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बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

(मेरी पुस्तक) अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख 

गुर्रमकोंडा नीरजा 
2015
वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु. 495
ISBN : 978-93-5229-249-3
पृष्ठ 304

आज  [27 अक्टूबर, 2015] सुबह मेरे नाम पर वाणी प्रकाशन से एक पार्सल आया था. मैं अपनी आखों पर यकीन नहीं कर पाई. मेरी पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ की लेखकीय प्रतियाँ!!! मेरी आँखें अनायास ही नम हो आईं. 

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ को लिखने के पीछे मेरे दो गुरुजन का प्रोत्साहन रहा - प्रो. दिलीप सिंह और  प्रो. ऋषभदेव शर्मा. इस पुस्तक का नामकरण भी दिलीप सर ने ही किया था. देखा जाय तो यह पुस्तक मेरे लिए देखा गया इन दोनों का सपना है जो आज इस रूप में पूरा हुआ है. मैं दोनों गुरुजन के प्रति कृतज्ञ हूँ. नतमस्तक हूँ. 

अपनी खुशी  दिलीप सर से बाँटनी चाही तो वे उपलब्ध नहीं हुए. मैं और मेरे पतिदेव शर्मा सर के घर पहुँच गए पुस्तकों के पार्सल सहित. शर्मा सर और पूर्णिमा मैडम दोनों पुस्तक को देखकर बेहद  खुश हुए. दोनों ने मुझे बार-बार आशीर्वाद दिए. 

गुरुजनों और हितैषियों के आशीष के अतिरिक्त और क्या चाहिए!

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

स्मृतियों में बसी गंगा की तरंग

9 जून 2014. 
रात की नींद गायब. कल नजीबाबाद जो जाना है ‘परिलेख हिंदी साधक सम्मान’ लेने. इसकी कल्पना भी नहीं की थी. 

10 जून 2014.
सुबह के चार बजे. तैयार हो गई और ठीक पाँच बजे माँ-पापा, भाई और तीन साल की बेटी से विदा लेकर पति के साथ घर से हैदराबाद नामपल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ी. 5.40 तक स्टेशन पहुँच गई और ठीक छह बजकर पाँच मिनट पर गाड़ी ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया. सफर बहुत अच्छा रहा. ठीक सामने की सीट पर एक सरदार जी और उनकी पत्नी रमणिक कौर जी (यही नाम बताया उन्होंने) थे. समय बीतता गया और ऐसे ही हम लोगों के बीच सहज वार्तालाप शुरू हुआ. वे दोनों अमृतसर जा रहे थे गुरुद्वारे का दर्शन करने. वार्तालाप से बहुत ही सरल और मिलनसार लगे. नागपुर स्टेशन पर इंजिनियरिंग और सी.ए. के कुछ विद्यार्थियों की टोली चढ़ी. वे मनाली जी रहे थे. उसमें एक व्यक्ति अपने परिवार (पत्नी और आठ साल की बेटी) को भी साथ लेकर जा रहा था. रात भर वे लोग मस्ती करते रहे. सफर में थकान महसूस ही नहीं हुई. जब भी कमर में दर्द होने लगता था तो ऊपर बर्थ पर जाकर सो जाती थी. पहली बार उत्तर की ओर यात्रा कर रही थी. 

आंध्र प्रदेश – अरे बाबा अब तो यह क्षेत्र तेलंगाना हो गया. जब तक गाड़ी तेलंगाना क्षेत्र में चल रही थी तब तक भौगोलिक परिवेश कुछ और था. जैसे जैसे गाड़ी महाराष्ट्र में पहुँची धीरे धीरे भौगोलिक परिस्थिति बदल गई. तेलंगाना के क्षेत्र में सूखे पेड़ दिखाई दे रहे थे. कहीं कहीं बंजर भूमि थी तो कहीं कहीं बुआई के लिए तैयार भूमि दिख पडी. नीम, ताड़, आम, छोटे खजूर और बरगद के पेड़ तो हैं ही, हर जगह टीक और बबूल के वृक्ष भी हैं. गर्मी का तो पता नहीं चला क्योंकि वातानुकूलित कोच में बैठकर यात्रा कर रही थी. महाराष्ट्र में पहुँचते ही मौसम बदला सा गया. बारिश की बूँदें भी गिरीं. नागपुर से जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, संतरे के बाग ही बाग थे. जगह जगह पर आम के बाग थे. पहाड़ों के बीच से जब गाड़ी गुज़री तो बहुत ही अच्छा लगा. कहीं कहीं तो गाड़ी सुरंग से गुज़री. कहीं जंगल था, तो कहीं पहाड़, कहीं सपाट भूमि तो कहीं घाटी. देखने लायक है भारत की प्राकृतिक संपदा. 

11 जून 2014

गाड़ी सुबह 9 बजे के आस-पास दिल्ली पहुँची. पापा के शिष्य अगस्टिन जी गाड़ी लेकर स्टेशन पहुँच गए हमें लेने. हम स्टेशन से सीधे आई.एस.बी.टी. - कश्मीरी गेट पहुँच गए और वहाँ से नजीबाबाद जाने वाली बस में चढ़ गए. ड्राइवर की सीट के पीछे वाली सीट खाली थी तो वहीं आराम से बैठ गए. बस चल पड़ी नजीबाबाद की ओर. जैसे ही बस दिल्ली के बाहर पहुँची तो रास्ते में लीची और रसीले आम दिख गए. हैदराबाद में तो लीची एकदम सूखी होती हैं. लेकिन यहाँ बड़ी बड़ी लाल-लाल रसीली लीची. देखते ही मन ललचाने लगा. बस आगे बढ़ती गई और मैं दोनों तरफ के पेड़-पौधों को देखने लगी. फलों से लदे हुए आम और लीची के पेड़. वाह! क्या बात है! बस रुकने का नाम नहीं ले रही थी. दोपहर हो गई और भूख लग रही थी तो खजूर खाते हुए गए. हैदराबाद से ही लिए थे साथ. मेरठ पार करने के बाद ड्राइवर ने एक ढाबे के पास बस रोक दी और हम सब वहाँ उतरे और ठंडे पानी से मुँह धोया तो मानो जान में जान आ गई. फिर हमने वहाँ चटपटी चाट का मजा लिया, शिकंजी भी पी और फिर आकर बस में विराज गए. रास्ते में अनेक छोटे छोटे गाँव थे. उनके नाम बड़े ही मजेदार लगे. जैसे – भैंसा, फिटकरी, चौलापुरा, इंचौली, बहसूमा, कौल, झुनझुनी, सदपुर, सैफपुर, रामराज, बहसुमा, भगवंतपुरम, मीराँपुर, डाबका, पठानपुरा, मलियाना, पुट्ठा, कुंडा, पतला, निवाडा आदि. मतलब यह है कि दक्षिण के स्थान नामों के अभ्यासी मन को ये नाम बहुत नए और रोचक लगे! और हाँ, ट्रकों व दूसरे वाहनों पर मजेदार स्लोगन भी पढ़ने को मिले. एक ट्रक पर लिखा हुआ था ‘हँस मत पगली प्यार हो जाएगा.’

एक मजेदार बात. एक यात्री को कहीं उतरना था पर ड्राइवर ने बस उसके वांछित स्थान पर नहीं रोकी. यात्री ने कटाक्ष पूर्वक ड्राइवर को संबोधित किया - ‘अपणे घर ही ले कै जागा क्या?’ ड्राइवर भी हाजिर जवाब निकाला. बोला – ‘क्या, मेरा कान बजै? कंडक्टर सै सिट्टी ना बजवा सकै था क्या?’ यह है हमारी लोक बोलियों के बतरस की संपदा जो शहरों की नकली भाषा से गायब है. एक व्यक्ति हाजमे की गोलियाँ बेच रहा था. उसके बेचने का तरीका भी भा गया. वह लोकभाषा (कौरवी) में लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था. क्या रेटॉरिक थी उसकी भाषा में. तब समझ में आया कि दिलीप सर क्यों कहते हैं कि भाषा का असली व्यवहार उसके प्रयोक्ता समाज में रहकर ही सीखा जा सकता है. 

होटल ब्ल्यू डाइमंड में 
नजीबाबाद पहुँचते पहुँचते पाँच बज गए. वहाँ बस स्टैंड के पास आयोजक हमारे स्वागत में खड़े थे. रिक्शा कर लिए गए. चेन्नै, हैदराबाद और आंध्र प्रदेश के रिक्शों से यहाँ के रिक्शे अलग ही थे. बहुत बरसों के बाद रिक्शे पर चढ़ी तो मजा आ गया. ब्ल्यू डाइमंड होटल पहुँचे. होटल में डॉ. रजनी शर्मा, डॉ. सुशील कुमार त्यागी, आकाशवाणी के ताहिर महमूद और प्रदीप सिंह ने अगवानी की.

भाई अमन कुमार त्यागी के परिवार के साथ 

थोड़ी देर आराम करने के बाद शाम को वहाँ से परिलेख कला एवं संस्कृति समिति, नजीबाबाद के संस्थापक भाई अमन कुमार त्यागी के घर पहुँचे. वहाँ उनका पूरा परिवार स्वागत में जुटा हुआ था. भाभी और बच्चे (अक्षि और तन्मय), डॉ. सुशील कुमार त्यागी आदि. खाना लाजवाब था. खाने के बाद होटल की ओर पैदल चल पड़े. चाँदनी रात थी. रेलवे स्टेशन क्रॉस करके जाना था. ब्रिज पर चढ़कर स्टेशन पार करते समय निर्मल आकाश में चंद्रमा की मनमोहक छटा निहारने योग्य थी. हम लोगों ने चाँदनी में कुछ फोटोग्राफी भी की. पूरे समय अमन भाई जाने कहाँ-कहाँ के रोचक किस्से सुनाते रहे. बड़े ठहरे से अंदाज में बात करते हैं अमन जी – कोई जल्दी नहीं, कोई तनाव नहीं! 

12 जून 2014. 

सुबह सुबह आँख खुल गई तो हम तैयार हो गए. डॉ. रजनी शर्मा के सुपुत्र आ गए और डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी
डॉ. रजनी शर्मा की पोती गौरी  
तथा डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी के साथ हमें अपने घर ले गए नाश्ते पर. गरमा गरम जलेबी और ब्रेड रोल के साथ लस्सी. मजा आ गया. सच कहूँ तो सुबह सुबह इस तरह का नाश्ता पहली बार किया. वहाँ से फिर होटल लौटे. थोड़ी ही देर में रुड़की से श्रद्धेय गुरुवर डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी आए. अरुण जी मुझे बेटी मानते हैं. ईमेल और फोन पर तो उनसे बातचीत होती रहती थी पर प्रत्यक्ष दर्शन पहली बार हुए. इतने में वहाँ ‘अमर उजाला’ के संवाददाता पहुँच गए और हम लोगों के साक्षात्कार लिए. अमन भाई ने आकाशवाणी – नजीबाबाद में रिकॉर्डिंग की भी व्यवस्था की थी; यों बाद में डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण जी हम सबको सीधे आकशवाणी भवन ले गए. पहले डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी की रिकॉर्डिंग हुई बाद में मेरी. मैंने ‘हिंदी तथा तेलुगु के प्रमुख संतों की रचनाओं में अंतःसंबंध’ शीर्षक वार्ता प्रस्तुत की. उधर अमन कुमार त्यागी जी के घर उनके पिताजी (श्री महेंद्र अश्क जी), माताजी और अन्य परिवारी जन हमारी प्रतीक्षा में बैठे थे. 

खाना खाते खाते तीन बज गए तो हम तुरंत होटल की ओर निकल पड़े चूँकि 4 बजे से परिलेख कला एवं संस्कृति समिति तथा लोक समन्वय समिति, नजीबाबाद का सम्मान समारोह था. 4 बजे के आसपास हम समारोह स्थल पहुँच चुके थे. बढ़िया बैनर लगा हुआ था – बैनर पर अपना और अपनी पुस्तक का चित्र देखकर मैं रोमांचित तो हुई, विचलित भी हो उठी – मैं इस सबकी अधिकारी हूँ भी या नहीं! 


सम्मान कार्यक्रम समाप्त होते होते आठ बज ही चुके थे. हम सब सीधे अमन भाई के घर पहुँचे. खाना खाकर वहाँ से होटल की ओर प्रस्थान. सब कुछ सपने जैसा लग रहा था. सचमुच मैंने अपने अत्यंत साधारण सी हिंदी सेवा के लिए इतनी स्वीकृति और सम्मान की न तो आशा की थी, न अपेक्षा. यह सब मुझे अनायास ही मिला रहा है – मेरे मातापिता और गुरुजन के आशीर्वाद से! 

13 जून 2014 

ठीक 7 बजे राजकुमार जी हाजिर हो गए हमें अपने घर ले जाने. आदरणीय राजकुमार जी के बारे में यह बताना जरूरी है कि प्रो. देवराज जी के अनन्य और घनिष्ठ मित्र हैं और प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी के प्रति भी वैसा ही स्नेहभाव रखते हैं. किस्सागोई में राजकुमार जी अमन जी से इक्कीस निकले. हमें इर्द गिर्द बिठाकर घर के बुजुर्ग की तरह जाने कितनी ‘ऐतिहासिक’ वारदातें उन्होंने सुना डालीं. उनसे ही मुझे ‘साहित्य कुंभ’ तथा ‘साहित्य मंथन’ की ऐतिहासिकता का पता चला. वहाँ से हम गुरुवर डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी के घर जाने वाले थे लेकिन कुछ ऐसी अप्रत्याशित स्थितियाँ आ गईं कि जा न सके. और इस तरह नजीबाबाद का हमारी यह सारस्वत यात्रा अधूरी रह गई. 

फिर कार्यक्रम बना कण्वऋषि आश्रम जाने का. पहले यह तय किया गया था कि आश्रम देखकर वहाँ से रुड़की और वहाँ से खतौली जाएँगे. दरअसल, भाई अमन कुमार त्यागी ने जब कहा था कि परिलेख सम्मान ग्रहण करने के लिए नजीबाबाद आना होगा तो मैंने गर्मी में इतनी लंबी यात्रा के डर से आनाकानी शुरू कर दी थी. इस पर उन्होंने मुझे ललचाने की कोशिश की. दो लालच दिए. एक - आपको इस बहाने हरिद्वार और गंगा स्नान का भी पुण्य मिल जाएगा. दो - शायद आपको नहीं पता कि नजीबाबाद के एकदम पास में कोटद्वार में कण्व ऋषि का आश्रम है जो दुष्यंत और शकुंतला की प्रणय कथा से जुड़ा है. यहाँ आएँगी तो वहाँ भी चलेंगे. 

अमन भाई ने अपना वादा निभाया. गंगा स्नान भी कराया और कण्व आश्रम भी दिखाया. साथ में थे अमन भाई,
तन्मय 
उनकी बहुत प्यारी बिटिया अक्षि, चपल और अत्यंत प्रिय बेटा तन्मय, मनमीत के संपादक अरविंद कुमार जी, दिल्ली से आए हुए पत्रकार उपेंद्र जी, गुरुकुल कांगड़ी ज्वालापुर के डॉ. सुशील कुमार त्यागी. डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा तो मेरे अभिभावक की तरह आए ही थे. इन सबके साथ मालिनी नदी के किनारे फैले कण्व आश्रम में जाना रोमांचकारी अनुभव रहा. दो ट्रकों को रोकने की शक्ति का प्रमाण दे चुके ‘पावर योगी’ जयंत जी (आधुनिक भीम) का दर्शन और भी रोमांचक रहा. उन्होंने स्वयं सारे क्षेत्र का संदर्शन कराया. 
अर्जुन के साथ 

नन्हे लंगूर अर्जुन को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी जो अक्षि और तन्मय को घुड़की देने के बाद चुपके से मेरी गोद में आ बैठा था और इशारे कर करके कभी सिर, कभी पीठ, कभी बगल को खुजवाता रहा था. 

हरिद्वार पहुँचकर गंगा स्नान का पुण्य भी प्राप्त किया. हरिद्वार पहुँची तो मन प्रफुल्लित हो उठा. वहाँ तक जाकर गंगा स्नान किए बिना वापस आना कैसे संभव हो सकता है! हर की पौड़ी पहुँचकर गंगा नदी को नमन किया और जलप्रवाह में धीरे धीरे प्रवेश किया तो शीतल गंगाजल के स्पर्श से तन और मन आनंद से भर उठे. मुझे ऐसा लगा कि मानो माँ का कोमल स्पर्श है. सच कहूँ तो पहले डुबकी लगाने में डर रही थी लेकिन जब यह देखा कि छोटे-छोटे बच्चे गंगा स्नान का आनंद उठा रहे हैं तो मन के भीतर से आवाज आई कि चलो आगे बढ़ो. बस एक सांस में तीन डुबकी लगा ही दी. गंगा की वह पुलक भरी तरंग सदा सदा के लिए स्मृतियों में बस गई है. 

रुड़की पहुँचने से पहले गुरुकुल कांगड़ी गए – डॉ. सुशील कुमार त्यागी जी के घर. वहाँ से रुड़की. डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी के भतीजे आशीष जी और पंकज जी ने गर्मजोशी से अगवानी की. उनके साथ ही श्रद्धेय डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण जी के घर जाना हुआ. अरुण जी और उनकी श्रीमती जी की जिंदादिली देखकर बड़ी प्रेरणा और ऊर्जा जैसी मिलती लगी. कभी कभी सोचती हूँ कि ये लोग बड़ी बड़ी उपलब्धियों और प्रकांड विद्वत्ता के बावजूद इतने सरल, निश्छल और बालसुलभ स्वभाव वाले कैसे रह लेते हैं! वहाँ से खतौली की ओर चल पड़े. गंगा जी तो साथ साथ चल रही थीं. एक जगह पर सर ने कहा, देखो, यहाँ गंग नहर और गंगा नदी ऊपर नीचे हैं! बहुत खूब! पल भर में ही गाड़ी क्रास हो चकी थी. 

आराध्या 
पूरी यात्रा के दौरान पूर्णिमा मै’म से लीची, चाट, कुल्फी आदि की बातें होती रहीं. खतौली पहुँचने से आशीष जी और पंकज जी ने पुरकाजी में एक जगह गाड़ी रोकी और गरमागरम चाट खिलाई. खतौली पहुँचकर घर के पास ही कुल्फी की दूकान पर मलाईदार कुल्फी का आनंद लिया. अरे हाँ, इससे पहले रुड़की में भी तो एक बड़ा गिलास लस्सी का भरपूर मजा लिया था. आशीष और पंकज का सेन्स ऑफ ह्यूमर तो कमाल का है. रास्ते भर मस्ती करते हुए चले. वाह, मजा आ गया! पूर्णिमा मैडम ने परिवार के सदस्यों से परिचय कराया. आशीष जी की बेटी आराध्या ने तो मेरा मन ही मोह लिया. तस्वीरें लेने की कोशिश की तो पहले मुँह इधर-उधर करती रही बिलकुल मेरी बेटी की तरह. पर थोड़ी ही देर में पोज देना शुरू कर दिए. यही स्नेह का नाता तो हमें जीवित रखता है! 

मैंने सोचा था कि रात का खाना स्किप कर दूँ. पर मुझसे नहीं हुआ. गरमागरम रोटियाँ (शायद मिस्सी रोटी), सब्जी, अचार. स्वादिष्ट भोजन. पेट भरके खाया और आराम से सो गई. 

पूरी यात्रा के दौरान मुझे एक पल के लिए भी यह अहसास नहीं हुआ कि मैं अपने घर छोड़कर कहीं अजनबियों के बीच गई हूँ. सब अपने ही थे. आत्मीय. 

14 जून 2014 

खतौली से दिल्ली की ओर प्रस्थान. सर और आशीष जी आए मुझे बस में बिठाने के लिए. साथ में नन्ही आराध्या भी थी. हाइवे पर बस रोककर, मुझे विधिवत बिठाकर, ड्राइवर को बताकर, तसल्ली करके ही आशीष जी बस से उतारे. बस तेजी से दिल्ली की ओर जा रही थी. उस वक्त मुझे ऐसा लगा कि अपनों से कटकर कहीं दूर जा रही हूँ.

दिल्ली में अगस्टिन आ गए. एपी भवन पहुँचने से पहले रास्ते में लाल किला घूमकर देखा. भोजनोपरांत पार्लियामेंट, इंडिया गेट आदि. फिर रात की गाड़ी से हैदराबाद की वापसी.



गुरुवार, 21 नवंबर 2013

'तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ' प्रो. एन. गोपि को समर्पित


प्रो. ऋषभ देव शर्मा की सद्यःप्रकाशित समीक्षा पुस्तक 'तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ' का समर्पण वाक्य तेलुगु के शीर्षस्थ समकालीन साहित्यकार प्रो. एन. गोपि को लक्ष्य करके लिखा गया है, जो इस प्रकार है - "समकालीन भारतीय कविता के उन्नायक 'नानीलु' के प्रवर्तक परम आत्मीय अग्रज कवि प्रो. एन. गोपि को सादर"

20 नवंबर 2013 को इस पुसतक की पहली प्रति समर्पित करने जब डॉ. ऋषभ देव शर्मा रात्रि 8 बजे डॉ. एन. गोपि के घर पहुँचे तो पुस्तक का समर्पण वाक्य पढ़कर प्रो. एन. गोपि रोमांचित और गदगद हो उठे. उल्लासपूर्वक उन्होंने अपनी अर्धांगिनी प्रतिष्ठित तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा जी को आवाज लगाई और अभ्यागत लेखक को अंगवस्त्र द्वारा सम्मानित करने के लिए कहा. 

भावविभोर होकर बार बार प्रो. एन. गोपि कहते रहे - पुस्तक समर्पण और स्वीकार मेरे लिए कोई नई बात नहीं है लेकिन आपने यह पुस्तक मुझे समर्पित करके हिंदी की ओर से तेलुगु का जो सम्मान किया है उसे मैं आजीवन एक सुखद अनुभव की तरह याद रखूँगा. 

ऐसे अवसर पर प्रो. ऋषभ देव शर्मा का अवाक् रह जाना सहज ही था! 




शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिंदी दिवस पर ‘आधुनिक रामायण’

सितंबर का महीना आते ही हिंदी से जुड़े सब अध्यापक, प्राध्यापक, प्रोफेसर और हिंदी अधिकारी आदि बहुत ही व्यस्त हो जाते हैं हिंदी दिवस के कार्यक्रमों में. आज मुझे निर्णायक के रूप में ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ जाने का सुअवसर मिला. वहाँ जाने के बाद मुझे यह पता चला कि ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ के तत्वावधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में द्विदिवसीय हिंदी उत्सव – ‘उमंग 2013’ का आयोजन किया गया. इस आयोजन का उद्घाटन 12 सितंबर को हुआ था. उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद की विभा भारती उपस्थित रहीं. ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ की प्राचार्या क्षमा गोस्वामी के निर्देशन में कार्यक्रम की शुरुआत हुई. हिंदी विभाग की वरिष्ठ अध्यापक मीरा ठाकुर और अन्य साथियों के मार्गदर्शन में बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए. 

आज (13 सितंबर 2013) कार्यक्रम के दूसरे दिन अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया - हास्य-व्यंग्य नाटक, नुक्कड़ नाटक, भाषण और निबंध लेखन. हास्य-व्यंग्य और नुक्कड़ नाटक के निर्णायकगण थे विक्रम सूर्यवंशी (इंटरनेशनल स्कूल, शेक्पेट) और आयशा बेगम (इनसाइट स्कूल). प्रीति सिंह (आर्मी स्कूल, गोलकोंडा) और मैं भाषण और निबंध प्रतियोगिता के निर्णायक थे. हमारे साथ ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ की अंग्रेजी अध्यापक प्रीति भी निर्णायक के रूप में उपस्थित रही. 

भाषण प्रतियोगिता शुरू होने में समय था तो हम भी हास्य-व्यंग्य प्रतियोगिता देखने के लिए बैठ गए. सिर्फ एक ही नाटक देख पाई क्योंकि उसके बाद भाषण प्रतियोगिता शुरू. मैं उस नाटक के बारे में आप से शेयर करना चाहती हूँ. 

आर्मी स्कूल, गोलकोंडा के पांचवी सेसातवीं कक्षा के विद्यार्थियों ने हास्य-व्यंग्य नाटक ‘आधुनिक रामायण’ का मंचन किया. वनवास का दृश्य. सीता राम से पिज्जा और बर्गर की जिद कर रही थी. राम सीता को समझाने में व्यस्त थे और लक्ष्मण मोबाइल फोन में. सीता की जिद को पूरा करने के लिए राम और लक्ष्मण पिज्जा और बर्गर को दूँढ़ने के लिए जाते हैं तो रावण मोबाइल की भिक्षा मांगते हुए आ जाता है और सीता का अपहरण करके लंका ले जाता है. राम और लक्ष्मण सीता को मोबाइल सिग्नल्स के माध्यम से खोज निकालते हैं. वानर सेना के साथ राम-लक्ष्मण लंका पहुँच जाते हैं. उनके बीच युद्ध होता है. स्टेनगन के साथ युद्ध करते हैं. रावण को मारने के लिए लक्ष्मण गूगल सर्च इंजन में समाधान दूंढ़ता है – रावण को कैसे मारा जा सकता है? रावण को मार कर सीता के साथ अयोध्या वापस जाते हैं और जाते समय राम सीता को बर्गर भेंट के रूप में देते हैं. नाटक का अंत हुआ इस पंच लाइन के साथ – ‘नई टेकनोलॉजी का कमाल! जय मोबाइल!!’ 

सभी बाल कलाकरों ने बहुत आत्मविश्वास के साथ मंचन किया. वहाँ उपस्थित सभी ने खूब मजा लिया. इस नाटक ने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल किया. 

भाषण प्रतियोगिता में आठवीं से लेकर बारहवीं कक्षाओं तक के विद्यार्थियों ने भाग लिया. सभी ने आत्मविश्वास के साथ परफोर्म किया. निर्णय लेना कठिन हो गया था कि किसको प्रथम दें और किसको द्वितीय. खैर प्रतियोगिता है तो एक को ज्यादा और एक को कम अंक देना ही पड़ता है. लेकिन सभी प्रतिभागी विजेता ही हैं.

निबंध प्रतियोगिता में भी वही हुआ. तीनों निर्णायकों के अंकों को मिलाकर प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों की घोषणा हुई. 

समापन समारोह में विजेताओं को पुरस्कार दिया गया. 

आज का दिन बहुत अच्छा बीता.

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

प्रेमचंद जयन्ती पर 'दूध का दाम' पर परिचर्चा संपन्न

हैदराबाद 




यहाँ खैरताबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग में 31 जुलाई 2012 को प्रेमचन्द जयन्ती के अवसर पर अमर कथाकार प्रेमचंद की कहानी 'दूध का दाम' पर परिचर्चा आयोजित की गई. आरम्भ में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने प्रेमचंद की बहुमुखी प्रतिभा, व्यापक विश्व दृष्टि और कालजयी लोकप्रियता की चर्चा की. प्राध्यापक डॉ.मृत्युंजय सिंह ने प्रेमचंद का परिचय देते हुए उनकी कहानी 'दूध का दाम' का वाचन किया. अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी में उन्होंने कहा कि यह कहानी पाठक को भद्र समाज के दोगले आचरण के बारे में सोचने के लिए विवश करता है और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देता है. परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्राध्यापिका डॉ. जी.नीरजा ने प्रेमचंद की कथा भाषा के सामाजिक पहलू की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि इस कहानी में साफ़ साफ़ दो भाषा रूप देखे जा सकते हैं - संपन्न वर्ग की भाषा और विपन्न वर्ग की भाषा. इसी क्रम में टी.उमा दुर्गा देवी, के.अनुराधा, बिमलेश कुमार सिंह, प्रतिभा मिश्रा, नम्रता भारत, के.अमृता और टी.परवीन सुलताना ने 'दूध का दाम' में निहित स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और सामाजिक यथार्थ पर अपने विचार प्रकट किए. प्रायः सभी वक्ताओं ने जाति प्रथा और वर्ण व्यवस्था के सन्दर्भ में भारतीय समाज में व्याप्त दोगले आचरण के प्रभावी चित्रण की दृष्टि से 'दूध का दाम' को उच्च कोटी की कहानी बताया.

बाएं से - प्रतिभा मिश्रा, नम्रता भारत, बिमलेश कुमार सिंह,
मृत्युंजय सिंह, ऋषभ देव शर्मा, जी.नीरजा, टी.उमा दुर्गा देवी,
के.अनुराधा, के.अमृता, टी.परवीन सुलताना 

तुलसी भवन में प्रेमचंद जयंती : प्रेमचंद की भाषा-चेतना



उस्मानिया विश्वविद्यालय, थियेटर ऑफ आर्ट्स के अध्यक्ष प्रो.प्रदीप कुमार के संयोजन में 31/7/2012 को उस्मानिया विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस के सेमिनार हाल में तुलसी भवन के तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई. उद्घाटन और प्रथम सत्र में तो मैं उपस्थित नहीं हो पाई थी क्योंकि हमारे संस्थान में भी 'प्रेमचंद जयंती' पर परिचर्चा थी जिसमें रहना मेरा नैतिक कर्तव्य था. दूसरे सत्र में मुझे आलेख प्रस्तुत करना था इसलिए मैं उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में प्रेमचंद जयंती मनाने के बाद 12.30 बजे तक सेमिनार हाल पहुँची. तब प्रथम सत्र के अध्यक्ष उस्मानिया विश्वविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो.टी.मोहन सिंह अपना अध्यक्षीय वक्तव्य दे रहे थे. 

जैसे ही प्रथम सत्र समाप्त हुआ तुरंत दूसरा सत्र आरंभ कर दिया गया. इस सत्र के अध्यक्ष थे केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद के आचार्य प्रो.हेमराज मीणा. इस सत्र में डॉ.शीला मिश्र, डॉ.वंदना प्रदीप कुमार और डॉ.रेखा रानी के साथ मैं भी मंच पर उपस्थित थी. प्रथम वक्ता के रूप में अध्यक्ष जी ने डॉ.शीला मिश्र को बुलाया. उनका विषय था 'निर्मला में नारी चेतना'. विषय बढ़िया था जिस पर पूरे 30 मिनट के वक्तव्य में राजेन्द्र यादव और 'हंस', मैत्रेयी पुष्पा आदि की नारी विषयक मान्यताओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्रसंगात प्रेमचंद और उनके उपन्यास 'निर्मला' का भी उल्लेख किया.

डॉ.शीला मिश्र के बाद यों तो डॉ.वंदना प्रदीप कुमार को बोलना था और लिस्ट के अनुसार मेरा नाम सबसे अंत में था. पर संयोजकों के इशारों के आधार पर अध्यक्ष जी ने दूसरे वक्ता के रूप में मुझे बुलाया और कहा कि मैं अपने वक्तव्य को सीमित रखूँ. मैंने संगोष्ठी के लिए 'प्रेमचंद की भाषा-चेतना' को चुना था, परंतु जैसा आम तौर पर हुआ करता है, लंच के लिए परचे को काटना पड़ा. बस कुछ मूल बिंदुओं को सूत्र रूप में प्रस्तुत कर संतोष किया..

संगोष्ठी में पूरा आलेख प्रस्तुत नहीं किया जा सका अतः यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ.

प्रेमचंद की भाषा-चेतना

आज प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) की 132 वीं जयंती है. प्रेमचंद अपने समय के लिए जितने प्रासंगिक थे आज भी वे उतने ही प्रासंगिक हैं. अगर प्रो.दिलीप सिंह के शब्दों में कहें तो "यह तथ्य इस बात से ही प्रमाणित हो जाता है कि आज दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, बाजारीकरण, भ्रष्ट व्यवस्था, संवेदनात्मक छीजन आदि पर जब भी कहीं चर्चा होती है तो वह अंततः प्रेमचंद के ही इर्द-गिर्द आकार अपनी सार्थकता पाती है. प्रेमचंद की भाषा भी आज तक नए गद्यकारों का आदर्श बनी हुई है. यह अलग बात है कि प्रेमचंद के निकट कोई नहीं पहुँच सका." (प्रो.दिलीप सिंह, संपादकीय, प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ. 5).

मानव जीवन में भाषा की भूमिका निर्विवाद है चूंकि भाषा के अभाव में मनुष्य केवल जैविक जंतु है. भाषा ही वह चीज है जो उसे समाज-सांस्कृतिक प्राणी के रूप में परिवर्तित करती है. शायद इसीलिए प्रेमचंद ने अपने एक व्याख्यान में कहा था, "जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बनती है. भाषा सुंदरी को कोठरी में बंद करके आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं, लेकिन उसके स्वास्थ्य का मूल्य देकर. उसकी आत्मा इतनी बलवान बनाइए कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ्य दोनों की ही रक्षा कर सके. .... हमारा आदर्श तो यह होना चाहिए कि हमारी भाषा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें." (नमिता सिंह, 'प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य और भाषा के मंतव्य'; साहित्य और संवेदना, (सं) पी.वी.विजयन, पृ. 268 से उद्धृत). भाषा एक तरफ व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करती है तो दूसरी तरफ वह सामाजिक संबंधों को व्यक्त करती है. प्रेमचंद की भाषा इन दोनों कर्तव्यों को बखूबी निभाना जानती है, इसीलिए वह आज भी सर्वाधिक अनुकरणीय और प्रासंगिक कथाभाषा के रूप में स्वीकृत है.

समाज में हिंदी की तीन शैलियाँ प्रचलित हैं – उच्च हिंदी, उच्च उर्दू और हिंदुस्तानी. प्रेमचंद पहले तो उर्दू में लिखते थे, लेकिन बाद वे हिंदी – बोलचाल की हिंदुस्तानी में लिखने लगे. वे हिंदुस्तानी के प्रबल पक्षधर बने. उन्होंने यह महसूस किया था कि हिंदी का यह शैलीभेद प्रायः राजनीतिक था. उनकी भाषा-चेतना बहुत गहरी थी. इसलिए उन्होंने बार बार यह लिखा कि "बंगाल का मुसलमान बंगला बोलता है और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मद्रास का तमिल और पंजाब का पंजाबी आदि. यहाँ तक कि उसने अपने अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है. उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक-सांस्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्य प्रति के जीवन में उसे उर्दू की बिलकुल आवश्यकता नहीं पड़ती." (प्रो.दिलीप सिंह, 'प्रेमचंद की भाषाई चेतना', प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ. 23 से उद्धृत). इतना ही नहीं उनके मतानुसार हिंदुओं और मुसलमानों की भाषा में कोई अंतर नहीं है तथा हिंदुस्तानी बोलचाल की हिंदी का सहज और सरल रूप है. ध्यान से देखा जाए तो प्रेमचंद के लिए हिंदुस्तानी केवल एक भाषा-शैली ही नहीं थी, बल्कि उनके लिए तो वह जातीय अस्मिता का एक प्रतीक थी. इसलिए उन्होंने कहा था कि "बोलचाल की हिंदी और उर्दू प्रायः एक-सी हैं. उर्दू-हिंदी के सर्वनाम एक हैं – वह, तुम, मैं, हम इत्यादि. हिंदी-उर्दू की क्रियाएँ एक ही हैं – जाना, सोना, खाना, पीना, करना, मरना, जीना, लिखना, पढ़ना इत्यादि. उर्दू के संबंधवाचक शब्द – पर, का, में, से आदि वही हैं जो हिंदी के. दोनों का मूल शब्दभंडार भी एक है, लेकिन यहाँ बहुत दिनों तक फारसी के राजभाषा रहने से हिंदी शब्दों के फारसी या अरबी पर्यायवाची शब्द भी प्रचलित हो गए हैं. जैसे : देश – मुल्क, आकाश – आसमान, नदी – दरिया, रोगी – बीमार आदि. इन शब्दों का व्यवहार बोलचाल की हिंदी-उर्दू में बिना किसी भेदभाव के होता है." (वही, पृ. 25 से उद्धृत). उनकी मान्यता थी कि "बोलचाल की हिंदी समझने में न तो साधारण मुसलमानों को कोई कठिनाई होती है और न बोलचाल की उर्दू समझने में हिंदुओं को ही." (वही, पृ. 24 से उद्धृत). अभिप्राय यह कि इस दुष्प्रचार के खंडन का प्रेमचंद ने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया कि हिंदी और उर्दू दो अलग भाषाएँ हैं तथा इनका किसी धर्म-मजहब से कुछ लेना देना है.

प्रेमचंद ने अपनी बातों को सिर्फ सैद्धांतिक स्तर तक सीमित नहीं रखा बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी उन्हें लागू किया. उनकी रचनाओं में घटना और अनुभव की बहुलता है. वे अपनी रचनाप्रक्रिया में भाषा का संपूर्णतः दोहन कर लेते हैं. (रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास). इसीलिए वे कहा करते थे कि "साधारण वकीलों की तरह साहित्यकार अपने मुवक्किल की ओर से उचित-अनुचित सब तरह के दावे नहीं पेश करता, अतिरंजना से काम नहीं लेता, अपनी ओर से बातें गढ़ता नहीं. वह जानता है कि इन युक्तियों से वह समाज की अदालत पर असर नहीं डाल सकता. उस अदालत का हृदय परिवर्तन तभी संभव है, जब आप सत्य से तनिक भी विमुख न हों, नहीं तो अदालत की धारणा आपकी ओर से खराब हो जाएगी और वह आपके खिलाफ फैसला सुना देगी." (नंदकिशोर नवल, 'प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र', प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र, पृ. 13)

विद्वानों ने यह लक्षित किया है कि मृदु और ललित शब्दयोजना, गूढ़शब्दार्थहीनता और जनपद सुखबोध्यता वास्तव में काव्यभाषा के लक्षण हैं लेकिन प्रेमचंद ने अपने साहित्य को व्यापक जनता से जोड़ने के लिए जनपद की भाषा को अपनाया. जब वे यह कहते हैं कि "साहित्य न चित्रण का नाम है, न अच्छे शब्दों को चुनकर सजा देने का, न अलंकारों से वाणी को शोभायमान बना देने का" तो वे निस्संदेह बोलचाल की हिंदुस्तानी – देशजता की बात कर रहे होते हैं. प्रेमचंद अपनी जमीन से जुड़े साहित्यकार हैं. इसलिए उनकी रचनाओं में ठेठ देहाती शब्द पाए जाते हैं. उन्होंने "ग्रामीण जन की बोली-बानी में निहित ऊर्जा का दोहन करके ही अपनी कथाभाषा का गठन किया है."(प्रो.ऋषभ देव शर्मा, 'प्रेमचंद दे देसिल बयाना : संदर्भ 'गुल्ली डंडा' का", प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ.36). 

प्रेमचंद की भाषा - विशेष रूप से ग्रामीण पात्रों की भाषा - को देखने से यह स्पष्ट होता है कि "देहाती बोली और हिंदी के एकीकरण में उन्हें इतनी सफलता मिली है कि गाँव का रहने वाला पाठक भी प्रेमचंद के किसानों की बात सुनकर उसे अस्वाभाविक नहीं कह सकता. *** परंतु प्रेमचंद किसानों की बातचीत के लिए ही देहात से शब्द नहीं लेते; उनकी भाषा का गठन ही उस देहाती बोली की भूमि पर हुआ है। जो सुन्दर मुहावरे, कहावतें, उपमाएं और हास्य के पुट उनके गद्य में हमें मिलते हैं उन्हें प्रेमचंद ने अपने गाँव की बोली से सीखा था। अपनी उपमाएँ उन्होंने बहुधा ग्रामीण जीवन से ली हैं. *** प्रेमचंद की भाषा के अलंकार उसके प्रवाह में सहज ही सज जाते हैं. सारी बात अनुभव और सचाई की है. प्रेमचंद जनता को जानते थे, उसकी भाषा को जानते थे; वहीं से उन्हें शक्ति मिली है।" (डॉ.रामविलास शर्मा, प्रेमचंद, पृ.138).

'गोदान' का ही एक उदाहरण देखें – प्रेमचंद का होरी अपने विद्रोही पुत्र गोबर को समझाता है–

· "फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है. मजूरी मजूरी है, किसानी किसानी है। मजूर लाख हो, तो मजूर ही कहलाएगा। सर पर घास रखे जा रहे हो, कोई इधर से पुकारता है, ओ घासवाले, कोई उधर से। किसी की मेड पर घास धर लो तो गालियाँ मिलें. किसानी में मरजाद है।" 

होरी 'मरजाद' अर्थात मर्यादा के लिए अपने आपको समर्पित/ होम कर देता है।

'कर्मभूमि' का अमरकांत कहता है –

· काम की कौन कमी है घास भी काट लो, तो एक रुपए रोज की मजूरी हो जाए। नहीं जूते का काम है. बल्लियाँ बनाओ, चरसे बनाओ. मेहनत करने वाला आदमी भूखों नहीं मरता. धेली की मजूरी कहीं नहीं गई।"

ऐसे कथन स्वतः सिद्ध करते हैं कि प्रेमचंद की भाषा में देसी मुहावरे सहज रूप से उभरते हैं जो उसे जनभाषा बनाते हैं.

'गुल्ली-डंडा' कहानी बहुत ही छोटी है पर प्रेमचंद की भाषा के इस देशज पक्ष को उजागर करने में सक्षम है. इस कहानी में देशजता के साथ आभिजात्यता भी निहित है। इस कहानी में पग पग पर प्रेमचंद का ठेठ देसीपन झलकता है. यहाँ प्रेमचंद भारतीय खेल गुल्ली-डंडा के हवाले से यह कहते हैं – "हमारे अँग्रेजीदां दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। ..... न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया। विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैंकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता। यहाँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रूपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाएँ, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो?" खेल से लेकर शिक्षा तक का जो महंगा अंग्रेजीपन आज भी हम अपने सिर पर ढो रहे हैं प्रेमचंद ने उसके खतरे को अपने समय में भली प्रकार भांप लिया था. यदि गुल्ली-डंडा को प्रतीक मान लें तो कहना होगा कि उन्होंने इस महंगे अंग्रेजीपन का विकल्प भी यहाँ सुझाया है – गुल्ली-डंडा अर्थात देहातीपन या देसीपन के वरण के रूप में.

अंततः डॉ.रामविलास शर्मा के शब्दों में कहे तो "प्रेमचंद की कला का रहस्य एक शब्द में उनका देहातीपन ही है; ग्रामीण होने के कारण वह समाज के हृदय में पैठकर उसके सभी तारों से संबंध स्थापित कर सके हैं." (प्रो.ऋषभ देव शर्मा, 'प्रेमचंद के देसिल बयना : सन्दर्भ 'गुल्ली डंडा' का'; प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ.40 से उद्धृत).

बुधवार, 1 अगस्त 2012

विश्व चेतस हिंदी


हैदराबाद.

आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी की इस महीने की व्याख्यानमाला 30 जुलाई 2012 को संपन्न हुई. 'विश्व चेतस हिंदी' पर केंद्रित इस व्याख्यानमाला के  मुख्य वक्ता थे प्रो.रमेशचंद्र शाह. अध्यक्ष थे हैदराबाद विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.रवि रंजन. आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद के निदेशक श्री सी.एस.एन.शर्मा भी मंच पर उपस्थित थे. इस व्याख्यानमाला के  संयोजक थे प्रो.एम.वेंकटेश्वर. कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा हॉल भरा हुआ था. हैदराबाद शहर के जाने माने विद्वान, साहित्यकार, कवि, हास्य-व्यंग्य लेखक, अध्यापक, शोधार्थी आदि उपस्थित थे.  हॉल  को भरा हुआ देखकर मन प्रफुल्लित हुआ.

प्रो.रमेशचंद्र शाह ने अपने व्याख्यान में कहा कि 'हिंदी भारत के हृदय की कुंजी है. हिंदी सदा से आधुनिक रही है. वह सदा ही आगे देखने वाली भाषा है. युग की आवश्यकता की पुकार है. भाव बोध अग्रगामिता का संस्कार सदा ही हिंदी के साथ रहा है. समग्र आंचलिक बोलियां हिंदी के पास हैं. हिंदी में सेंट्रीफ्यूगल टेंडेंसी – केन्द्रापसारी प्रवृत्ति निहित है. हिंदी कभी किसी के संरक्षण की मोहताज नहीं रही. वह तो स्वतः ही आगे बढ़ती रही और आज भी बढ़ रही है. मध्य युग की 'भाखा' ने समस्त सांस्कृतिक तत्वों को एकजुट किया था. आज आधुनिक भाषा के सामने सांप्रदायिक ताकतों की चुनौती उपस्थित है जो भयंकर है. इस आतंक ने हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर को, शिक्षा व्यवस्था को तोड़ने का प्रयत्न किया है.

रमेशचंद्र शाह 
आज के परिप्रेक्ष्य में हिंदी ने सपाट भाषा के पक्ष में अपने आपको सरंडर किया है. हिंदी का हाजमा बहुत अच्छा है. देश की संजीवनी को इक्कट्ठा करने का काम हिंदी से ही संभव होगा. हिंदी का इतिहास खड़ीबोली हिंदी का नहीं है. यदि हिंदी के कवियों को हिंदी के मर्मस्थल तक पहुंचना है तो उन्हें पहले उसकी कालगति और स्वधर्म को पहचानना होगा. भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग हिंदी और अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा का प्रयोग कर रहा है. भारतीय बुद्धीजीवी शैडो माइंडेड है. आज इनके अस्पष्ट और भ्रामक विचारों के कारण हमारी व्यवस्था दलदल में फंसी हुई है. हम अपने ही नेटिव माइंड – देसी मन को पाताल में धकेल रहे हैं.'

प्रो.रवि रंजन ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि 'हैदराबाद की अपनी एक निजी संस्कृति है – सर्वसमावेशी संस्कृति. मिली-जुली संस्कृति. हैदराबाद में हिन्दुस्तानी कल्चर को देखा जा सकता है.' उन्होंने यह चिंता जाहिर की हम लोग ही अपने देसीपन को छोड़कर विदेसीपन के पीछे भाग रहें हैं. फैशन के नाम पर हिंदी में इतने सारे अंग्रेज़ी शब्दों को घुसेड़ रहें है कि एक अजीब भाषा उससे पैदा हो रही है. हिंदी का पाठक वर्ग – शिक्षित मध्यवर्ग जैसे ही शिक्षित होता है वह अंग्रेजीदां बन जाता है. संस्कृति के क्षेत्र में नकलीपन मेटाबोलिज्म को खराब कर देगा. इसलिए स्वाभाविक हिंदी बोलना, पढ़ना और लिखना चाहिए.'


गुरुवार, 26 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का अंतिम दिन

25/07/2012 की सुर्खियाँ


· पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का समापन समारोह संपन्न

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का अंतिम दिन.

आज पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का अंतिम दिन था. 21 दिनों के पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का समापन समारोह आज अकादमिक स्टाफ कॉलेज, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ. अच्छा रहता अगर समापन समारोह में हिंदी और अंग्रेजी प्रतिभागी दोनों मिलकर एक साथ बैठते - पहले दिन की तरह.. पर हिंदी और अंग्रेजी पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का समापन समारोह अलग अलग मनाया गया. सुनने में आया कि अकादमिक स्टाफ कॉलेज, मानू के पांच साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है.

इस समारोह में अकादमिक स्टाफ कॉलेज के निदेशक (डॉ.पी.एफ.रहमान), सहायक निदेशक (इमतियाज) और हिंदी विभागाध्यक्ष (प्रो.टी.वी.कट्टीमनी) जी भी उपस्थित रहते, अधिक गरिमा पूर्ण लगता. लेकिन अकादमिक स्टाफ कॉलेज, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के एसोसिएट डायरेक्टर (डॉ.तहसीन बिलग्रामी), अतिथि श्री सुरेन्द्र वर्मा और समन्वयक डॉ.करन सिंह ऊटवाल ने उनकी कमी महसूस नहीं होने दी.

बुधवार, 25 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का पंद्रहवां दिन

24/07/2012 की सुर्खियाँ

· 'नाटक साहित्य और उसका फिल्मांकन' पर श्री सुरेंद्र वर्मा का व्याख्यान 

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का पंद्रहवां दिन.


श्री सुरेंद्र वर्मा के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक' के प्रसिद्ध नाटककार सुरेंद्र वर्मा ने कहा कि नाटक एक तरह से आइसबर्ग के समान है. ऊपर से देखने के लिए तो वह सतही लगता है लेकिन अंदर से वह गहरा है. नाटककार और फिल्म निर्देशक के बीच हमेशा अहं टकराता रहता है. कभी भी निर्देशक यह नहीं चाहता कि रिहार्सल के वक्त मूल लेखक मौजूद हो. जिस तरह से नाटककार नाटक का सृजन करते हैं ठीक उसी प्रकार फिल्म बनाना कठिन अवश्य है लेकिन नामुमकिन नहीं है. 

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का चौदहवाँ दिन

23/07/2012 की सुर्खियाँ

· प्रसिद्ध उपन्यास 'मुझे चाँद चाहिए' के लेखक श्री सुरेंद्र वर्मा का नगर आगमन

· 'साहित्य : फ़िल्में' पर श्री सुरेंद्र वर्मा का व्याख्यान 

· 'विज्ञापन और एस एम एस की भाषा' पर मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. तेजस्वी वेंकप्पा कट्टीमनी का व्याख्यान 

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का चौदहवाँ दिन.


श्री सुरेंद्र वर्मा के व्याख्यान का सार संक्षेप 


'साहित्य : फिल्में' पर व्याख्यान देते हुए श्री सुरेंद्र वर्मा ने कहा कि किसी भी साहित्यकार की जिंदगी में बार बार एक शब्द आता है, वह है इंटरप्रेटेशन. समय के साथ साथ तकनीक में भी बदलाव आ रहा है और साथ ही मानवीय संवेदनाएं भी बदल रही हैं. साहित्य के आधार पर जब फिल्मों का निर्माण होता है तब मूल लेखक को निर्देशक के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि फिल्म में नाटकीयता बनाए रखने के लिए निर्देशक कुछ सीन्स को जोड़ भी सकता और जरूरत पड़े तो कुछ को छोड़ सकता है. यह कोई जरूरी नहीं कि उपन्यास, कहानी या नाटक में जो कुछ भी लिखा हो उसे हू-ब-हू फिल्म में दिखा जाए. लेखकों के सिलसिले में फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत बहुत प्रचलित है – 'Take Money and run away, never turn back.'

सुरेंद्र वर्मा ने यह बताया कि उन्हें उपन्यास या नाटक लिखने के बजाए फिल्म स्क्रिप्ट लिखना बेहद पसंद है. उन्होंने कहा कि पहले वे वेश्या समस्या पर आधारित - विशेष रूप से पुरुष जब इस वृत्ति को अपनाते हैं तो उनकी मनःस्थिति और मानसिकता क्या होगी पर - फिल्म स्क्रिप्ट लिखने बैठे थे. लेकिन दो-तीन सीन्स लिखने के बाद उन्हें यह लगा कि इस तरह की फिल्म को दर्शक नहीं स्वीकारेंगे तो उन्होंने 'दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता' शीर्षक से उपन्यास का सृजन किया जिसे पढ़कर काफी लोगों ने उनसे यह कहा - इतना घटिया उपन्यास आपने कैसे लिखा. 

सुरेंद्र वर्मा ने 'Mr & Mrs Mathur – Gender Bender Comedy (Surendra Varma, FRA Registration No. 138041 dated 24/4/08) की पटकथा दिखाकर प्रतिभागियों को यह समझाया कि फिल्म स्क्रिप्ट मॉन्ताज (छोटे छोटे हिस्से) में लिखी जाती है. 


प्रो.टी.वी.कट्टीमनी के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'विज्ञापन और एस एम एस की भाषा' पर व्याख्यान देते हुए मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.टी.वी.कट्टीमनी ने कहा कि विज्ञापन हमेशा अनुवाद को साथ लेकर चलता है. विज्ञापन एक कमर्शियल कंसेप्ट है. माल – कमाल – मालामाल, यही विज्ञापन दुनिया की नीति है. उत्पादक अपने माल को कमाल (आकर्षक विज्ञापनों) के साथ बेचकर मालामाल होना चाहते हैं. इसलिए इसमें प्रयुक्त भाषा हमेशा लचीली और आकर्षक होती है तथा साथ ही नवीन भी. ताजगी विज्ञापनों के लिए अनिवार्य तत्व है. उन्होंने यह भी कहा कि आजकल विज्ञापनों के कारण हर एक की मानसिकता बदल रही है. विज्ञापन ने उपभोक्ता को मुट्ठी में कर लिया है तो एस एम एस ने पूरी दुनिया को मुट्ठी में कर लिया है. 

सोमवार, 23 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का तेरहवाँ दिन

20/07/2012 की सुर्खियाँ


· 'हिंदी कवियों के सिने गीत : वस्तु और शिल्प' पर हैदराबाद के गीतकार डॉ.डी.के.गोयल का व्याख्यान 

· 'सृजनात्मक नाटक' पर श्री डी.श्रीनिवास का व्याख्यान 

· नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक श्री विकास नारायण राय का व्याख्यान 

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का तेरहवाँ दिन.

डॉ.डी.के.गोयल के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'हिंदी कवियों के सिने गीत : वस्तु और शिल्प' पर व्याख्यान देते हुए डॉ.डी.के.गोयल ने कहा कि 'दिल के दर्द से, दिमाग की गर्द से/ आहे सर्द से बनता है गीत./ भावना की चाल से, वर्तमान के हाल से/ शब्दों के जाल में फँसता है गीत./ बिंबों की साया ले, प्रतीकों की माया ले/ अलंकारों की काया में सजता है गीत/ नए नए छंदों में, गोरख धंधों में/ अकविता के फंदों में, कसता है गीत.' 

हिंदी सिनेमा लगभग गीति नाट्य का ही एक विकसित रूप है. हिंदी सिने गीतकार प्रमुख रूप से तीन प्रकार के हैं – (1) मूलतः हिंदी कवि, (2) मूलतः हिंदी गीतकार और (3) उर्दू शायर. सिने गीत भी साहित्य का ही हिस्सा है. ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि सिने गीतों में तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों की बहुलता है. सिचुएशन के अनुरूप गीत लिखे जाते हैं. कुछ गीतों में ध्वन्यात्मक शब्दों का भी प्रयोग होता है. आजकल तो सिने गीतों के लिए कोई शब्द निरर्थक नहीं हैं. इन गीतों में बिंब और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग पाया जाता है. काम, प्रेम, विवाह, सौंदर्य, विरह, संयोग, वियोग, दुःख, सुख, संदेह, ईर्ष्या, द्वेष, प्रथम दर्शन, राजनीति, प्रकृति, मानवीय संबंध, माँ, जुआ, शराब, होली, दीवाली, सामाजिक चेतना, देश प्रेम आदि पर गीत हैं. एकल गीत, युगल गीत, समूह गीत, लोरी, पार्श्व गीत, संयुगल गीत, प्रश्नोत्तर शैली में गीत, फेरीवालों की शैली में गीत, वार्ता शैली में गीत, शीर्षक गीत, मुहावरों की शैली में गीत, लोकगीत, दार्शनिक गीत आदि अनेक प्रकार की शैलियों में सिने गीत लिखे जाते हैं.'

डॉ.डी.के.गोयल ने व्यावहारिक स्तर पर पूरी क्लास को तेलुगु सिनेमा 'श्री रामदास' का प्रसिद्ध गीत 'अंता रामा मैयम, जगमंता रामा मैयम...' सुनाकर सबसे यह कहा कि उसके आधार पर नया गीत लिखें. 


श्री डी.श्रीनिवास के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'सृजनात्मक नाटक' पर व्याख्यान देते हुए 'जनपदम' के निर्देशक श्री श्रीनिवास देंचनाला ने कहा कि सृजनात्मक नाटक के लिए स्पेस, अभिनेता और दर्शक प्रमुख अंग है. इनके बिना नाटक का मंचन असंभव है.' मास्टर जी ने तो क्लास रूम को ही थियेटर में बदल दिया! उन्होंने प्रतिभागियों के तीन समूह बनाकर कहा कि पांच मिनट के समय में खुद एक थीम बनाकर नाटक प्रदर्शन करें जिसका अंत ट्रैजिक हो. समूह एक ने मध्यवर्गीय परिवार की समस्या को दर्शाया तो समूह दो ने अस्पतालों में गरीब मरीजों की समस्या को. समूह तीन ने पुलिस व्यवस्था को दर्शाया. सब प्रतिभागी पहले तो अपने आप में यह सोच रहे थे कि यह क्या हो रहा है और आपस में इशारों से बतिया रहे थे. कुछ लोग नाराज भी हो गए. पर अंत में सब प्रतिभागी खुश थे क्योंकि सबको मौक़ा मिला है अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने के लिए. 


श्री विकास नारायण राय के व्याख्यान का सार संक्षेप 

हैदराबाद नेशनल अकादमी के निदेशक डी जी पी श्री विकास नारायण राय ने प्रतिभागियों से यह कहा कि साहित्य से दोस्ती करना अनिवार्य है चूंकि वह हर एक के जीवन का हिस्सा है. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि नाटक लिखना और मंच पर उसे प्रदर्शित करना आसान नहीं है. इस संबंध में उन्होंने 2007 में हरियाणा पुलिस अकादमी के लिए उनके द्वारा रचित '1857 : India's War Of Independence' शीर्षक नाटक के उदाहरण द्वारा ध्वनि एवं प्रकाश के माध्यम से गीतसंगीतमय नाटक की प्रक्रिया को समझाया और अपने अनुभवों को बांटा . 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का बारहवाँ दिन


19/07/2012 की सुर्खियाँ

· 'संश्लेषण का रंगमंच और कहानी का मंचन' पर दिल्ली आर्ट्स कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर प्रो.महेश आनंद का व्याख्यान 

· 'सृजनात्मक नाटक' पर 'रंगधारा' के निर्देशक प्रो.भास्कर शेवालकर का व्याख्यान 

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का बारहवाँ दिन.

प्रो.महेश आनंद के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'कलाएँ हमारे जीवन और संस्कृति का अहम हिस्सा है. विभिन्न कलाएँ एक-दूसरे से संबद्ध हैं. कहानी के रंगमंच ने कई कल्पनाशील निर्देशकों के कारण अपनी एक पहचान बनाई है. एक पाठक जब कहानी को पढ़ता है या सुनता है, वह उसी समय कहानी के पाठ के समानांतर कहानी को दृश्य के रूप में देखता है. अभिनेता के रूप में मंच पर एक दूसरा लेखक प्रस्तुत हो जाता है. सादगी भरी परिकल्पना वस्तुतः कहानी मंचन की विशेषता है. मंचन करते समय संवादों को पेश करना आसान है लेकिन वर्णन के दृश्यों को पेश करना कठिन है. इसलिए नाट्यरूपांतरण में वर्णन को छोड़ दिया जाता है लेकिन कहानी के रंगमंच में वर्णन को नेरेटर नेरेट करता है. कहानी में निहित व्यंग्यार्थ को मंचित करना चुनौती का कार्य है.'

प्रो.भास्कर शेवालकर के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'सृजनात्मक नाटक' पर व्याख्यान देते हुए 'रंगधारा' के निर्देशक प्रो.भास्कर शेवालकर ने कहा कि 'नाटक महज मनोरंजन के लिए नहीं होता है. वह संप्रेषण का सशक्त माध्यम है तथा सभी कलाओं का सम्मिश्रण. सृजनात्मक नाटक (Creative Drama) पारंपरिक नाटक (Formal Drama) से भिन्न है. सृजनात्मक नाटक के लिए न ही किसी तरह के विशेष मंच की जरूरत है और न ही विशेष वेश-भूषा और मेकअप की और न ही बना बनाया स्क्रिप्ट की. इसके लिए सृजनात्मक व्यक्ति की जरूरत है. एक ऐसा व्यक्ति जो बच्चों की भीतरी प्रतिभा को सामने ला सके.' (Creative drama is especially good for children who are creative but do not get an opportunity to express themselves. Children often like to perform. They will have much more understanding power, self-confidence, better control on their bodies, clear dialogue utterance, grasping power. We can say that Creative Drama is the preparation for Formal Drama and those who are trained in this will bring the Formal Drama to the same imaginative level. By the Creative Drama both the action and the dialogue are improvised.)

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का ग्यारहवाँ दिन


18/07/2012 की सुर्खियाँ

  •  'साहित्य और मीडिया' पर हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.रवि रंजन का व्याख्यान 
  •  'हैदराबाद में हिंदी नाटकों की स्थिति' पर मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ.करनसिंह ऊटवाल का व्याख्यान 
पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का ग्यारहवाँ दिन.

प्रो.रवि रंजन के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'साहित्य और मीडिया' पर व्याख्यान देते हुए हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.रवि रंजन ने कहा कि 'मीडिया के क्षेत्र में बहुत तेजी से क्रांति आई है. मीडिया के प्रसार के कारण ज्ञान सूचनात्मक हो गया है. यह सूचना अंतिम सत्य नहीं है. सूचना क्रांति के कारण हाशिए के लोग केंद्र में आ गए हैं. आज मनुष्य को मीडिया नचा रहा है. मीडिया के कारण झूठ का मानकीकरण हो रहा है. इसके परिणामस्वरूप पीत पत्रकारिता आगे बढ़ रही है. आज मीडिया ने रीडिंग हैबिट को कैप्चर कर लिया है. 

विज्ञापनों से मीडिया का वर्ग चरित्र पता चलता है. आवारा पूँजी मीडिया को प्रभावित कर रही है जिसके परिणामस्वरूप लोकहितकारी नीतियों के खिलाफ एक वातावरण तैयार हो रहा है. इसीलिए नामवर सिंह ने अपनी एक कविता में यूं कहा है – 'क्षमा मत करो वत्स, आ गया दिन ही ऐसा/ आँख खोलती कलियाँ भी कहती हैं पैसा.' मीडिया के कारण हमारी जीवन शैली बदल रही है. सपने भी बदल रहे हैं. यथार्थ में भी बहुत तेजी से बदलाव आया है. यथार्थ क्या है ! यथार्थ वह वस्तु सत्ता है जिसका अस्तित्व हमारी चेतना के बाहर है पर वह हमारी चेतना को प्रभावित करता है. आज मीडिया के कारण यथार्थ के बारे में हमारी धारणा भी बदल रही है. 

आज का समय अपने आप में आभासी समय है. पहले चीजें बन रहीं हैं और उन चीजों के अनुरूप एक उपभोक्ता वर्ग तैयार हो रहा है. इसी तरह कुछ ऐसे साहित्य भी हमारे सामने आ रहे हैं जो अपना पाठक वर्ग खुद तैयार कर रहे हैं. यदि हम किसी उपन्यास या नाटक या कहानी को पढ़ते हैं तो हमारी कल्पनाशक्ति जागृत होती है. पर यदि हम उसी को परदे पर देखते हैं तो हम वही देखते हैं जो हमारे सामने दिखाया जा रहा है. कहने का आशय यह है कि मीडिया ने हमारे परसेप्शन (ग्रहणबोध) को डिजिटलाइज्ड बना दिया है. इसके फलस्वरूप हमारे सामने एक आभासी दुनिया है – 'तांबे का आसमान, टिन के सितारे, गैसीले अंधकार, उड़ते हैं कस्कुट के पंछी बेचारे.'

भले ही मीडिया एक इंद्रजाल फैला रहा है यह शाश्वत नहीं है. विलियम रेमंड्स ने भी कहा है कि 'Media is mind manipulator.' पर साहित्य चिरस्थाई है.'


डॉ.करनसिंह ऊटवाल के व्याख्यान का सार संक्षेप 

'हैदराबाद में हिंदी नाटकों की स्थिति' पर व्याख्यान देते हुए मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ.करनसिंह ऊटवाल ने कहा कि आज भी हैदराबाद में नाटक खेले जा रहे हैं और देखे भी जा रहे हैं. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि 'कहानी का रंगमंच' तथा 'कहानी का नाट्यरूपांतरण' दोनों अलग अलग हैं. कहानी के रंगमंच में किसी कहानी को हू-ब-हू मंच पर प्रस्तुत किया जाता है. जहां कहानी में वर्णन होता है उसे बैकग्राउंड में नेरेट किया जाता है. कहानी के नाट्यरूपांतरण में रंगमंच के अनुकूल कहानी को ढाला जाता है. 

डॉ.करनसिंह ऊटवाल ने हैदराबाद में स्थित कुछ नाट्य संस्थाओं और उनके द्वारा प्रदर्शित नाटकों के बारे में सूचनात्मक जानकारी प्रस्तुत की जो इस प्रकार है –

हैदराबाद की कुछ नाटक संस्थाएं –

· आवर्तन (सत्यब्रत रावत)

· सूत्रधार (विनय वर्मा)

· रंगधारा (भास्कर शेवालकर)

· सिफ़र (फिरोज़)

· उड़ान (सौरभ धारी पूरीकर )

· समाहारा (रत्नशेखर)

· कलाश्रोत (चंद्रकांत खानापुरकर)

· प्रदीप कुमार थियेटर अकादमी (प्रदीप कुमार)

· स्टार आर्ट अकादमी (महबूब)

· न्यू थियेटर (खादर अली बैग)

· खादर अली बैग थियेटर फाउण्डेशन (महमद अली बैग)


· 1952 में फाइन आर्ट्स अकादमी की स्थापना हुई.

· 1971 में भास्कर शिवालकर की संस्था 'रंगधारा' की स्थापना हुई.

· 1975 में देवेंद्र राज अंकुर ने निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (डेढ़ इंच ऊपर, धूप का दुःख और वीकेंड) का मंचन किया.

बुधवार, 18 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का दसवाँ दिन


17/07/2012 की सुर्खियाँ

· 'प्रदर्शन कलाएँ और कला का मंचन' पर आर्ट्स कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो.महेश आनंद का व्याख्यान 

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का दसवाँ दिन.

डॉ.महेश आनंद के व्याख्यान का सार संक्षेप 


'प्रदर्शन कलाएँ और कला का मंचन' पर व्याख्यान देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय, आर्ट्स कॉलेज के प्रोफेसर प्रो.महेश आनंद ने कहा कि 'भारत के हर प्रदेश में उत्सवधर्मिता है. हिंदुस्तान की परंपराओं में जिस तरह सम्मिश्रण प्राप्त होता है उसी तरह नाटक में भी कलाओं का सम्मिश्रण पाया जाता है. कूडीयाट्टम (केरल), करागाट्टम (तमिलनाडु), हरिकथा (आंध्र प्रदेश), स्वांग, रासलीला (उत्तरप्रदेश), पंडवानी (छत्तीसगढ़), ख्याल (राजस्थान), तमाशा, नुक्कड़ नाटक आदि अनेक लोक कलाएँ भारत में देखी जा सकती हैं. ये सभी पारंपरिक शैलियाँ हैं. 

कूडीयाट्टम केरल का नाट्य रूप है. यह संस्कृत नाटकों का पुराना रूप है. यदि संस्कृत नाटकों को समझना है तो इसे अवश्य देखना होगा. यह मंदिर कला है. इस कला को केरल के चाक्यार और नंपियार समुदाय के लोग प्रस्तुत करते हैं. 

प्रमुख रूप से ये कलाएँ भारत की मंदिर कलाएँ हैं. मंदिर के मंडपों में हमें लोक कलाओं और नृत्यों से संबंधित प्रतिमाएं, मुद्राएं प्राप्त होंगी. मदुरै मीनाक्षी मंदिर में सहस्र स्तंभ मंडप है. चिदंबरम नटराज मंदिर में नटराज की 108 भंगिमाएं अंकित हैं. वरंगल में सहस्र स्तंभ का मंदिर है. एल्लोरा, अजंता, कोणार्क आदि को भी देख सकते हैं. इन मंदिरों में हमारी प्राचीन कला और संस्कृति को देखा जा सकता है. इन्हीं से हमारी लोक कालाएँ उद्भूत हैं. परंपरा के साथ साथ हमें आज की आधुनिक तकनीकों को भी नाटक और लोक कलाओं में प्रयोग करना चाहिए. हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है.'

बाएँ से - स्नेहलता शर्मा, जी,नीरजा, महेश आनंद और करनसिंह ऊटवाल 

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का नवां दिन




16/07/2012 की सुर्खियाँ 

·        आर्ट्स कॉलेजदिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ.महेश आनद का नगर आगमन 
·        ‘नाटक देखने और पढ़ने की दर्शनीयता’ पर प्रो.महेश आनंद का व्याख्यान
·       ‘हिंदी – तेलुगु नाटक और रंगमंच’ पर उस्मानिया विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो.माणिक्याम्बा का व्याख्यान

पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का नवां दिन.
यह कार्यक्रम 5 जुलाई को शुरू हुआ था. अतः 16 जुलाई 2012 पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का बारहवां दिन है. रविवार (8 जुलाई15 जुलाई) और द्वितीय शनिवार (14 जुलाई) की छुट्टियों को छोड़ दें तो 16 जुलाई नवां दिन हैं.

डॉ.महेश आनंद के व्याख्यान का सार संक्षेप 

नाटक को देखने और पढ़ने की दर्शीयता’ पर व्याख्यान देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालयआर्ट्स कॉलेज के प्रोफेसर प्रो.महेश आनंद ने कहा कि नाटक महज साहित्य या संवेदात्मक कथा नहीं है बल्कि वह एक तरह से सामाजिक घटना है क्योंकि वह मानवीय कार्य को बखूबी पकड़ता है. वह ज़िंदगी के अनकहेअनछुए पक्षों को उद्घाटित करता है. वस्तुतः नाटक एक सामूहिक कला है चूंकि इसमें अनेक कलाओं का सम्मिश्रण है. प्रकाशध्वनिसंगीतनृत्यस्क्रिप्टसाज-सज्जाआहार्य आदि अनेकानेक डिसिप्लिन्स  का सम्मिश्रण है.

आज ऐसे कई कल्पनाशील निर्देशक हैं जो नित नए प्रयोगों द्वारा नाटक के अलावा अन्य विधाओं से रंगमंच को जोड़कर उसके फलक को विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं. समकालीन नाटकों में तकनीकी प्रयोग तो हो रहा है लेकिन तकनीकी चमत्कार से अलग अभिनेता को केंद्र में लाते हुए रंगमंच को एक नया आयाम और अर्थ दिया जा रहा है.

नाटक एक ऐसा जीवंत माध्यम है जो जीवंत व्यक्तियों के लिए जीवंत व्यक्तियों द्वारा खेला जाता है. नाटक का जन्म दो बार होता है – पहली बार तब  जब निर्देशक या नाटककार उसे लिखता है तथा दूसरी बार तब  जब अभिनेता उसका मंच पर दर्शकों के समक्ष अभिनय करता है. वस्तुतः निर्देशक/ नाटककारअभिनेता और दर्शक थियेटर के मुख्य अंग हैं तथा अन्य सदस्य जो प्रकाशध्वनिसाज-सज्जाआहार्य आदि चीजों का ध्यान रखते हैं वे गौण अंग हैं.

परंपरागत लोकनाट्य के प्रचलित नाट्य रूपों के साथ साथ किस्सागोई की परंपरा भी रही है. समकालीन नाटकों में रगमंच ने किस्सागोई के इन रूपों से अलग अपना एक स्वतंत्र रूप बना लिया है. नाटक में वस्तुतः प्रदर्शन प्रमुख है. नाटक के क्षेत्र में सिर्फ सैद्धांतिकी से काम नहीं चलेगा. यहाँ व्यावहारिकता पर अधिक बल दिया जाता है. अभ्यास बहुत महत्वपूर्ण है. एक नाटककार/ निर्देशक अपने अर्थ को अभिनेता के माध्यम से दर्शक तक पहुंचाना चाहता है. इसके लिए वह ऐसे शब्दों का चयन करता है जिनसे दर्शक प्रभावित हो सकें. नाटक प्रस्तुति के बिना अधूरा है. उसका मुख्य प्रयोक्ता अभिनेता है. यही अभिनेता अपने हाव-भावों के माध्यम से दर्शक तक बात पहुंचाता है. शब्दों को आकार देने का काम अभिनेता करता है. एक तरह से कहा जाए तो अभिनेता संपूर्ण स्क्रिप्ट को कंट्रोल करता है. (Actor controls the whole script and displays it. For this an aesthetic sense is required so that he can communicate maintaining an equilibrium.). अभिनेता को थियेटर स्पेस प्रदान करता है अपने टैलेंट को प्रदर्शित करने के लिए.       

नाटक में वर्णन नहीं होता है. शब्द बोलते हैं अभिनेता के हर अंग के साथ. अभिनेता समूह को संबोधित करता है. अतः यह कहा जा सकता है कि प्रदर्शनीयता  नाटक का प्रमुख गुण है.

डॉ.माणिक्याम्बा के व्याख्यान का सार संक्षेप

हिंदी - तेलुगु नाटक और रंगमंच’ पर प्रकाश डालते हुए उस्मानिया विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो.माणिक्याम्बा ने कहा कि नाटककार जीवन के शाश्वत बिंदुओं को  छू लेता है. उन्होंने प्रमुख रूप से नवजागरणकालीन तेलुगु नाटकों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन दिनों नाटककारों ने समाज सुधार के लिए ही नाटकों का सृजन किया. वीरेशलिंगम पंतुलुगुरजाडा अप्पारावचिलकमरतीरघुपति वेंकटरमण नाइडू आदि नाटककारों ने सफल नाटकों का सृजन करके तत्कालीन समाज में व्याप्त वेश्या समस्याबाल विवाहविधवा समस्यासती प्रथाअनमेल विवाह आदि का यथार्थ चित्रण किया है.

प्रो.माणिक्याम्बा ने यह कहा कि आजकल विशेष रूप से हैदराबाद में नाटक देखने को नहीं मिल रहें हैं क्योंकि यहाँ नाटक कंपनियां ही नहीं हैं. उनकी बात एक सीमा तक सही  हो सकती है परन्तु इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता की इन दिनों हैदराबाद में कई नाट्य संस्थाएं सक्रिय हैं.        

शनिवार, 14 जुलाई 2012

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते .....

भारत महान परंपराओं वाला देश है. इसकी अनेक महान परंपराओं में से एक परंपरा यह भी है कि यहाँ ईश्वर की कल्पना पुरुष के साथ साथ स्त्री रूप में भी की गई है तथा यह माना गया है कि जहाँ स्त्रियों की पूजा की जाती है वहाँ देवता निवास करते हैं. “विश्व में संभवतः भारत एकमात्र ऐसा देश है और भारतीय संस्कृति एकमात्र ऐसी संस्कृति है जहाँ स्त्री को ‘देवी’ कहा जाता है, उसके नाम के साथ ‘देवी’ जोड़ा जाता है, जहाँ विद्या, संपदा, शक्ति की अधिष्ठाता शक्तियों को सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा – यों स्त्रीरूप में दर्शाया जाता है. यूनानी, रोमन सभ्यताओं में भी विशिष्ट कार्यों, व्यवसायों के विशिष्ट देवी-देवता हैं लेकिन उनकी इतने पूज्य-भाव से घर-घर में और सार्वजनिक तौर पर और इतने सुदीर्घ काल से पूजा नहीं होती है. भारत में ‘माँ’ का स्थान अत्यंत पूज्य और आदरणीय है, पत्नी अपने पति की ‘अर्धांगिनी’ है लेकिन सदियों के भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक इतिहास से स्त्री ‘विलुप्त’ है, निम्नतम सोपान पर है. जन्मपूर्व सामाजिक, व्यक्तिगत आकांक्षाओं से लेकर देहांत के बाद भी पराधीन है.”(डॉ.राजम पिल्लै, महाराष्ट्र की संत कवयित्रियाँ, पृ. 3) 

आचरण के स्तर पर देवी स्वरूपा स्त्री के साथ पशु से भी बदतर  व्यवहार के उदाहरण हमारे समाज में रोज ही मिलते रहते हैं. ऐसा लगता है जैसे सब ओर देवताओं के स्थान पर दानव रमण करने लगे हैं. प्रमाणस्वरूप गत दिनों गुवाहाटी में घटित कुकृत्य का उल्लेख किया जा सकता है. “एक नाबालिग लड़की पर टूट पड़े वहशी दरिंदों की करतूत को कैमरे में कैद करने की हिम्मत दिखाने वाले मीडियाकर्मी दीप्य बोरदोलोई से जब सोमवार की इस आंखों देखी घटना के बारे में पूछा गया तो उनके पहले लफ्ज थे,'यह छेड़छाड़ नहीं सामूहिक दुष्कर्म जैसा वाकया था।' गुवाहाटी में एक स्थानीय चैनल न्यूजलाइव के रिपोर्टर दीप्य ने दावा किया कि उन्होंने लड़की को छोड़ने की कई बार गुहार लगाई, लेकिन उन उन्मादी युवकों ने एक न सुनी। उन दुस्साहसी युवकों की भीड़ बढ़ती गई। युवकों के उग्र तेवरों को देख दीप्य ने कैमरामैन से इन शर्मसार करने वाली तस्वीरों को कैद करने का इशारा किया। सोमवार रात को शहर के भीड़ भरे इलाके में फर्राटा भरती गाड़ियों के बीच यह सबकुछ हो रहा था। पीड़िता चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन कोई उसके बचाव में आगे नहीं आया। कुछ राहगीर तमाशबीन बनकर देखते रहे, मगर किसी ने नशे में धुत उन युवकों को रोकने की कोशिश नहीं की। आरोपियों ने लड़की का चेहरा कैमरे की ओर करने की कोशिश भी की, जैसे वह कोई बहादुरी का काम कर रहे हों। घटनास्थल से एक किमी दूर पुलिस स्टेशन होने के बावजूद पुलिसकर्मी 40 मिनट बाद वहां पहुंचे। असंवेदनशीलता में डूबी पुलिस इंटरनेट पर वीडियो देखकर भड़के लोगों के गुस्से के बाद ही नींद से जागी।“ (जागरण, 14 जुलाई, 2012). 

कहना न होगा कि इस प्रकार की घटनाएँ इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटनाएँ हैं. इनसे हमारा यह महान देश भी कलंकित होता है. ऐसी हालत में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का विचलित हो उठना स्वाभाविक है. लेकिन यह और भी चिंताजनक है कि जिन्हें विचलित होना चाहिए वे ज़रा भी विचलित दिखाई नहीं देते. शायद इसी से दुखी और हताश होकर ‘फेसबुक’ पर डॉ.कविता वाचक्नवी ने यह लिखा कि “पुरुषरहित होना ही इस (दुनिया) का अपराधरहित होना है क्योंकि संसार के सारे अपराध (क्राइम) पुरुष ही से शुरू होते और उसी पर अंत होते हैं या उसी के इर्दगिर्द के कारणों ही से उपजते हैं।”  यह कथन हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि क्या हमारा पुरुष समाज अभी तक सभ्य नहीं हुआ है और उसे इतना सभ्य होने में और कितने युग लगेंगे कि इस धरती पर स्त्रियाँ अपने आपको पुरुषों के होते हुए भी  सुरक्षित महसूस कर सकें. 

सारांश यह है कि जब तक स्त्री के प्रति बर्बरता रहेगी तब तक हमें सभ्य समाज नहीं माना जा सकता.