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मंगलवार, 20 मई 2025

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर : योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण (7 जनवरी, 1941-9 मई, 2025) 

प्रतिष्ठित कवि, कथाकार, बाल साहित्यकार, समीक्षक, शिक्षाविद, स्तंभ लेखक और मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं प्राकृत तथा अपभ्रंश के विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ (7 जनवरी, 1941) का निधन 9 मई, 2025 को हो गया।

डॉ. ‘अरुण’ ने अपभ्रंश भाषा और जैन साहित्य के गहन अध्येता तथा व्याख्याकार के रूप में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतविद्या (इंडोलॉजी) के क्षेत्र में उल्लेखनीय तथा अविस्मरणीय योगदान किया है। इस दृष्टि से उनकी ‘अपभ्रंश’, ‘पुष्पदंत’, ‘जैन रामकाव्य और महाकवि स्वयंभूदेव प्रणीत पउमचरिउ’, ‘जैन रामायण की कहानियाँ’, ‘जैन कहानियाँ’, ‘स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र’ तथा ‘प्राकृत-अपभ्रंश इतिहास दर्शन’ जैसी कृतियाँ अपना सानी नहीं रखतीं। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

एम.ए. (हिंदी), साहित्य रत्न, पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधियों से अलंकृत डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ जीवट व्यक्तित्व के धनी थे। जैन रामकथा के अंतर्गत स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र : तुलनात्मक अनुशीलन, स्वयंभू प्रणीत ’पउमचरिउ’ में समाज, संस्कृत एवं दर्शन की अभिव्यंजना पर उन्होंने पीएचडी और डीलिट की उपाधियाँ अर्जित कीं। शंभू दयाल कॉलेज, ग़ाज़ियाबाद (मेरठ विश्वविद्यालय), बी.एस.एम. (स्नातकोत्तर) कॉलेज, रुड़की (मेरठ विश्वविद्यालय), पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज, पीलीभीत (एम.जे.पी. रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली) आदि में अध्यापन कार्य से जुड़े रहे। उनके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने शोधोपाधियाँ अर्जित कीं।

डॉ. ‘अरुण’ की सतत साधना का सम्मान करते हुए 1975 में उन्हें थियोसोफ़िकल सोसायटी, अड्यार (चेन्नई) ने यूनिवर्सल ब्रदरहुड अवार्ड प्रदान किया। अन्य अनेक सम्मानों-पुरस्कारों के अतिरिक्त उन्हें 2006 में अपभ्रंश साहित्य अकादमी, जयपुर ने ‘स्वयंभू सम्मान’ से तथा 28 जनवरी, 2019 को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने ‘भाषा सम्मान’ से अलंकृत किया। 2010 में दूसरी बार ‘स्वयंभू सम्मान’ से अलंकृत हुए। साथ ही, भारतविद्या के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने ‘स्वामी विवेकानंद पुरस्कार’, ‘तुलसी सम्मान’ और ‘विद्यानिवासमिश्र स्मृति सम्मान’ भी प्रदान किए। अन्य अनेक संस्थानों ने भी उन्हें सम्मानित कर गौरव का अनुभव किया।

अपभ्रंश साहित्य के विद्वान के रूप में प्रख्यात ‘अरुण’ जी ने मौलिक पुस्तकों के साथ-साथ अनेक संपादित पुस्तकें, अनूदित पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित करके पाठकों का मार्गदर्शन किया। ‘आशा कभी न छोड़िए’, ‘आशा जीवित है’, ‘अक्षर अक्षर हो अमर’, ‘अँधियारों से लड़ना सीखें’, ‘बहती नदी हो जाइए’, ‘जीवन-अमृत’, ‘वैदुष्यमणि विद्योत्तमा’ आदि उनकी काव्य कृतियाँ उल्लेखनीय हैं।

‘अरुण’ जी आशावादी थे। जीवन को हमेशा एक नई दृष्टि से देखते थे। परेशानियाँ हर किसी के सामने उपस्थित होती हैं। ‘अरुण’ जी ने भी इन परेशानियों का सामना किया, पर हँसते-हँसते कहते हैं – ‘परेशानियाँ बहुत हैं/ हँस कर टालो यार/ कुछ को डालो वक़्त पर/ यह जीवन का सार।’ उनके भीतर की जिजीविषा को उनकी कविताओं में तथा उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियों में भी देखा जा सकता है। वे हमेशा अपने आप पर भोरसा रखने के लिए कहते हैं क्योंकि ‘हैं जिन्हें खुद पर भरोसा, पाते हैं मंजिल वही,/ उनकी हिम्मत तो कभी, मिटती नहीं है दोस्तो।'


‘अरुण’ जी हमेशा ही मानवीय संबंधों और मूल्यों को महत्व देते थे। वे जहाँ भी जाते थे वहाँ के लोगों से एक आत्मीय रिश्ता बना लेते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। वे सबके दुख-दर्द में शामिल हो जाते थे। वे अपने दिल का दरवाजा खोलकर सबके दर्द को अपना समझकर आगे बढ़ते थे और लोगों को ढाढ़स बँधाते थे – ‘दिल का दरवाजा खुला है, आइए, आ जाइए/ हम भी बंदे आपके हैं, यह यकीं ले आइए।’ ‘सबका दर्द समझकर् अपना, सहते आए सदा से हम/ नश्वर जग को अपना ही घर, कहते आए सदा से हम।’

‘अरुण’ जी अपने आसपास के वातावरण को प्रेममय बना ही डालते थे। वे कबीर की इस उक्ति को बार-बार दोहराते थे और आज के इस अमानवीय संसार को देखकर चिंतित होते हुए कहते थे– ‘पढ़ी किताबें सारी हमने, ‘ढाई आखर’ भूल गए/ दौलत कर झूले पर देखो, दुनिया वाले झूल गए।’ वे ढाई आखर प्रेम को अत्यंत महत्व देते हैं, क्योंकि आज दुनिया में हर व्यक्ति मुखौटा पहनकर जी रहा है, ऐसे में सच्चा प्यार मिलना मुश्किल है। अतः अरुण जी कहते हैं कि ‘प्यार जहाँ मिलता सखे,/ जाएँ वहाँ जरूर।/ प्यार अनूठी चीज़ है,/ तोड़े व्यर्थ गुरूर।’

आज दुनिया लोभ और स्वार्थ से भरी हुई है। ऐसी स्थिति में प्रेम, भाईचारा आदि गायब ही हो जाते हैं। ‘अरुण’ जी लोभ को मनुष्य का परम शत्रु मानते थे और धैर्य को अस्त्र बनाने के लिए कहते थे, ताकि इस लोभ को जीता जा सके – ‘लोभ महा शत्रु मनुज का,/ इससे लड़ा न जाय।/ लोभ शत्रु को जीतो सखे,/ धैर्य को अस्त्र बनाय।’

आज सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हर एक के पास धन-दौलत, सोना-चाँदी, ऐश्वर्य के अनेकानेक साधनों की बाढ़ है, लेकिन संवेदनाएँ खो गई हैं, लगता है मर-सी गई हैं। ‘अरुण’ जी इससे चिंतित रहते थे। अतः उनकी रचनाएँ हमें इस संकट से रू-ब-रू कराती हैं। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘अब बचाना आदमीयत, हो गया अनिवार्य-सा/ वरना सब कुछ खत्म खुद ही, आदमी कर जाएगा।’

यह नफ़रतों का दौर है। मूल्यों का ह्रास चरम पर है। नफरत, छल, कपट, बेईमानी, ईर्ष्या आदि का साम्राज्य चारों तरह फैल रहा है। ‘अरुण’ जी यह प्रश्न उठाते हैं कि ‘नफ़रतों का दौर ये कब तक चलेगा/ आदमी खुद को भला कब तक छलेगा?’ इस तरह की स्थितियों में सामान्य जनता का निराश होना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। इसी तर्ज पर निराशा की घड़ी में भी आशा को जगाए रखने की हिम्मत देते हुए वे कहते हैं कि ‘हो निराशा की घड़ी गहरी भले ही/ दृढ़ इरादा है तो हर रास्ता फलेगा।’ अरुण जी के भीतर अपार आत्मविश्वास और जिजीविषा गुँथी हुई मिलती हैं। अपने जीवनकाल में उन्होंने तमाम उलझनों को हँसते हुए झेला। विकट परिस्थितियों में भी वे टूटे नहीं बल्कि कुंदन की तरह तपकर सोना बन गए – ‘तपकर ही कुंदन बनता है, सोना इस दुनिया में,/ आ जाती वो आभा दुनिया जिसकी दीवानी है।’

‘अरुण’ जी बच्चों को बहुत पसंद करते थे। अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ‘मेरा बचपन संघर्षों का साक्षी रहा, जिन्होंने कभी-कभी तो मेरी कल्पनाओं को चूर-चूर करके रख दिया, लेकिन बचपन में ही सौभाग्य से मुझे स्वामी विवेकानंद का जीवन-दर्शन पढ़ने को मिला, जिसने मेरी लहूलुहान हुई कल्पनाओं में कब हिम्मत, साहस और आशा को अमृत-सा मरहम लगाकर मुझमें जूझने की ताकत भर दी, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे हर सफलता संघर्षों के बाद, निराशा के जंगल में बिछे कष्ट के नुकीले काँटों से जूझ कर ही मिली है।’ इसीलिए उनकी रचनाओं का मूल स्वर हिम्मत से आगे बढ़ने और निराशा के घटाटोप में एक दीपक जलाए रखने की उत्कट अभिलाषा का रहा है। इसीलिए वे कहते हैं – ‘जीवन में अब अभाव को, अड़चन न मानिए/ साधन अगर नहीं हैं तो साधन बनाइए।’ ‘कोई काम नहीं है मुश्किल, अगर इरादा पक्का/ पर्वत झुक जाते हैं आगे, मंजिल सब मिल जाएँ।’

‘अरुण’ जी कहा करते थे कि मृत्यु जीवन का परम सत्य है। जिस तरह जीवन को खुशी-खुशी अपनाते हैं, उसी तरह मृत्यु को भी अपनाना चाहिए। भारतीय संस्कृति का सूत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय...’ उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है। बहुत बार मृत्य उनके निकट आई लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण हार मानकर चुपचाप चली गई। परंतु इस बार 9 मई को मृत्यु दबे पाँव आई और जीत हासिल करके चली गई। ‘अरुण’ जी ने मृत्यु को भी हँसते-हँसते स्वागत किया।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा विशेष रूप से हैदराबाद शाखा के प्रति ‘अरुण’ जी का रुझान अविस्मरणीय है। 2015 में जब ‘मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' : अर्धशती समारोह' विषयक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हैदराबाद शाखा द्वारा किया गया था, उस वक्त हृदयाघात से पीड़ित होने के बावजूद, डॉक्टरों से अनुमति लेकर वे उस समारोह में पहुँचे और अपने साथ डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को भी हैदराबाद ले आए। तीनों दिन सुबह से लेकर शाम तक चर्चा-परिचर्चा में भाग लिए और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किए। ऐसे जीवट व्यक्ति थे ‘अरुण’ जी। उनके मार्गदर्शन में हैदराबाद सभा में अनेक ऐसी संगोष्ठियों का आयोजन किया गया है।

‘स्रवंति’ पत्रिका के साथ ‘अरुण’ जी का विशेष लगाव था। पत्रिका में उनकी रचनाएँ नियमित प्रकाशित हुईं हैं। कविता, गीत, गजल आदि के साथ-साथ उनके समसामयिक विचार समय-समय पर प्रकाशित हुए। ‘स्रवंति’ का नया अंक मिलते ही वे एक संदेश अवश्य भेजते थे उस अंक से संबंधित। उनकी टिप्पणी बहुत ही महत्वपूर्ण होती थी, पत्रिका की गुणवत्ता को बनाए रखने में। यदि अंक प्रकाशित होने में विलंब हो जाता, तो फोन करके विलंब का कारण पूछ ही लेते थे। 


‘अरुण’ जी सही अर्थों में ‘स्रवंति’ पत्रिका के परामर्शदाता हैं। ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को उनकी ही बातों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ –
मर गए तो किसने देखा, बादशाहों की तरफ
गीत लेकिन हम फकीरों का जमाना गाएगा

मौत उनकी है जो दुनिया लूटने को आए हैं
बाँट कर अमृत जगत में तू अमर हो जाएगा

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर
बाद तेरे नाम तेरा यह जहाँ दोहराएगा

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

'स्पैरो' की उड़ान का सम्मान

साहित्यिक क्षेत्र में अंबै के नाम से प्रसिद्ध तमिलनाडु की लेखिका सी. एस. लक्ष्मी (1944) को 2023 के “टाटा लिटरेचर लाइव! लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड” से सम्मानित किया गया है। लक्ष्मी का जन्म कोयंबत्तूर में हुआ था। उनका अधिकांश समय मुंबई और बैंगलूर में बीता। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक की उपाधि अर्जित की। 1956 की असफल क्रांति के कारण हंगरी से पलायन कर रहे शरणार्थियों के प्रति अमेरिकी नीति पर उन्होंने अपना शोधप्रबंध प्रस्तुत किया और नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपना अकादमिक जीवन एक शिक्षक के रूप में शुरू किया। उन्होंने मुंबई में स्त्रियों के लिए “स्पैरो” नाम से एक संस्था की स्थापना की। स्पैरो (SPARROW - Sound Picture ARchives of Research on Women) की स्थापना का विचार उन्हें 1988 में आया। इसके पीछे स्त्रियों के लिए एक अलग अभिलेखागार स्थापित करना ही मुख्य उद्देश्य रहा। इसकी आवश्यकता उनके शोध अध्ययन के दौरान उभरी। उनका उद्देश्य महिला अभिलेखागार को मात्र एक संग्रह के रूप में स्थापित करना नहीं था, बल्कि एक ऐसा अभिलेखागार बनाने का था जो स्त्रियों की समस्याओं को दूर करने में सहायक हो। वर्तमान में आप ही इस संस्था की निदेशक हैं।

अंबै बहिर्मुखी व्यक्तित्व की धनी रचनाकार हैं। समाज में व्याप्त विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के प्रति उन्होंने हमेशा आवाज उठाई। मूलतः स्त्री के अधिकारों के लिए। इसके लिए उन्होंने साहित्य को माध्यम बनाया। अंबै से परिचित लोगों का कहना है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं दीखता। उनकी अधिकांश रचनाओं में स्त्री विषयक मान्यताओं तथा उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए व्यक्तित्व को देखा जा सकता है। उनकी कहानियाँ रिश्तों को उजागर करती हैं। अंबै समकालीन जीवन के बारे में तीखी टिप्पणियाँ करने से भी पीछे नहीं हटती। वह विकट परिस्थितियों में कभी भी हार नहीं मानती।

सी. एस. लक्ष्मी ने 16 वर्ष की उम्र से ही कहानियों के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करना शुरू कर दिया था। 1962 में उनकी पहली कृति ‘नंदिमलै चारलिले’ (नंदी पर्वतों के समीप) प्रकाशित हुई। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - 'अंधि मलय’ (गोधूलि बेला), ‘सिरगुगल मुरियुम’ (पंख टूट जाते हैं), ‘वीट्टिन मूलयिल ओरु समयिलअरै’ (घर के कोने में एक रसोईघर), ‘काट्टिल ओरु मान’ (जंगल में एक हिरण) आदि। उनकी अधिकांश कृतियाँ अंग्रेजी में अनूदित हो चुकी हैं और वे खुद भी अंग्रेजी में लिखती हैं। उन्होंने अनेक नाटकों का भी सृजन किया है। वे सफल अनुवादक भी हैं। हिंदी और अंग्रेजी से तमिल में कविताओं का अनुवाद करती हैं, साथ ही तमिल से अंग्रेजी में।

अंबै की कहानियों का मूल स्वर स्त्री अस्मिता है। अपनी मातृभाषा तमिल में वे अंबै के नाम से लिखती हैं, जबकि अंग्रेजी में लक्ष्मी के नाम से। इसके संबंध में एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया कि सृजनात्मक लेखन के लिए विशेष रूप से अपनी मातृभाषा में वे अंबै नाम का प्रयोग करना ही पसंद करती हैं। तमिल में अंबै का अर्थ है देवी अर्थात पार्वती। अपनी युवावस्था में वे तमिल लेखक देवन से अत्यधिक प्रभावित थी। उनकी कृति ‘पार्वतियिन सबदम’ (पार्वती की शपथ) को पढ़कर वे सोचने को मजबूर हो गईं। उस कृति की मूल कथा एक स्त्री के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें यह बखूबी दिखाया गया है कि अपने पति द्वारा अपमानित स्त्री शपथ लेती है कि वह अपनी अस्मिता के लिए दुनिया से लड़ेगी। वह अपने अस्तित्व के संघर्ष में सफलता हासिल करती है। इससे प्रेरित होकर लक्ष्मी ने ‘अंबै’ नाम से सृजनात्मक लेखन शुरू किया था।

पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के लिए आगे बढ़ना, अपने अस्तित्व को बचाए रखना इतना आसान नहीं है। सदियों से स्त्री को यह कहकर हाशिये पर धकेला गया कि ‘न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।’ हर क्षेत्र में उसे पीछे ही रहना पड़ता है। यदि स्त्री घर की दहलीज लाँघकर समाज में कुछ बनने की इच्छा से किसी क्षेत्र में आगे आती है, तो उसे यह समाज जीने नहीं देता। तरह-तरह के नाम से भी उसे संबोधित किया जाता है। पुरुष तो उसे हर कदम पर टोकने के लिए तैयार रहता है। इतना ही नहीं पुरुष-मानसिकता से ग्रस्त स्त्रियाँ भी स्त्री की दुश्मन बन बैठती हैं। लक्ष्मी ने भी बहुत कुछ झेला है। उन्हें और उनके लेखन को धिक्कारने वालों की कमी नहीं है। इसकी पुष्टि करते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उनके चरित्र पर भी तरह-तरह के लांछन लगाए गए थे। कुछ पुरुष लेखकों ने उनकी तथा उनकी रचनाओं की भर्त्सना की थी। उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया थ। वे एकदम अकेली पड़ गई थीं। फिर भी उन्होंने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। सभी तरह की आलोचनाओं का अंबै ने डटकर सामना किया। इसके लिए उन्होंने लेखनी को हथियार बनाया।

अंबै के स्त्री पात्र हाड़-मांस से बने हैं और अपनी सभी इच्छाओं और कल्पनाओं को बिना किसी हिचकिचाहट के व्यक्त करते हैं। ‘सिरागुगल मुरियुम’ (पंख टूट जाते हैं) कहानी संग्रह की केंद्रीय कहानी में लेखिका ने बेमेल रिश्तों का खुलासा किया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि जब पति का साथ न मिले तो उस पत्नी की जिंदगी नारकीय बन जाएगी। कहानी की केंद्रीय पात्र ऐसी परिस्थितियों में भी साहस के साथ आगे बढ़ती है।

‘वीट्टिन मूलयिल ओरु समयिलअरै’ (घर के कोने में एक रसोईघर) में कुल मिलाकर 20 कहानियाँ संकलित हैं। ये कहानियाँ सांस्कृतिक संदर्भों से युक्त हैं। प्रत्येक कहानी का एक अलग अहसास है। इन कहानियों के माध्यम से हम उस स्त्री की दयनीय स्थिति को समझ सकते हैं जो पारंपरिक रूढ़ियों के कारण पिसती है तथा घर और समाज में अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए संघर्ष करती है। अकसर यही सुनने को मिलता है कि स्त्री का साम्राज्य रसोईघर है। वह रसोईघर से कदम आगे नहीं रख सकती। यदि वह घर के निर्णयों में कुछ सलाह देने के लिए आगे आई, तो उसे चुप करा दिया जाता है यह कहकर कि- जा! रसोई का काम देख पहले। बड़ी आई पुरुष को सलाह देने वाली! रीति-रिवाजों के आगे स्त्री भी इतना दब जाती है कि वह भी अपने आपको रसोईघर तक सीमित कर लेती है। लेखिका यह टिप्पणी करती हैं कि जब तक स्त्री अपने लिए अपने अस्तित्व व अस्मिता के लिए स्वयं संघर्ष नहीं करेगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता। उसे स्वयं ऊपर उठना होगा। उसकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आएगा।

सी. एस. लक्ष्मी ‘अंबै’ एक सशक्त स्त्रीवादी लेखिका हैं। वे कोरी नारेबाजी करने वाली लेखिका नहीं हैं, अपितु ज़मीनी सच्चाई को पाठकों के सामने रखकर स्त्री की समस्याओं के निदान के लिए काम करने वाली सक्रिय कार्यकर्ता हैं। “टाटा लिटरेचर लाइव! लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड” से सम्मानित होने के अवसर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मान पाकर वे अत्यंत गौरव का अनुभव कर रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सम्मान एक स्त्रीवादी रचनाकार का सम्मान नहीं है, अपितु यह साहित्य का सम्मान है। यह एक साहित्यकार का सम्मान है। साहित्य रचनेवाला सिर्फ साहित्यकार अथवा रचनाकार होता है, न कि स्त्रीवादी या पुरुषवादी।

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सरलता का अपनापन!


छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी, 1889 - 15 नवंबर, 1937) कवि के साथ-साथ नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंध लेखक तथा संपादक थे। रामविलास शर्मा के अनुसार वे छायावाद के पहले कवि हैं। प्रसाद एक ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए साध्य को ही मुख्य मानते हैं। यही बात उन्होंने ‘चंद्रगुप्त’ नाटक में चाणक्य के मुख से कहलवाई है। प्रसाद ने जहाँ एक ओर गंभीर ऐतिहासिक साहित्य का सृजन किया है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति, देशप्रेम आदि का चित्रण बखूबी किया है। उनकी कहानियों में साहस-युक्त बाल चरित्र को भी देखा जा सकता है।

हर मनुष्य को बचपन की स्मृतियाँ आह्लादित करती हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बात करें तो जन्म से लेकर किशोरावस्था तक का समय बचपन कहलाता है। सामान्य रूप से कहें तो यह वह समय है जब मनुष्य बिना किसी भेद-भाव के, बिना किसी राग-द्वेष के हँसी-खुशी समय व्यतीत करता है। यह वह सुनहरा समय है जो जिंदगी को तनाव-मुक्त रखता है। इस अवस्था में न तो तनाव के बारे में पता रहता है और न ही सामाजिक विसंगतियों का ज्ञान रहता है। यदि कुछ होता है तो वह है सिर्फ और सिर्फ अल्हड़ खेल। उसी में नन्हे बच्चे भाव विभोर होकर नाचते हैं, गाते हैं, किलकते हैं, खिलखिलाते हैं। अपने चारों ओर खुशियों की सुगंध फैलाते हैं। यदि कहें कि बचपन सबसे मधुर और अविस्मरणीय क्षणों का पुंज है, तो गलत नहीं होगा। इसीलिए शायद जयशंकर प्रसाद भी कह गए - ‘तुम्हारी आँखों का बचपन!/ खेलता था जब अल्हड़ खेल,/ अजिर के उर में भरा कुलेल,/ हारता था हँस-हँस कर मन,/ आह रे वह व्यतीत जीवन!/ तुम्हारी आँखों का बचपन!/ साथ ले सहचर सरस वसंत,/ चंक्रमण करता मधुर दिगंत,/ गूँजता किलकारी निस्वन, पुलक उठता तब मलय-पवन/ तुम्हारी आँखों का बचपन!’ क्या आज भी ऐसा बचपन बचा हुआ है! यह तो सोचने की बात है। ‘आज भी है क्या नित्य किशोर-/ उसी क्रीड़ा में भाव विभोर-/ सरलता का वह अपनापन-/ आज भी है क्या मेरा धन!/ तुम्हारी आँखों का बचपन!’

सांसारिक दाव-पेंच के दबाव के कारण आज असमय ही बालकों का बचपन छिनता जा रहा है। बहुत बार परिस्थितियों के कारण किसी नन्ही सी जान को परिवार की जिम्मेदारी तक अपने कंधों पर उठानी पड़ जाती है। इस विसंगति को अपने समय में जयशंकर प्रसाद ने भी महसूस किया था। उनकी कहानी ‘छोटा जादूगर’ में यह दिखाया गया है कि एक छोटा सा बच्चा कितना हिम्मती है। वह परिस्थितियों का सामना साहस के साथ करता है। एक राहगीर से मेले में उसकी मुलाकात होती है। जब वह व्यक्ति उस छोटे से बच्चे के माता-पिता के बारे में पूछता है, तो वह कहता है कि ‘बाबूजी जेल में हैं’ देश के लिए और माँ बीमार। पिता के जेल जाने के बावजूद वह टूटता नहीं और अपनी बीमार माँ का भी ध्यान रखता है। जब वह राहगीर कहता है कि ऐसी परिस्थिति में वह तमाशा देख रहा है, तो वह झट से कहता है, ‘तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शर्बत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती!’ (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग iv, पृ. 264)। ऐसा कह पाना सबके लिए आसान नहीं। यह वही बहादुर बच्चा कह सकता है जिसने जिंदगी के खट्टे-मीठे लम्हों को जिया हो।

आजकल परिस्थितियों के कारण बच्चे जल्दी ही चतुर और सांसारिक बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया के कारण बच्चों का बचपन गुम होता जा रहा है। मासूमियत कोसों दूर है। प्रसाद जी के ज़माने में सोशल मीडिया तो न था, लेकिन राष्ट्र और समाज की परिस्थितियाँ अति विषम थीं। इसीलिए उन्होंने लिखा, ‘बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।’ (वही)। छोटा जादूगर छोटी उम्र में बीमार माँ के इलाज के लिए रास्ते में लोगों को जादू दिखाकर पैसा कमाने का काम करता है। जब उसकी माँ अंतिम साँसें ले रही होती है, तब भी वह जादू दिखाने चल पड़ता है। यह अंश पढ़ते समय पाठक द्रवित हुए बिना नहीं रह सकते।

‘छोटा जादूगर’ कहानी पढ़ते समय मानो ऐसा लगता है कि जयशंकर प्रसाद स्वयं पात्र बनकर उपस्थित हैं जो बाल मन को समझने का प्रयास कर रहे हैं। मेले में जब बच्चा जाता है, तो वहाँ चीजों को देखकर उसका मन ललचाता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन मेले में जाने के बावजूद बच्चा खिलौने या फिर मिठाइयों को खरीदने के बजाय, तमाशा देखने के बजाय घर-परिवार के बारे में, घर की जरूरतों के बारे में सोचता हो, तो तनिक रुक कर सोचना पड़ेगा। ‘छोटा जादूगर’ कहानी के बाल पात्र को भी मेले की चीजें अच्छी लगती हैं। वह कहता है - ‘मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।’ (वही, पृ. 266)। यह सब उस बच्चे ने बड़े गर्व और आत्मविश्वास के साथ कहा। जब वह बोल रहा था तब उसकी वाणी में कहीं भी रुकावट नहीं थी। यह उसके आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह मातृ-प्रेम को दर्शाने वाली अद्वितीय कहानी है। इस कहानी में जयशंकर प्रसाद ने परोक्ष रूप से स्वाधीनता संग्राम में जेल जाने वाले एक पात्र का उल्लेख किया है।

बच्चे मन के सच्चे होते हैं। छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाते हैं। उसी तरह छोटी सी बात पर दुखी भी हो जाते हैं, रूठते भी हैं, हंगामा भी करते हैं। कहने का अर्थ है कि बच्चे किसी एक मनोदशा में ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। एक ही क्षण में उनकी इच्छाएँ बदल जाती हैं। बच्चे आसानी से किसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उनके मन में अपार दया का भाव रहता है। कहा जाता है कि उनमें भगवान वास करते हैं। ‘गूदड़ साईं’ शीर्षक कहानी में प्रसाद जी ने साईं के माध्यम से यह कहा कि ‘मेरे पास, दूसरी कौन वस्तु है, जिसे देकर इस ‘रामरूप’ भगवान को प्रसन्न करता!’ (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ, पृ.16)। इस कहानी का नन्हा मोहन साईं को ‘गरीब और भिखमंगा जानकर माँ से अभिमान करके पिता की नजर बचाकर कुछ साग-रोटी लाकर दे देता, तब उस साईं के मुख पर पवित्र मैत्री के भावों का साम्राज्य हो जाता।’ (वही)।

जयशंकर प्रसाद मनुष्यता को प्रमुखता देने वाले साहित्यकार हैं। उनके समग्र साहित्य में इस तत्व को रेखांकित किया जा सकता है। उनके अनुसार जीवन की मुख्य संवेदनाएँ हैं मानवता और करुणा। ‘अनबोला’ एक ऐसी कहानी है जिसमें प्रसाद जी ने इन मानवीय संवेदनाओं को उकेरा है। इस कहानी में जग्गैय्या का मातृ-प्रेम दिखाया गया है। जग्गैय्या एक छोटा सा बालक है। पिता का साया बचपन में उठ गया था। उसके सिर पर तो सिर्फ ममतामयी माँ का हाथ था। “जग्गैय्या को केवल माँ थी, वह कामैया के पिता के यहाँ लगी-लिपटी रहती, अपना पेट पालती थी। कामैया की मछलियाँ ले जाकर बाजार में बेचना उसी का काम था।’ (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग iv, पृ.312)। एक दिन जाल में मछलियों के साथ-साथ समुद्री बाघ भी आ गया। ‘जग्गैय्या की माँ अपना काम करने की धुन में जाल में मछलियाँ पकड़कर दौरी में रख रही थी। समुद्री बाघ बालू की विस्तृत बेला में एक बार उछला। जग्गैय्या की माता का हाथ उसके मुँह में चला गया। कोलाहल मचा; पर बेकार! बेचारी का एक हाथ वह चबा गया।’ (वही, पृ.313)। जग्गैय्या अपनी मूर्च्छित माँ को उठाकर झोंपड़ी में ले चलता है। उसके मन में कामैया के पिता के लिए असीम क्रोध भर जाता है। अपनी माँ को कष्ट में देखकर वह सोचने लगता कि यदि उसके पास खुद की नाव होती तो माँ को आज यह दिन देखना न पड़ता। वह चाहते हुए भी अपनी माँ को बचा नहीं पाता। छोटी उम्र में ही माता-पिता की छाया से वंचित न जाने कितने जग्गैय्या जीवन-संघर्ष में अग्रसर हैं! ऐसी स्थिति में अपने जीवन यापन के लिए उन्हें काम करना ही पड़ता है। सेठ-साहूकार काम तो करवा लेते हैं, लेकिन पगार तो उन्हें नाममात्र के लिए ही देते हैं। बालश्रम कानूनन अपराध है, पर वे बच्चे कर ही क्या सकते हैं! प्रसाद की कहानी का मधुआ एक ऐसा ही पात्र है जो ‘कुँअर साहब का ओवरकोट लिए खेल में दिनभर साथ रहा। सात बजे लौटा तो और भी नई भजे तक कुछ काम करना पड़ा।’ (जयशंकर प्रसाद, प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. 91)। रोटी के बदले उसे लातें खाने को मिलीं। प्रसाद ने इस कहानी में यह दर्शाया है कि बालक मधुआ की ममता और निरीहता एक शराबी के भीतर क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘बालक चंद्रगुप्त’ एक छोटी सी ऐतिहासिक कहानी है। इस कहानी में उन्होंने रोचक ढंग से इतिहास के नायक चंद्रगुप्त के बचपन की झाँकी प्रस्तुत की है। बचपन में चंद्रगुप्त राजसी वैभव का अभिनय करता है। उस समय उसकी मुलाकात चाणक्य से होती है। भले ही यह दृश्य नाटकीय है, पर बहुत प्रभावी है। प्रसाद के बाल चरित्रों में जहाँ एक ओर प्रेम, करुणा, दया जैसी संवेदनाएँ हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें मातृप्रेम के साथ-साथ देशप्रेम जैसे राष्ट्रीय मूल्य भी निहित हैं।

गुरुवार, 14 सितंबर 2023

देश को सिलने के लिए चाहिए एक सुई



सितंबर! हिंदी प्रेमियों के लिए उत्सव का माहौल। पाठशालाओं, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, स्वैच्छिक संस्थानों, बैंकों, राजभाषा विभागों आदि में चारों ओर कोलाहल। न जाने कितनी तरह की प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। अवसर है ‘हिंदी दिवस’। आखिर हिंदी दिवस को इतना महत्व क्यों दिया जाता है! कभी सोचा है।

14 सितंबर, 1949 को हिंदी ने भारत की राजभाषा का पद संवैधानिक रूप से प्राप्त किया। पहली बार 14 सितंबर, 1953 को ‘हिंदी दिवस’ मनाया गया। तब से लेकर आज तक यह एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भारत एक उत्सवधर्मी देश है। हर महीने कोई न कोई त्योहार होता ही है। छोटी-छोटी उपलब्धियों को भी उत्सव के रूप में मनाकर भारत के लोग आपस में भाईचारा कायम रखते हैं। ऐसे ही सितंबर में सभी हिंदी प्रेमी ‘हिंदी दिवस’ मनाने के लिए एकजुट हो जाते हैं।

हिंदी दिवस क्यों मनाते हैं, इसके पीछे निहित कारण हम सब जानते ही हैं। मैं तो बस यही कहना चाहूँगी कि इसे केवल एक औपचारिकता न समझा जाए। वैसे भी, हम दूसरे तमाम त्योहार क्यों मनाते हैं? क्योंकि हमारे हर त्योहार के पीछे कोई न कोई मूल्य अवश्य जुड़ा हुआ होता है। चाहे वह दीवाली हो या दशहरा, ईद हो या होली, बैसाखी हो या बड़ा दिन, ये त्योहार हमारे लिए केवल औपचारिक नहीं हैं। इनका संबंध हमारे जीवन मूल्यों से है। 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्तूबर की तरह 14 सितंबर भी हमारा राष्ट्रीय पर्व है। और इस पर्व के मूल में जो मूल्य निहित है वह है ‘भारतीयता’ – ‘राष्ट्रीयता’। भारतवर्ष की भावात्मक एकता। हमारा यह देश बहु-सांस्कृतिक और बहु-भाषिक है। हिंदी भारत की सामासिक एकता को अक्षुण्ण रखने का एक आधार है।

भौगोलिक रूप से हमारे बीच दूरियाँ बहुत हैं। लेकिन भावात्मक एकता के धरातल पर हम सब एक हैं। कहने का आशय है कि उत्तर के राज्यों और दक्षिण के राज्यों के बीच भौगोलिक दूर हो सकती है और है भी। इन भौगोलिक दूरियों के बावजूद यह पूरा देश भावात्मक रूप से एक सूत्र में जुड़ा हुआ है। इस भावात्मक एकता को मजबूत बनाने वाला तत्व है ‘भाषा’।

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसने संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया और अंग्रेजों की दासता से भारत को मुक्त किया। विभिन्न भाषाएँ बोलने वाला और विभिन्न प्रांतों में बँटा हुआ भारत एक राष्ट्र बना और हिंदी इसकी राजभाषा बनी। उल्लेखनीय है कि भाषा के अभाव में न ही मनुष्य का अस्तित्व होता है और न ही देश का। इस संदर्भ में थोमस डेविड का कथन ध्यान खींचता है। उनका कहना है कि कोई भी देश राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र नहीं कहला सकता।

भाषा महज आदान-प्रदान या अभिव्यक्ति का साधन नहीं है अपितु वह मनुष्य की अस्मिता है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो एक साथ अनेक भूमिकाएँ निभा सकती है और निभा भी रही है। अर्थात जनभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, शिक्षा की माध्यम भाषा, प्रौद्योगिकी की भाषा, बाजार-दोस्त भाषा, मीडिया भाषा आदि। साहित्यिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में हिंदी की भूमिका निर्विवाद है। महात्मा गांधी ने हिंदी की इस ताकत को पहचाना और ‘स्वभाषा’ को स्वराज्य के लिए अनिवार्य घोषित किया। उनकी यह मान्यता थी कि हिंदुस्तान की आम भाषा अंग्रेजी नहीं, हिंदी ही हो सकती है। क्योंकि अलग-अलग भाषा-भाषी भी हिंदी में आसानी से बातचीत कर सकते हैं। अपने भावों को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

भाषा एक संवेदनशील वस्तु है। जरा सी गलती हो जाए, तो वह तोड़ने वाली शक्ति बन सकती है। आप जानते ही हैं, भाषा के नाम पर आपस में झगड़े होने से देश किस तरह टुकड़ों में बँट जाते हैं। इसीलिए कभी कभी ऐसा भी लगता है कि भाषा के नाम पर राज्य बनना भाषा की नकारात्मक भूमिका है। किंतु इसके विपरीत भाषा की एक सकारात्मक भूमिका भी है। वह है जोड़ने की ताकत। हम सबको नकारात्मकता को छोड़कर इसी सकारात्मक तत्व को ग्रहण करना होगा। यह उचित भी है। अतः कहा जा सकता है कि ‘हिंदी दिवस’ भाषा के संबंध में सकारात्मक सोच के प्रति अपने आपको समर्पित करने का दिन है।

14 सितंबर, 1949 को जब भारतीय संविधान के निर्माताओं ने हिंदी को ‘भारत संघ की राजभाषा’ बनाया, तो वे इसे केवल ‘राजकाज’ की भाषा नहीं बना रहे थे, बल्कि भावात्मक एकता की भाषा बना रहे थे। इसीलिए उन्होंने दो और विशेष प्रावधान रखे। एक प्रावधान यह रखा कि अलग-अलग प्रांत अपनी-अपनी राजभाषाएँ रखने के लिए स्वतंत्र हैं। दूसरे, इन अलग-अलग राजभाषाओं को भावात्मक एकता की दृष्टि से जोड़ने के लिए अनुच्छेद 351 का प्रावधान किया गया। यह कहा गया कि हिंदी का विकास इस तरह से हो कि वह सामासिक संस्कृति (मिश्रित संस्कृति) का प्रतिबिंब बने। अतः हम सबको यह समझना जरूरी है कि हिंदी केवल राजभाषा नहीं है, बल्कि अलग-अलग भाषा और बोलियाँ बोलने वाले इस महान देश के लोगों को आपस में जोड़ने वाली एक सुई है। यहाँ मुझे तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा की एक कविता याद आ रही है –

इंसानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ
फटे भूखंडों पर
पैबंद लगाना चाहती हूँ
रफ़ू करना चाहती हूँ
चीथड़ों में फिरने वाले लोगों के लिए
हर चबूतरे पर
सिलाई मशीन बनना चाहती हूँ
असल में यह सुई
मेरी माँ की है विरासत
आत्मीयताओं के टुकड़ों से मिली
कंथा है हमारा घर
सीने का मतलब ही है जोड़ना
सीने का मतलब ही होता है बनाए रखना
माँ अपनी नजरों से बाँधती थी
हम सबको एक ही सूत्र में
सुई की नोक चुभाकर
होती थी कशीदाकारी भलाई के ही लिए
नस्ल, देश और भाषाओं में विभक्त
इस दुनिया को
कमरे के बीचों-बीच ढेर लगाकर
प्रेम के धागे से सी लेना चाहती हूँ (एन. अरुणा, मौन भी बोलता है)

सुई की तरह ही हिंदी भाषा किसी और भाषा की पहचान के लिए खतरा पैदा नहीं कर सकती। बल्कि यह उन सबको आपस में जोड़ती है। क्या आप बता सकते हैं कि घड़ी, गाड़ी, टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल, उपग्रह आदि चीजों को कैसे बनाया जाता है? जी हाँ, टुकड़ों में। टुकड़ों को असेम्बल करके जोड़ा जाता है। तभी उत्पाद तैयार होकर हमारे सामने आएगा। कहने का आशय है कि अलग-अलग टुकड़ों को असेम्बल करते हुए किसी भी उपकरण का निर्माण किया जाता है। अगर इन टुकड़ों को अलग-अलग ही रहने देंगे तो क्या उपकरण बनेगा! नहीं। इसी प्रकार राष्ट्र के निर्माण में वह जो प्राण तत्व है, आत्मा है जो दिखाई नहीं देती, वह है हमारी संपर्क भाषा। इस संपर्क भाषा के द्वारा ही सारी भाषाएँ जुड़कर ‘भारतीय चिंतन की भाषा’ का निर्माण करती हैं। इसी भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है। अतः हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि असेम्बल करने वाले इस तत्व को कभी भी खत्म नहीं होने देंगे। हिंदी भाषा की सीमेंटिंग पावर को पहचानकर उसके साथ जुड़ेंगे।

हिंदी के वैश्विक विस्तार हेतु विचारणीय बिंदुओं के संबंध में आज सोशल मीडिया के माध्यम से काफी कुछ कहा जा रहा है। वहाँ 'वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ (हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के प्रयोग व प्रसार का मंच) एक ऐसा सक्रिय मंच है जिसके माध्यम से आम जनता हिंदी भाषा के संबंध में अपने विचार व्यक्त कर पा रही है। हिंदी दिवस के हवाले से यहाँ विभिन्न लोगों द्वारा सुझाए गए कुछ बिंदु पाठकों के विचारार्थ प्रस्तुत हैं –

• अनेक कंप्यूटर-साधित सॉफ्टवेयर बनाए जाएँ जिससे हिंदी का प्रचलन और भी आसान हो सके।

• विभिन्न संगठनों द्वारा विकसित भाषा-उपकरण न सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित हों अपितु उन्हें जन-मानस के लिए सुलभ कराया जाए।

• हिंदी सिर्फ एक सरकारी भाषा बनकर न रह जाए अपितु लोग उसे सहर्ष स्वीकारें। हिंदीतर भाषियों को इस प्रकार प्रेरित करना चाहिए कि वे हिंदी को सहर्ष ही अपने आप स्वीकारें।

• इंडिया हटाओ ‘भारत’ बनाओ।

• भारत सरकार के सभी कार्यालयों, मंत्रालयों, विभागों आदि का कामकाज प्रथम राजभाषा हिंदी में नोट शीट से लेकर सभी विधेयक तक बिना विलंब प्रारंभ कर दिया जाय।

• न्याय के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय तक अपील तथा बहस की सुविधा हिंदी में भी उपलब्ध करा दी जाए।

• सभी कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को बिना विलंब बनाने का समय आ गया है।

• देश में देवनागरी लिपि के लिए अंग्रेजी भाषा की लिपि का उपयोग तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है। यह हिंदी की लिपि देवनागरी के अस्तित्व पर संकट पैदा कर रहा है। इसे हतोत्साहित करना चाहिए।

अंततः इतना ही कि अब समय आ गया है कि हिंदी को उसका सही सम्मानपूर्ण वैश्विक स्थान प्रदान कराने के लिए सभी भारतवासियों को नवीनतम भाषा प्रौद्योगिकी से सुसज्जित होकर भाषाभिमान का परिचय देना चाहिए।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

विलोम शब्द


विलोम अर्थात उलटा, विपरीत, रीतिविरुद्ध। अतः विलोम शब्द ऐसे शब्दों को कहा जाता है जो एक-दूसरे का विपरीत अर्थ देते हों। उदाहरण के लिए - 

  • अंशकालिक - पूनकालिक                                                           अंशतः - पूर्णतः 
  • अकर्मक - सकर्मक                                                                     अकारण - सकारण 
  • अपयश - यश                                                                             अविश्वास - विश्वास 
  • आरंभ - अंत                                                                               अनुत्तीर्ण - उत्तीर्ण 
  • असंभव - संभव                                                                          अगोचर - गोचर 
  • अग्र - पश्च                                                                                   अचल - चल 
  • अचेतन - चेतन                                                                            अज्ञेय - ज्ञेय 
  • अडिग - अस्थिर                                                                          अतिवृष्टि - अनावृष्टि 
  • अदृश्य - दृश्य                                                                              अद्भुत - सामान्य 
  • अधर्म - धर्म                                                                                 अधिक - थोड़ा 
  • अधीन - स्वतंत्र                                                                             अधूरा - पूरा 
  • अनधिकार - साधिकार                                                                  अभिज्ञ - अनभिज्ञ 
  • अनहोनी - होनी                                                                            आदि - अनादि 
  • अनायास - सायास                                                                         आवरण - अनावरण 
  • आवृत्त - अनावृत्त                                                                           आस्था - अनास्था 
  • अनिवार्य - ऐच्छिक                                                                        अनिश्चित - निश्चित 
  • अग्रज - अनुज                                                                              अनुपयुक्त - उपयुक्त 
  • अनुपस्थित - उपस्थित                                                                   अनैतिक - नैतिक 
  • औपचारिक - अनौपचारिक                                                            अंधकार - प्रकाश 
  • अंतरंग - बहिरंग                                                                            अंतर्मुखी - बहिर्मुखी 
  • अपकार - उपकार                                                                         अपठनीय - पठनीय 
  • अपना - पराया                                                                               अपमान - सम्मान 
  • अपशकुन - शकुन                                                                          अपराध - निरपराध 
  • अपरिचित - परिचित                                                                       अप्रस्तुत - प्रस्तुत 
  • अबला - सबला                                                                               अमानुषिक - मानुषिक 
  • अमीर - गरीब                                                                                 अमृत - विष  
  • अर्थ - अनर्थ                                                                                    अपूर्ण - पूर्ण 
  • अल्पायु - दीर्घायु                                                                              आधुनिक - प्राचीन  

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

हिंदी प्रयोग

अंग-अंग : हर अंग। संज्ञा पदबंध. इसका प्रयोग सामान्य रूप से एकवचन में होता है।
(प्रयोग : उसका अंग-अंग दुखने लगा)

अंगारा हो जाना : आवेश या क्रोध के कारण लाल हो जाना। सामान्य रूप से इसका प्रयोग् व्यक्ति या उसके चेहरे या आँख के लिए होता है।
(प्रयोग : देखते ही देखते उसकी आँखें अंगारा हो गईं।)

अंगूठा चूसना : सामान्य रूप से अबोध बच्चों की अंगूठे को मुँह में डालकर चूसते रहने की क्रिया। मुहावरे के रूप में इसका अर्थ है – बचकानी हरकत।
(प्रयोग : तुम्हारे अंगूठा चूसने के दिन गए।)

अंगूठा दिखाना : साफ इनकार करना।
(प्रयोग : आश्रम के चंदा माँगा तो उन्होंने अंगूठा दिखा दिया।)



अंगूठे पर मारना : अत्यंत उपेक्षित समझकर त्याग देना।
(प्रयोग : तुम्हारी पाप की कमाई नहीं चाहिए। ऐसे रकम को तो हम अंगूठे पर मारते हैं।)

अंत हो जाना : समाप्त हो जाना। उन्मूलन हो जाना।
(प्रयोग : उसके जमाने में ही सती प्रथा का अंत हो गया।)

अंदर-ही-अंदर : मन ही मन में
(प्रयोग : वह अंदर-ही-अंदर घुटता रहा।)

अँधेरे में रखना : वस्तुस्थिति से परिचित न होना।
(प्रयोग : मझे अँधेरे में रखा गया।)

आँखों के आगे अंधकार छा जाना : निराशापूर्ण स्थिति
(प्रयोग : मेरे आँखों के आगे अंधकार छा गया।)

अंधा बना देना : घमंडी बना देना
(प्रयोग : सत्ता के मैड में वह अंधा बन गया।

अंधे की लकड़ी : एकमात्र सेहरा
(प्रयोग : बुढ़ापे में अपने माता – पिता का सहारा बनकर राम यह सिद्ध कर दिया कि वह अपने माता – पिता के अंधे की लकड़ी है।)

अगर-मगर : बहाना
(प्रयोग : काम करने करने के लिए अगर-मगर न करना।)

रविवार, 29 जनवरी 2023

भारत की एकता की भाषा है हिंदी



भाषा सिर्फ आदान-प्रदान का साधन नहीं है, बल्कि वह प्रयोक्ता समाज की अस्मिता है। भाषा के अभाव में तो हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। भाषा ही वह माध्यम है जिसके कारण हम समाज से जुड़ते हैं। हिंदी भाषा ने आज अपना स्वरूप ऐसा बनाया है कि उसे सबको स्वीकारना ही पड़ा। ‘वह एक कोने की खड़ीबोली नहीं है। वह पुरइन के खड़े पत्ते की तरह से पूरे सरोवर में छा जाने वाली भाषा बन गई है।’ (विद्यानिवास मिश्र, साहित्य के सरोकार पृ.154)। भाषा व्यवहार में एकरूपी या समरूपी नहीं होती। भाषा की यह विविधता उसकी सजीवता का लक्षण है। इसी सजीवता का प्रयोग करके रचनाकार अपनी रचना में रंग लाता है।

ध्यान देने की बात है कि हिंदी की शक्ति उसकी जनपदीय भाषाएँ हैं। इनसे हिंदी निरंतर समृद्ध होती रहती है। हिंदी को सींखचों में जकड़कर रखना संभव नहीं है। शुद्धतावादी सिद्धांत काम नहीं करेगा। ‘भाषा की प्रवाहमयता की कीमत चुकाकर शुद्धता की बात’ सोचना मूर्खता है (विद्यानिवास मिश्र)। ऐसी शुद्धता किस काम की जिसमें न कोई प्रवाह है और न ही संप्रेषण। हिंदी में वह शक्ति निहित है जिसके कारण वह अन्य भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करती चलती है। इससे हिंदी की अस्मिता विस्तृत होती जा रही है। इतना ही नहीं, हिंदी में वह शक्ति है जो एक भाषा को दूसरी भाषा से और एक प्रांत को दूसरी प्रांत से जोड़ती है। हिंदी की एक सीमा में राजस्थान और पंजाब है तो दूसरी सीमा में बिहार। राजस्थान से बिहार तक के लोग अपने घरों में राजस्थानी, ब्रज, बुन्देली, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय भाषाएँ बोलते हैं, लेकिन व्यापक रूप से इनकी मातृभाषा हिंदी है। इन सबकी सामाजिक भाषा हिंदी है। शिक्षा से लेकर कामकाज तक हिंदी में ही होता है। यही विलक्षण बात है।

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे आसानी से सब समझ सकते हैं। मिथिला का कोई आदमी पंजाब जाए तो उसे पंजाबी समझने में दिक्कत हो सकती है और इसी प्रकार गुजरात का कोई आदमी असम जाए, तो असमिया समझने में दिक्कत हो सकती है और असम के लोगों को गुजराती समझने में, लेकिन हिंदी से काम चला सकते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है, जहाँ उद्योग फैलता है, वहाँ अलग भाषा समुदाय के लोग आकर बस जाते हैं। इन सबके बीच व्यवहार की भाषा हिंदी बन सकती है। इसीलिए महात्मा गांधी ने भी हिंदी को अपनाने पर बल दिया था। यह एक ऐसी भाषा है जो दूसरी भाषाओं को भी साथ लेकर चलती है। इसीलिए आजादी से पहले हिंदी को अंतःप्रांतीय संपर्क के लिए प्रयोग करने की बात भी आई। अनेक नेताओं ने इसका समर्थन भी किया। उनमें वे नेता प्रमुख थे, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं बल्कि बांग्ला थी। ‘हिंदी भारत की एकता की भाषा’ (रामधारी सिंह 'दिनकर') है। यह इस बात से भी प्रमाणित हो जाता है कि भारत में एक भाषा का साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद के माध्यम से आसानी से पहुँच रहा है और यह काम सबसे ज्यादा हिंदी के माध्यम से हो रहा है।

हिंदी प्रचार-प्रसार आंदोलन का अपना एक महत्व है। यह स्वतंत्रता आंदोलन का ही एक प्रमुख अंग रहा। उस समय महात्मा गांधी ने यह महसूस किया कि जब तक देश के सभी नागरिक एक नहीं होंगे, आपस में संप्रेषण स्थापित नहीं करेंगे तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर नहीं करेंगे तब तक आजादी की लड़ाई सफल नहीं हो सकती। समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का रास्ता अपनाया तो आम जनता के बीच संप्रेषण स्थापित करने के लिए एक ऐसी भाषा को सीखने पर बल दिया जिसे सब आसानी से समझ सकते हैं और बोल सकते हैं। यह भाषा संपूर्ण हिंदुस्तान की भाषा है – ‘हिंदी’। उन्होंने हिंदी का आंदोलन प्रारंभ किया। वस्तुतः वे हिंदी के माध्यम से देशवासियों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द कायम करना चाहते थे। गांधी जी से काफी लोग प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप हिंदीतर क्षेत्रों में लाखों लोगों ने हिंदी सीखकर हिंदी का परचम फहराया। “हिंदी प्रचार का काम देशभक्ति का ही काम है। हिंदी को हम इसलिए ऊपर उठा रहे हैं कि उसके साथ सभी भाषाओं का उत्थान हो। हिंदी एक प्रतीक है। असल में हमारा उद्देश्य सभी भाषाओं को ऊपर उठाना है, जिससे यह पूरा देश अपनी भाषाओं में सोच सके और सारी मनुष्य-जाति के लिए भारत की परंपरा में जो संदेश निहित है, उसे अपनी भाषाओं में उछाल सके।” (रामधारी सिंह 'दिनकर', संस्कृति, भाषा और राष्ट्र, पृ. 200)।

पड़ने लगती है पीयूष की शिर पर धारा।
हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा।
बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती।
कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती।
आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नाम ही।
इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही। (अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’)

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

युद्ध के विरुद्ध 'तीसरी दुनिया'

आम तौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को विकास के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँट कर देखने का चलन रहा है - पहली विकसित, दूसरी विकासशील और तीसरी अविकसित। इसके अलावा 1990 से पहले तक दुनिया के दो शक्ति केंद्र थे - पूँजीवादी और साम्यवादी। गुट निरपेक्ष देश तीसरी दुनिया कहे जाते थे। लेकिन इन सब बातों से अनंत काबरा के ‘तीसरी दुनिया’ शीर्षक विवेच्य काव्य संग्रह की कविताओं को समझने में कोई खास सहायता नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि कविताएँ रची जाने के बाद संग्रह के नामकरण को तर्कसंगत दिखाने के लिए एक दार्शनिक भूमिका जोड़ दी गई। जिसका सार यह है कि इस संग्रह की कविताओं के केंद्र में ‘युद्ध’ है। इस सार का प्रसार ही कवि की ‘तीसरी दुनिया’ का अभिप्राय है। इससे पहले कि इस संग्रह की कविताओं पर आगे विचार किया जाए, यह कहना जरूरी है कि रूस के यूक्रेन पर हमले ने जिस तरह पूरी दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने लाकर खड़ा कर दिया है, उसे देखते हुए ‘तीसरी दुनिया’ की ये युद्ध केंद्रित कविताएँ आज बेहद प्रासंगिक प्रतीत होती हैं, भले ही इनका प्रकाशन 1988 में हुआ हो। किसी रचना और रचनाकार की रचनाधर्मिता की कसौटी यही है कि वह अपने रचना-काल के बाद भी प्रासंगिक रहे। इस दृष्टि से कवि अनंत काबरा जी के इस संग्रह की कविताएँ देश-काल का अतिक्रमण करने वाली सार्थक कविताएँ सिद्ध होती हैं। उदाहरण स्वरूप हम कुछ कविताएँ देखेंगे।

इतिहास के पन्नों को पलटने से स्पष्ट होता है कि अनादिकाल से युद्ध की विभीषिका चलती आ रही है। युद्ध के बाद चारों ओर विनाश के अलावा कुछ नहीं बचता। हर नया युद्ध विगत युद्ध से भयंकर होता है। परिणाम भी उसी तरह अधिक घातक होते हैं।

कवि यह बार-बार कहते हैं कि युद्ध के आग्रह ने असंतोष का बीज बो दिया है। खुशहाल धरती बंजर बन गई है। चारों ओर कंकाल ही कंकाल नज़र आते हैं। विश्व में जितने भी युद्ध हुए हों, हार तो इंसान की ही हुई है। कवि कहते हैं -
पचास वर्ष पूर्व का आदमी
असमंजस है! आज (तीसरी दुनिया, पृ.23)

युद्ध की यह विभीषिका संपूर्ण मानव जाति को नष्ट कर देगी। विश्व के नक्शे से कुछ देश गायब भी हो सकते हैं। इस संदर्भ में कवि कहते हैं कि -
विश्व के नक्शे पर से
कर जाएँगे कई हाशिये देश -
समर्पण की कई करुण संवेदनाएँ
घिरा देंगी
विश्व को दुखों के बादलों से
विकृति संघर्ष का संशय
फँस जाएगा युद्धों के दलदल में - (पृ. 20)

युद्ध के इस नृशंस तांडव के बाद मनुष्य भयभीत होकर दौड़ रहा है। मौत का डर उसे निगल रहा है। अपने अंदर की मानवता का गला घोंटकर वह नरसंहार कर रहा है। उसके लिए रिश्ते-नाते कोई मायने नहीं रखते। वह तो ‘पत्थर की मूर्ति’ बन बैठा है। कहीं कोई संवेदना नहीं बची है। वह ‘अविश्वास और तनाव भरे परिवेश’ में जी रहा है। ऐसे में कवि दम तोड़ती संवेदनाओं को बचाने की बात करते हैं -
संवेदना के सोपान
जिस उफनती नदी में
नाव पर सवार हैं
काश!
बच जाए वह
तभी तो
मेरे अधूरी इच्छा की तस्वीर
भर पाएगी। (पृ. 16)

यह सच है कि भयंकर विनाश के बाद भी कुछ देश अपने पूर्व वैभव को वापस निर्मित कर पाए। वैज्ञानिक प्रगति कर पाए। पर तीसरी दुनिया के उस प्राणी की स्थिति क्या है जो ‘हर पल जान हथेली पर लेकर सड़क के चौराहों पर घूम रहा है’ -
औद्योगिक वायु प्रदूषणों की गंध
साँसों में समेटा जा रहा है
तीसरी दुनिया में (पृ. 27)

इन कविताओं के माध्यम से कवि-मन यह प्रश्न उठा रहा है कि हम भावी पीढ़ी को कैसा वातावरण प्रदान कर रहे हैं? इन कविताओं में एक ओर ‘अणुबमों की खतरनाक होड़’ है तो दूसरी ओर ‘विषैला धुआँ’, ‘प्राणों का आर्तनाद’, ‘लाशों का ढेर’, ‘निराशा की बंदिश’, ‘हत्याओं का नृशंस दौर’, ‘शवों की सड़ांध’, ‘श्मशान बनते घर और बस्तियाँ’, ‘अत्याचार की वारदातें’, ‘संघर्ष का परिवेश’, ‘अभिलाषाओं की अर्थी’, ‘मौत की तनी हुई रस्सी’, ‘सांप्रदायिकता का विष’, ‘मानसिक कुंठाएँ’, ‘षड्यंत्र का स्रोत’, ‘गलतफहमियों की पगडंडी’, ‘सर्वत्र जीवन का आतंक’ द्रष्टव्य है। क्या ऐसा कोई देश है जहाँ युद्ध न लड़ा गया हो? क्या ऐसा कोई देश है जहाँ अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग न किया गया हो? क्या ऐसा कोई देश हैं जहाँ बच्चे सुरक्षित हों? ऐसे वातावरण में जन्म लेने के लिए भी बच्चा डर जाएगा।

कवि कहते हैं कि हथियारों के साथ-साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी विस्फोटक हो गया है। ‘दिमाग में फैलती जा रही है/ उस शव की बदबू/ जो बंद कमरे में/ कब मरा पता तक नहीं/ सड़ते विचार/ क्रियाकर्म के भी लायक नहीं।’ (पृ.112)

मेरा मानना है कि अनंत काबरा आस्था और सकारात्मकता के कवि हैं। वे इस विडंबना से भली भाँति परिचित हैं कि -
मनुष्य के अंतर्संबंध तोड़ने के लिए
युद्ध का होना जरूरी है (पृ.133)।

इसके बावजूद वे यही आशा करते हैं कि एक न एक दिन युद्ध की विकृतियाँ समाप्त हो जाएँगी और सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी। संवेदनशील कवि-मन युद्ध के भीषण उन्माद की परिस्थिति से मानव समाज को बचाना चाहता है; युद्ध को रोकना चाहता है। इसीलिए तो अनंत काबरा कहते हैं -
आगामी युद्ध रोका जा सकता है
भावी युद्ध टाला जा सकता है।
लेकिन हम रोकेंगे नहीं, टालेंगे नहीं,
पहुँचेंगे जब तक हम
किसी निश्चित निष्कर्ष पर
×××
युद्ध के बाद
जीवित होंगी
गर्भवतियाँ
अपंग बच्चों को जनने के लिए
पता नहीं -
कैसे जिएँगे वे आश्रयहीन बेचारे। (पृ.5)

इन कविताओं में सिर्फ युद्ध की विभीषिका ही नहीं, बल्कि शांत वातावरण में जीने की इच्छा को भी अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। 000

शनिवार, 1 जनवरी 2022

भारतीय संस्कृति का शीर्षासन


हिंदी साहित्य जगत में श्रीलाल शुक्ल और 'राग दरबारी' (1968) के एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि उन्होंने कुछ और लिखा ही नहीं। उन्होंने 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) को देखते-देखते कुछ दिनों तक 'अज्ञातवास' (1962) किया। उस समय उन्हें यह पता चला कि 'आदमी का जहर' (1972) क्या होता है तथा 'सीमाएँ टूटती हैं' (1973) तो घर केवल 'मकान' (1976) बन जाता है। 'पहला पड़ाव' (1987) के बारे में सोचते हुए जब 'बिस्रामपुर का संत' (1998) 'यहाँ से वहाँ' आगे बढ़ता है 'अगली शताब्दी का शहर' की खोज में तो उन्हें 'बब्बरसिंह और उसके साथी' (1999) मिल जाते हैं। तो वे सोचते हैं कि 'आओ बैठ लें कुछ देर'। जब 'राग-विराग' (2001) हो जाता है तो 'अंगद का पाँव' और 'कुंती देवी का झोला' लेकर 'उमराव नगर में कुछ दिन' 'मम्मीजी का गधा' 'कुछ जमीन पर कुछ हवा में' 'ख़बरों की जुगाली' करते हुए घूमता रहता है। 

अब 'राग दरबारी' पर हम थोड़ी सी चर्चा  करेंगे। 

1. पहले ‘राग दरबारी’ क्या है, यह देखें।

राग दरबारी तानसेन द्वारा बनाया हुआ राग है। तानसेन अकबर के दरबारी संगीतकार थे। शायद इसीलिए उनके बनाए हुए राग के साथ ‘दरबारी’ शब्द जुड़ गया। दरबार अर्थात राजा-महाराजा का दरबार। यह एक बहुत ही गंभीर राग है और इसे धीमी गति से गाया जाता है। संगीत के क्षेत्र में इसे बहुत ही कठिन राग माना जाता है। हर कोई इस राग में गा नहीं पाते। इसके लिए परिश्रम की आवश्यकता होती है। तेलुगु और तमिल भाषा की अनेक धार्मिक फिल्मों के गाने इसी राग में हैं। ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ फिल्म के टाइटल सॉन्ग का राग भी ‘दरबारी’ है।

2. यह तो हुई राग की चर्चा। अब हम श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ को भी देख लें।

इस उपन्यास का नाम तो ‘राग दरबारी’ है, लेकिन संगीत से इसका दूर-दूर तक भी कोई रिश्ता नहीं। तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि संगीत से कोई रिश्ता ही नहीं, तो इस उपन्यास का नामकरण राग दरबारी क्यों किया गया है?

इसका उत्तर हमें तभी मिलेगा जब हम ‘दरबार’ के बारे में जानेंगे। इस उपन्यास में चित्रित दरबार किसी राजा-महाराजा का नहीं है, बल्कि वैद्य जी का दरबार है। और वैद्य जी उस दरबार के सर्वेसर्वा है। उनकी आज्ञा के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता, क्योंकि वे गाँव की तमाम राजनीति के पीछे उपस्थित मास्टरमाइंड है। बहुत सोच समझकर तोल-तोल कर बात करने में माहिर हैं।

दरबारी राग धीमी गति से चलता है, लेकिन यह उपन्यास धीमी गति से नहीं चलता। श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्य का सहारा लेकर कथा को आगे बढ़ाया है। उपन्यास का शीर्षक भी दूसरा ही अर्थ देता है।

2010 में ‘उत्तर आधुनिकता और समकालीन विमर्श’ पर जब उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के हैदराबाद केंद्र में संगोष्ठी का आयोजन किया गया था, उस समय श्रद्धेय प्रो. गोपाल शर्मा जी ने देरिदा के अनेक सूत्र बताए थे। उसी प्रकार 2017 में ‘अँधेरे में : पुनर्पाठ’ शीर्षक पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा था, तो उन्होंने ‘अँधेरे में’ की जगत समीक्षा देरिदा की दृष्टि से की थी।

सहज शब्दों में कहना हो तो, देरिदाई सूत्रों में एक सूत्र है ‘सिर के बल खड़ा करना’। शीर्षासन करना। जब आप शीर्षासन करते हैं तो सिर जमीन पर टिका रहता है और पैर आसमान में लटकते रहते हैं। ज़रा कल्पना करके तो देखिए जब हम सब सिर के बल खड़े होंगे तो कैसा लगेगा। जी हाँ, विकृत लगेगा। श्रीलाल शुक्ल ने भारतीय संस्कृति को सिर के बल खड़ा कर दिया है अपने इस उपन्यास में।

भारतीय संस्कृति से मेरा अभिप्राय उन तमाम मूल्यों से है जो हमारे लिए आदर्श हैं। लेकिन आज ये मूल्य विकृत हो चुके हैं। इन विकृतियों से ही विडंबनाएँ पैदा होती हैं। इस उपन्यास में श्रीलाल शुक्ल ने इन विकृतियों को उजागर किया है, लेकिन व्यंग्य रूपी मिश्री की कोटिंग लगाकर। व्यंग्यकार सत्य की खोज नहीं, बल्कि झूठ और पाखंड की खोज करता है। व्यंग्य के टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुज़र कर ही व्यंग्यकार उन मूल्यों तक पहुँचता है, जो उत्कृष्ट साहित्य का अंतिम लक्ष्य हैं। इस उपन्यास के केंद्र में शिवपालगंज गाँव है और वैद्य जी का दरबार, जो पूरी तरह से छल और छद्म का अखाड़ा बना हुआ है। शिवपालगंज कोई गाँव नहीं है, यह तो भारतीय लोकतंत्र का प्रतीक है। व्यवस्था में निहित विकृतियों को कहे बिना श्रीलाल शुक्ल नहीं रह पाए। इन विकृतियों के एकाध उदाहरण देखें -

  • पहले के डाकू नदी-पहाड़ लाँघकर घर पर रुपया लेने आते थे, अब वे चाहते हैं कि कोई उन्हीं के घर जाकर रुपया दे आवे। (पृ. 16)
  • एक तो अछूतों के लिए चंदा कमाने की इमारत बनेगी। दूसरे, अस्पताल के लिए हैज़े का वार्ड बनेगा। वहाँ ज़मीन की कमी है। कॉलिज ही के आसपास टिप्पस से ये इमारतें बनवा लें ... फिर धीरे से हथिया लेंगे। (पृ.27)
आखिर यह कथा किसी शिवपालगंज की ही क्यों, किसी दिल्ली या किसी हैदराबाद की भी तो सकती है। लेकिन यदि ऐसा होता तो IAS या IPS या किसी उच्च अधिकारी या नेता को आलंबन बनाना पड़ता। लेखक को मालूम है कि व्यवस्था से लड़ने से कोई फायदा नहीं होगा, और तो और उल्टा लेने के देने पड़ सकते हैं। शायद इससे बचने के लिए ही श्रीलाल शुक्ल ने शिवपालगंज नामक एक काल्पनिक गाँव को गढ़ा और अपने समय की तमाम विकृतियों को उस पर आरोपित कर दिया। एक तरह से यह लेखकीय चतुराई है।

सोमवार, 31 मई 2021

स्त्री विमर्श


समाज में किसी व्यक्ति अथवा समुदाय की अस्मिता अथवा पहचान का मुख्य आधार उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए समाज में अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि दुनिया के सभी समाजों में सदियों से पुरुष और स्त्री को अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है। स्त्री को कमजोर माना जाता है और उसे हमेशा ही अबला, दीन, कमजोर, वीक जेंडर आदि अनेक विशेषणों से संबोधित किया जाता है। लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है कि स्त्री भले ही शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर है लेकिन मानसिक रूप से वह किसी भी स्तर पर कम नहीं है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का यह कथन उल्लेखनीय है। “नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादिभाव अधिक तीव्र तथा स्थायी होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अंतर है जितना विद्युत और झड़ी में। एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं, परंतु प्यास नहीं बुझाई जा सकती। दूसरी से शांति मिलती है, परंतु पशुबल की उत्पत्ति संभव नहीं। दोनों के व्यक्तित्व, अपनी पूर्णता में समाज के एक ऐसे रिक्त स्थान को भर देते हैं जिससे विभिन्न सामाजिक संबंधों में सामंजस्य उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण कर देता है।” (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 11-12)। स्त्री-पुरुष साहित्य के केंद्र में भी आ चुके हैं। साहित्यकार इनके विविध रूपों और विविध संबंधों का चित्रण करते रहे हैं।

1990 के बाद विमर्शों का साहित्य भारतीय भाषाओं में उभरने लगा। इसकी भूमिका एक तरह से उसी समय तैयार हो चुकी थी जब ‘नई कविता’ अस्तित्व और अस्मिता की खोज की बात कर रही थी। नई कविता में व्यक्ति की जिजीविषा और अस्तित्व के संघर्ष की बात थी। आगे चलकर यही व्यक्ति समुदाय में बदल गया - हाशियाकृत समुदाय में। उस समुदाय का संघर्ष ही विमर्श है। जीने की इच्छा, अस्तित्व और अस्मिता को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद, शोषण के प्रति आक्रोश और संघर्ष के परिणामस्वरूप स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, तृतीय लिंगी, पर्यावरण आदि विमर्श सामने आए।

अब हम स्त्री विमर्श पर दृष्टि केंद्रित करेंगे। स्त्री विमर्श की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करने से पूर्व ‘स्त्री’ शब्द पर विचार आवश्यक है। स्त्री शब्द के अनेक पर्याय हैं। जैसे हिंदी में नारी, औरत, महिला, कन्या, मादा, श्रीमती, लुगाई आदि और अंग्रेजी में female, woman, damsel। इसी तरह तेलुगु में स्त्री, आडदी, इंति, महिला, कन्या, श्रीमती, आविडा, आडपिल्ला, अम्मायी, मगुवा आदि शब्दों का प्रयोग संदर्भ के अनुसार किया जाता है। यदि ‘स्त्री’ शब्द के व्युत्पत्तिमूलक अर्थ पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होता है कि यास्क ने अपने ‘निरुक्त’ में ‘स्त्यै’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति की है जिसका अर्थ लगाया गया है – लज्जा से सिकुड़ना। पाणिनी ने भी ‘स्त्यै’ धातु से ही ‘स्त्री’ की व्युत्पत्ति की है, पर इस धातु का अर्थ शब्द करना और इकट्ठा करना लगाया है – ‘‘स्त्यै शब्द-संघातयोः’ (धातुपाठ)। साहित्य में स्त्री को दया, माया, श्रद्धा, देवी आदि अनेक रूपों में संबोधित किया जाता है। स्त्री को इस तरह अनेक रूपों में विभाजित करके देखने के बजाए उसके व्यक्तित्व को समग्र रूप में अर्थात मानवी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

भारतीय स्त्री को बचपन से ही घर और समाज की मर्यादों की पट्टी पढ़ाई जाती है। पुराने समय में लड़की को एक सीमा तक ही शिक्षा प्रदान की जाती थी। उसे घरेलू काम-काज में प्रशिक्षण दिया जाता था। उसके लिए तरह-तरह की पाबंदियाँ होती थीं। हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है न कि ‘स्त्री न स्वातंत्र्यम अर्हती’। यही माना जाता रहा है कि स्त्री पिता, पति और पुत्र के संरक्षण में सुरक्षित रहती है। लेकिन यह भूल जाते हैं कि वह भी मनुष्य है। मानवी है। उसके भीतर भी भावनाएँ हैं। पुरुषसत्तात्मक समाज ने उसे माँ और देवी का रूप प्रदान करके उसे ऐसे सिंहासन पर बिठा दिया कि वह कठपुतली बनती गई। स्त्री को जहाँ एक ओर देवी, माँ, भगवती आदि कहकर संबोधित किया जाता है वहीं दूसरी ओर उसकी अवहेलना की जाती है। “नारी के देवत्व की कैसी विडंबना है!” (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 35)। पुरुष के समान स्त्री भी इस समुदाय का हिस्सा है तो सारे प्रतिबंध उसी के लिए क्यों!? पुरुष के लिए क्यों नहीं?

स्त्री को यह कहकर घर की चारदीवारी तक सीमित किया गया कि घर के बाहर वह असुरक्षित है। घर ही उसका साम्राज्य है। लेकिन जिस घर में जन्म लेती है वह घर विवाह के बाद उसके लिए पराया हो जाता है। उस घर के लिए वह मेहमान बन जाती है। विवाह के बाद नए घर में प्रवेश करके वहाँ अपने आपको जड़ से रोपने की कोशिश करती है। और यह कोशिश निरंतर चलती है। रुकने का नाम नहीं लेती। इस रोपने की क्रिया में उसे तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उसकी एक नई पहचान बनती है। और वह नए रिश्ते में बंध जाती है। सबकी जरूरतों के बारे में सोचने वाली स्त्री अपनी जरूरतों को दरकिनार कर देती है। इस संदर्भ में मुझे तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा की प्रसिद्ध कविता ‘सुई’ याद आ रही है। उस कविता में उन्होंने सुई के माध्यम से स्त्री जीवन को व्यक्त किया है। यहाँ सुई प्रतीक है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता की धागों से पिरोती है - इन्सानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फट्टे भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-भेदों को रफू करना चाहती हूँ/ आर-पार न सूझने वाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में/ मेरी सुई है/ और लोकों की समीष्टि के लिए खुला कांतिनेत्र। ( मौन भी बोलता है, पृ. 53-54)। लेकिन उसे क्या मिलता है! कभी-कभी तो उसे घर के सदस्यों की अवहेलना और तिरस्कार को झेलना पड़ता है। चाहे गलती किसी की भी क्यों न हो स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है। ‘युगों से उसको उसकी सहनशीलता के लिए दंडित होना पड़ रहा है।‘ (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 17)।

समय के साथ-साथ स्त्री भी मूलभूत मानाधिकारों के प्रति सचेत हो गई। सदियों से हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी। यदि महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो “स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है। कारण वह जान गई है कि एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाना है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना है जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे। आज उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उत्तीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है।“ (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 105)। शोषण के प्रति स्त्री अपनी आवाज उठाने लगी। परिणामस्वरूप स्त्री विमर्श की अवधारणा सामने आई।

स्त्री विमर्श की अवधारणा भारत एवं पाश्चात्य संदर्भ में बिल्कुल अलग-अलग है क्योंकि भारतीय दृष्टि में स्त्री ‘मूल्य’ है जबकि पाश्चात्य दृष्टि में वह मात्र ‘वस्तु’ है। अब स्त्री विमर्श की कुछ परिभाषाओं पर चर्चा करेंगे।

स्त्री विमर्श अथवा स्त्रीवाद को अंग्रेजी में ‘feminism’ कहा जाता है। इस शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन शब्द ‘फेमिना’ से मानी जाती है जिसका अर्थ है ‘स्त्री’। इसे स्त्रियों के अधिकारों के लिए किए जाने वाले संघर्ष के रूप में देखा जाने लगा है।

एस्टेल फ़्रडमेन (Estelle Freedman) ने अपनी पुस्तक ‘Feminism, Sexuality & Politics’ में यह कहा है कि “I use feminism as an umbrella term for any movement seeking to achieve full economic and political citizenship for woman.” (pg. 210). इससे यह स्पष्ट होता है कि स्त्री के नागरिक अधिकारों के लिए होने वाले समस्त आर्थिक एवं राजनैतिक आंदोलन स्त्री विमर्श के अंतर्गत समाहित हैं।

रेबेका लेविन (Rebecca Lewin) का मानना है कि “Feminism is a theory that calls for woman’s attainment of social, economic and political rights and opportunities equal to those possessed by men.” कहने का आशय है कि जिस तरह पुरुष सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में अधिकार प्राप्त करते हैं वैसे ही स्त्री भी उन सभी अधिकारों के लिए समान रूप से अधिकारी है।

स्त्री विमर्श एक प्रतिक्रिया है। युगों की दासता, पीड़ा और अपमान के विरुद्ध स्त्री की सकारात्मक प्रतिक्रिया है अपनी अस्मिता एवं अस्तित्व की रक्षा हेतु। 1949 में सिमोन द बुआ ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में स्त्री को वस्तु रूप में प्रस्तुत करने की स्थिति पर प्रहार किया। डोरोथी पार्कर का मानना है कि स्त्री को स्त्री के रूप में ही देखना होगा क्योंकि पुरुष और स्त्री दोनों ही मानव प्राणी हैं। 1960 में केट मिलेट ने पुरुष की रूढ़िवादी मानसिकता पर प्रहार किया। वर्जीनिया वुल्फ़, जर्मेन ग्रीयर आदि ने भी स्त्री के अधिकारों की बात की। इन स्त्रीवादी चिंतकों का प्रभाव भारतीय समाज पर भी पड़ा। भारतीय स्त्रीचिंतकों में वृंदा करात, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, महाश्वेता देवी, मेधा पाटकर, अरुंधति राय, वोल्गा, अब्बूरी छायादेवी, जयाप्रभा आदि उल्लेखनीय हैं।

स्त्री विमर्श की अवधारणा भारतीय एवं पाश्चात्य संदर्भ में अलग-अलग है। भारतीय संस्कृति बहुत प्राचीन संस्कृति है। यहाँ वैदिक काल में स्त्रियों को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था। प्रमाणस्वरूप स्त्रियों द्वारा रचित ऋचाओं को देख सकते हैं। उस काल में साहित्यिक क्षेत्र में स्त्री की सहभागिता थी। उस काल में स्त्री को गृहस्थ का गुरुतर भार वहन करने की प्रेरणा के साथ-साथ यह भी आदेश दिया जाता था कि समय आने पर वीरता दिखानी होगी। निस्संदेह उस काल में स्त्री को कुछ अधिकार प्राप्त थे लेकिन पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण वह धीरे-धीरे बंधनों में जकड़ती गई। विदेशी आक्रमणों के फलस्वरूप मध्यकाल में स्त्री शोषण के चक्रव्यूह में फँस गई। पुनर्जागरण काल में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, गोविंद रानाड़े आदि चिंतकों ने स्त्री को सचेत करने का प्रयास किया। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल, झलकारी बाई, ऊदा देवी, अज़ीज़न बाई, कर्नाटक प्रदेश की कित्तूर चेन्नम्मा, आंध्र की नयकुरालु नागम्मा आदि का योगदान अविस्मरणीय है।

स्त्री, समाज को अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर देखती है। वह जब से यह महसूस करने लगी कि वह पुरुष से किसी भी स्तर पर कम नहीं तब से ही वह अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए आवाज उठाने लगी। स्त्री विमर्श में महत्वपूर्ण कारक है ‘जेंडर’। स्त्री इसी लिंग केंद्रित जड़ता को तोड़ना चाहती है। इसे स्त्री मुक्ति का पहला चरण माना जा सकता है। वैश्विक स्तर पर घटित विभिन्न आंदोलन स्त्रीवादी सैद्धांतिकी को निर्मित करने में सहायक सिद्ध हुए। प्रमुख रूप से उदारवादी स्त्रीवाद (liberal feminism), समाजवादी-मार्क्सवादी स्त्रीवाद (socio-Marxist feminism), रेडिकल स्त्रीवाद (radical feminism), सांस्कृतिक स्त्रीवाद (cultural feminism), पर्यावरणीय स्त्रीवाद (eco-feminism), वैयक्तिक स्त्रीवाद (I-feminism/ individualistic feminism) स्त्री प्रश्नों पर प्रकाश डालते हैं।

वस्तुतः स्त्री विमर्श के लिए कुछ समीक्षा आधार निर्धारित करना अनिवार्य है। समाज में स्त्री की स्थिति, स्त्री विषयक पारंपरिक मान्यताओं पर पुनर्विचार, पारंपरिक स्त्री संहिता की व्यावहारिक अस्वीकृति, शोषण के विरुद्ध स्त्री का असंतोष और आक्रोश, देह मुक्ति, पुरुषवादी वर्चस्व के ढाँचे को तोड़ना, स्त्री सशक्तीकरण और सार्वजनिक जीवन में स्त्री की भूमिका आदि को प्रमुख रूप से स्त्री विमर्श की कसौटियाँ माना जा सकता है। इनके आधार पर साहित्य का स्त्री विमर्शमूलक विश्लेषण आसानी से किया जा सकता है।

भाषा की दृष्टि यदि स्त्री विमर्श को देखा जाए तो रोचक तथ्य सामने आते हैं। स्त्री-भाषा पुरुष की भाषा से भिन्न होती है। स्त्री अपने अनुभव जगत से शब्द चयन करती है। जहाँ पुरुष-भाषा में वर्चस्व, रौब और अधिकार की भावनाओं को देखा जा सकता है वहीं स्त्री-भाषा में सखी भाव अर्थात मैं से हम की यात्रा को देखा जा सकता है। सामान्य स्त्री के भाषिक आचरण में आप पुरुष की रुचि-अरुचि का ध्यान रखने की प्रवृत्ति, परिवार की शुभेच्छा की प्रवृत्ति, स्त्री सुलभ कलाओं में रुचि की प्रवृत्ति, घर-परिवार और संस्कारों में रुचि की प्रवृत्ति, घरेलू चिंताओं की प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। इसी प्रकार एक शिक्षित स्त्री के भाषिक आचरण में पूर्ण आत्मविश्वास, निडरता, जागरूकता, स्थितियों के विश्लेषण की क्षमता आदि प्रवृत्तियों को देखा जा सकता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि स्त्री विमर्श से अभिप्राय है स्त्री में आत्मनिर्णय की प्रवृत्ति होना जिससे वह उस स्त्री संहिता का अतिक्रमण कर सकती है जो उसकी अस्मिता एवं अस्तित्व के लिए घातक है तथा सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभा सकती है।

रविवार, 2 मई 2021

संपादकीय : 'स्रवंति' अप्रैल 2021

 


संपादकीय...

 

“बढ़ते ही रहेंगे

हम न मरते हैं

मरने से डरेंगे” (अब शेष हूँ मरता नहीं)

कहकर उद्घोष करने वाले डॉ. प्रेमचंद्र जैन का जन्म बदायूँ जनपद के ग्राम नगला बारहा में 3 जनवरी, 1938 को हुआ था। अपभ्रंश पर उनका विशेष अधिकार था। वे कर्मठ व्यक्ति थे। अपने विचारों और कार्यों के कारण हमेशा जाने जाते रहे। 16 मार्च, 2021 को वे पंचतत्व में लीन हो गए। उनका जाना व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए अपूरणीय क्षति है।

डॉ. प्रेमचंद्र जैन को बचपन से ही घर में शिक्षा का वातावरण प्राप्त था क्योंकि पिताजी मूलतः अध्यापक थे। उन्होंने स्यादवाद महाविद्यालय, काशी विश्वविद्यालय एवं पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान से उच्च शिक्षा अर्जित की। ‘अपभ्रंश कथा काव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक’ विषय पर 1969 में काशी विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि अर्जित की।  वे जैन धर्म के गहन अध्येता थे। इस का प्रमाण है उनका ‘जैन रहस्यवादी अपभ्रंश काव्य और उनका हिंदी पर प्रभाव’ (1964) नामक ग्रंथ। डॉ. शिवप्रसाद सिंह अभिनंदन ग्रंथ ‘बीहड़ पथ के यात्री’ के वे संपादक थे।

प्रेमचंद्र जैन स्वाभिमानी थे। साहसी और कर्मठ थे। वे दृढ़ निश्चयी थे। इस संबंध में उनके गुरु शिवप्रसाद सिंह का यह कथन उल्लेखनीय है- "तुम संकल्प को यथा समय सही ढंग से पूरा करने में सदैव तत्पर हो।"  उनके व्यक्तित्व के संबंध में बताते हुए चंद्रमणि रघुवंशी ने कहा कि “कृशकाय डॉ. प्रेमचंद्र जैन प्रभावशाली व्यक्ति न होने के बावजूद अपने ज्ञान की बपौती के बूते पर मिलने वाले प्रत्येक अपरिचित पर भी अमिट प्रभाव छोड़ने में सदैव सफल रहते हैं। उनकी विनम्रता ‘सोने में सुहागा’ की कहावत को चरितार्थ करती है।“ (निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक, पृ. 31)।

डॉ. प्रेमचंद्र जैन सबके लिए 'गुरु जी' थे। इस संबंध में डॉ. कृष्णावतार 'करुण' का यह मत उल्लेखनीय है- "गुरु जी नजीबाबाद में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के गुरु जी हैं। यहाँ तक कि मेरी माँ भी उन्हें गुरु जी ही कहती हैं।" (वही, पृ. 39)। वे बहुत ही आत्मीयता के साथ सबका स्वागत करते थे। गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे भी मिला। गुरु जी मुझे अपनी बेटी के रूप में मानते थे। केवल मानते ही नहीं, बल्कि कभी कभी पिता के समान रूठते भी थे और जल्दी ही मान भी जाते थे।

मुझे यह सोचकर हमेशा गर्व होता है कि गुरु परंपरा में मेरे संबंध सूत्र आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़ते हैं. आचार्य द्विवेदी, शिवप्रसाद सिंह, प्रेमचंद्र जैन, उनके शिष्य और अंत में मैं। मेरे बाद भी यह क्रम चलता रहेगा। इस अर्थ में गुरु जी डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी से मेरा जुड़ाव स्वाभाविक ही है।

ज्ञान जगत के संबंधों के बारे में कहना ही पड़े तो मैं कहूँगी कि इसका श्रेय दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद की पत्रिका 'स्रवंति' को है। सह संपादक के रूप में मैं इससे जुड़ी हूँ और इसका हर अंक गुरु जी को भी जाता था।  मुझे याद है कि 'स्रवंति' का अंक प्राप्त होते ही वे अपनी टिप्पणी तुरंत भेजते थे। उनकी प्रतिक्रियाओं में सामग्री का मूल्यांकन भी होता था और दिशा निर्देश भी। उनके इस कार्य ने पत्रिका-परिवार को सजग बनाए रखा। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह भी एक उपलब्धि है। पिता की भाँति स्नेह और प्यार बाँटने वाले 'गुरु जी' आज भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं,  फिर भी हमारी स्मृतियों में वे सदा ही जीवित रहेंगे।

'गुरु जी' अपने गुरु शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्राप्त गुरुमंत्र को हमें विरासत में दे गए हैं- "चिंताएँ छोड़कर नियति से लड़ो…  लड़ना ही धर्म है। सारा जीवन बन जाए युद्ध… । तभी मृत्यु का भय भाग जाता है।"

 

पाठकों के आस्वादन हेतु 'मध्यांतर' में डॉ. प्रेमचंद्र जैन की कविताएँ दी जा रही हैं.


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की दो पुस्तकें लोकार्पित

हैदराबाद, 19.2.2021 (मीडिया विज्ञप्ति)।

'तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा' का लोकार्पण 


यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित परिसर में विगत 11 फरवरी को डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की दो पुस्तकों ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ और ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए सभा के सचिव श्री जी. सेल्वराजन ने कहा कि एक तेलुगुभाषी लेखिका के रूप में डॉ. नीरजा की उपलब्धियों पर सभा गर्व का अनुभव करती है।

दोनों पुस्तकों का लोकार्पण लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक डॉ. रमेश कुमार पांडेय ने किया। उन्होंने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि हिंदीतरभाषी हिंदी सेवियों ने ही हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया है। उन्होंने आगे कहा कि डॉ. नीरजा की ये दोनों पुस्तकें हिंदी और तेलुगु भाषा-समाजों के बीच सेतु को सुदृढ़ करने वाली हैं।

विशेष अतिथि के रूप में पधारे केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपनिदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने यह जानकारी दी कि विमोचित पुस्तकों में सम्मिलित ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ के लिए लेखिका को केंद्रीय हिंदी निदेशालय से एक लाख रुपए का ‘हिंदीतरभाषी हिंदी लेखक पुरस्कार’ भी प्राप्त हुआ है। उन्होंने इस पुस्तक में शामिल तेलुगु भाषा और साहित्य विषयक सामग्री को भारतीय साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

'कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा' का लोकार्पण

लोकार्पित पुस्तकों की समीक्षा करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ में जहाँ कवयित्री की हिंदी में रचित मौलिक कविताएँ शामिल हैं, वहीं उनके द्वारा किया गया हिंदी, तमिल और तेलुगु के कुछ प्रसिद्ध रचनाकारों की कविताओं का अनुवाद भी सम्मिलित है। उन्होंने बताया कि ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ में जहाँ तेलुगु भाषा और साहित्य के उदय से लेकर इक्कीसवीं सदी तक के विकास को अलग-अलग निबंधों के माध्यम से दर्शाया गया है, वहीं इसमें सम्मिलित 76 तेलुगु साहित्यकारों का ‘परिचय कोश’ इसकी उपादेयता को और भी बढ़ा देता है।

लेखिका का परिचय देते हुए शिक्षा महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. के. चारुलता ने कहा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा बहुभाषाविद लेखिका हैं और उन्होंने साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के सह-संपादक के रूप में साहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बनाई है।

इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और शिक्षा महाविद्यालय, हैदराबाद की ओर से लेखिका का भावभीना अभिनंदन किया गया। 000


- वुल्लि श्रीसाहिती 
304, मेधा टावर्स, राधाकृष्ण नगर
अत्तापुर, हैदराबाद - 500048