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बुधवार, 24 दिसंबर 2014

स्मृतियों में बसी गंगा की तरंग

9 जून 2014. 
रात की नींद गायब. कल नजीबाबाद जो जाना है ‘परिलेख हिंदी साधक सम्मान’ लेने. इसकी कल्पना भी नहीं की थी. 

10 जून 2014.
सुबह के चार बजे. तैयार हो गई और ठीक पाँच बजे माँ-पापा, भाई और तीन साल की बेटी से विदा लेकर पति के साथ घर से हैदराबाद नामपल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ी. 5.40 तक स्टेशन पहुँच गई और ठीक छह बजकर पाँच मिनट पर गाड़ी ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया. सफर बहुत अच्छा रहा. ठीक सामने की सीट पर एक सरदार जी और उनकी पत्नी रमणिक कौर जी (यही नाम बताया उन्होंने) थे. समय बीतता गया और ऐसे ही हम लोगों के बीच सहज वार्तालाप शुरू हुआ. वे दोनों अमृतसर जा रहे थे गुरुद्वारे का दर्शन करने. वार्तालाप से बहुत ही सरल और मिलनसार लगे. नागपुर स्टेशन पर इंजिनियरिंग और सी.ए. के कुछ विद्यार्थियों की टोली चढ़ी. वे मनाली जी रहे थे. उसमें एक व्यक्ति अपने परिवार (पत्नी और आठ साल की बेटी) को भी साथ लेकर जा रहा था. रात भर वे लोग मस्ती करते रहे. सफर में थकान महसूस ही नहीं हुई. जब भी कमर में दर्द होने लगता था तो ऊपर बर्थ पर जाकर सो जाती थी. पहली बार उत्तर की ओर यात्रा कर रही थी. 

आंध्र प्रदेश – अरे बाबा अब तो यह क्षेत्र तेलंगाना हो गया. जब तक गाड़ी तेलंगाना क्षेत्र में चल रही थी तब तक भौगोलिक परिवेश कुछ और था. जैसे जैसे गाड़ी महाराष्ट्र में पहुँची धीरे धीरे भौगोलिक परिस्थिति बदल गई. तेलंगाना के क्षेत्र में सूखे पेड़ दिखाई दे रहे थे. कहीं कहीं बंजर भूमि थी तो कहीं कहीं बुआई के लिए तैयार भूमि दिख पडी. नीम, ताड़, आम, छोटे खजूर और बरगद के पेड़ तो हैं ही, हर जगह टीक और बबूल के वृक्ष भी हैं. गर्मी का तो पता नहीं चला क्योंकि वातानुकूलित कोच में बैठकर यात्रा कर रही थी. महाराष्ट्र में पहुँचते ही मौसम बदला सा गया. बारिश की बूँदें भी गिरीं. नागपुर से जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, संतरे के बाग ही बाग थे. जगह जगह पर आम के बाग थे. पहाड़ों के बीच से जब गाड़ी गुज़री तो बहुत ही अच्छा लगा. कहीं कहीं तो गाड़ी सुरंग से गुज़री. कहीं जंगल था, तो कहीं पहाड़, कहीं सपाट भूमि तो कहीं घाटी. देखने लायक है भारत की प्राकृतिक संपदा. 

11 जून 2014

गाड़ी सुबह 9 बजे के आस-पास दिल्ली पहुँची. पापा के शिष्य अगस्टिन जी गाड़ी लेकर स्टेशन पहुँच गए हमें लेने. हम स्टेशन से सीधे आई.एस.बी.टी. - कश्मीरी गेट पहुँच गए और वहाँ से नजीबाबाद जाने वाली बस में चढ़ गए. ड्राइवर की सीट के पीछे वाली सीट खाली थी तो वहीं आराम से बैठ गए. बस चल पड़ी नजीबाबाद की ओर. जैसे ही बस दिल्ली के बाहर पहुँची तो रास्ते में लीची और रसीले आम दिख गए. हैदराबाद में तो लीची एकदम सूखी होती हैं. लेकिन यहाँ बड़ी बड़ी लाल-लाल रसीली लीची. देखते ही मन ललचाने लगा. बस आगे बढ़ती गई और मैं दोनों तरफ के पेड़-पौधों को देखने लगी. फलों से लदे हुए आम और लीची के पेड़. वाह! क्या बात है! बस रुकने का नाम नहीं ले रही थी. दोपहर हो गई और भूख लग रही थी तो खजूर खाते हुए गए. हैदराबाद से ही लिए थे साथ. मेरठ पार करने के बाद ड्राइवर ने एक ढाबे के पास बस रोक दी और हम सब वहाँ उतरे और ठंडे पानी से मुँह धोया तो मानो जान में जान आ गई. फिर हमने वहाँ चटपटी चाट का मजा लिया, शिकंजी भी पी और फिर आकर बस में विराज गए. रास्ते में अनेक छोटे छोटे गाँव थे. उनके नाम बड़े ही मजेदार लगे. जैसे – भैंसा, फिटकरी, चौलापुरा, इंचौली, बहसूमा, कौल, झुनझुनी, सदपुर, सैफपुर, रामराज, बहसुमा, भगवंतपुरम, मीराँपुर, डाबका, पठानपुरा, मलियाना, पुट्ठा, कुंडा, पतला, निवाडा आदि. मतलब यह है कि दक्षिण के स्थान नामों के अभ्यासी मन को ये नाम बहुत नए और रोचक लगे! और हाँ, ट्रकों व दूसरे वाहनों पर मजेदार स्लोगन भी पढ़ने को मिले. एक ट्रक पर लिखा हुआ था ‘हँस मत पगली प्यार हो जाएगा.’

एक मजेदार बात. एक यात्री को कहीं उतरना था पर ड्राइवर ने बस उसके वांछित स्थान पर नहीं रोकी. यात्री ने कटाक्ष पूर्वक ड्राइवर को संबोधित किया - ‘अपणे घर ही ले कै जागा क्या?’ ड्राइवर भी हाजिर जवाब निकाला. बोला – ‘क्या, मेरा कान बजै? कंडक्टर सै सिट्टी ना बजवा सकै था क्या?’ यह है हमारी लोक बोलियों के बतरस की संपदा जो शहरों की नकली भाषा से गायब है. एक व्यक्ति हाजमे की गोलियाँ बेच रहा था. उसके बेचने का तरीका भी भा गया. वह लोकभाषा (कौरवी) में लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था. क्या रेटॉरिक थी उसकी भाषा में. तब समझ में आया कि दिलीप सर क्यों कहते हैं कि भाषा का असली व्यवहार उसके प्रयोक्ता समाज में रहकर ही सीखा जा सकता है. 

होटल ब्ल्यू डाइमंड में 
नजीबाबाद पहुँचते पहुँचते पाँच बज गए. वहाँ बस स्टैंड के पास आयोजक हमारे स्वागत में खड़े थे. रिक्शा कर लिए गए. चेन्नै, हैदराबाद और आंध्र प्रदेश के रिक्शों से यहाँ के रिक्शे अलग ही थे. बहुत बरसों के बाद रिक्शे पर चढ़ी तो मजा आ गया. ब्ल्यू डाइमंड होटल पहुँचे. होटल में डॉ. रजनी शर्मा, डॉ. सुशील कुमार त्यागी, आकाशवाणी के ताहिर महमूद और प्रदीप सिंह ने अगवानी की.

भाई अमन कुमार त्यागी के परिवार के साथ 

थोड़ी देर आराम करने के बाद शाम को वहाँ से परिलेख कला एवं संस्कृति समिति, नजीबाबाद के संस्थापक भाई अमन कुमार त्यागी के घर पहुँचे. वहाँ उनका पूरा परिवार स्वागत में जुटा हुआ था. भाभी और बच्चे (अक्षि और तन्मय), डॉ. सुशील कुमार त्यागी आदि. खाना लाजवाब था. खाने के बाद होटल की ओर पैदल चल पड़े. चाँदनी रात थी. रेलवे स्टेशन क्रॉस करके जाना था. ब्रिज पर चढ़कर स्टेशन पार करते समय निर्मल आकाश में चंद्रमा की मनमोहक छटा निहारने योग्य थी. हम लोगों ने चाँदनी में कुछ फोटोग्राफी भी की. पूरे समय अमन भाई जाने कहाँ-कहाँ के रोचक किस्से सुनाते रहे. बड़े ठहरे से अंदाज में बात करते हैं अमन जी – कोई जल्दी नहीं, कोई तनाव नहीं! 

12 जून 2014. 

सुबह सुबह आँख खुल गई तो हम तैयार हो गए. डॉ. रजनी शर्मा के सुपुत्र आ गए और डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी
डॉ. रजनी शर्मा की पोती गौरी  
तथा डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी के साथ हमें अपने घर ले गए नाश्ते पर. गरमा गरम जलेबी और ब्रेड रोल के साथ लस्सी. मजा आ गया. सच कहूँ तो सुबह सुबह इस तरह का नाश्ता पहली बार किया. वहाँ से फिर होटल लौटे. थोड़ी ही देर में रुड़की से श्रद्धेय गुरुवर डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी आए. अरुण जी मुझे बेटी मानते हैं. ईमेल और फोन पर तो उनसे बातचीत होती रहती थी पर प्रत्यक्ष दर्शन पहली बार हुए. इतने में वहाँ ‘अमर उजाला’ के संवाददाता पहुँच गए और हम लोगों के साक्षात्कार लिए. अमन भाई ने आकाशवाणी – नजीबाबाद में रिकॉर्डिंग की भी व्यवस्था की थी; यों बाद में डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी हम सबको सीधे आकशवाणी भवन ले गए. पहले डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी की रिकॉर्डिंग हुई बाद में मेरी. मैंने ‘हिंदी तथा तेलुगु के प्रमुख संतों की रचनाओं में अंतःसंबंध’ शीर्षक वार्ता प्रस्तुत की. उधर अमन कुमार त्यागी जी के घर उनके पिताजी (श्री महेंद्र अश्क जी), माताजी और अन्य परिवारी जन हमारी प्रतीक्षा में बैठे थे. 

खाना खाते खाते तीन बज गए तो हम तुरंत होटल की ओर निकल पड़े चूँकि 4 बजे से परिलेख कला एवं संस्कृति समिति तथा लोक समन्वय समिति, नजीबाबाद का सम्मान समारोह था. 4 बजे के आसपास हम समारोह स्थल पहुँच चुके थे. बढ़िया बैनर लगा हुआ था – बैनर पर अपना और अपनी पुस्तक का चित्र देखकर मैं रोमांचित तो हुई, विचलित भी हो उठी – मैं इस सबकी अधिकारी हूँ भी या नहीं! 


सम्मान कार्यक्रम समाप्त होते होते आठ बज ही चुके थे. हम सब सीधे अमन भाई के घर पहुँचे. खाना खाकर वहाँ से होटल की ओर प्रस्थान. सब कुछ सपने जैसा लग रहा था. सचमुच मैंने अपने अत्यंत साधारण सी हिंदी सेवा के लिए इतनी स्वीकृति और सम्मान की न तो आशा की थी, न अपेक्षा. यह सब मुझे अनायास ही मिला रहा है – मेरे मातापिता और गुरुजन के आशीर्वाद से! 

13 जून 2014 

ठीक 7 बजे राजकुमार जी हाजिर हो गए हमें अपने घर ले जाने. आदरणीय राजकुमार जी के बारे में यह बताना जरूरी है कि प्रो. देवराज जी के अनन्य और घनिष्ठ मित्र हैं और प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी के प्रति भी वैसा ही स्नेहभाव रखते हैं. किस्सागोई में राजकुमार जी अमन जी से इक्कीस निकले. हमें इर्द गिर्द बिठाकर घर के बुजुर्ग की तरह जाने कितनी ‘ऐतिहासिक’ वारदातें उन्होंने सुना डालीं. उनसे ही मुझे ‘साहित्य कुंभ’ तथा ‘साहित्य मंथन’ की ऐतिहासिकता का पता चला. वहाँ से हम गुरुवर डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी के घर जाने वाले थे लेकिन कुछ ऐसी अप्रत्याशित स्थितियाँ आ गईं कि जा न सके. और इस तरह नजीबाबाद का हमारी यह सारस्वत यात्रा अधूरी रह गई. 

फिर कार्यक्रम बना कण्वऋषि आश्रम जाने का. पहले यह तय किया गया था कि आश्रम देखकर वहाँ से रुड़की और वहाँ से खतौली जाएँगे. दरअसल, भाई अमन कुमार त्यागी ने जब कहा था कि परिलेख सम्मान ग्रहण करने के लिए नजीबाबाद आना होगा तो मैंने गर्मी में इतनी लंबी यात्रा के डर से आनाकानी शुरू कर दी थी. इस पर उन्होंने मुझे ललचाने की कोशिश की. दो लालच दिए. एक - आपको इस बहाने हरिद्वार और गंगा स्नान का भी पुण्य मिल जाएगा. दो - शायद आपको नहीं पता कि नजीबाबाद के एकदम पास में कोटद्वार में कण्व ऋषि का आश्रम है जो दुष्यंत और शकुंतला की प्रणय कथा से जुड़ा है. यहाँ आएँगी तो वहाँ भी चलेंगे. 

अमन भाई ने अपना वादा निभाया. गंगा स्नान भी कराया और कण्व आश्रम भी दिखाया. साथ में थे अमन भाई,
तन्मय 
उनकी बहुत प्यारी बिटिया अक्षि, चपल और अत्यंत प्रिय बेटा तन्मय, मनमीत के संपादक अरविंद कुमार जी, दिल्ली से आए हुए पत्रकार उपेंद्र जी, गुरुकुल कांगड़ी ज्वालापुर के डॉ. सुशील कुमार त्यागी. डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा तो मेरे अभिभावक की तरह आए ही थे. इन सबके साथ मालिनी नदी के किनारे फैले कण्व आश्रम में जाना रोमांचकारी अनुभव रहा. दो ट्रकों को रोकने की शक्ति का प्रमाण दे चुके ‘पावर योगी’ जयंत जी (आधुनिक भीम) का दर्शन और भी रोमांचक रहा. उन्होंने स्वयं सारे क्षेत्र का संदर्शन कराया. 
अर्जुन के साथ 

नन्हे लंगूर अर्जुन को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी जो अक्षि और तन्मय को घुड़की देने के बाद चुपके से मेरी गोद में आ बैठा था और इशारे कर करके कभी सिर, कभी पीठ, कभी बगल को खुजवाता रहा था. 

हरिद्वार पहुँचकर गंगा स्नान का पुण्य भी प्राप्त किया. हरिद्वार पहुँची तो मन प्रफुल्लित हो उठा. वहाँ तक जाकर गंगा स्नान किए बिना वापस आना कैसे संभव हो सकता है! हर की पौड़ी पहुँचकर गंगा नदी को नमन किया और जलप्रवाह में धीरे धीरे प्रवेश किया तो शीतल गंगाजल के स्पर्श से तन और मन आनंद से भर उठे. मुझे ऐसा लगा कि मानो माँ का कोमल स्पर्श है. सच कहूँ तो पहले डुबकी लगाने में डर रही थी लेकिन जब यह देखा कि छोटे-छोटे बच्चे गंगा स्नान का आनंद उठा रहे हैं तो मन के भीतर से आवाज आई कि चलो आगे बढ़ो. बस एक सांस में तीन डुबकी लगा ही दी. गंगा की वह पुलक भरी तरंग सदा सदा के लिए स्मृतियों में बस गई है. 

रुड़की पहुँचने से पहले गुरुकुल कांगड़ी गए – डॉ. सुशील कुमार त्यागी जी के घर. वहाँ से रुड़की. डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी के भतीजे आशीष जी और पंकज जी ने गर्मजोशी से अगवानी की. उनके साथ ही श्रद्धेय डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण जी के घर जाना हुआ. अरुण जी और उनकी श्रीमती जी की जिंदादिली देखकर बड़ी प्रेरणा और ऊर्जा जैसी मिलती लगी. कभी कभी सोचती हूँ कि ये लोग बड़ी बड़ी उपलब्धियों और प्रकांड विद्वत्ता के बावजूद इतने सरल, निश्छल और बालसुलभ स्वभाव वाले कैसे रह लेते हैं! वहाँ से खतौली की ओर चल पड़े. गंगा जी तो साथ साथ चल रही थीं. एक जगह पर सर ने कहा, देखो, यहाँ गंग नहर और गंगा नदी ऊपर नीचे हैं! बहुत खूब! पल भर में ही गाड़ी क्रास हो चकी थी. 

आराध्या 
पूरी यात्रा के दौरान पूर्णिमा मै’म से लीची, चाट, कुल्फी आदि की बातें होती रहीं. खतौली पहुँचने से आशीष जी और पंकज जी ने पुरकाजी में एक जगह गाड़ी रोकी और गरमागरम चाट खिलाई. खतौली पहुँचकर घर के पास ही कुल्फी की दूकान पर मलाईदार कुल्फी का आनंद लिया. अरे हाँ, इससे पहले रुड़की में भी तो एक बड़ा गिलास लस्सी का भरपूर मजा लिया था. आशीष और पंकज का सेन्स ऑफ ह्यूमर तो कमाल का है. रास्ते भर मस्ती करते हुए चले. वाह, मजा आ गया! पूर्णिमा मैडम ने परिवार के सदस्यों से परिचय कराया. आशीष जी की बेटी आराध्या ने तो मेरा मन ही मोह लिया. तस्वीरें लेने की कोशिश की तो पहले मुँह इधर-उधर करती रही बिलकुल मेरी बेटी की तरह. पर थोड़ी ही देर में पोज देना शुरू कर दिए. यही स्नेह का नाता तो हमें जीवित रखता है! 

मैंने सोचा था कि रात का खाना स्किप कर दूँ. पर मुझसे नहीं हुआ. गरमागरम रोटियाँ (शायद मिस्सी रोटी), सब्जी, अचार. स्वादिष्ट भोजन. पेट भरके खाया और आराम से सो गई. 

पूरी यात्रा के दौरान मुझे एक पल के लिए भी यह अहसास नहीं हुआ कि मैं अपने घर छोड़कर कहीं अजनबियों के बीच गई हूँ. सब अपने ही थे. आत्मीय. 

14 जून 2014 

खतौली से दिल्ली की ओर प्रस्थान. सर और आशीष जी आए मुझे बस में बिठाने के लिए. साथ में नन्ही आराध्या भी थी. हाइवे पर बस रोककर, मुझे विधिवत बिठाकर, ड्राइवर को बताकर, तसल्ली करके ही आशीष जी बस से उतारे. बस तेजी से दिल्ली की ओर जा रही थी. उस वक्त मुझे ऐसा लगा कि अपनों से कटकर कहीं दूर जा रही हूँ.

दिल्ली में अगस्टिन आ गए. एपी भवन पहुँचने से पहले रास्ते में लाल किला घूमकर देखा. भोजनोपरांत पार्लियामेंट, इंडिया गेट आदि. फिर रात की गाड़ी से हैदराबाद की वापसी.



शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मैं ऋणी हूँ!

12 जून 2014 को नजीबाबाद में परिलेख हिंदी साधक सम्मान समारोह में उस समय मैं कृतज्ञता और आनंद से भर कर मन ही मन रो दी जब पता चला कि आदरणीय मैडम डॉ. पूर्णिमा शर्मा द्वारा लिखे गए मेरे इस परिचय को पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है. मैडम! मैं आजीवन आपकी ऋणी रहूँगी. 
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नत नयन, प्रिय कर्मरत मन नीरजा 
-    डॉ. पूर्णिमा शर्मा


डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
सहज समर्पण भाव और विनम्रता से हिंदी की मौन सेवा में लगी रहने वाली डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा भाषा और साहित्य से अपेक्षाविहीन प्रेम करती हैं. उन्हें आज तक किसी ने किसी तरह की शिकायत करते नहीं सुना. असुविधाएँ हैं, तो हुआ करें. वे बस अपने कर्म में किसी निष्काम कर्मयोगी की भाँति लगी रहती हैं. ‘नत नयन, प्रिय कर्मरत मन’ – तोड़ती पत्थर! कभी कोई धन्यवाद दे दे तो तरल मुस्कान से चेहरा खिल उठता है. लेकिन ज्यादातर धन्यवाद कोई देता नहीं – लोग काम निकलवाने में तो माहिर होते हैं लेकिन अपनी ओर से आगे बढ़कर सहयोग व सहायता देने वालों को धन्यवाद देना कतई जरूरी नहीं समझते. ऐसा नहीं है कि डॉ. नीरजा लोगों के इस ‘नाशुक्रे’ स्वभाव को नहीं जानतीं लेकिन इसे क्या कहिए कि तमाम तरह के ‘थैंकलेस’ काम करने के अपने स्वभाव को बदलना ही नहीं चाहतीं. तो ऐसी हैं हमारी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा. वे सदा हिंदी के नाम पर हर किसी का सहयोग करने को तत्पर रहती हैं और यही कारण है कि हैदराबाद के हिंदी जगत में – छात्रों, शोधार्थियों, अध्यापकों, पत्रकारों और साहित्यकारों के बीच – वे अच्छी खासी लोकप्रिय हैं. 


डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का जन्म 11 मार्च 1975 को चेन्नै में हुआ. उनकी माताजी का नाम श्रीमती कुसुमा और पिताजी का नाम श्री गुर्रमकोंडा श्रीकांत है. माताजी सुशिक्षित गृहिणी हैं और पिताजी तेलुगु के सम्मानित पत्रकार एवं साहित्यकार. बचपन से ही नीरजा ने माँ से आत्मगोपन और पिता से गंभीरता का संस्कार पाया. उसी काल में उनके मन में कला, साहित्य, संगीत और नृत्य के प्रति प्रेम के बीज रोपे गए. आरंभिक शिक्षा-दीक्षा उन्होंने तमिल और अंग्रेजी माध्यम से प्राप्त की. घर में मातृभाषा तेलुगु का व्यवहार सीखा तथा तीन वर्ष की आयु से ही हिंदी की भी विधिवत शिक्षा प्राप्त की. मैट्रिक के बाद उन्होंने चिकित्सा संबंधी क्षेत्र में जाने का सपना देखा और विज्ञान विषयों की विधिवत पढ़ाई की. इसी बीच उन्हें अपने पिता और परिवार सहित चेन्नै से हैदराबाद आना पड़ा. दरअसल उनके पिता चेन्नै से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘सोवियत भूमि’ के तेलुगु संस्करण के संपादक थे जो सोवियत संघ के विघटन के बाद बंद हो गई. श्रीकांत जी सपरिवार हैदराबाद आ गए और कई वर्ष तक आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता-अभिनेता श्री एन.टी. रामाराव के पी.आर.ओ. के रूप में कार्यरत रहे. एन.टी.आर. के निधन के बाद तेलुगु समाचार पत्रों ‘उदयम’ और ‘वार्ता’ में काम किया. कुछ वर्ष वे ‘वार्ता’ समूह द्वारा संचालित पत्रकारिता विद्यालय के प्राचार्य भी रहे. परिवार के इस साहित्य और राजनीति मिश्रित परिवेश को आत्मसात करते हुए डॉ. जी. नीरजा ने 1995 में माइक्रोबायोलॉजी, जेनेटिक्स और केमिस्ट्री विषय लेकर उस्मानिया विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.एससी. उत्तीर्ण की. इसके बाद मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी में पीजी डिप्लोमा भी कर डाला. जैसा कि होना था, इस पाठ्यक्रम के बाद वे एक वर्ष अपोलो अस्पताल में माइक्रोबायोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत रहीं. अर्थात चिकित्सा संबंधी क्षेत्र में जाने का सपना पूरा हो गया. लेकिन पारिवारिक संस्कार शायद इस सपने से अधिक प्रबल था. भाषा और साहित्य का प्रेम बार-बार जोर मारता था. और एक दिन संस्कार ने सपने को जीत लिया. नीरजा ने वह नौकरी छोड़ दी और हिंदी क्षेत्र में छलांग लगा दी. 



2000 ई. में गुर्रमकोंडा नीरजा ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च शिक्षा और शोध संस्थान से प्रथम श्रेणी में एमए हिंदी की उपाधि अर्जित की तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया. सौभाग्यवश उन्हें प्रो. दिलीप सिंह जैसे भाषावैज्ञानिक और प्रो. ऋषभ देव शर्मा जैसे साहित्य मर्मज्ञ अध्यापकों का अहेतुक स्नेह मिला तथा इन दोनों गुरुजन की प्रेरणा से उन्होंने अनुवाद समीक्षा और अनुवाद तुलना जैसे अछूते क्षेत्र में शोधकार्य का निर्णय लिया. 2001 में उन्होंने ‘कुरुक्षेत्र : अंग्रेजी अनुवाद की समीक्षा’ पर एमफिल की शोधोपाधि प्राप्त की तथा एक और स्वर्ण पदक अर्जित किया. आगे उन्होंने ‘श्रवणकुमार कृत उपन्यास ‘प्रेत’ : अंग्रेजी अनुवाद का संदर्भ’ विषय पर शोधप्रबंध प्रस्तुत करके 2006 में पीएचडी उपाधि प्राप्त की. अपने इन शोधकार्यों के आधार पर डॉ. जी. नीरजा को बहुभाषाविद अनुवाद समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई. इस अवधि में उन्होंने स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा और पत्रकारिता डिप्लोमा की परीक्षाएँ भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर डालीं.



एमए के बाद से ही गुर्रमकोंडा नीरजा ने कई विद्यालयों में हिंदी अध्यापन का कार्य आरंभ कर दिया था. पीएचडी के बाद 2007 में उन्हें उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद परिसर में प्राध्यापक के रूप में विधिवत नियुक्ति प्राप्त हो गई. और यहाँ से शुरू हुआ भाषा और साहित्य की सेवा का उनके जीवन का नया अध्याय. उन्होंने अपनी निष्ठा और श्रमशीलता के आधार पर अल्प अवधि में ही छात्रों के मन में अपनी जगह बना ली. उन्हें स्नातकोत्तर कक्षाओं में सामान्य भाषाविज्ञान, अनुवाद विज्ञान, व्यतिरेकी विश्लेषण, अन्य भाषा शिक्षण, प्रयोजनमूलक हिंदी और समाजभाषाविज्ञान जैसे विषयों की विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है. 



शोध निर्देशक के रूप में भी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की उपलब्धियाँ प्रशंसनीय रही हैं. उनके निर्देशन में संपन्न शोधकार्यों की सूची के अवलोकन से यह पता चलता है कि उनका ज्ञान क्षेत्र कितना व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण है. उनके द्वारा निर्देशित तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद समीक्षा संबंधी शोधकार्यों में तेलुगु-हिंदी कविताओं में विद्रोही चेतना, विश्वनाथ सत्यनारायण कृत ‘वेयिपडगलु’ का हिंदी अनुवाद ‘सहस्रफण’ : अनुवाद समीक्षा, एन. गोपि कृत तेलुगु काव्य ‘कालान्नि निद्रपोनिव्वनु’ का हिंदी अनुवाद : तुलनात्मक अध्ययन, माधवीकुट्टी कृत मलयालम उपन्यास ‘वंडीकालकल’ का हिंदी अनुवाद, मुदिकोंडा शिवप्रसाद के तेलुगु उपन्यास ‘रेज़िडेंसी’ का हिंदी अनुवाद : अनुवाद समीक्षा एवं अनुवाद मूल्यांकन जैसे शोधकार्य सम्मिलित हैं. इसी प्रकार भाषा संबंधी शोधकार्य के रूप में वाणिज्यिक हिंदी : समस्याएँ और संभावनाएँ (बैंकिंग हिंदी के विशेष संदर्भ में) का उल्लेख किया जा सकता है. मीडिया विमर्श जैसे नए क्षेत्र में शोध कराना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है. डॉ नीरजा ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अलका सरावगी के उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ में मीडिया विमर्श, हिंदी ब्लॉगिंग में महिला ब्लॉगरों का योगदान विषयों पर भी शोधकार्य कराए हैं. स्त्री विमर्श डॉ. नीरजा का विशेष रुचि क्षेत्र है जिसका प्रमाण उनके द्वारा निर्देशित महुआ माजी के उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला’ में स्त्री विमर्श, चंद्रकांता कृत ‘हाशिए की इबारतें’ में स्त्री विमर्श, नीलम कुलश्रेष्ठ के कहानी संग्रह ‘हैवेनली हेल’ में स्त्री विमर्श, सिम्मी हर्षिता के उपन्यास ‘जलतरंग’ में स्त्री विमर्श, विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ में स्त्री विमर्श, मनोज सिंह के उपन्यास ‘कशमकश’ में स्त्री विमर्श जैसे शोधप्रबंध बाकायदा देते हैं. इसी प्रकार दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श का क्षेत्र भी उन्होंने अछूता नहीं छोड़ा है. इस संदर्भ में उनके द्वारा निर्देशित के.एस. तूफ़ान का दलित विमर्श : ‘टूटते संवाद’ का विशेष संदर्भ, मधुकर सिंह के उपन्यास ‘बाजत अनहद ढोल’ में आदिवासी विमर्श, नई शती के कथा साहित्य में अल्पसंख्यक विमर्श (मुस्लिम समाज के विशेष संदर्भ में) शीर्षक शोधकार्यों का अवलोकन किया जा सकता है. उनके द्वारा निर्देशित अन्य शोधप्रबंधों में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन, पुनर्जागरण के संदर्भ में बालकृष्ण भट्ट कृत ‘निबंधों की दुनिया’ का अनुशीलन, अनंत काबरा के कविता संग्रह ‘पड़ाव पर ठहरे कदम’ में सामाजिक यथार्थ, विश्वनाथ अय्यर के ललित निबंधों में दक्षिण भारत की झलक, रामदरश मिश्र के उपन्यास ‘जल टूटता हुआ’ में आंचलिकता, हरिशंकर परसाई के निबंधों में व्यक्तित्व और वैचारिकता (‘निबंधों की दुनिया’ का विशेष संदर्भ), कमलेश्वर के कहानी संग्रह ‘देस-परदेस’ में चित्रित सामाजिक समस्याएँ, उषा प्रियंवदा के कहानी संग्रह ‘एक कोई दूसरा नहीं’ में वस्तु और शिल्प, क्षमा शर्मा के कहानी संग्रह ‘रास्ता छोड़ो डार्लिंग’ में मध्यवर्ग, श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दराबारी’ में राजनैतिक चेतना, अमरकांत के उपन्यास ‘सूखा पत्ता’ में आधुनिकताबोध, राजेंद्र अवस्थी की कहानियों में आधुनिकताबोध, रामदरश मिश्र की कहानियों में ग्राम चेतना शामिल हैं. 


'परिलेख हिंदी साधक सम्मान' समारोह (12/6/2014) के अवसर पर प्रकाशित  परिचय पुस्तिका का आवरण 


नीरजा को कविताएँ लिखने का शौक छात्र जीवन से रहा. यदाकदा छपती भी रहीं. लकिन जब 2008 में उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की द्विभाषी (हिंदी-तेलुगु) साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के संपादन का दायित्व मिला, तब से उनके लेखन में नियमितता आई. यही समय था जब उन्होंने गंभीरता से तेलुगु के पुराने-नए साहित्य का अध्ययन आरंभ किया और सहज सरल भाषा शैली में तेलुगु साहित्य तथा साहित्यकारों के संबंध में लिखना आरंभ किया. उनके तेलुगु भाषा-साहित्य विषयक लेखन को ‘स्रवंति’ के साथ साथ उनके ब्लॉग ‘सागरिका’ के माध्यम से पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हुई. उनके ऐसे लेखों का एक संग्रह ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ शीर्षक से 2012 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ जिसे सुधी पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला. शीर्षस्थ तेलुगु कवि प्रो. एन.गोपि ने इस कृति की प्रशंसा करते हुए लिखा कि “तेलुगु भारत में हिंदी के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. अतः तेलुगु में निहित साहित्यिक धरोहर से हिंदी जगत को परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है. डॉ. नीरजा केवल विदुषी भर नहीं अपितु समय समय पर अपने आप को अद्यतन रखने वाली आलोचक भी हैं. इसलिए वे स्वाभाविक रूप से इतिहास बोध से भी संपन्न हैं. खास तौर पर समकालीन तेलुगु साहित्य को वे जिस दृष्टि से देख रही हैं, वह निरंतर परिवर्तित होते साहित्य के अनुशीलन का परिचायक है.” इसी प्रकार प्रमुख हिंदी भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह ने भूमिका में कहा कि “गुर्रमकोंडा नीरजा ने तेलुगु साहित्य का परिचयात्मक आकलन अपनी इस पुस्तक में दिया है. लेखिका ने जटिलता भरे विस्तार की जगह उन मुद्दों को उभारने की कोशिश की है जिनसे तेलुगु साहित्य की सामाजिकता अथवा लौकिकता का उद्घाटन हो सके और इसके जरिए तेलुगु साहित्य में मनुष्य और मनुष्यता का जो भाव प्रारंभ से ही अंतर्भुक्त है, उभार पा सके. जी.नीरजा की यह पैनी दृष्टि ही पुस्तक की प्राण-रेखा है.” इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लिखा है कि “पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ में लेखिका डॉ. जी.नीरजा ने तेलुगु के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों का साहित्यिक परिचय देते हुए जहाँ एक ओर इस बात का खयाल रखा है कि सूचना और विवेचन दोनों का मणिकांचन संयोग हो सके, वहीं यह भी ध्यान रखा है कि इन निबंधों के माध्यम से हिंदीभाषी समाज आंध्र प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को भी हृदयंगम कर सके. विषयवस्तु की दृष्टि से यह निबंध संग्रह तेलुगु साहित्य के विविध कालों, विविध विधा प्रकारों, विविध प्रवृत्तियों और विविध साहित्यकारों को समेटे हुए है.” इतना ही नहीं, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. देवराज ने नीरजा की इस पुस्तक की विस्तृत समीक्षा करते हुए ‘संकल्य’ मासिक में लिखा है कि “गुर्रमकोंडा नीरजा की इस पुस्तक में अन्नमाचार्य, कृष्णदेव राय, त्यागराज, वीरेशलिंगम पंतुलु, कशीनाथुनि नागेश्वराराव पंतुलु, गुरजाडा वेंकट अप्पाराव, उन्नव लक्ष्मीनारायण, जनकवि श्री श्री, दिगंबर कवि ज्वालामुखी, त्रिपुरनेनि गोपीचंद, आरुद्रा, डी. कामेश्वरी आदि के साहित्यिक अवदान के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराई गई है. स्मरणीय है कि भारतीय नवजागरण का सांस्कृतिक और साहित्यिक परिदृश्य वीरेशलिंगम पंतुलु और गुरजाडा अप्पाराव जैसे कालजयी रचनाकारों के कृतित्व को जाने बिना नहीं समझा जा सकता. नीरजा की पुस्तक से पता चलता है कि वीरेशलिंगम पंतुलु आंध्र साहित्य के भारतेंदु हैं. उन्हें गद्य ब्रह्म और गद्य तिक्कना भी कहा जाता है. उन्होंने आंध्र में जाति-विरोध आंदोलन का सूत्रपात किया था. वे लिखती हैं, “तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर वीरेशलिंगम ने जनता को चिर निद्रा से जगाया, चेताया, स्त्री सशक्तीकरण को प्रोत्साहित किया, स्त्री शिक्षा पर बल दिया, बालविवाह का खंडन किया, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और ज़मींदारी प्रथा का विरोध किया. उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर दिखाई नहीं देता. उन्होंने 11 दिसंबर, 1881 को प्रथम विधवा पुनर्विवाह संपन्न करवाया जिसके कारण उनकी कीर्ति देश-विदेश में फ़ैल गई. वीरेशलिंगम पंतुलु ने अपने एक-सौ तीस ग्रंथों से तेलुगु साहित्य को समृद्ध किया, जिनमें राजशेखर चरित्रमु जैसा मौलिक उपन्यास तथा कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम का तेलुगु रूपांतर शामिल है.” प्रो. देवराज ने आगे लिखा है कि “वर्तमान में भारतीय भाषाओं के साहित्य और भारतीय साहित्य पर नए सिरे से विमर्श की शुरूआत हुई है. इस परिघटना में हिंदी समालोचना से सबसे अधिक सक्रियता की अपेक्षा है. जो समीक्षक हिंदी में हिंदी के इतर भाषाओं और उनके साहित्य पर केंद्रित कार्य करने में समर्थ हैं वे भारतीय साहित्य की परिकल्पना को यथार्थ बनाने में वास्तविक रचना-घटक की भूमिका निभा सकते हैं. इस अभियान में इतनी सावधानी भी ज़रूरी है कि उनके द्वारा प्रतुत सामग्री विश्लेषणपरक और प्रामाणिक हो. उसमें अंतिम निष्कर्ष देने की जल्दबाजी न हो. गुर्रमकोंडा नीरजा भारतीय साहित्य के इस अभियान से जुड़ने को संकल्पबद्ध हुई हैं, उन्हें मेरी शुभकामनाएँ; और उनसे यह अपेक्षा भी कि वे अपने अध्ययन में और अधिक गंभीरता, और अधिक गहराई लाने की कोशिश करेंगी.” 



नीरजा अध्यापक, संपादक, समीक्षक और कवयित्री तो हैं ही, बहुभाषाविद होने के नाते अच्छी अनुवादक भी हैं. उन्होंने हिंदी से तमिल और तेलुगु में तथा अंग्रेजी से हिंदी व हिंदी से अंग्रेजी में काफी साहित्यिक और साहित्येतर पाठों का अनुवाद किया है. तेलुगु के नागार्जुन माने जाने वाले प्रजाकवि पद्मविभूषण डॉ. कालोजी नारायणराव की जन्मशताब्दी पर विशेष रूप से प्रकाशित 100 कविताओं के हिंदी अनुवाद कार्य से वे अनुवादक मंडल के एक सदस्य के रूप में तो संबद्ध रहीं ही, अनुवाद-संपादन का कार्य भी अत्यंत मनोयोग और सफलता से निभाया जिसकी तेलुगु और हिंदी दोनों ही के साहित्यिक हलकों में भूरि भूरि प्रशंसा हुई है. 



परिचयकर्ता  डॉ. पूर्णिमा शर्मा और सम्मानित  डॉ. जी. नीरजा 
हिंदी भाषा और साहित्य की निष्काम सेवा में रत डॉ. नीरजा के काम पर विभिन्न साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थाओं का ध्यान जाना स्वाभाविक है. यही कारण है कि उन्हें कई सम्मानों-पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है जिनमें आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी का ‘युवा लेखक पुरस्कार (2012)’ तथा तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी का ‘साहित्य सेवी सम्मान (2014)’ उल्लेखनीय हैं. इतना ही नहीं, 2012 में जब हैदराबाद से भाषा, संस्कृति और विचारों की अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘भास्वर भारत’ आरंभ हुई तो उसके संपादक-प्रकाशक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने डॉ. नीरजा को मानद साहयक संपादक के रूप में उसमें शामिल करना आवश्यक समझा. 



कुलमिलाकर यह कहना उचित होगा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा हिंदी और तेलुगु के बीच साहित्यिक सेतुबंध के महान अनुष्ठान में अपना शक्तिभर योगदान करने में सदा निरभिमान हिंदी सेवी की तरह तत्पर रहती है.उनको ''परिलेख हिंदी साधक सम्मान -2014'' से सम्मानित किया जाना उचित ही है. मैं उनके उज्ज्वल भविष्य और समृद्ध जीवन के लिए शुभकामना करती हूँ. 



  डॉ. पूर्णिमा शर्मा, 



208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013, मो. 08125336300

सोमवार, 23 जून 2014

परिलेख हिंदी साधक सम्मान : स्वीकार वक्तव्य : गुर्रमकोंडा नीरजा

आदरणीय मंच, सभागार में उपस्थित साहित्य प्रेमियो, देवियो और सज्जनो, 

नमस्कार. 

सर्वप्रथम तो मैं परिलेख कला एवं संस्कृति समिति, नजीबाबाद तथा मातृ संस्था – लोक समन्वय समिति, नजीबाबाद के प्रति आभारी हूँ. विशेष रूप से भाई अमन कुमार त्यागी के प्रति आभारी हूँ. 

मैं इस सम्मान को अपनी संक्षिप्त सी हिंदी सेवा की हिंदी भाषा समाज द्वारा स्वीकृति के रूप में ग्रहण कर रही हूँ. आपके इस अकारण स्नेह से मैं गद्गद हूँ. 

मैं यह नहीं मानती कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत दो भिन्न भारत हैं. और यह भी नहीं मानती कि यह सम्मान उत्तर भारत द्वारा दक्षिण भारत का सम्मान है. मैं तो यही कहना चाहूँगी कि भाषाई और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के ये दोनों हिस्से एक हैं. एक भाषा क्षेत्र हैं. एक सांस्कृतिक क्षेत्र हैं. इसके भीतर भले ही अनेक रंग हों, अनेक shades हों - ये दोनों एक ही हैं. इसलिए मैं यह समझती हूँ कि परिलेख सम्मान हिंदी भाषा समाज द्वारा हिंदी के विनम्र सेवकों का सम्मान है. परस्पर स्नेह की अभिव्यक्ति है. 

आपका यह स्नेह, मेरे लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है. यह क्षण मेरे लिए बहुत ही अनमोल है क्योंकि यह सम्मान मैं अपने गुरुवर प्रो. ऋषभ देव शर्मा जो आज यहाँ सपत्नीक उपस्थित है – के समक्ष ग्रहण कर रही हूँ. साथ ही अभी फोन पर इस संस्था के प्रणेता प्रो. देवराज जी ने वर्धा से आशीर्वाद दिया है. वे मेरे दादा गुरु हैं. इन लोगों के गुरु स्थानीय श्रद्धेय डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी तो प्रत्यक्ष रूप से यहाँ उपस्थित हैं ही. इनका बड़ा स्नेह मुझे मिला है. मैं इस सम्मान को इन सबका आशीर्वाद और प्रसाद समझ कर शिरोधार्य रही हूँ क्योंकि जैसा कि हमारे यहाँ तेलुगु में कहते हैं - ‘वेदांतमेदैना सद्गुरुनि पादुमुलु चेंतने, ये विद्यकैना गुरुवु लेकुन्ना आ विद्या पट्टुवडदु’ (अर्थात कोई भी विद्या हो, चाहे वेद हो या वेदांत, सद्गुरु के चरणों में रहकर ही प्राप्त की जा सकती है). और सारे भारत में सभी भाषाओं में यही मान्यता है कि गुरु रूपी पारस के स्पर्श से लोहा भी स्वर्ण बन जाता है. मैं अभी स्वर्ण नहीं बन सकी हूँ पर आपने यह सम्मान देकर मेरे भीतर राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति गहरी जिम्मेदारी का बोध अवश्य जगा दिया है. 

मैं इस अवसर पर नजीबाबाद के सभी साहित्य प्रेमियों को प्रणाम करती हूँ. मुझे इस बात का अहसास है कि नजीबाबाद शहर में हिंदीतर भाषी जन समुदाय को प्रेरित करने के लिए देशभर के अनेक लेखकों और कवियों का, हिंदी सेवियों का सम्मान करने की परंपरा रही है. कहना न होगा कि राष्ट्रभाषा के प्रति इस तरह के निःस्वार्थ प्रेम की मिसालें बहुत ज्यादा नहीं हैं. इसीलिए इस सम्मान और आयोजन के लिए नजीबाबाद का यह सांस्कृतिक शहर अभिनंदनीय है. मैं इस शहर की धरती की वंदना करती हूँ और इस सम्मान और स्मृति चिह्न के साथ यहाँ की मिट्टी को भी अपने साथ लेकर जाऊँगी.

मेरी मातृभाषा तेलुगु है. हिंदी तो हमारी राष्ट्रभाषा है ही. इसीलिए इस अवसर पर मैं यह जरूर कहना चाहूँगी कि हिंदी और तेलुगु दोनों के माध्यम से लोक और साहित्य में एक जैसी भारतीयता की अभिव्यक्ति मिलती है. मेरी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का पोषण हिंदी और तेलुगु रूपी दो माताओं के साहित्य की दुग्धधारा से हुआ है. मैं इन दोनों भाषाओं को नमन करती हूँ. 

मैं आप से एक बात बाँटना चाहती हूँ. पिछले दिनों प्रो. देवराज जी के निर्देश पर तेलुगु से हिंदी में अनूदित साहित्य पर कुछ काम किया तो मेरे सामने ऐसी बहुत सारी जानकारियाँ आईं जो हिंदी भाषा समाज को नई लग सकती हैं. पर साथ ही हिंदी और तेलुगु बोलने वालों को एक दूसरे के नजदीक लाने वाली सिद्ध हो सकती हैं. जैसे - 

  • तेलुगु साहित्य की एक विशिष्ट विधा है – अवधान. इसमें एक व्यक्ति से कम से कम 8 से लेकर 1000 तक पृच्छक प्रश्न पूछते हैं और वह व्यक्ति प्रश्नों का उसी क्रम से काव्यमय उत्तर देता है. 100 पृच्छक हों तो – शतावधानम और 1000 हों तो – सहस्रावधानम कहा जाता है. 
  • हमारे समाजों में कुछ मिलते-जुलते संस्कार हैं. जन्म से जुड़े संस्कार को ही लें. तेलुगु समाज में जन्म के समय बच्चे के मामा को कुछ रस्में निभानी पड़ती हैं. जैसे नाल काटना. बच्चे की नाल मामा काटता है हमारे यहाँ. उसके बाद लहसुन डालकर उबाले गए तेल में बच्चे का चेहरा देखने का रिवाज है. 
  • तेलुगु समाज में आज भी विद्यारंभ संस्कार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. इसके लिए शुभ मुहूर्त निकला जाता है. शास्त्रोक्त विधि से मुंडन कराया जाता है. तब पंडितजी बच्चे की उंगली पकड़कर कच्चे चावलों पर ‘ॐ’ लिखवाते हैं. इसके बाद पंडितजी को धोती का एक जोड़ा और तांबूल में रखकर दक्षिणा दी जाती है. 
  • दक्षिणा में 116 (एक सौ सोलह रुपए) या फिर 1116 (एक हजार एक सौ सोलह रुपए) देना का रिवाज है. इसे शुभ माना जाता है. 
  • यज्ञोपवीत या उपनयन का संस्कार भी धूमधाम से मनाया जाता है. इसे विवाह की पहली सीढ़ी माना जाता है. 
  • तेलुगु समाज में विवाह से संबंधित संस्कार अत्यंत व्यापक है. हिंदी समाज में सिंदूर और सात फेरे को जो महत्व प्राप्त है, तेलुगु समाज में मंगलसूत्र उसी महत्व का अधिकारी है. हल्दी में भिगोए हुए मोटे धागे (ताली) में दो गोल-गोल ढक्कनों की तरह मंगलसूत्र पिरोया जाता है. इस धागे को विवाह के अवसर पर मंत्रोच्चार के साथ वर द्वारा वधू के गले में पहनाया जाता है.
  • शादी के समय सफ़ेद सूत की साड़ी को हल्दी में डुबोकर पूजा के बाद वधू को पहनाया जाता है. इसे ‘मधुपर्कालु’ (शादी का जोड़ा) कहा जाता है. 
  • विवाह के अवसर पर लड़की को मायके की ओर से जो उपहार (स्त्रीधन) दिया जाता है, उसे तेलुगु समाज में ‘हल्दी-कुमकुम’ कहते हैं. 
  • विभिन्न शुभ अवसरों पर ताड़, नारियल और केले के पत्तों का प्रयोग किया जाता है. विवाह के अवसर पर ताड़ या नारियल के पत्तों से शामियाना लगाया जाता है और केले के गोदों को आँगन में मुख्य द्वार पर बाँधा जाता है. तोरण आम के पत्तों का बनाया जाता है. 
  • शुभ अवसरों पर आगंतुकों का स्वागत गीले चंदन द्वारा किया जाता है. 
  • शादी के अवसर पर तो अनेक तरह की रस्म होती हैं. दूल्हा और दुल्हन को एक दूसरे की जूठन खानी होती है. दूध के भरे बर्तन में से अँगूठी खोजने पड़ती है. फूलों की छड़ी से मारने का भी रिवाज है.
अंत में मैं यह भी कहना चाहती हूँ की हिंदी और तेलुगु भाषाओं में भी अनेक समानताएँ हैं. आपको यह जानकर रोचक लगेगा कि इन दोनों भाषओं की वर्णमाला का क्रम एक जैसा ही है. तेलुगु में कुछ अतिरिक्त वर्ण भी हैं जैसे ह्रस्व ए, ह्रस्व ओ, मूर्धन्य ल आदि. दोनों भाषाओ में अनेक शब्द संस्कृत स्रोत से आए हैं. जैसे – भक्ति, लग्नमु (लग्न), गौरवमु (गौरव) आदि. आज जरूरत इस बात की है कि हिंदी को सही अर्थों में सार्वदेशिक भाषा बनाने के लिए इसमें विभिन्न दक्षिण भारतीय और पूर्वोत्तर भारतीय भाषाओं के शब्दों का भी समावेश किया जाए.

ये बातें कहने से मेरा अभिप्राय इतना भर है कि भारत के लोग भले ही अलग अलग प्रांतों में रहते हों और अलग अलग भाषाएँ बोलते हों, उनकी सामाजिक संस्कृति और लोक संपदा एक जैसी है. हम सब इस साझी विरासत के भागीदार हैं और हिंदी इस विरासत के अलग अलग दिखने वाले हिस्सों को जोड़ने वाली भाषा है. इस भाषा ने जो आज मुझे सम्मान दिलाया है उसके लिए कृतज्ञता प्रकट करते हुए मैं आप सबको प्रणाम करती हूँ और हैदराबाद आने के लिए आमंत्रित करती हूँ ताकि आप देख सकें कि वहाँ राष्ट्रभाषा का कैसा वातावरण है. 

नमस्कार.