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शुक्रवार, 7 जून 2024

मैं गुड़िया नहीं, गाय नहीं, गुलाम नहीं!



समाज में किसी व्यक्ति व समुदाय की अस्मिता अथवा पहचान का मुख्य आधार उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा ही होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए समाज में अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि दुनिया के सभी समाजों में सदियों से पुरुष और स्त्री को अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है। स्त्री को कमजोर माना जाता है और उसे हमेशा ही अबला, दीन, कमजोर, वीक जेंडर आदि अनेक विशेषणों से संबोधित किया जाता है; लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है कि स्त्री भले ही शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर है पर मानसिक रूप से वह किसी भी स्तर पर कम नहीं है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का यह कथन उल्लेखनीय है: “नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव अधिक तीव्र तथा स्थायी होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अंतर है जितना विद्युत और झड़ी में। एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं, परंतु प्यास नहीं बुझाई जा सकती। दूसरी से शांति मिलती है, परंतु पशुबल की उत्पत्ति संभव नहीं। दोनों के व्यक्तित्व, अपनी पूर्णता में समाज के एक ऐसे रिक्त स्थान को भर देते हैं जिससे विभिन्न सामाजिक संबंधों में सामंजस्य उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण कर देता है।” (महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृ.11-12)। स्त्री-पुरुष साहित्य के केंद्र में भी आ चुके हैं। साहित्यकार इनके विविध रूपों और विविध संबंधों का चित्रण करते रहे हैं।

1990 के बाद विमर्शों का साहित्य भारतीय भाषाओं में उभरने लगा। इसकी भूमिका एक तरह से उसी समय तैयार हो चुकी थी जब ‘नई कविता’ अस्तित्व और अस्मिता की खोज की बात कर रही थी। नई कविता में व्यक्ति की जिजीविषा और अस्तित्व के संघर्ष की बात थी। आगे चलकर यही व्यक्ति समुदाय में बदल गया - हाशियाकृत समुदाय में। उस समुदाय का संघर्ष ही विमर्श है। जीने की इच्छा, अस्तित्व और अस्मिता को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद, शोषण के प्रति आक्रोश और संघर्ष के परिणामस्वरूप स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, तृतीय लिंगी, पर्यावरण आदि विमर्श सामने आए।

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, अतः स्त्री विमर्श पर दृष्टि केंद्रित करना समीचीन होगा। स्त्री विमर्श की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करने से पूर्व ‘स्त्री’ शब्द पर विचार करना आवश्यक है। स्त्री शब्द के अनेक पर्याय हैं। जैसे हिंदी में नारी, औरत, महिला, कन्या, मादा, श्रीमती, लुगाई आदि और अंग्रेजी में female, woman, damsel. इसी तरह तेलुगु में स्त्री, आडदी, इंति, महिला, कन्या, श्रीमती, आविडा, आडपिल्ला, अम्मायी, मगुवा आदि शब्दों का प्रयोग संदर्भ के अनुसार किया जाता है। इसी तरह तमिल में पेन, मंगै, श्रीमत आदि का प्रयोग किया जाता है। यदि ‘स्त्री’ शब्द के व्युत्पत्तिमूलक अर्थ पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होता है कि यास्क ने अपने ‘निरुक्त’ में ‘स्त्यै’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति मानी है जिसका अर्थ लगाया गया है – लज्जा से सिकुड़ना। पाणिनि ने भी ‘स्त्यै’ धातु से ही ‘स्त्री’ की व्युत्पत्ति सिद्ध की है, पर इस धातु का अर्थ इकट्ठा करना लगाया है – ‘‘स्त्यै शब्द-संघातयोः’ (धातुपाठ)। साहित्य में स्त्री को दया, माया, श्रद्धा, देवी आदि अनेक रूपों में संबोधित किया जाता है। स्त्री को इस तरह अनेक रूपों में विभाजित करके देखने के बजाय उसके व्यक्तित्व को समग्र रूप में अर्थात मानवी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

भारतीय स्त्री को बचपन से ही घर और समाज की मर्यादाओं की पट्टी पढ़ाई जाती है। पुराने समय में लड़की को एक सीमा तक ही शिक्षा प्रदान की जाती थी। उसे घरेलू काम-काज में प्रशिक्षण दिया जाता था। उसके लिए तरह-तरह की पाबंदियाँ होती थीं। हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है न कि ‘न स्त्री स्वातंत्र्यम् अर्हति’। यही माना जाता रहा है कि स्त्री पिता, पति और पुत्र के संरक्षण में सुरक्षित रहती है। लेकिन शास्त्रकार यह भूल जाते हैं कि स्त्री भी है तो मनुष्य ही। वह मानवी है। उसके भीतर भी भावनाएँ हैं। पुरुषसत्तात्मक समाज ने उसे माँ और देवी का रूप प्रदान करके उसे ऐसे सिंहासन पर बिठा दिया कि वह कठपुतली बनती गई। स्त्री को जहाँ एक ओर देवी, माँ, भगवती आदि कहकर संबोधित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर उसकी अवहेलना की जाती है। “नारी के देवत्व की कैसी विडंबना है!” (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 35)। पुरुष के समान स्त्री भी इस समुदाय का हिस्सा है, तो सारे प्रतिबंध उसी के लिए क्यों!? पुरुष के लिए क्यों नहीं?

स्त्री को यह कहकर घर की चारदीवारी तक सीमित किया गया कि घर के बाहर वह असुरक्षित है। घर ही उसका साम्राज्य है। “कितना मनहूस था वह दिन जब किसी पिता ने, किसी भाई ने, किसी बेटे ने,/ किसी बेटी को/ किसी बहन को/ किसी माँ को, किसी पत्नी को सुझाव दिया था/ घर में रहने का, हिदायत दी थी/ देहरी न लाँघने की/ और बँटवारा कर दिया था/ दुनिया का - घर और बाहर में।/ बाहर की दुनिया पिता की थी – वे मालिक थे, संरक्षक थे/ भीतर की दुनिया माँ की थी – वे गृहिणी थीं संरक्षिता थीं।” (ऋषभदेव शर्मा, क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें, देहरी, पृ. 36)।

स्त्री जिस घर में जन्म लेती है वह घर विवाह के बाद उसके लिए पराया हो जाता है। उस घर के लिए वह मेहमान बन जाती है। विवाह के बाद नए घर में प्रवेश करके वहाँ अपने आपको जड़ से रोपने की कोशिश करती है। और यह कोशिश निरंतर चलती है। रुकने का नाम नहीं लेती। इस रोपने की क्रिया में उसे तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उसकी एक नई पहचान बनती है। और वह नए रिश्ते में बंध जाती है। सबकी जरूरतों के बारे में सोचने वाली स्त्री अपनी जरूरतों को दरकिनार कर देती है। इस संदर्भ में मुझे तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा की प्रसिद्ध कविता ‘सुई’ याद आ रही है। उस कविता में उन्होंने सुई के माध्यम से स्त्री जीवन को व्यक्त किया है। यहाँ सुई प्रतीक है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता के धागों से पिरोती है - इन्सानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फटे भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-भेदों को रफू करना चाहती हूँ/ आर-पार न सूझने वाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में/ मेरी सुई है/ और लोकों की समष्टि के लिए खुला कांतिनेत्र। (एन. अरुणा, मौन भी बोलता है, पृ. 53-54)। इतना करने पर भी स्त्री को क्या मिलता है! कभी-कभी तो उसे घर के सदस्यों की अवहेलना और तिरस्कार भी झेलना पड़ता है। चाहे गलती किसी की भी क्यों न हो स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है। “युगों से उसको उसकी सहनशीलता के लिए दंडित होना पड़ रहा है।” (महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृ.17)।

समय के साथ-साथ स्त्री भी मूलभूत मानवाधिकारों के प्रति सचेत हो गई। सदियों से हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी। यदि महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो “स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है। कारण वह जान गई है कि एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाना है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना है जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे। आज उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उत्तीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है।” (वही, पृ.105)। शोषण के प्रति स्त्री अपनी आवाज उठाने लगी: “नहीं! मैं गुड़िया नहीं,/ मैं गाय नहीं,/ मैं गुलाम नहीं!” (ऋषभदेव शर्मा, गुड़िया-गाय,-गुलाम, देहरी, पृ.10)। परिणामस्वरूप स्त्री विमर्श की अवधारणा सामने आई।

स्त्री विमर्श की अवधारणा भारत एवं पाश्चात्य संदर्भ में बिल्कुल अलग-अलग है क्योंकि भारतीय दृष्टि में स्त्री ‘मूल्य’ है जबकि पाश्चात्य दृष्टि में वह मात्र ‘वस्तु’ है। स्त्री विमर्श एक प्रतिक्रिया है। युगों की दासता, पीड़ा और अपमान के विरुद्ध स्त्री की सकारात्मक प्रतिक्रिया है अपनी अस्मिता एवं अस्तित्व की रक्षा हेतु। 1949 में सिमोन द बुआ ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में स्त्री को वस्तु रूप में प्रस्तुत करने की स्थिति पर प्रहार किया। डोरोथी पार्कर का मानना है कि स्त्री को स्त्री के रूप में ही देखना होगा क्योंकि पुरुष और स्त्री दोनों ही मानव प्राणी हैं। 1960 में केट मिलेट ने पुरुष की रूढ़िवादी मानसिकता पर प्रहार किया। वर्जीनिया वुल्फ़, जर्मेन ग्रीयर आदि ने भी स्त्री के अधिकारों की बात की। इन स्त्रीवादी चिंतकों का प्रभाव भारतीय समाज पर भी पड़ा। भारतीय स्त्रीचिंतकों में वृंदा करात, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, महाश्वेता देवी, मेधा पाटकर, अरुंधति राय, वोल्गा, अब्बूरी छायादेवी, जयाप्रभा, अंबै (सी.एस.लक्ष्मी) आदि उल्लेखनीय हैं।

स्त्री, समाज को अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर देखती है। वह जब से यह महसूस करने लगी कि वह पुरुष से किसी भी स्तर पर कम नहीं तब से ही वह अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए आवाज उठाने लगी। स्त्री विमर्श में महत्वपूर्ण कारक है ‘जेंडर’। स्त्री इसी लिंग केंद्रित जड़ता को तोड़ना चाहती है। इसे स्त्री मुक्ति का पहला चरण माना जा सकता है। वैश्विक स्तर पर घटित विभिन्न आंदोलन स्त्रीवादी सैद्धांतिकी को निर्मित करने में सहायक सिद्ध हुए। प्रमुख रूप से उदारवादी स्त्रीवाद, समाजवादी-मार्क्सवादी स्त्रीवाद, रेडिकल स्त्रीवाद, सांस्कृतिक स्त्रीवाद, पर्यावरणीय स्त्रीवाद, वैयक्तिक स्त्रीवाद स्त्री प्रश्नों पर प्रकाश डालते हैं।

वस्तुतः स्त्री विमर्श के लिए कुछ समीक्षाधार निर्धारित करना अनिवार्य है। समाज में स्त्री की स्थिति, स्त्री विषयक पारंपरिक मान्यताओं पर पुनर्विचार, पारंपरिक स्त्री संहिता की व्यावहारिक अस्वीकृति, शोषण के विरुद्ध स्त्री का असंतोष और आक्रोश, देह मुक्ति, पुरुषवादी वर्चस्व के ढाँचे को तोड़ना, स्त्री सशक्तीकरण और सार्वजनिक जीवन में स्त्री की भूमिका आदि को प्रमुख रूप से स्त्री विमर्श की कसौटियाँ माना जा सकता है। इनके आधार पर साहित्य का स्त्री विमर्शमूलक विश्लेषण आसानी से किया जा सकता है।

भाषा की दृष्टि यदि स्त्री विमर्श को देखा जाए तो रोचक तथ्य सामने आते हैं। स्त्री-भाषा पुरुष की भाषा से भिन्न होती है। स्त्री अपने अनुभव जगत से शब्द चयन करती है। जहाँ पुरुष-भाषा में वर्चस्व, रौब और अधिकार की भावनाओं को देखा जा सकता है वहीं स्त्री-भाषा में सखी भाव अर्थात मैं से हम की यात्रा को देखा जा सकता है। सामान्य स्त्री के भाषिक आचरण में पुरुष की रुचि-अरुचि का ध्यान रखने की प्रवृत्ति, परिवार की शुभेच्छा की प्रवृत्ति, स्त्री सुलभ कलाओं में रुचि की प्रवृत्ति, घर-परिवार और संस्कारों में रुचि की प्रवृत्ति, घरेलू चिंताओं की प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। इसी प्रकार एक शिक्षित स्त्री के भाषिक आचरण में पूर्ण आत्मविश्वास, निडरता, जागरूकता, स्थितियों के विश्लेषण की क्षमता आदि प्रवृत्तियों को देखा जा सकता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि स्त्री विमर्श से अभिप्राय है स्त्री में आत्मनिर्णय की प्रवृत्ति होना जिससे वह उस रूढ़िगत स्त्री संहिता का अतिक्रमण कर सकती है जो उसकी अस्मिता एवं अस्तित्व के लिए घातक है तथा सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभा सकती है। 8 मार्च को हर.वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अभियान के रूप में मनाया जाता है। यह 1909 से शुरू होकर आज तक चल रहा है। इस वर्ष का थीम है इंस्पायर इनक्लूजन। अर्थात हर क्षेत्र की स्त्री को प्रोत्साहित करना और उन्हें आगे बढ़ने में सहायता करना।

‘हिंदी प्रचार समाचार’ के पाठकों को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।

सोमवार, 31 मई 2021

स्त्री विमर्श


समाज में किसी व्यक्ति अथवा समुदाय की अस्मिता अथवा पहचान का मुख्य आधार उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए समाज में अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि दुनिया के सभी समाजों में सदियों से पुरुष और स्त्री को अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है। स्त्री को कमजोर माना जाता है और उसे हमेशा ही अबला, दीन, कमजोर, वीक जेंडर आदि अनेक विशेषणों से संबोधित किया जाता है। लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है कि स्त्री भले ही शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर है लेकिन मानसिक रूप से वह किसी भी स्तर पर कम नहीं है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का यह कथन उल्लेखनीय है। “नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादिभाव अधिक तीव्र तथा स्थायी होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अंतर है जितना विद्युत और झड़ी में। एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं, परंतु प्यास नहीं बुझाई जा सकती। दूसरी से शांति मिलती है, परंतु पशुबल की उत्पत्ति संभव नहीं। दोनों के व्यक्तित्व, अपनी पूर्णता में समाज के एक ऐसे रिक्त स्थान को भर देते हैं जिससे विभिन्न सामाजिक संबंधों में सामंजस्य उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण कर देता है।” (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 11-12)। स्त्री-पुरुष साहित्य के केंद्र में भी आ चुके हैं। साहित्यकार इनके विविध रूपों और विविध संबंधों का चित्रण करते रहे हैं।

1990 के बाद विमर्शों का साहित्य भारतीय भाषाओं में उभरने लगा। इसकी भूमिका एक तरह से उसी समय तैयार हो चुकी थी जब ‘नई कविता’ अस्तित्व और अस्मिता की खोज की बात कर रही थी। नई कविता में व्यक्ति की जिजीविषा और अस्तित्व के संघर्ष की बात थी। आगे चलकर यही व्यक्ति समुदाय में बदल गया - हाशियाकृत समुदाय में। उस समुदाय का संघर्ष ही विमर्श है। जीने की इच्छा, अस्तित्व और अस्मिता को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद, शोषण के प्रति आक्रोश और संघर्ष के परिणामस्वरूप स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, तृतीय लिंगी, पर्यावरण आदि विमर्श सामने आए।

अब हम स्त्री विमर्श पर दृष्टि केंद्रित करेंगे। स्त्री विमर्श की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करने से पूर्व ‘स्त्री’ शब्द पर विचार आवश्यक है। स्त्री शब्द के अनेक पर्याय हैं। जैसे हिंदी में नारी, औरत, महिला, कन्या, मादा, श्रीमती, लुगाई आदि और अंग्रेजी में female, woman, damsel। इसी तरह तेलुगु में स्त्री, आडदी, इंति, महिला, कन्या, श्रीमती, आविडा, आडपिल्ला, अम्मायी, मगुवा आदि शब्दों का प्रयोग संदर्भ के अनुसार किया जाता है। यदि ‘स्त्री’ शब्द के व्युत्पत्तिमूलक अर्थ पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होता है कि यास्क ने अपने ‘निरुक्त’ में ‘स्त्यै’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति की है जिसका अर्थ लगाया गया है – लज्जा से सिकुड़ना। पाणिनी ने भी ‘स्त्यै’ धातु से ही ‘स्त्री’ की व्युत्पत्ति की है, पर इस धातु का अर्थ शब्द करना और इकट्ठा करना लगाया है – ‘‘स्त्यै शब्द-संघातयोः’ (धातुपाठ)। साहित्य में स्त्री को दया, माया, श्रद्धा, देवी आदि अनेक रूपों में संबोधित किया जाता है। स्त्री को इस तरह अनेक रूपों में विभाजित करके देखने के बजाए उसके व्यक्तित्व को समग्र रूप में अर्थात मानवी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

भारतीय स्त्री को बचपन से ही घर और समाज की मर्यादों की पट्टी पढ़ाई जाती है। पुराने समय में लड़की को एक सीमा तक ही शिक्षा प्रदान की जाती थी। उसे घरेलू काम-काज में प्रशिक्षण दिया जाता था। उसके लिए तरह-तरह की पाबंदियाँ होती थीं। हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है न कि ‘स्त्री न स्वातंत्र्यम अर्हती’। यही माना जाता रहा है कि स्त्री पिता, पति और पुत्र के संरक्षण में सुरक्षित रहती है। लेकिन यह भूल जाते हैं कि वह भी मनुष्य है। मानवी है। उसके भीतर भी भावनाएँ हैं। पुरुषसत्तात्मक समाज ने उसे माँ और देवी का रूप प्रदान करके उसे ऐसे सिंहासन पर बिठा दिया कि वह कठपुतली बनती गई। स्त्री को जहाँ एक ओर देवी, माँ, भगवती आदि कहकर संबोधित किया जाता है वहीं दूसरी ओर उसकी अवहेलना की जाती है। “नारी के देवत्व की कैसी विडंबना है!” (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 35)। पुरुष के समान स्त्री भी इस समुदाय का हिस्सा है तो सारे प्रतिबंध उसी के लिए क्यों!? पुरुष के लिए क्यों नहीं?

स्त्री को यह कहकर घर की चारदीवारी तक सीमित किया गया कि घर के बाहर वह असुरक्षित है। घर ही उसका साम्राज्य है। लेकिन जिस घर में जन्म लेती है वह घर विवाह के बाद उसके लिए पराया हो जाता है। उस घर के लिए वह मेहमान बन जाती है। विवाह के बाद नए घर में प्रवेश करके वहाँ अपने आपको जड़ से रोपने की कोशिश करती है। और यह कोशिश निरंतर चलती है। रुकने का नाम नहीं लेती। इस रोपने की क्रिया में उसे तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उसकी एक नई पहचान बनती है। और वह नए रिश्ते में बंध जाती है। सबकी जरूरतों के बारे में सोचने वाली स्त्री अपनी जरूरतों को दरकिनार कर देती है। इस संदर्भ में मुझे तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा की प्रसिद्ध कविता ‘सुई’ याद आ रही है। उस कविता में उन्होंने सुई के माध्यम से स्त्री जीवन को व्यक्त किया है। यहाँ सुई प्रतीक है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता की धागों से पिरोती है - इन्सानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फट्टे भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-भेदों को रफू करना चाहती हूँ/ आर-पार न सूझने वाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में/ मेरी सुई है/ और लोकों की समीष्टि के लिए खुला कांतिनेत्र। ( मौन भी बोलता है, पृ. 53-54)। लेकिन उसे क्या मिलता है! कभी-कभी तो उसे घर के सदस्यों की अवहेलना और तिरस्कार को झेलना पड़ता है। चाहे गलती किसी की भी क्यों न हो स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है। ‘युगों से उसको उसकी सहनशीलता के लिए दंडित होना पड़ रहा है।‘ (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 17)।

समय के साथ-साथ स्त्री भी मूलभूत मानाधिकारों के प्रति सचेत हो गई। सदियों से हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी। यदि महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो “स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है। कारण वह जान गई है कि एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाना है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना है जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे। आज उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उत्तीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है।“ (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 105)। शोषण के प्रति स्त्री अपनी आवाज उठाने लगी। परिणामस्वरूप स्त्री विमर्श की अवधारणा सामने आई।

स्त्री विमर्श की अवधारणा भारत एवं पाश्चात्य संदर्भ में बिल्कुल अलग-अलग है क्योंकि भारतीय दृष्टि में स्त्री ‘मूल्य’ है जबकि पाश्चात्य दृष्टि में वह मात्र ‘वस्तु’ है। अब स्त्री विमर्श की कुछ परिभाषाओं पर चर्चा करेंगे।

स्त्री विमर्श अथवा स्त्रीवाद को अंग्रेजी में ‘feminism’ कहा जाता है। इस शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन शब्द ‘फेमिना’ से मानी जाती है जिसका अर्थ है ‘स्त्री’। इसे स्त्रियों के अधिकारों के लिए किए जाने वाले संघर्ष के रूप में देखा जाने लगा है।

एस्टेल फ़्रडमेन (Estelle Freedman) ने अपनी पुस्तक ‘Feminism, Sexuality & Politics’ में यह कहा है कि “I use feminism as an umbrella term for any movement seeking to achieve full economic and political citizenship for woman.” (pg. 210). इससे यह स्पष्ट होता है कि स्त्री के नागरिक अधिकारों के लिए होने वाले समस्त आर्थिक एवं राजनैतिक आंदोलन स्त्री विमर्श के अंतर्गत समाहित हैं।

रेबेका लेविन (Rebecca Lewin) का मानना है कि “Feminism is a theory that calls for woman’s attainment of social, economic and political rights and opportunities equal to those possessed by men.” कहने का आशय है कि जिस तरह पुरुष सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में अधिकार प्राप्त करते हैं वैसे ही स्त्री भी उन सभी अधिकारों के लिए समान रूप से अधिकारी है।

स्त्री विमर्श एक प्रतिक्रिया है। युगों की दासता, पीड़ा और अपमान के विरुद्ध स्त्री की सकारात्मक प्रतिक्रिया है अपनी अस्मिता एवं अस्तित्व की रक्षा हेतु। 1949 में सिमोन द बुआ ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में स्त्री को वस्तु रूप में प्रस्तुत करने की स्थिति पर प्रहार किया। डोरोथी पार्कर का मानना है कि स्त्री को स्त्री के रूप में ही देखना होगा क्योंकि पुरुष और स्त्री दोनों ही मानव प्राणी हैं। 1960 में केट मिलेट ने पुरुष की रूढ़िवादी मानसिकता पर प्रहार किया। वर्जीनिया वुल्फ़, जर्मेन ग्रीयर आदि ने भी स्त्री के अधिकारों की बात की। इन स्त्रीवादी चिंतकों का प्रभाव भारतीय समाज पर भी पड़ा। भारतीय स्त्रीचिंतकों में वृंदा करात, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, महाश्वेता देवी, मेधा पाटकर, अरुंधति राय, वोल्गा, अब्बूरी छायादेवी, जयाप्रभा आदि उल्लेखनीय हैं।

स्त्री विमर्श की अवधारणा भारतीय एवं पाश्चात्य संदर्भ में अलग-अलग है। भारतीय संस्कृति बहुत प्राचीन संस्कृति है। यहाँ वैदिक काल में स्त्रियों को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था। प्रमाणस्वरूप स्त्रियों द्वारा रचित ऋचाओं को देख सकते हैं। उस काल में साहित्यिक क्षेत्र में स्त्री की सहभागिता थी। उस काल में स्त्री को गृहस्थ का गुरुतर भार वहन करने की प्रेरणा के साथ-साथ यह भी आदेश दिया जाता था कि समय आने पर वीरता दिखानी होगी। निस्संदेह उस काल में स्त्री को कुछ अधिकार प्राप्त थे लेकिन पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण वह धीरे-धीरे बंधनों में जकड़ती गई। विदेशी आक्रमणों के फलस्वरूप मध्यकाल में स्त्री शोषण के चक्रव्यूह में फँस गई। पुनर्जागरण काल में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, गोविंद रानाड़े आदि चिंतकों ने स्त्री को सचेत करने का प्रयास किया। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल, झलकारी बाई, ऊदा देवी, अज़ीज़न बाई, कर्नाटक प्रदेश की कित्तूर चेन्नम्मा, आंध्र की नयकुरालु नागम्मा आदि का योगदान अविस्मरणीय है।

स्त्री, समाज को अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर देखती है। वह जब से यह महसूस करने लगी कि वह पुरुष से किसी भी स्तर पर कम नहीं तब से ही वह अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए आवाज उठाने लगी। स्त्री विमर्श में महत्वपूर्ण कारक है ‘जेंडर’। स्त्री इसी लिंग केंद्रित जड़ता को तोड़ना चाहती है। इसे स्त्री मुक्ति का पहला चरण माना जा सकता है। वैश्विक स्तर पर घटित विभिन्न आंदोलन स्त्रीवादी सैद्धांतिकी को निर्मित करने में सहायक सिद्ध हुए। प्रमुख रूप से उदारवादी स्त्रीवाद (liberal feminism), समाजवादी-मार्क्सवादी स्त्रीवाद (socio-Marxist feminism), रेडिकल स्त्रीवाद (radical feminism), सांस्कृतिक स्त्रीवाद (cultural feminism), पर्यावरणीय स्त्रीवाद (eco-feminism), वैयक्तिक स्त्रीवाद (I-feminism/ individualistic feminism) स्त्री प्रश्नों पर प्रकाश डालते हैं।

वस्तुतः स्त्री विमर्श के लिए कुछ समीक्षा आधार निर्धारित करना अनिवार्य है। समाज में स्त्री की स्थिति, स्त्री विषयक पारंपरिक मान्यताओं पर पुनर्विचार, पारंपरिक स्त्री संहिता की व्यावहारिक अस्वीकृति, शोषण के विरुद्ध स्त्री का असंतोष और आक्रोश, देह मुक्ति, पुरुषवादी वर्चस्व के ढाँचे को तोड़ना, स्त्री सशक्तीकरण और सार्वजनिक जीवन में स्त्री की भूमिका आदि को प्रमुख रूप से स्त्री विमर्श की कसौटियाँ माना जा सकता है। इनके आधार पर साहित्य का स्त्री विमर्शमूलक विश्लेषण आसानी से किया जा सकता है।

भाषा की दृष्टि यदि स्त्री विमर्श को देखा जाए तो रोचक तथ्य सामने आते हैं। स्त्री-भाषा पुरुष की भाषा से भिन्न होती है। स्त्री अपने अनुभव जगत से शब्द चयन करती है। जहाँ पुरुष-भाषा में वर्चस्व, रौब और अधिकार की भावनाओं को देखा जा सकता है वहीं स्त्री-भाषा में सखी भाव अर्थात मैं से हम की यात्रा को देखा जा सकता है। सामान्य स्त्री के भाषिक आचरण में आप पुरुष की रुचि-अरुचि का ध्यान रखने की प्रवृत्ति, परिवार की शुभेच्छा की प्रवृत्ति, स्त्री सुलभ कलाओं में रुचि की प्रवृत्ति, घर-परिवार और संस्कारों में रुचि की प्रवृत्ति, घरेलू चिंताओं की प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। इसी प्रकार एक शिक्षित स्त्री के भाषिक आचरण में पूर्ण आत्मविश्वास, निडरता, जागरूकता, स्थितियों के विश्लेषण की क्षमता आदि प्रवृत्तियों को देखा जा सकता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि स्त्री विमर्श से अभिप्राय है स्त्री में आत्मनिर्णय की प्रवृत्ति होना जिससे वह उस स्त्री संहिता का अतिक्रमण कर सकती है जो उसकी अस्मिता एवं अस्तित्व के लिए घातक है तथा सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभा सकती है।

रविवार, 2 जून 2019

प्रतिरोध में उठता मन : रमणिका गुप्ता


                                                           
"हमने तो कलियाँ माँगी ही नहीं
काँटे ही माँगे
पर वो भी नहीं मिले
यह न मिलने का अहसास
जब सालता है
तो काँटों से भी अधिक गहरा चुभ जाता है
तब
प्रतिरोध में उठ जाता है मन-
भाले की नोकों से अधिक मारक बनकर"

... कहने वाली बेबाक साहित्यकार रमणिका गुप्ता का जन्म 22 अप्रैल, 1930 को सुनाम (पंजाब) में हुआ था। उन्होंने अपने पिता से उदारता और माता से जिद्दी स्वभाव अर्जित की। अपनी आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की। 

रमणिका गुप्ता ने आजीवन आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के उत्थान हेतु कार्य किया। स्त्रियों की मुक्ति के संदर्भ में उनका कथन उल्लेखनीय है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि "जब मैं स्त्री मुक्ति का नाम भी नहीं सुनी थी, तभी से स्त्री के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रही हूँ। घर से ही मैंने नौकरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी है।" स्त्री विमर्श का दिशा निर्धारित करते हुए उन्होंने कहा है कि - "स्त्री विमर्श ने औरत में वस्तु से व्यक्ति बनने की समझ पैदा की है। स्त्री विमर्श से स्त्रियों में आटोनामी यानी स्वायत्तता की इच्छा जगी है। उनमें निर्णय लेने की शक्ति पनपी है। हालांकि इतना ही काफी नहीं है क्योंकि अब भी और बहुत कुछ करना बाकी है। भारत की 99 प्रतिशत स्त्रियाँ सुहाग-भाग पति-परमेश्वर, पारिवारिक इज्जत की अवधारणओं से ग्रस्त हैं। ये अवधारणाएँ एक ग्रंथि की सीमा तक पहुँच चुकी हैं, उनके अंतर्मन में कुंडली जमाकर बैठी हुई हैं। हमें इनसे निजात पानी है तो अपने को इनसे मुक्त करना ही होगा।" (गुप्ता, रमणिका. स्त्री मुक्ति, संघर्ष और इतिहास, नई दिल्ली : सामयिक प्रकाशन. पृ.66) 

रमणिका गुप्ता की कृतियों में (कविता संग्रह) भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूँ, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदम से आदमी तक, विज्ञापन बनते कवि, कैसे करोगे बँटवारा इतिहास का, निज घरे परदेसी, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल : एक कविता यात्रा, आम आदमी के लिए, खूँटे, अब और तब, गीत-अगीत; (उपन्यास) सीता, मौसी; (कहानी संग्रह) बहू जुठाई; (गद्य पुस्तकें) कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे, दलित चेतना : साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण-वाम के कठघरे और दलित साहित्य, असम नरसंहार : एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज; (आत्मकथा) हादसे, आपहुदरी उल्लेखनीय हैं। उत्कृष्ठ साहित्य के लिए वे अनेक सम्मानों एवं पुरस्कारों से अलंकृत हो चुकी हैं। 

रमणिका गुप्ता ने स्वयंसेवी कार्यकर्ता एवं साहित्यकार के रूप में हमेशा ही स्त्री, आदिवासी, दलित और मजदूरों के मुद्दों को उकेरा। उनके साहित्य को ध्यान से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने आदि से अंत तक मुक्ति की कामनी की। अनेक रूपों एवं आयामों में यह मुक्ति उनके साहित्य में निहित है। अपनी कविता ‘मैं आजाद हुई हूँ’ में वे कहती हैं कि "हाँ! डरो मत! आओ न!/ भीतर चले आओ तुम/ अब तुम पर कोई खिड़कियाँ/ बंद करने वाला नहीं है/ अब मैं अपने वश में हूँ/ किसी और के नहीं/ इसलिए रुको मत/ मैं आजाद हुई हूँ।" 

रमणिका गुप्ता जो भी लिखती हैं बेबाक लिखती हैं। वे हमेशा विवादों के कटघरे में खड़ी रही। उनका कहना है कि पुरुषों का आर्थिक दोहन होता है तो स्त्रियों का दैहिक दोहन होता है। वे कहती हैं कि "हम राजनीतिक तौर पर आजाद तो चुके हैं, पहनावे में भी पश्चिम की नकल कर रहे हैं किंतु सोच के स्तर पर विशेषकर स्त्री और सेक्स के बिंदु पर, हमारी मानसिकता मध्यवर्गीय ही है – बल्कि कहा जाए तो 16वीं सदी की मानसिकता ही हम आज भी ढो रहे हैं। हम सूडोमॉडर्न हैं – मॉडर्न नहीं।" (गुप्ता, रमणिका. 2005. हादसे. नई दिल्ली : राधाकृष्ण पेपरबैक्स) 

रमणिका गुप्ता ने एक साक्षात्कार में स्त्रियों की स्थिति के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि "देश में लाखों की संख्या में जो महिलाएँ खेतों में खटती हैं वे हमसे ज्यादा स्वतंत्र हैं। मध्य वर्ग की स्त्री को क्या चाहिए वर्जनाओं से मुक्ति, काम करने की छूट, स्वावलंबी बनने की छूट। निम्न वर्ग की स्त्रियाँ पहले से ही स्वावलंबी हैं। कई बार वो पति से ज्यादा कमाती हैं। बच्चों को पालती हैं। उनको छूट है शादी करने की, छोड़ने की और दूसरा मर्द करने की। पर उनके यहाँ दबाव दूसरी तरह के हैं। वहाँ दबंग हावी हैं। उच्च वर्ग की बात करें तो यहाँ की महिला या तो बिजनेस वीमेन है या फिर वे ड्राइंग रूम डॉटर्स हैं। वो उसी में खुश हैं। हमारी 90 फीसदी औरतें अपनी गुलामी का जश्न मनाती हैं। वो सुहाग, पति परमेश्वर जैसी बातों में रहती हैं। निम्न वर्ग में बलात्कार होता है तो जुल्म होता है और हमारे यहाँ बलात्कार होता है तो इज्जत लुटती है। इज्जत का सिंड्रोम शुचिता, कुंवारीं लड़की, इसका सिंड्रोम औरत को गुलाम बनाए रखता है। परिवार ने महिलाओं को पुरुष के नजरिये से सोचने वाला बना दिया है। कामकाजी महिला अपने पति से मार खाती है, डॉक्टर महिला मजार-मंदिर पर जाकर लड़के की माँग करती है। परिवार के टूटने से ही स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार होगा। वह स्वतंत्र बनेगी, बाहर निकलेगी, काम करेगी तब कहीं जाकर वह अपनी इज्जत करना सीखेगी। जब वह अपनी इज्जत करेगी तभी दूसरे भी उसका सम्मान करेंगे।" 

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे’ के संबंध में सीताराम येचुरी का कहना है कि ‘हादसे’ मुठभेड़ों की शृंखला है। सुकृता पॉल रमणिका गुप्ता को व्यक्ति के बजाए संस्था के रूप में रेखांकित करते हुआ कहती हैं कि यदि उन्होंने आत्मकथा (हादसे) में खुद को ‘कोयले की रानी’ और ‘पानी की रानी’ बताती हैं तो इसके पीछे का तथ्य यह है कि उन्होंने झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कोयले और पानी के लिए संघर्ष किया था। रमणिका गुप्ती की कथनी और करनी में अंतर नहीं दीखती। वे आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ हमेशा लड़ती रहीं। 

‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के माध्यम से रमणिका गुप्त ने हाशियेकृत समाजों के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। इसकी शुरूआत उन्होंने 1986 में त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हजारीबाग से की थी। बाद में इसका प्रकाशन दिल्ली से होने लगा और 2013 अक्टूबर से मासिक के रूप में परिवर्तित हुई। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की सृजनशीलता को प्लेटफार्म प्रदान करना था। स्त्री अधिकारों के संघर्षरत रमणिका गुप्ता 27 मार्च, 2019 को पंचतत्व में विलीन हुई। स्त्री, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक की मुक्ति की कामना करने वाली रमणिका गुप्ता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं।

रविवार, 12 जनवरी 2014

स्त्री-पुरुष में द्वैताद्वैत वादी संबंध वांछित है

आज की प्रगतिशील नारी का पुरुषों के प्रति नजरिया

“प्रश्न गाँव औ’ शहरों के तो 
हम पीछे सुलझा ही लेंगे 
तुम पहले कंधों पर सूरज 
लादे होने का भ्रम छोड़ो.

*****

कैसे हवा उठेगी ऊपर 
तपने पर भी 
कैसे कोई बारिश में भीगेगा हँसकर? 

छत पर आग उगाने वाले 
दीवारों के सन्नाटों में 
क्या घटता है – 
हम पीछे सोचें सलटेंगे 
तुम पहले कंधों पर सूरज 
लादे होने का भ्रम छोड़ो.”
  (कविता वाचक्नवी, मैं चल तो दूँ)

इसमें संदेह नहीं कि आज की स्त्री का पुरुष के प्रति दृष्टिकोण प्राचीन और मध्यकालीन स्त्री की तुलना में बड़ी सीमा तक परिवर्तित हुआ है. यदि प्राचीन भारतीय स्त्री के लिए पुरुष पिता, पति और पुत्र के रूप में ऐसी सुरक्षा की गारंटी था जिसके चलते उसे किसी स्वतंत्रता की आवश्यकता नहीं थी तथा मध्यकालीन भारतीय स्त्री के लिए पुरुष मालिक और परमेश्वर था जिसकी सर्वोपरि इच्छाओं के समक्ष बलिदान हो जाना ही स्त्री की नियति थी और इसे ही वह अपना अहोभाग्य समझती थी; तो इन दोनों प्रकार की मानसिकताओं से आगे बढ़कर आज की प्रगतिशील स्त्री की मानसिकता पुरुष को समता के धरातल पर मित्र और सखा के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता है. 

इसमें संदेह नहीं कि रखवाला और मालिक मानकर पुरुष के समक्ष आत्महीनता और आत्मदया से ग्रस्त रहने वाली स्त्रियाँ आज भी हमारे समाज में बड़ी संख्या में हैं. लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पुरुष से मैत्रीपूर्ण आचरण की अपेक्षा रखने वाली स्त्री भी इसी पृष्ठभूमि की जमीन तोड़कर पुरातनता के खोल से बाहर निकलकर आ रही है. 

यह प्रगतिशील स्त्री, स्त्री और पुरुष की गैरबराबरी को स्वीकार नहीं करती बल्कि मनुष्य होने के पने अधिकार को पहचानती है. अपने अधिकार की इस पहचान ने उसे आत्मविश्वास और दृढ़ता प्रदान की है. हिंदी साहित्य में यह दृढ़ और आत्मविश्वासी स्त्री प्रेमचंद और प्रसाद के समय से ही दिखाई देने लगी थी - धनिया और ध्रुवस्वामिनी जैसे पात्रो के रूप में. यशपाल के ‘दिव्या’ और ‘दादा कामरेड’ जैसे उपन्यासों में भी प्रगतिशील स्त्री का यह नया चेहरा दिखाई देता है. लेकिन फिर एक दौर ‘नई कहानी’ के जमाने में ऐसी मानसिकता का आया कि तमाम कहानी-उपन्यासों में आधुनिक स्त्री को कुंठित मानसिकता वाली दर्शाया जाने लगा. यह स्वतंत्र भारत के आरंभिक दशकों का वह दौर था जब स्त्रियाँ बड़ी संख्या में घर के बाहर निकल रही थीं और कामकाजी स्त्री के रूप में नया अवतार ले रही थीं. हो सकता है कि मेरी यह बात बहुत प्रामाणिक न हो परंतु मुझे लगता है कि उस दौर के कथाकार स्त्री की इस प्रगति से बड़ी सीमा तक आतंकित और आशंकित दिखाई देते हैं. यही कारण है कि उस दौर में स्त्री की जिस छवि का निर्माण किया गया वह दमित वासनाओं से संचालित थी. परंतु यह छवि सही रूप में प्रगतिशील स्त्री का प्रतिनिधित्व नहीं करती. इसके बाद जब 20वीं सदी के अंतिम दो दशकों में विमर्शों ने जोर पकड़ा तो स्त्री विमर्श के नाम पर भी आरंभ में काफी भ्रमपूर्ण स्थितियाँ सामने आईं. लेकिन धीरे धीरे धुंध हट गई और एक ऐसी प्रगतिशील स्त्री सामने आई जो पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकता चलती ही है, उसकी आँखों में आँखें डालकर देखती भी है और पुराने जमाने की नायिकाओं की तरह मूर्छित नहीं हो जाती. 

जब हम कहते हैं कि पुरुष के संबंध में आज की स्त्री का नज़रिया बदल रहा है तो इसका एक अर्थ यह भी होता है कि वह पति परमेश्वर वाले आतंककारी संबंध से निकलकर पति को सहयात्री के रूप में स्वीकार करती है, मालिक के रूप में नहीं. दरअसल यदि परिवार को लोकतांत्रिक सामाजिक संस्था के रूप में देखा जाए तो स्त्री और पुरुष दोनों ही को परस्पर मालिक और गुलाम मानने की मानसिकता से मुक्त होना होगा. आज की स्त्री चाहती है कि पुरुष समय-असमय अपना ‘पतिपना’ न दिखाया करे. स्त्री को भी गाहेबगाहे प्रतिपल अपना ‘पत्नीपना’ दिखाने की प्रवृत्ति से बाज़ आना होगा. वह ज़माना गया जब पति-पत्नी ‘दो शरीर एक प्राण’ होते थे क्योंकि इस एकप्राणता के लिए दो में से किसी एक को अपना व्यक्तित्व दूसरे के व्यक्तित्व में विलीन करना होता था. आज की स्त्री अपने व्यक्तित्व को इस तरह पुरुष के व्यक्तित्व में विलीन करने के लिए तैयार नहीं है. उसे अपनी स्पष्ट पहचान और परिवार तथा समाज में अपना स्थान व सम्मान चाहिए. भारतीय परंपरा में ‘अर्द्धनारीश्वर’ इस परस्पर पहचान की स्वीकृति का अत्यंत सुंदर और समर्थ प्रतीक है. यह बात भी समझनी चाहिए कि स्त्री-पुरुष दुनिया की दो विपरीत अपूर्ण इकाइयाँ हैं जिन्हें प्राकृतिक संरचना के कारण पूर्णता प्राप्त करने के लिए एक-दूसरे की जरूरत होती है. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. ऐसी स्थिति में विचारों के स्तर पर भेद को सहन करना सीख लेना ज्यादा अच्छा होगा. हाँ, इन स्थितियों के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि पति-पत्नी ‘दो शरीर एक प्राण’ नहीं बल्कि ‘दो शरीर और दो प्राण’ ही होते हैं. (नीलम कुलश्रेष्ठ, परत दर परत स्त्री, पृ. 77). अभिप्राय यह है कि स्त्री को ‘मानव’ के रूप में स्वीकृति चाहिए. यह स्वीकृति पुरुष के प्रति स्त्री के दृष्टिकोण को भी बदलने और व्यापक बनाने वाली साबित होगी, इसमें संदेह नहीं. 

आज की प्रगतिशील नारी यह समझ चुकी है कि उसकी पुरुष के साथ प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा नहीं है. उसे शिकायत है तो पुरुष के मालिकाना और अहंवादी व्यवहार से है. अधिकतर घरेलू ही नहीं कामकाजी स्त्रियां भी यह महसूस करती हैं कि पुरुष स्त्री के श्रम से लेकर धन तक और प्रेम से लेकर संतान तक सब कुछ को लेता तो अपना अधिकार समझकर है, लेकिन देने की बात आती है तो घर खर्च के कुछ रुपए देते वक्त भी उसका अंदाज ऐसा होता है जैसे स्त्री को खैरात दे रहा हो. ‘यदि पुरुष अपने अहं से निकलकर सिर्फ अपनी मानसिकता बदल लें तो सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी.’ (वही, पृ. 159).

यही कारण है कि आज दुनिया के हर कोने में औरतें यही चाह रही हैं कि पुरुष अपनी मानसिकता बदलें. जिन्होंने अपनी मानसिकता को बदल लिया है वे निश्चित ही स्वस्थ संबंधों और सभ्य समाज की नई इमारत बना रहे हैं. 

अंत में एक बात की ओर इशारा जरूरी है कि प्रगतिशीलता के कारण जो तनाव और संघर्ष पैदा हुए हैं उनमें ‘जो पिछली पीढ़ी के जीवन की सर्वोत्तम निधि नष्ट हुई है वह है स्त्री-पुरुष के बीच के आकर्षण का सौंदर्यबोध व आपसी सहज संबंध. दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर वार एवं प्रतिवार करते रह गए हैं.’ (वही, पृ. 160). आवश्यकता इस बात की है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे को पूर्ण मानव माने तथा एक दूसरे की भावनाओं और संवेदनाओं का सम्मान करें. ऐसा होगा तो आनेवाला समय निश्चय ही मंगलमय होगा. स्त्री के मुक्त होने या मानव के रूप में पहचाने जाने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि स्त्री पुरुष के बीच के मधुर संबंध को नकार दिया जाए. दरअसल दोनों एक-दूसरे से द्वैताद्वैत वादी संबंध की उम्मीद रखते हैं. यानी हमारा अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी हो और हम एक-दूसरे के होकर भी रहें. ऐसी स्तिथि में ‘दोनों अपनी अपनी स्वायत्तता में दूसरे का अनन्य रूप भी देखेंगे. संबंधों की पारस्परिकता और अन्योन्याश्रितता से, चाह, अधिकार, प्रेम और आमोद-प्रमोद के अर्थ समाप्त नहीं हो जाएँगे और न ही समाप्त होंगे दो संवर्गों के बीच से शब्द देना, प्राप्त करना, मिलन होना; बल्कि दासत्व जब समाप्त होगा और वह भी आधी मानवता का, तब व्यवस्था का यह सारा ढोंग समाप्त हो जाएगा तथा स्त्री-पुरुष के बीच का विभेद वास्तव में एक महत्वपूर्ण नई सार्थकता को अभिव्यक्त करेगा.’ (सिमोन द बोउवार, स्त्री : उपेक्षिता).

(चेन्नई के अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन (11.1.14) में प्रस्तुत शोधपत्र.)

शुक्रवार, 17 मई 2013

रावूरि भरद्वाज होने का अर्थ

आंध्रप्रदेश के गोदावरी जिले में एक छोटा-सा गाँव है मोगलतूरू. इस गाँव में कोटय्या और मल्लिकांबा दंपति रहते थे. जमीन-जायदाद तो थी नहीं पर कोटय्या छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा करता था. भगवान की कृपा से 5 जुलाई, 1927 को उनके घर एक बालक का जन्म हुआ जिसे रावूरि भरद्वाज के नाम से जाना गया. जी हाँ, वही रावूरि भरद्वाज जिन्हें 2012 ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया है. 

रावूरि के जन्म पर उनके माता-पिता बहुत ही खुश हुए. वे अपने बच्चे को सब सुख-सुविधाएँ देना चाहते थे और इसलिए वे मोगलतूरू से गुंटूर जिले के तरिगोंडा नामक गाँव में आकर बस गए. उनकी आर्थिक स्थिति कुछ सुधर गई. बालक बड़ा होता गया और आठवीं कक्षा तक पढ़ भी लिया. पर उसके बाद आर्थिक समस्या शुरू हो गई. रावूरि को स्कूल जाना बंद करना पड़ा और गुजारा करने के लिए छोटी-मोटी नौकरी करनी पड़ी. 15 वर्ष की आयु में कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी उठाई. खेलकूद की उम्र में कल-कारखाने, फैक्टरी, प्रिंटिंग प्रेस, खेतों-खलिहानों में काम करना पड़ा. नन्हे हाथों ने कलम छोड़कर औजार उठाए. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय तकनीशियन का काम भी किया. यह सब तकलीफदेह रहा, फिर भी जो भी काम करते पूरे लगन और ईमानदारी के साथ करते. जब वह बालक अपने दोस्तों को स्कूल जाते हुए देखता था तो अपनी स्थिति पर बहुत दुःखी और लज्जित होता था. उनके दोस्त उनकी अवहेलना करते थे कि ‘तुम पढ़कर क्या करोगे. जाओ जाओ, किसी कारखाने में या होटल में जाओ और साफ़-सफाई का काम करो.’ इससे उस बालक में पढ़ने की इच्छा प्रबल होती गई. परिणामस्वरूप यह हुआ कि उन्होंने दिन-दिन भर मजदूरी करने के बावजूद, रात को मंदिर में बैठकर पढ़ाई करना आरंभ कर दिया. 

मजे की बात सुनिए, बालक रावूरि से अक्सर लोग यही कहते थे कि ‘तुम पढ़कर क्या करोगे’ लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वे 17 वर्ष की आयु में साहित्य सृजन की ओर प्रवृत्त हो गए. 1946 में नेल्लूर से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘जमीन रैतु’ (धरा कृषक) के संपादक ने उन्हें उप-संपादक के पद को संभालने के लिए चुना तो उन्होंने सहर्ष उसे स्वीकार किया. बाद में तेलुगु साप्ताहिक ‘दीनबंधु’ के प्रभारी बने. 1959 तक उन्होंने ‘ज्योति’, ‘अभिसारिका’, ‘समीक्षा’, ‘चित्रसीमा’, ‘सिनेमा’ जैसी फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं में भी काम किया. वहाँ भी उनके ‘हितैषी’ यही कहा करते थे कि ‘संपादक बनकर तुम क्या करोगे. बड़े आए संपादक. काम-वाम तो आता नहीं. बस हवा में तो पुल बनाते हो.’ फिर भी रावूरि ने हार नहीं मानी. वे अपना काम करते गए. अपनी जिम्मेदारी निभाते गए. 

1959 में तेलुगु के प्रसिद्ध कथाकार त्रिपुरनेनि गोपीचंद की प्रेरणा से रावूरि ने आकाशवाणी में स्क्रिप्ट लेखक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया. वहाँ भी लोगों ने उन्हें चैन से नहीं जीने दिया. अक्सर यही कहते थे ‘तुम्हारी आवाज माइक के लिए ठीक नहीं है. तुम दूसरा कोई काम क्यों नहीं करते.’ पर बच्चे रावूरि के कार्यक्रम को बहुत रुचि से सुनते थे. रावूरि ने सबको यह सिद्ध करके दिखा दिया कि वे कलम और ‘गळम’ (कंठ) दोनों के धनी हैं. लोगों ने यह कहकर भी उन्हें हतोत्साहित किया कि ‘तुम जिंदगी में कभी भी अंग्रेज़ी भाषा नहीं सीख सकते हो.’ पर उन्होंने अंग्रेज़ी से कई निबंधों का तेलुगु में अनुवाद कर डाला. कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने तो उन्हें यह कहकर अपमानित भी किया कि ‘तुम्हारी इस दरिद्र जिंदगी में साहित्य सृजन का सपना आकाश सुमन ही होगा.’ लेकिन गर्व का विषय है कि रावूरि ने साहित्य जगत को समृद्ध बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने 160-170 से भी अधिक पुस्तकें लिख डालीं. साहित्यकार बन गए. रावूरि ने अपने जीवनानुभवों और अनुभूतियों को ही साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त कर यह सिद्धि प्राप्त की. उन्होंने 17 उपन्यास, 36 कहानी संग्रह, 6 बाल साहित्य ग्रंथ और 8 नाटकों के साथ साथ सैकड़ों छुटपुट रचनाओं, रेखाचित्रों, जीवनियों, कविताओं, निबंधों, पटकथाओं, विज्ञान पुस्तकों आदि के रूप में अनेक विधाओं में सृजन किया है. अवहेलना और तिरस्कार करने वालों के सामने उन्होंने एक मिसाल कायम की है. उनकी कुछ रचनाएँ हिंदी, तमिल, कन्नड, मलयालम, गुजराती तथा अंग्रेज़ी भाषाओं में भी अनूदित हो चुकी हैं. सरल-सुबोध विज्ञान पुस्तकों के लेखक के रूप में भी उन्हें बड़ी ख्याति मिली है. 

अपनी पत्नी की स्मृति में रावूरि भरद्वाज ने ‘कांतम’ नाम से डायरी शैली में स्मृतिकाव्य का सृजन किया जिसका हिंदी अनुवाद डॉ. भीमसेन निर्मल ने 1997 में ‘फिर भी एक कांतम’ नाम से किया. उनके प्रथम उपन्यास ‘कादंबरी’ का 1981 में डॉ. बालशौरि रेड्डी ने ‘कौमुदी’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया जो विद्या प्रकाशन मंदिर, दरियागंज, नई दिल्ली से प्रकाशित है. रावूरि भरद्वाज को तेलुगु साहित्य के प्रसिद्ध स्त्रीवादी रचनाकार गुडिपाटि वेंकट चलम के अनुयायी के रूप में भी जाना जाता है. उनकी कहानियों में अवंति, नर(क) लोक, अनाथ शरणम नास्ति, अपरिचितुलु (अपरिचित), अर्धांगिनी, आहुति, कल्पना आदि उल्लेखनीय हैं. बाल साहित्य में कीलु गुर्रम (काठी का घोड़ा), मणि मंदिरम (मणि मंदिर), मायालोकम (मायालोक), परकाया प्रवेशम (परकाया प्रवेश) बहुत चर्चित हैं तो मनोरथम, दूरपु कोंडलू (दूर के पर्वत), भानुमूर्ति जैसे नाटक उल्लेखनीय हैं. उनके उपन्यासों में प्रमुख रूप से कादंबरी, चंद्रमुखी, चित्र ग्रहम, इदं जगत, करिमिंगिन वेलगपंडू (हाथी द्वारा निगला हुआ बेल का फल), मंचि मनिषी (अच्छा मानव), ओक रात्रि ओक पगलु (एक रात एक सुबह) और पाकुडु राल्लु (काई जमे पत्थर) उल्लेखनीय हैं. 


1965 में जब ‘पालपुंता’ (गेलेक्सी) नाम से उनकी लंबी कहानी ‘कृष्णा पत्रिका’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई थी तो अनेक विद्वानों ने अनेक तरह के आक्षेप भी लगाए. कहा गया कि इसमें कुछ वास्तविक व्यक्तियों के नामा और चरित्र सम्मिलित हैं और कि इसके विवरण उत्तेजक हैं. इस बहाने उस कहानी पर रोक लगाने का प्रयास भी किया गया था. लेकिन रावूरि टस से मस नहीं हुए. 1978 में उन्होंने इसी कहानी को बृहत उपन्यास का रूप दिया और इसका नामकरण ‘माया जलतारु’ (माया स्वर्णतार) के रूप में किया. इस उपन्यास को पढ़ने के बाद प्रमुख साहित्य समीक्षक सीला वीरराजू ने ‘पाकुडु राल्लु’ (काई जमे पत्थर) किया. यह उपन्यास मूलतः सिनेमा जगत की विसंगतियों, विडंबनाओं और समस्याओं को उजागर करता है. इसके केंद्र में एक स्त्री है जो अनेक पड़ावों को पार करके सिने जगत में अपना एक सुनिश्चित स्थान प्राप्त करने के प्रयत्न में अंततः आत्महत्या कर लेती है. इस उपन्यास का शीर्षक ‘पाकुडु राल्लु’ (काई जमे पत्थर) अत्यंत सटीक है क्योंकि सागर के किनारे पानी में पड़े हुए पत्थरों पर काई जम जाती है तो देखने में ये पत्थर सुंदर और मनमोहक तो लगते हैं लेकिन यदि कोई इन पत्थरों पर खड़ा होकर प्रकृति को निहारने का प्रयत्न करता है तो उसका फिसल कर नीचे गिरना निश्चित है. सिनेमा जगत का सच भी यही है. उसकी चकाचौंध से आकर्षित होकर गाँव से शहर की ओर पलायन करके इस दुनिया में कदम रखने वालों की स्थिति - विशेष रूप से स्त्रियों की स्थिति - भी यही है. 

अब देखिए, लोग रावूरि भरद्वाज की पग-पग पर अवहेलना करते रहे पर उन्होंने इतना कुछ लिख डाला. आपको याद होगा कि 1970 में तेलुगु साहित्य के लिए प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार विश्वनाथ सत्यनारायण को उनकी कृति ‘रामायण कल्पवृक्षमु’ पर प्रदान किया गया था. उसके 18 वर्ष पश्चात 1988 में यह पुरस्कार डॉ सी.नारायण रेड्डी को उनके महाकाव्य ‘विश्वंभरा’ के लिए प्रदान किया गया. उसके बाद 25 बरसों तक यह कशमकश चलती रही कि तेलुगु साहित्य के लिए किस साहित्यकार को ज्ञानपीठ के लिए चुना जाय. आज यह कशमकश समाप्त हो गई है और 2012 का ज्ञानपीठ पुरस्कार रावूरि भरद्वाज को उनकी कृति ‘पाकुडु राल्लु’ (काई जमे पत्थर) के लिए मिल रहा है. जिस उपन्यास को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया गया था आज उसी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हो रहा है! स्मरण रहे कि इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाला यह पहला तेलुगु उपन्यास है. 

रावूरि भरद्वाज बाहर जैसे दीख पड़ते हैं अंदर से भी वे वैसे ही हैं – सीधे सच्चे मनुष्य. कहने का अर्थ यह है कि उनका बाह्य एवं आतंरिक व्यक्तित्व दोनों ही सहज और सरल हैं. पके हुए बाल, सफ़ेद सफ़ेद लंबी दाढ़ी और मूँछें, खादी कुर्ता और धोती – वेशभूषा जितनी सहज है उनका मन भी उतना ही सहज, निर्मल और संवेदनशील है. वे अपने परिवारी जन और दोस्तों से अमित प्यार करते हैं. उनका सोच सकारात्मक है. इसीलिए तो उन्होंने लोगों की निंदा को भी सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है और आज ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हो रहे हैं. यह गौरव और हर्ष की बात है. 

बुधवार, 13 मार्च 2013

“स्त्री-पुरुष की परस्पर-आश्रयता का प्रतीक है ‘अर्धनारीश्वर’

आज की स्त्री चाहती है अपने युग की स्मृति खुद रचने का अधिकार


वह निरभ्र आकाश, जहाँ की निर्विकल्प सुषमा में,
न तो पुरुष मैं पुरुष, न तुम नारी केवल नारी हो;
दोनों हैं प्रतिमान किसी एक ही मूलसत्ता के,
देह-बुद्धि से परे, नहीं जो नर अथवा नारी है.” (दिनकर, उर्वशी, तृतीय अंक, पृ.48)

अक्सर कुछ लोगों के मुँह से सुनने को मिलता है कि ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’. लोग स्त्री को अबला, दीन, कमजोर, फेयर सेक्स, वीक जेंडर आदि अनेकानेक विशेषणों से अलंकृत करते रहते हैं. यह भी सुनने को मिलता है कि स्त्री को देवी, माँ आदि गरिमामय स्थान देकर उसे बंधनों में जकड़ लिया जाता है. दूसरी ओर ‘ऐसा कुछ नहीं है’ कहकर कुछ लोग स्त्री-प्रश्न को सिरे से रद्द करने वाले भी मिलते हैं. इन अतिवादी फतवों के बीच समझना यह है कि भारतीय संस्कृति के अनुसार स्त्री अबला या कमजोर नहीं है. जैसा कि महादेवी वर्मा कहती हैं, “’नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव तीव्र तथा स्थायी होते हैं. इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं. इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अंतर है जितना विद्युत और झड़ी में. एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं, परंतु प्यास नहीं बुझाई जा सकती. दूसरी से शान्ति मिलती है, परंतु पशुबल की उत्पत्ति संभव नहीं. दोनों के व्यक्तित्व, अपनी उपस्थिति से समाज के एक ऐसे रिक्त स्थान को भर देते हैं जिससे विभिन्न सामाजिक संबंधों में सामंजस्य उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण कर देता है”.’

भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष एक दूसरे के विरोधी या प्रतिबल नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं. दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं. ‘उर्वशी’ में दिनकर यही कहते हैं कि “’नारी नर को छूकर तृप्त नहीं होती, न नर नारी के आलिंगन में संतोष मानता है. कोई शक्ति है जो नारी को नर तथा नर को नारी से अलग रहने नहीं देती, और जब वे मिल जाते हैं, तब भी, उनके भीतर किसी ऐसी तृषा का संचार करती है, जिसकी तृप्ति शरीर के धरातल पर अनुपलब्ध है. नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है. इस नारी का संधान पुरुष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते, उसे मन के समुद्र में फेंक देती है, जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँच कर निस्पंद हो जाता है. और पुरुष के भीतर भी एक और पुरुष है, जो शरीर के धरातल पर नहीं रहता, जिससे मिलने की आकुलता में नारी अंग-संज्ञा के पार पहुँचना चाहती है.”’

स्त्री-पुरुष के इस मूलभूत युग्म के लिए हमारे पास एक बहुत सुंदर प्रतीक है ‘अर्द्धनारीश्वर’. दिनकर की मान्यता है कि “अर्द्धनारीश्वर केवल इस बात का प्रतीक नहीं है कि नारी और नर जब तक अलग हैं, तब तक दोनों अधूरे हैं, बल्कि इस बात का भी द्योतक है जिसमें नारीत्व अर्थात संवेदना नहीं है, वह पुरुष अधूरा है. जिस नारी में पुरुषत्व अर्थात अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस नहीं है, वह भी अपूर्ण है.” अभिप्राय यह है कि भले ही हम पुरुष हों या स्त्री, दरअसल हम संवेदना के स्तर पर स्त्री और पुरुष का युग्म ही होते हैं – इस युग्मता में ही हमारे अस्तित्व की पूर्णता है.

यहाँ एक और बात ध्यान खींचती है. यह नहीं कहा जाता कि शिव के बिना शक्ति अधूरी है, बल्कि यही कहा जाता है कि शक्ति के बिना शिव अपूर्ण है. अर्थात कहीं न कहीं हमारी परंपरा स्त्री को पूर्ण मानती है – और पूर्ण करने वाली भी. इस परंपरा में स्त्री ‘पर-निर्भर’ और ‘अबला’ नहीं थी. भारतीय परंपरा के अनुसार वह पुरुष के मनोरंजन की वस्तु भी नहीं है. स्त्री भी पुरुष के समान पूर्ण है. उसकी रचना किसी आदिपुरुष के मनोरंजन के लिए नहीं की गई बल्कि वह भी पुरुष के साथ ही अस्तित्व में आई और सृष्टि के लिए उतनी ही अहम है जितना पुरुष. इसीलिए अर्धनारीश्वर का मिथक हमारी संस्कृति का सबसे मनोरम मिथक है. इस मिथक का अत्यंत सटीक और सामयिक प्रयोग विष्णु प्रभाकर ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ में किया है और यह दर्शाया है कि स्त्री-पुरुष संबंधी विसंगतियों का निदान है ‘अर्द्धनारीश्वर’. विष्णु प्रभाकर यह कहते हैं कि “नारी की स्वतंत्र सत्ता का, नारी की सैक्स-इमेज से कोई संबंध नहीं है. उसका अर्थ है समान अधिकार, समान दायित्व, एक स्वस्थ समाज के निर्माण के दोनों समान रूप से भागीदार हैं. अर्द्धनारीश्वर का प्रतीक इस कल्पना का साकार रूप है, एक-दूसरे से विसर्जित नहीं, एक-दूसरे से स्वतंत्र, फिर भी जुड़े हुए. आगे वे यह भी कहते हैं कि नारी को बस नारी बनना है, सुंदरी और कामिनी नहीं.”

हमारी आज की यह चिंता भी विष्णु प्रभाकर की चिंता है कि वर्ण-व्यवस्था और उसके अंतर्गत फलती-फूलती जाति व्यवस्था ने आज समाज को खोखला बना दिया है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की स्थिति सोचनीय बन गई. आज वह न ही घर में सुरक्षित है, न ही बाहर. “एक ओर नारियों को परेशान करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध क़ानून बनाकर जनता से एक जागरूक और प्रगतिशील संस्कार होने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करते हैं; दूसरी ओर, दूषित साहित्य, कामुक फिल्म और फूहड़ विज्ञापनों के माध्यम से जनमत की कोमल वृत्तियों को उत्तेजित करके उन्हें नारियों के प्रति अपराध करने को उकसाते हैं.” कहना न होगा कि यह एक तरह से भोगवादी दृष्टि है जो पश्चिमी सभ्यता का परिणाम है. इसके कारण पुरुष स्त्री को एक खिलौना व मनोरंजन की वस्तु के रूप में देख रहा है. वास्तव में जो पुरुष सुविधाभोगी होता है वह कायर होता है. इस कायरता के कारण ही वह स्त्री की गरिमा को नकारता है और स्त्री के प्रति प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से हिंसक हो उठता है. हीनताग्रंथि से ग्रस्त तथाकथित आधुनिक पुरुष समाज के हाथों स्त्री की गरिमा के प्रतिदिन तार-तार होने का यह एक बड़ा कारण है.

‘मनुस्मृति’ में कहा गया है कि स्त्री की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में क्रमशः पिता, पति और पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात वह अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए, चूंकि वह कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है. यों तो विद्वान लोग इस वचन की अनेक उदारतावादी व्याख्याएं कर सकते हैं,लेकिन यह सच है कि ऐसे ही वचनों के सहारे स्त्री की स्वतंत्रता को पूरी तरह से पुरुष ने अपने हक में कर लिया और स्त्री को भी इस तरह ट्यून किया कि वह भी वही करती है जो पुरुष चाहता है. ‘युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए दंड देता आ रहा है.’ (महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ). विष्णु प्रभाकर भी अपने उपन्यास में यही दर्शाते है कि "जो समाज युगों से मातृशक्ति को शीर्षस्थ स्थान पर बैठा कर और शाब्दिक पूजा करके भी अपमानित करता आया है, शब्द को महिमामंडित करने में उसने ज़रा भी कृपणता नहीं की है. परंतु अर्थ की दुनिया में उसने पत्नी को पति-परमेश्वर की संपत्ति ही माना है, धरती है वह. इसलिए अन्नपूर्णा होकर भी निष्प्राण-निष्पंद है. उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है. पुरुष के पापों का दंड उसने भोगा है, पर उसे दंडित करने का अधिकार उसे कभी नहीं मिला.” सभ्यता के जिस सामंती दौर में स्त्री इस तरह मानवी से संपत्ति बन् गई उसे सबसे अंधा दौर कहा जाना चाहिए!

स्त्री केवल पुरुष की सहभागिनी, सहधर्मिणी तथा छाया मात्र बनकर नहीं रहना चाहती है. वह स्वतंत्रता चाहती है. वह आत्मनिर्भर बनना चाहती है. निर्णय लेने, चुनाव करने, वरण करने का अधिकार चाहती है. वह यह नहीं चाहती कि देवी के रूप में उसकी पूजा की जाए, बल्कि वह यही अपेक्षा करती है कि पुरुषसत्तात्मक समाज मानवी के रूप में उसे देखे और उसके अस्तित्व को सुरक्षित रखे. देवी बनाकर भी हमने औरत से त्याग की ही माँग की और कहा कि चूंकि वह पति और परिवार के सुख के लिए अपने सुख का त्याग करती है अतः पूजनीय है. इस तरह पूजनीय बनाकर उसके निजत्व को नष्ट करने वाली व्यवस्था महान होते हुए भी स्त्रीत्ववादी दृष्टि से तो स्त्रीविरोधी और अमानवीय ही मानी जाएगी. महादेवी इस पर वुयांग्य करते हुए कहती हैं कि “पुरुष के विचार में नारी मानव नहीं है, देवी है और देवताओं को मनुष्य के लिए आवश्यक सुविधाओं का करना ही क्या है! नारी के देवत्व की कैसी सी विडंबना है!”

आज तो समाज में स्त्री की कोई गरिमा नहीं है. आए दिन नन्हीं बच्चियों से लेकर बुजर्ग महिलाओं तक हो रहे अपहरण, बलात्कार, कन्याभ्रूण हत्या जैसे दुष्कांड समाज की घोर अनैतिकता के प्रतीक हैं.पर यही समाज दिन रात मर्यादा और नैतिकता के ढोल पीटता नहीं थकता. संवेदनशील स्त्री अपने इस जीवन से परेशान है, वह इससे छुटकारा चाहती है. इस संदर्भ में पुनः विष्णु प्रभाकर का कथन उल्लेखनीय है. वे कहते हैं कि “इन दोहरे मूल्यों का परिहार तभी किया जा सकता है जब नारी की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया जाय. तब इस प्रकार की घटनाएँ नहीं घटेंगी क्योंकि उनके लिए कोई कारण ही नहीं रहेगा. नर-नारी अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार स्वतंत्र रूप से आचरण करेंगे. वे यह भी ध्यान दिलाते हैं कि असंयम निश्चय ही घातक है, पर अतिसंयम नितांत अप्राकृतिक है. आदिवासी समाज में ‘बलात्कार’ शब्द ही नहीं है क्योंकि उन्होंने अपना सामाजिक जीवन इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि उसकी संभावना ही नहीं रहती.

स्त्री जब तक अपने आपको सशक्त नहीं बनाएगी तब तक इस दासता से मुक्ति संभव नहीं है. इसके लिए उसे खुद यह समझना अनिवार्य है कि स्त्री-पुरुष एक दूसरे के विरोधी तत्व नहीं है बल्कि इस सृष्टि के निर्माण में दोनों एक-दूसरे के पूरक है. दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं. यह आश्रयता पराधीनता नहीं है बल्कि सिद्धि है. सार्थकता है. “नारी जब अपनी स्वतंत्र सत्ता के रूप में अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ पुरुष के बराबर आकर खड़ी होगी तब समाज का बल अनंत गुणा बढ़ जाएगा. दो परिणत स्वाधीन सत्ताओं का मिलन एक-दूसरे की सिद्धि और सार्थकता को तेज गति प्रदान करेगा.”

अगर थोड़ा पीछे जाकर देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आज जो स्थिति स्त्री की है वह पुराने जमाने में नहीं थी. उस जमाने में स्त्री गरिमामय थी. राम, कृष्ण और शिव भारतीय समाज में संबंधों के ऐसे प्रतीक हैं जो सामाजिक जीवन शैली को नियंत्रित करने में सहायक हैं. पूरे विश्व में कृष्ण जैसा दूसरा व्यक्तित्व नहीं मिलता जिसने नैतिकता के विकृत रूप पर प्रहार किया और सही अर्थों में जो नारी का सखा है, इसीलिए डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था, ‘मैं समझता हूँ नारी कहीं अगर नर के बराबर हुई है तो बृज में और कान्हा के पास’.” नैतिकता की अवधारणा को व्यक्त करने के उद्देश्य से विष्णु प्रभाकर ने ‘अर्द्धनारीश्वर’ के एक स्त्री पात्र के माध्यम से मार्मिक चोट की है उस समाज पर जिसने स्त्री को केवल भोग्या माना है - “’’मैं इसमें इतना और जोड़ सकती हूँ कि पाँच पांडवों की पत्नी द्रौपदी भी कृष्ण की सखी है, उसका चीर वही तो बढ़ाता है. मैं पूछती हूँ कि किसी ने समझा है इस प्रतीक का अर्थ? समझा होता तो क्यों होतीं वधू-दहन और बलात्कार की असंख्य जघन्य घटनाएँ इस देश में?”’’

पुरुष समाज यह कहता थकता नहीं कि ‘स्त्री कभी मुक्त नहीं हो सकती.’ वह कभी कभी यह कहकर भी स्त्री को निराश करता रहता है कि ‘मुक्ति बाहर वालों से ही नहीं, अपने अंतरमन से भी पानी होती है.’ ऐसे कहने वालों के समक्ष विष्णु प्रभाकर ने भारतीय वाङ्मय में समग्रता की खोज करते हुए उदाहरण दिए हैं – “राम की मर्यादा से कृष्ण की लीला तक की यात्रा मनुष्य की शब्द से अर्थ तक की यात्रा है. सत्य की खोज की जननी यात्रा है. सत्य तो ‘नेति नेति’ है. निरंतर यात्रा करता है. सत्य की इस विकास यात्रा से ही सारा वाङ्मय, सारा विज्ञान, सारी संस्कृति विकसित हुई है. इसलिए हर युग में कविता के छंद वाल्मीकि से व्यास तक और जीवन के छंद राम से कृष्ण तक निरंतर यात्रा करते हैं. राम शब्दों की यानी नियमों की कारा में बंद है. क्योंकि विकसित होते समाज में उसकी जरूरत होती है. यही नैतिकता है, लेकिन शब्द जब अर्थ खोकर जड़ हो रहते हैं तब कृष्ण आकर शब्दों की कारा से यानी जड़ नैतिकता से मुक्ति का संदेश देते हैं.”. अब समय आ गया है कि भारतीय समाज जड़ नैतिकता से मुक्त हो और स्त्री को उसकी मानवीय गरिमा तथा स्त्रीत्व का सम्मान बहाल करे ताकि स्त्री-जीव होना अधमता न माना जाए वरना न तो भ्रूण हत्याएं थमेंगी, न बलात्कार – क्योंकि ये तमाम स्त्रीविरोधी अपराध इसीलिए विद्यमान हैं कि हम सच्चे हृदय से स्त्री और स्त्रीत्व का सम्मान नहीं करते.

इसे शुभ लक्षण माना जाना चाहिए कि आज समाज भी जाग रहा है और स्त्री भी अपनी चिर निद्रा से जाग चुकी है. वह अपने अधिकारों के प्रति सजग हो उठी है. शिक्षा ने उसे आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाया है. वह आज यह सवाल कर रही है कि “हमें अपने युग की आचार संहिता, अपने युग की स्मृति बनाने का अधिकार क्यों न मिले? ऐसी स्मृति जिसमें नारी की स्वतंत्र सत्ता हो. मनुष्य-मनुष्य में सामाजिक स्तर पर कोई भेद-विभेद न हो. दलित कोई न हो. नर नर हो– नारी नारी.”

स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं. इनमें से कोई उच्च या कोई निम्न नहीं है. दोनों का अस्तित्व बराबर है. दोनों ही इंसान हैं. इस तथ्य को समझने के लिए पहले हमारे भीतर निहित अहं को समाप्त करना होगा. इस संबंध में विष्णु प्रभाकर का कथन द्रष्टव्य है – ‘“बस ‘मैं’ को मारना है. यानी ‘स्वयं’ को ‘स्व’ से मुक्त करना है आदमी बनना है.’ ” भले ही भारतीय संस्कृति विरोधाभासों से आप्लावित हो उसे स्त्रीत्व की गरिमा को, उसकी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करके पुष्ट किया जा सकता है. “प्रश्नाकुलता, चिरंतन खोज के आधार पर आज एक नई स्मृति, एक नई संहिता की आवश्यकता है.

यह सब महज कागज़ी बातें होने से काम नहीं चलेगा. भाषण झाड़ने से कोई फायदा नहीं होगा. अगर समाज में स्त्री को गरिमामय स्थान प्राप्त होना है तो ऑपेरेशन करके स्त्रीविरोधी सड़े-गले विचारों को काट फेंकना होगा. “कलम की नोक से कागज़ पर कुछ भी लिखा जा सकता है. आवश्यकता है हमारी मज्जा में पैबस्त हुए विचारों को ऑपरेशन करके निकाल फेंकने की, मन के पटल पर खिंचे दायरों को मिटाने की, लेकिन हर समाज शक्ति की भाषा समझता है. शक्ति तलवार में नहीं, विचारों में होती है. अतः वैचारिकता में मूलगामी बदलाव लाने के लिए सभी स्तरों पर प्रयास ज़रूरी है ताकि पुरुषवर्चस्व के टूटने को सहजता से स्वीकार करके समाज स्त्री का सम्मान लौटा सके.

स्मरण रहे कि अतीत हमारी शक्ति है पर वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता, हमारे वर्त्तमान और भविष्य पर आरोपित नहीं हो सकता. अतीत से शक्ति वैसे ही मिलती है जैसे वृक्ष को जड़ों से, लेकिन जड़ कभी ऊपर नहीं फैलती; ताल में रहकर ही वह वृक्ष को पुष्पित, पल्लवित करती है. जड़ ही तो बीज है और बीज के भीतर ही कोंपल फूटती है, तभी वह धन्य होता है.” विष्णु प्रभाकर कहते हैं कि “हमारा सामाजिक ढांचा युगों पूर्व बनी स्मृतियों और संहिताओं पर आधारित है. हिंदू समाज में, जो प्राचीन काल में आर्य या भारतीय समाज था, चौथी या छठी शताब्दी के बाद कोई नई स्मृति नहीं बनी. जैन समाज बहुत प्राचीन है, पर उनकी ऐसी कोई स्मृति नहीं . बौद्धों में भी अपनी कोई विशेष परंपरा नहीं है. ईसाई, मुसलमान – इन अल्पसंख्यक समाजों की अपनी परम्परा है, वही भी दो हजार – डेढ़ हजार वर्ष पुरानी है. आदिवासियों के अपने अलिखित क़ानून हैं. सिख, ब्रह्म समाज, आर्य समाज आधुनिक भारत की देन हैं, लेकिन इनके विधि-विधान में विशेष नया नहीं है. अब जब हम सब सुगठित समाज के रूप में जीना चाहते हैं तो हमें आधुनिक मानव मूल्यों पर आधारित एक सांझी सामाजिक संहिता की रचना करनी होगी.”

अंततः विष्णु प्रभाकर अर्धनारीश्वर को एक और अर्थ देते है. वह यह कि भारत में स्त्री न्याय चाहती है लेकिन पुरुष से मुक्ति नहीं. आज उसमें यह कहने का साहस आ गया है कि “बलात्कार से सतीत्व नष्ट होता हो तो हो, पर नारीत्व नष्ट नहीं होता. और नारी के लिए नारीत्व सर्वोपरि है.” स्त्री-गरिमा और स्त्री-मुक्ति का यह अर्थ कदापि नहीं कि स्त्री अपनी कोमल भावनाओं को छोड़ दे. स्त्री, स्त्री भी रहे, अपनी संवेदनाओं और सुकोमलता को बरकरार रखे और साथ ही मनुष्य भी बने. उसे शिकार न होना पड़े. वह अपमानित महसूस न करे. आज वह कह रही है, “मैं वही हूँ. वही रहूँगी जो शंकर के अर्द्धनारीश्वर के रूप में कल्पित की गई है.”

सोमवार, 21 जनवरी 2013

‘अर्द्धनारीश्वर’ के देश में....

“मैं 
हज़ारों बार अपराध के शिकार 
को भुगत चुकी हूँ. 
कभी राह चलते 
कभी खुले मैदान में 
कभी गली में 
कभी घर में भीतर घुसकर 
बलात्कार का राहु 
कच्ची और पकी उम्र के प्रति बेपरवाह 
होकर 
मेरे जीवन को ग्रहण लगा देता है.’ (इंदु जोशी) 

16 दिसंबर 2012 का काला दिन हम भारतीयों के लिए शर्म के दिन के रूप में अंकित हो गया है. आएदिन बलात्कार का शब्द संपूर्ण वातावरण में गूँज रहा है. चाहे प्रत्यूषा हो या आएशा, अनन्या हो या अरुणा या फिर दामिनी हो या निर्भया. नाम, आयु कुछ भी हो पर जंगल बन चुके समाज में स्त्री की नियति एक समान है. बलात्कार के इस दैत्य के चंगुल में फँसकर स्त्री अपने आपको निस्सहाय और मजबूर पा रही है. भले ही एक ओर यह कहा जा रहा है कि यह सदी स्त्री शक्तीकरण की सदी है; आज स्त्री सशक्त है, आत्मनिर्भर है और पुरुषवर्चस्ववादी समाज से टक्कर ले रही है आदि.... आदि... आदि.... पर क्या यह सच है? सच में स्त्री मुक्त है? सशक्त है? तो फिर वातावरण में क्यों गूँजते हैं बलात्कार, कन्याभ्रूण हत्या और वधू दहन? जब जब इस तरह की घटनाएँ घटती हैं तब तब संसद में, मीडिया में और भाषणों में बहस चलती रहती है. पर कुछ नहीं किया जाता. अगले ही दिन समाचार पत्र में एक और नई सनसनीखेज खबर – ‘एक और महिला का सामूहिक बलात्कार’, ‘पाँच वर्षीय नाबालिग पर अत्याचार’, ‘पिता की हवस का शिकार ......’ कुछ निहित स्वार्थ वाले तत्व तो इन घटनाओं को राजनैतिक खेल बना लेते हैं. विपक्ष सत्ता पक्ष पर कीचड़ उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ता और सत्ता जनता के सिर सारा अपराध मढ़ देती है. 

दिल्ली में एक युवती के बर्बर बलात्कार की नृशंस घटना ने संपूर्ण देश को झकझोर दिया है. युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर आई लेकिन क्या हुआ! आज भी नित्यप्रति इस तरह की खबरों से अखबार भरे हुए हैं. स्त्री के प्रति समाज के असम्मानपूर्ण और अमर्यादित आचरण पर चिंता व्यक्त करते हुए विष्णु प्रभाकर (जिनकी इस वर्ष शताब्दी है) ने 1992 में ही अपने उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ में यह प्रश्न किया था कि ‘क्यों भरे रहते हैं हर रोज दैनिक पत्र बलात्कार की शर्मनाक घटनाओं से? क्यों बुद्धिजीवी हर क्षण बहस करते हैं इस शब्द को लेकर? देश की संसद में भी गूँजता रहता है यही एक शब्द बार-बार, पर कहीं कुछ होता क्यों नहीं? शब्द, शब्द और शब्द. क्रिया के बिना शब्द का अस्तित्व सार्थक हुआ है क्या? शायद ऐसा तो नहीं कि ये शर्मनाक घटनाएँ पढ़कर हमें दर्द के स्थान पर एक रोमांचक अनुभूति होती है, ‘काश हम न हुए’ की मुद्रा में. इसलिए और भी कि प्रमाण के अभाव में अधिकांश अभियुक्त साफ़ छूट जाते हैं....’ 

आज तक यही पाया गया है कि अपराधी हमेशा प्रत्यक्षदर्शी गवाह न होने के कारण गिरफ्तार होने पर भी छूट जाता है. इतना ही नहीं समाज से डर कर भी लोग इस जघन्य अपराध को छिपा लेते हैं ताकि उनकी इज्जत बची रहे. पुलिस भी यही सलाह देती है कि ‘वह दोषी है’ – यह प्रमाणित करने के लिए आपकी बेटी/ पत्नी को जिस यातना में से गुजरना होगा उसको सह पाएगी वह....?’ समाज की छद्म नैतिकता के कारण शिकार भी चुप रहा जाता है और शिकारी तो बेबाक घूमता रहता ही है और फिर किसी अबला का शिकार करता है. विष्णु प्रभाकर इस छद्म नैतिकता पर तीखा प्रहार करते हैं – ‘जैसा हमारा समाज है, हमारे संस्कार हैं, उसमें और हो ही क्या सकता था? ... कैसी है हमारी नैतिकता ! इनसानियत के प्रति इतना बड़ा जघन्य अपराध केवल इस छद्म नैतिकता के कारण दंडित हुए बिना रह गया. कौन तोड़ेगा नैतिकता के इस आत्मघाती चक्रव्यूह को...?’ 

क्या कभी किसी ने उस स्त्री के बारे में सोचा होगा जिसका शिकार किया गया है ! जिसका कोई अपराध नहीं है. पर यह समाज उसे अपराधी बनाता है. जिसका बलात्कार हुआ उसी को सजा मिलती है. अपमान के घूँट पीने के लिए उसे मजबूर किया जाता है. ‘अर्द्धनारीश्वर’ में विष्णु प्रभाकर ने पम्मी के माध्यम से उस स्त्री की व्यथा को उजागर किया है जो यौन हिंसा का शिकार है – ‘समाज की नीति-नैतिकता, शास्त्र में पाप-पुण्य की व्याख्या, नर-नारी के संबंध में यह भावना पैबस्त कर दी थी कि कुछ अघटित घट गया है और जो कुछ घटित हुआ है वह पाप है. ऐसा पाप जिसका प्रतिकार नहीं हो सकता. मुझे अपराधिनी उस दरिंदे ने नहीं बनाया बल्कि मेरे समाज ने बनाया. भीतर से मैं जिसे स्वीकार नहीं कर सकी थी, वही मुझ पर थोप दिया गया. जिसके प्रति अपराध किया गया, सजा भी उसी को मिली. आहत, अपमानित मैं किसी की करुणा की अधिकारिणी भी नहीं रह गई. .... कितना बड़ा संसार है मेरे भीतर दर्द से सना ! किसी को दिखा भी नहीं सकती, किसी की सहानुभूति भी नहीं चाह सकती. ..... उस आत्मग्लानि से मैं काँप–काँप उठती हूँ, इसलिए नहीं कि कोई मुझे दोषी समझता है बल्कि इसलिए कि मैं स्वयं अपने को इस दोष से मुक्त क्यों नहीं कर पा रही, समाज को झटक क्यों नहीं देती?’ 

देश भर में जो आंदोलन स्वतःस्फूर्त चल रहा है वह दर्शाता है कि आज की पीढ़ी इस दोष से मुक्त होना चाहती है. वह जीना चाहती है. तन और मन पर हुए घावों से वह उबरना चाहती है. वह उस आत्मग्लानि से बाहर निकलना चाहती है. अपराधी को सजा दिलाना चाहती है. दामिनी ने भी तो बार-बार यही माँग की थी कि वह जीना चाहती है. उन दरिंदों को सजा दिलाना चाहती है. पर वह बच नहीं सकी. अगर बच भी जाती तो उसने जो अमानुषिक आचरण झेला-भुगता है, वह आजीवन बार-बार उसके अंतस को कुरेदता रहता. वह अंदर अंदर ही दमघोंटू तनाव में जीने लगती. अब अंत होना चाहिए इस दमघोंटू तानाव का. यदि दामिनी जीवित बच जाती तो वह इस बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रस्थान बिंदु और प्रेरणा बन सकती थी. 

‘अर्द्धनारीश्वर’ की सुमिता भी कहती है, ‘अपने को खोल देना चाहती हूँ. उतार फेंकना चाहती हूँ, संस्कारों के धुएँ की चादर को.’ पुरुष यही कहता है कि ‘बात अंततः तुम पर है, तुम्हारी अपनी शक्ति और तुम्हारी अपनी क्षमता पर है. तुम गिरोगी, समाज तुम्हें रौंदता चला जाएगा. तुम खड़ा होना चाहेगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा. तुममें चलने का संकल्प होगा तो मेरी शक्ति तुम्हें अजेय कर देगी.’ यह सही है कि युवा पीढ़ी इस छद्म नैतिकता से, संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलना चाहती है. संकीर्ण रूढ़ियों से मुक्त होना चाहती है. पर क्या कभी यह मुक्ति मिल सकेगी? विशेष रूप से स्त्री को. 

बलात्कार के कई कारण हो सकते हैं. काम वासना भी हो सकता है और बदले की भावना भी. बलात्कारी पुरुष की मानसिकता का विश्लेषण करते हुए विष्णु प्रभाकर यह टिप्पणी करते हैं कि ’जो कुछ उन्होंने किया वह केवल वासना का खेल नहीं था. वासना तो निमित्त मात्र थी बदला लेने की. हाँ, मूल में इस जघन्य कृत्य के पीछे इंतकाम लेने की कामना थी, संपन्न और सत्ता-भोगी वर्ग से इंतकाम लेने की कामना.’ इस तरह हर दिन किसी-न-किसी रूप में स्त्री को यौन उत्पीड़न का सामना करना ही पड़ता है और जाने किस-किस के बदले चुकाने पड़ते हैं. 

समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने ध्यान दिलाया है कि दामिनी के साथ घटित राक्षसी घटना ने युवा पीढ़ी में अपराध के खिलाफ़ लड़ने का जज्बा भर दिया है. दिल्ली से लेकर गली गली तक आम जनता न्याय माँगते हुए सड़कों पर उतर आई. पुलिस के दमन के बावजूद पीछे हटने को भी तैयार नहीं हुई. युवा पीढ़ी ने इस बार सरकार को हिला दिया. घबराहट में सरकार ने क़ानून में बदलाव लाने की बातें आरंभ कर दीं. इतना ही नहीं सामूहिक बलात्कार की जाँच के लिए न्यायिक आयोग गठित किए गए और सार्वजनिक बसों की संख्या बढ़ाने आदि जैसे फैसले लिए गए. लोगों के गुस्से को थामने के लिए अपराधियों को कड़ी-से-कड़ी सजा दिलाने का वादा भी किया गया है. फिर भी लोगों का गुस्सा थमा नहीं. क्योंकि जब जब ऐसी घटनाएँ घटती हैं तब तब सरकार वादा करती है, अखबारों में मोटी-मोटी सुर्ख़ियों में खबर को प्रकाशित किया जाता है और कुछ दिन बाद भुला भी दिया जाता है. 

इसीलिए विष्णु प्रभाकर का यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठाता है कि ‘नारी कब तक ढोती रहेगी इस अभिशाप को? कोई भी क़ानून स्त्री को तब तक बंधन मुक्त नहीं कर सकता जब तक वह स्वयं ही बंधन मुक्त न हो जाए. इसी प्रकार पुरुष भी अधिकार जमाने की आदतों के होते हुए तब तक दासता से मुक्त नहीं हो सकता जब तक वह अपने अंदर की सारी दासता से मुक्त न हो जाए....’ शताब्दियों से स्त्री को सरस्वती, लक्ष्मी, अन्नपूर्णा आदि कहकर उसे लुभाकर बेजुबान बना दिया गया और उसकी तमाम यातना को बलिदान कह कर गौरवान्वित किया गया. दूसरी ओर उसे वस्तु बनाकर बेचा, खरीदा, सजाया और रौंदा गया. देवीकरण और वस्तुकरण दोनों ही स्थितियाँ स्त्री को मनुष्य के रूप में न जीने देने वाली स्थितियाँ हैं. यह बात आज अगर स्त्री की समझ में आ रही है तो इसे नए समाज की आहट समझा जाना चाहिए और इन जगी हुई आवाजों का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि पुराने विधि-विधान और पुरानी स्मृतियाँ आज के संदर्भ में अर्थहीन हैं. आज नई स्मृतियों और नई संहिताओं की जरूरत है. सब कुछ बदलना होगा, सारे समाज की मानसिकता को बदलना होगा. 

शनिवार, 14 जुलाई 2012

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते .....

भारत महान परंपराओं वाला देश है. इसकी अनेक महान परंपराओं में से एक परंपरा यह भी है कि यहाँ ईश्वर की कल्पना पुरुष के साथ साथ स्त्री रूप में भी की गई है तथा यह माना गया है कि जहाँ स्त्रियों की पूजा की जाती है वहाँ देवता निवास करते हैं. “विश्व में संभवतः भारत एकमात्र ऐसा देश है और भारतीय संस्कृति एकमात्र ऐसी संस्कृति है जहाँ स्त्री को ‘देवी’ कहा जाता है, उसके नाम के साथ ‘देवी’ जोड़ा जाता है, जहाँ विद्या, संपदा, शक्ति की अधिष्ठाता शक्तियों को सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा – यों स्त्रीरूप में दर्शाया जाता है. यूनानी, रोमन सभ्यताओं में भी विशिष्ट कार्यों, व्यवसायों के विशिष्ट देवी-देवता हैं लेकिन उनकी इतने पूज्य-भाव से घर-घर में और सार्वजनिक तौर पर और इतने सुदीर्घ काल से पूजा नहीं होती है. भारत में ‘माँ’ का स्थान अत्यंत पूज्य और आदरणीय है, पत्नी अपने पति की ‘अर्धांगिनी’ है लेकिन सदियों के भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक इतिहास से स्त्री ‘विलुप्त’ है, निम्नतम सोपान पर है. जन्मपूर्व सामाजिक, व्यक्तिगत आकांक्षाओं से लेकर देहांत के बाद भी पराधीन है.”(डॉ.राजम पिल्लै, महाराष्ट्र की संत कवयित्रियाँ, पृ. 3) 

आचरण के स्तर पर देवी स्वरूपा स्त्री के साथ पशु से भी बदतर  व्यवहार के उदाहरण हमारे समाज में रोज ही मिलते रहते हैं. ऐसा लगता है जैसे सब ओर देवताओं के स्थान पर दानव रमण करने लगे हैं. प्रमाणस्वरूप गत दिनों गुवाहाटी में घटित कुकृत्य का उल्लेख किया जा सकता है. “एक नाबालिग लड़की पर टूट पड़े वहशी दरिंदों की करतूत को कैमरे में कैद करने की हिम्मत दिखाने वाले मीडियाकर्मी दीप्य बोरदोलोई से जब सोमवार की इस आंखों देखी घटना के बारे में पूछा गया तो उनके पहले लफ्ज थे,'यह छेड़छाड़ नहीं सामूहिक दुष्कर्म जैसा वाकया था।' गुवाहाटी में एक स्थानीय चैनल न्यूजलाइव के रिपोर्टर दीप्य ने दावा किया कि उन्होंने लड़की को छोड़ने की कई बार गुहार लगाई, लेकिन उन उन्मादी युवकों ने एक न सुनी। उन दुस्साहसी युवकों की भीड़ बढ़ती गई। युवकों के उग्र तेवरों को देख दीप्य ने कैमरामैन से इन शर्मसार करने वाली तस्वीरों को कैद करने का इशारा किया। सोमवार रात को शहर के भीड़ भरे इलाके में फर्राटा भरती गाड़ियों के बीच यह सबकुछ हो रहा था। पीड़िता चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन कोई उसके बचाव में आगे नहीं आया। कुछ राहगीर तमाशबीन बनकर देखते रहे, मगर किसी ने नशे में धुत उन युवकों को रोकने की कोशिश नहीं की। आरोपियों ने लड़की का चेहरा कैमरे की ओर करने की कोशिश भी की, जैसे वह कोई बहादुरी का काम कर रहे हों। घटनास्थल से एक किमी दूर पुलिस स्टेशन होने के बावजूद पुलिसकर्मी 40 मिनट बाद वहां पहुंचे। असंवेदनशीलता में डूबी पुलिस इंटरनेट पर वीडियो देखकर भड़के लोगों के गुस्से के बाद ही नींद से जागी।“ (जागरण, 14 जुलाई, 2012). 

कहना न होगा कि इस प्रकार की घटनाएँ इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटनाएँ हैं. इनसे हमारा यह महान देश भी कलंकित होता है. ऐसी हालत में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का विचलित हो उठना स्वाभाविक है. लेकिन यह और भी चिंताजनक है कि जिन्हें विचलित होना चाहिए वे ज़रा भी विचलित दिखाई नहीं देते. शायद इसी से दुखी और हताश होकर ‘फेसबुक’ पर डॉ.कविता वाचक्नवी ने यह लिखा कि “पुरुषरहित होना ही इस (दुनिया) का अपराधरहित होना है क्योंकि संसार के सारे अपराध (क्राइम) पुरुष ही से शुरू होते और उसी पर अंत होते हैं या उसी के इर्दगिर्द के कारणों ही से उपजते हैं।”  यह कथन हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि क्या हमारा पुरुष समाज अभी तक सभ्य नहीं हुआ है और उसे इतना सभ्य होने में और कितने युग लगेंगे कि इस धरती पर स्त्रियाँ अपने आपको पुरुषों के होते हुए भी  सुरक्षित महसूस कर सकें. 

सारांश यह है कि जब तक स्त्री के प्रति बर्बरता रहेगी तब तक हमें सभ्य समाज नहीं माना जा सकता.

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

स्त्री : अशक्त या सशक्त

 
स्त्री कितनी अशक्त और कितनी सशक्त? यह सवाल बार बार हमारे सामने उपस्थित हो जाती है. इस पर अनेक विद्वानों एवं विदुषियों ने समय समय पर काफी कुछ कहा है. इस मुद्दे पर काफी चर्चा-परिचर्चा, बहस-मुहाबिसा भी हो चुका है. मैं भला इस पर और क्या कह सकती हूँ?

पर एक बात जरूर कहना चाहूंगी. स्त्री होने का प्रमुख लक्षण है कोमल होना. भावनात्मक स्तर पर स्त्री कोमल है. दया, ममता, वात्सल्य आदि गुण स्त्री को कोमल बानाते हैं. इसी कोमलता के कारण स्त्री पुरुष की सहचरी बनकर सृष्टि का निर्माण करती है. सृष्टि के निर्माण में स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं. स्त्री की इस निर्भरता को, इस स्त्रीत्व को पुरुष वर्चस्व ने स्त्री के लिए अभिशाप बना दिया. वह उसकी संवेदनशीलता का दोहन करने लगा. सिर्फ पुरुष ही स्त्री का शोषण नहीं करता है. स्त्री का शोषण स्त्री भी करती है, परिवार भी करता है और साथ ही साथ समाज भी करता है. इसमें संदेह नहीं कि पुरुष को भी इस समाज में समस्याओं का सामना करना पड़ता है पर स्त्री को उससे ज्यादा पीड़ा उठानी पड़ती है.

बचपन से ही लड़की को लड़की होने का अहसास कराया जाता है. हर बात पर उसे यह कहकर टोका जाता है कि तुम लड़की हो, चुप रहो. शादी-ब्याह करके पराए घर में जाना है. पुरुष की तरह सीना तान के मत चलो. सर झुकाए बैठो. इत्यादि...... इत्यादि....... इत्यादि...... परंपरा और संस्कृति के नाम पर स्त्री को जंजीरों में जकड़ दिया जाता है. इस समाज ने जबरदस्ती उसे सती बनाया. देवदासी बनाया. उसे खिलौना बनाकर नचाया. इसलिए नीलम कुलश्रेष्ठ कहती हैं 'इतिहास की कोई दरबारी गायिका हो, नर्तकी हो या खूबसूरत रानी ही क्यों न हो. उसके इर्द गिर्द षड्यंत्रों के शिकंजे कसे होते थे.'

स्त्री की अशक्तता नैसर्गिक नहीं बल्कि थोपी हुई स्थिति है. उसे सपनों तक से वंचित कर दिया गया था. समाज ने स्त्री को अपने बारे में भी निर्णय लेना का अधिकार नहीं दिया. वह सबके सामने ऊँची आवाज में बात तक नहीं कर सकती निर्णय क्या ख़ाक लेगी! परंतु पुनर्जागरण आंदोलन, समाज सुधार आंदोलन, स्वतंत्रता आंदोलन तथा लोकतांत्रिक भारत में सामाजिक न्याय की माँग ने स्त्री के सशक्तीकरण को संभव बनाया.

निस्संदेह समाज ने स्त्री की भूमिका तय कर दी. उसे यह बताया गया कि घर संभालना, बच्चों को पैदा करना और उन्हें पालना, स्वादिष्ट भोजन बनाना, घर परिवार के लिए बलिदान होना आदि उसकी जिम्मेदारियां हैं. इन जिम्मेदारियों को निभाते निभाते स्त्री यह भूल गई कि उसका भी कोई अस्तित्व है.

उसे जागरूक बनाने के लिए राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद और महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों ने आवाज बुलंद की तो वे समाज सुधारक कहलाए. जब स्त्री जागरूक हुई और शोषण तथा  षड्यंत्र के खिलाफ आवाज उठाई तो वह विद्रोहिणी बन गई. कुलटा बन गई. और न जाने क्या क्या बन गई. इसके बावजूद उसने अपने पर खोलकर उड़ना नहीं सीखा और आत्मनिर्भरता हासिल करके दिखाई. जब स्त्री पर-निर्भर थी, कोमल थी समाज के हाथों ठगी गई, लूटी गई, प्रताड़ित हुई, शिकार हुई. धीरे धीरे स्त्री अपनी शक्ति को पहचानने लगी. अपनी कमजोरियों को दूर करने लगी. आत्मनिर्भर होने लगी. यह आत्मनिर्भरता स्त्री को शिक्षा ने प्रदान की. महादेवी वर्मा कहती है 'युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशीलता के लिए दंड देता आ रहा है. स्त्री बोल्ड बनी. समाज में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगी. हर क्षेत्र में वह आगे बढ़ी. वह अपने स्त्रीत्व को ही गुलामी का कारण समझने लगी. क्या स्त्रीत्व को खोना ही सशक्तीकर्ण है? पुरुष को हर तरह से खलनायक के रूप में चित्रित करना ही सशक्तीकरण है? स्त्री, स्त्री भी रहे, अपनी संवेदनाओं और सुकोमलता को भी बरकारा रखे और साथ ही मनुष्य भी बने. उसे शिकार न होना पड़े. वह अपमानित महसूस न करे. उसके साथ अन्याय न हो. इसीलिये महादेवी वर्मा कहती हैं 'हमें पुरुष नहीं बनाना है. हमें मनुष्य बनाना है.' हाँ संवेदनशील मनुष्य बनाना है.

आज कारपोरेट दुनिया और राजनीती में स्त्री ने अपनी ताकत का झंडा फहराया है. वह हर तरह से सफल है. सशक्त है. पर क्या आज हम यह कह सकते हैं कि कन्या भ्रूण सुरक्षित है ! स्त्री अकेली आधी रात को घर से बाहर निकल सकती है ! अगर नहीं तो मानना पडेगा कि सशक्त होकर भी आज की दुनिया में स्त्री सशक्त नहीं है जो हमारे समय की एक शर्मनाक सच्चाई है.   
  • गत माह कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद की मासिक गोष्ठी में प्रस्तुत किया गया आलेख      

मंगलवार, 15 मार्च 2011

इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ...



आज की नारी न तो कामायनी की श्रद्धा मात्र है और न इड़ा मात्र ही। इड़ा और श्रद्धा उसके व्यक्‍तित्व के दो पहलू हैं - समान रूप से आवश्‍यक और समान रूप से महत्वपूर्ण। जब तक स्त्री को श्रद्धा और इड़ा में विभाजित करके देखा जाता रहेगा, ऐसा हर दर्शन अधूरा रहेगा। स्त्री को उसके व्यक्‍तित्व की पूर्णता में समग्र मानवी के रूप में देखे बिना उसके बारे में फ़तवे जारी करना न्याय संगत नहीं है।

इंदिरा गांधी ने एक जगह कहा था कि ‘भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही स्त्री को कई अधिकार प्राप्‍त हैं। इसलिए अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ स्त्री अधिकारों के लिए उस तरह के संघर्ष की आवश्यकता  नहीं है।’ अतः भारतीय संदर्भ में स्त्री की छवि कई प्रसंगों में दुर्बल न होकार सक्षम ही प्रतीत होती है।’ हाँ, यह सर्वविदित है कि भारत में कई बाह्‍य आक्रमण हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय संस्कृति में कई अन्य देशों की संस्कृति आकर सम्मिलित हुईं तथा स्त्रियों पर कुछ पहरे लगने भी शुरू हुए। यहाँ भिन्न भिन्न वर्ग, धर्म और संप्रदाय की स्त्रियों की भिन्न भिन्न दशाएँ देखने को मिलती हैं। यह एक आम धारणा बन चुकी है कि मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल के आरंभ तक भारत में स्त्रियों की दशा सोचनीय रही लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली और नई प्रौद्योगिकी ने स्त्री को बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक स्तर पर सचेत किया है। अतः आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ स्त्री न पहुँची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘दि सब्जेक्शन ऑफ विमैन’ (1869) में स्त्रियों की कानूनी असमानता को चुनौती दी है। उनकी मान्यता थी कि ‘स्त्रियों के लिए मताधिकार का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है।’ संयुक्‍त राष्‍ट्र के महासचिव कॉफी अन्नान के अनुसार ‘प्रजातांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज की अवधारणा को क्रियान्वित करने के लिए सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक स्तर पर जेंडर समानता और महिलाओं का सशक्‍तीकरण महत्वपूर्ण कदम है।’ स्त्रियों के लिए मताधिकार का संवैधानिक अधिकार तो प्राप्‍त हुआ लेकिन आज भी वह अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत है। दूसरी ओर ‘हिंदू कोड बिल’ ने भारतीय नारी की स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई। इस समस्त संघर्ष और चेतना का ब्यौरा हमें सहज रूप से साहित्यिक कृतियों में भी देखने को मिलता है।

संवेदनशील साहित्यकारों ने स्त्री की जागरूकता का चित्रण किया है। साहित्य में स्त्री के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों रूपों का चित्रण प्राप्‍त होता है। आदिकालीन हिंदी साहित्य में नारी के अपूर्व सौंदर्य का वर्णन पाया जाता है। भक्‍तिकालीन साहित्य में उसके वैराग्यजनित कुंठाओं का चित्रण है तो रीतिकालीन साहित्य में वह पुरुष की विलासिता का पात्र बन गई। आधुनिक साहित्य में नारी को अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करते देखा जा सकता है तथा समकालीन साहित्य में स्त्री की ‘बोल्डनेस’ को।

हिंदी साहित्यकारों की भाँति तेलुगु साहित्यकारों ने भी स्त्री के अनेक रूपों और उनसे जुड़े अनेक मुद्‍दों का चित्रण किया है। कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु और गुरजाडा अप्पाराव जैसे साहित्यकारों ने स्त्री की समस्याओं को लेकर अनेक रचनाएँ की हैं। स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से तेलुगु साहित्य में गुडिपाटी वेंकट चलम्‌ की रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री को अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य किया। उनकी रचनाओं में ‘कन्नीटी कालुवा’ (अश्रुधारा), ‘अदृष्‍टम्‌’ (किस्मत), ‘हंपी कन्यलू’ (हंपी की कन्याएँ) और ‘वेंकट चलम्‌ कथलू’ (वेंकट चलम्‌ की कहानियाँ) आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इसी क्रम में कोडवटीगंटी कुटुंबराव की रचनाओं को भी स्त्री विमर्श की दृष्‍टि से देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी कृतियों में स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता से जुड़े मुद्‍दों को उकेरा है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं ‘आडा जन्मा’ (स्त्री जन्म), ‘लेचिपोइना मनिषी’ (भागा हुआ मनुष्य) और ‘कुलम्‌ लेनी पिल्ला’ (निम्न जाति की लड़की) आदि।

चलम्‌ और कुटुंबराव के साहित्य से प्रेरणा पाकर अनेक स्त्रियों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। इतना ही नहीं अनेक पुरुष साहित्यकारों के साथ साथ महिला रचनाकारों ने भी उनसे प्रभावित होकर अपने सृजनात्मक लेखन द्वारा समाज में स्त्री की दशा को बदलने की आवाज उठाई।

भावात्मक कहानियाँ लिखने में जहाँ अडवि बापिराजु, चिंता दीक्षितुलु और वेलूरि शिवराम शास्त्री प्रसिद्ध हैं वहीं लेखिकाओं में कनुपर्ति वरलक्ष्‍म्मा, इल्लिंदल्लि सरस्वती देवी, मालती चंदूर, अब्बूरि छायादेवी तथा कोम्मूरि पद्‍मावती देवी आदि विख्यात हैं। इन महिला रचनाकारों ने भोगे हुए यथार्थ को कलात्मक बिंबों द्वारा अपनी रचनाओं में अभिव्यक्‍त किया है।

आज वह जमाना नहीं रहा जब स्त्री की दुनिया चूल्हा-चक्की तक सीमित थी। अब वह घर-परिवार के साथ साथ समाज की भी संरक्षक बन गई है। कोंडेपूडि निर्मला, ओल्गा, वसंता कन्नाभिरान्‌, पद्‍मलता, एन.अरुणा, वाणी रंगाराव, घंटसाला निर्मला, शाहजहाना, वकुलाभरनम्‌ ललिता और के.गीता जैसी अनेक कवयित्रियों ने भुक्‍तभोगी के रूप में स्त्री जीवन के यथार्थ के साथ साथ अपने समकालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को भी अपनी रचनाओं में विचारोत्तेजक रूप में प्रस्तुत किया है।

महाकवि श्रीश्री का कथन है कि ‘कविता के लिए हर कोई छोटी चीज भी उपयोगी है।’ इसी तथ्य को आज की समकालीन स्त्री रचनाकार चरितार्थ कर रही हैं। वे अपनी अभिव्यक्‍ति के लिए छोटे से छोटे बिंब, प्रतीक, घटना और विचार को सशक्‍त रूप से प्रयोग कर रही हैं। एन.अरुणा ने अपनी कविता ‘सुई’ के माध्यम से यह स्पष्‍ट किया है कि सुई स्त्री जीवन और सृजनात्मक मानसिकता का वह प्रकार है जो बेटी को अपनी माँ से विरासत में प्राप्‍त होता है। सुई को कवयित्री ने प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता के धागों से पिरोती है - "इनसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फटते भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-विभेदों को/ रफ़ू करना चाहती हूँ/ चीथड़ों में फिरनेवाले लोगों के लिए/ हर चबूतरे पर/ सिलाई मशीन बनना चाहती हूँ।/ ***/ आर-पार न सूझनेवाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में / मेरी सुई है/ और लोकों की समष्‍टि के लिए खुला कांतिनेत्र।" (एन.अरुणा, ‘सुई’, मौन भी बोलता है; पृ.53-54)।

स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करने के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। जैसे समान क्षतिपूर्ति अधिनियम 1976; बाल विवाह प्रतिबंध नियम 1929, संशोधित 1987; हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और महिला आरक्षण विधेयक आदि। फिर भी स्त्री का जीवन संघर्षपूर्ण है। उसे अक्सर यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि तुम लड़की हो। अपनी सीमा में रहो। एन. रजिया बेगम ने अपनी कविता ‘अलागे अन्नारू’ (ऐसे ही कहते थे) में इसी बात को स्प्ष्‍ट किया है - "बाल्यम्‌लो/ ‘चिन्न पिल्लवी नीकेम तेलुसु कूर्चो!’ अन्नारू/ यौवनम्‌लो/ ‘उडुकुरक्‍तम्‌ मंची चेडु तेलीदु कूर्चो! अनारू/ वृद्धाप्यम्‌लो/ ‘मुसल्‌दानिवी इंकेम्‌ चेस्ताव कूर्चो!’ अनारू/ अवकाहसम्‌ रानन्दुकु कोपंगा लेदु नाकु/ कूर्चोनी, कूर्चोनी बद्‌धकम्‌ वच्चिनंदुके बाधगा उन्दि।" (‘बचपन में  यह कहकर चुप कराया गया कि तुम बच्ची हो, तुम्हें क्या पता। यौवन में कहा गया कि जोश में हो, अच्छे और बुरे की पहचान नहीं है, चुप बैठो। और वार्धक्य में यह कहकर एक कोने में बिठा दिया ‍गया कि बूढ़ी हो, अब क्या कर सकती हो। कुछ करने के लिए मौका प्राप्‍त न होने के कारण क्रोधित नहीं हूँ, पर बैठे बैठे उकताहट ने घेर लिया है। यही मेरी वेदना है।’ - एस.रजिया बेगम, अलागे अन्नारू (ऐसे ही कहते थे), नीलि मेघालू (नीला मेघ) (सं) ओल्गा; पृ.58)।

पुरुष सदैव से स्त्रियों की कुंठा, निराशा, इच्छा और प्रेम आदि के बारे में तो लिखता आया है लेकिन वह निजीकरण (प्रसव वेदना और मासिकधर्म) जिसे स्त्री ही स्वयं अनुभव कर सकती है, उसकी भाषिक और सच्ची अभिव्यक्‍ति स्त्रियाँ ही कर सकती हैं। तेलुगु की अनेक कवयित्रियों ने इस सर्वथा निजी अनुभव को सटीक अभिव्यक्‍ति प्रदान की हैं। 

आज की स्त्री पूरी तरह से बदल चुकी है। जहाँ मनुस्मृति में यह कहा गया है कि स्त्री की कौमार्य अवस्था में पिता, यौवनावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं वहीं आज की स्त्री कहती है कि "सुना है पुराने जमाने में गांधारी नाम की एक महान पतिव्रता थी, जिसका पति जन्मांध था। उसने अपनी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँध ली कि उसे वह दुनिया दिखाई न दें, जिसे उसका पति नहीं देख सकता। इस ज़माने में अगर आप ऐसा सोचेंगे कि हम बिना पट्टी बाँधे आपकी मनमानी देखें, चुपचाप रहें, तो यह संभव नहीं है।" (डी.कामेश्वरी, ‘आज की नारी’; आज की नारी’ पृ.58)|

वैज्ञानिक तर्कों ने भी यह साबित कर दिया है कि कई प्रसंगों में पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक समझदार, भावुक और मानवीय गुणों से संपन्न है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा के निबंध ‘युद्ध और नारी’ के  कुछ अंश याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ‘जहाँ पुरुष एक बरगद का पेड़ है, वहीं स्त्री एक कोम्ल लता।’ वे आगे कहती हैं कि ‘स्त्री ने यदि पुरुष के विरुद्ध हथियार उठा लिया तो पूरी दुनिया का सर्वनाश हो जाएगा।’ अतः जो समाज स्त्री को एक बोझ समझकर उसके पैदा होने से पहले ही उसकी भ्रूण हत्या करने की ओर अग्रसर हैं, उन्हें थोड़ी देर के लिए आज की स्त्री की शक्‍ति को एक बार परख लेना समीचीन होगा।

अनेक स्त्रियों ने अपने अनुभूत यथार्थ को सर्जनात्मक अभिव्यक्‍ति दी है। उनमें से कुछ ने और एक कदम आगे बढ़कर इस सर्जनात्मक चेतना को वैचारिक रूप प्रदान करने के लिए कई संस्थाओं का निर्माण किया है। उदाहरणार्थ तेलुगु की प्रसिद्ध कवयित्री ओल्गा (1950) ने स्त्री संबंधी रचनात्मक साहित्य ही नहीं लिखा बल्कि उस साहित्य को जन आंदोलन का रूप देने हेतु ‘अस्मिता’ (Feminist Voluntary Organization) की स्थापना भी की। ऐसी और भी अनेक संस्थाएँ सामाजिक परिवर्तन के लिए अहर्निश प्रयासरत हैं। 

स्मस्णीय है कि मानव-अधिकारों की बात करना ही स्त्री-अधिकारों की बात करना है; स्त्री-अधिकार कोई अलग वस्तु नहीं है :-
"हमें उड़ने को
पंख नहीं चाहिए।
बस हमारे पैरों की
बेड़ियाँ खोल दो॥" 

- ८.३.२०११ 



शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

स्त्री विमर्श से संबंधित कुछ पुस्तकें



  • आम औरत : जिंदा सवाल - सुधा अरोड़ा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • औरत अपने लिए - लता शर्मा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • औरत के लिए औरत - नासिरा शर्मा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • औरत : कल, आज और कल - आशा रानी व्होरा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • आधी दुनिया का सच - कुमुद शर्मा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • आज का स्त्री आंदोलन - रमेश उपाध्‍याय और संज्ञा उपाध्याय, शब्द संधान प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • औरतें और आवाज - क्षमा शर्मा, आलेख प्रकाशन, दिल्ली।
  • आदमी के निगाह में औरत - राजेंद्र यादव, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
  • इस्पात में ढ़लती स्त्री - शशिकला राय, सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • उपनिवेश में स्त्री : मुक्‍ति कामना की दस वार्ताएँ - प्रभा खेतान, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
  • खुली खिड़कियाँ - मैत्रेयी पुष्‍पा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • जीना है तो लड़ना होगा - वृंदा कारात, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • नारी तुम अनन्या हो - जयश्री गोस्वमी महंत, सामायिक प्राकशन, नई दिल्ली।
  • नारी प्रश्‍न - सरला माहेश्‍वरी, राधाकृष्‍ण प्रकाशन, दिल्ली।
  • नारी शोषण : आइने और आयाम - आशारानी व्होरा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली।
  • नष्‍ट लड़की : नष्‍ट गद्‍य - तसलीमा नसरीन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • नहीं, नहीं मैं केवल नारी - इंदिरा ‘नूपुर’, आलेख प्रकाशन, दिल्ली।
  • नौकरपेशा नारी - पुष्‍पपाल सिंह, सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • प्रेम के साथ पिटाई - लवलीन, सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • बाज़ार के बीच : बाज़ार के खिलाफ (भूमंडलीकरण और स्त्री के प्रश्‍न) - प्रभा खेतान, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • बिटिया! बनो सयानी - सुदर्शन भाटिया, आलेख प्रकाशन, दिल्ली।
  • महिला शोषण और मानवाधिकार - सुधारानी श्रीवास्तव एवं आशा श्रीवास्तव, अर्जुन पब्लिकेशन हाउस, नई दिल्ली।
  • मात्र देह नहीं है औरत - मृदुला सिन्हा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • मन माँझने की जरूरत - अनामिका, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • मोर्चे पर स्त्री - अंजुदुआ जैमानी, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • लड़ेंगे भी - रचेंगे भी (भारत में स्वरोजगारत स्त्रियों का दास्तान) - इला.भट्‍ट, वाग्देवी प्रकाशन, बिकानेर, राजस्थान।
  • विश्‍व की प्रसिद्ध महिलाएँ - आशारानी व्होरा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री उपेक्षिता - प्रभा खेतान, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
  • स्त्रीत्व धारणाएँ : यथार्थ - कुसुमलता केडिया, विश्‍वविद्‍यालय प्रकाशन, दिल्ली।
  • स्त्री आकांक्षा के मानचित्र - गीताश्री, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री अस्मिता के प्रश्‍न - सुभाष सेतिया, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री के लिए जगह - (सं)राजकिशोर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री संघर्ष का इतिहास :1880-1900 - राधाकुमार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्रीवादी विमर्श : समाज और साहित्य - क्षमा शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ - रेखा कस्तवार, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री सशक्‍तीकरण के विविध आयाम - (सं) ऋषभदेव शर्मा, गीता प्रकाशन, हैदराबाद।
  • स्त्री : मुक्‍ति का सपना - कमला प्रसाद, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री अस्मिता : साहित्य और विचारधारा - जगदीश चतुर्वेदी, सुधा सिंह, आनंद प्रकाशन, कलकत्ता।
  • स्त्री : परंपरा और आधुनिकता - राजकिशोर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • स्त्री और पराधीनता - द सब्जेक्‍शन ऑफ विमैन’ - जॉन स्टुअर्ट मिल, (अनु) युगांत धीर, संवाद प्रकाशन, मुंबई, मेरठ।
  • स्त्री-मुक्‍ति : साझा चूल्हा - अनामिका, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया, नई दिल्ली।
  • शृंखला की कडियाँ - महादेवी वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।
  • हम सभ्य औरतें - मनीषा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली।
  • हिंदी लेखिकाओं की कहानी - नारी के बदलते स्वरूप - सुधा बालकृष्‍णन,संजय बुक सेंटर, वाराणसी।