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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

तेलुगु साहित्य : 2017 : एक सर्वेक्षण

आधुनिक तेलुगु साहित्य अपने आरंभिक काल से ही सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत चेतना संपन्न साहित्य रहा है। समकाल की धड़कनों को समझने और अंकित करने विभिन्न विधाओं के माध्यम से तेलुगु साहित्यकार भारत में अग्रणी रहे हैं। अपनी इस सामाजिक-राजनैतिक संचेतना के कारण आज का साहित्यकार इस बात से अत्यंत विचलित प्रतीत होता है कि इक्कीसवीं सदी में भी जाति और वर्ण के नाम पर समाज में अराजकता और अमानुषिकता का बोलबाला है। समकालीन साहित्यकार इन विसंगतियों की ओर ध्यान केंद्रित कर रहा है। यही कारण है कि 2017 में तेलुगु साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और अल्पसंख्यक विमर्श से संबंधित स्वानुभूति पर आधारित अत्यंत महत्वपूर्ण रचनाएँ सामने आई हैं। 

यद्यपि दलित विमर्श का प्रचलन बहुत बाद का है तथापि यह तथ्य उल्लेखनीय है कि ‘माकोद्दु नल्ल दोरतनम’ (हमें नहीं चाहिए ये काले अंग्रेज़) के कवि के रूप में प्रसिद्ध कुसुम धर्मन्ना (1900-1946) तेलुगु के प्रथम दलित कवि थे जिन्होंने वर्ण व्यवस्था का खंडन किया था। वे ‘जयभेरी’ के संपादक भी थे। आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए संघर्ष किया। उन्होंने ‘हरिजन शतक’, ‘नल्ल दोरतनम’ (काले अंग्रेज़), ‘निम्नजाति तरंगिणी’, ‘मद्यपान निषेधम’ (शराब निषेध), ‘अंटरानिवाल्लम’ (छुआछूत) आदि कविता और निबंध संग्रहों के माध्यम से जनता को चेताया था। अब मद्दुकूरि, पुट्ल हेमलता और अन्य ने कुसुम धर्मन्ना के संपूर्ण साहित्य को ‘कुसुम धर्मन्ना रचनलु’ (कुसुम धर्मन्ना की रचनाएँ) नाम से सात खंडों में संपादित किया है। 

तेलुगु साहित्य में शिखामणि के नाम से प्रसिद्ध कवि और आलोचक डॉ. कर्रि संजीव राव ने दलित विमर्श से संबंधित अनेक काव्य संग्रह और आलोचना ग्रंथों की रचना की है। उनके कविता संग्रह ‘चूपुडुवेलु पाडे पाटा’ (तर्जनी के गीत) में संकलित कविताओं का मुख्य स्वर दलित की व्यथा-कथा है। 

‘दग्धम कथलु’ (दग्ध कथाएँ) शीर्षक कहानी संग्रह में बूतम मुत्यालु ने दलितों के मानवाधिकारों के हनन का हृदयस्पर्शी चित्रण किया है। ‘जालि’ (दया) शीर्षक कहानी में दलित समुदाय में मानव संबंधों की गरिमा का अंकन किया गया है। ‘मीना’ शीर्षक कहानी दलित बाल मजदूर की आशाओं एवं आकांक्षाओं की कहानी है। पर-स्त्री के कारण पति अपनी पत्नी की हत्या करता है। ऐसे पिता के प्रति प्रतीकार की भावना से पीड़ित पुत्र की कहानी है ‘दग्धम’ (दग्ध)। बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से यह कहानी उल्लेखनीय है। धर्म और अंधविश्वासों के नाम पर दलितों पर होने वाले अत्याचारों का पर्दाफाश करने वाली कहानी है बलिमर्मम (बली का मर्म)। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस कहानी संग्रह में संकलित कहानियों में दबे हुए और कुचले हुए व्यक्ति की पीड़ा निहित है। 

धर्म की आड़ में ढोंगी बाबाओं का राज्य चल रहा है। राजनैतिक दल-बल से जनता के विश्वास को लूटकर कुछ धोखेबाज़ अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं और दिगंबर पूजा के नाम पर अविवाहित स्त्रियों की अस्मत लूट रहे हैं। मोलकपल्लि कोटेश्वर राव ने अपने उपन्यास ‘स्वामुलोरु’ (स्वामीजी) में ऐसे धोखेबाज़ों का पर्दाफाश करते हुए भक्ति और अंधविश्वास के अंतर को स्पष्ट किया है। धर्म, वर्ग, वर्ण, जाति, लिंग, प्रांत आदि के भेदभाव के कारण होने वाले मनुष्य के शोषण का चित्रण अनवर के कहानी संग्रह ‘बकरी’ में सम्मिलित कहानियों में प्रभावी ढंग से किया गया है। अल्पसंख्यक विमर्श की दृष्टि से ये कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। 

आज भी भारत के अन्य प्रांतों की भाँति तेलुगु भाषी राज्यों में भी बाल मजदूरी प्रथा विद्यमान है। यह भारतीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर कलंक की तरह है। भारत सरकार ने बाल श्रम के उन्मूलन के लिए अनेक सकारात्मक कदम उठाए हैं, लेकिन आज तक भी बाल मजदूरी को रोक पाना संभव नहीं हो पाया है। आर. शशिकला के कहानी संग्रह ‘माँ तुझे सलाम’ में बाल श्रम, बाल शोषण और बाल मानवाधिकारों से संबंधित मार्मिक कहानियाँ संकलित हैं। ‘चिट्टी चिट्टी मिरियालु’ (छोटी छोटी काली मिर्च) शीर्षक कविता संग्रह में पालपर्ती इंद्राणी ने बाल कविताओं के माध्यम से जीवन मूल्यों को उकेरा है। 

तेलुगु साहित्यकार जहाँ एक ओर मानवाधिकारों की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर अपनी संस्कृति को भी उजागर करते हैं। उदयमित्र के कहानी संग्रह ‘दोसेडु पल्लीलु’ (मुट्ठी भर मूँगफली) में संकलित 17 कहानियों में तेलंगाना की सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों का मार्मिक अंकन देखा जा सकता है। इन कहानियों में स्त्री शोषण और संघर्ष के विविध आयाम भी बखूबी उभरे हैं। तेलंगाना के भीमदेवरपल्लि मंडल के आंदोलन के इतिहास को डॉ. एरुकोंडा नरसिंहस्वामि और डेगल सूरय्या ने ‘मा पोराटम : भीमदेवरपल्लि मंडल उद्यम चरित्र’ (हमारा आंदोलन : भीमदेवरपल्लि मंडल के आंदोलन का इतिहास) शीर्षक कृति में विस्तार से विवेचित किया है। इसी प्रकार मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत के. बालगोपाल ने अपने निबंध संग्रह ‘नक्सलइट उद्यमम : वेलुगु नीडलु (नक्सलइट आंदोलन : प्रकाश और परछाई) में 40 निबंधों तथा एक साक्षात्कार के माध्यम से तेलंगाना क्षेत्र के नक्सलइट आंदोलन के भविष्य और उससे संबंधित अनेक मुद्दों पर वैचारिक मंथन किया है। 

तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान है बतुकम्मा। 2014 से यह त्योहार राजकीय लोकपर्व के रूप में मनाया जाने लगा है। इस देवी पूजन से संबंधित अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। कूतुरु रामरेड्डी के कहानी संग्रह ‘बतुकम्मा कथला संपुटि’ (बतुकम्मा कहानियों का संग्रह) में सम्मिलित 18 कहानियों में बतुकम्मा से संबंधित लोककथाओं के साथ-साथ तेलंगाना आंदोलन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और मद्य निषेध आंदोलन आदि का चित्रण है। सुरवरम प्रताप रेड्डी के संपादन में प्रकाशित ‘गोलकोंडा’ पत्रिका में तेलुगु साहित्य और संस्कृति के साथ-साथ सामाजिक और राजनैतिक चेतना, तेलंगाना के परिवेश और संस्कृति से ओत-प्रोत कहानियाँ प्रकाशित हुईं थीं। इनमें से 52 कहानियों को यामिजाल आनंद ने ‘गोलकोंडा पत्रिका कथलु’ (गोलकोंडा पत्रिका की कहानियाँ) शीर्षक से संकलित किया है। आचार्य एस.वी. रामाराव की कृति ‘तेलंगाना सांस्कृतिक वैभवम’ (तेलंगाना का सांस्कृतिक वैभव) में तेलंगाना संस्कृति की विशेषताओं का वर्णन है। आमगोत वेंकट पवार ने ‘मरो लदणि’ (दूसरा लदणि) में बंजारा संस्कृति का चित्रण किया है। उल्लेखनीय है कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तेलुगु भाषा के अलग-अलग रूपों का प्रचलन है। यहाँ तक कि पृथक तेलंगाना राज्य की माँग के पीछे निहित कई कारणों में से एक कारण इस क्षेत्र की तेलुगू की निजता की प्रतिष्ठा की माँग भी थी। इस संदर्भ में डॉ. कालुव मल्लय्या का ‘तेलंगाना भाषा, चदुवला तल्लि’ (तेलंगाना की भाषा, ज्ञान की देवी) शीर्षक निबंध संग्रह उल्लेखनीय है। 

समकालीन तेलुगु साहित्यकारों ने निम्न और मध्यवर्गीय जीवन शैली और समाज-आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों को अंकित करने के लिए कथा साहित्य को माध्यम बनाया है। गुंडु सुब्रह्मण्य दीक्षितुलु के ‘अम्मा अज्ञानम’ (माँ का अज्ञान), गुडिपाटि कनकदुर्गा कृत ‘अनुबंधालु-आत्मीयुलु’ (सहयोगी-आत्मीयजन), डॉ. वी. आर. रासानी कृत ‘मुल्लुगर्रा’ (काँटों की छड़ी) शीर्षक कहानी संग्रहों में आम आदमी की कथा अंकित है। आज व्यक्ति भीड़ में भी अकेला होता जा रहा है। संबंध विच्छेद हो रहे हैं। वैवाहिक संबंधों में दरारें आ रही हैं। सुखी दांपत्य जीवन के लिए पति-पत्नी के बीच समंजस्य की आवश्यकता होती है। सफल वैवाहिक जीवन के लिए आवश्यक जानकारियाँ डॉ. गोडवर्ती सत्यमूर्ति के निबंध संग्रह ‘विवाहालु-विभेदालु’ (विवाह-विभेद) में सम्मिलित हैं। 

माइग्रेशन के कारण उत्पन्न सांस्कृतिक संक्रमण और समाज-आर्थिक विसंगतियों का चित्रण के. सदाशिव राव के ‘क्रासरोड्स’ शीर्षक कहानी संग्रह में सम्मिलित कहानियों में देखा जा सकता है। उन्होंने वैज्ञानिक फिक्शन के आधार पर कहानियाँ बुनी है जो ‘आत्माफैक्टर’ शीर्षक संग्रह में सम्मिलित हैं। 

विरिंची नाम से प्रसिद्ध तेल्लाप्रगडा गोपाल कृष्ण के कहानी संग्रह ‘सहनाववुतु’ में शामिल 24 कहानियों में मध्यवर्गीय मानसिकता, मध्यवर्ग की जीवन शैली, सामाजिक विसंगतियाँ, आर्थिक संकट, स्त्री शोषण और पुरुष मानसिकता से त्रस्त स्त्री का चित्रण है। 

बुनकरों पर केंद्रित साहित्य कम देखने को मिलता है। बुनकरों की जीवन शैली, उनकी परंपरागत कला, आर्थिक संकट आदि को कथावस्तु बनाकर रचित 58 कहानियों को डॉ. मेडिकुर्ति ओबुलेसु, वेल्लंदि श्रीधर और सिंगिशेट्टि श्रीनिवास ने ‘पडुगु पेकलु’ (ताना-बाना) शीर्षक से संकलित किया है। 

रजक (धोबी) जाति का मुख्य कार्य कपड़े धोना, रंगना और इस्त्री करना है। आंध्र प्रदेश के मेडुलमिट्टा नामक स्थान के रजकों की जीवन शैली, आर्थिक और सामाजिक स्थिति, संस्कृति और विभिन्न संस्कारों को विंजमूरि मस्तानबाबु ने अपनी कहानियों की विषयवस्तु बनाया है। इन कहानियों को ‘मेडुलमिट्टा कथलु’ (मेडुलमिट्टा की कहानियाँ) शीर्षक संग्रह के रूप में प्रकाशित किया गया है। 

विकास के नाम पर मनुष्य विनाश कर रहा है। प्रकृति का दोहन कर रहा है। उर्वर कृषि मैदानों की छाती पर कंक्रीट भवनों का निर्माण कर रहा है। झोंपड़पट्टियों में रहने वालों की स्थिति और भी दयनीय है। यदि ऐसी ही स्थिति रहेगी तो भविष्य में जल, जमीन और जंगल की अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। सलीम ने अपने कहानी संग्रह ‘नीटिपुट्टा’ (पानी का बिल) में इन स्थितियों को उजागर किया है और यह आशा व्यक्त की है कि भविष्य में मनुष्य कंक्रीट जंगलों को ध्वस्त करके कृषि प्रधान भूमि निर्मित करेगा। 

समकालीन समाज में व्याप्त सामाजिक एवं राजनैतिक विद्रूपताओं पर प्रहार करने के लिए साहित्यकार हास्य-व्यंग्य का सहारा ले रहा है क्योंकि व्यंग्य पाठक को गुदगुदाने के साथ-साथ सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विसंगतियों के उद्घाटन द्वारा पाठक को विचलित करता है। तेलुगु के हास्य-व्यंग्य लेखक यासीन ने अपनी व्यंग्य कृति ‘हा... हा... कारालु’ (हाहाकार) में सामाजिक एवं राजनैतिक विद्रूपताओं का पर्दाफाश करने के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्य संक्रमण को भी उजागर किया है। हास्यब्रह्म शंकरनारायण ने ‘इंगलीशुकु तल्लि तेलुगु?!’(इंगलिश की जननी तेलुगु?!) में उदाहरणों के साथ यह कहा है कि तेलुगु के शब्दों को तोड़ मरोड़कर अंग्रेजी में प्रयोग किया जा रहा है। उदाहरण के लिए तेलुगु शब्द ‘मनिषी’ (मनुष्य) को तोड़ने से अंग्रेजी के शब्द बनते हैं – ‘मनी’ और ‘शी’। शंकर नारायण की एक और हास्य कृति है ‘तीपिगुर्तुलु’ (मीठी स्मृतियाँ)। 

यात्रा साहित्य में मुत्तेवि रवींद्रनाथ कृत ‘मा कश्मीर यात्रा’ (हमारी कश्मीर यात्रा), जीवनी साहित्य में सी. भवानी देवी कृत ऊटुकूरि लक्ष्मीकास्तम्मा, संजय किशोर कृत फिल्म अभिनेता अक्किनेनी नागेशवरराव के जीवन पर आधारित ‘मना अक्किनेनी’ (हमारा अक्किनेनी), कूनपराजु कुमार कृत फिल्म के हास्य-व्यंग्य कलाकार एम.एस. नारायण की जीवनी, वेंकट सिद्दारेड्डी कृत सिनेमा का आलोचनात्मक संग्रह ‘सिनीमा ओका आल्केमी’ (सिनेमा एक आल्केमी), डॉ. के. किरण कुमार कृत ‘जी.एस.टी. गाइड’, ममता वेणु के काव्य संग्रह ‘मल्लेचेट्टु चौरस्ता’ (चमेली का चौराहा), श्रीनागास्त्र के काव्य संग्रह ‘गायपड्डा गुंडे भाषा’ (घायल हृदय की भाषा) आदि विभिन्न विधाओं की कृतियाँ सामने आई हैं। वांड्रंगी कोंडल राव कृत ‘ऊरु-पेरु : आंध्र प्रदेश’ (गाँव-नाम : आंध्र प्रदेश) में आंध्र के 13 जिले के कुछ चयनित गाँव और शहरों के नाम, स्थान विशेष की जानकारी, ऐतिहासिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत आदि सम्मिलित हैं। यह पुस्तक क्षेत्र कार्य पर आधारित है। विन्नकोटा रविशंकर कृत आलोचनात्मक कृति ‘कवित्वमलो नेनु’ (कविता में मैं) में कोकानी, श्रीश्री जैसे प्रतिष्ठित कवियों के विचार और उनसे से जुड़ी स्मृतयों को सँजोया गया है। 

तेलुगु साहित्य में मौलिक लेखन के साथ-साथ अनुवाद का कार्य भी चल रहा है। अष्टम अनुसूची में उल्लिखित 22 भारतीय भाषाओं की प्रमुख कहानियों को तेलुगु में अनूदित करके काकानी चक्रपाणि ने ‘भारतीय कथा भारती’ नामक महाकाय ग्रंथ में सम्मिलित किया है। कहानी के साथ-साथ मूल लेखक का परिचय भी सम्मिलित है। अनुवादों के माध्यम से भारत की सामासिक संस्कृति को अक्षुण्ण रखा जा सकता है। 

वर्ण व्यवस्था आज भी समाज में व्याप्त है। पश्चिमी तमिलनाडु के कोंगुनाडु में स्थिति तोलूर गाँव में दो प्रेमियों को जाति के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया। इसका सशक्त चित्रण पेरुमाल मुरुगन ने अपने तमिल उपन्यास ‘पूकुलि’ में किया है। के. सुरेश ने तेलुगु में ‘चिति’ (चिता) शीर्षक से इसका अनुवाद किया है। इसमें मजदूर शोषण और स्त्री शोषण को भी दर्शाया गया है। इसमें शोषण के प्रसंग अत्यंत मार्मिक बन पड़े हैं जो पाठक की चेतना को झकझोरती हैं। 

कोलूरि सोमशंकर ने हिंदी, उर्दू, बांग्ला और अंग्रेजी की कहानियों को तेलुगु में रूपांतरित करके ‘नान्ना तोंदरगा वच्चेई’ (पापा जल्दी आ जाना) शीर्षक कहानी संग्रह में प्रकाशित किया है। अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी पर आधारित विजय त्रिवेदी की कृति ‘हार नहीं मानूँगा’ का आचार्य यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद ने ‘वोटमिनि अंगीकरिंचनु’ के रूप में रूपांतरित किया है। नगराजु रामस्वामी ने ‘ई पुडमि कवित्वम आगदु : जॉन कीट्स कविता वैभवम’ (इस धरती की कविता रुकेगी नहीं : जॉन कीट्स का काव्य वैभव) के रूप में जॉन कीट्स की कविताओं का काव्यानुवाद प्रस्तुत किया है। के. सदाशिवराव ने ‘काव्य कला’ शीर्षक से स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, अफ्रीका, हंगेरी, क्यूबा और रूस की कविताओं का काव्यानुवाद प्रस्तुत किया है। 

उपर्युक्त सर्वेक्षण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्ष 2017 में तेलुगु साहित्यकारों की दृष्टि मुख्य रूप से हाशियाकृत समूहों और हाशियाकृत प्रश्नों पर केंद्रित रही। यदि यह कहा जाए कि इस वर्ष सभी विधाएँ हाशिए पर फोकस रहीं तो अनुचित न होगा। इस वर्ष विभिन्न विधाओं की कृतियों में दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक, उपेक्षित श्रमिक, बालक, किसान और पारिस्थितिकी से जुड़े प्रश्न मुख्य विषयवस्तु बनते दिखाई दिए। यह तेलुगु साहित्य की सटीक समकालीनता का ज्वलंत प्रमाण है। 

संदर्भ  
[1] कुसुम धर्मन्ना रचनलु (कुसुम धर्मन्ना की रचनाएँ)/ (सं) मद्दुकूरि, पुट्ल हेमलता और अन्य/ प्रजाशक्ति पब्लिकेशन्स 

[2] चूपुडुवेलु पाडे पाटा (तर्जनी के गीत)/ शिखामणि/ मूल्य : रु. 150/ नवोदया बुक हाउस, हैदराबाद 
दग्धम कथलु (दग्ध कथाएँ)/ बूतम मुत्यालु/ पृष्ठ 116/ मूल्य : रु. 80 

[3] स्वामुलोरु (स्वामीजी)/ मोलकपल्लि कोटेश्वर राव/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 120/ विशालांध्रा पब्लिशिंग हाउस, विजयवाडा 

[4] बकरी/ अनवर/ पृष्ठ 140/ मूल्य रु. 80 

[5] माँ तुझे सलाम/ आर. शशिकला/ पृष्ठ 104/ मूल्य रु. 60 
[6] चिट्टी चिट्टी मिरियालु (छोटी छोटी काली मिर्च)/ पालपर्ती इंद्राणी/ पृष्ठ 80/ मूल्य : रु. 50/ जे. आई. पब्लिकेशन्स 

[7] दोसेडु पल्लीलु (मुट्ठी भर मूँगफली)/ उदयमित्र/ पृष्ठ 175/ मूल्य : रु. 120 

[8] मा पोराटम : भीमदेवरपल्लि मंडल उद्यम चरित्र (हमारा आंदोलन : भीमदेवरपल्लि मंडल के आंदोलन का इतिहास)/ एरुकोंडा नरसिंहस्वामि, डेगल सूरय्या/ पृष्ठ 264/ मूल्य : रु. 200 

[9] नक्सलइट उद्यमम : वेलुगु नीडलु (नक्सलइट आंदोलन : प्रकाश और परछाई)/ के. बालगोपाल/ पृष्ठ 306/ मूल्य : रु. 200 

[10] बतुकम्मा कथला संपुटि (बतुकम्मा की कहानियों का संग्रह)/ कूतुरु रामरेड्डी/ पृष्ठ 180/ मूल्य : रु. 120 

[11] गोलकोंडा पत्रिका कथलु (गोलकोंडा पत्रिका की कहानियाँ)/ (सं) यामिजाल आनंद/ पृष्ठ 252/ मूल्य : रु. 190 

[12] तेलंगाना सांस्कृतिक वैभवम (तेलंगाना संस्कृति का वैभव)/ आचार्य एस.वी. रामाराव/ पृष्ठ 252/ मूल्य : रु. 252 

[13] मरो लदणि (दूसरा लदणि)/ आमगोत वेंकट पवार/ पृष्ठ 149/ मूल्य : रु. 100 

[14] तेलंगाना भाषा, चदुवला तल्लि (तेलंगाना की भाषा, ज्ञान की देवी)/ कालुव मल्लय्या/ पृष्ठ 106/ मूल्य : रु. 100 

[15] अम्मा अज्ञानम (माँ का अज्ञान)/ गुंडु सुब्रह्मण्य दीक्षितुलु/ पृष्ठ 248/ मूल्य : रु. 125 

[16] अनुबंधालु-आत्मीयुलु (सहयोगी-आत्मीयजन)/ गुडिपाटि कनकदुर्गा/ पृष्ठ 251/ मूल्य अंकित नहीं 

[17] मुल्लुगर्रा (काँटों की छड़ी)/ डॉ. वी. आर. रासानी/ पृष्ठ 252/ मूल्य : 170 

[18] विवाहालु-विभेदालु (विवाह-विभेद)/ डॉ. गोडवर्ती सत्यमूर्ति/ पृष्ठ 219/ मूल्य : रु. 150 

[19] क्रासरोड्स/ के. सदाशिव राव/ पृष्ठ 152/ मूल्य : रु. 75 

[20] आत्माफैक्टर/ के. सदाशिव राव/ पृष्ठ 480/ मूल्य : रु. 250 

[21] सहानाभवुतु/ विरिंची/ पृष्ठ 264/ मूल्य : रु. 150 

[22] पडुगु पेकलु (ताना-बाना)/ (सं) मेडिकुर्ति ओबुलेसु, वेल्लंदि श्रीधर और सिंगिशेट्टि श्रीनिवास/ पृष्ठ 568/ मूल्य : रु. 300 

[23] मेडुलमिट्टा कथलु’ (मेडुलमिट्टा की कहानियाँ)/ विंजमूरि मस्तानबाबु/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 50 

[24] नीटिपुट्टा (पानी का बिल)/ सलीम/ पृष्ठ 184/ मूल्य : रु. 150 

[25] हा... हा... कारालु (हाहाकार)/ यासीन/ पृष्ठ 206/ मूल्य : रु. 160 

[26] ‘इंगलीशुकु तल्लि तेलुगु?!’(इंगलिश की जननी तेलुगु?!)/ हास्यब्रह्म शंकरनारायण/ पृष्ठ 186/ मूल्य : रु. 144 

[27] तीपिगुर्तुलु’ (मीठी स्मृतियाँ)/ हास्यब्रह्म शंकरनारायण/ पृष्ठ 200/ मूल्य : रु. 150 

[28] मा कश्मीर यात्रा (हमारी कश्मीर यात्रा)/ मुत्तेवि रवींद्रनाथ/ पृष्ठ 216/ मूल्य : रु. 250 

[29] ऊटुकूरि लक्ष्मीकास्तम्मा/ सी. भवानी देवी/ पृष्ठ : 132/ मूल्य : रु. 50/ साहित्य अकादमी 

[30] मना अक्किनेनी (हमारा अक्किनेनी)/ संजय किशोर/ पृष्ठ 335/ मूल्य : रु. 2000 

[31] एम.एस. नारायण जीवित कथा (एम.एस. नारायण की जीवनी)/ कूनपराजु कुमार/ पृष्ठ 208/ मूल्य : रु. 175 

[32] सिनीमा ओका आल्केमी (सिनेमा एक आल्केमी)/ वेंकट सिद्दारेड्डी/ पृष्ठ 272/ मूल्य : रु. 130 

[33] जी.एस.टी. गाइड/ डॉ. के. किरण कुमार/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 125 

[34] मल्लेचेट्टु चौरस्ता (चमेली का चौराहा)/ ममता वेणु/ पृष्ठ 100/ मूल्य अंकित नहीं 

[35] गायपड्डा गुंडे भाषा (घायल हृदय की भाषा)/ श्रीनागास्त्र/ पृष्ठ 132/ मूल्य : 100 

[36] ऊरु-पेरु : आंध्र प्रदेश (गाँव-नाम : आंध्र प्रदेश)/ वांड्रंगी कोंडल राव/ पृष्ठ 280/ मूल्य : रु. 100 

[37] कवित्वमलो नेनु (कविता में मैं)/ विन्नकोट रविशंकर/ पृष्ठ 275/ मूल्य : रु. 100 

[38] भारतीय कथा भारती/ (अनुवाद) काकानी चक्रपाणि/ पृष्ठ 800/ मूल्य : रु. 400 

[39] चिति (चिता)/ (अनुवाद) के. सुरेश/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 100 

[40] नान्ना तोंदरगा वच्चेई (पापा जल्दी आ जाना)/ कोलूरि सोमशंकर/ पृष्ठ 66/ मूल्य : 80 

[41] वोटमिनि अंगीकरिंचनु : अटलबिहारी वाजपेयी जीवन गाथा (हार नहीं मानूँगा : अटलबिहारी वाजपेयी जीवन गाथा)/ यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद/ पृष्ठ 420/ मूल्य : 399 

[42] ई पुडमि कवित्वम आगदु : जॉन कीट्स कविता वैभवम (इस धरती की कविता रुकेगी नहीं : जॉन कीट्स का काव्य वैभव)/ नगराजु रामस्वामी 

[43] काव्य कला/ के. सदाशिवराव/ पृष्ठ 308/ मूल्य : रु. 150 

मंगलवार, 21 मई 2019

तेलुगु साहित्य 2016 : एक सर्वेक्षण

2016 में तेलुगु साहित्य की विभिन्न विधाओं में प्रभूत लेखन सामने आया। पाठकीय रुझान की दृष्टि से कथा साहित्य केंद्रीय विधा बना हुआ है। संस्मरण और आत्मकथा भी तेलुगु के लेखकों और पाठकों की प्रिय विधाएँ हैं। इस वर्ष भी इन विधाओं में रोचक कृतियाँ सामने आईं। समीक्षा और फिल्म विषयक लेखन के साथ ही मीडिया के प्रभाव विषयक पुस्तकें भी पर्याप्त चर्चित रहीं। 

यह निर्विवाद सत्य है कि संपूर्ण भारतवर्ष में लोककथा की अत्यंत समृद्ध परंपरा रही है। लोककथाएँ लोक के कंठ से फूटती हैं और उनमें संवेदनाओं के साथ-साथ सृजनात्मकता का सम्मिश्रण होता है। इन्हीं लोककथाओं से प्रेरित होकर मनुष्य कहानियों को अक्षरबद्ध करने लगा ताकि यह संपदा पीढ़ी दर पीढ़ी अक्षुण्ण रहे। ‘टी तोटला आदिवासुलु चेप्पिना कथलु’ (चाय बागान के आदिवासियों की कथाएँ)[1] शीर्षक कहानी संग्रह में संकलित 16 कहानियाँ दार्जिलिंग के चाय बागान में कार्यरत आदिवासियों द्वारा कही गई लोककथाएँ हैं। सामान्या ने इन लोककथाओं को अक्षरबद्ध किया है ताकि यह विरासत लुप्त न हो जाए। इन कहानियों के माध्यम से आदिवासी जीवनशैली, रीति-रिवाज, संस्कार आदि के संबंध में जानकारी उपलब्ध होती है। आज उत्तर आधुनिक संदर्भ में आदिवासियों को केंद्र में रखकर कहानियाँ एवं उपन्यास लिखे जा रहे हैं, शोधकार्य कार्य हो रहे हैं और आलोचनात्मक ग्रंथ पाठकों के सामने आ रहे हैं। इस दृष्टि से बालगोपाल कृत ‘आदिवासुलु : वैद्यम, संस्कृति, अनचिवेता’ (आदिवासी : चिकित्सा, संस्कृति और दमन)[2], ‘आदिवासुलु : चट्टालु, अभिवृद्धि’ (आदिवासी : न्याय और अभिवृद्धि)[3] उल्लेखनीय हैं। 

आज के साहित्यकार अपने चारों ओर निहित परिवेश से कथासूत्र ग्रहण करते हैं और थोड़ा बहुत कल्पना के योग से कहानी बुनते हैं। कोम्मिशेट्टि मोहन कृत ‘पूला परिमलम’ (फूलों की सुगंध)[4] शीर्षक कहानी संग्रह में कुल 12 कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों में मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ-साथ निम्नवर्ग के लोगों की समस्याओं का चित्रण भी है। इन कहानियों को पढ़ते समय पाठक को ऐसा लगता है कि वह इन पात्रों से भलीभाँति परिचित है। इस संग्रह में संकलित कहानी ‘वाग्दानम’ (वादा) में कहानीकार ने यह दर्शाया है कि शराब के शिकंजे में फँसे हुए व्यक्ति के परिवार को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। पार्वतम्मा का पति शिवय्या शराबी है। इस आदत से छुटकारा दिलाने के लिए वह प्रयत्न करती है। पति के व्यसन से त्रस्त पार्वतम्मा पति को कोसती रहती है, गुस्से में आकर पीटती भी है। लेकिन शराबी पति शराब छोड़ने का नाम नहीं लेता, तो वह प्यार से समझाती है कि उसके स्वास्थ्य के लिए शराब हानिकारक है। पत्नी का दिल रखने के लिए वह शराब छोड़ने का नाटक करता है। इतने में सरकार घोषणा करती है कि शराब पर रोक लगाई जा रहा है। यह सुनकर शिवय्या अपने आपको रोक नहीं पाता और भगवान की मनौती हेतु रखे हुए पैसों को लेकर शराब पीने चला जाता है यह कहकर कि इसके बाद गलती से भी वह कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाएगा। शिवय्या रात को नशे में घर आता है और सुबह मृत पाया जाता है। कहानी का अंत पत्नी के विलाप से होता है - ‘उन्होंने अपना वादा पूरा किया।’ यहाँ कहानीकार ने यह दर्शाया है कि शिवय्या की खुली हुई आँखें मानो कह रही हों कि ‘मैं शराब को कभी हाथ नहीं लगाऊँगा। यह मेरा वादा है।’ 

शहरीकरण, एकल परिवार, कम आय आदि से समाज जूझ रहा है। जहाँ बूढ़े माता-पिता अपनी संतान के साथ रह सकते हैं, वहाँ तो फिर भी खैर है; परंतु जहाँ युवक गाँव छोड़कर शहर जा रहे हैं, वहाँ परिस्थिति बहुत गंभीर है। कोम्मिशेट्टि मोहन कृत ‘पूला परिमलम’ (फूलों की सुगंध) कहानी संग्रह में संकलित कहानी ‘ओ हो... अलागा!’ (अ हा... ऐसा है क्या!) इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इसमें वृद्धों की मनोदशा, उनके आयुजनित बड़प्पन, बहू के रूखा व्यवहार और बेटे की निरूपायता को बखूबी दर्शाया गया है। बेटा चाहते हुए भी माता-पिता को अपने साथ शहर में रख नहीं सकता। जब बूढ़े माता-पिता बेटे-बहू से मिलने गाँव से शहर आते हैं तो उनके प्रति बहू का व्यवहार ठीक नहीं रहता लेकिन बेटा कुछ नहीं कर सकता। जब वह दीपावली के अवसर पर माता-पिता के लिए भी नए वस्त्र लाता है तो बहू हंगामा कर देती है। तीर्थयात्रा के लिए निकले माता-पिता भगवान के पास चले जाते हैं। बरसी के दिन बहू वही नए कपड़े उनकी तस्वीर के समक्ष लाकर रखती है तो उनके बेटे के पूछने पर जवाब देती है कि नए कपड़े दादा-दादी के लिए हैं। यह सुनकर वह नन्हा बालक कहता है, ‘अच्छा! ऐसा है क्या! लेकिन दादा-दादी तो नहीं रहे, फिर कपड़े कौन पहनेंगे माँ?’ जीते जी वृद्ध माता-पिता को न तो सम्मान प्राप्त हुआ और न ही प्यार, लेकिन मरने के बाद नए कपड़े अर्पित किए जाने पर कहानीकार ने छोटे बच्चे के माध्यम से व्यंग्य कसा है। इस कहानी संग्रह में संकलित परीक्षा, स्वार्थम (स्वार्थ), वारसत्वम (विरासत), अम्मायिलु... जिंदाबाद... (लड़कियाँ.. जिंदाबाद), पूल परिमलम (फूलों की सुगंध), प्रयाणम (यात्रा) आदि कहानियों के कथासूत्र और चरित्र हमारे इर्द-गिर्द उपस्थित हैं और रोज़ ही हमारा उनसे आमना-सामना होता रहता है। 

पोतूरी विजयलक्ष्मी कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके 20 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और समसामयिक मुद्दों पर 250 से भी अधिक कहानियाँ। उनके ‘पूर्वी’[5] शीर्षक कहानी संग्रह में कुल 16 कहानियाँ सम्मिलित हैं। इस संग्रह की शीर्ष कहानी ‘पूर्वी’ एक ऐसी युवती की कहानी है जिसका जन्म पूर्वी भारत में होता है और विवाह तेलुगुभाषी युवक से। एक दुर्घटना में पति का निधन हो जाता है। बीमाराशि सास-ससुर को देने के उद्देश्य से पूर्वी उनकी खोज में आंध्र प्रदेश जाती है और अपने सास-ससुर से मिलती है। इस संग्रह में संकलित सुखांतम (सुखांत), प्रेमिकुला रोजु (प्रेमियों के दिन), श्रीदेवी अम्मगारि मामिडी तोरणम (श्रीदेवी माता के आम का तोरण) आदि कहानियों में परिवेश चित्रण की दृष्टि से तेलुगु भाषासमाज और संस्कृति की प्रामाणिक छवियाँ ध्यान खींचती हैं। 

परिमला सोमशेखर की कहानियाँ स्त्री विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। ‘परिमला सोमशेखर कथलु’ (परिमला सोमशेखर की कहानियाँ)[6] शीर्षक संग्रह में संकलित 42 कहानियाँ प्रमुख रूप से स्त्री प्रधान कहानियाँ हैं जो परंपरागत रूढ़ियों के प्रति स्त्री को विद्रोह करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन कहानियों में स्त्री सशक्तीकरण को भलीभाँति देखा जा सकता है। परिमला सोमशेखर की कहानियों के स्त्री पात्र एक ओर परंपरागत रूढ़ियों को मानने वाले हैं तो दूसरी ओर स्त्री-आचार संहिता को तोड़ने वाले भी हैं। इन कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री के प्रति पुरुष की मानसिकता, पुरुष के प्रति स्त्री की मानसिकता, स्त्री संघर्ष और आक्रोश को भी रेखांकित जा सकता है। 

प्रसन्नकुमार सर्राजु की कहानियों में हास्य और व्यंग्य का सम्मिश्रण है। ‘प्रसन्नकुमार सर्राजु कथलु-2’ (प्रसन्नकुमार सर्राजु की कहानियाँ-2)[7] शीर्षक कहानी संग्रह में कुल 12 कहानियाँ संकलित हैं। ये कहानियाँ पाठकों के चहरे पर मुस्कान लाने के साथ-साथ उन्हें सोचने पर भी बाध्य करती हैं। उदाहरण के लिए ‘डॉनल भूगर्भ शत्रुत्वम’ (माफिया की शत्रुता) शीर्षक कहानी सिनेमा जगत पर व्यंग्य कसती है। यह कहानी दर्शाती है कि किस तरह सिनेमा को अंडरवर्ल्ड माफिया संचालित कर रहा है। ‘ए टेल ऑफ इंडियन सिनेमा’ शीर्षक कहानी इस ओर संकेत करती है कि सिनेमा को उद्योग के रूप में परिवर्तित करके सरकार कैसे मुनाफा अर्जित कर रही है। 

शेख हुसैन सत्याग्नि की कहानियाँ सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं, सांप्रदायिक ताकतों एवं राजनैतिक षड्यंत्रों के खिलाफ आवाज उठाने वाली कहानियाँ हैं।[8] देवुलपल्लि कृष्णमूर्ति ने तेलुगु समाज के उपेक्षित वर्ग ‘दासरी’ की जीवनशैली को अपनी कहानी ‘यक्षगानम’ (यक्षगान) में चित्रित किया है तथा ‘मृत्युंजयुडु’ (मृत्युंजय) शीर्षक कहानी में निजाम शासन के विरोध में किए गए आंदोलन का चित्रण किया है। ऐसी अनेक सामाजिक कहानियों का समुच्चय है देवुलपल्लि कृष्णमूर्ति की पुस्तक ‘यक्षगानम’ (यक्षगान)।[9]

2 जून, 2014 को तेलंगाना राज्य का गठन हुआ। तत्पश्चात तेलंगाना के साहित्यकार तेलंगाना का इतिहास, तेलंगाना का साहित्य, संस्कृति और उससे जुड़े आंदोलनों को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। तेलुगु साहित्य के इतिहास का भी पुनर्लेखन किया जा रहा है। प्रसिद्ध पत्रकार और आलोचक प्रतापरेड्डी द्वारा समय-समय पर तेलंगाना संस्कृति और साहित्येतिहास आदि विषयों पर लिखे गए आलोचनात्मक लेखों का संकलन है ‘तेलंगाना साहित्योद्यमालु (तेलंगाना के साहित्यिक आंदोलन)।[10] वाई. यानालु ने अपनी आलोचनात्मक पुस्तक ‘तेलंगाना चरित्र, संस्कृति वारसत्वम’ (तेलंगाना : ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत)[11] में तेलंगाना से संबद्ध अनेकानेक आंदोलन एवं सांस्कृतिक विरासत को साझा किया है। 

क़ासिम ने तेलंगाना आंदोलन से संबंधित अनेक कविताएँ लिखी हैं। तेलंगाना की जनता की व्यथा-कथा को उन्होंने अभिव्यक्त किया है। के कहते हैं कि ‘साठ वर्ष के अज्ञातवास के बाद/ दूध की धारा बन प्रवाहित हो रहा है तेलंगाना।’ (मेरा तेलंगाना)। ‘क़ासिम कवित्वम’ (क़ासिम की कविता)[12] काव्य संग्रह में 96 कविताएँ सम्मिलित हैं जिनमें 3 लंबी कविताएँ भी शामिल हैं। डॉ. देवराजु महाराजु ने ‘गुडिसे गुंडे’ (झोंपड़ी का हृदय)[13] शीर्षक कविता संग्रह में तेलंगाना की क्षेत्रीय बोली का प्रयोग किया है। यह तेलंगाना की क्षेत्रीय बोली में लिखित प्रथम काव्य संग्रह है। 

चाहे कविता हो या कथासाहित्य, संस्मरण हो या जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज और यात्रावृत्त; विभिन्न विधाओं में साहित्यकार अपनी स्मृतियों एवं अनुभूतियों को अभिव्यक्त करता है। जहाँ कविता, कथा आदि में कल्पना के लिए खुला आकाश होता है, वहीं आत्मकथा आदि विधाएँ अकाल्पनिक विधाएँ हैं जो मूलतः स्मरणाधारित हैं। तेलुगु में इस कोटि की कृतियों की समृद्ध परंपरा बन चुकी है। इसी क्रम में, प्रसिद्ध तेलुगु साहित्यकार बुच्चिबाबु की धर्मपत्नी शिवराजु सुब्बलक्ष्मी की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘मा ज्ञापकालु’ (हमारी स्मृतियाँ)[14] संस्मरण के साथ-साथ आत्मकथा भी है। 12वर्ष की आयु में उनका विवाह बुच्चिबाबु से संपन्न हुआ। संतानहीन रहे लेकिन कभी चिंतित नहीं हुए। दोनों एक-दूसरे के लिए संतान बने। बुच्चिबाबु ने सुब्बलक्ष्मी को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया और सृजनात्मक लेखन के क्षेत्र में प्रोत्साहित किया। नाटककार, कवि, कथाकार, चित्रकार और आलोचक के रूप में तेलुगु पाठक बुच्चिबाबु से परिचित तो हैं ही, लेकिन सुब्बलक्ष्मी ने अपनी पुस्तक के माध्यम से उनके भीतर निहित ममता, वात्सल्य, करुणा और प्रेम के विविध पक्षों को उजागर किया है। 

विजयनागिरेड्डी मूलतः चिकित्सक थे। हर व्यक्ति को उत्तम चिकित्सा उपलब्ध कराने की दृष्टि से उन्होंने चेन्नई में ‘विजया हॉस्पिटल’ की स्थापना की। सिनेमा के प्रति रुचि के कारण उन्होंने ‘विजया संस्था’ की स्थापना की और अनेक सफल फिल्मों के निर्माता-निर्देशक बने तथा अनेक लोगों को जीविका प्रदान की। ‘विजया पब्लिकेशंस’ की स्थापना करके उन्होंने ‘चंदामामा’ के साथ-साथ अनेक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का दायित्व भी निभाया। विजयनागिरेड्डी ने जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए अनेक छोटे-मोटे व्यापार भी किए। उनके सुपुत्र विश्वनाथ रेड्डी ‘विश्वम’ ने अपने पिता के जीवन से संबद्ध छोटी-छोटी घटनाओं के साथ-साथ पिता के साथ गुजारी मधुर स्मृतियों को ‘नन्नातो नेनु (पिताजी के साथ मैं)[15] शीर्षक पुस्तक में संजोया है। इस पुस्तक के माध्यम से तमिल, तेलुगु, कन्नड और मलयालम फ़िल्मी जगत की अनेक छोटी-बड़ी हस्तियों की जानकारी भी उपलब्ध होती है। यह पुस्तक जीवनी के साथ-साथ संस्मरण भी है। 

आज की युवा पीढ़ी पुराने साहित्यकारों और उनके साहित्य से परिचित नहीं है। इस दृष्टि से पुराने साहित्य एवं साहित्यकारों पर फिर से दृष्टि केंद्रित की जा रही है। कालिपाका मधुसूदन ने अपनी आलोचनात्मक कृति ‘चंदाला केशवदासु : जीवितम-साहित्यम’ (चंदाला केशवदासु : व्यक्तित्व और कृतित्व)[16] में खम्मम जिला (तेलंगाना) के जक्कपल्लि गाँव में 1876 को जन्मे केशवदास के प्रदेय पर प्रकाश डाला है। इस पुस्तक से यह तथ्य सामने आता है कि केशवदास ने तेलुगु की प्रथम ‘टाकी फिल्म’ भक्तप्रह्लाद (1931) के लिए पदों की रचना की थी। ‘श्रीकृष्ण तुलाभारम’ (1966) फिल्म के लिए उनके द्वारा लिखे गए गीत आज भी तेलुगु पाठकों के हृदय में अंकित हैं। नाटककार, अभिनेता, गीतकार और अवधानी के रूप में भी उन्होंने ख्याति अर्जित की। 

‘बुच्चिबाबु साहित्य व्यासालु’ (बुच्चिबाबु के साहित्यिक निबंध)[17] शीर्षक निबंध संग्रह नवतेलंगाना पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित है। इसमें बुच्चिबाबु द्वारा समय-समय पर लिखे गए अंग्रेजी साहित्य से संबंधित शोधपरक आलेख संकलित हैं। इसी तरह प्रसिद्ध नाटककार और कथाकार सिंगराजु लिंगमूर्ति की रचनाएँ भी दो खंडों में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं।[18] ‘प्रजासेवालो नागिरेड्डी (जनसेवा में नागिरेड्डी)[19] शीर्षक पुस्तक में चेरुकूरि सत्यनारायण ने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक नागिरेड्डी के जीवन पर प्रकाश डाला है। ओलेटि श्रीनिवासभानु की पुस्तक ‘एल.वी.प्रसाद जीवित प्रस्थानम’ (एल.वी.प्रसाद की जीवन यात्रा)[20] में एल.वी.प्रसाद के जीवन पर प्रकाश डाला गया है। जयधीर तिरुमलराव ने अलिशेट्टि प्रभाकर की कविताओं को संगृहीत किया है।[21] डॉ. पेद्दी रामाराव ने अपनी पुस्तक ‘यवनिका’[22] में रंगमंच से संबंधित अनेक विषयों का विश्लेषण किया है। इस पुस्तक में संकलित 34 आलेखों में तेलुगु नाटक साहित्य की विकास यात्रा, नाट्यकर्मियों का संक्षिप्त परिचय, रंगमंच के विभिन्न तत्व, नाटक प्रदर्शनी आदि की सैद्धांतिक चर्चा के साथ-साथ व्यावहारिक चर्चा भी सम्मिलित है। 

समाज में व्याप्त विसंगतियों, विद्रूपताओं एवं राजनैतिक षड्यंत्रों के प्रति जनता को जागृत करने के लिए कविहृदय धड़कता रहता है। कवि के समक्ष यह भी प्रश्न खड़ा होना स्वाभाविक है कि कविता किस तरह समाज को प्रभावित कर सकती है और कितने लोग कविता पढ़ने में रुचि प्रदर्शित करते हैं? इस तरह के अनेक प्रश्नों से जूझता हुआ कविमन उनके उत्तर की तलाश करता रहता है। एन. वेणुगोपाल की पुस्तक ‘कवित्वमतो मुलाकात’ (कविता से मुलाकात)[23] में इस तरह के अनेक प्रश्नों के समाधान निहित हैं और वेणुगोपाल की मौलिक कविताओं के साथ ही माओ, पाब्लो नेरुदा, कैफ़ी आज़मी, देवीप्रसाद मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि की कविताओं का अनुवाद भी सम्मिलित है। 

जापानी काव्यविधा हाइकू को तेलुगु साहित्यकारों ने भी अपनाया है। हाइकू में 5,7,5 अक्षरों के माध्यम से बिंब निर्माण किया जाता है। तेलुगु साहित्य में इस विधा को लिखने वालों में बी.वी.वी. प्रसाद का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपने हाइकू ‘बी.वी.वी. प्रसाद हाइकूलु (बी.वी.वी. प्रसाद के हाइकू)[24] शीर्षक पुस्तक में संकलित किए हैं। वासिरेड्डी पब्लिकेशंस ने एम.एस.नायुडु की कविताओं को ‘गालि अद्दम’[25] (हवा दर्पण) शीर्षक से प्रकाशित किया है। 

कविता, कहानी, आलोचना और संस्मरण साहित्य के साथ-साथ तेलुगु साहित्य यात्रावृत्त क्षेत्र में भी समृद्ध है। ’मा केरल यात्रा’ (हमारी केरल की यात्रा)[26] शीर्षक यात्रावृत्त में मुत्तेवी रवींद्रनाथ ने केरल के भौगोलिक और प्राकृतिक परिवेश के साथ-साथ वहाँ के लोगों की जीवन शैली, खान-पान, वेश-भूषा, संस्कृति तथा केरल से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं का भी उल्लेख किया है। इसी प्रकार राजेश वेमूरि ने यूरोप की भौगोलिक एवं प्राकृतिक शोभा के साथ-साथ वहाँ के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक यथार्थ की जानकारी अपनी पुस्तक ‘ना ऐरोपा यात्रा’ (मेरी यूरोप की यात्रा)[27] में रोचक ढंग से प्रस्तुत की है। 

इस वर्ष में तेलुगु में पत्रकारिता और फिल्म जगत से भी संबंधित कई पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्तियों को हमेशा यातना का शिकार होना पड़ता है; फर्जी केस में फँसकर उम्रकैद की सजा भुगतनी पड़ती है या फाँसी पर लटकना पड़ सकता है। मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र पर लगाए इल्जाम से लेकर आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम नक्सल केस तक अनेकानेक फर्जी केसों, षड्यंत्रों, पुलिस मुठभेड़ों आदि का विवरण, दंड भुगतने वालों की जानकारी, साक्षात्कार आदि का ब्यौरा प्रमाणों के साथ ‘सूर्योदयम कुट्रकादु’ (सूर्योदय षड्यंत्र नहीं है)[28] शीर्षक ग्रंथ में संकलित किया गया है। अन्नम श्रीधर बाचि कार्टून चित्रों के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों एवं राजनैतिक दावपेंच पर व्यंग्य कसते हैं। उनके कार्टून चित्रों का संकलन है ‘बाचि कार्टूनलु’ (बाचि के कार्टून)।[29] इसके अलावा दाशरथि कृष्णामाचार्युलु (22.7.1925-5.11.1987) द्वारा लिखित तेलुगु सिनेमा के प्रसिद्ध गीत ‘दाशरथि सिनेमा पाटला पंदिरी’ (दाशरथि के फिल्मी गीत)[30] शीर्षक पुस्तक में सम्मिलित हैं। 

मौलिक रचनाओं के साथ-साथ अनूदित रचनाएँ भी प्रकाशित हुई हैं। राहुल सांकृत्यायन कृत ‘बहुरंगी मधुपुरी’ (कहानी संग्रह) का तेलुगु अनुवाद ‘मधुपुरी’[31] शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। सर ऑथर कॉनेन डॉयल कृत ‘शरलॉक होम्स’ का के. बी. गोपालम ने ‘एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स-1'[32], ‘एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स-2’[33] के रूप में तेलुगु में अनुवाद किया है। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के काव्य संग्रह ‘संघर्ष जारी है’ का तेलुगु में भागवतुल हेमलता ने ‘सागुतुन्ना समरम’[34] शीर्षक से अनुवाद किया है। इस संग्रह में राष्ट्रीय अस्मिता की कविताएँ संकलित हैं. इन कविताओं में कवि ने वर्तमान व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था, समाज, राष्ट्र और मानव कल्याण की चिंताएँ व्यक्त की हैं. 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि वर्ष 2016 तेलुगु साहित्य की दृष्टि से पर्याप्त वैविध्यपूर्ण और गंभीर कृतियों के प्रकाशन की वर्ष रहा है। यह भी देखा जा सकता है कि इधर अकाल्पनिक गद्य विधाओं के प्रति तेलुगु लेखक और प्रकाशक अपेक्षाकृत अधिक रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं। 

संदर्भ 

[1] टी तोटला आदिवासुलु चेप्पिना कथलु (चाय बागान के आदिवासियों की कथाएँ, 2016)/ सामन्या/ पृष्ठ 92/ मूल्य : रु. 120 

[2] आदिवासुलु : वैद्यम, संस्कृति, अनचिवेता (आदिवासी : चिकित्सा, संस्कृति और दमन, 2016)/ बालगोपाल/ पृष्ठ 150/ मूल्य : रु. 100/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नव तेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[3] आदिवासुलु : चट्टालु, अभिवृद्धि (आदिवासी : न्याय और अभिवृद्धि, 2016), बालगोपाल/ पृष्ठ 176/ मूल्य : रु. 130/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नव तेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[4] पूला परिमलम (फूलों की सुगंध, 2016)/ डॉ. कोम्मिशेट्टि मोहन/ मूल्य : रु.100/ पृष्ठ 88/ प्रतियों के लिए संपर्क सूत्र : सरस्वती मोहनम, 24/327-4, अमृता गार्डन्स, पावरहाउस स्ट्रीट, प्रोद्दुटूरू – 516360, कड़पा जिला (आंध्र प्रदेश), मोबाइल : 09441323170 

[5] पूर्वी (2016)/ पोतूरी विजयलक्ष्मी/ 130 पृष्ठ/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-27637729 

[6] परिमला सोमशेखर कथलु (परिमला सोमशेखर की कहानियाँ, 2016)/ परिमला सोमशेखर/ पृष्ठ 460/ मूल्य : रु. 280/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नवचेतना पब्लिशर्स, हैदराबाद 

[7] प्रसन्नकुमार सर्राजु कथलु-2 (प्रसन्नकुमार सर्राजु की कहानियाँ-2, 2016)/ मूल्य : रु. 100/ पृष्ठ 137/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : : 09849026928 

[8] सत्याग्नि कथलु (सत्याग्नि की कहानियाँ, 2016)/ शेख हुसैन सत्याग्नि/ पृष्ठ : 173/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09866040810 

[9] यक्षगानम (यक्षगान, 2016), देवुलपल्ली कृष्णमूर्ति/ पृष्ठ : 152/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-23521849 

[10] तेलंगाना साहित्योद्यमालु (तेलंगाना के साहित्यिक आंदोलन, 2016)/ कासुला प्रतापरेड्डी/ पृष्ठ 430/ मूल्य : 275/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : श्री वेंकटरमण बुक डिस्ट्रिब्यूटर्स, हैदराबाद 

[11] तेलंगाना चरित्र, संस्कृति वारसत्वम (तेलंगाना : ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत, 2016)/ वाई. यानालु/ पृष्ठ 430/ मूल्य : 399/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 07396586170 

[12] क़ासिम कवित्वम (क़ासिम की कविता, 2016)/ क़ासिम/ पृष्ठ 266/ मूल्य : रु. 140 

[13] गुडिसे गुंडे (झोंपड़ी का हृदय, 2016)/ डॉ. देवराजु महाराजु/ पृष्ठ : 66/ मूल्य : रु. 60 

[14] मा ज्ञापकालु (हमारी स्मृतियाँ, 2016)/ शिवराजु सुब्बलक्ष्मी/ मूल्य : रु.100/ पृष्ठ 142/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : विशालांध्र पब्लिशिंग हाउस 

[15] नन्नतो नेनु (पिताजी के साथ मैं)/ विश्वम/ मूल : रु. 100/ पृष्ठ 280/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : विजया पब्लिकेशंस, चेन्नई, 040-23652007 

[16] चंदाला केशवदासु : जीवितम-साहित्यम (चंदाला केशवदासु : व्यक्तित्व और कृतित्व, 2016)/ कालिपाका मधुसूदन/ पृष्ठ 48/ मूल्य : रु. 40/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नवचेतना बुक हाउस, हैदराबाद 

[17] बुच्चिबाबु साहित्य व्यासालु (बुच्चिबाबु के साहित्यिक निबंध)/ पृष्ठ 245/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियों के लिए संपर्क सूत्र : नवतेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[18] सिंगराजु लिंगराजु रचनलु (सिंगराजु लिंगराजु की रचनाएँ, 2016), भाग 1, पृष्ठ 243/ मूल्य : रु. 170/ भाग 2, पृष्ठ 270/ मूल्य : 175, प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : नवचेतना पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 

[19] प्रजासेवलो नागिरेड्डी (जनसेवा में नागिरेड्डी, 2016)/ चेरुकूरि सत्यनारायण/ पृष्ठ 500/ मूल्य : रु. 50/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09848631604 

[20] एल.वी.प्रसाद जीवित प्रस्थानम (एल.वी.प्रसाद की जीवन यात्रा, 2016)/ ओलेटि श्रीनिवासभानु/ पृष्ठ 210/ मूल्य : रु. 250/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09848506964 

[21] अलिशेट्टि प्रभाकर कविता (अलिशेट्टी प्रभाकर की कविता, 2016)/ संपादक जयधीर तिरुमलराव, निजाम वेंकटेशम और बी. नरसन/ पृष्ठ 350/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 09440128169 

[22] यवनिका/ 2016/ डॉ. पेद्दी रामाराव/ पृष्ठ 200/ मूल्य : रु. 200 

[23] कवित्वमतो मुलाकात (कविता से मुलाकात, 2016)/ एन. वेणुगोपाल/ पृष्ठ 206/ रु. 120 

[24] बी.वी.वी. प्रसाद हाइकूलु (बी.वी.वी. प्रसाद की हाइकू, 2016)/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 90/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : वासिरेड्डी पब्लिकेशंस, बी-2 टेलीकॉम क्वार्टर्स, कोत्त्पेट, हैदराबाद – 500060 

[25] गालि अद्दम (हवा दर्पण, 2016)/ एम.एस.नायुडु/ पृष्ठ : 182/ मूल्य : रु. 120/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : वासिरेड्डी पब्लिकेशंस, हैदराबाद, मोबाइल : 09000528717 

[26] मा केरल यात्रा (हमारी केरल की यात्रा, 2016)/ मुत्तेवी रवींद्रनाथ/ पृष्ठ 256/ मूल्य : रु. 250/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-24224458 

[27] ना ऐरोपा यात्रा (मेरी यूरोप की यात्रा, 2016)/ राजेश वेमूरि/ पृष्ठ 184/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 040-23325979 

[28] सूर्योदयम कुट्रकादु (सूर्योदय षड्यंत्र नहीं है, 2016)/ चेरुकूरि सत्यनारायण/ पृष्ठ 508/ मूल्यः रु. 90 

[29] बाचि कार्टूनलु (बाचि के कार्टून, 2016)/ अन्नम श्रीधर बाचि/ पृष्ठ 160/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : बाचि, हैदराबाद, फोन : 040-24042847 

[30] दाशरथि सिनेमा पाटला पंदिरी (दाशरथि के फिल्मी गीत, 2016)/ प्रधान संपादक : के. प्रभाकर/ पृष्ठ : 350/ मूल्य : 326/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : के. विमलारानी, 104, ब्लॉक 1, डॉ. प्रभाकररेड्डी चित्रपुरी कॉलोनी, मणिकोंडा जागीर, राजेंद्रनगर मंडल, हैदराबाद – 500008 

[31] मधुपुरी/ हिंदी मूल : राहुल सांकृत्यायन, तेलुगु अनुवाद : कविनि आलूरि/ पृष्ठ 272/ मूल्य : रु. 200/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : विशालांध्र पब्लिशिंग हाउस 

[32] एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स-1/ मूल : सर ऑथर कॉनेन डॉयल, तेलुगू अनुवाद : के. बी. गोपालम/ पृष्ठ 206/ मूल्य : रु. 100/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : क्रिएटिव लाइंस, हैदराबाद, 09848065658 

[33] एडवेंचर ऑफ शरलॉक होम्स -2/ मूल : सर ऑथर कॉनेन डॉयल, तेलुगू अनुवाद : के. बी. गोपालम/ पृष्ठ 220/ मूल्य : रु. 100/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : क्रिएटिव लाइंस, हैदराबाद, 09848065658 

[34] सागुतुन्ना समरम (संघर्ष जारी है, 2016)/ हिंदी मूल : डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’/ तेलुगु अनुवाद : डॉ. भागवतुल हेमलता/ पृष्ठ 135/ मूल्य : रु. 150/ प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : डॉ. भागवतुल हेमलता, फ्लैट नं. 403, साई रामप्रसाद अपार्टमेंट्स, ओल्ड प्रतिभानिकेतन स्ट्रीट, माछवरम, विजयवाडा – 520004, मोबाइल : 09492437606 

मंगलवार, 26 मार्च 2019

तेलुगु साहित्य 2015 : एक सर्वेक्षण


भारतीय भाषाओं के बीच तेलुगु भाषा का साहित्य अत्यंत समृद्ध और परंपरायुक्त है. इक्कीसवीं शताब्दी में तेलुगु के साहित्यकार समय और समाज की नब्ज पहचानकर इसे और भी संपन्न बनाने के लिए सचेत है. वर्तमान समय में एक ओर पुरानी पीढ़ी अपनी लेखनी से तेलुगु साहित्य को समृद्ध कर रही है तो इसके समानांतर संवेदनशील नई पीढ़ी भी अपनी लेखनी से इसे बहुरंगी आयाम प्रदान कर रही है. वर्ष 2015 में तेलुगु साहित्य में प्रमुख रूप से आलोचना कृतियों के साथ-साथ कहानी संग्रहों का प्रकाशन हुआ है. उपन्यास, कविता, निबंध और अनूदित रचनाएँ भी पाठकों के समक्ष उपस्थित हुई हैं. 

तेलुगु भाषा और साहित्य के इतिहास, विकास यात्रा तथा भाषा और साहित्य से संबंधित अन्य जानकारी प्रदान करने वाली आलोचनात्मक पुस्तकें अनेक हैं. लेकिन 2015 में डॉ. दहगाम साम्बमूर्ति कृत ‘तेलुगु भाषा साहित्य दर्पणम : रूपालु, प्रक्रियलु, धोरणुलु (तेलुगु भाषा साहित्य दर्पण : रूप, प्रक्रिया, प्रवृत्तियाँ) प्रकाशित हुई है जिसमें लेखक ने तेलुगु भाषा विषयक अनेक व्याकरणिक एवं भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोणों को स्पष्ट किया है. 

तेलुगु साहित्य जगत में लोक को प्रमुखता दी जाती है. लोक भाषा एवं लोक साहित्य का अपना एक निजी एवं विशिष्ट स्थान है. यह सर्वविदित तथ्य है कि नागर जीवन और लोक जीवन के बीच अंतर विद्यमान है. लोक साहित्य लोक कंठ से निःसृत साहित्य है. इसमें लोक की आस्थाओं, आकांक्षाओं, कल्पनाओं, आवश्यकताओं को महत्व दिया जाता है. अपनी पुस्तक ‘जानपद साहित्यम : आधुनिक स्पृहा’ (लोक साहित्य : आधुनिक चेतना) में देवराजु महाराजु ने लोक साहित्य तथा उसकी मान्यताओं की व्याख्या आधुनिक परिप्रेक्ष्य में की है और प्रतिपादित किया है कि समय के साथ-साथ लोक साहित्य में भी नए-नए आधुनिक परिवेश प्रतिबिंबित हो रहे हैं. 

यह तो विमर्शों का युग है. हाशियाकृत समुदाय केंद्र की ओर आ रहे हैं और अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हर भाषा के साहित्य में इस प्रकार के विमर्श प्रधान साहित्य को भलीभाँति देखा जा सकता है. तेलुगु साहित्य में भी दलित साहित्य की अवधारणा को रेखांकित करने वाली अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है. 2015 में डॉ. एस.वी. सत्यनारायण कृत ‘दलित साहित्यम नेपथ्यम’ (दलित साहित्य की पृष्ठभूमि) पाठकों के सामने आई. इसमें दलित साहित्य के उदय और विकास के साथ-साथ अखिल भारतीय दलित लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन की जानकारी अंकित है तथा आधुनिक दलित साहित्य में चित्रित दलित चेतना, आधुनिक दलित कविता में अभिव्यक्त दलित आक्रोश और संघर्ष आदि को भी रेखांकित किया गया है. इसी प्रकार डॉ. कत्ति पद्मारव कृत ‘दलित साहित्यवादम : जाषुवा’ शीर्षक पुस्तक दलित साहित्य की अवधारणा को तेलुगु के कवि गुर्रम जाषुवा के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट करती है. स्मरणीय है कि तेलुगु साहित्य में दलित कवि के रूप में गुर्रम जाषुवा विख्यात हैं लेकिन वे मूलतः मानववादी कवि हैं. उनके साहित्य को उजागर करने वाली अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं. फिर भी 2015 में ‘जाषुवा साहित्यम : द्रुकपथम – परिणामम’ [जाषुवा का साहित्य : परिप्रेक्ष्य और विकास] (डॉ. येंड्लूरि सुधाकर), ‘महाकवि जाषुवा : प्रगतिशीलता-कलात्मकता’ [महाकवि जाषुवा : प्रगतिशीलता एवं कलात्मकता] (डॉ. अद्देपल्लि राममोहन राव) और जाषुवा स्नेहम-संदेशम [जाषुवा का स्नेह और संदेश] (डॉ. राचपालेम चंद्रशेखर रेड्डी) जैसी पुस्तकें सामने आईं जो महाकवि जाषुवा की कविता का विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं. 

दलित विमर्श स्वयं को बौद्ध दर्शन से जोड़ता है. भारत में जन्मे बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार पूरे विश्व में हुआ. इस पर अनेकानेक पुस्तकें भी उपलब्ध हैं. आज के परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता को रेखांकित करने वाली पुस्तक ‘बौद्धम : इप्पटिकी अवसरमा?’ (बौद्ध धर्म : आज भी आवश्यक है?) पाठकों के समक्ष है. बुद्ध ने जिन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था आज बौद्ध मत में वे सिद्धांत नहीं है. बुद्ध को भगवान के रूप में पूजा जा रहा है. ऐसी स्थिति में बोर्रा गोवर्धन ने अपनी इस शोधपरक पुस्तक में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता को बखूबी रेखांकित किया है और साथ ही समसामयिक समाज की रीति-नीति को स्पष्ट करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि बौद्ध मत मानवता को प्रमुख मानता है. 

वंचित समूहों के रूप में आमतौर पर दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यकों की बात की जाती है लेकिन वृद्धों की चर्चा न के बराबर होती है. ऐसे में उस साहित्य पर ध्यान देने की जरूरत है जिसमें वृद्धों को केंद्र में रखा जा रहा है. वार्धक्य के बारे में स्पष्ट करने वाली पुस्तक ‘वार्धक्यम : वरमा? शापमा?’ (वार्धक्य : वरदान है या अभिशाप) प्रकाशित हुई. इसकी रचनाकार हैं डॉ. गुरजाडा शोभा पेरिंदेवी. उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से वार्धक्य से संबंधित अनेक भ्रांतियों का निराकरण किया है और स्पष्ट किया है कि वार्धक्य अभिशाप नहीं बल्कि जीवन का सार है. 

तेलुगु साहित्य जगत में उपन्यासों का अपना विशिष्ट स्थान है. तेलुगु उपन्यास साहित्य से संबंधित अनेक आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. तेलुगु साहित्य के 25 प्रमुख राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक उपन्यासों के इतिवृत्त को सहवासी ने 9 वर्ष पहले अपनी पुस्तक ‘नूरेल्ला तेलुगु नवला’ में रेखांकित किया था. 2015 में इसकी पहली आवृत्ति पाठकों के समक्ष आई है. इस वर्ष पाठकों की संवेदना को प्रबल करने वाले उपन्यास भी प्रकाशित हुए. उनमें प्रमुख हैं नागेश बीररेड्डी कृत ऐतिहासिक उपन्यास ‘ओका नाजिया कोसम’ (नाजिया के लिए). इसमें प्रेमकथा के माध्यम से 1947 कालीन निजाम शासन की कथा अंकित है. उस समय तेलंगाना निजाम शासन के अधीन था. इस उपन्यास में रजाकारों की अमानुषिकता का लोमहर्षक चित्रण किया गया है. 

यह पहले भी कहा जा चुका है कि 2015 में आलोचना पुस्तकों के साथ-साथ कहानी संग्रहों का प्रकाशन अधिक मात्रा में हुआ है. के. सुभाषिणी के कहानी संग्रह ‘अमूल्या’ में संकलित 15 कहानियाँ स्त्री प्रधान कहानियाँ हैं. इन कहानियों में स्त्री की समस्याओं को उजागर करने के साथ-साथ आर्थिक विसंगतियों, मानसिक द्वंद्व, उपभोक्ता संस्कृति, भ्रष्ट शिक्षा तंत्र आदि को भी रेखांकित किया गया है. इन कहानियों में परिनिष्ठित तेलुगु के साथ-साथ रायलसीमा अंचल की भाषा का खुला प्रयोग विशेष द्रष्टव्य है. इस दृष्टि से इस संग्रह की कहानी ‘गायालु’ (घाव) विशेष रूप से उल्लेखनीय है. 

कथा साहिती प्रकाशन लगातार 25 वर्षों से नए नए कहानीकारों को प्रोत्साहित करने का कार्य कर रहा है. वासिरेड्डी नवीन और पापिनेनि शिवशंकर द्वारा संपादित ‘कथा-2014’ इस शृंखला का 25वाँ संग्रह है जिसका प्रकाशन 2015 में हुआ. नए कहानीकारों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से इस शृंखला का सूत्रपात किया गया है. इस संग्रह में संकलित रामसुंदरी बत्तुला की कहानी ‘चावु देवरा’ (मर जा, भगवान!) में भ्रष्ट समाज का यथार्थ चित्र अंकित है. उन्होंने यह दिखाया है कि भूमंडलीकरण के कारण आम आदमी की जिंदगी किस तरह तब्दील हो गई है तथा यह समाज मंडी के रूप में कैसे परिवर्तित हो चुका है. पलगिरी विश्वप्रसाद की कहानी ‘आकुलु राल्चिना कालम’ (पतझड़) में स्त्री का जीवन संघर्ष अंकित है तो मधुरांतकम नरेंद्र की कहानी ‘निशब्दपु चप्पुडु’ (निशब्द ध्वनि) में स्त्री आक्रोश की अभिव्यक्ति है. तल्लावर्झुला पतंजलि शास्त्री ने अपनी कहानी ‘रोहिणी’ में जल समस्या को रेखांकित किया है तो अद्देपल्ली प्रभु ने अपनी कहानी ‘इस्साकु चिलुका’ (इस्साक का तोता) में निम्नवर्ग के साथ हो रहे राजनैतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है. इस संग्रह की सभी कहानियाँ किसी न किसी समसामयिक समस्या को पाठक के समक्ष रखकर उसे झकझोरने में सक्षम हैं. 

कहानियों को अस्त्र के रूप में प्रयोग करके समाज को चेताने के लिए विरसम (विप्लव रचयितला संघम, क्रांतिकारी लेखक संघ) ने कार्यशाला का आयोजन किया जिसके माध्यम से अनेक नए कहानीकार उभरकर सामने आए. उस कार्यशाला के फलस्वरूप जितनी कहानियाँ लिखी गईं उन्हें समय-समय पर प्रकाशित भी किया गया. इसी क्रम में 2015 में ‘कथला पंटा-3’ (कहानियों का फसल) सामने आया. इस संग्रह में कुल 19 कहानियाँ संकलित हैं. सामाजिक विसंगतियों के अलावा सत्ता की अमानवीयता, सत्ता के प्रति जनता का असंतोष और आक्रोश इन कहानियों का मुख्य कथ्य है. अभिव्यक्ति शैली रोचक है. परंपरागत कथा शैली को इन कहानीकारों तोड़ा है. 

प्रशांत विघ्नेश के कहानी संग्रह ‘मा ऊरू चेप्पिंदि (गाँव ने कहा)’ में संकलित कहानियाँ के साथ उस कथा के इतिवृत्त को स्पष्ट करने वाले चित्र भी अंकित हैं. हर एक कथा ग्रामीण व्यवस्था और गाँव की जिंदगी से जुड़ी हुई है. इन कहानियों को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि कहानीकार जमीन से जुड़े हुए हैं. शहरी सभ्यता के रंग-ढंग में वे ढले नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े हैं. इन कहानियों में अतीत की स्मृतियाँ भी अंकित है पर ऐसा नहीं लगता कि कहानीकार नॉस्टालजिक हैं. 

संगिशेट्टि श्रीनिवास द्वारा संपादित कहानी संग्रह ‘सुरमौली कथलु’ (सुरमौली की कहानियाँ) में कहानीकार सुरमौली की तेलंगाना की निजी भाषा-शैली में लिखी गई 16 कहानियाँ संकलित हैं. इन कहानियों के माध्यम से उन्होंने तेलंगाना की संस्कृति और जीवन शैली को पाठकों के सम्मुख अत्यंत रोचक ढंग से रखा है. जातिभेद को जड़ से मिटाना ही कहानीकार का मुख्य लक्ष्य है. उन्होंने इसी लक्ष्य को अपनी कहानियों में भी अंकित किया है. इसमें संकलित कहानी ‘रक्त पूजा’ में 1940-50 में घटित तेलंगाना किसान विद्रोह का मार्मिक चित्रण किया गया है. इस संकलन की कहानियों में उन लेखकों पर व्यंग निहित है जिनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है. 

वेंपटि हेमा के कहानी संग्रह ‘कल्कि कथलु’ (कल्कि की कहानियाँ) में कुल 50 कहानियाँ संकलित हैं. इन कहानियों का कथ्य वैविध्यपूर्ण है. किसानों का जीवन संघर्ष, स्त्री-पुरुष संबंध और समस्याएँ, माता-पिता की संवेदना, वृद्धावस्थाजनित समस्याएँ, बदलते जीवन मूल्य आदि का प्रामाणिक चित्रण इन्हें पठनीय बनाता है. 

एक ओर जहाँ नई नई रचनाएँ सामने आ रही है वहीं दूसरी ओर पुरानी पुस्तकों के नए संस्करण भी सामने आ रहे हैं. इसी क्रम में पाठकों को लोक जीवन के नजदीक लेने जाने वाली ‘करुण कुमार कथलु’ (करुण कुमार की कहानियाँ) का पुनः प्रकाशन किया गया है. 65 वर्ष पूर्व कंदुकूरि अनंतम ने ‘करुण कुमार’ नाम से कहानियों का सृजन किया था. उनकी प्रतिनिधि कहानियों को ‘करुण कुमार कथलु’ नाम से प्रकाशित किया गया है. इनमें संकलित अधिकांश कहानियाँ 1936-50 के बीच लिखी गई कहानियाँ हैं. इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार ने लोक जीवन, लोक की मान्यताएँ, लोक विश्वास आदि का चित्रण किया है. साथ ही सामाजिक विसंगतियों और बदलते जीवन मूल्यों पर भी प्रकाश डाला है. 

आज साहित्यकारों के समक्ष एक गंभीर समस्या है. क्योंकि पुस्तक प्रकाशन में काफी कुछ खर्च करना पड़ता है. यदि पुस्तक प्रकाशित भी हो जाए तो उसके वितरण को लेकर समस्या होती है. लेकिन इंटरनेट ने आम रचनाकार को भी विशिष्ट बना दिया है. कहने का आशय है कि न्यू मीडिया के कारण आज हर व्यक्ति ब्लॉग लेखक बन गया है. अपने ब्लॉग पर वह अपनी संवेदनाओं और अनुभूतियों को उकेरता जा रहा है. उसके समक्ष विशाल पाठक वर्ग है. उसकी रचना पर पाठकीय प्रतिक्रिया तुरंत प्राप्त हो जाती है. इसी तरह सत्यसाई कोव्वलि ने अपने ब्लॉग के माध्यम से समाज, संस्कृति, राजनीति, मूल्य ह्रास, गायब होते जा रहे रिश्ते-नाते और मानवीयता जैसे हर समसामायिक विषय पर अपनी संवेदनाओं को व्यक्त किया है. उन निबंधों को उन्होंने संकलित करके ‘नाकु तेलुगु चेसिंदि’ (मेरे लिए तेलुगु ने जो किया) पुस्तकाकार में प्रकाशित किया. 

उत्तर आधुनिक विमर्शों के इस दौर में यों तो कवि और कविता की मृत्यु घोषित हो चुकी है, लेकिन यह वास्तविकता नहीं है. कवि और कविता की मृत्यु हो ही नहीं सकती. संवेदनशील कवियों के कारण ही समाज जीवंत रहता है. एम.एस. सूर्यनारायण की 100 कविताओं का संग्रह ‘शब्दभेदी’ के नाम से प्रकाशित हुआ. मनुष्य और प्रकृति के रागात्मक संबंध इन कविताओं में मुखरित हैं. कवि ने अपनी निजी अनुभूतियों को शब्दबद्ध किया है. बचपन से लेकर अपने जीवन में घटित विभिन्न घटनाओं को उन्होंने शब्द संयोजन के माध्यम से पाठकों के सम्मुख रखा है. इन कविताओं में कहीं-कहीं दार्शनिकता का पुट दिखाई देता है. इसी प्रकार जगद्दात्री ने ‘सहचरणम’ (साहचर्य) नामक कविता संग्रह के माध्यम से साहचर्य में निहित माधुर्य भाव को अभिव्यक्त करने वाली कविताओं का सृजन किया. इन कविताओं में व्यंजित प्रेम वैयक्तिक न होकर वैश्विक है. ‘असंपूर्णा’ (असंपूर्ण) में संकलित राम चंद्रमौली की कविताओं में व्यक्ति के जीवन से संबंधित अधूरी इच्छाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त किया गया है. 

शहीदा की कविताओं में एक ओर अनेक क्रांतियों का चित्रण है तो दूसरी ओर क्रांतिकारी नेता का जीवन संघर्ष है. उनके कविता संग्रह ‘ओका माटा, ओका संभाषण’ (एक बात, एक संवाद) में संकलित कविताओं में मिलन, विच्छेद, आपसी बातचीत, अंतहीन संवाद आदि मुखरित हैं. फिर मिलने का वादा करके जाने वाले दोस्त जब हमेशा हमेशा के लिए दुनिया से विदा ले लेते हैं तो उनके परिवार वालों की पीड़ा की अभिव्यक्ति इन कविताओं में निहित है. 

‘गुडिसे गुंडे’ (झोंपड़ी का हृदय) में संकलित डॉ. देवराजु महाराजु की कविताओँ में तेलंगाना क्षेत्र के सामान्य व्यक्ति का सामाजिक जीवन और अस्तित्व का संघर्ष अंकित है. ‘कोत्तसालु’ (नया साल) शीर्षक कविता संग्रह तेलंगाना राजभाषा एवं सांस्कृतिक विभाग द्वारा प्रकाशित है. नवगठित तेलंगाना राज्य में उगादि 2015 (नव संवत्सर) में संपन्न कविसम्मेलन में सुनाई गई कविताओं को इस संग्रह में स्थान दिया गया है. 

तेलुगु साहित्य को जहाँ एक ओर मौलिक सृजनात्मक कृतियाँ समृद्ध कर रही हैं वहीं दूसरी ओर अनूदित साहित्य का भी अपना महत्व है. 120 वर्ष पूर्व आर्मीनिया के रचनाकार होवेनस टुमेनियन द्वारा रचित बाल साहित्य का पी. चिरंजीविनी कुमार ने ‘कथलु-गाथलु’ (कथाएँ-गाथाएँ) शीर्षक से तेलुगु में अनुवाद किया था. 1974 तथा 1982 में प्रगति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक को 2015 में नवचेतना प्रकाशन, हैदराबाद ने अब पाठकों के लिए पुनः प्रकाशित किया है. इन बाल कहानियों के माध्यम से बालश्रम, बाल शोषण, बच्चों के मानवाधिकार के साथ-साथ आर्मीनिया तथा टर्की के बीच घटित सीमा संघर्ष को भी उजागर किया गया है. 

कन्नड भाषा की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अग्नि’ के संपादक अग्नि श्रीधर द्वारा रचित लघु उपन्यास ‘येदगरिके’ (साहस) का तेलुगु में सृजन ने ‘तेगिंपु’ (साहस) शीर्षक से सरल और सुबोध भाषा में अनुवाद किया है. यह लघु उपन्यास सत्य घटना पर आधारित है. दो प्रमुख पात्रों के माध्यम से लेखक ने बहुत ही रोमांचक ढंग से आदि से अंत तक पाठकों को जिज्ञासा में बाँध कर रखने में सफलता प्राप्त की कि कब, किसकी और कैसे हत्या होगी? 

‘अंधकारमपै सम्मेटा देब्बा’ (अंधेरगर्दी पर करारी चोट) रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के हिंदी कहानी संग्रह ‘टूटते दायरे’ का तेलुगु अनुवाद है. इस संग्रह में कुल 17 कहानियाँ संकलित हैं जो सामाजिक विसंगतियों एवं विद्रूपताओं पर करारी चोट करती हैं तथा मानवाधिकारों के प्रति जनता को सचेत करती हैं. 

इस प्रकार वर्ष 2015 तेलुगु साहित्य की विभिन्न विधाओं के लिए पर्याप्त उर्वर रहा. इस वर्ष में प्रकाशित विभिन्न विधाओं की कृतियों का उपर्युक्त विवेचन पर समझने के लिए काफी है कि समकालीन साहित्यकार यथार्थ के प्रति संकल्पबद्ध हैं तथा समकालीन साहित्य अपनी प्रकृति में विमर्शपरक और आंदोलनात्मक चरित्रवाला है. 

संदर्भ 

  1. तेलुगु भाषा साहित्य दर्पणम : रूपालु, प्रक्रियलु, धोरणुलु (तेलुगु भाषा साहित्य दर्पण : रूप, प्रक्रिया, प्रवृत्तियाँ)/ आलोचना/ डॉ. दहगाम साम्बमूर्ति/ पृष्ठ : 392/ मूल्य : ₹ 375/ वितरक : नील कमल डिस्ट्रीब्यूटर्स, हैदराबाद 
  2. जानपद साहित्यम : आधुनिक स्पृहा (लोक साहित्य : आधुनिक चेतना)/ लोक साहित्य/ देवाराजु महाराजु/ 2015/ पृष्ठ 102/ मूल्य : ₹ 90 
  3. दलित साहित्यम नेपथ्यम (दलित साहित्य की पृष्ठभूमि)/ आलोचना/ डॉ. एस.वी. सत्यनारायण/ नवचेतना प्रकाशन, हैदराबाद/ पृष्ठ : 80/ मूल्य : ₹ 50 
  4. दलित साहित्यवादम : जाषुवा/ आलोचना/ डॉ. कत्ति पद्मारव/ पृष्ठ : 176/ मूल्य : ₹ 100/ वितरक : प्रजाशक्ति पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 
  5. वार्धक्यम : वरमा? शापमा? (वार्धक्य : वरदान है या अभिशाप)/ आलोचना/ डॉ. गुरजाडा शोभा पेरिंदेवी/ पृष्ठ : 104/ मूल्य : ₹ 100 
  6. जाषुवा साहित्यम : द्रुकपथम – परिणामम (जाषुवा का साहित्य : परिप्रेक्ष्य और विकास)/ आलोचना/ डॉ. येंड्लूरि सुधाकर/ पृष्ठ : 168/ मूल्य : ₹ 100/ वितरक : प्रजाशक्ति पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 
  7. महाकवि जाषुवा : प्रगतिशीलता-कलात्मकता (महाकवि जाषुवा : प्रगतिशीलता एवं कलात्मकता)/ आलोचना/ डॉ. अद्देपल्लि राममोहन राव/ पृष्ठ : 64/ मूल्य : ₹ 40/ वितरक : प्रजाशक्ति पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 
  8. जाषुवा स्नेहम-संदेशम (जाषुवा का स्नेह और संदेश)/ आलोचना/ डॉ. राचपालेम चंद्रशेखर रेड्डी/ पृष्ठ : 72/ मूल्य : ₹ 45/ वितरक : प्रजाशक्ति पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 
  9. बौद्धम : इप्पटिकी अवसरमा? (बौद्ध धर्म : आज भी आवश्यक है?)/ आलोचना/ बोर्रा गोवर्धन/ पृष्ठ : 291/ मूल्य : ₹ 150 
  10. नूरेल्ला तेलुगु नवला (1878-1977) {सौ वर्ष का तेलुगु उपन्यास}/ आलोचना/ सहवासी/ पृष्ठ : 240/ मूल्य : ₹ 140/ वितरक : नवोदया बुक हाउस, हैदराबाद 
  11. ओका नाजिया कोसम (नाजिया के लिए)/ उपन्यास/ नागेश बीररेड्डी/ पृष्ठ : 207/ मूल्य : ₹ 150/ प्रकाशक : वासीरेड्डी पब्लिकेशंस, हैदराबाद 
  12. अमूल्या/ कहानी संग्रह/ के. सुभाषिणी/ पृष्ठ : 192/ मूल्य : ₹ 100 
  13. कथा-2014/ कहानी संग्रह/ (सं) वासिरेड्डी नवीन, पापिनेनि शिवशंकर/ पृष्ठ : 197/ मूल्य : ₹ 65/ कथा साहिती प्रकाशन 
  14. कथला पंटा-3 (कहानियों का फसल)/ कहानी संग्रह/ वीरसम प्रकाशन, हैदराबाद/ पृष्ठ 232/ मूल्य : ₹ 120 
  15. मा ऊरू चेप्पिंदि (गाँव ने कहा)/ कहानी संग्रह/ प्रशांत विघ्नेश / पृष्ठ : 150/ मूल्य : ₹ 180 
  16. सुरमौली कथलु (सुरमौली की कहानियाँ)/ कहानी संग्रह/ (सं) संगिशेट्टि श्रीनिवास/ नवोदया पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद/ पृष्ठ : 172/ मूल्य : ₹ 100 
  17. कल्कि कथलु (कल्कि की कहानियाँ)/ कहानी संग्रह/ वेंपटि हेमा/ पृष्ठ : 648/ मूल्य : ₹ 300/ प्रकाशक : वंगूरी फाउंडेशन ऑफ अमेरिका/ वितरक : नवोदया पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद 
  18. करुण कुमार कथलु (करुण कुमार की कहानियाँ)/ कहानी संग्रह/ करुण कुमार/ पृष्ठ : 278/ मूल्य : ₹ 125/ वितरक : विशालंध्र पब्लिशिंग हाउस, विजयवाडा 
  19. नाकु तेलुगु चेसिंदि (मेरे लिए तेलुगु ने जो किया)/ निबन्ध संग्रह/ सत्यसाई कोव्वलि/ पृष्ठ : 223/ मूल्य : ₹ 120 
  20. शब्दभेदी/ कविता संग्रह/ एम.एस. सूर्यनारायण/ पृष्ठ 183/ मूल्य : ₹ 100/ वितरक : एम.रत्नमाला, आदित्य कुटीर, पोदलाडा – 533 242 
  21. सहचरणम (साहचर्य)/ कविता संग्रह/ जगद्दात्री/ पृष्ठ : 154/ मूल्य : ₹ 150 
  22. असंपूर्णा (असंपूर्ण)/ कविता संग्रह/ राम चंद्रमौली/ पृष्ठ : 120/ मूल्य : ₹ 100/ प्रकाशक : सृजन लोकम 
  23. ओका माटा, ओका संभाषण (एक बात, एक संवाद)/ कविता संग्रह/ शहीदा/ पृष्ठ : 144/ मूल्य : ₹ 75 
  24. गुडिसे गुंडे (झोंपड़ी का हृदय)/ कविता संग्रह/ डॉ. देवराजु महाराजु/ पृष्ठ : 66/ मूल्य : ₹ 60 
  25. कोत्तासालु (नया साल)/ कविता संग्रह/ (सं) मामिडी हरिकृष्ण/ पृष्ठ : 182/ तेलंगाना राज्य भाषा एवं सांस्कृतिक शाखा 
  26. कथलु-गाथलु (कथाएँ-गाथाएँ)/ बाल कहानियाँ/ मूल : होवेनस टुमेनियन (आर्मीनिया); अनुवाद : पी. चिरंजीविनी कुमार/ पृष्ठ : 92/ मूल्य : ₹ 60/ नवचेतना प्रकाशन, हैदराबाद 
  27. तेगिंपु (साहस)/ लघु उपन्यास/ मूल : येदगरिके : अग्नि श्रीधर (कन्नड); अनुवाद : सृजन/ पृष्ठ : 60/ मूल्य : ₹ 70/ एन बी टी 
  28. अंधकारमपै सम्मेटा देब्बा (अंधेरगर्दी पर करारी चोट)/ कहानी संग्रह/ मूल : टूटते दायरे : रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ (हिंदी); अनुवाद : गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2015/ पृष्ठ : 142/ मूल्य : ₹ 250/ श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद