सोमवार, 18 दिसंबर 2023

गुमनामी के अँधेरे में से रा यात्री की यात्रा

साहित्यिक जगत में से रा यात्री के नाम से प्रसिद्ध सेवा राम अग्रवाल 17 नवंबर, 2023 को कभी न लौटने वाली महायात्रा पर प्रस्थान कर गए। उत्तर प्रदेश के जनपद मुज़फ़्फ़रनगर के गाँव जड़ोदा में 1933 में जन्मे सेवा राम की साहित्यिक यात्रा कविताओं के माध्यम से शुरू हुई थी। उसके बाद यह यात्रा तेज गति चलती रही। उनकी पहली कहानी है ‘गर्द गुबार’ जो प्रसिद्ध कहानी पत्रिका ‘नई कहानी’ में प्रकाशित हुई और पहला कहानी संग्रह है ‘दूसरे चहरे’ (1971)। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मुजफ्फरनगर में हुई। तत्पश्चात आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान (1955) और हिंदी साहित्य (1957) में एम.ए. की उपाधि अर्जित की। सागर विश्वविद्यालय से शोधकार्य संपन्न करके उन्होंने अपनी आजीविका अध्यापन से शुरू की।

से रा यात्री प्रसाद, महादेवी वर्मा, निराला, पंत, बच्चन और नरेंद्र शर्मा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों से प्रभावित थे। वे बेहद संवेदनशील कथाकार थे। समसामयिक सामाजिक एवं राजनैतिक परिदृश्य को देखकर वे चिंता व्यक्त करते थे। उनका व्यक्तिव बहुत सरल था। उनकी सरलता एवं सादगी का एकमात्र कारण यह है कि वे जमीन से जुड़े साहित्यकार थे। कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य और संस्मरण विधाओं में उन्होंने अपनी लेखनी चलाई।

से रा यात्री सचमुच साहित्य के ‘सेरा’ (शेरा) थे। उनकी किताबों का संसार विशाल है। उनकी लेखनी से दराजों में बंद दस्तावेज, लौटते हुए, कई अँधेरों के पार, अपरिचित शेष, चाँदनी के आरपार, बीच की दरार, टूटते दायरे, चादर के बाहर, प्यासी नदी, भटका मेघ, आकाशचारी, आत्मदाह, बावजूद, अंतहीन, प्रथम परिचय, जली रस्सी, युद्ध अविराम, दिशाहारा, बेदखल अतीत, सुबह की तलाश, घर न घाट, आखिरी पड़ाव, एक जिंदगी और, अनदेखे पुल, कलंदर, सुरंग के बाहर जैसे उपन्यासों का सृजन हुआ। साथ ही केवल पिता, धरातल, अकर्मक क्रिया, टापू पर अकेले, दूसरे चेहरे, अलग-अलग अस्वीकार, काल विदूषक, सिलसिला, खंडित संवाद, नया संबंध, भूख तथा अन्य कहानियाँ, अभयदान, पुल टूटते हुए, विरोधी स्वर, खारिज और बेदखल, परजीवी जैसे कहानी संग्रहों में संकलित कहानियाँ पाठकों को सोचने पर बाध्य करती हैं। किस्सा एक खरगोश का, दुनिया मेरे आगे उनके प्रमुख व्यंग्य संग्रह हैं। लौटना एक वाकिफ उम्र का संस्मरण है। वे सफल संपादक भी थे। उन्होंने मासिक ‘वर्तमान साहित्य’ का सफल संपादन किया था। इतनी महत्वपूर्ण कृतियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के बावजूद यात्री जी कहते हैं कि ‘मैं मैं को नहीं लिख पाया। यहाँ आकर मेरी शक्ति खत्म हो गई। जहाँ मुझे स्वयं को लिखना था... ये जो मैंने सब लिखा है, ये तो दिशांतर है।’

से रा यात्री अनेक सम्मानों से सम्मानित हुए। जैसे राजस्थान पत्रिका, जयपुर द्वारा वर्ष 1998 में ‘विरोधी स्वर’ कहानी के लिए पुरस्कृत हुए। राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, डूंगरगढ़, राजस्थान द्वारा 1993 में ‘साहित्यश्री’ सम्मान से अलंकृत हुए। सावित्री देवी चैरिटेबल ट्रस्ट, गाजियाबाद द्वारा 1986 में पुरस्कृत हुए। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा कथा संग्रह ‘धरातल’ (1979), ‘सिलसिला’ (1980), ‘अकर्मक क्रिया’ (1980), ‘अभयदान’ (1979) तथा संस्मरण ‘लौटना एक वाकिफ उम्र का’ (1998) के लिए पुरस्कृत हुए। यात्री जी 2006 में साहित्य भूषण, 2007 में समन्वय द्वारा सारस्वत सम्मान, 2011 में महात्मा गांधी साहित्य सम्मान तथा 2017 में पीटरबर्ग्स अमेरिका के सेतु शिखर सम्मान से भी अलंकृत हुए।

यात्री जी ने भले ही अपनी साहित्यिक यात्रा कविता से शुरू की, लेकिन बहुत जल्दी ही उसकी सीमा को देखते हुए उन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया। उसके बाद उपन्यास, संस्मरण आदि एक के बाद एक लिखते रहे। उनके कवि रूप को उनकी कहानियों और उपन्यासों में भी जीवित देखा जा सकता है। उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की है। यात्री जी का जीवन बहुत ही सरल और पारदर्शी रहा। उनके बाह्य व्यक्तित्व का रेखाचित्र रवींद्र कालिया ने कुछ इस तरह खींचा है – ‘ऊँचा कद, गोरा रंग, काले बाल, चोगे की तरह लंबा घुटनों से नीचे तक सफेद कुर्ता, ढीला पायजामा, कंधे पर समाजवादी झोला, पीछे-पीछे कुत्तों की लंबी कतार, गाजियाबाद की किसी सड़क पर लंबे-लंबे डग भरता हुआ ऐसा कोई आदमी दिखाई दे जाय तो समझ लेना लीजिए, वह कहानीकार से रा यात्री है।’ (रवींद्र कालिया, कॉमरेड मोनालिज़ा तथा अन्य संस्मरण, पृ. 178)। यात्री जी अपने झोले में रोटी के टुकड़े रखते और उन टुकड़ों को रास्ते में कुत्तों को खिलाते। यह उनकी आदत थी। इसीलिए उनके पीछे कुत्तों की लंबी कतार लगी रहती। रवींद्र कालिया उन्हें ‘एक खुली किताब’ मानते हैं। यात्री जी उन ‘अनसंग हीरोज़’ के समान हैं जिनके बारे में लोग बहुत ही कम चर्चा करते हैं। उन्होंने कभी भी यह नहीं चाहा कि लोग उनकी तारीफ के पुल बाँधें। उन्होंने तो मस्त कलंदर की तरह ज़िंदगी बिताई थी।

यात्री जी की रचनाओं में समाज के हर तबके के दर्द को देखा जा सकता है। बच्चों की मानसिकता से लेकर वार्धक्य तक की स्थितियों को यात्री जी ने बखूबी उकेरा है। ‘दराजों में बंद दस्तावेज’ उनका पहला उपन्यास है। इसमें नायक-नायिका के मानसिक द्वंद्व का चित्रण है। ‘लौटे हुए’ में जीवन मूल्यों का निरूपण है। ‘दरारों के बीच’ में बेरोजगारी का चित्रण है। ‘कई अँधेरों के पार’ में मध्यवर्गीय मानसिकता है। ‘आत्मदाह’ में युवा पीढ़ी की पलायन करने की प्रवृत्ति को उजागर किया गया है। ‘उखड़े हुए’ शीर्षक कहानी में शिक्षण संस्था की आड़ में चल रहे शोषण-चक्र का खुलासा किया गया है। ‘किस्सा कोताह’ कहानी में अध्यापकों के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के प्रति कटाक्ष है तो ‘उजरत’ कहानी विद्यार्थी जीवन का दस्तावेज है। ‘जोंक’ में संकीर्ण मानसिकता का चित्रण है। इस प्रकार हर रचना में एक नई समस्या को देखा जा सकता है। उनकी रचनाओं के पात्र हमारे इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं। कभी-कभी तो हम स्वयं एक पात्र बनकर उपस्थित हो जाते हैं।

आज के रचनाकारों के संदर्भ में से रा यात्री का कहना है कि ‘...जोखिम नहीं है। लेखन के लिए एक प्रतिबद्धता होती है, कमिटमेंट होता है। विद आउट कमिटमेंट आप हैं कहाँ? ढोल है…। आज सबसे बड़ी कमी लेखन में कमिटमेंट की है। मैं जोखिम उठाता हूँ और अपने लेखन में रेखांकित करता हूँ।  सारे आजादी के जमाने की जो जद्दोजहद स्टैंड करती है… व्हाई गांधी स्टुड… गांधी क्यों खड़े रहे गए? गांधी इसलिए खड़े रह गए कि उनका शायद मंत्र था। आज कोई मंत्र नहीं है।’

आज संवेदनशून्यता हर दिशा में फैली हुई है। अपने काम के प्रति कमिटमेंट तो है ही नहीं। एक साक्षात्कार में जब उनसे यह पूछा गया कि क्या कोई और आप के बारे में उस तरह लिख सकते हैं जिस तरह आप चाहते हों तो उन्होंने कहा कि ‘मुझ पर 35 लोगों ने पीएचडी की है, लेकिन सब खोखलापन है। ‘उजरत’ कहानी का किसी ने कोई जिक्र नहीं किया। 35 स्कॉलर्स में से... एक ने भी जिक्र नहीं किया ‘उजरत’ का।’ ‘उजरत’ कहानी विद्यार्थी जीवन का जीवंत दस्तावेज है। ‘कितने बचने की कोशिश है, कितना सामने आने का जज्बा है, दोनों चीजें हैं इस कहानी में।’ उनकी बातों में एक संदेश और उनकी चिंता स्पष्ट रूप से मुखरित है। वह यह है कि आज के शोधार्थी महज उपाधि पाने के लिए काम कर रहे हैं, न कि कमिटमेंट से। फिर ऐसी उपाधि किस काम की! एक अलंकरण मात्र!!

आज की पीढ़ी को संदेश देते हुए यात्री जी कहते हैं कि ‘खूब पढ़ना चाहिए। क्लासिक पढ़ना चाहिए। प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए। रेणु को पढ़ना चाहिए। हिमांशु श्रीवास्तव को पढ़ना चाहिए। दिनकर की कविता पढ़नी चाहिए। 34 साल की उम्र में मेरी पहली कहानी छपी ‘धर्मयुग’ में। आज 34 साल की उम्र में 34 किताबें छप जाती हैं।’ हममें ऐसे कितने लोग हैं जो इन रचनाकारों को पूरा पढ़ पाए! पढ़ने का अर्थ यह नहीं कि किताबों के पन्नों को पढ़ लिया। यहाँ पढ़ने का अर्थ है उन किताबों में निहित संवेदनशील तत्वों को ग्रहण करना और अपने जीवन में उतारना। हम ऐसा नहीं करते। ऐसा करने के लिए समय किसके पास है! भागदौड़ की जिंदगी में हम अपने आपसे कटते जा रहे हैं।

सामाजिक विसंगतियों से विचलित यात्री जी हमेशा बेचैन रहे। अपने अंतिम दिनों में भी उनके अंदर यही बेचैनी थी, यही चिंता थी। 16 नवंबर, 2023 को से रा यात्री को अपनी सृजन यात्रा के लिए ‘दीपशिखा’ सम्मान से अलंकृत करने की घोषणा हुई। इस घोषणा के 24 घंटे में ही यात्री जी ‘कई अँधेरों के पार’ ‘गुमनामी के अँधेरे में’ ‘आखिरी पड़ाव’ पर पहुँचकर कभी वापस न लौटने की यात्रा पर निकल पड़े। जन सरोकारों के इस अप्रतिम यात्री को ‘स्रवंति’ की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है! 

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

'स्पैरो' की उड़ान का सम्मान

साहित्यिक क्षेत्र में अंबै के नाम से प्रसिद्ध तमिलनाडु की लेखिका सी. एस. लक्ष्मी (1944) को 2023 के “टाटा लिटरेचर लाइव! लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड” से सम्मानित किया गया है। लक्ष्मी का जन्म कोयंबत्तूर में हुआ था। उनका अधिकांश समय मुंबई और बैंगलूर में बीता। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक की उपाधि अर्जित की। 1956 की असफल क्रांति के कारण हंगरी से पलायन कर रहे शरणार्थियों के प्रति अमेरिकी नीति पर उन्होंने अपना शोधप्रबंध प्रस्तुत किया और नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपना अकादमिक जीवन एक शिक्षक के रूप में शुरू किया। उन्होंने मुंबई में स्त्रियों के लिए “स्पैरो” नाम से एक संस्था की स्थापना की। स्पैरो (SPARROW - Sound Picture ARchives of Research on Women) की स्थापना का विचार उन्हें 1988 में आया। इसके पीछे स्त्रियों के लिए एक अलग अभिलेखागार स्थापित करना ही मुख्य उद्देश्य रहा। इसकी आवश्यकता उनके शोध अध्ययन के दौरान उभरी। उनका उद्देश्य महिला अभिलेखागार को मात्र एक संग्रह के रूप में स्थापित करना नहीं था, बल्कि एक ऐसा अभिलेखागार बनाने का था जो स्त्रियों की समस्याओं को दूर करने में सहायक हो। वर्तमान में आप ही इस संस्था की निदेशक हैं।

अंबै बहिर्मुखी व्यक्तित्व की धनी रचनाकार हैं। समाज में व्याप्त विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के प्रति उन्होंने हमेशा आवाज उठाई। मूलतः स्त्री के अधिकारों के लिए। इसके लिए उन्होंने साहित्य को माध्यम बनाया। अंबै से परिचित लोगों का कहना है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं दीखता। उनकी अधिकांश रचनाओं में स्त्री विषयक मान्यताओं तथा उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए व्यक्तित्व को देखा जा सकता है। उनकी कहानियाँ रिश्तों को उजागर करती हैं। अंबै समकालीन जीवन के बारे में तीखी टिप्पणियाँ करने से भी पीछे नहीं हटती। वह विकट परिस्थितियों में कभी भी हार नहीं मानती।

सी. एस. लक्ष्मी ने 16 वर्ष की उम्र से ही कहानियों के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करना शुरू कर दिया था। 1962 में उनकी पहली कृति ‘नंदिमलै चारलिले’ (नंदी पर्वतों के समीप) प्रकाशित हुई। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - 'अंधि मलय’ (गोधूलि बेला), ‘सिरगुगल मुरियुम’ (पंख टूट जाते हैं), ‘वीट्टिन मूलयिल ओरु समयिलअरै’ (घर के कोने में एक रसोईघर), ‘काट्टिल ओरु मान’ (जंगल में एक हिरण) आदि। उनकी अधिकांश कृतियाँ अंग्रेजी में अनूदित हो चुकी हैं और वे खुद भी अंग्रेजी में लिखती हैं। उन्होंने अनेक नाटकों का भी सृजन किया है। वे सफल अनुवादक भी हैं। हिंदी और अंग्रेजी से तमिल में कविताओं का अनुवाद करती हैं, साथ ही तमिल से अंग्रेजी में।

अंबै की कहानियों का मूल स्वर स्त्री अस्मिता है। अपनी मातृभाषा तमिल में वे अंबै के नाम से लिखती हैं, जबकि अंग्रेजी में लक्ष्मी के नाम से। इसके संबंध में एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया कि सृजनात्मक लेखन के लिए विशेष रूप से अपनी मातृभाषा में वे अंबै नाम का प्रयोग करना ही पसंद करती हैं। तमिल में अंबै का अर्थ है देवी अर्थात पार्वती। अपनी युवावस्था में वे तमिल लेखक देवन से अत्यधिक प्रभावित थी। उनकी कृति ‘पार्वतियिन सबदम’ (पार्वती की शपथ) को पढ़कर वे सोचने को मजबूर हो गईं। उस कृति की मूल कथा एक स्त्री के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें यह बखूबी दिखाया गया है कि अपने पति द्वारा अपमानित स्त्री शपथ लेती है कि वह अपनी अस्मिता के लिए दुनिया से लड़ेगी। वह अपने अस्तित्व के संघर्ष में सफलता हासिल करती है। इससे प्रेरित होकर लक्ष्मी ने ‘अंबै’ नाम से सृजनात्मक लेखन शुरू किया था।

पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के लिए आगे बढ़ना, अपने अस्तित्व को बचाए रखना इतना आसान नहीं है। सदियों से स्त्री को यह कहकर हाशिये पर धकेला गया कि ‘न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।’ हर क्षेत्र में उसे पीछे ही रहना पड़ता है। यदि स्त्री घर की दहलीज लाँघकर समाज में कुछ बनने की इच्छा से किसी क्षेत्र में आगे आती है, तो उसे यह समाज जीने नहीं देता। तरह-तरह के नाम से भी उसे संबोधित किया जाता है। पुरुष तो उसे हर कदम पर टोकने के लिए तैयार रहता है। इतना ही नहीं पुरुष-मानसिकता से ग्रस्त स्त्रियाँ भी स्त्री की दुश्मन बन बैठती हैं। लक्ष्मी ने भी बहुत कुछ झेला है। उन्हें और उनके लेखन को धिक्कारने वालों की कमी नहीं है। इसकी पुष्टि करते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उनके चरित्र पर भी तरह-तरह के लांछन लगाए गए थे। कुछ पुरुष लेखकों ने उनकी तथा उनकी रचनाओं की भर्त्सना की थी। उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया थ। वे एकदम अकेली पड़ गई थीं। फिर भी उन्होंने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। सभी तरह की आलोचनाओं का अंबै ने डटकर सामना किया। इसके लिए उन्होंने लेखनी को हथियार बनाया।

अंबै के स्त्री पात्र हाड़-मांस से बने हैं और अपनी सभी इच्छाओं और कल्पनाओं को बिना किसी हिचकिचाहट के व्यक्त करते हैं। ‘सिरागुगल मुरियुम’ (पंख टूट जाते हैं) कहानी संग्रह की केंद्रीय कहानी में लेखिका ने बेमेल रिश्तों का खुलासा किया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि जब पति का साथ न मिले तो उस पत्नी की जिंदगी नारकीय बन जाएगी। कहानी की केंद्रीय पात्र ऐसी परिस्थितियों में भी साहस के साथ आगे बढ़ती है।

‘वीट्टिन मूलयिल ओरु समयिलअरै’ (घर के कोने में एक रसोईघर) में कुल मिलाकर 20 कहानियाँ संकलित हैं। ये कहानियाँ सांस्कृतिक संदर्भों से युक्त हैं। प्रत्येक कहानी का एक अलग अहसास है। इन कहानियों के माध्यम से हम उस स्त्री की दयनीय स्थिति को समझ सकते हैं जो पारंपरिक रूढ़ियों के कारण पिसती है तथा घर और समाज में अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए संघर्ष करती है। अकसर यही सुनने को मिलता है कि स्त्री का साम्राज्य रसोईघर है। वह रसोईघर से कदम आगे नहीं रख सकती। यदि वह घर के निर्णयों में कुछ सलाह देने के लिए आगे आई, तो उसे चुप करा दिया जाता है यह कहकर कि- जा! रसोई का काम देख पहले। बड़ी आई पुरुष को सलाह देने वाली! रीति-रिवाजों के आगे स्त्री भी इतना दब जाती है कि वह भी अपने आपको रसोईघर तक सीमित कर लेती है। लेखिका यह टिप्पणी करती हैं कि जब तक स्त्री अपने लिए अपने अस्तित्व व अस्मिता के लिए स्वयं संघर्ष नहीं करेगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता। उसे स्वयं ऊपर उठना होगा। उसकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आएगा।

सी. एस. लक्ष्मी ‘अंबै’ एक सशक्त स्त्रीवादी लेखिका हैं। वे कोरी नारेबाजी करने वाली लेखिका नहीं हैं, अपितु ज़मीनी सच्चाई को पाठकों के सामने रखकर स्त्री की समस्याओं के निदान के लिए काम करने वाली सक्रिय कार्यकर्ता हैं। “टाटा लिटरेचर लाइव! लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड” से सम्मानित होने के अवसर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मान पाकर वे अत्यंत गौरव का अनुभव कर रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सम्मान एक स्त्रीवादी रचनाकार का सम्मान नहीं है, अपितु यह साहित्य का सम्मान है। यह एक साहित्यकार का सम्मान है। साहित्य रचनेवाला सिर्फ साहित्यकार अथवा रचनाकार होता है, न कि स्त्रीवादी या पुरुषवादी।

------------------

सरलता का अपनापन!


छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी, 1889 - 15 नवंबर, 1937) कवि के साथ-साथ नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंध लेखक तथा संपादक थे। रामविलास शर्मा के अनुसार वे छायावाद के पहले कवि हैं। प्रसाद एक ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए साध्य को ही मुख्य मानते हैं। यही बात उन्होंने ‘चंद्रगुप्त’ नाटक में चाणक्य के मुख से कहलवाई है। प्रसाद ने जहाँ एक ओर गंभीर ऐतिहासिक साहित्य का सृजन किया है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति, देशप्रेम आदि का चित्रण बखूबी किया है। उनकी कहानियों में साहस-युक्त बाल चरित्र को भी देखा जा सकता है।

हर मनुष्य को बचपन की स्मृतियाँ आह्लादित करती हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बात करें तो जन्म से लेकर किशोरावस्था तक का समय बचपन कहलाता है। सामान्य रूप से कहें तो यह वह समय है जब मनुष्य बिना किसी भेद-भाव के, बिना किसी राग-द्वेष के हँसी-खुशी समय व्यतीत करता है। यह वह सुनहरा समय है जो जिंदगी को तनाव-मुक्त रखता है। इस अवस्था में न तो तनाव के बारे में पता रहता है और न ही सामाजिक विसंगतियों का ज्ञान रहता है। यदि कुछ होता है तो वह है सिर्फ और सिर्फ अल्हड़ खेल। उसी में नन्हे बच्चे भाव विभोर होकर नाचते हैं, गाते हैं, किलकते हैं, खिलखिलाते हैं। अपने चारों ओर खुशियों की सुगंध फैलाते हैं। यदि कहें कि बचपन सबसे मधुर और अविस्मरणीय क्षणों का पुंज है, तो गलत नहीं होगा। इसीलिए शायद जयशंकर प्रसाद भी कह गए - ‘तुम्हारी आँखों का बचपन!/ खेलता था जब अल्हड़ खेल,/ अजिर के उर में भरा कुलेल,/ हारता था हँस-हँस कर मन,/ आह रे वह व्यतीत जीवन!/ तुम्हारी आँखों का बचपन!/ साथ ले सहचर सरस वसंत,/ चंक्रमण करता मधुर दिगंत,/ गूँजता किलकारी निस्वन, पुलक उठता तब मलय-पवन/ तुम्हारी आँखों का बचपन!’ क्या आज भी ऐसा बचपन बचा हुआ है! यह तो सोचने की बात है। ‘आज भी है क्या नित्य किशोर-/ उसी क्रीड़ा में भाव विभोर-/ सरलता का वह अपनापन-/ आज भी है क्या मेरा धन!/ तुम्हारी आँखों का बचपन!’

सांसारिक दाव-पेंच के दबाव के कारण आज असमय ही बालकों का बचपन छिनता जा रहा है। बहुत बार परिस्थितियों के कारण किसी नन्ही सी जान को परिवार की जिम्मेदारी तक अपने कंधों पर उठानी पड़ जाती है। इस विसंगति को अपने समय में जयशंकर प्रसाद ने भी महसूस किया था। उनकी कहानी ‘छोटा जादूगर’ में यह दिखाया गया है कि एक छोटा सा बच्चा कितना हिम्मती है। वह परिस्थितियों का सामना साहस के साथ करता है। एक राहगीर से मेले में उसकी मुलाकात होती है। जब वह व्यक्ति उस छोटे से बच्चे के माता-पिता के बारे में पूछता है, तो वह कहता है कि ‘बाबूजी जेल में हैं’ देश के लिए और माँ बीमार। पिता के जेल जाने के बावजूद वह टूटता नहीं और अपनी बीमार माँ का भी ध्यान रखता है। जब वह राहगीर कहता है कि ऐसी परिस्थिति में वह तमाशा देख रहा है, तो वह झट से कहता है, ‘तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शर्बत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती!’ (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग iv, पृ. 264)। ऐसा कह पाना सबके लिए आसान नहीं। यह वही बहादुर बच्चा कह सकता है जिसने जिंदगी के खट्टे-मीठे लम्हों को जिया हो।

आजकल परिस्थितियों के कारण बच्चे जल्दी ही चतुर और सांसारिक बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया के कारण बच्चों का बचपन गुम होता जा रहा है। मासूमियत कोसों दूर है। प्रसाद जी के ज़माने में सोशल मीडिया तो न था, लेकिन राष्ट्र और समाज की परिस्थितियाँ अति विषम थीं। इसीलिए उन्होंने लिखा, ‘बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।’ (वही)। छोटा जादूगर छोटी उम्र में बीमार माँ के इलाज के लिए रास्ते में लोगों को जादू दिखाकर पैसा कमाने का काम करता है। जब उसकी माँ अंतिम साँसें ले रही होती है, तब भी वह जादू दिखाने चल पड़ता है। यह अंश पढ़ते समय पाठक द्रवित हुए बिना नहीं रह सकते।

‘छोटा जादूगर’ कहानी पढ़ते समय मानो ऐसा लगता है कि जयशंकर प्रसाद स्वयं पात्र बनकर उपस्थित हैं जो बाल मन को समझने का प्रयास कर रहे हैं। मेले में जब बच्चा जाता है, तो वहाँ चीजों को देखकर उसका मन ललचाता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन मेले में जाने के बावजूद बच्चा खिलौने या फिर मिठाइयों को खरीदने के बजाय, तमाशा देखने के बजाय घर-परिवार के बारे में, घर की जरूरतों के बारे में सोचता हो, तो तनिक रुक कर सोचना पड़ेगा। ‘छोटा जादूगर’ कहानी के बाल पात्र को भी मेले की चीजें अच्छी लगती हैं। वह कहता है - ‘मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।’ (वही, पृ. 266)। यह सब उस बच्चे ने बड़े गर्व और आत्मविश्वास के साथ कहा। जब वह बोल रहा था तब उसकी वाणी में कहीं भी रुकावट नहीं थी। यह उसके आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह मातृ-प्रेम को दर्शाने वाली अद्वितीय कहानी है। इस कहानी में जयशंकर प्रसाद ने परोक्ष रूप से स्वाधीनता संग्राम में जेल जाने वाले एक पात्र का उल्लेख किया है।

बच्चे मन के सच्चे होते हैं। छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाते हैं। उसी तरह छोटी सी बात पर दुखी भी हो जाते हैं, रूठते भी हैं, हंगामा भी करते हैं। कहने का अर्थ है कि बच्चे किसी एक मनोदशा में ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। एक ही क्षण में उनकी इच्छाएँ बदल जाती हैं। बच्चे आसानी से किसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उनके मन में अपार दया का भाव रहता है। कहा जाता है कि उनमें भगवान वास करते हैं। ‘गूदड़ साईं’ शीर्षक कहानी में प्रसाद जी ने साईं के माध्यम से यह कहा कि ‘मेरे पास, दूसरी कौन वस्तु है, जिसे देकर इस ‘रामरूप’ भगवान को प्रसन्न करता!’ (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ, पृ.16)। इस कहानी का नन्हा मोहन साईं को ‘गरीब और भिखमंगा जानकर माँ से अभिमान करके पिता की नजर बचाकर कुछ साग-रोटी लाकर दे देता, तब उस साईं के मुख पर पवित्र मैत्री के भावों का साम्राज्य हो जाता।’ (वही)।

जयशंकर प्रसाद मनुष्यता को प्रमुखता देने वाले साहित्यकार हैं। उनके समग्र साहित्य में इस तत्व को रेखांकित किया जा सकता है। उनके अनुसार जीवन की मुख्य संवेदनाएँ हैं मानवता और करुणा। ‘अनबोला’ एक ऐसी कहानी है जिसमें प्रसाद जी ने इन मानवीय संवेदनाओं को उकेरा है। इस कहानी में जग्गैय्या का मातृ-प्रेम दिखाया गया है। जग्गैय्या एक छोटा सा बालक है। पिता का साया बचपन में उठ गया था। उसके सिर पर तो सिर्फ ममतामयी माँ का हाथ था। “जग्गैय्या को केवल माँ थी, वह कामैया के पिता के यहाँ लगी-लिपटी रहती, अपना पेट पालती थी। कामैया की मछलियाँ ले जाकर बाजार में बेचना उसी का काम था।’ (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग iv, पृ.312)। एक दिन जाल में मछलियों के साथ-साथ समुद्री बाघ भी आ गया। ‘जग्गैय्या की माँ अपना काम करने की धुन में जाल में मछलियाँ पकड़कर दौरी में रख रही थी। समुद्री बाघ बालू की विस्तृत बेला में एक बार उछला। जग्गैय्या की माता का हाथ उसके मुँह में चला गया। कोलाहल मचा; पर बेकार! बेचारी का एक हाथ वह चबा गया।’ (वही, पृ.313)। जग्गैय्या अपनी मूर्च्छित माँ को उठाकर झोंपड़ी में ले चलता है। उसके मन में कामैया के पिता के लिए असीम क्रोध भर जाता है। अपनी माँ को कष्ट में देखकर वह सोचने लगता कि यदि उसके पास खुद की नाव होती तो माँ को आज यह दिन देखना न पड़ता। वह चाहते हुए भी अपनी माँ को बचा नहीं पाता। छोटी उम्र में ही माता-पिता की छाया से वंचित न जाने कितने जग्गैय्या जीवन-संघर्ष में अग्रसर हैं! ऐसी स्थिति में अपने जीवन यापन के लिए उन्हें काम करना ही पड़ता है। सेठ-साहूकार काम तो करवा लेते हैं, लेकिन पगार तो उन्हें नाममात्र के लिए ही देते हैं। बालश्रम कानूनन अपराध है, पर वे बच्चे कर ही क्या सकते हैं! प्रसाद की कहानी का मधुआ एक ऐसा ही पात्र है जो ‘कुँअर साहब का ओवरकोट लिए खेल में दिनभर साथ रहा। सात बजे लौटा तो और भी नई भजे तक कुछ काम करना पड़ा।’ (जयशंकर प्रसाद, प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. 91)। रोटी के बदले उसे लातें खाने को मिलीं। प्रसाद ने इस कहानी में यह दर्शाया है कि बालक मधुआ की ममता और निरीहता एक शराबी के भीतर क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘बालक चंद्रगुप्त’ एक छोटी सी ऐतिहासिक कहानी है। इस कहानी में उन्होंने रोचक ढंग से इतिहास के नायक चंद्रगुप्त के बचपन की झाँकी प्रस्तुत की है। बचपन में चंद्रगुप्त राजसी वैभव का अभिनय करता है। उस समय उसकी मुलाकात चाणक्य से होती है। भले ही यह दृश्य नाटकीय है, पर बहुत प्रभावी है। प्रसाद के बाल चरित्रों में जहाँ एक ओर प्रेम, करुणा, दया जैसी संवेदनाएँ हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें मातृप्रेम के साथ-साथ देशप्रेम जैसे राष्ट्रीय मूल्य भी निहित हैं।

गुरुवार, 14 सितंबर 2023

देश को सिलने के लिए चाहिए एक सुई



सितंबर! हिंदी प्रेमियों के लिए उत्सव का माहौल। पाठशालाओं, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, स्वैच्छिक संस्थानों, बैंकों, राजभाषा विभागों आदि में चारों ओर कोलाहल। न जाने कितनी तरह की प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। अवसर है ‘हिंदी दिवस’। आखिर हिंदी दिवस को इतना महत्व क्यों दिया जाता है! कभी सोचा है।

14 सितंबर, 1949 को हिंदी ने भारत की राजभाषा का पद संवैधानिक रूप से प्राप्त किया। पहली बार 14 सितंबर, 1953 को ‘हिंदी दिवस’ मनाया गया। तब से लेकर आज तक यह एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भारत एक उत्सवधर्मी देश है। हर महीने कोई न कोई त्योहार होता ही है। छोटी-छोटी उपलब्धियों को भी उत्सव के रूप में मनाकर भारत के लोग आपस में भाईचारा कायम रखते हैं। ऐसे ही सितंबर में सभी हिंदी प्रेमी ‘हिंदी दिवस’ मनाने के लिए एकजुट हो जाते हैं।

हिंदी दिवस क्यों मनाते हैं, इसके पीछे निहित कारण हम सब जानते ही हैं। मैं तो बस यही कहना चाहूँगी कि इसे केवल एक औपचारिकता न समझा जाए। वैसे भी, हम दूसरे तमाम त्योहार क्यों मनाते हैं? क्योंकि हमारे हर त्योहार के पीछे कोई न कोई मूल्य अवश्य जुड़ा हुआ होता है। चाहे वह दीवाली हो या दशहरा, ईद हो या होली, बैसाखी हो या बड़ा दिन, ये त्योहार हमारे लिए केवल औपचारिक नहीं हैं। इनका संबंध हमारे जीवन मूल्यों से है। 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्तूबर की तरह 14 सितंबर भी हमारा राष्ट्रीय पर्व है। और इस पर्व के मूल में जो मूल्य निहित है वह है ‘भारतीयता’ – ‘राष्ट्रीयता’। भारतवर्ष की भावात्मक एकता। हमारा यह देश बहु-सांस्कृतिक और बहु-भाषिक है। हिंदी भारत की सामासिक एकता को अक्षुण्ण रखने का एक आधार है।

भौगोलिक रूप से हमारे बीच दूरियाँ बहुत हैं। लेकिन भावात्मक एकता के धरातल पर हम सब एक हैं। कहने का आशय है कि उत्तर के राज्यों और दक्षिण के राज्यों के बीच भौगोलिक दूर हो सकती है और है भी। इन भौगोलिक दूरियों के बावजूद यह पूरा देश भावात्मक रूप से एक सूत्र में जुड़ा हुआ है। इस भावात्मक एकता को मजबूत बनाने वाला तत्व है ‘भाषा’।

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसने संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया और अंग्रेजों की दासता से भारत को मुक्त किया। विभिन्न भाषाएँ बोलने वाला और विभिन्न प्रांतों में बँटा हुआ भारत एक राष्ट्र बना और हिंदी इसकी राजभाषा बनी। उल्लेखनीय है कि भाषा के अभाव में न ही मनुष्य का अस्तित्व होता है और न ही देश का। इस संदर्भ में थोमस डेविड का कथन ध्यान खींचता है। उनका कहना है कि कोई भी देश राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र नहीं कहला सकता।

भाषा महज आदान-प्रदान या अभिव्यक्ति का साधन नहीं है अपितु वह मनुष्य की अस्मिता है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो एक साथ अनेक भूमिकाएँ निभा सकती है और निभा भी रही है। अर्थात जनभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, शिक्षा की माध्यम भाषा, प्रौद्योगिकी की भाषा, बाजार-दोस्त भाषा, मीडिया भाषा आदि। साहित्यिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में हिंदी की भूमिका निर्विवाद है। महात्मा गांधी ने हिंदी की इस ताकत को पहचाना और ‘स्वभाषा’ को स्वराज्य के लिए अनिवार्य घोषित किया। उनकी यह मान्यता थी कि हिंदुस्तान की आम भाषा अंग्रेजी नहीं, हिंदी ही हो सकती है। क्योंकि अलग-अलग भाषा-भाषी भी हिंदी में आसानी से बातचीत कर सकते हैं। अपने भावों को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

भाषा एक संवेदनशील वस्तु है। जरा सी गलती हो जाए, तो वह तोड़ने वाली शक्ति बन सकती है। आप जानते ही हैं, भाषा के नाम पर आपस में झगड़े होने से देश किस तरह टुकड़ों में बँट जाते हैं। इसीलिए कभी कभी ऐसा भी लगता है कि भाषा के नाम पर राज्य बनना भाषा की नकारात्मक भूमिका है। किंतु इसके विपरीत भाषा की एक सकारात्मक भूमिका भी है। वह है जोड़ने की ताकत। हम सबको नकारात्मकता को छोड़कर इसी सकारात्मक तत्व को ग्रहण करना होगा। यह उचित भी है। अतः कहा जा सकता है कि ‘हिंदी दिवस’ भाषा के संबंध में सकारात्मक सोच के प्रति अपने आपको समर्पित करने का दिन है।

14 सितंबर, 1949 को जब भारतीय संविधान के निर्माताओं ने हिंदी को ‘भारत संघ की राजभाषा’ बनाया, तो वे इसे केवल ‘राजकाज’ की भाषा नहीं बना रहे थे, बल्कि भावात्मक एकता की भाषा बना रहे थे। इसीलिए उन्होंने दो और विशेष प्रावधान रखे। एक प्रावधान यह रखा कि अलग-अलग प्रांत अपनी-अपनी राजभाषाएँ रखने के लिए स्वतंत्र हैं। दूसरे, इन अलग-अलग राजभाषाओं को भावात्मक एकता की दृष्टि से जोड़ने के लिए अनुच्छेद 351 का प्रावधान किया गया। यह कहा गया कि हिंदी का विकास इस तरह से हो कि वह सामासिक संस्कृति (मिश्रित संस्कृति) का प्रतिबिंब बने। अतः हम सबको यह समझना जरूरी है कि हिंदी केवल राजभाषा नहीं है, बल्कि अलग-अलग भाषा और बोलियाँ बोलने वाले इस महान देश के लोगों को आपस में जोड़ने वाली एक सुई है। यहाँ मुझे तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा की एक कविता याद आ रही है –

इंसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ
फटे भूखंडों पर
पैबंद लगाना चाहती हूँ
रफ़ू करना चाहती हूँ
चीथड़ों में फिरने वाले लोगों के लिए
हर चबूतरे पर
सिलाई मशीन बनना चाहती हूँ
असल में यह सुई
मेरी माँ की है विरासत
आत्मीयताओं के टुकड़ों से मिली
कंथा है हमारा घर
सीने का मतलब ही है जोड़ना
सीने का मतलब ही होता है बनाए रखना
माँ अपनी नजरों से बाँधती थी
हम सबको एक ही सूत्र में
सुई की नोक चुभाकर
होती थी कशीदाकारी भलाई के ही लिए
नस्ल, देश और भाषाओं में विभक्त
इस दुनिया को
कमरे के बीचों-बीच ढेर लगाकर
प्रेम के धागे से सी लेना चाहती हूँ (एन. अरुणा, मौन भी बोलता है)

सुई की तरह ही हिंदी भाषा किसी और भाषा की पहचान के लिए खतरा पैदा नहीं कर सकती। बल्कि यह उन सबको आपस में जोड़ती है। क्या आप बता सकते हैं कि घड़ी, गाड़ी, टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल, उपग्रह आदि चीजों को कैसे बनाया जाता है? जी हाँ, टुकड़ों में। टुकड़ों को असेम्बल करके जोड़ा जाता है। तभी उत्पाद तैयार होकर हमारे सामने आएगा। कहने का आशय है कि अलग-अलग टुकड़ों को असेम्बल करते हुए किसी भी उपकरण का निर्माण किया जाता है। अगर इन टुकड़ों को अलग-अलग ही रहने देंगे तो क्या उपकरण बनेगा! नहीं। इसी प्रकार राष्ट्र के निर्माण में वह जो प्राण तत्व है, आत्मा है जो दिखाई नहीं देती, वह है हमारी संपर्क भाषा। इस संपर्क भाषा के द्वारा ही सारी भाषाएँ जुड़कर ‘भारतीय चिंतन की भाषा’ का निर्माण करती हैं। इसी भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है। अतः हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि असेम्बल करने वाले इस तत्व को कभी भी खत्म नहीं होने देंगे। हिंदी भाषा की सीमेंटिंग पावर को पहचानकर उसके साथ जुड़ेंगे।

हिंदी के वैश्विक विस्तार हेतु विचारणीय बिंदुओं के संबंध में आज सोशल मीडिया के माध्यम से काफी कुछ कहा जा रहा है। वहाँ 'वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ (हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के प्रयोग व प्रसार का मंच) एक ऐसा सक्रिय मंच है जिसके माध्यम से आम जनता हिंदी भाषा के संबंध में अपने विचार व्यक्त कर पा रही है। हिंदी दिवस के हवाले से यहाँ विभिन्न लोगों द्वारा सुझाए गए कुछ बिंदु पाठकों के विचारार्थ प्रस्तुत हैं –

• अनेक कंप्यूटर-साधित सॉफ्टवेयर बनाए जाएँ जिससे हिंदी का प्रचलन और भी आसान हो सके।

• विभिन्न संगठनों द्वारा विकसित भाषा-उपकरण न सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित हों अपितु उन्हें जन-मानस के लिए सुलभ कराया जाए।

• हिंदी सिर्फ एक सरकारी भाषा बनकर न रह जाए अपितु लोग उसे सहर्ष स्वीकारें। हिंदीतर भाषियों को इस प्रकार प्रेरित करना चाहिए कि वे हिंदी को सहर्ष ही अपने आप स्वीकारें।

• इंडिया हटाओ ‘भारत’ बनाओ।

• भारत सरकार के सभी कार्यालयों, मंत्रालयों, विभागों आदि का कामकाज प्रथम राजभाषा हिंदी में नोट शीट से लेकर सभी विधेयक तक बिना विलंब प्रारंभ कर दिया जाय।

• न्याय के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय तक अपील तथा बहस की सुविधा हिंदी में भी उपलब्ध करा दी जाए।

• सभी कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को बिना विलंब बनाने का समय आ गया है।

• देश में देवनागरी लिपि के लिए अंग्रेजी भाषा की लिपि का उपयोग तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है। यह हिंदी की लिपि देवनागरी के अस्तित्व पर संकट पैदा कर रहा है। इसे हतोत्साहित करना चाहिए।

अंततः इतना ही कि अब समय आ गया है कि हिंदी को उसका सही सम्मानपूर्ण वैश्विक स्थान प्रदान कराने के लिए सभी भारतवासियों को नवीनतम भाषा प्रौद्योगिकी से सुसज्जित होकर भाषाभिमान का परिचय देना चाहिए।

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

भाषा के लक्षण

मानवेतर और मानव भाषा के बीच निहित भेद स्पष्ट करने की प्रक्रिया के कारण भाषा के लक्षण सामने आए। यहाँ भाषा के कुछ प्रमुख लक्षणों पर विचार किया जाएगा। यह पहले भी संकेत किया गया है कि मनुष्य ध्वनियों और प्रतीकों के माध्यम से भावों और विचारों को प्रकट करते हैं। भावाभिव्यक्ति के समस्त साधन भाषा के व्यापक अर्थ में सम्मिलित हो जाते हैं। भाषा के व्यापक अर्थ की सीमाएँ अत्यंत विस्तृत हैं। वस्तुतः व्यापक अर्थ उसकी सीमाओं को संकेतों से लेकर मूक भावाभिव्यक्तियों तक पहुँचा देता है तथा जिसके अंतर्गत केवल मानवीय भाषा ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों के निरर्थक समझे जाने वाले स्वर भी सम्मिलित हो जाते हैं। लेकिन भाषाविज्ञान के अनुसार भाषा का आशय सिर्फ और सिर्फ मानव भाषा है. मानव भाषा के लक्षणों को ही भाषाविज्ञान मान्यता देती है. भाषाविज्ञान ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाषा की संरचना हमेशा नियमबद्ध होती है. सस्यूर, जॉन लयोंस और चार्ल्स हॉकेट आदि ने भाषा के कुछ लक्षण निर्धारित किए. कुछ प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –

अभिव्यक्ति की क्षमता : अभिव्यक्ति वक्ता और श्रोता तथा लेखक और पाठक के बीच संबंध स्थापित करता है. इसे संप्रेषण क्रिया (कम्यूनिकेशन एक्ट) कहा जा सकता है. इससे सामाजिक संबंधों को स्थापित किया जा सकता है.

अर्जित व्यवहार : व्यवहार दो प्रकार का होते हैं – प्राकृतिक व्यवहार और अर्जित व्यवहार. प्राकृतिक व्यवहार वह है जो अनायास ही सीखा जा सकता है. अर्थात खाना, पीना, हँसना, रोना, चिल्लाना, चीखना, बैठना आदि. यह व्यवहार सभी प्राणियों में समान होते हैं. इसके विपरीत कुछ व्यवहार परिश्रमपूर्वक अर्जित किए जाते हैं. भाषा अर्जित व्यवहार है. इसे व्यवस्थित ढंग से सीखना पड़ता है. मातृभाषा अर्जन अनुकरण के माध्यम से अनायास ही हो जाता. द्वितीय भाषा और विदेशी भाषा को सायास रूप से सीखना पड़ता है.

अनुकरणशीलता : यह पहले भी संकेत किया जा चुका है कि भाषा अर्जित व्यवहार है. मनुष्य भाषा को पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त नहीं कर सकता. जिस परिवार में वह जन्म लेता है वहीं से भाषा को अर्जित करता है. मनुष्य अनुकरण के माध्यम से ही भाषा सीखता है.

सामाजिक व्यवहार : भाषा अर्जित व्यवहार होने का अर्थ है कि उसका संबंध समाज से है. समाज में रहकर ही इसे सीखा जा सकता है और समाज में ही इसका प्रयोग किया जाता है. वस्तुतः भाषा सामाजीकरण का सबसे महत्वपूर्ण घटक है. भाषा को सामाजिक संस्था भी कहा जाता है. वह इसलिए कि भाषा का निर्माण नहीं होता बल्कि विकास होता है.

परिवर्तनशीलता : भाषा की संरचना ऐसी होती है कि उसमें परिवर्तन आवश्यक होता है. परिवर्तन जीवंतता का परिचायक होता है. हिंदी भाषा को ही देखें तो उसके विकास क्रम में संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी का क्रम दिखाई देता है. हिंदी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से माना जाता है. क्रमशः परिवर्तित होते हुए हिंदी का वह रूप आज समाने है जिसे हिंदी का आधुनिक रूप कहते हैं. हिंदी के संबंध में इस परिवर्तन को गृह > घर; चंद्र > चाँद आदि में देखा जा सकता है. ऐसे परिवर्तन को प्रायः ध्वनि परिवर्तन कहा जाता है. इसी प्रकार विदेशी भाषाओं के कारण हिंदी ध्वनियों का विकास हुआ. जैसे – ऑ, ग़, ज़, फ़ आदि ध्वनियाँ अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों को ग्रहण करके हिंदी में लाया गया है. संस्कृत में तीन वचन और लिंग हैं तो हिंदी में दो. इसी प्रकार शब्द के स्तर पर भी भाषा परिवर्तित होती है. जैसे हिंदी में अनके विदेशी शब्द ग्रहण कर लिए गए. समय के साथ-साथ भाषा में नए-नए शब्द आते रहते हैं. जैसे – छटाक, पाव, सेर आदि के स्थान पर ग्राम तथा किलोग्राम आ गए. अर्थात समय के साथ-साथ परिवर्तन करना पड़ता है. जिस भाषा में परिवर्तन के जितने स्तर होते हैं वह भाषा उतना ही विकास करती है. अतः आधुनिक भाषाविज्ञान में परिवर्तन को भाषा का मुख्य लक्षण माना गया है.

मानकता : प्रत्येक भाषा का एक मानक रूप होता है. इसका प्रयोग औपचारिक वार्तालाप और लिखित अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है. इन दोनों स्थितियों में भाषा प्रयोक्ता भाषा के मानक रूप का यथासंभव प्रयोग करने का प्रयास करता है. मानक भाषा रूप को शिक्षा में, कामकाज में अपनाया जाता है. हिंदी के संबंध में कहें तो इसके अनके रूप समाज में प्रचलित हैं लेकिन उसके मानक रूप खड़ीबोली को ही शिक्षा के स्तर पर स्वीकार किया जाता है. भाषा के मानक रूप को विकसित करने की प्रक्रिया को मानकीकरण कहा जाता है. यह एक सामाजिक प्रक्रिया है क्योंकि समाज ही यह निश्चित करता है कि मानक भाषा की आवश्यकता है या नहीं. यह पूरी तरह से समाज केंद्रित संकल्पना है.

पॉल गार्विन (1959) ने अपने आलेख ‘A Conceptual Framework for the study of the language standardization’ में यह प्रतिपादित किया है कि ‘किसी भी भाषा समुदाय के सदस्यों के लिए भाषा राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है.’ मानक भाषा के बारे में स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि ‘Standard Language is a codified variety of language that serves the multiple and complex communicative needs of a speech community that has either achieved modernization or has the desire of achieving it.’ उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मानक भाषा के लिए सतत लचीलापन (constant flexibility) और बौद्धीकरण (intellectualization) के गुण होने चाहिए.

फर्ग्यूसन (1962) ने मानकीकरण तथा लेखन के दो आयामों के आधार पर मानक भाषाओं के विकास को स्पष्ट करने का प्रयास किया है. उन्होंने लेखन के तीन बिंदु बनाए (0, 1, 2) और मानकीकरण के चार बिंदु (0, 1, 2, 3).
मानकीकरण की प्रक्रिया को दो स्तरों पर समझा जा सकता है –

यादृच्छिकता : इसका अर्थ है ‘इच्छानुसार’. भाषा में यादृच्छिकता हर स्तर पर पाई जाती है. यह समाज द्वारा स्वीकार्य लक्षण है. यदि ऐसा नहीं होता तो प्रायः संसार की सभी भाषाओं में एक वस्तु के लिए एक ही शब्द होता है. कहने का आशय है, ‘पानी’ के लिए सभी भाषाएँ ‘पानी’ का ही प्रयोग करतीं. जबकि ऐसा नहीं है. ‘पानी’ के लिए अंग्रजी में ‘वाटर’, तेलुगु में ‘नीरु’, तमिल में ‘तन्नीर’, मलयालम में ‘वेल्लम’, रूसी में ‘वदा’ आदि का प्रयोग किया जाता है. विभिन्न भाषाओं में सभी शब्दों में यादृच्छिकता द्रष्टव्य है. आधुनिक भाषाविज्ञान के जनक सस्यूर ने यादृच्छिकता सिद्धांत का प्रतिपादन किया और कहा कि, “The link between signal and signification is arbitrary. The term arbitrary implies that the signal is unmotivated; that is to say arbitrary in relation to its signification, with which it has no natural connection in reality (de Saussure, 1983).” रवींद्रनाथ श्रावास्त्व (1997 : 58) कहते हैं कि यादृच्छिकता के कारण एक शब्द के लिए भिन्न भिन्न भाषाओं में अलग अलग शब्द पाए जाते हैं. एक भाषा में भी एक शब्द के लिए अनेक पारिभाषिक शब्द पाए जाते हैं.

संरचना द्वैतता : अपनी पुस्तक ‘द स्टडी ऑफ लैंग्वेज’ में जॉर्ज यूल ने कहा कि “Duality is a property of language whereby linguistic forms have two simultaneous levels of sound production and meaning; also called ‘double articulation’.” (George Yule, 2010). भाषा की प्रत्येक इकाई द्विपक्षीय होती है. एक ओर जहाँ इनका निर्माण कुछ निश्चित ध्वनियों के माध्यम से होता है वहीं दूसरी ओर ये इकाइयाँ कुछ विशिष्ट अर्थ प्रकट करती हैं.

सृजनात्मकता : मानव भाषा और मानवेतर भाषा को अलगाने की दृष्टि से चॉमस्की ने सृजनात्मकता को आधार बनाया. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वक्ता आवश्यकतानुसार भाषा में नए शब्द और वाक्यों का सृजन करता है.

लचीलापन : लचीलेपन को भाषा की जीवंतता का कारण तथा उसकी शक्ति माना जा सकता है.

भाषा और भाषाविज्ञान


भाषाविज्ञान भाषा का ही वैज्ञानिक अध्ययन है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि भाषा क्या है? उसका विकास और परिवर्तन कैसे और क्यों होता है? उसके क्या कारण हैं? आदि। अर्थात भाषाविज्ञान भाषा संबंधी सभी प्रश्नों एवं समस्याओँ का निदान करता है। भाषाविज्ञान से संबंधित पहलुओं पर विचार करने से पूर्व भाषा क्या है? भाषा की परिभाषा क्या है? भाषा के क्या लक्षण हैं? भाषा और अभिव्यक्ति का क्या अंतःसंबंध है? आदि प्रश्नों पर विचार करना समीचीन होगा। सबसे पहले मानवेतर और मानव संप्रेषण पर विचार करेंगे। 

मानवेतर और मानव संप्रेषण

भाषा संप्रेषण का सशक्त साधन है। वह केवल विचार-विनिमय का साधन मात्र नहीं है अपितु मनुष्य का अस्तित्व इसके माध्यम से ही सिद्ध होता है। भाषा के अभाव में मनुष्य केवल जैविक जंतु (बायोलोजिकल ऑर्गानिज्म) है। भाषा ही वह साधन है जो मनुष्य को इस समाज से जोड़कर उसे समाज-सांस्कृतिक प्राणी के रूप में परिवर्तित करता है। 
भाषा क्या है? इस पर विचार करने से पूर्व ‘भाषा’ शब्द की व्युत्पत्ति पर ध्यान देना आवश्यक है। ‘भाषा’ शब्द संस्कृत की धातु ‘भाष’ से बना है जिसका अर्थ है बोलना या कहना। इस दृष्टि से ‘जो बोला जाए वह भाषा है।’ संसार के प्रायः सभी प्राणी बोलते तो हैं। प्रत्येक जीवधारी गाय, कुत्ता, बिल्ली, बंदर आदि परस्पर भावों के आदान-प्रदान हेतु किसी-न-किसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं। ‘रामचरितमानस’ में खग भाषा का उल्लेख है – समुझै खग खग ही कै भाषा। पशु-पक्षियों की भाषा का अध्ययन करने वालों का मत है कि मनोदशा के अनुसार पशु-पक्षियों की ध्वनियाँ परिवर्तित हो जाते हैं। लेकिन भाषाविज्ञान की दृष्टि से उनके विचार-विनिमय को भाषा की संज्ञा नहीं दी जाती। 

भाषाविज्ञान में मानव के मुख से उच्चरित ध्वनि व्यवस्था को ही ‘भाषा’ की संज्ञा दी जाती है। मनुष्य कभी कभी आँख, हाथ, सिर आदि का प्रयोग करके अपना काम संकेतों से चलाता है। इसे सांकेतिक भाषा, इंगित भाषा अथवा आंगिक भाषा कहा जाता है। मनुष्य कई प्रकार के संकेत चिह्नों से भी काम चलाता है। चौराहे की बत्तियाँ, रेलवे गार्ड की झंडियाँ, झंडे का रंग, मोर्स कोड, कूट भाषा, सिक्के, राष्ट्रध्वज, विवाह में निमंत्रण के लिए हल्दी-सुपारी बाँटना आदि भी सांकेतिक भाषा के अंतर्गत ही आते हैं। सभ्यता और संस्कृति के अनेक उपादान प्रतीकात्मक होते हैं; जैसे – दाड़ी, पगड़ी आदि। स्वस्तिका, ईद का चाँद, क्रॉस आदि धार्मिक प्रतीक हैं तो × √ ∑ + = आदि गणित के प्रतीक हैं। इन प्रतीकों के बिना मनुष्य का जीवन यापन कठिन है। ये सारे प्रतीक सूक्ष्म संकेतात्मक और ध्वन्यात्मक हैं लेकिन भाषाविज्ञान की दृष्टि से इन्हें भाषा नहीं कहा जा सकता। 

स्मरणीय है कि मानव भाषा केवल सांकेतिक न होकर लिखित है। अतः मनुष्य के भावों, विचारों और अभिप्रेत अर्थों को अभिव्यक्त करने का ध्वनि प्रतीकमय साधन भाषा है। भाषाविज्ञान में भाषा के इसी रूप का अध्ययन किया जाता है। भाषा शब्द का प्रयोग कृत्रिम भाषा के लिए भी होता है। कृत्रिम भाषा उसे कहते हैं जिसे मनुष्य अपनी सुविधा या उद्देश्य से गढ़ लेते हैं. वस्तुतः कृतिम भाषा का प्रयोग उस भाषा के लिए किया जाता है जो सहज न होकर तोड़ी-मरोड़ी जाती है. देवेंद्रनाथ शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘भाषाविज्ञान की भूमिका’ में कृत्रिम भाषा को अंतरराष्ट्रीय भाषा की संज्ञा दी है और कहा है कि “भाषा भेद जनित असुविधाओं को दूर कर अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के लिए एक सामान्य भाषा प्रस्तुत करना ही कृत्रिम भाषा के आविष्कार का उद्देश्य है। अतः चाहें तो कृत्रिम भाषा को अंतरराष्ट्रीय भाषा भी कह सकते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विगत दो शताब्दियों में सैकड़ों भाषाएँ बनाई गईं। किंतु उनमें अधिकतर उत्पत्ति के साथ ही गतायु हो गईं।” (देवेंद्रनाथ शर्मा, (2008), पृ. 52)। इस प्रकार की भाषा का प्रमुख उदाहरण है एस्पेरांतो नाम की भाषा. कृत्रिम भाषा प्रयोग में कुछ समस्याएँ उत्पन्न होती हैं क्योंकि कृत्रिम भाषा दैनिक व्यवहार के लिए उपयुक्त कामचलाऊ भाषा है। अतः इसमें न ही गंभीर आलोचना संभव है न ही साहित्य रचना। 

मानवेतर और मानव भाषा के संबंध में प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक चार्ल्स हॉकेट (1960) ने अपना आलेख ‘द ऑरिजिन ऑफ द लैंग्वेज’ में विचार प्रस्तुत किए। उनका कहना है कि “man is the only animal that can communicate by means of abstract symbols. Yet this ability shares many features with communication in other animals, and has arisen from these more primitive systems.” उन्होंने मानवेतर एवं मानव भाषा की तुलना सृजनात्मक यादृच्छिकता तथा द्वैतता के आधार पर की. इसके लिए उन्होंने 13 आधारों को कसौटियों के रूप में प्रयोग किया जो निम्नलिखित हैं –
             Vocal-auditory channel (मौखिक श्रव्यता): मानव भाषा मुँह से बोली जाती है और कान से सुनी जाती है। यह मौखिक-श्रव्य सरणि है। भाषा की लिखित-पठित सरणि का आधार भी यही है। 

            Broadcast transmission (प्रसारण संचरण) and directional reception (दिशात्मक अभिग्रहण): जब मानव मुख से ध्वनियाँ निकलती हैं तो ध्वनि तरंग सभी दिशाओं में संचरण करता है तथा सुनने वाले श्रोता का ध्यान भी उसी दिशा की ओर जाता है.

            Rapid fading (Transitoriness) (अनित्यता): नाम से स्पष्ट है कि ध्वनि अल्पकालिक है. कहने का आशय है कि ध्वनि मुँह से निकलने के बाद लुप्त हो जाती है। कहने का आशय है कि जैसे ही वक्ता बात करना बंद कर देता है तो ध्वनि तरंगे रुख जाती हैं। 

Interchangeability (परिवर्तनीयता) : मनुष्य जब संदेश को संप्रेषित करता है तो वह वक्ता की भूमिका में होता है और वह जब संदेश के ग्रहण करता है तो श्रोता की भूमिका में होता है. अर्थात वक्ता-श्रोता की भूमिकाएँ आपस में परिवर्तनशील हैं। 

         Total feed back (पूर्ण प्रतिक्रया): वक्ता अपने वक्तव्य को सुनकर यदि उसमें कोई कमियाँ निहित हैं तो उनका निराकरण कर सकता है। अनुतान, बालाघात आदि की सहायता से वह बोलने की पद्धति को बदल सकता है। 


        Specialization (विशेषीकरण): भाषिक संकेतों के माध्यम संप्रेषण संभव होता है। संकेतों के माध्यम से मौखिक भाषा को विशेषीकृत किया जाता है ताकि श्रोता संदेश को गरहन कर सके। 

Semanticity (आर्थीयता)
Arbitrariness (यादृच्छिकता)
Discreteness (विविकत्ता)
Displacement (अंतरणता)
Productivity (उत्पादनशीलता)
Traditional transmission (परंपरागत प्रेषण)
Duality of patterning (अभिरचनात्मक द्वैतता)

इनमें से ज्यादातर प्रवृत्तियाँ मानवेतर प्राणियों की भाषा में दिखाई देती हैं लेकिन कुछ कुछ प्रवृत्तियाँ सिर्फ मानव भाषा में ही उपलब्ध होती हैं। 

हॉकेट : मानवेतर और मानव भाषा के आधार

इसी तरह मैकनील (1972, हार्पर) ने ‘Aquisition of Language’ में यह स्पष्ट किया है कि संरचनात्मक दृष्टि से मानव भाषा में योजना व्यवस्था होती है अर्थात विभिन्न ध्वनियों के संयोजन से शब्द, वाक्य आदि का निर्माण होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रकार्यात्मकता के आधार पर वस्तु, भाव एवं घटना को संकेत करने के प्रकार्य होते हैं। चॉमस्की (1966) ने अपनी पुस्तक ‘कार्टीसियन लिंग्विस्टिक्स’ में मानवेतर एवं मानव भाषा के बीच निहित भेद को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उन्होंने यह कहा कि मानव भाषा के माध्यम से अपने भावों को अभिव्यक्त करता है जबकि मानवेतर प्राणी में इस शक्ति का अभाव है। उनका मत है कि “Language acquisition is a matter of growth and maturation of relatively fixed capacities, under appropriate external conditions.” मानव भाषा में किसी भी अज्ञात या नए-नए संदर्भों को अभिव्यक्त करने की क्षमता होती है जबकि मानवेतर भाषा में नहीं होती। 

मानवेतर और मानव भाषा के बीच निहित भेद को स्पष्ट करते हुए जॉन लयोंस (1991, पृ. 2) ने कहा कि “A Human Language is one that is attested as being used (or as having been used in the past) by human beings; and a non-human language is one that is (or has been) used by any non-human being (either an animal or a machine).” इससे यह स्पष्ट होता है कि भाषाविज्ञान का विषय ‘मानव भाषा’ है। भाषा एक सामाजिक प्रक्रिया है (सोशल फिनोमिना)। वक्ता और श्रोता के बीच विचार-विनिमय का साधन है भाषा। अर्थात वक्ता-श्रोता के बीच भाषा मौखिक व्यवहार का साधन है। भाषा मनुष्य के मुख से उच्चरित वह सार्थक ध्वनि समूह है जिसका विश्लेषण और अध्ययन भाषाविज्ञान में किया जाता है। 

संदर्भ
  • (सं) श्रीवास्तव, रवींद्रनाथ; सहाय, रमानाथ (1990, तृतीय संशोधित संस्करण), हिंदी का सामाजिक संदर्भ, आगरा : केंद्रीय हिंदी संस्थान
  • श्रीवास्तव, रवींद्रनाथ (1997), भाषाविज्ञान : सैद्धांतिक चिंतन, दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन
  • शर्मा, देवेंद्रनाथ (2008), भाषाविज्ञान की भूमिका, नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन
  • सिंह, दिलीप (2008), भाषा का संसार, नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन
  • सिंह, दिलीप (2009), हिंदी भाषा चिंतन, नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन
  • Baker, Colin; Jones, Sylvia Pyrs (1998), Encyclopedia of Bilingualism Bilingual Education, USA : Multilingaul matters ltd.
  • Bloomfield, Leonard (1985 Reprint), Language, New Delhi : Motilal Banarsi Dass
  • Chomsky, Noam (1957), Syntactic Structures, The Hague : Mouton
  • Chomsky, Noam (1966), Cartesian Linguistics, Harper
  • Coartes, Jennifer (2003, Third edition), Women, Men and Language, London : Rouledge
  • Fishnman, J.A., Ferguson (1968), The Sociology of Language in developing Countries, New York : John Wiley & Sons
  • Halliday, M.A.K, (2007), Language and society, London : Continuum
  • Lakoff, Robin Tolmch (2004 edition), Language and Women’s Place, Oxford
  • Lyons, John (1991), Natural Language and Universal Grammar (Essays in Linguistics Theory, Vol1), Cambridge : Oxford
  • Pierce, Charles sanders (1991), Writings on Semiotics, University of North California Press
  • Sapir, Edward (1921), Language : An Introduction to the study of the speech, Harcourt : Brace
  • Sassure, Ferdinand (1983), Course in General Linguistics, London : Bloomsberry
  • Sharma, Gopal (2010), A Course Outline of General Linguistics, Delhi : Aman Prakashan
  • Toomey, Stella Ting (1999), Communicating Across Cultures, London : Gulliford Press
  • Yule, George (2010, Fourth Edition), The study of language, Cambridge : Cambridge University Press

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता : प्रवीण प्रणव



परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता

- प्रवीण प्रणव

बशीर बद्र का बहुत मकबूल शेर है "परखना मत परखने में
कोई अपना नहीं रहता/ किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता।/ बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना/ जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता।" हालांकि एक सत्य यह भी है कि बिना परख किए अपनेपन की पहचान नहीं हो सकती। समुद्र मंथन के बाद ही यह संभव है कि हम विष और अमृत को अलग कर सकें और और उनकी तासीर की पहचान भी। यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली ने 'परख और पहचान' (2022) शीर्षक से लेखिका गुर्रमकोंडा नीरजा (1975) की किताब प्रकाशित की है जिसमें छह खंडों में पैंतीस लेख संकलित हैं। किताब का कलेवर बहुत आकर्षक है और किताब के पन्ने और इसकी छपाई उत्तम है। प्रकाशक इस किताब को इस रूप में प्रकाशित करने के लिए बधाई के पात्र हैं। हालांकि 204 पृष्ठ की इस किताब (सजिल्द) का मूल्य 595/- रुपये रखा गया है जो एक आम पाठक के लिए ज्यादा है। इस किताब को पेपरबैक संस्करण में भी प्रकाशित कर इसे आम पाठकों के लिए कम मूल्य पर उपलब्ध करवाया जा सकता है।

किसी और की परख करने से पहले अपनी परख आवश्यक है। लेखिका 'पुरोवाक्' में ही स्पष्ट कर देती हैं कि “छह खंडों में आपके सामने उपस्थित हो रही यह पुस्तक योजना बनाकर नहीं लिखी गई है, बल्कि समय-समय पर अलग-अलग प्रयोजन से लिखे गए छोटे-बड़े आलेखों को एक गुलदस्ते में सजाकर रख दिया गया है। इसलिए इन आलेखों के प्रतिपाद्य विषयों में एकसूत्रता न मिलना स्वाभाविक है। हाँ, विविधता मिलेगी।“ इस स्पष्टवादिता के कुछ नुकसान तो होंगे लेकिन पाठकों की अपेक्षाओं को यह सही दिशा देगी।

किताब का खंड एक कवि और कविताओं को समर्पित है। इस खंड में नौ लेख हैं जिनमें रसलीन, बालमुकुंद गुप्त, भगवतीचरण वर्मा, मुक्तिबोध, नरेश मेहता और रामावतार त्यागी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सारगर्भित लेख तो हैं ही, समकालीन कविता के सहयात्रियों जैसे अहिल्या मिश्र, ऋषभदेव शर्मा और ईश्वर करुण के व्यक्तित्व और कृतित्व से भी पाठकों का परिचय करवाया गया है।

‘आख्यान की बुनावट’ शीर्षक खंड दो में पाँच आलेख हैं जिनमें ‘शमशेर की कहानियाँ’ और ‘श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य’ विशेष रूप से पठनीय है। ‘अर्थ की खोज’ शीर्षक तीसरे खंड में दो लेख हैं जिनमें आलोचक के तौर पर आचार्य रामस्वरूप चतुर्वेदी और परमानंद श्रीवास्तव के आलोचना कर्म और इसी बहाने हिंदी साहित्य में आलोचना के महत्व पर महत्वपूर्ण चर्चा की गई है।

बारह आलेखों से युक्त चौथे खंड का शीर्षक है ‘स्मरण और संदर्शन’। यह खंड विशेष है और इन्हें पढ़ते हुए स्मृति में कई संस्मरण जीवंत हो उठते हैं। खंड में हमारी कई धरोहरों जैसे - स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी (1909 में गुजराती में लिखी गई उनकी पहली पुस्तक 'हिंद स्वराज' के बहाने), अटल बिहारी वाजपेयी, हज़ार चौरासी की माँ के बहाने महाश्वेता देवी, रमणिका गुप्ता, राजेंद्र यादव और डॉ. धर्मवीर पर अच्छे लेख हैं। कई ऐसे साहित्यकारों को भी आलेखों के माध्यम से याद किया गया है जो हाल में ही हमसे बिछड़ गए। जगदीश सुधाकर, शशि नारायण 'स्वाधीन', मृदुला सिन्हा और मंगलेश डबराल पर आधारित आलेख इनमें शामिल हैं। विश्व साहित्य में वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड (1967) के माध्यम से अपना नाम दर्ज कराने वाले साहित्यकार गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ उर्फ़ गाबो, जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला, को स्मरण करते हुए एक लेख उनके नाम भी है। साहित्यकारों से संबंधित जानकारी में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह किताब इस खंड की वजह से विशेष रूप से संग्रहणीय है।

‘भारतीय साहित्य का क्षितिज’ शीर्षक से खंड पाँच में चार लेख संकलित हैं। दो लेख तमिल भाषा के योगदान से संबंधित हैं और दो कवींद्र रवींद्र नाथ ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हैं। तमिल भाषा का बहुत पुराना और बहुत समृद्ध इतिहास है। अनेक साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने अनुवाद के माध्यम से तमिल और हिंदी भाषा-समाजों के बीच पुल का काम किया है। कई तमिल साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने हिंदी में मौलिक लेखन कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। इस किताब के लेख पाठकों के लिए इन मायनों में महत्वपूर्ण होंगे कि इनसे तमिल साहित्य और साहित्यकारों की एक संक्षिप्त जानकारी मिलती है। गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। इस किताब में भी दो लेख संकलित हैं जो गुरुदेव के बारे में सरल, सहज, और रोचक तरीके से पाठकों तक महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाते हैं।

किताब का आखिरी खंड ‘संचार की शक्ति’ है जिसमें तीन लेख हैं। खंड का पहला लेख ‘चाँद का फाँसी अंक’ पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक है। 'चाँद' पत्रिका का गौरवशाली इतिहास रहा है। रामरख सिंह सहगल और महादेवी वर्मा जैसी हस्तियाँ इस पत्रिका की संपादक रही हैं। 1928 नवंबर में 'चाँद' पत्रिका का ‘फाँसी’ अंक प्रकाशित हुआ था। लेखिका ने पत्रिका के इसी अंक पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए अपनी बात रखी है। ‘फाँसी’ के पक्ष और विपक्ष में चर्चा वर्षों से होती आ रही है। फाँसी की सजा को अमानवीय और क्रूर मानते हुए कई देशों ने इसे प्रतिबंधित भी किया है। कहा जाता है कि अब तक 600 से भी अधिक तरीके/ यंत्र ईजाद किए गए हैं फाँसी देने के लिए। स्वतंत्रता आंदोलन में जिस तरह क्रांति में भाग लेने वालों को फाँसी की सजा दी गई, वैसे में यह अंक बहुत महत्वपूर्ण है। इस अंक में हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ कुछ नहीं लिखा गया लेकिन प्रकाशित सामग्री को भड़काऊ मानते हुए ब्रिटिश सरकार ने 'चाँद: पत्रिका के इस अंक को जब्त कर लिया था। रोचक तथ्य यह भी है कि पत्रिका में शहीद भगत सिंह ने छद्म नाम से कई लेख लिखे थे। पत्रिका के इस विशेषांक के बारे में लेखिका नीरजा ने संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित लेख लिखा है जो पाठकों को इस पत्रिका के बारे में खोज-पड़ताल करने के लिए प्रेरित करेगा। इस खंड के अन्य लेखों में मीडिया का महत्व, मीडिया पर बढ़ता बाज़ार का दबाव और राजनीतिक साँठ-गाँठ की वजह से मीडिया की गिरती साख जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर लेखिका की पैनी नज़र गई है और उनकी कलम चली है।

‘परख और पहचान’ के लेखों को पढ़ते हुए कई चेहरे और कई कृतियाँ स्मृति के झरोखों में आती-जाती रहती हैं। इन शख्सियतों में से कई के साथ व्यक्तिगत और कई के साथ साहित्यिक राब्ता, पाठकों का होगा ही। ऐसे में इनसे जुड़ी सूचनाओंऔर जानकारियों को समेटे इस संग्रह के लेख पाठकों को प्रिय लगेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। अकबर इलाहाबादी ने कहा था- "बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है/ तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता।" लेकिन "परख और पहचान" को पढ़ने के बाद पाठक इसमें संगृहीत साहित्यकारों को इस कदर समझ सकेंगे कि वे दिल में भी आ बसें और उनकी कृति समझ में भी आए।

प्रवीण प्रणव
सीनियर डायरेक्टर, माइक्रोसॉफ्ट, हैदराबाद
praveen.pranav@gmail.com

बुधवार, 22 मार्च 2023

बिन पानी सब सून...



औद्योगीकरण के कारण देशों का विकास हो रहा है। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची! विकास के अंधाधुंध में मनुष्य ने प्रकृति से छेड़छाड़ की। परिणामस्वरूप आज स्वच्छ वातावरण का अभाव है। प्रदूषण का दैत्य मुँह बाये खड़ा है। हवाएँ जहरीली हो चुकी हैं। इन जहरीली हवाओं के कारण आकाश भी मैला हो चुका है। पृथ्वी और जल भी प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं। हम सब जल संकट से जूझ रहे हैं। इसीलिए प्रति वर्ष 22 मार्च को 'विश्व जल दिवस' मनाया जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य है जल के महत्व को उजागर करना।

विश्व के हर नागरिक को पानी के महत्व को समझाने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र ने ‘विश्व जल दिवस’ मनाने की शुरूआत 1992 में की थी। 1993 को पहली बार 22 मार्च के दिन पूरे विश्व में 'जल दिवस' के अवसर पर जल के संरक्षण पर जागरूकता फैलाने का कार्य आरंभ किया गया। हर वर्ष इसकी एक थीम होती है। जैसे शहर के लिए जल (1993), हमारे जल संसाधनों की देखभाल करना हर किसी का कार्य है (1994), महिला और जल (1995), प्यासे शहरों के लिए पानी (1996), विश्व का जल : क्या पर्याप्त है (1997), भूमि जल - अदृश्य संसाधन (1998), हर कोई प्रवाह की ओर जी रहा है (1999), 21वीं सदी के लिए पानी (2000), जल और दीर्घकालिक विकास (2015), जल और नौकरियाँ (2016), अपशिष्ट जल (2017), जल के लिए प्रकृति के आधार पर समाधान (2018), किसी को पीछे नहीं छोड़ना (2019), जल और जलवायु परिवर्तन (2020), पानी का महत्व (2021), भूजल : अदृश्य को दृश्यमान बनाना (2022)। और विश्व जल दिवस 2023 की थीम है ‘अक्सेलरेटिंग चेंज’ अर्थात परिवर्तन में तेजी। विश्व जल दिवस सिर्फ एक औपचारिकता भर न रह जाए। इसके लिए हमें हर दिन पानी बचाने के लिए संकल्प लेना होगा और उस पर अटल रहना होगा।

पृथ्वी की 71% सतह जल से आच्छादित है। लेकिन पीने योग्य पानी की मात्रा बहुत ही कम है। आजकल पानी भी बंद बोतल में बिक रहा है। जल संरक्षण आज की जरूरत है। जल संकट की समस्या की ओर अनेक साहित्यकारों ने भी समय-समय पर ध्यान आकृष्ट किया है। एकांत श्रीवास्तव कहते हैं कि ‘जब वह जीवन और समाज के लिए संकट बनकर आती है - कभी भूकंप तो कभी बाढ़ के रूप में - तब आतंकित करती है।’ (पानी भीतर फूल, पृ.62)। ‘बाढ़ के कारण खाने के लाले पड़ गए हैं’ (रामदरश मिश्र, जल टूटता हुआ, पृ.40), ‘यहाँ आती है बाढ़, आती है महामारी, आती है भूख, ..... आती है, ... डॉक्टर क्यों आएगा?’ (रामदरश मिश्र, पानी के प्राचीर, पृ.166)। बाढ़ पूरे गाँव को लील जाता है – ‘बेतवा में जो उफान आया वह न जाने कितने गाँव के गाँव लील गया।’ (वीरेंद्र जैन, डूब, पृ. 204)। बाढ़ का मार्मिक चित्र देखें – ‘रात के पिछले पहर में आंधी की सी हरहराहट गाँव में गरज उठी। आखिर वही हुआ जो होना था। पड़ोसी गाँव के लोगों ने रात को बाँध काट दिया क्योंकि इधर का पानी उधर फैल रहा था। घुर-घुर-घुर-घुर पानी की धारा गहरी में गिर रही है। गड़ही और खेत देखते-देखते एक हो गए। गाँव के चारों ओर छाती भर पानी घहरा उठा। पानी ही पानी। आदिगंत सफेद-सफेद फेन फैल रहा था। राप्ती और गोरा एक हो गए। ह-ह-ह-हास – ह-ह-ह-ह-हास – भेड़िया उछल रही है। तेज पुरवा हुहुकार रही है। ऊपर से पानी बरस रहा है और बाढ़ की ऊँची-ऊँची तरंगें हहास-हहास गरज रही हैं। किसान नदी-नालों को पार कर दूर-दूर के खेतों तक जा रहे हैं और फसलों को उखाड़-उखाड़ कर पशुओं के लिए ला रहे हैं। साँप, पशु, पक्षी और मुर्दे आदमी बहे जा रहे हैं।’ (रामदरश मिश्र, पानी के प्राचीर, पृ.10)। इससे गंदगी फैल जाती है। सब कुछ नष्ट हो जाता है। “खेतों में बाढ़ का हाहाकार तड़पा था, इन्हीं खेतों से होकर कितनी लाशें बही थीं। बाढ़ इन खेतों की फसलें छीन कर इनमें बालू झोंक गई थी, इनके ऊपर तान गई थी रिक्तता का खाली आकाश।’ (रामदरश मिश्र, जल टूटता हुआ, पृ.76)। इतना होने के बावजूद किसान आशा नहीं छोड़ते। ‘खेत बोये जा रहे थे – यह समझते हुए भी कि बाढ़ आएगी, सब डूब जाएगा, फिर भी खेत बोये जा रहे थे। गरीब किसान अपने खेत के अन्न को बेच-बाच गए। बीज खरीद रहे थे – उन खेतों में डालने के लिए जहाँ बाढ़ आएगी, सब कुछ लूट ले जाएगी... फिर भी एक आशा थी, भविष्य के प्रति एक आस्था थी, जो उन्हें बीज बोने के लिए प्रेरित कर रही थी। सदियों से इनकी यह जिजीविषा इन्हें जीवन देती आई है, नहीं तो न जाने कब के खत्म हो गए होते।’ (रामदरश मिश्र, जल टूटता हुआ, पृ.159)। (हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह/ एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।/ नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,/ एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन – कामायनी, चिंता सर्ग)। पानी में घिरे हुए लोग किसी से कुछ प्रार्थना नहीं करते बल्कि ‘वे पूरे विश्वास के साथ देखते हैं पानी को/ और एक दिन/ बिना किसी सूचना के/ खच्चर बैल भैंस की पीठ पर/ घर-असबाब लादकर/ चल देते हैं कहीं और।’ (केदारनाथ सिंह, पानी में घिरे हुए लोग)

बाढ़ के कारण चारों ओर पानी ही पानी है लेकिन किसी काम का नहीं। जब अकाल पड़ता है तो भी मानव जीवन तहस-नहस हो जाता है। रांगेय राघव ने बंगाल के अकाल की भीषण त्रासदी को अपनी रिपोर्ताज ‘तूफ़ानों के बीच’ में चित्रित किया है तो रेणु (मैला आँचल), रामधारी सिंह दिवाकर (अकाल संध्या), शिवमूर्ति (आखिरी छलांग), पंकज सुबीर (अकाल के उत्सव), संजीव (फाँस), कमल कुमार (पासवर्ड) आदि अनेक साहित्यकारों ने मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। तेलुगु साहित्य में भी कंदविल्ली साम्बासिव राव (शिक्षा (दंड), पापीकोंडलु,), राजेश्वरी (वरदा – बाढ़), बंडी नारायण स्वामी (शप्तभूमि – श्राप ग्रस्त भूमि) जैसे साहित्यकारों ने इन समस्याओं का मार्मिक चित्र अंकित किया है। सिर्फ उपन्यास, कहानी या रिपोर्ताज ही नहीं बल्कि कविताओं में भी इस समस्या का चित्रण है। हिंदी में केदारनाथ सिंह ने ‘पानी की प्रार्थना’ के माध्यम से पाने के महत्व को रेखांकित किया है तो तेलुगु के प्रसिद्ध कवि एन. गोपि ने ‘जलगीतम’ (जलगीत) के माध्यम से इसका अंकन किया है। संपूर्ण भारतीय साहित्य में बाढ़ और अकाल की समस्याओं को देखा जा सकता है। बिन पानी सब सून।

पानी की समस्या अत्यंत गंभीर समस्या है। सदियों से समाज इससे पीड़ित है। नासिरा शर्मा लिखती हैं – ‘खालिस दूध नहीं मिलता – यह शिकायत तो पुरानी हो चुकी है। नई शिकायत है – खालिस पानी नहीं मिलता है, देखने को। पानी तो दूर, खालिस शब्द की तरह खालिस पानी को भी लोग बोतल में बंद रखेंगे, ताकि उसकी एक दो बूँद सूखे के समय चाटकर अमृत का स्वाद ले सकें। ऐसा दौर जल्दी ही आने वाला है, जब हीरे के मोल पानी मिलेगा और पूँजीपति उसको अपनी तिजोरी में बंद करके रखेंगे, तब डकैतियाँ पानी की बोतल के लिए पड़ेंगी। बैंक के लॉकर टूटे मिलेंगे, केवल खालिस पानी के लिए जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों में होगी। यह फैंटसी नहीं, बल्कि आने वाले समय में पानी की दुर्बलता की पूर्व घोषणा है। यह मजाक नहीं बल्कि पानी के बढ़ते महत्व का सच है। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि भविष्य का यथार्थ है’। (कुइयाँजान, पृ. 271)। यह हमारा कर्तव्य है कि इस अनमोल वस्तु को सुरक्षित रखें और धरा का संरक्षण करें।

प्रिय पाठको! पानी की गुहार सुन लीजिए-
                        मेरा मूल्य जानो! मेरी कीमत समझो
                        मुझे प्रदूषित करते
                        फिर शुद्ध करते
                        फिर शुद्ध करते, मुझे
                        दुकान का सौदा मत बनाओ
                        पहले अपने हृदयों को
                        शुद्ध करो।'' (एन. गोपि, जलगीतम, पृ. 103)

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

विलोम शब्द


विलोम अर्थात उलटा, विपरीत, रीतिविरुद्ध। अतः विलोम शब्द ऐसे शब्दों को कहा जाता है जो एक-दूसरे का विपरीत अर्थ देते हों। उदाहरण के लिए - 

  • अंशकालिक - पूनकालिक                                                           अंशतः - पूर्णतः 
  • अकर्मक - सकर्मक                                                                     अकारण - सकारण 
  • अपयश - यश                                                                             अविश्वास - विश्वास 
  • आरंभ - अंत                                                                               अनुत्तीर्ण - उत्तीर्ण 
  • असंभव - संभव                                                                          अगोचर - गोचर 
  • अग्र - पश्च                                                                                   अचल - चल 
  • अचेतन - चेतन                                                                            अज्ञेय - ज्ञेय 
  • अडिग - अस्थिर                                                                          अतिवृष्टि - अनावृष्टि 
  • अदृश्य - दृश्य                                                                              अद्भुत - सामान्य 
  • अधर्म - धर्म                                                                                 अधिक - थोड़ा 
  • अधीन - स्वतंत्र                                                                             अधूरा - पूरा 
  • अनधिकार - साधिकार                                                                  अभिज्ञ - अनभिज्ञ 
  • अनहोनी - होनी                                                                            आदि - अनादि 
  • अनायास - सायास                                                                         आवरण - अनावरण 
  • आवृत्त - अनावृत्त                                                                           आस्था - अनास्था 
  • अनिवार्य - ऐच्छिक                                                                        अनिश्चित - निश्चित 
  • अग्रज - अनुज                                                                              अनुपयुक्त - उपयुक्त 
  • अनुपस्थित - उपस्थित                                                                   अनैतिक - नैतिक 
  • औपचारिक - अनौपचारिक                                                            अंधकार - प्रकाश 
  • अंतरंग - बहिरंग                                                                            अंतर्मुखी - बहिर्मुखी 
  • अपकार - उपकार                                                                         अपठनीय - पठनीय 
  • अपना - पराया                                                                               अपमान - सम्मान 
  • अपशकुन - शकुन                                                                          अपराध - निरपराध 
  • अपरिचित - परिचित                                                                       अप्रस्तुत - प्रस्तुत 
  • अबला - सबला                                                                               अमानुषिक - मानुषिक 
  • अमीर - गरीब                                                                                 अमृत - विष  
  • अर्थ - अनर्थ                                                                                    अपूर्ण - पूर्ण 
  • अल्पायु - दीर्घायु                                                                              आधुनिक - प्राचीन  

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023

वस्तुनिष्ठ प्रश्न : हिंदी साहित्य का इतिहास



1. ‘उत्तर अपभ्रंश ही पुरानी हिंदी है’ – यह किसका मत है?

        चंद्रधर शर्मा गुलेरी

2. आदिकाल के प्रथम कवि कौन हैं?

        सरहपाद

3. राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी के प्रथम कवि किसे माना?

        सरहपा

4. ‘पउम चरिउ’ के रचनाकार कौन हैं?

        स्वयंभू

5. ‘आल्हाखंड’ के रचयिता कौन हैं?

        जगनिक

6. आदिकाल को ‘वीरगाथा काल’ नाम किसने दिया?

        रामचंद्र शुक्ल

7. ‘चारण काल’ का दूसरा नाम क्या है?

        आदिकाल

8. आदिकाल को ‘बीजवपन काल’ किसने माना?

        महावीर प्रसाद द्विवेदी

9. प्रथम काल का नामकरण ‘आदिकाल’ किसने किया?

        हजारी प्रसाद द्विवेदी ने साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर इसे आदिकाल कहा

10. हिंदी साहित्य के इतिहास को ‘संधि काल एवं चारण काल’ किसने कहा?

        डॉ. रामकुमार वर्मा

11. आचार्य शुक्ल ने किस आधार पर प्रथम काल को वीरगाथा काल कहा?

        ऐतिहासिक सामाजिक वास्तविकता के आधार पर

12. ऐतिहासिकता के आधार पर गरियर्सन ने आदिकाल को क्या कहा?

        चारण काल

13. मिश्रबंधुओं ने आदिकाल को क्या नाम रखा?

        प्रारंभिक काल

14. ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ के रचनाकार कौन हैं?

        शालिभद्र सूरी

15. ‘मैथिल कोकिल’ कौन हैं?

        विद्यापति

16. हिंदी साहित्य के पहले इतिहासकार कौन हैं?

    गार्सां द तासी। ‘इस्त्वार द ल लितरेत्युर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी’ नाम से उन्होंने हिंदी साहित्य का पहला इतिहास फ्रेंच में लिखा है।

17. हिंदी में लिखा गया हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास का नाम बताइए।

        शिवसिंह सेंगर कृत ‘शिवसिंह सरोज’

18. अंग्रेजी में लिखा गया हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास का नाम बताइए।

        सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन कृत ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’

19. चौरासी सिद्धों में आदि सिद्ध कौन हैं?

        सरहपा