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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

चाणक्य वार्ता सम्मान - 2018

'चाणक्य वार्ता' का तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश विशेषांक का लोकार्पण 
28 अक्टूबर, 2018 को हैदराबाद गच्चिबावली में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एंड हॉस्पिटालिटी मैनेजमेंट में अपराह्न 3.30 बजे आयोजित 'चाणक्य वार्ता' के 'तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश विशेषांक' का विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का निमंत्रण देते हुए पत्रिका के संपादक डॉ.अमित जैन ने फोन किया था तो मैंने उनसे कहा कि मैं कार्यक्रम में जरूर आऊँगी क्योंकि नई दिल्ली से हैदराबाद आकर तेलंगाना और आंध्र से संबंधित विशेषांक का विमोचन करना हम हैदराबादवासियों के लिए गौरव की बात है। उस कार्यक्रम में उपस्थित रहना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने यह भी सूचना दी कि विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए संस्थाओं और व्यक्तियों का सम्मान भी किया जाएगा। बातों-बातों में उन्होंने मुझसे कहा कि तेलुगु साहित्य लेखन और हिंदी अध्यापन के लिए 'आचार्य चाणक्य सम्मान - 2018' के लिए चार-पाँच व्यक्तियों ने मेरा नाम नामित किया है और इस सम्मान के लिए मेरा नाम चयनित किया गया है तो मैं निःशब्द हो गई।

डॉ. अमित जैन,
संपादक 'चाणक्य वार्ता' 
कार्यक्रम भव्य था। जब मैं समारोह स्थल पर पहुँची तो एक क्षण के लिए मुझे लगा कि कहीं मैं गलत स्थान पर तो नहीं पहुँच गई। लेकिन जब अंदर पहुँचकर बैनर देखा तो निश्चिंत हुई। इतने में डॉ. अमित जैन जी से मुलाकात हो गई। पहली बार मिले लेकिन उनकी आत्मीयता के कारण ऐसा नहीं लगा कि हम अपरिचित थे। 

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के आते ही कार्यक्रम शुरू हुआ। लक्ष्मीनारायण भाला की अध्यक्षता में संपन्न इस कार्यक्रम में स्वामी परिपूर्णानंद, डॉ. कृष्ण चंद्र चौराड़िया, डॉ. अमित जैन, डॉ. नरेंद्र, धनराज भांभी व अन्य उपस्थित रहें। 'चाणक्य वार्ता' के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश विशेषांक का लोकार्पण हुआ। सम्मान कार्यक्रम शुरू हुआ। विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान हेतु चार संस्थाओं को, हिंदी और तेलुगु साहित्य के विभिन्न विद्वानों को तथा मीडियाकर्मियों को लगभग 25 लोगों को सम्मानित किया गया। 

दक्षिण में हिंदी प्रचार-प्रसार करके घर-घर में हिंदी की मशाल जलाकर असंख्य विद्यार्थियों को हिंदी सीखने का अवसर प्रदान करने हेतु दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद को 'आचार्य चाणक्य सम्मान - 2018' से सम्मानित किया गया। सभा के प्रतिनिधि के रूप में सचिव सी. एस. होसगौडर ने यह सम्मान स्वीकार किया।

अश्विनी कुमार चौबे के हाथों 
'आचार्या चाणक्य सम्मान - 2018' स्वीकार करते हुए 
प्रो. ऋषभ देव शर्मा 

श्रद्धेय गुरुवर प्रो. ऋषभ देव शर्मा को हिंदी साहित्य लेखन, शोध एवं हिंदी प्रचार हेतु सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र, लघुकथाकार पवित्रा अग्रवाल, चित्रकार नरेंद्र राय और हास्य-व्यंग्य कवि वेणुगोपाल भट्टड के साथ मुझे भी सम्मानित किया गया।
अश्विनी कुमार चौबे के हाथों सम्मान स्वीकार करते हुए 

गुरुवार, 15 मार्च 2018

अनुवाद चिंतन पर एक परिपूर्ण दृष्टि


शर्मा, गोपाल (2017)/ अनुवाद : परंपरा और प्रयोग
नई दिल्ली : तक्षशिला
पृष्ठ : 423/ मूल्य : 900 


अनुवाद विज्ञान भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयोग क्षेत्र है। इसकी संकल्पना अत्यंत व्यापक है। अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन जैसे क्षेत्रों का विस्तार हो रहा है। अनुवाद विज्ञान को पाठ विश्लेषण तथा संकेत विज्ञान से जोड़कर भी देखा जाता है। पहले से ही अंग्रेजी में अनुवाद विज्ञान से संबंधित अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। हिंदी में भी अनुवाद की सिद्धांत और व्यवहार से संबंधित अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं क्योंकि स्नातक और सनातकोत्तर स्तर पर अनेक विश्वविद्यालयों में अनुवाद को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है। इन पुस्तकों में ज्यादातर अनुवाद की परिभाषा, स्वरूप, प्रक्रिया, क्षेत्र, प्रकार आदि से संबंधित सामग्री एवं तथ्यों में दुहराव दिखाई देता है। शोध ग्रंथों में भी प्रायः यही स्थिति है। लेकिन हाल ही में मुझे प्रो. गोपाल शर्मा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ (2017, नई दिल्ली : तक्षशिला) देखने और पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ तो ऐसा प्रतीत हुआ कि यही वह पुस्तक है जिसकी अनुवाद विज्ञान के अध्येताओं और हिंदी पाठकों को भी लंबे अरसे से तलाश थी। 

प्रो. गोपाल शर्मा इथियोपिया के अरबा मिंच विश्वविद्यालय में अंग्रेजी और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर हैं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में समान गति से आप शिक्षण, लेखन तथा अनुवाद कार्य करते हैं। आपकी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हैं – देरिदा : विखंडन की शब्दावली, समकालीन मीडिया लेखन, राजभाषा हिंदी : विचार और विश्लेषण, संप्रेषणपरक हिंदी भाषा शिक्षण, केंद्रीय हिंदी व्याकरण, अँधेरे में : देरिदा दृष्टि से एक जगत समीक्षा, एन आउटलाइन ऑफ जनरल लिंग्विस्टिक्स, एन इंटरोडक्शन टू लिटरेरी क्रिटिसिज़्म एंड थ्योरी, प्रेमचंद इन ट्रांस्लेशन, इंग्लिश इन इथोपिया : ईशूज एंड परस्पेक्टिव्ज, नेलसन मंडेला : दि अफ्रीकन गांधी, यूथ आइकन : नरेंद्र मोदी आदि। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से आपने प्रसिद्ध समाजभाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह के सफल निर्देशन में ‘सैद्धांतिक-अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान और हिंदी भाषा : प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का लेखन संदर्भ’ पर शोधकार्य किया है। सभा की मासिक पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ में वैनतेय शास्त्री के नाम से व्यंग्य लेखन भी किया है। 

‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ प्रो. गोपाल शर्मा की शोध दृष्टि और गहन चिंतन का सुपरिणाम है। अनुवाद अध्ययन और अध्यापन तथा शोध के लिए यह उपयोगी एवं महत्वपूर्ण पुस्तक है क्योंकि पहली बार अनुवाद अध्ययन का सर्वांगीण ढाँचा तथा अनुवाद परंपरा का भारतीय एवं पाश्चात्य परिदृश्य इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों के समक्ष उपस्थित हुआ है। इस पुस्तक के ब्लर्ब पर यह उल्लेख किया गया है कि ‘यह पुस्तक अनुवाद अध्ययन की पाश्चात्य व भारतीय परंपराओं, सिद्धांतों और अनुवादवेत्ताओं के लेखन का अद्यतन और विस्तृत विवेचन करते हुए उसके अधुनातन प्रयोगात्मक पक्ष को विशेषतापूर्वक प्रस्तुत करती है।‘ एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी., डिप्लोमा के छात्रों एवं शोधार्थियों के साथ-साथ प्राध्यापकों एवं शोध निर्देशकों को भी इस पुस्तक को आदि से अंत तक अक्षरशः पढ़ना चाहिए। 

‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ शीर्षक इस 423 पृष्ठों के महाकाय ग्रंथ में लेखक ने 14 शीर्षकों के अंतर्गत अनुवाद के वैश्विक परिदृश्य को समेटा है - (1) अनुवाद : महत्व, उद्देश्य, स्वरूप तथा क्षेत्र विस्तार, (2) अनुवाद : बहुस्तरीय व बहुआयामी परिभाषाएँ, (3) सफल अनुवादक की पहचान, (4) अनुवाद और भाषाविज्ञान, (5) अनुवाद की भारतीय परंपराएँ, (6) पाश्चात्य अनुवाद परंपरा, (7) प्रमुख अनुवाद चिंतक : भारतीय व पाश्चात्य, (8) समतुल्यता का सिद्धांत और अनुवाद, (9) उत्तर आधुनिकता और अनुवाद, (10) उत्तर उपनिवेशवाद और अनुवाद, (11) विखंडन और देरिदा की अनुवाद दृष्टि, (12) चित्रपट अनुवाद के विविध पक्ष, (13) मशीनी अनुवाद : उपलब्धियाँ, समस्याएँ और संभावनाएँ तथा (14) अनुवाद की नई सैद्धांतिकी। अंत में अनुवाद विज्ञान से संबंधित हिंदी और अंग्रेजी पुस्तकों की प्रामाणिक सूची भी सम्मिलित है जिसकी उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता। 

अनुवाद के महत्व को सिद्ध करते हुए गोपाल शर्मा कहते हैं कि ईसापूर्व भारतीय जीवन का पश्चिम से जो संबंध रहा वह केवल व्यापार का न होकर सांस्कृतिक आदान-प्रदान का था जिसमें अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। (पृ.13)। लेखक की मान्यता है कि भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना में अनुवाद सहायक था। अनुवाद केवल भाषा का अंतरण नहीं बल्कि सांस्कृतिक अंतरण है। इससे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक प्रगति भी जुड़ी हुई है। लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि “दाराशिकोह के उपनिषदों के अनुवाद से लेकर आज तक की परंपरा के महत्व को समझते हुए यह कहने में गर्व होना चाहिए कि इस क्षेत्र में भारतीय योगदान नगण्य नहीं, अपितु अग्रगण्य है।“ (पृ.14)। 

अनुवाद विज्ञान के छात्र, शोधार्थी एवं शोध निर्देशक प्रायः कैटफोर्ड, नाइडा और पीटर न्यूमार्क तथा रवींद्रनाथ श्रीवात्सव, सुरेश कुमार, कैलाश चंद्र भाटिया, भोलानाथ तिवारी के ही इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। इन विद्वानों के द्वारा प्रतिपादित परिभाषाओं को तोते की तरह रटते हैं और काम चला लेते हैं। इन परिभाषाओं से न आगे जाते हैं और न ही जाने की कोशिश करते हैं। प्रो. गोपाल शर्मा ने अपनी गहन अध्ययन दृष्टि का परिचय देते हुए अनुवाद की बहुस्तरीय एवं बहुआयामी परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। चीनी भाषाविद लोंग जिंग (Long Jixing) के हवाले से वे यह स्पष्ट करते हैं कि परिभाषाओं को केवल कालक्रमानुसार न देखकर बहुस्तरीय स्वरूप के आधार पर देखना उचित होगा। भाषावैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अनुवाद की अनेक परिभाषाएँ विस्तृत विवेचन के साथ इस पुस्तक में सम्मिलित हैं। यह अनेकविद संकल्पना इसलिए भी आवश्यक प्रतीत होती है कि वर्तमान युग की कोई भी गतिविधि अनुवाद के बिना नहीं चलती। “अनुवाद की कोई भी थ्योरी कभी पूर्ण नहीं होती और न ही पूर्णरूपेण व्यर्थ।“ (पृ.283)। गोपाल शर्मा अनुवाद को ‘पौधारोपण’ (transplantation) मानते हैं (पृ.283) और कहते हैं कि जिस तरह धरती पर पौधा जमाने के लिए काट-छाँट और कतर-ब्योंत की आवश्यकता होती है उसी तरह अनुवाद को जमाने के लिए भी करना होगा। 

उत्तर आधुनिकता, उत्तर उपनिवेशवाद तथा विखंडन के बारे में आजकल बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर संकल्पना अभी भी स्पष्ट नहीं हो सकी। देखा जाए तो संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद, फेमेनिज़्म आदि अनुवादों के माध्यम से ही सामने आए। इस संबंध में लेखक का कहना है कि “यदि सस्यूर और देरिदा को फ्रेंच से अंग्रेजी में अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत न किया जाता तो न संरचनावाद होता और न उत्तर संरचनावाद। न फ्रेंच फेमिनिज़्म से परिचय हो पाता, न जेंडर अध्ययन की नींव रखी जाती।“ (पृ.6)। ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ में पहली बार उत्तर आधुनिकता तथा उत्तर उपनिवेशवाद से अनुवाद के संबंध को रेखांकित किया गया है। आज के परिप्रेक्ष्य में हिंदी ‘बाजार-दोस्त’ और ‘कंप्यूटर-दोस्त’ भाषा (शर्मा, ऋषभदेव [2015], हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, नई दिल्ली : तक्षशिला, पृ. 183) बन चुकी है। ऐसी स्थिति में अनुवाद भी अब भाषाओं की सीमाओं से परे जाकर ‘मीडिया-अध्ययन’ और ‘मास कम्युनिकेशन’ तक पहुँच चुका है। (पृ.278)। लेखक ने यह स्मरण कराया है कि उनके बचपन में ‘रूसी से हिंदी में अनुवादित अनेक कृतियाँ नाम मात्र के मूल्य पर मिल जाया करती थीं।‘ (पृ.278)। मेरे पास आज भी रूसी से अंग्रेजी में और तेलुगु में अनूदित साहित्यिक कृतियाँ हैं जो रादुगा और प्रोग्रेस पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित हैं। उनमें से कुछ किताबों पर मात्र पाँच रुपए अंकित हैं और कुछ किताबों में तो मूल्य अंकित ही नहीं। 26 दिसंबर, 1991 से सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी साहित्य की वैसी उपलब्धता भी समाप्त हो गई है। आज अंग्रेजी का वर्चस्व है। अंग्रेजीतर भाषाओं के लेखक प्रायः यह समझते हैं कि यदि उनके साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद होता है तो उनका दर्जा भी बढ़ जाता है। जबकि प्रो. गोपाला शर्मा ने इसे एक उत्तर उपनिवेशी लक्षण माना है। 

उत्तर उपनिवेश काल में अनुवाद का महत्व बढ़ गया है। यदि उपनिवेशवादी ताकतों ने यह कहा कि ‘भारतीय भाषाओं में कुछ भी पठनीय व श्रेष्ठ नहीं है तो भारतीयों ने भी अपनी श्रेष्ठता का दावा करने के लिए अनुवाद को माध्यम बनाया।‘ (पृ.288)। अनुवाद कभी भी ‘वन वे ट्राफिक’ न होकर आदान-प्रदान होता है। (पृ.289)। भारत में 19वीं शती के प्रारंभ में जो ‘अनुवाद कार्य हुआ वह एक प्रकार से उपनिवेशी सोच का विस्तार है।‘ (पृ.290)। उल्लेखनीय है कि अनुवादकों को मार्ग सुझाने के साथ-साथ अनुवाद के क्षेत्र में निहित समस्याओं एवं सीमाओं का उल्लेख करते हुए विनय धारवाडकर ने अपने निबंध ‘ट्रांस्लेटिंग द मिलेनियम : इंडियन लिटरेचर इन ए ग्लोबल मार्केट’ में अनुवाद के लिए दस सूत्र निर्धारित किए हैं जिन पर इस पुस्तक में विचारोत्तेजक विमर्श सम्मिलित है। (पृ.297-298)। 

बाजार की ताकतों के सामने सब को झुकना ही पड़ रहा है। अनुवाद भी बाजार की ताकतों द्वारा संचालित है। प्रायः हम लोग यह पढ़ते आ रहे हैं कि अनुवादक वंचक होते हैं और अनुवाद दोयम दर्जे का कार्य। अनुवाद की लक्ष्य भाषा के अनुवादक की मातृभाषा से भिन्न होने पर यह खतरा और भी बढ़ जाता है। लेकिन प्रो. शर्मा याद दिलाते हैं कि देरिदा की दृष्टि से कोई भी अनुवाद दोयम नहीं होता। (पृ.311)। उनके अनुसार अनुवादक पाठक है और पाठक के साथ-साथ वह लेखक भी है और “यदि अनुवाद एक प्रकार का पठन कर्म है और या निर्वचन का प्रकार है तो वह दिए अर्थ का प्रतिस्थापन है।“ (पृ.312)। क्योंकि वे यह मानते हैं कि मूल अर्थ को खंडित करने के बावजूद एक नई टैक्स्ट या टैक्स्टों के नेटवर्क का निर्माण किया जा सकता है। (पृ.313)। ‘अनुवाद : परंपरा और प्रयोग’ में मशीनी अनुवाद, सबटाइटलिंग, फिल्मों के संवाद की प्रकृति, डबिंग, अनुवाद और जेंडर आदि अनेकानेक विषयों पर काफी विस्तार से चर्चा निहित है। 

पाठकों के लिए गोपाल शर्मा द्वारा रेखांकित कुछ तथ्यों को सूत्र रूप में यहाँ दिया जा रहा है – 

Ø अनुवाद के माध्यम से हीनता ग्रंथ की जड़ मिट सकती है। (पृ.14)। 

Ø अनुवाद तो एक ‘पाठ’ या ‘संवाद’ होता है, उसे जीवन देना, या संजीवनी देना अनुवाद का दायित्व है। (पृ.204)। 

Ø उत्तर उपनिवेशी काल में अनुवाद का महत्व यह कहकर अभिव्यक्त किया जाता है कि उपनिवेशवाद और अनुवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इनमें अटूट संबंध है। (पृ.288)। 

Ø उपनिवेशी सिद्धांती अनुवाद को एक ऐसा माध्यम मानते हैं जिनमें उपनिवेश को अनुवाद का रूपक मानकर देखना प्रश्नांकित किया जाता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवादक मूल-कृतिकार का जरखरीद गुलाम नहीं वह भी एक सर्जक है। वह ऐसा सर्जक है जो मूलकृति को अन्य भाषा में ढालकर एक नई आकृति देता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवाद किसी कृति के साथ किया जाने वाला आत्मीय संवाद या संलाप है, प्रतिक्रिया है जिसमें अनुवादक स्वयंभू, स्वतंत्र, निर्भीक एवं सहृदय पाठक होता है। (पृ.289)। 

Ø अनुवाद पर प्रतिबंध की कोई चेष्टा अलाभप्रद होगी। बेहतर होगा की कोई मध्यम मार्ग हो, समस्त परिक्षेत्र का आकलन व मूल्यांकन हो और जिसे भाभा ‘in-between space’ कहते हैं तथा जिसमें अनुवाद के साथ संस्कृति का जुड़ाव भी होता है वह रहे। (पृ.289)। 

Ø हर कृति का अनुवाद मूलकृति को परिष्कृत, परिमार्जित व परिवर्धित ही नहीं करता, वह नए अर्थ का निर्धारण भी करता है। (पृ.291)। 

Ø सांस्कृतिक और भाषाई विभाजन अनुवाद के मार्ग में बाधा है। (पृ.294)। 

Ø कंप्यूटर के पास स्मृति तो होती है, किंतु मानवीय मस्तिष्क की विचार प्रक्रिया को वह नहीं पा सकता। अतः अनुवाद में निहित सर्जनात्मकता अपना पुनःसर्जन की प्रक्रिया में कोई मशीन मानवीय मस्तिष्क का स्थान नहीं ले सकती। केवल सीधी-सादी सूचनाओं अथवा आँकड़ों का भाषांतरण तो यह असीम क्षमता से कर सकती है। (पृ.391)। 

Ø एक गंभीर (मूल) स्रोत टैक्स्ट सदैव पवित्र नहीं होती, और जब कोई टैक्स्ट किन्हीं पाठकों के लिए लिखी जाती है तो उन पाठकों को उससे भटकना नहीं चाहिए। (पृ.414)। 

अंत में इस ग्रंथ की उपादेयता के संदर्भ में यह तथ्य एक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसमें विद्वान लेखक ने देश विदेश के जिन अनेक अनुवादशास्त्रियों के सिद्धांतों और मत-मतांतरों पर विमर्श प्रस्तुत किया है उनमें रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, भोलानाथ तिवारी, सतीश कुमार रोहरा, कैलाश चंद्र भाटिया, एन.ई. विश्वनाथ अय्यर, सत्यव्रत, गार्गी गुप्त, श्रीपाद रघुनाथ जोशी, दिलीप सिंह, नगेंद्र, अज्ञेय, कृष्ण कुमार गोस्वामी, कैटफोर्ड, नाइडा, पीटर न्यूमार्क, एंड्रे लेफेवरे, पेट्रस डेनियलस हूटिअस, सुज़ेन बेसनेट, एल्स वियरा, गेंटजलेर, वॉल्टर बेंजामिन, देरिडा, शैरी साइमन, एमिली एप्टर, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक्, होमी भाभा जैसे अनेक महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। साथ ही न्यायसूत्र, मीमांसा, पाणिनि, शब्द रत्नावली, शब्द कल्पद्रुम की परंपरागत प्राचीन परिभाषाएँ भी सम्मिलित हैं। निष्कर्षतः, अनुवाद चिंतन या अनुवाद अध्ययन को परिपूर्णता प्रदान करने की दृष्टि से यह विमर्श अत्यंत श्लाघनीय है।

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा (समर्पण)

तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा/ गुर्रमकोंडा नीरजा
ISBN : 978-93-84068-35-6
2016/ मूल्य : रु. 80/ पृष्ठ 231/ परिलेख  प्रकाशन, नजीबाबाद 
प्राप्ति स्थल : श्रीसाहिती प्रकाशन, 303 मेधा टॉवर्स 
राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर रिंग रोड, हैदराबाद - 500048 
मोबाइल : 09849986346


रविवार, 13 अगस्त 2017

समकालीन सरोकार और साहित्य (भूमिका)

समकालीन सरोकार और साहित्य 
संपादक : ऋषभ देव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा
अतुल्य पब्लिकेशंस, सी -5 /एफ - 2, ईस्ट ज्योति नगर, दिल्ली - 110 093
प्रथम संस्करण : 2017
मूल्य : रु 500
ISBN  : 978-93-82553-66-3  

दक्षिण भारत में किए जा रहे हिंदी भाषा और साहित्य विषयक शोध लेखन की एक छवि प्रस्तुत करने के लिए पिछले दो वर्षों में हमने दो पुस्तकें ‘संकल्पना’ (2015) तथा ‘अन्वेषी’ (2016) हिंदी पाठकों को समर्पित की हैं। ‘समकालीन सरोकार और साहित्य’ इस शृंखला की तीसरी कड़ी है। विशेष रूप से शोधार्थियों की माँग पर इसमें शोध विमर्श संबंधी व्यावहारिक जानकारियाँ शामिल की गई हैं। साथ ही इसका क्षेत्र अब दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। 

हिंदी साहित्य और भाषा विषयक अनुसंधान के क्षेत्र में शोध पत्र और शोधप्रबंध के लेखन में मानकता की दृष्टि से प्रायः बड़ी अराजकता देखने को मिलती है। इसका एक बड़ा कारण शोध लेखन के संबंध में स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय प्रारूपों के प्रति उपेक्षा भाव है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए शोध संबंधी मानक लेखन के लिए व्यापक रूप से स्वीकृत दो प्रारूपों की हिंदी के संदर्भ में प्रस्तुति इस पुस्तक को विशिष्ट बनाती है। ए.पी.ए. और एम.एल.ए. प्रणालियों की यह जानकारी हिंदी में पहली बार इस रूप में प्रस्तुत की जा रही है जो शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसके अलावा हिंदी में शोध की संभावनाओं एवं सकारात्मक मनोविज्ञान जैसी नई दिशाओं का उद्घाटन करने वाली सामग्री भी अत्यंत उपयोगी है। 

यह पुस्तक समसामयिक अद्यतन हिंदी शोध में लोकप्रियता प्राप्त कर रहे दलित एवं स्त्री आदि हाशिया विमर्शों के आलोक में कविता, उपन्यास और कहानी जैसी विधाओं का पुनर्पाठ तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही भाषा विमर्श और मीडिया विमर्श के नए आयामों को भी प्रस्तुत करती है। 

विश्वास है कि भाषा और साहित्य संबंधी अनुसंधानकर्ताओं और सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। 

पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण एवं प्रकाशन के लिए हम अतुल्य पब्लिकेशन्स के श्री अतुल माहेश्वरी और श्री आदित्य माहेश्वरी के प्रति विशेष रूप से आभारी हैं। इस पूरी योजना में सहयोग के लिए श्री वी. कृष्णाराव का हार्दिक धन्यवाद।

1 मई, 2017                                                                                                                       - ऋषभ देव शर्मा 

                                                                                                                                        गुर्रमकोंडा नीरजा 

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

श्रद्धांजलि...

जगदीश सुधाकर
21 नवंबर, 1946 - 6 जनवरी, 2017
जाना एक जनकवि का....

अभावों में जन्मे, 
अभावों में पले,
और हम मर गए, 
अभावों के तले. 
लकड़ियाँ भी थीं इतनी 
कि रह गए अधजले. 

इन हृदयविदारक पंक्तियों के रचनाकार जगदीश ‘सुधाकर’ अभी इसी माह अपनी इहलीला समेटकर परलोक गमन कर गए. अपनी अंतिम साँस तक अभावों से जूझते रहे सुधाकर जी को लगभग छह महीने पहले जून 2016 में ‘ब्रेन-अटैक’ आया था. उस समय तो वे उबर गए पर दूसरी कई रुग्णताओं ने उन्हें घेर लिया और अंततः 6 जनवरी, 2017 के सूर्योदय से पहले हास्य-व्यंग्यपूर्ण जनकविता के क्षेत्र का यह ‘सुधाकर’ अस्त हो गया. 

शब्द-क्रीड़ा और आशु कविता के महारथी इस जनकवि का जन्म 21 नवंबर, 1946 को कलूरकोट, जिला मियाँवाली (अब पाकिस्तान) में हुआ था. भारत विभाजन से उजड़ और उखड़ कर उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश के कस्बे खतौली में आए तो शिशु जगदीश माँ की गोद में थे. धर्म के घोर पाखंड और उन्माद से जन्मे द्वि-राष्ट्रवाद के घातक सिद्धांत को इसीलिए वे आजीवन कोसते रहे. अपनी किशोरावस्था में उन्होंने नए राष्ट्र के सपने को परवान चढ़ने से पहले ही ध्वस्त होते हुए देखा और उनके भीतर के कवि ने सहज ही चिर प्रतिपक्ष की स्थायी भूमिका अंगीकार कर ली. जैसा कि उनके अंतिम पलों में उनके साथ रहे उनके कविमित्र जसवीर सिंह राणा का मानना है, बिना लाग-लपेट के सामाजिक और राजनैतिक
अधूरी आजादी (काव्य संकलन)
जगदीश सुधाकर
2001
हिंदी लेखक मंच, मणिपुर 
जीवन के हर दोगलेपन पर हँस-हँसकर चोट करना उसी के लिए संभव है जिसका दिल इस सब पाखंड और भ्रष्टाचार को देखकर भीतर-भीतर ज़ार-ज़ार रोता हो. ऐसे ही थे जगदीश सुधाकर. 

जगदीश सुधाकर ने 1964-65 के दिनों में विधिवत लिखना शुरू किया – लिखना भी क्या, डायरी तो वे रखते नहीं थे, किसी भी मुड़े-तुड़े कागज़ पर लिखते थे और संदूकची में डाल देते थे. कहानी और नाटक भी उन्होंने लिखे. पर कभी उन्हें हाथ में कागज़ लेकर रचना बाँचते नहीं देखा गया. कवि सम्मेलनों के मंच पर दोनों हाथ चलाकर आँखें मटकाकर अपनी सद्यः रचित अलिखित कविताओं के द्वारा वे श्रोताओं को लोटपोट करते थे और कई बार वहाँ पधारे हुए तथाकथित बड़े लोगों के कोपभाजन भी बनते थे. पर सच कहने और खरी-खरी सुनाने से बाज़ नहीं आते थे. शायद यही कारण रहा हो कि वे किसी टीम में शामिल नहीं थे. उनके कविधर्म की प्रथम प्रतिज्ञा थी – जो मुझे गलत दिखेगा उसे गलत कहूँगा. उनका यह गुण बाबा नागार्जुन को बड़ा प्रिय था. बाबा प्रो. देवराज के यहाँ खतौली आए तो अपनी-अपनी तरह के इन दोनों अक्खड़ जनकवियों की संगत खूब जमी. प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं सुधाकर जी हाँक लगाते थे – ‘आदरणीय जी!’ और बाबा छौंक लगाते थे – ‘फादरणीय जी!’ वैसे भी बाबा को सुधाकर जी के हाथ की मछली काफी पसंद थी – डॉ. देवराज के कॉलेज चले जाने पर वे सुधाकर जी की रसोई में पहुँच जाते थे. पर अब बस कहानियाँ रह गईं! मैंने उनके अभिन्न मित्र डॉ. ऋषभदेव शर्मा से श्रद्धांजलि में कुछ कहने के लिए कहा तो उन्होंने कवि आलम की पंक्तियाँ दुहरा दी - 

“जा थल कीन्हें बिहार अनेकन, ता थल काँकरी बैठि चुन्यो करैं।
जा रसना सों करी बहु बातन, ता रसना सो चरित्र गुन्यो करैं॥
आलम जौन से कुंजन में करी केलि, तहाँ अब सीस धुन्यो करैं।
नैंनन में जो सदा रहते, तिनकी अब कान कहानी सुन्यो करैं॥“ 

इन्हीं शब्दों के साथ हम जनकवि जगदीश सुधाकर को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं और परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार को यह महाकष्ट सहन करने की शक्ति प्रदान करे. 

- गुर्रमकोंडा नीरजा, हैदराबाद 

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा

भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य,
समाज, संस्कृति और भाषा
(सं) डॉ. प्रदीप कुमार सिंह
2016, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन,
पृष्ठ 528, मूल्य : रु. 950
भूमंडलीकरण ने समूचे विश्व के समक्ष अनेक चुनौतियाँ खड़ी की हैं. वास्तव में इसका संबंध अर्थतंत्र से है. इस आर्थिक संबंध के कारण ही पूरा विश्व एक बाजार बन चुका है. बाजार पूरे विश्व को नियंत्रित कर रहा है. स्कॉटिश अर्थशास्त्री एडम स्मिथ (16 जून, 1723 – 17 जुलाई, 1790) ने अपनी पुस्तक ‘ऐन इन्क्वायरी इंटू द नेचर एंड कॉसस ऑफ द वेल्थ आफ नेशंस’ (1976) में यह प्रतिपादित किया था कि जब आर्थिक प्रक्रिया स्वायत्त होगी तो देशों का विकास निश्चित है और इसके लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होना अनिवार्य है. उन्होंने आर्थिक दृष्टि से मुक्त बाजार की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया था कि बाजार पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं होगा क्योंकि एकाधिकार बढ़ने का ख़तरा है. 

भूमंडलीकरण ने विश्व बाजार को प्रभावित किया. यदि कहा जाए कि इसके कारण अमीरी-गरीबी की खाई और बढ़ गई तो गलत नहीं होगा क्योंकि बाजार में उत्पादों की कमी नहीं है लेकिन उन्हें खरीदने की शक्ति भी हर किसी के पास नहीं है. स्थानीय लघु उद्योग आम आदमी की औसतन आय को बढ़ाने के लिए जुटे हुए हैं पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आपसी समझौतों के कारण बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का लोप हो रहा है. परिणामस्वरूप राष्ट्रीय एवं लघु उद्योगों का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है. अतः यह कहा जा सकता है कि महाजनी सभ्यता का विस्तार है यह भूमंडलीकरण और बाजारीकरण.

भूमंडलीकरण ने एक ओर बाजार तंत्र को प्रभावित किया है तो दूसरी ओर व्यक्ति, समाज, संस्कृति, सभ्यता, साहित्य और भाषा आदि अधिरचनाओं को भी प्रभावित किया है. इस ओर लेखक ही नहीं अपितु संवेदनशील सहृदय चिंतक दृष्टि केंद्रित कर रहे हैं और चिंतन-मनन कर रहे हैं कि यदि भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण हमें बहना-ढहना नहीं, बल्कि रहना है तो क्या करना चाहिए? महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र का कहना है कि “देशों के बीच की सीमाएँ सहयोग के लिए पारगामी हो रही हैं. अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय और व्यापार में दृष्टि के साथ अन्य देशों में प्रवासन की प्रक्रिया भी तीव्र हुई है. अर्थतंत्र अब वैश्विक हो रहा है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी प्रसार हो रहा है, जिसके लिए स्वदेशी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के प्रयोग के अवसर बढ़ रहे हैं. भारत में उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश भी हो रहा है. इस तरह के बदलते संदर्भ में भाषा और संस्कृति के अनेक अंतरराष्ट्रीय आयाम उभर रहे हैं, जिनकी ओर ध्यान देना आवश्यक है.” (गिरीश्वर मिश्र (2016), ‘संदेश,’ भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 9). 

भूमंडलीकरण के प्रभाव और चुनौतियाँ आदि से संबंधित अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं. यह भी बाजारतंत्र का ही एक हिस्सा है. हाल ही में, डॉ. प्रदीप कुमार सिंह द्वारा संपादित पुस्तक ‘भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा’ (2016, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृष्ठ 528, मूल्य : रु. 950) को पढ़ने का अवसर मिला. इसमें देश-विदेश के विद्वानों के 76 आलेख सम्मिलित हैं. हिंदी का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य (गिरीश्वर मिश्र), देश-विदेश में हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार की समस्याएँ तथा उज्बेकिस्तान में हिंदी भाषा का अध्यापन तथा अध्ययन : वर्तमान और भविष्य (डॉ. सिराजुद्दीन नुर्मातोव), इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी और मनुष्य : वैश्वीकरण का यथार्थ (प्रो. ऋषभदेव शर्मा), भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य में अर्वाचीन स्त्री विमर्श (प्रो. गोविंद मुरारका), मॉरीशसीय जीवन एवं हिंदी शिक्षण पर राम तथा कृष्ण का प्रभाव (डॉ. अलका धनपत), रामायण की वैश्विक यात्रा (डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह), रामायण के प्रति नायक रावण तथा प्रमुख स्थान (डॉ. ई.जी. डबल्यू.पी. गुणसेना) और आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा (गुर्रमकोंडा नीरजा) आदि शीर्षकों से ही इन ग्रंथ के बहुआयामी विस्तार का अनुमान किया जा सकता है.

भूमंडलीकरण ने बाजार के साथ-साथ मनुष्य को इतना प्रभावित किया है कि वह ‘कॉमोडिटी’/ वस्तु बन चुका है. आज बाजार इतने व्यापक रूप से फैल चुका है कि “विश्व बाजार के लिए राष्ट्रों की सीमाएँ कोई अर्थ नहीं रखतीं. ऐसा होने पर ही तो पूँजी का मुक्त विचरण संभव है. xxx भारत ने 1990 के बाद अपनी आर्थिक नीति में यही बदलाव किया, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश के दरवाजे तो खुल गए, लेकिन ‘न्याय पर आधारित समानता’ के स्थान पर ‘संपन्नता पर आधारित समानता’ ने समाज में नई खाइयाँ भी खोद डालीं. तरह-तरह के संकटों ने भी जन्म लिया.” (प्रो. ऋषभदेव शर्मा (2016), ‘इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी और मनुष्य : वैश्वीकरण का यथार्थ,’ भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 202). प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने यह भी स्पष्ट किया है कि बाजार को वैविध्य पसंद नहीं है. उसे न तो भाषा वैविध्य पसंद है और न ही अलग-अलग सांस्कृतिक पहचानें. “बाजार ‘मॉल’ और ‘माल’ का विस्तार करते हुए रोजगार की गारंटी जैसी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है. बाजार बुद्धिजीवियों से लेकर शिल्पियों तक के विदेश पलायन को बुरा नहीं मानता, पर ये सारी चीजें भारत जैसे किसी भी देश के लिए संकट तो खड़ा करती ही हैं.” (वही). भूमंडलीकरण ने जहाँ बाजार और व्यक्ति को प्रभावित किया है वहीं उसने साहित्य को भी प्रभावित किया है. केंद्र, महावृत्तांत और आदर्श टूट रहे हैं. बहुकेंद्रीयता को नई तकनीक के साथ जोड़कर देखा-परखा जा रहा है. साहित्य के नए-नए पाठ निर्मित हो रहे हैं. बाजार “रीमिक्स करके परंपरा और लोक के व्यावसायिक संस्करण तैयार कर रहा है, महावृत्तांतों के टूटने की उत्तर वेला में प्रस्तुति की भव्यता और आदर्श के अभाव के बीच पैरोडी और विडंबना को सिरज रहा है. साहित्य पर भी मीडिया हावी है, बाजार का दबाव है, इसलिए न रस महत्वपूर्ण है, न चेतना महत्वपूर्ण है.” (वही, पृ. 203). ऐसी स्थिति में केवल सूचना महत्वपूर्ण रह गई है.

इस ग्रंथ में यह तथ्य भी कई स्थलों पर उभरा है कि भाषा-परिदृश्य भी भूमंडलीकरण से प्रभावित है. भूमंडलीकरण और प्रौद्योगिकी के कारण भाषा में परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. शुद्धतावादियों को इस परिवर्तन से कष्ट हो रहा है. लेकिन भाषा परिवर्तन भाषा विकास का सूचक है. भूमंडलीकरण का ही प्रभाव है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार वैश्विक स्तर पर हो रहा है. प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने यह याद दिलाया है कि ‘सूरीनाम, मॉरिशस, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में गिरमिटिया लोगों के लिए हिंदी संस्कृति की वाहिका बनी. अब इंगलैंड, अमेरिका, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, कोरिया, पोलैंड, रूस, बुल्गारिया, फिनलैंड आदि में हिंदीभाषी हैं और भारत के बाहर विदेशों में आज सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन और शोध हो रहा है.’ (प्रो. गिरीश्वर मिश्र (2016), ‘संदेश,’ भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 9). इस संदर्भ में डॉ. सिराजुद्दीन नुर्मातोव का आलेख ‘देश-विदेश में हिंदी प्रचार-प्रसार की समस्याएँ तथा उज्बेकिस्तान में हिंदी भाषा का अध्यापन तथा अध्ययन : वर्तमान और भविष्य’ उल्लेखनीय है. उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि “उज्बेक और हिंदी भाषाओँ में कई हजार की संख्या में पाई जाने वाली आम शब्दावली के अतिरिक्त, ध्वनि विचार, व्याकरण और वाक्य विन्यास के क्षेत्रों में भी बहुत-सी समान विशेषताएँ दृष्टिगोचर हैं.” (डॉ. सिराजुद्दीन नुर्मातोव (2016), ‘देश-विदेश में हिंदी प्रचार-प्रसार की समस्याएँ तथा उज्बेकिस्तान में हिंदी भाषा का अध्यापन तथा अध्ययन : वर्तमान और भविष्य,’ भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 60). उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि उज्बेक और हिंदी भाषाओं की सामाजिक एवं व्यावहारिक विशेषताओं में भी समानता है. 

भूमंडलीकरण ने संस्कृति को भी प्रभावित किया है. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध ‘भारतीय संस्कृति की देन’ में भारतीय संस्कृति के संबंध में कहा है कि “भिन्न-भिन्न देशों और भिन्न-भिन्न जातियों के अनुभूत और साक्षात्कृत अन्य अविरोधी धर्मों की भाँति वह मनुष्य की जययात्रा में सहायक है. वह मनुष्य के सर्वोत्तम को जितने अंश में प्रकाशित और अग्रसर कर सका है, उतने ही अंश में वह सार्थक और महान है. वही भारतीय संस्कृति है, उसको प्रकट करना, उसकी व्याख्या करना या उसके प्रति जिज्ञासा भाव उचित है.” (हजारी प्रसाद द्विवेदी (2007 अट्ठाईसवाँ संस्करण), भारतीय संस्कृति की देन, अशोक के फूल, इलाहाबाद : लोकभारती प्रकाशन, पृ. 69).

भारतीय संस्कृति पुरानी है. हमारा स्वभाव रामायण और महाभारत की कथाओं के माध्यम से फैली है. इनके सहारे से ही हम जुड़े हुए हैं. भारत में ही देश-विदेश में भी रामायण और महाभारत की कथाएँ प्रचलित हैं. डॉ. अलका धनपत ने यह स्पष्ट किया है कि मॉरीशसीय जीवन एवं हिंदी शिक्षण पर राम एवं कृष्ण का प्रभाव दृष्टिगोचर है. उन्होंने इस तथ्य को उजागर किया कि ‘मानस तथा गीता ने हिंदी शिक्षण को प्रेरणा दी और राम तथा कृष्ण के चरित्र ने मजबूत किया.’ (डॉ. अलका धनपत (2016), ‘मॉरीशसीय जीवन एवं हिंदी शिक्षण पर राम एवं कृष्ण का प्रभाव,’ भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 39).

लोगों में यह धारणा है कि श्रीलंका रावण की राजधानी है. पुरातत्वविद इसी प्राक्कल्पना के आधार पर श्रीलंका में रामायण से संबंधित अनेक ऐतिहासिक स्थलों की खोज कर चुके हैं. डॉ. ई.जी.डब्ल्यू.पी. गुणसेना ने अपने शोधपरक आलेख में यह बताया है कि “श्रीलंका में रामायण के स्थानों संबंधी पुरातात्विक खोजों से तथा ऐतिहासिक सूचना के अनुसार ऐसा विश्वास है कि रावण का समय लगभग 5000 वर्ष के पूर्व ठहरता है. xxx [परंतु] श्रीलंका के पारंपरिक विश्वासों, मान्यताओं तथा बौद्ध साहित्य के लंकावतार मसुत्त के अनुसार माना जाता है कि रावण, भगवान बुद्ध का बड़ा भक्त था तथा उसने काश्यप बुद्ध भगवान की पूजा एवं उपासना भी की थी.” (डॉ. ई.जी.डब्ल्यू.पी. गुनसेन (2016), ‘रामायण के प्रति नायक रावण तथा प्रमुख स्थान,’ भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 91). इसे भारत में प्रचलित जैन और बौद्ध रामायणों की भाँति राम कथा के सम्प्रदाय विशेष के लिए उपयोग के रूप में देखा जा सकता है. तेलुगु में उपलब्ध अनेक रामायणें भी बहुपाठीयता की प्रवृत्ति के अनुरूप ठहरती हैं. अनुसंधान के आधार पर तेलुगु भाषा में लगभग रामकथा के 146 पाठ उपलब्ध हैं. उनमें से 60 लोकरामायण के पाठ हैं तो 85 के आसपास संस्कृत से अनुवादित विविध पाठ. यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है. ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’ में विश्वनाथ सत्यनारायण (रामायण कल्पवृक्षम), रंगनायकम्मा (रामायण विषवृक्षम) और ओल्गा (विमुक्ता) की कृतियों के विशेष संदर्भ में यह स्पष्ट किया गया है कि “आधुनिक तेलुगु साहित्य में एक ओर रामायण के आदर्श पाठ उपस्थित हैं, तो वहीं दूसरी ओर उसके विमर्शात्मक पाठ भी उपस्थित हैं. समकालीन पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विसंगतियों को उजागर करने के लिए भी आधुनिक साहित्यकारों ने रामकथा का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है.” (गुर्रमकोंडा नीरजा (2016), ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’, भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा, इलाहाबाद : सरस्वती प्रकाशन, पृ. 396)

कुल मिलाकर इस ग्रंथ से यह स्पष्ट है कि भूमंडलीकरण के कारण समाज, साहित्य, संस्कृति और भाषा आदि अधिरचनाएँ प्रभावित हुई हैं. समाज में बदलाव है और बदलते समाज की इस बदलती मानसिकता को अंकित करने में साहित्य सक्षम है. संस्कृति भी प्रभावित हो रही है लेकिन भारतीय संस्कृति एवं स्वभाव रामायण और महाभारत की कथाओं के माध्यम से विश्व भर में फैले हैं, जिन्हें भूमंडलीकरण के प्रतिवाद के रूप में प्रस्तुत करके इसकी धारा को मोड़ा जा सकता है. इतने विचारपूर्ण आलेखों से सुसज्जित इस ग्रंथ के लिए इसके संपादक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह बधाई के पात्र हैं.

रविवार, 25 सितंबर 2016

अथ से अनंत

डॉ. त्रिभुवन राय के संपादकत्व में यश पब्लिकेशंस, दिल्ली द्वारा 2 भागों में प्रकाशित ‘अथ से अनंत’ (2015) शीर्षक ग्रंथावली मनुष्य की जययात्रा में आस्था रखने वाले मानवता के चितेरे साहित्यकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (19 अगस्त,1907 - 19 मई,1979) के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व के मूल्यांकन पर केंद्रित है। 

‘अथ से अनंत’ [1 और 2] में देश भर के विभिन्न विद्वानों के चिंतनपरक आलेख सम्मिलित हैं। पहले भाग में 20 आलेख हैं जिन्हें तीन खंडों में विभाजित किया गया है। ‘व्यक्तित्व एवं जीवन बोध’ शीर्षक पहले खंड में आचार्य डॉ. शिवेंद्र पुरी (गुरुदेव का पुण्य स्मरण), प्रो. नंदलाल पाठक (श्रद्धा सुमन), डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी (शांतिनिकेतन के वे दिन), डॉ. इरेश स्वामी (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : व्यक्तित्व की प्रमुख रेखाएँ), डॉ. विद्या केशव चिटको (मेरे विभागाध्यक्ष डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी), डॉ. एम. शेषन (मानवतावादी साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी), डॉ. धर्मपाल मैनी (भारतीय संस्कृति के पुरोधा : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी), डॉ. रामदरश मिश्र (हजारी प्रसाद द्विवेदी : सर्जना ही बड़ा सत्य है), डॉ. शिवशंकर पांडेय (‘अशोक के फूल’ संग्रह के निबंधों में निहित आचार्य द्विवेदी का पारदर्शी व्यक्तित्व), प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र (लोक एवं लोकचेतना के चतुर चित्रकार : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी) और डॉ. रामदेव शुक्ल (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन बोध) के लेख सम्मिलित हैं जो द्विवेदी जी के व्यक्तित्व को उभारने में सक्षम हैं। 

द्विवेदी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। संपादकीय में डॉ. त्रिभुवन राय ने उनके विराट व्यक्तित्व के बारे में संकेत करते हुए कहा है कि “आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपनी संपूर्ण सहजता और सरलता में भी भव्य एवं उदात्त व्यक्तित्व के प्रतिरूप थे।“ (डॉ. त्रिभुवन राय, संपादकीय, अथ से अनंत, पृ. 7)। ऐसे विराट व्यक्तित्व को शब्दों में समेटना कठिन है। ‘अथ से अनंत’ में सम्मिलित लेखों में द्विवेदी जी के अनेक आयाम सामने प्रकट हो जाते हैं। 

गुरु का आशीर्वाद शिष्य के लिए ऊर्जा का स्रोत होता है। जब रामदरश मिश्र एम.ए. के विद्यार्थी थे तब द्विवेदी जी हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। उन दिनों को याद करते हुए मिश्र जी कहते हैं कि पंडित जी के सौम्य व्यक्तित्व की उपेक्षा करना संभव नहीं, लेकिन इतने बड़े व्यक्ति से निजी संपर्क बनाने के लिए कोई बहाना भी तो चाहिए। काशी विद्यापीठ में आयोजित एक कवि गोष्ठी में आचार्य के समक्ष गीत पढ़ने का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ। पहले तो वे संकोच करते रहे, लेकिन जब उन्होंने यह देखा कि द्विवेदी जी मुग्ध होकर गीत सुन रहे हैं तो वे और अधिक तन्मयता से गीत पढ़ने लगे। मिश्र जी उस क्षण को याद करते हुए कहते हैं कि “मैंने उस समय कितनी धन्यता अनुभव की, कह नहीं सकता। उस क्षण का बहुत आभारी हूँ कि उसने मुझे पंडितजी का अंतेवासी बना दिया। उस क्षण ने एक ऐसा संबंध दिया जो पंडितजी को सबसे अधिक प्रिय था। मैं सर्जनात्मक संबंध से पंडितजी के निकट पहुँचा था।“ (रामदरश मिश्र, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : सर्जना ही बड़ा साहित्य, अथ से अनंत-1, पृ. 44)। हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य में सर्जनात्मकता ही परम सत्य है। 

रामदरश मिश्र द्विवेदी जी के व्यक्तित्व के एक और आयाम की परत को खोलते हुए कहते हैं कि “पंडितजी का भास्वर सारस्वत व्यक्तित्व जितना प्रिय और बड़ा है, उतना ही छोटे-छोटे सामाजिक तथा पारिवारिक प्रसंगों में उभरता उनका सामान्य मनुष्य। कोई अजनबी से अजनबी मनुष्य उनके यहाँ चला जाता था, तो वे अपनी सहज हँसी और चुटकुलों में उसे बहा लेते थे। वह मनुष्य अपने को उनके बहुत निकट समझने लगता था और लगता था, ये तो हम लोगों जैसे एक सामान्य मनुष्य हैं, जो विनोद करते हैं, चुट्कुले सुनाते हैं, अट्टहास करते हैं, किसी की निंदा भी हो रही हो तो उसे भी विनोद से सुन और हँस लेते हैं. लेकिन उनसे अलग होने के बाद जब वह अपने को टटोलता था तो पाता था कि बातों-बातों में पंडित जी उसे बहुत कुछ दे गए हैं, आत्मीयता ही नहीं, ज्ञान भी।“ (वही, पृ. 51)। 

दूसरा खंड है ‘परंपरा और इतिहास’। इसमें आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी (आर्ष परंपरा और हजारी प्रसाद द्विवेदी), डॉ. अमर सिंह वधान (प्राचीन और नवीन के मध्य आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी), डॉ. रमेश कुंतल मेघ (कलात्मक इतिहास और समाज विज्ञानों की गोधूलि में सृजनशीलता) और डॉ. बैजनाथ प्रसाद (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि और भक्ति आंदोलन) के लेख समाहित हैं। इन लेखों से यह स्पष्ट होता है कि द्विवेदी जी साहित्य को कला, संस्कृति, सभ्यता और परंपरा आदि से जोड़कर देखते हैं। उनके विचार प्रौढ़ एवं वैज्ञानिक हैं। आनंदप्रकाश दीक्षित का कहना है कि अतीत को वे इस तरह खंगालते हैं कि उसमें नई दीप्ति पैदा हो जाती है और बरबस हमारे चिंतन के नए द्वार उन्मुक्त हो जाते हैं। (अथ से अनंत)। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मानवता के पक्षधर थे। वे साहित्य और भाषा को मानव की दृष्टि से देखने की पक्षपाती थे। उनका मानना है कि “हम लोग एक कठिन समय के भीतर से गुजर रहे हैं। आज नाना भाँति के संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को कुछ ऐसा अंधा बना दिया है कि जाति-धर्म-निर्विशेष मनुष्य के हित की बात सोचना असंभव-सा हो गया है। ऐसा लग रहा है कि किसी विकट दुर्भाग्य के इंगित पर दलगत स्वार्थ से प्रेम ने मनुष्यता को दबोच लिया है।“ (हजारी प्रसाद द्विवेदी, ‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है’, अशोक के फूल, पृ. 143)। आज तो मनुष्य, मनुष्यता और भाषा खतरे में हैं। आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी की मान्यता है कि द्विवेदी जी के साहित्य को समझना हो तो मानवतावादी अवधारणा को समझना अनिवार्य है क्योंकि द्विवेदी जी मानवीय मूल्यों को प्रमुख मानते हैं। ‘अनामदास का पोथा’ में द्विवेदी जी ने लिखा है कि “मानवीय मूल्यों के आचरण का पर्यवसान विश्वमंगल के साथ-साथ विश्वात्मक और विश्वातीत चिदानंदमय सुख में होना चाहिए।“ 

यह पहले भी कहा जा चुका है कि द्विवेदी जी परंपरा और आधुनिकता को जोड़कर कर देखते हैं। अमर सिंह वधान यह स्पष्ट करते हैं कि “द्विवेदी जी प्राचीन के प्रति पूर्ण आस्थावान होते हुए भी विकास-नियम स्वीकार करते हैं। लेकिन समय की माँग के अनुसार परिवर्तन के वे समर्थक हैं। इसीलिए उनके निबंधों में नवीन मानव के प्रति आशावाद है।“ (अमर सिंह वधान, प्राचीन और नवीन के मध्य आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, अथ से अनंत-1, पृ. 103)। इस संदर्भ में डॉ. त्रिभुवन राय का मत उल्लेखनीय है। उनका मानना है कि “पुरातन और आधुनिकता के संधि बिंदु पर अवस्थित आचार्यश्री न आँख मूँदकर पुराने का अनुगमन करते हैं और न ही नए के पीछे भागते हैं। इनके स्वीकार और अस्वीकार के मूल में उनके संदर्भ में वस्तुतः समय के साथ मनुष्य उसके हित-अहित एवं प्रतिष्ठा की भावना ही निर्णायक प्रतीत होती है।“ (त्रिभुवन राय, संपादकीय, अथ से अनंत-1, पृ. 12)। 

डॉ. देवकीनंदन श्रीवास्तव (भक्ति साहित्य के मर्मी पंडित द्विवेदी), डॉ. सुनील कुमार (मध्ययुगीन साहित्य और आचार्य द्विवेदी), डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी (जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभु पायो), डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी (आचार्य और धर्मवीर के कबीर : कुछ खुलासे) और डॉ. लल्लन राय (कबीर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : सूर्य पर पूर्ण ग्रहण) के लेख ‘भक्ति साहित्य’ शीर्षक तीसरे खंड में सम्मिलित हैं। इन लेखों को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि द्विवेदी जी भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ हैं। मध्यकालीन भाव बोध को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। 

‘अथ से अनंत’ के दूसरे भाग में 27 शोधपूर्ण आलेख सम्मिलित हैं जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। ‘सृजन आयाम’ शीर्षक खंड को निबंध, उपन्यास और आलोचना में विभाजित किया गया है। ‘निबंध’ के अंतर्गत ‘व्युत्पत्ति और प्रतिभा के धनी : निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी’ (डॉ. रामानंद शर्मा), ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध साहित्य : परंपरा का पुनराख्यान’ (डॉ. श्रीराम परिहार), ‘शूद्र-ब्राह्मण के द्वार बालू से निकाला गया तेल : परंपरा और प्रगतिशीलता का संदर्भ’ (प्रो. जयप्रकाश), ‘लालित्य तत्व एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी’ (डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा) और ‘आचार्य द्विवेदी के निबंधों का लालित्य विधान’ (डॉ. रविकुमार ‘अनु’) आदि लेख सम्मिलित हैं, जिनके माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि द्विवेदी जी के निबंधों में प्रकृति के माध्यम से संस्कृति की यात्रा है, परंपरा का पुनराख्यान है, लोकमंगल की भावना है, जनता के भविष्य की सुरक्षा है, दीन-हीन जनता के प्रति अपार सहानुभूति है। ‘उपन्यास’ शीर्षक उपवर्ग के अंतर्गत डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ल (बाणभट्ट की आत्मकथा : मानवीय जीवन का महाकाव्य), डॉ. देशराज शर्मा (बाणभट्ट की आत्मकथा और मानव मूल्य), डॉ. योजना रावत (बाणभट्ट की आत्मकथा और मानववाद), डॉ. शशिकला राय (जिजीविषा है तो जीवन रहेगा), मधुरेश (द्विवेदीजी के उपन्यास : प्रेम और सौंदर्यदृष्टि), डॉ. अश्विनी कुमार शुक्ल (भारतीय उपन्यास की अवधारणा और आचार्य द्विवेदी के उपन्यास), डॉ. सत्यकेतु सांकृत (हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में व्यक्त भारतीय जीवन दृष्टि), डॉ. सुशीला गुप्ता (हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में चित्रित नारी शक्ति का आह्वान), डॉ. इंदु शुक्ला (आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों में चित्रित नारी भावना), डॉ. रामनाथ मौर्य (आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों में लोकतत्व) और डॉ. त्रिभुवन राय (परंपरा का पुनराख्यान : उपन्यासकार हजारी प्रसाद द्विवेदी) के लेख सम्मिलित हैं, तो ‘आलोचना’ शीर्षक उपवर्ग में डॉ. ए. अरविंदाक्षन (आलोचना की सृजनात्मकता), डॉ. रामकिशोर शर्मा (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि) तथा डॉ. त्रिभुवन राय (आचार्य द्विवेदी के साहित्य सिद्धांत और समीक्षा दृष्टि) के गंभीर चिंतनपरक लेख सम्मिलित हैं, जिनमें द्विवेदी जी के समग्र कृतित्व की पड़ताल है। 

भूमंडलीकरण के इस दौर में एक ओर तो बाजारवाद पूरे विश्व को एक बड़ी मंडी में तब्दील कर रहा है, वहीं दूसरी ओर संकीर्ण स्वार्थों के कारण समस्त संसार अनेक टुकड़ों में, दलों में और खेमों में विभाजित हो चुका है। द्विवेदी जी इस दलगत संकीर्णता का विरोध करते हैं। उनकी दृष्टि में मनुष्य सर्वोपरि है। मनुष्य की रक्षा और विकास ही उनका परम लक्ष्य है। वे इस बात पर बल देते हैं कि अच्छी बात को सुनने और मानने के लिए ‘मनुष्य’ को तैयार करना आवश्यक है। और यह काम एक संवेदनशील साहित्यकार के माध्यम से ही संभव हो सकता है। स्पष्ट है कि साहित्य द्विवेदी जी के लिए साधन है, साध्य नहीं, क्योंकि वे मानते हैं कि साहित्य में वह शक्ति होनी चाहिए जो मनुष्य को पशु होने से बचा सके। उनके विचार में जो साहित्य मनुष्य में निहित पशुत्व का निर्मूलन नहीं कर सकता है वह साहित्य की संज्ञा ही खो देता है। (हजारी प्रसाद द्विवेदी, विचार और वितर्क, पृ. 96)। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लिए संस्कृति मनुष्य की सहायक एवं सहयोगिनी है। डॉ. त्रिभुवन राय का मानना है कि “मानव संस्कृति में भारतीय संस्कृति उन्हें विशेष प्रिय है। इसलिए कि जीवन के उत्तरोत्तर साधना क्रम में मानव में अंतर्निहित संभावनाओं का द्वार उद्घाटित करने के साथ अंततः उस ‘एक’ से तदाकार होने की दिशा भी उन्मीलित करती है, जिसके आगे पाने को कुछ शेष नहीं रह जाता, परंतु यहाँ भी उनकी पटरी विशुद्धतावादियों से नहीं बैठती।“ (त्रिभुवन राय, संपादकीय, अथ से अनंत-1, पृ. 9)। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी संस्कृतिकर्मी के साथ-साथ भाषाचिंतक भी हैं। अतः ‘भाषा तथा अन्य’ शीर्षक खंड में उनके भाषाचिंतन के विविध आयामों को डॉ. अमरनाथ (आचार्य द्विवेदी की दृष्टि में स्वराज्य और स्वभाषा), डॉ. ऋषभदेव शर्मा (लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी), प्रो. भगवानदीन मिश्र (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का भाषावैभव), डॉ. दिलीप सिंह (प्रकृति में फक्कड़ता की तलाश का गद्य), डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया (अपभ्रंश और हिंदी के संबंध पर द्विवेदी जी के भाषाशास्त्रीय विचार), डॉ. रत्ना शर्मा (आचार्य द्विवेदी की व्याकरणिक दृष्टि), प्रो. सुरेश उपाध्याय (मेघदूत की सहयात्रा) और डॉ. निर्मला एस. मौर्य (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पत्र साहित्य में मानवीय संवेदना) ने खँगाला है। 

डॉ. त्रिभुवन राय ने अपने शोधपरक लेख ‘आचार्य द्विवेदी के साहित्य सिद्धांत और समीक्षा दृष्टि’ में यह स्पष्ट किया है कि “द्विवेदी जी सहज भाषा के पक्षपाती हैं। किंतु सहज भाषा उनके विचार में वही हो सकती है जो मनुष्य को आहार, निद्रा आदि पशु सामान्य प्रवृत्तियों से ऊँचा उठाने में सहायक होती है।“ (डॉ. त्रिभुवन राय, अथ से अनंत–2, पृ. 218)। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्वयं इस बात पर बल देते हैं कि उनकी दृष्टि में “सहज भाषा का अर्थ है सहज ही महान बना देने वाली भाषा। वह भाषा जो मनुष्य को उसकी सामाजिक दुर्गति, दरिद्रता, अंध संस्कार और परमुखापेक्षिता से न बचा सके किसी काम की नहीं है, भले ही उसमें प्रयुक्त शब्द बाज़ार में विचरने वाले अत्यंत निम्नस्तर के लोगों के मुख से संग्रह किए गए हों।“ (हजारी प्रसाद द्विवेदी, विचार और वितर्क, पृ. 175)। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मनुष्य को सबसे बड़ा मानते हैं और भाषा उसकी सेवा के लिए उपयुक्त साधन। डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने अपने लेख ‘लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी’ में यह याद दिलाया है कि द्विवेदी जी के साहित्य और भाषाविषयक चिंतन के केंद्र में परंपरा और इतिहास बोध अवस्थित है, क्योंकि उन्होंने परंपरा और इतिहास बोध की सहायता से समसामयिक भाषा समस्या को भी सुलझाने के सूत्र अपने निबंधों में दिए हैं। (डॉ. ऋषभदेव शर्मा, ‘लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी’, अथ से अनंत-2, पृ. 244)। आगे उन्होंने कहा है कि भाषा नियोजन के संबंध में द्विवेदी जी की दृष्टि अत्यंत व्यापक है। इस संबंध में द्विवेदी जी की दो मान्यताएँ हैं – ‘अपने देश की भाषा और साहित्य विषयक नीति स्थिर करते समय हमें अपने देश के विशाल इतिहास को याद रखना होगा; और मनुष्य को चरम लक्ष्य मानकर तथा उसके सुख-दुख का विचार करके हमें अपनी भाषा विषयक नीति स्थिर करनी चाहिए.’ (वही, पृ. 247)। 

यहाँ हिंदी भाषा के संबंध में भी हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत उल्लेखनीय है। वे हिंदी को निरी शास्त्रार्थ की भाषा बनने से बचाना चाहते हैं। इस संबंध में वे कहते हैं कि “हमें हिंदी को ऐसी भाषा नहीं बना देना है, जो सर्वसाधारण के निकट अंग्रेजी की भाँति दुर्बोध्य बनी रहे, या संस्कृत की ही भाँति कुछ चुने हुए लोगों के शास्त्रार्थ-विचार की भाषा बन जाए। ऐसा करके तो हम निश्चित रूप से हिंदी का अहित करेंगे। हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिए जो मामूली से मामूली जनचित्त को ऊपर उठा सके। हमें तो इस भाषा को इस योग्य बना देना है कि वह साधारण से साधारण मजदूर से लेकर अत्यंत विकसित मस्तिष्क के बुद्धिजीवी के दिमाग में समान भाव से विहार कर सके।“ (हजारी प्रसाद द्विवेदी, अशोक के फूल, पृ. 142)। अतः बुद्धिजीवियों से यही अपील है कि हिंदी को सर्वसाधारण जनता की भाषा बनाए रखें और द्विवेदी जी की बात को हमेशा हमेशा के लिए याद रखें कि “हिंदी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई, तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।“ (अथ से अनंत-2, पृ. 250)। 

बुधवार, 15 जून 2016

संपादकीय : 'संकल्पना' (आलोचना कृति)


प्रस्तुति

हिंदी भाषा और साहित्य का फलक जितना विस्तृत और बहुआयामी है, उससे संबंधित अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान का क्षेत्र भी उतना ही विस्तृत और प्रसरणशील है. यों तो हिंदी कभी भी क्षेत्र विशेष तक सीमित भाषा नहीं थी, लेकिन वर्तमान समय में विधिवत सब प्रकार की क्षेत्रीय और भौगोलिक लक्ष्मणरेखाओं का अतिक्रमण करके वह सार्वदेशिक, अखिल भारतीय भाषा के रूप में उभरी है और सब प्रकार के विमर्श को संभव बनाती हुई अपनी विश्व भाषा की दावेदारी को पुष्ट कर रही है. वैसे भी यह समय केंद्र से परिधि की और जाने वाले विमर्शों का समय है. कहना ना होगा की हिंदी की प्रकृति भी केंद्र से परिधि की और जानी की रहे है. विमर्शों के इस समय में परिधि की गतिविधियाँ महत्वपूर्ण हो गई हैं और बहुकेंद्रीयता उभार पर है. हिंदी अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान का बहुकेंद्रीय प्रसार इसका प्रमाण है. हम कहना यह चाहते हैं कि जिन क्षेत्रों को अहिंदी भाषी अथवा हिंदीतर कहकर हिंदी भाषा और साहित्य तत्संबंधी अनुसंधान के हाशिए पर धकेल कर लगभग अनुपस्थित मान लिया जाता था, आज क्षेत्रों में केवल परंपरागत ही नहीं वरन् नए, मौलिक, अछूते और चुनौतीपूर्ण विषयों पर हिंदी भाषी, और अहिंदी भाषी के भेद के बिना, उत्कृष्ट कोटि का अनुसंधान कार्य हो रहा है. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान का इस दिशा में योगदान अनन्य है. परंतु खेद का विषय है कि अभी तक भी इसके संबंध में अधिसंख्य हिंदी जन अपरिचित हैं. क्योंकि इस प्रभूत शोधकार्य को अभी तक भी समुचित प्रकाशन के अवसर अनुपलब्ध हैं.

‘संकल्पना’ दक्षिण भारत में हो रहे शोधकार्य की एक बानगी प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास है. इसमें संकलित सभी शोधपत्र हैदराबाद (तेलंगाना) स्थित शोधकर्ताओं के स्वाध्याय का परिणाम हैं. इनमें से अधिसंख्य शोधकर्ता अभी अनुसंधान पथ के अन्वेषी पथिक हैं तथापि उनकी शोधदृष्टि एकदम साफ, तटस्थ, वाद निरपेक्ष और मानव सापेक्ष है. यहाँ संकलित शोधपत्रों में अध्येय पाठ के रूप में काव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, बल साहित्य और साक्षात्कार जैसी विविध विधाओं के पाठ तो ग्रहण किए ही गए हैं पत्रकारिता, मीडिया और वैज्ञानिक साहित्य तक को भाषिक अनुसंधान के दायरे में लाया गया है. इससे निश्चय ही हिंदी अनुसंधान के एक क्षेत्र को व्यापकता प्राप्त हुई है. इतना ही नहीं अनूदित साहित्य का विश्लेषण इसे और भी विस्तार प्रदान करता है. इसी प्रकार इस शोधपत्रों में अधुनातन शोधदृष्टियों का भी वैविध्य देखने को मिलेगा. यदि इनमें शोध और समीक्षा की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक दृष्टि, सामाजिक दृष्टि और ऐतिहासिक दृष्टि जैसी पारंपरिक आलोचना दृष्टियाँ विद्यमान हैं तो स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, विस्थापित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, दलित विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और मीडिया विमर्श जैसी पिछले दो तीन दशकों में विकसित उत्तर आधुनिक आलोचना दृष्टियाँ इस पुस्तक को एकदम नई दिशा को खोलने वाली बनाती हैं. इतना ही नहीं प्रयोजनमूलक भाषा, स्त्री भाषा, लोकतत्व और अनुवाद विमर्श पर जो शोधपूर्ण अध्ययन यहाँ उपलब्ध है वह इस पुस्तक को और भी उपादेय बनाने वाला है, इसमें संदेह नहीं.

आशा है, मोतियों के शहर हैदराबाद से प्रकाश में आ रहे इस प्रकृत मुक्ताहार को हिंदी जगत में स्नेह और अपनापन मिलेगा.


25     मई, 2015                                                    - संपादकद्वय


शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

(शुभाशंसा : प्रो. ऋषभदेव शर्मा) 'अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख'

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख 

गुर्रमकोंडा नीरजा 
2015
वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु. 495
ISBN : 978-93-5229-249-3
पृष्ठ 304
                                      शुभाशंसा

हमारी परंपरा ने पंचभूतों की उत्पत्ति चिदाकाश से मानी है जिसमें नाद, शब्द, वाक् या भाषा व्याप्त है. इसीलिए हमारा सारा चिंतन भाषामूलक है. वाक् और अर्थ के संबंधों को समझने के लिए ही भाषाविज्ञान और काव्यशास्त्र विकसित हुए हैं. ये दोनों एक दूसरे को प्रभावित तो करते ही हैं, प्रतिच्छादित भी करते हैं. इन दोनों में भी भाषाविज्ञान अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक है और अपनी वैज्ञानिक विश्लेषण प्रक्रिया के कारण अनुप्रयोग की अनंत संभावनाएँ भी प्रस्तुत करता है. अनुप्रयोग से जुड़कर भाषाविज्ञान के सिद्धांत विभिन्न ज्ञान शाखाओं का विस्तार करते हुए नित्य नए क्षितिजों का उद्घाटन कर रहे हैं. इससे अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के कई क्षेत्र सामने आए हैं. भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, शैलीविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, संचार अभियांत्रिकी, कंप्यूटर विज्ञान आदि क्षेत्रों में भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग ने नई संभावनाओं को उजागर किया है. इसलिए अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की अलग अलग क्षेत्रों में व्यावहारिक परख भी आवश्यक हो गई है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की यह पुस्तक इसी दृष्टिकोण से लिखी गई है. 

लेखिका डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को दक्षिण भारत में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन, पठन-पाठन और तत्संबंधी शोधकार्य का अच्छा अनुभव है. वे समाजभाषिकी, अनुवाद, भाषा शिक्षण, व्यतिरेकी विश्लेषण, संचार, पत्रकारिता और साहित्यालोचन से व्यावहारिक रूप से प्रत्यक्षतः जुड़ी हुई हैं और इन विषयों पर प्रायः सोचती, पढ़ती और लिखती रहती हैं. यह पुस्तक उनके भाषा-साहित्य के स्वाध्याय और साधना का प्रीतिकर प्रतिफलन है. लेखिका ने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के विभिन्न मुद्दों को आत्मसात करके उन्हें सोदाहरण सरल एवं सटीक भाषाशैली में इस पुस्तक में पिरोया है. 

सात खंडों वाली इस पुस्तक की प्रस्तुति पूर्णतः तर्कसंगत और क्रमिक विकास की दृष्टि से सोपानबद्ध है. ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ खंड में भाषा अध्ययन की दृष्टियों पर चर्चा करते हुए अनुप्रयोग के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर प्रकाश डाला गया है. इस संक्षिप्त पीठिका के साथ अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख की ओर अगले छह खंडों में क्रमशः प्रस्थान किया गया है. इस प्रस्थान के बिंदु हैं – भाषा शिक्षण, अनुवाद विमर्श, साहित्य पाठ विमर्श या शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण, प्रयोजनमूलक भाषा विमर्श, समाजभाषिक विमर्श और भाषाचिंतन. 

इसमें संदेह नहीं कि यह पुस्तक अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अनेक आयामों की व्यावहारिकता को उद्घाटित करने के साथ साथ उनका परीक्षण एवं मूल्यांकन भी करती है. इस दृष्टि से डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की यह कृति भाषा और साहित्य, दोनों ही के जिज्ञासु पाठकों और शिक्षकों के लिए अत्यंत उपादेय सिद्ध होगी तथा नई पीढ़ी को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की ओर आकृष्ट करने में भी सफल होगी, ऐसा मेरा विश्वास है. 

शुभकामनाओं सहित
25 अप्रैल, 2015                                                                                                  -  ऋषभ देव शर्मा

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

(मेरी पुस्तक) अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख 

गुर्रमकोंडा नीरजा 
2015
वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु. 495
ISBN : 978-93-5229-249-3
पृष्ठ 304

आज  [27 अक्टूबर, 2015] सुबह मेरे नाम पर वाणी प्रकाशन से एक पार्सल आया था. मैं अपनी आखों पर यकीन नहीं कर पाई. मेरी पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ की लेखकीय प्रतियाँ!!! मेरी आँखें अनायास ही नम हो आईं. 

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ को लिखने के पीछे मेरे दो गुरुजन का प्रोत्साहन रहा - प्रो. दिलीप सिंह और  प्रो. ऋषभदेव शर्मा. इस पुस्तक का नामकरण भी दिलीप सर ने ही किया था. देखा जाय तो यह पुस्तक मेरे लिए देखा गया इन दोनों का सपना है जो आज इस रूप में पूरा हुआ है. मैं दोनों गुरुजन के प्रति कृतज्ञ हूँ. नतमस्तक हूँ. 

अपनी खुशी  दिलीप सर से बाँटनी चाही तो वे उपलब्ध नहीं हुए. मैं और मेरे पतिदेव शर्मा सर के घर पहुँच गए पुस्तकों के पार्सल सहित. शर्मा सर और पूर्णिमा मैडम दोनों पुस्तक को देखकर बेहद  खुश हुए. दोनों ने मुझे बार-बार आशीर्वाद दिए. 

गुरुजनों और हितैषियों के आशीष के अतिरिक्त और क्या चाहिए!

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की पत्रकारिता

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की पत्रकारिता 

- ऋषभ देव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा 

भारत के दक्षिणपूर्व समुद्र तट पर अवस्थित अविभाजित आंध्रप्रदेश राज्य (जो अब 2 जून 2014 से आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के रूप में नवगठित हो चुका है) क्षेत्रफल की दृष्टि से 2 जून 2014 तक देश का चौथा और जनसंख्या की दृष्टि से पांचवाँ सबसे बड़ा राज्य था जिसमें तीन क्षेत्र शामिल हैं – तेलंगाना, तटीय आंध्र और रायलसीमा. अविभाजित आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद ही फिलहाल नवगठित दोनों प्रांतों की राजधानी है. आंध्र और तेलंगाना की राजभाषा तेलुगु रही है. उर्दू यहाँ की सहराजभाषा है और हिंदी, मराठी, तमिल, कन्नड़ तथा उड़िया भाषियों की भी यहाँ बड़ी तादाद है. स्मरणीय है कि अविभाजित आंध्रप्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को तत्कालीन आंध्रप्रदेश के साथ हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को सम्मिलित करके किया गया था. वर्तमान में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना राज्य से तेलुगु, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी की अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं. प्रमुख तेलुगु पत्र-पत्रिकाएँ हैं – ईनाडु, आंध्रभूमि, आंध्रप्रभा, आंध्रपत्रिका, आंध्रज्योति, प्रजाशक्ति, साक्षी, वार्ता, सूर्या, नमस्ते तेलंगाना और विशालांध्रा. उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में सम्मिलित हैं – अवाम, इत्तेमाद (डेली), मुंसिफ (डेली), सियासत (डेली), ब्लिट्ज़. राज्य के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्र हैं – डेली हिंदी मिलाप और स्वतंत्र वार्ता. साथ ही अनेक पत्रिकाएँ हिंदी में प्रकाशित होती हैं. इनके अलावा अंग्रेज़ी के जिन पत्रों के संस्करण आंध्रप्रदेश से प्रकाशित होते हैं उनमें शामिल हैं – डेक्कन क्रोनिकल, हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, बिजनस लाइन, इकोनॉमिक टाइम्स, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, प्लेज और हंस इंडिया. उल्लेखनीय है कि आंध्रप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. तेलुगु पत्रकारिता तो 19वीं शताब्दी के दूसरे दशक से ही आरंभ हो गई थी. इसके बाद उर्दू पत्रकारिता का उदय 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हुआ जबकि हिंदी पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा चलाये गए हिंदी प्रचार अभियान के दौर में और खास तौर से ब्रिटिश और निजाम शासन के विरुद्ध आर्य समाज की राष्ट्रीय गतिविधियों के साथ बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के आरंभिक वर्षों में उदित हुई. 

1. आंध्रप्रदेश की तेलुगु पत्रकारिता 
तेलुगुभाषी प्रांत आंध्रप्रदेश में प्रकाशन की सुविधा और पत्रकारिता के इतिहास का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि ईसाई मिशनरियों के प्रयास से 1747 में तेलुगु में ‘बाइबिल’ का प्रकाशन हुआ. आगे चलकर 1818 में मछलीपट्टनम (बंदरु, जिला कृष्णा) से ‘हितवादी’ और 1835 में बल्लारी से ‘सत्यदूत’ – ये दो तेलुगु पत्रिकाएँ निकलीं जो ईसाई धर्मप्रचार पर केंद्रित थीं. सुरवरम प्रताप रेड्डी ने ‘आंध्रुला सांघिक चरित्र’ (आंध्र का समग्र इतिहास) नामक ग्रंथ में यह सूचित किया है कि 19वीं शताब्दी के मध्य काल में ‘श्रीयक्षिणी’ (साप्ताहिक) प्रकाशित होती थी जिसे उन्होंने तेलुगु भाषा की प्रथम पत्रिका माना है. लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी हुई पहली तेलुगु पत्रिका 1838 में मंडिगल वेंकटराय शास्त्री के संपादन में मद्रास से प्रकाशित हुई जिसका नाम था ‘वृत्तांतिनी’. इसमें सरकार से संबंधित टिप्पणी, जुलूस तथा हड़ताल आदि से संबंधित समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते थे. वास्तव में ‘वृत्तांतिनी’ को पहली देसी तुलुगु पत्रिका होने का गौरव प्राप्त है. (डॉ.बालशौरि रेड्डी, ‘तेलुगु पत्रिकला चरित्र’, (तेलुगु पत्रिकाओं का इतिहास), एमएसको बुक्स, हैदराबाद, 2010).

1842 में पुव्वाड वेंकटराव के संपादकत्व में ‘वर्तमान तरंगिणी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ जो आठ वर्ष तक चला. इस पत्रिका को संस्कृत महाकाव्यों का तेलुगु अनुवाद प्रकाशित करने का श्रेय है. इसके अतिरिक्त 1848 में ‘हितवादी’ और ‘दिन वर्तमान’ जैसी पत्रिकाएँ निकलनी शुरू हुईं जिनमें क्षेत्रीय समाचारों के साथ साहित्यिक विषयों का भी समावेश होता था. उल्लेखनीय है कि 1862 में पूर्णरूप से साहित्यिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक विषयों को समर्पित मासिक पत्रिका ‘सुजन रंजनी’ आरंभ हुई जो बाद में त्रैमासिक हो गई. 1863 में बल्लारी से ‘श्रीयक्षिणी’ तथा 1865 में मद्रास से ब्रह्मसमाज की पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. इन पत्रिकाओं ने विदेशी धर्मप्रचार का सामना करने के लिए भारतीय दर्शन, धर्म, निष्ठा, स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति और समाज सुधार पर ध्यान केंद्रित किया. ये पत्रिकाएँ अंग्रेज़ों के अत्याचार के विरुद्ध भी खुलकर लिखतीं थीं. (चर्ल अन्नपूर्णा, तेलुगु पत्रकारिता (आलेख), भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, 2000, (सं.) दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा). इस अवधि की एक अन्य पत्रिका थी ‘आंध्र भाषा संजीवनी’. इसमें भी साहित्य, समाज और राजनीति विषयक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित होती थीं. तेलुगु भाषा के विकास में इस पत्रिका का योगदान अत्यंत महवपूर्ण है. तेलुगु पत्रकारिता के प्रथम दौर की इन सभी पत्रिकाओं ने सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रीय चेतना को उद्बुद्ध करने के साथ साथ आंध्र क्षेत्र के नए लेखकों को प्रोत्साहित करने का बड़ा काम किया. यहाँ ‘पुरुषार्थ प्रदायिनी’ (1872 से प्रकाशित/ (सं) उमा रंगनायकुलु), ‘स्वधर्म प्रकाशिनी’, सुधीरंजनी’ और ‘सकल विद्याभिवर्धिनि’ का भी उल्लेख किया जा सकता है जिनमें तेलुगु मुहावरे, लोकोक्तियाँ, प्राचीन सूक्तियाँ और ऐतिहासिक गाथाएं प्रकाशित होती थीं. 

1874 में आधुनिक तेलुगु भाषा के सुधार आंदोलन के प्रवर्तक कंदुकूरि वीरेशलिंगम द्वारा राजमहेंद्री से प्रकाशित ‘विवेकवर्धनि’ के साथ तेलुगु पत्रकारिता के नए युग का सूत्रपात हुआ. “वहीं से उन्होंने सन 1874 में ‘विवेकवर्धनि’, सन 1883 में ‘सतीहितबोधिनि’, सन 1892 में ‘सत्यसंवर्धनि’, सन 1905 में ‘सत्यवादिनि’ नामक पत्रिकाओं का क्रमश: प्रकाशन किया और सामाजिक परिवर्तन तथा राष्ट्रीय जागरण के प्रधान आधार के रूप में इन्हें स्थापित किया. इतना ही नहीं उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि लोगों की रुचि ही समाचार पत्र की असली पूंजी है. उस समय की प्रगतिविरोधी शक्तियों, मठाधीशों, धोखेबाजों और गुंडों की भी उन्होंने अच्छी ख़बर ली. उनकी पत्रिकाओं से ये असामाजिक तत्व थर-थर कांपते थे.” (वही) 

यहाँ किसी अंग्रेज़ी पत्रिका के प्रथम तेलुगुभाषी संपादक के रूप में प्रतिष्ठित नेल्लूर वासी दामपुरी नरसैया का उल्लेख आवश्यक है. उन्होंने अंग्रेज़ी में मद्रास से ‘द नेटिव एडवोकेट’ (साप्ताहिक) का संपादन किया. साथ ही अनेक समाज सुधारकों तथा ब्रह्म समाज से प्रभावित होकर 1871 में नेल्लूर से ‘नेल्लूर पायोनियर’ का प्रकाशन किया. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर 1881 से’ 1897 तक की अवधि में ‘पीपुल्स फ्रेंडली’ (अंग्रेज़ी साप्ताहिक) का प्रकाशन किया. दामपुरी नरसैया को तेलुगु के प्रथम साप्ताहिक ‘आंध्र भाषा ग्राम वार्तामणि’ के प्रकाशन का भी श्रेय प्राप्त है जिसे उन्होंने ग्रामीण, निर्धन और दलित समुदाय के हितों के लिए समर्पित किया. 

1876 में वी.कृष्णमाचार्युलु के संपादकत्व में मद्रास स्कूल बुक एंड वर्नाकुलर लिटरेचर सोसाइटी की ओर से मद्रास से प्रथम बालोपयोगी तेलुगु पत्रिका ‘जनविनोदिनि’ निकली. इस अवधि की अन्य उल्लेखनीय पत्रिकाएँ हैं - ‘शशिरेखा’ (1874 से/ मद्रास/ (सं) गटुपल्लि शेषाचार्युलु), ‘आंध्रप्रकाशिका’ (1885 से/ (सं) ए.वी.पार्थसारथी नायुडु), ‘देशाभिमानी’ (मासिक) (1890 से/ बेजवाड़ा (विजयवाडा) : (सं) देशगुप्तम शेषाचलपति द्वारा आरंभ यह पत्र आगे चलकर दैनिक हो गया. अतः ‘देशाभिमानी’ को तेलुगु का प्रथम दैनिक समाचार पत्र माना जाता है), ‘मनोहारिणि’ (नरसापुर/ (सं) अखिलन), ‘चिंतामणि’ ((सं) न्यायपति सुब्बाराव). तेलुगु पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास में स्त्री संबंधी प्रथम पत्रिका के रूप में ‘सतीहितबोधिनि’ (सं. वीरेशलिंगम पंतुलु) के अतिरिक्त स्वयं महिलाओं द्वारा संपादित ये पत्रिकाएँ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – ‘सौंदर्यवल्ली’ (मद्रास/ (सं) श्रीमती रामबाई), ‘हिंदू सुंदरी’ (काकीनाडा/ (सं.) मोसलिकंटि रामबायम्मा), ‘सावित्री’ (सं. पुलुगुर्ति लक्ष्मी नरसमाम्बा), ‘अनसूया’ (सं. विन्जमूरि वेंकट रत्नम्मा). 

बीसवीं शताब्दी में तेलुगु पत्रकारिता का बहुमुखी विकास हुआ तथा इसके माध्यम से “व्यावहारिक भाषा” को लोकप्रियता प्राप्त हुई. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के युग में देशभक्त कोंडा वेंकटप्पय्या (1902, बंदरु – कृष्णा पत्रिका), चिलकमर्ती लक्ष्मी नरसिम्हम (मनोरमा – 1906, देशमाता – 1910) और मुट्नूरी कृष्णाराव (1907 से कृष्णा पत्रिका के संपादक) जैसे पत्रकारों के नाम प्रमुख हैं. 1905 में “वंदेमातरम आंदोलन” के प्रबल होने पर तेलुगु पत्रकारिता में राष्ट्रीयता का जमकर विकास हुआ. अंग्रेज़ विरोधी तेवर के कारण चिलकमर्ती लक्ष्मी नरसिम्हम (भारतभूमि एक दुधारू गाय है, अंग्रेज़ रूपी चालाक ग्वाले भूखे बछड़े की तरह रोती हुई भारतीय जनता के मुँह को छींके से बाँधकर इस गाय का दूध अपने लिए दुह रहे हैं.) और ‘स्वराज्य’ (1908) के संपादक गाडिचर्ल हरिसर्वोत्तम राव (अरे रे! फिरंगी! क्रूर व्याघ्र!) को जेल यात्रा करनी पड़ी. इस युग में चिल्कूरी वीरभद्रराव ने राजमहेंद्री से ‘आंध्रकेसरी’ और चिल्लरिगि श्रीनिवास राव ने मछलीपट्टनम से ‘नवयुग’ का प्रकाशन किया. जैसा कि ऊपर संकेत किया जा चुका है 1902 में देशभक्त कोंडा वेंकटप्पय्या और दासु नारायण राव द्वारा शुरू की गई ‘कृष्णा’ पत्रिका से 1907 में मुट्नूरि कृष्णा राव संपादक के रूप में जुड़े. इस पत्रिका से अवटपल्ली नारायण राव, पट्टाभि सीतारामैया, कोपल्ले हनुमंता राव और कौता राममोहन शास्त्री भी संबद्ध रहें. 

‘कृष्णा पत्रिका’ के समान ही ‘आंध्र पत्रिका’ ने भी राष्ट्रीय आंदोलन काल में संघर्षशील पत्रकारिता का इतिहास रचा. इसे 1908 में साप्ताहिक के रूप में काशीनाथुनि नागेश्वरराव पंतुलु ने मुंबई से आरंभ किया था. 1914 में इसे दैनिक पत्र के रूप में मद्रास स्थानांतरित कर दिया गया. बाद में दैनिक और साप्ताहिक ‘आंध्र पत्रिका’ के साथ साथ काशीनाथुनि नागेश्वर राव पंतुलु ने साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘भारती’ भी निकाली. पंतुलु के प्रयास से तेलुगु जनता में पठन-पाठन के संस्कार का प्रभूत विस्तार हुआ और उनकी प्रेरणा से अनेक देशभक्त युवक पत्रकारिता के क्षेत्र में आए. स्मरणीय है कि विश्वनाथ सत्यनारायण का विख्यात महाकाय उपन्यास ‘वेयीपडगलु’ (सहस्रफण) ‘आंध्र पत्रिका’ में दैनिक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था. 

“बाद में ‘आंध्र साहिती परिपुष्पत्रिका’ नामक पत्रिका सन 1912 में प्रकाशित हुई. इसी युग में ‘त्रिलिंग’ नामक पत्रिका सन 1916 में निकली. इसी प्रकार सन 1923 में निकली ‘मुत्याला सरस्वती’ नामक पत्रिका ने प्राचीन प्रबंध काव्यों के प्रचार को प्रधानता दी. सन 1924 में प्रकाशित ‘आंध्र सर्वस्वम’ और ‘सारस्वत सर्वस्वम’ आदि पत्रिकाएँ उल्लेखनीय हैं. इसी वर्ष में प्रकाशित ‘प्रबुद्धान्ध्र’ नामक पत्रिका में गिडुगु राममूर्ति जी के व्यावहारिक भाषा वाद को समर्थन मिलता है.” (एल.विश्वनाथ रेड्डी, तेलुगु भाषा के विकास में पत्रिकाओं का योगदान, सहस्र वर्षों का तेलुगु इतिहास, (सं) यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद). 

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने तेलुगु पत्रकारों की एक और नई पौध तैयार की. इनमें टंगुटूरी प्रकाशम पंतुलु का नाम शीर्षस्थ है जिन्होंने 1921 में मद्रास से ‘स्वराज्य’ का अंग्रेज़ी, तमिल और तेलुगु में प्रकाशन आरंभ किया. उनके बाद गोविंदराजुलु वेंकट कृष्णा राव ने भी मद्रास से ही ‘नवयुगम’ का प्रकाशन किया. उन्हें तेलुगु के प्रथम साम्यवादी पत्रकार माना जाता है. ‘मातृसेवा’ (1922, ताड़िपत्री से, गाडिचर्ल हरिसर्वोत्तम राव), ‘कांग्रेस’ (1922, राजमहेंद्री, अन्नपूर्णय्या) तथा ‘सत्याग्रही’ (एलुरु, आत्मकूरी गोविंदाचार्युलू) को ब्रिटिश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा. ‘कांग्रेस’ के कई संपादकों को जेलयात्रा भी करनी पड़ी. राष्ट्रीय आंदोलन को तीव्रतर बनाने में एलुरु से प्रकाशित ‘गान्डीवमु’ और ‘देवदत्तमु’, मद्रास से प्रकाशित ‘जन्मभूमि’ (एक कानी – तीन कौड़ी मूल्य के कारण ‘कानी’ पत्रिका नाम से प्रसिद्ध) तथा नेल्लूरु से प्रकाशित ‘जमीनु रैतु’ (1928) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

राष्ट्रीय आंदोलन काल में रायलसीमा और तेलंगाना क्षेत्र से भी कई तेलुगु पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं. ‘मातृसेवा’ (ताड़िपत्री), ‘हास्य मंजूषा’ (अनंतपुर), ‘पिनाकिनी’, ‘कौमोदिकी’ (नंदयाल), ‘इंद्रावती’ (सं. वनम शंकर शर्मा), ‘विजयवाणी’ (सं. मूलनारायण स्वामी), ‘ब्रह्मनंदिनी’ (कडपा, (सं.) स्वधानम कृष्णमुनी) रायलसीमा की प्रतिनिधि पत्रिकाएँ रहीं. यहाँ उल्लेखनीय हैं कि तेलंगाना क्षेत्र में तेलुगु पत्रकारिता का विकास अपेक्षाकृत पिछड़ा रहा क्योंकि यह इलाका निजाम शासन में दबा हुआ था. इसके बावजूद ‘हितबोधिनि’ (1913, महबूब नगर), ‘तेलुगु पत्रिका’ (1920, इन्गुर्ति), ‘नीलगिरि’ (नलगोंडा), ‘गोलकोंडा’ (1925, सुरवरम प्रताप रेड्डी) तथा ‘सुजाता’ (1927, (सं.) सुरवरम और मंडपाटि) ने तेलंगाना क्षेत्र की तेलुगु पत्रकारिता को निजी पहचान प्रधान की. आगे चलकर 1933 – 38 की अवधि में तेलंगाना क्षेत्र से ‘देशबंधु’, ‘दक्कन केसरी’, ‘आंध्र वाणी’, ‘तेलुगु तल्लि’ और ‘विभूति’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. 1945 में राजगोपाल मुदलियार ने अंग्रेज़ी दैनिक ‘दक्कन क्रोनिकल’ के साथ साथ तेलुगु दैनिक ‘तेलंगाना’ का प्रकाशन आरंभ किया जो बाद में बंद हो गया. उन्होंने ही आगे चलकर ‘आंध्र भूमि’ तेलुगु दैनिक निकाला जो अभी तक चल रहा है. तेलुगु दैनिक ‘मिज़ान’ भी 1945 में हैदराबाद से आरंभ हुआ. इसके अलावा निज़ाम शासकों के शोषण चक्र के विरुद्ध किसानों के क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थन में विजयवाडा से ‘प्रजाशक्ति’ (सं. रामानुजराव) का प्रकाशन आरंभ हुआ – यह दैनिक पत्र भी अब तक चल रहा है.). 

तेलुगु पत्रकारिता को उद्योग के रूप में विकसित करने का प्रथम श्रेय 1937 से प्रकाशित समाजवादी पार्टी के पत्र ‘नवशक्ति’ और 1938 से प्रकाशित रामनाथ गोयनका के पत्र ‘आंध्रप्रभा’ को जाता है. विशेष रूप से ‘आंध्रप्रभा’ दैनिक ने तेलुगु पत्रकारिता में अनेक नए आयाम जोड़े. स्वातंत्र्यपूर्व युग की तेलुगु पत्र-पत्रिकाओं में ‘जनवाणी’, ‘प्रतिभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘प्रबुद्ध आंध्र’, ‘उदयिनी’, ‘ज्वाला’’, साहिती’, ‘विज्ञानमु’, ‘बाला’ और ‘चंदामामा’ के नाम उल्लेखनीय हैं. इन्होंने तेलुगु के व्यावहारिक भाषारूप को लोकप्रियता प्रदान की तथा साहित्यिक पत्रकारिता, महिला पत्रकारिता, विज्ञान पत्रकारिता और बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. 

तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास से पता चलता है कि 1939 से 42 तक समाजवादी दल द्वारा गुप्त रूप से ‘स्वतंत्र भारत’ का प्रकाशन किया जाता था. इसके अलावा ‘जनता’, ‘संदेशम’, ‘विशालांध्र’, ‘जनवाणी’, ‘नगारा’ जैसी पत्रिकाओं ने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए डटकर संघर्ष किया. ‘विशालांध्र’ 1952 से दैनिक हो गया. ये पत्र-पत्रिकाएँ साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करने वाली रहीं. ‘नवयुग’ (युवाओं के लिए), ‘आंध्र वनिता’ (महिलाओं के लिए) ‘वर्कर’ (श्रमिकों के लिए) तथा ‘अभ्युदय’ (प्रगतिशील लेखक संघ) भी प्रगतिशील विचारधारा की विशिष्ट पत्रिकाएँ हैं. 

तेलुगु पत्रकारिता का नया उन्मेष तीन ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा है – भारत की आजादी (1947), आंध्र प्रांत का गठन (1953) और आंध्र प्रदेश का निर्माण (1956). पहले मद्रास से छपने वाले तेलुगु समाचार पत्र अब आंध्र प्रदेश में छपने लगे. आंध्रप्रभा (1959), आंध्रपत्रिका (1965), आंध्रज्योति (1967), प्रभा और ज्योति आदि सचित्र दैनिक और साप्ताहिक पत्र एकाधिक केंद्रों से प्रकाशित होने लगे. 1974 में विशाखपट्टनम से और 1975 में हैदराबाद से ‘ईनाडु’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ हुआ. 

वर्तमान में आंध्रप्रदेश भर से तेलुगु की लगभग 500 पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं. इनमें प्रसार संख्या की दृष्टि से ईनाडु, आंध्रज्योति, आंध्रभूमि पहले तीन स्थानों पर हैं. वर्तमान उपलब्ध प्रमुख तेलुगु दैनिक समाचार पत्र हैं – आंध्रभूमि, आंध्रज्योति, आंध्रपत्रिका, ईनाडु, ईमाता, वार्तलु, आंध्रप्रभा, विशालांध्रा, प्रजाशक्ति, विजेता, वार्ता, साक्षी, सूर्या, नेटि तेलंगाना. साप्ताहिक तेलुगु पत्रिकाओं में आंध्रभूमि, आंध्रज्योति, आंध्रप्रभा, स्वाति, चित्रभूमि, ज्योतिचित्र, मयूरी, सितारा, शिवरंजनी, इंडिया टुडे (तेलुगु), रचना, कृष्णा पत्रिका, प्रतिभा, प्रगति के नाम उल्लेखनीय हैं. तेलुगु की मासिक पत्रिकाओं के अंतर्गत मुख्य रूप से अन्नदाता, चतुरा, स्वाति, उद्योग विजयालु, विपुला, चतुरा, आंध्रभूमि, प्रजासाहिती, पालपिट्टा, प्रतिबिंबम, माभूमि, गमनम, ग्रामस्वराज्यम, अभिनय, मनिदीपम, चिनुकु, प्रजाशक्ति, उज्वला, कापुमित्रा, कापुसत्ता, कापुयुवता, भूमिका, महिलाज्योति, माधुरी-2, रैतुनेस्तम, रैतुमित्रा, आंध्रप्रदेश, मयूरी अत्यंत उपयोगी पत्रिकाएँ हैं. इसके अतिरिक्त वेदांतभेरी, शुभवार्ता, सप्तगिरी, सनातन सारथी, अक्षरमैथिली, उषश्री, सनमार्गामु, भक्तिप्रपंचम, ज्ञानभूमि, मणिदीपम, पुण्यक्षेत्रालु, तिरुपति, ओंकारवेदमु, ऋषिपीठमु आदि आध्यात्मिक वर्ग की तेलुगु पत्रिकाओं के रूप में उल्लेखनीय है. फिल्म पत्रकारिता भी तेलुगु में अत्यंत लोकप्रिय हैं. इस कोटि की मुख्य पत्र-पत्रिकाएं हैं – सितारा (1976, मासिक), चलनचित्र (1973, मासिक), सिनी सम्राट (1997), स्टार डिटेक्टिव (1998, पाक्षिक), सिनिमा चांस (1998), संतोषम (2002, साप्ताहिक), उल्लासम (2003, मासिक), सुमांजलि (2003, साप्ताहिक), केमेरा (2003, साप्ताहिक), सिनी गूढ़ाचारी (1987, साप्ताहिक), सिनेमा (1984, मासिक), सिनीरमा (1976), ज्योतिचित्रा (1977), चित्रभूमि (1980, साप्ताहिक), सिनीविनोदमु (2002, तेलुगु – हिंदी साप्ताहिक), चित्रांजलि (2001, साप्ताहिक), चित्रम (2001, साप्ताहिक), मूवी लैंड्स (2002, साप्ताहिक), मा (1998, मासिक), शिवरंजनी (1986, मासिक; 1997, साप्ताहिक), मेघसंदेशम (1997, साप्ताहिक), सिनी मार्जिन (1986, साप्तहिक) और आंध्रभूमि (सिनेमा – 1981, साप्ताहिक). इसी प्रकार प्रमुख तेलुगु बालपत्रिकाओं में चंदामामा, बंगारुबोम्मा (1976, मासिक), चिन्नारीलोकम (1985, मासिक), आंध्रबाला (1995, मासिक), बाल जोजो वेन्नला (2000, मासिक), चिन्नारुलु (2002, मासिक), सिसिंद्रीलु (2006, मासिक) और बालतेजम (2006) के नाम सम्मिलित हैं. 

तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास की सबसे नई ऐतिहासिक परिघटना के रूप में फरवरी 2004 से आरंभ पहले वैश्विक तेलुगु समाचार पत्र के प्रकाशन का उल्लेख किया जा सकता है. ‘तेलुगु टाइम्स’ के नाम से प्रकाशित यह समाचार पत्र भारत और विदेशों के मीडिया और व्यवसाय जगत के अनुभवी पत्रकारों द्वारा चलाया जा रहा है. इसके पृष्ठ तैयार तो हैदराबाद के कार्यालय में किए जाते हैं लेकिन उन्हें सीधे अमेरिका स्थित प्रेस को प्रेषित कर दिया जाता है और उन्हें वहीं में मुद्रित और वितरित किया जाता है. वास्तव में ‘तेलुगु टाइम्स’ का प्रकाशन उत्तरी अमेरिका में बसे हुए पांच लाख प्रवासी तेलुगुभाषियों की मीडिया और जनसंचार संबंधी अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए आरंभ किया गया है. 

2. आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता 
आंध्रप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास का दूसरा आयाम उर्दू पत्रकारिता से संबंधित है. आंध्रप्रदेश की प्रथम उर्दू पत्रिका का प्रकाशन 1857 ई में हआ जब आसफ़जाही शासन के दौरान हैदराबाद से स्वास्थ्य संबंधी पत्रिका ‘तिबाबत’ निकली. आजे चलकर 1860 में काज़ी मोहम्मद क़ुतुब के संपादन में हैदराबाद का पहला उर्दू समाचार पत्र ‘आफ़ताब दक्कन’ आरंभ हुआ जो वास्तव में हैदराबाद की सभ्यता, संस्कृति और विभिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक और राजमहल संबंधी गतिविधियों की सूचनाएँ जनता को देने का माध्यम बना. इसी प्रकार 1869 से 1948 तक हैदराबाद राज्य के गजट के प्रकाशन की भी जानकारी मिलती है. ‘आफ़ताब दक्कन’ (1860) के अलावा ‘खुर्शीद दक्कन’ (1877) को भी इस राज्य का पहला उर्दू समाचार पत्र माना जाता है. प्रथम उर्दू ‘दैनिक’ समाचार पत्र के स्थान के भी दो दावेदार हैं. पहला 1883 में सुल्तान मोहम्मद आकिल देहलवी द्वारा संपादित ‘खुर्शीद दक्कन’ तथा दूसरा 1888 में हाजी करतान द्वारा संपादित ‘शौकत उल इस्लाम’. 19वीं शताब्दी के अंतिम पच्चीस वर्षों में प्रकाशित अन्य उर्दू पत्रों में शामिल हैं ‘अखबार आसफी’ (1885), ‘अफ़सर उल अखबार’ (1886) और ‘अफ़सर’ (1897). 

‘भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन’ (2000) में सम्मिलित ‘उर्दू पत्रकारिता’ विषयक निबंध में नेहपाल सिंह वर्मा यह जानकारी दी है कि “हैदराबाद के पत्रकारिता जगत के सबसे महत्वपूर्ण समाचार पत्र ‘मुशीर दक्कन’ का संपादन 1892 ई. में स्व. किशनराव ने किया. उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में शायद ही कोई दूसरा समाचार पत्र इतना पुराना इतिहास रखता है. यह पत्र 22 अप्रैल 1892 से 10 दिसंबर 1898 ई. तक नियमित प्रकाशित होता रहा. कुछ दिन बंद रहा. पुनः 1899 ई. से प्रकाशित होने लगा. 1898 ई. में आपत्तिजनक निबंध के प्रकाशन के आरोप में किशनराव को शहर से निकाल दिया गया. उन्होंने इसे मद्रास से निकाला और फिर 1899 ई. से इसे पुनः हैदराबाद से प्रकाशित किया. 1902 ई. में सादिक़ हुसैन ने ‘इल्म व अमल’ प्रकाशित किया. 1901 ई. में समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं की संख्या 14 थी जिनमें 12 उर्दू के और 2 मराठी के थे. इनमें सात दैनिक पत्र थे. इनमें ‘मुशीर दक्कन’ ही ऐसा दैनिक पत्र था जो 1970 ई. तक प्रकाशित होता रहा. इस दैनिक ने पत्रकारिता को एक नया रूप दिया. उस समय लोगों की राजनैतिक समाचारों में रुचि कम थी, कोई संवादवाहिनी संस्था नहीं थी. बादशाह को ईश्वर के बाद शक्ति का अवतार मानते थे. ऐसे समय 1904 ई. में मोहब हुसैन ने ‘इल्म व अमल’ जारी किया. यह वह समय था जब राष्ट्रीय कांग्रेस की हवा हैदराबाद पहुँच गई थी. केशवराव कोरटकर, वामन नायक, मुल्ला अब्दुल कय्यूम, डॉ.रघुनाथ चट्टोपाध्याय, पं. तारानाथ, बैरिस्टर श्री किशन और बैरिस्टर मोहम्मद असगर ने निजाम राज्य में जनजागृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लेख लिखे.” ‘मुशीर दक्कन’ को पत्रकारिता के मूल्यों की स्थापना का श्रेय दिया जाता है.” (नेहपाल सिंह वर्मा, ‘उर्दू पत्रकारिता’ (आलेख), भातरीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ.109). 

आगे चलकर 1911 में ‘मुआरिफ’ (मुल्ला अब्दुल बासित) और ‘उस्मान गजट’ (सैयद राजा शाह) के अतिरिक्त ‘सहीफ़ा’ ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की. इस पत्र ने साहित्यिक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बताया जाता है कि निजाम मीर उस्मान अली खान की उत्तर भारत की यात्रा के अवसर पर उनके साथ गए अकबर अली द्वारा प्रेषित ताज़ा समाचारों के कारण ‘सहीफ़ा’ को यह लोकप्रियता मिली. 1920–1948 की अवधि में अहमद मोहिउद्दीन द्वारा ‘रहबर दक्कन’ का प्रकाशन किया गया जो मजलिस इत्तहाद उल मुसलमीन का धार्मिक पत्र था. बाद में इसका नाम ‘रहनुमाये दक्कन’ कर दिया गया जो मुसलमानों और मुस्लिम धर्म के पक्षधर पत्र के रूप में आगे भी प्रकाशित होता रहा. 

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि रजाकार आंदोलन (1948) के कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियों ने इस राज्य में हिंदू-मुस्लिम एकता के वातावरण को बहुत क्षति पहुँचाई तो आर्य समाज के आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को शक्ति प्रदान की. “उस समय ‘रहबर दक्कन’, रैयत’ और ‘पयाम’ महत्वपूर्ण पत्र थे. सरकार ने जब देखा कि ‘रैयत’ राष्ट्रीयता का प्रचार कर रहा है तो उस पर रोक लगा दी गई. एम.नरसिंह राव, संपादक ने समाचार पत्र ही बंद कर दिया. ‘रैयत’ के बंद होते ही बी.रामकिशन राव और एम.नरसिंह राव (जो बाद में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हुए) के सहयोग से शोयब उल्लाह खान ने ‘इमरोज’ निकाला. शोयब उल्लाह खान गांधीवादी थे. उन्होंने खुलकर हैदराबाद में हो रहे सांप्रदायिक तांडव का विरोध किया. उन्होंने बादशाह उस्मान अलीखान को सलाह दी कि वह हैदराबाद को भारत में विलय कर देश की कौमी धारा से जुड़ जाएँ और रजाकारों की गतिविधियों को तुरंत बंद करा दें. रजाकारों ने उन्हें जान से मार डालने की धमकी दी और एक दिन जब वह साईकिल से काम कर वापस लौट रहे थे उन पर आक्रमण किया गया. उनका सीधा हाथ काट दिया गया और उन्होंने वहीं सड़क पर अपने प्राण छोड़ दिए. हैदराबाद की पत्रकारिता के इतिहास में यह पहले पत्रकार का बलिदान था, जो रंग लाया और भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल को हैदराबाद पर पुलिस एक्शन कर इसे भारत में विलय कराने का कार्य करना पड़ा. उसी समय प्रगतिवादी विचारधारा के दैनिक पत्र ‘पयाम’ (सं. अख्तर हसन) के कार्यालय पर भी आक्रमण किया गया और आग लगा दी गई.” (द्रष्टव्य - नेहपाल सिंह वर्मा, ‘उर्दू पत्रकारिता’, भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ. 110).

इन सब परिस्थितियों के समानांतर आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता की यात्रा आगे बढ़ती रही. ‘निजाम गजट’ (1927 : हबीब उल्ला रशदी, विकार अहमद), ‘सुबह दक्कन’ (1928 : अहमद आरिफ़, अली अशरफ़), ‘मज़लिस’ (1948 : हकीम गफ्फार अहमद अंसारी), ‘वक्त’ और ‘मंशूर’ (1928 : अब्दुल रहमान रईस), ‘सल्तनत’ (1930 : अहमद उल्लाह कादरी), ‘पयाम (1935 : काज़ी अब्दुल गफ़ार) के अनंतर 1942 (भारत छोड़ो आंदोलन) से 1948 (हैदराबाद का भारत में विलय) की अवधि में अनेक उर्दू पत्र-पत्रकार सामने आए. जैसे ‘मीज़ान’ (1942 : गुलाम मुहम्मद और हबीब उल्लाह ओज), ‘तन्जीम’ (1942 : अली अशरफ़), ‘इत्तहाद’ (1947 : अब्दुल इहाशमी), ‘मुस्तकबिल’ और ‘तामीर दक्कन’ (फैज़ उद्दीन ‘फैज़’), ‘इन्कलाब’ (मुरतुज़ा मुज्तहदी), ‘मुहबे वतन’ (लक्ष्मी रेड्डी), ‘आवाज़’ (अब्दुल कादर), ‘जिन्नाह’ (अज़हर रजवी), ‘हमदम’ (मुस्तफ़ा कादरी), ‘आगाज़’ (सैयद मोईन उलहक), ‘मंजिल’ (अज़हर रजवी), ‘इखदाम’ (मुरतुजा मुजतहदी), ‘नई जिंदगी’ (जे.एन.शर्मा), ‘शोईब’ (अनीस उलरहमान).

इसमें संदेह नहीं कि 1935 (‘पयाम’) से 1948 (‘इखदाम’) तक की अवधि आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रही. “बादशाह के समर्थक समाचार पत्रों में ‘निजाम दक्कन’ और ‘दक्कन’ प्रमुख थे. इन समाचार पत्रों में बादशाह की ओर से नज़री बाग से जारी निजाम के आदेश और फरमान छपते थे, जिन्हें बाद में हर समाचार पत्र को प्रकाशित करना पडता था. ‘रहबर दक्कन’, ‘मजलिस’, ‘इत्तहाद’, ‘जिन्नाह’, ‘आगाज़’ मजलिस के समर्थक समाचार पत्र थे. इन पत्रों ने स्वतंत्र हैदराबाद के लिए जनमत तैयार किया. ‘रैयत’, ‘पयाम’, ‘वक्त’ और ‘इमरोज़’ प्रजातांत्रिक शासन के लिए आवाज़ उठा रहे थे. ‘पयाम’ ने कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए काम किया. अंततः 1948 ई. में इन समाचार पत्रों का प्रकाशन रंग लाया और हैदराबाद राज्य का भारत में विलय हो गया.” (वही). उल्लेखनीय है कि 1948 में प्रगतिशील पत्रकार मुरतुजा मुज्तहदी द्वारा प्रकाशित ‘इखदाम’ से अनेक प्रगतिशील पत्रकार और लेखक संबंधित रहे जिनमें मखदूम मोहिउद्दीन और राज बहादुर गौड़ भी सम्मिलित थे. मुरतुजा ने 1950 में ‘अंगारा’ निकाला जिसके बंद होने पर मोईन फारुकी ने ‘अंगारे’ का प्रकाशन किया. 

1948 के बाद की अवधि में अर्थात निजामशाही के समापन के बाद अनेक नए उर्दू पत्र सामने आए जिनमें उल्लेखनीय हैं ‘नई जिंदगी’ (जे.एन.शर्मा), ‘हमदर्द’ (नक्श आलमी), ‘हमदम’ (जमाल उद्दीन और मुस्तफा कादरी), ‘ताजयाना’ (सआदत जहां), ‘हमारा इखदाम’ (शहरयार), ‘नया ज़माना’ (असद जाफ़री), ‘सल्तनत’ (सादउल्लाह कादरी), ‘पैसा अखबार’ (अहमद उल्लाह कादरी), ‘अंगारे’ (मोईन फारुकी), ‘वतन’ (रशीद बेग), ‘अमर भारत’ (पूरनचंद शाकिर), ‘सदाकत’ (वही उलहसन), ‘ज़बीह’ (इस्माईल ज़बीह), ‘हक’ (शेख चाँद), ‘नवीद दक्कन’ (अज़ीम अस्कंरी), मुंसिफ (महमूद अंसारी), ‘खून नाव’ (जी.एम.उरूज) आदि. इनके अलावा 1948 से हैदराबाद से ‘मिलाप’ (दैनिक उर्दू पत्र) निकला जिसके संपादक युद्धवीर थे. अपनी राष्ट्रीय चेतना और आर्य समाजी विचारधारा के कारण इसे हिंदुओं में खूब लोकप्रियता प्राप्त हुई. अब यह पत्र बंद हो चुका है. 

हैदराबाद की उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में ‘सियासत’ का अपना विशिष्ट स्थान है. इसे आबिद अली खान ने महबूब हुसैन ‘ज़िगर’ के साथ मिलकर 15 अगस्त 1949 से उर्दू दैनिक के रूप में आरंभ किया. वर्तमान में दैनिक ‘सियासत’ के साथ साथ मासिक ‘सियासत’ का भी प्रकाशन किया जाता है. इस पत्र को प्रगतिशील विचारधारा के लिए जाना जाता है. दैनिक ‘सियासत’ के वर्तमान संपादक है जाहिद अली खान. इसके जैसी ही लोकप्रियता ‘मुंसिफ’ को भी प्राप्त है जिसे महमूद अंसारी ने आरंभ किया था और अब भारतीय अमेरिकी खान लतीफ़ द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है. 

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि आंध्रप्रदेश की पत्रकारिता में उर्दू पत्रों और पत्रकारों का योगदान अविस्मरणीय है. यहाँ अंत में यह जोड़ना भी प्रासंगिक होगा कि शीर्षस्थ उर्दू पत्रकार जाहिद अली खान और नसीम आरिफी यह मानते हैं कि उर्दू मीडिया में अभी संसाधनों और प्रोफेशनलिज्म की कमी है जिसके कारण वह कुछ हद तक पिछड़ा हुआ है. इसके बावजूद वह बड़ी सीमा तक उर्दू भाषी जनता और आंध्रप्रदेश के प्रशासन के मध्य सेतु की भूमिका निभा पा रहा है. यहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री के समक्ष अंग्रेज़ी और तेलुगु के अखबारों के साथ साथ उर्दू अखबारों की क्लिपिंग भी प्रस्तुत की जाती हैं. आज ‘सियासत’ दुनिया के 107 देशों में पढ़ा जाता है लेकिन यह अवश्य चिंतनीय है कि नई पीढ़ी का उर्दू के प्रति झुकाव काफी कम होता जा रहा है. 

3. आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता 
आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता का इतिहास पर्याप्त रोचक है तथा इस प्रांत के हिंदी प्रेम और राष्ट्रीयता का द्योतक भी. पत्रकारिता के इतिहास संबंधी शोधकर्ताओं ने इस तथ्य पर विस्मय प्रकट किया है कि जहाँ एक ओर हिंदी विरोधी समझे जाने वाले मद्रास प्रांत में हिंदी पत्रकारिता को हिंदी प्रचार के साथ जुड़कर विकसित होने का अनुकूल वातावरण मिला, वहाँ उर्दू को प्रमुखता देने वाला और दक्खिनी हिंदी को अपनाने वाला निजाम द्वारा शासित हैदराबाद प्रांत हिंदी पत्रकारिता के रास्ते में काँटे बिछाने वाला बना. इसके बावजूद यह भी रेखांकित किया गया है कि हिंदी पत्रकारिता का जो रूप हमें दक्षिण भारत में देखने को मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता क्योंकि यहाँ हिंदी देशप्रेम की संवाहिका बनकर आई और भावों की संवाहिका कुछ देर से बनी. डॉ.गोपाल शर्मा ने हैदराबाद के प्रमुख हिंदी पत्रकार मुनींद्र जी के अमृतोत्सव के अवसर पर दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ ‘भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन’ (2000) के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए अपने शोधपूर्ण निबंध ‘दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता’ में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को चार कालों में विभक्त किया है, जिन्हें आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में ज्यों-का-त्यों स्वीकार किया जा सकता है. यही नहीं उनके द्वारा प्रस्तुत सूचनाएँ और विश्लेषण भी अत्यंत प्रामाणिक हैं जिन्हें हम यहाँ आभार सहित इस्तेमाल कर रहे हैं. आंध्रप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को जिन चार कालखंडों में बाँटा जा सकता है, वे हैं –
1. उद्भव काल (सन 1947 से पूर्व)
2. विकास काल (सन 1948 से 1972 तक)
3. नव निर्माण काल (सन 1973 से 1998 तक)
4. वर्तमान काल (सन 1999 से....)

स्वातंत्र्यपूर्व काल में स्थानीय राजनैतिक कारणों वश हैदराबाद में निजामशाही के दौरान हिंदी को ‘बगावत की भाषा’ और ‘विदेशी भाषा’ समझा जाने लगा था जबकि उर्दू यहाँ की राजभाषा थी. हिंदी में पत्र-पत्रिका प्रकाशित करने पर पाबंदी थी. 1931 में अर्जुन प्रसाद मिश्र ‘कंटक’ ने ‘भाग्योदय’ नामक मासिक पत्रिका के लिए अनुमति तो प्राप्त कर ली लेकिन भयभीत जनता का सहयोग न प्राप्त कर सके. यही कहानी और भी एक-दो हिंदी पत्रों की है. हिंदी के प्रति शासन के इस विद्वेष का कारण यह था कि यहाँ धार्मिक एवं नागरिक स्वतंत्रता के लिए आर्य समाज शासन से टकराव मोल लेता रहता था. आर्य समाज के प्रचारक हिंदी का प्रयोग करते थे अतः उनके प्रभाव को कम करने के लिए हिंदी भाषा और हिंदी पत्रकारिता को लगातार दबाया जाता था. आर्य समाजियों ने हैदराबाद की जनता के लिए बाहर से पत्र प्रकाशित करने शुरू किए, एक ऐसा ही पत्र सोलापुर से निकला. ‘आर्य संदेश’ नामक इस पत्र में जनता को न्याय-पथ पर चलने की सलाह दी जाती थी और हैदराबाद के शासन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए तैयार किया जाता था. इस पत्र के संपादकद्वय त्रिलोकी नाथ शास्त्री और राम देव ने ‘आर्य संदेश’ को राजनीतिक चेतना फैलाने के लिए प्रयोग किया. इस पत्र का मुख्य संदेश आज भी हैदराबाद के बुजुर्गों को याद है : ‘उठ बाँध कमर, क्यों डरता है – फिर देख प्रभु क्या करता है.’ यह पत्र दो वर्ष तक भी न चल पाया. चल ही नहीं सकता था. सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया. कई वर्षों तक हैदराबाद राज्य की हिंदी पत्रकारिता में लुका-छिपी का खेल चलता रहा. आर्य प्रतिनिधि सभा अनुमति लेकर पत्र निकालती, सरकार प्रतिबंध लगा देती, इसलिए संपादकों ने कई नामों की अनुमति ले डाली. कभी कोई पत्र नागपुर से छपता, कभी सोलापुर से, कभी पत्र बड़ा होता तो कभी विवरण पत्र मात्र बन जाता. इस समय प्रकाशित पत्रों के नामों की एक लंबी सूची है जैसे आर्यभानु, दैनिक दिग्विजय, सुधाकर, हनुमान, दिवाकर, पताका, वेद प्रकाश, वैदिक ज्योति आदि. कई अन्य पत्रकारों ने भी कोशिश की जैसे बृंदावन विहारी मिश्र ने ‘व्यापार’ नामक पत्र निकाला और अपने आप को विवादों से दूर रखने का प्रयत्न किया. (गोपाल शर्मा, ‘दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता’ (आलेख), भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ. 115). इस प्रकार स्वातंत्र्यपूर्व काल में हैदराबाद में हिंदी पत्रकारिता को अपने अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष करना पड़ा. 

स्वातंत्र्योत्तर काल में उपर्युक्त स्थिति में परिवर्तन आया और हैदराबाद नवीन पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का केंद्र बनकर उभरा. सितंबर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत संघ में विलय के बाद हैदराबाद से नियमित रूप से दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्र निकलने लगे. हैदराबाद से प्रकाशित ‘अजंता’ और ‘कल्पना’ जैसी मासिक पत्रिकाओं ने ‘सरस्वती’ और ‘हंस’ के समान ख्याति अर्जित की. ‘अजंता’ हिंदी प्रचार सभा हैदराबाद द्वारा प्रकाशित की जाती थी. गया प्रसाद शास्त्री, श्यामू संन्यासी, श्रीराम शर्मा, वंशीधर विद्यालंकार, हरिकृष्ण पुरोहित, राजकिशोर पांडेय और भीमसेन निर्मल जैसे दिग्गज इस पत्रिका के संपादक रहे. दूसरी ओर ‘कल्पना’ का प्रकाशन बद्री विशाल पित्ती द्वारा अगस्त 1949 से आरंभ किया गया जिसके संपादकों में डॉ.आर्येंद्र शर्मा से लेकर भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय और मुनींद्र जी तक अनेक समर्पित हिंदी सेवी जुड़े थे. इसके कला विभाग से एम.एफ.हुसैन और जगदीश मित्तल जैसे चित्रकार और कला समीक्षक संबद्ध रहे. यह भारत भर के लेखकों एवं पत्रकारों की प्रिय पत्रिका बनी तथा 1978 में कोई विशेष कारण घोषित किए बिना बंद हो गई. स्मरणीय है कि आर्येंद्र शर्मा मूलतः वैयाकरण थे. उनकी पुस्तक ‘बेसिक ग्रामर ऑफ हिंदी’ भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई थी जिसे आज भी हिंदी का मानक व्याकरण माना जाता है. भाषा के प्रति उनकी गंभीरता और अच्छी रचनाओं को पहचानने की विवेकी दृष्टि ने ‘कल्पना’ को अपनी एक अलग जगह बनाने में मदद की. ‘कल्पना’ के माध्यम से वे अनेक नए रचनाकारों को सामने लाए जो बाद में प्रतिष्ठित हुए. इसी अवधि में मारवाड़ी प्रेस, हैदराबाद के बालकृष्ण लाहोटी द्वारा प्रकाशित ‘दक्षिण भारती’ भी निकली जो चार-पांच वर्ष तक चली. इसके संपादक महेंद्र भटनागर थे. बाद में वेमूरि आंजनेय शर्मा भी इस पत्रिका के संपादक रहे. यह पत्रिका दक्षिण भारत के हिंदी साहित्यकारों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आरंभ की गई थी.

इन साहित्यिक पत्रिकाओं के अतिरिक्त इस काल में हैदराबाद से कई समाचारबहुल पत्र भी प्रकाशित हुए. डॉ.गोपाल शर्मा ने लिखा है कि साप्ताहिकों में ‘आर्यभानु’ और ‘संगम’ उल्लेखनीय पत्र हैं. ‘आर्यभानु’ का संपादन विनायक राव विद्यालंकार और कृष्णदत्त ने किया. वंदेमातरम रामचंद्रराव ने इस पत्र को जीवित रखने का भरसक प्रयास किया. शिवनंदन शास्त्री ने ‘संगम’ का प्रकाशन 28 अप्रैल 1958 को प्रारंभ किया. इस पत्र ने पाठकों को सुरुचिपूर्ण साहित्य दिया. “हैदराबाद के दैनिक पत्रों में ‘डेली हिंदी मिलाप’ को भी इस काल की प्रमुख उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए. ‘हिंदी मिलाप’ नाम से अखबार दिल्ली और जालंधर से भी निकलते थे. ‘मिलाप’ स्वतंत्रता से पूर्व ही हैदराबाद से प्रकाशित होने लगा था. स्वतंत्रता के पश्चात श्री युद्धवीर जी के संपादकत्व में इस पत्र ने अपनी पहचान भी बनाई और हिंदी प्रेमियों के बीच जगह भी. धीरे धीरे यह पत्र दैनिक आवश्यकता बन गया. ‘मिलाप’ के प्रकाशक की हैसियत से युद्धवीर जी ने अनेक नए पत्रकारों को अवसर दिया. बाहर से भी योग्य प्रतिभाओं को बुलाया और अवसर दिया. पं.दिवाकर पांडेय इस पत्र से जुड़े. सरदार हरनाम सिंह ‘प्रवासी’ ने इस पत्र में कार्य किया. श्री रवि श्रीवास्तव इस पत्र से जुड़े. ‘मिलाप’ जब कुछ दिनों के लिए बंद हो गया तो दिवाकर पांडेय ने प्रकाश भाई के साथ मिलकर ‘दैनिक विश्व वाणी’ का प्रकाशन किया. ‘विश्व वाणी’ के साथ डी.एस.सिंह ‘लाट’ भी जुड़े. ‘साथी’ के संपादन प्रकाशन में भी दिवाकर पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही.” (वही, पृ. 117). 

आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक नया मोड 1973 में तब उपस्थित हुआ जब 14 सितंबर 1973 (हिंदी दिवस) से मुनींद्र जी के संपादकत्व में ‘हैदराबाद समाचार’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. आगे चलकर इसका नाम ‘दक्षिण समाचार’ कर दिया गया. इस पत्र की पृष्ठभूमि में मुख्य रूप से दो लक्ष्य थे. एक तो यह कि हैदराबाद के हिंदी से जुड़े हुए लोगों को परस्पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा प्राप्त हो. आगे चलकर इसका क्षेत्र हैदराबाद से बढ़कर आंध्रप्रदेश और फिर दक्षिण भारत तथा अंततः पूरा भारत बन गया. दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुरूप हिंदी को भारत की सामासिक संस्कृति की वाहक भाषा के रूप में विकसित करना. हिंदी के विकास, भाषा की शुद्धता, साहित्य में घटित नई रचनात्मक प्रवृत्तियों की जानकारी और अंग्रेज़ी के विरोध तथा मानक हिंदी के प्रयोग को इस पत्र ने सदा आंदोलन के रूप में प्रसारित किया. इसके साथ ही इस साप्ताहिक पत्र ने हिंदी के लेखन को प्रोत्साहित करने और दक्षिण भारत भर में हो रहे लेखन से समस्त भारत को परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुनींद्र जी के निधन के बाद उनके पुत्र प्रफुल्ल कुमार तथा उनके बाद वर्तमान समय में नीरज कुमार ने भी इन्हीं नीतियों पर ‘दक्षिण समाचार’ को आगे बढ़ाया है. 

हिंदी अकादमी, हैदराबाद (1956) द्वारा कई वर्ष तक हस्तलिखित पत्रिका के रूप में प्रकाशित प्रसारित ‘संकल्य’ 1974 में विधिवत पंजीकरण के बाद मुद्रित मासिक पत्रिका के रूप में निकलने लगी. उस समय इसके संपादक मुधुसूदन चतुर्वेदी थे बाद में 1977 से बैजनाथ चतुर्वेदी के संपादकत्व में इसे साहित्यिक त्रैमासिक के रूप में भारत भर में ख्याति प्राप्त हुई. 

हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार और संवर्धन की दृष्टि से हैदराबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की आंध्र शाखा द्वारा प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ का योगदान उल्लेखनीय है. 1977 अप्रैल से प्रकाशित ‘पूर्णकुंभ’ के संपादन से दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र के सचिवों के रूप में कई बड़े हिंदी प्रचारकों के नाम जुड़े रहे हैं. परंतु इस पत्रिका ने 1997 से विशेष रूप से नया स्वरूप तब प्राप्त किया जब दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा क्रमशः संपादक और सह-संपादक के रूप में ‘पूर्णकुंभ’ से जुड़े तथा कविता, कहानी, लेख, समीक्षा आदि विविध विषयों के साथ साथ इसमें अनुवाद, भाषाविज्ञान और साहित्य की विशिष्ट विधाओं को प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया. इस अवधि में ‘पूर्णकुंभ’ के कई चर्चित विशेषांक भी निकले, यथा, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, शिवप्रसाद सिंह, नागार्जुन, नागेंद्र और रामविलास शर्मा पर केंद्रित विशेषांक. आगे चलकर अप्रैल 2003 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा – आंध्र की तेलुगु पत्रिका ‘स्रवंति’ और हिंदी पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ का परस्पर विलय करके उन्हें द्विभाषी साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ का रूप दे दिया गया जिसमें हिंदी और तेलुगु दोनों भाषाओं की सामग्री रहती है. सभा के सचिव इसके पदेन संपादक रहते हैं. सह-संपादक के रूप में नारायण राजु और मल्लसर्ज मंगोडी के बाद अगस्त 2008 से गुर्रमकोंडा नीरजा इस पत्रिका का संपादन कार्य देख रही हैं. हिंदी और तेलुगु की मौलिक और अनूदित सामग्री प्रस्तुत करने वाली यह पत्रिका जनवरी 2011 से इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. इस लघुकाय पत्रिका के कई विशेषांक भी विगत वर्षों में प्रकाशित और चर्चित हुए, जैसे राष्ट्रकवि दिनकर विशेषांक (मई 2009), उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य विशेषांक (फरवरी 2011), शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक (अप्रैल 2011), अज्ञेय जन्मशती विशेषांक – 1,2,3 (जून, जुलाई, अगस्त 2011), स्व.प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव अमृत वर्ष विशेषांक (अक्टूबर 2011), दूरस्थ शिक्षा पर एकाग्र (मार्च 2012), पुण्य स्मृति (परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, अमरकांत, राजेंद्र यादव और ओमप्रकाश वाल्मीकि) विशेषांक (2014) और मुक्तिबोध विशेषांक (2015). 

हिंदी प्रचार सभा (नामपल्ली, हैदराबाद) द्वारा 1977 से प्रकाशित मासिक ‘विवरण पत्रिका’ भी हिंदी भाषा और साहित्य के मुद्दों को समर्पित है. इसके संपादकों के रूप में पांडुरंग ढगे, शीलम वेंकटेश्वर राव, धोंडीराव जाधव और चंद्रदेव भगवंत राव कवडे ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. सहयोगी संपादक के रूप में सुरेश दत्त अवस्थी और अहिल्या मिश्र ने इसे साहित्यिक स्वरूप प्रदान करने के लिए पर्याप्त श्रम किया है. यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रतिष्ठान, हैदराबाद की पत्रिका ‘अग्रतारा’ का भी उल्लेख जरूरी है जिसने हिंदीतरभाषियों के लेखन को प्रमुखता से छापा. अनियतकालीन पत्रिका ‘राष्ट्रनायक’ 1963 से हरिश्चंद्र विद्यार्थी के संपादन में निकल रही है. इसके अलावा पुरुषोत्तम प्रशांत द्वारा प्रकाशित ‘काव्य वार्षिकी मध्यांतर’ ने अपने पांच अंक निकालकर देशभर के कवियों को हैदराबाद से जोड़ा. कहना न होगा कि इस अवधि (नवनिर्माण काल) में हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता ने चतुर्मुख विकास किया. पत्रकारिता पर चर्चाएँ भी आरंभ हुईं और शोध भी. पत्रकारीय लेखन के क्षेत्र में इस अवधि में नन्दकिशोर शर्मा (वेणु गोपाल), किशोरी लाल व्यास नीलकंठ, गोवर्धन ठाकुर, जे.वी.कुलकर्णी, विजय कुमार मलहोत्रा, मुरलीधर शर्मा, विजयराघव रेड्डी, मनोहर लाल व्यास, दुली चंद शशि (‘मुचकुंदा’ के संपादक वजन कवि), बजरंग राव बांगरे, नेहपाल सिंह वर्मा, अशोक मिश्र आदि कलमकार खास तौर से उभरकर सामने आए.

‘हिंदी पत्रकारिता : विविध आयाम’ (सं. वेदप्रताप वैदिक) में आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के मूल्यांकन के संदर्भ में डॉ.श्रीराम शर्मा ने 1976 में संकेत किया था कि आंध्रप्रदेश का तेलंगाना क्षेत्र आज एक ऐसे साप्ताहिक पत्र की प्रतीक्षा कर रहा है जो उसकी सांस्कृतिक और साहित्यिक आवश्यकता को पूरा कर सके. इस बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ.गोपाल शर्मा ने 2000 में लिखा कि “यूँ तो शर्मा जी के सामने ‘मिलाप’ भी था, ‘हैदराबाद समाचार’ भी और आंध्रप्रदेश सरकार का ‘आंध्रप्रदेश’ भी, आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी का ‘संकल्य’ भी, फिर भी वे एक बेहतर पत्र चाहते थे. इस पत्र की चाह शर्मा जी के जीवन काल में पूरी न हो सकी. नवनिर्माण काल में ‘स्वतंत्र वार्ता’ (1996 से आरंभ) ने बहुत हद तक इस चाह को पूरा किया. इस पत्र के प्रकाशन ने दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता को बहुआयामी बनाया. (1996 से मार्च 2012 तक) इसके संपादक के रूप में डॉ.राधेश्याम शुक्ल दक्षिण के लेखकों एवं पाठकों को ऐसा मंच प्रदान करने में समर्थ हुए जिसकी आवश्यकता थी. उनके द्वारा संपादित ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक किसी भी राष्ट्रीय पत्र के समकक्ष बड़े गर्व के साथ रखे जाने योग्य पत्र के रूप में स्थापित हुआ तथा स्थानीय लेखकों एवं पत्रकारों को अपनी पहचान बनाने का एक और मौक़ा मिला.” 

1999 से हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान काल आरंभ माना जा सकता है. नवंबर 1999 से यहाँ से गोविंद अक्षय के संपादन में कविता प्रधान मासिक ‘गोलकोंडा दर्पण’ का प्रकाशन आरंभ हुआ जिसे आरंभ से ही ऋषभ देव शर्मा, गोपाल शर्मा, नेहपालसिंह वर्मा, कविता वाचक्नवी, अमृत मेहता, पूर्णिमा शर्मा, दिलीप सिंह, वेणु गोपाल और भगवान दास जोपट जैसे स्थायी स्तंभकारों के लेखन ने अलग पहचान दी. लगभग इसी समय 2000 ईस्वी से ‘संकल्य’ ने भी अपने नए रूपाकार में वसंत चक्रवर्ती के प्रधान संपादकत्व में आलोचना प्रधान त्रैमासिक के रूप में नया अवतार लिया. इसे भी ऋषभ देव शर्मा और शुभदा वांजपे जैसे संपादकों ने देश भर में प्रतिष्ठा अर्जित करने में सहयोग दिया. चक्रवर्ती जी के निधन के पश्चात 2003 से टी.मोहन सिंह इसके संपादक हैं. हिंदी अकादमी, हैदराबाद के सचीव के रूप में गोरखनाथ तिवारी इसके प्रकाशक हैं. विगत दस वर्षों में ‘संकल्य’ हैदराबाद की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका बन गई है. इसके महादेवी वर्मा (2002), प्रेमचंद (2005,2006), दिनकर (2008), बच्चन (2009), आदिवासी विमर्श (2010) और जन्मशती (2011-12) विशेषांक देश भर में साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित हुए हैं. 

हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता के संवर्धन में महिला पत्रकारों का योगदान भी अविस्मरणीय है. सीता युद्धवीर, विपमा वीर, नरेश बंसल, अहिल्या मिश्र, कमला रानी संघी, सरोज बजाज, मुखविंदर कौर, कविता वाचक्नवी, गुर्रमकोंडा नीरजा, रमा द्विवेदी, प्रतिभा गर्ग आदि ने संपादन, और स्तंभ लेखन को सुपारिभाषित स्त्री-स्पर्श प्रदान किया है. यहाँ अहिल्या मिश्र के प्रधान संपादकत्व में प्रकाशित अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका ‘पुष्पक’ का उल्लेख भी आवश्यक है जिसके विगत पंद्रह वर्ष में 20 अंक प्रकाशित हो चुके हैं. कृष्णकुमार गोस्वामी, दिलीप सिंह, ऋषभ देव शर्मा, रमा द्विवेदी और लक्ष्मी नारायण अग्रवाल आदि के परामर्श और संपादन में ‘पुष्पक’ ने विविध विधाओं की साहित्यिक पत्रिका के रूप में दक्षिण भारत के हिंदी रचनाकारों को तो अखिल भारतीय मंच प्रदान किया ही है, देश भर के अनेक नए-पुराने रचनाकारों को भी दक्षिण में परिचित कराया है.

आंध्रप्रदेश भर में फैले हुए केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों और उपक्रमों के राजभाषा विभागों से अनेक हिंदी पत्रिकाएँ गृह पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती हैं. इनमें यों तो अपने अपने विभाग की सूचनाएँ और गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं तथापि इनमें से कुछ राजभाषा पत्रिकाओं ने तकनीकी लेखन की दृष्टि से राजभाषा विभागों के बाहर भी अपना वैशिष्ट्य प्रमाणित किया है. जैसे सीसीएमबी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘जिज्ञासा’, एनजीआरआई, हैदराबाद से प्रकाशित ‘वसुंधरा’, एनएमडीसी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘खनिज भारती’, एनआईआरडी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘ग्रामीण विकास समीक्षा’ और बीडीएल, हैदराबाद से प्रकाशित ‘पथिक’ आदि. 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आंध्रप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता का उदय यद्यपि अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में हुआ था परंतु स्वातंत्र्योत्तर काल में इस हिंदीतर राज्य में निरंतर बढ़ती हुई हिंदी की स्वीकार्यता ने हिंदी पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया और दैनिक समाचार पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता तथा राजभाषा पत्रकारिता के विविध क्षेत्रों में आज राज्य की राजधानी हैदराबाद के अलावा विजयवाडा और विशाखपट्टनम से भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक प्रकाशन हो रहा है. उल्लेखनीय है कि लोगों की सामाजिक-राजनैतिक जागरूकता तथा साहित्यिक अभिरुचि के निर्माण और परिष्कार में हिंदी की इन पत्र-पत्रिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा भारत की राष्ट्रभाषा-राजभाषा-संपर्कभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा में अपना-अपना योगदान दिया है.