध्यान दिया है। नासिरा शर्मा का लघु उपन्यास ‘शब्द पखेरू’ यह आगाह करता है कि नई पीढ़ी अनजाने में साइबर क्राइम का हिस्सा बन सकती है। इस उपन्यास की नायिका शैलजा अनजाने में फ़ेसबुक दोस्त के कारण साइबर अपराध में फंस जाती है। नासिरा शर्मा ने इस उपन्यास के माध्यम से सबको आगाह किया है कि यदि हम जागरूक हों तो बढ़ते साइबर अपराध से अपने आपको बचा सकते हैं। प्रो. त्रिवेणी सिंह (आईपीएस) और अमित दुबे की पुस्तक ‘अदृश्य जाल’ (2021) में संकलित कहानियाँ साइबर क्राइम की सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। कहानिकारों ने स्पष्ट किया है कि यह पुस्तक एक प्रयास है “अधिक-से-अधिक लोगों को जागरूक करने और ऑनलाइन की दुनिया के बढ़ते खतरों से बचाने के लिए। इसलिए इस पुस्तक की बिक्री से अर्जित पूँजी रूट 64 फाउंडेशन (root64.in) नामक संस्था को दी जाएगी, जो कि इस साइबर क्राइम के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ पुलिस और दूसरी लॉ एंफोर्समेंट एजेंसी को ट्रेनिंग देना काम करती है।”

बच्चों को एक सुरक्षित वातावरण देने के बजाय हम शोषणपूर्ण परिवेश दे रहे हैं। बच्चों पर ही कल आधारित है। अतः यह प्रत्येक नागरिक कर्तव्य है कि बच्चों को हर तरह के अपराधों के प्रति जागरूक करें। इसके लिए अभियान चलाना होगा। उन्हें स्वस्थ समाज देना होगा।