शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

चौदह फरवरी के बाद

गाँव की डाकघर में आज भी वही पुराना बोर्ड टँगा है - “स्पीड पोस्ट उपलब्ध है।”
लेकिन रामदुलारी के लिए समय कभी 'स्पीड' से नहीं चला। वह चौदह फरवरी के बाद जैसे वहीं ठहर गया। उसका बेटा रवि हर साल इसी दिन फोन करता था- “माँ, आज सब वैलेंटाइन डे मना रहे होंगे, आप मेरे लिए खीर बना लेना।”

उस साल फोन नहीं आया। आया तो सिर्फ एक सरकारी वाहन और तिरंगे में लिपटा सन्नाटा।

बरसों बाद भी जब 14 फरवरी आता है, टीवी पर बहस शुरू हो जाती है - कौन ज़िम्मेदार, किसने क्या किया, किसने क्या कहा। गाँव के चौराहे पर भी लोग मोबाइल पर वीडियो दिखाकर गुस्सा दोहराते हैं।

रामदुलारी अब बहस नहीं सुनतीं। वे आँगन में तुलसी के पास दिया जलाती हैं। पास में पड़ोस की नाज़िया खड़ी रहती है - जिसका भाई भी उसी हमले में गया था। दोनों अलग धर्म की हैं, पर उनके आँसू का रंग एक है।

आज नाज़िया का छोटा बेटा रामदुलारी से पूछ बैठा, “दादी, लोग लड़ते क्यों हैं?”

रामदुलारी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जब लोग इंसान को भूलकर सिर्फ नाम और पहचान याद रखते हैं, तब लड़ते हैं।”

“तो हम क्या याद रखें?”

उन्होंने आकाश की ओर देखा, जैसे किसी दूर खड़े जवान से बात कर रही हों और कहा- “हम यह याद रखें कि हर शहीद पहले किसी का बेटा था, किसी का भाई था। और अगर हम सच में उन्हें मान देते हैं, तो हमें ऐसा देश बनाना होगा जहाँ किसी माँ को यह सवाल न पूछना पड़े—क्यों?”

वह रामदुलारी की बातें तो आज समझ नहीं पाया लेकिन उसके मन में बेटा और भाई शब्द तो हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो गए।

दूर कहीं लाउडस्पीकर पर देशभक्ति गीत बज रहा था। पर उस छोटे से आँगन में, दो माताएँ बिना शोर के देश को थोड़ा और बड़ा बना रही थीं - नफ़रत से नहीं, सहने की ताकत से।

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