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शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता : प्रवीण प्रणव



परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता

- प्रवीण प्रणव

बशीर बद्र का बहुत मकबूल शेर है "परखना मत परखने में
कोई अपना नहीं रहता/ किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता।/ बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना/ जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता।" हालांकि एक सत्य यह भी है कि बिना परख किए अपनेपन की पहचान नहीं हो सकती। समुद्र मंथन के बाद ही यह संभव है कि हम विष और अमृत को अलग कर सकें और और उनकी तासीर की पहचान भी। यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली ने 'परख और पहचान' (2022) शीर्षक से लेखिका गुर्रमकोंडा नीरजा (1975) की किताब प्रकाशित की है जिसमें छह खंडों में पैंतीस लेख संकलित हैं। किताब का कलेवर बहुत आकर्षक है और किताब के पन्ने और इसकी छपाई उत्तम है। प्रकाशक इस किताब को इस रूप में प्रकाशित करने के लिए बधाई के पात्र हैं। हालांकि 204 पृष्ठ की इस किताब (सजिल्द) का मूल्य 595/- रुपये रखा गया है जो एक आम पाठक के लिए ज्यादा है। इस किताब को पेपरबैक संस्करण में भी प्रकाशित कर इसे आम पाठकों के लिए कम मूल्य पर उपलब्ध करवाया जा सकता है।

किसी और की परख करने से पहले अपनी परख आवश्यक है। लेखिका 'पुरोवाक्' में ही स्पष्ट कर देती हैं कि “छह खंडों में आपके सामने उपस्थित हो रही यह पुस्तक योजना बनाकर नहीं लिखी गई है, बल्कि समय-समय पर अलग-अलग प्रयोजन से लिखे गए छोटे-बड़े आलेखों को एक गुलदस्ते में सजाकर रख दिया गया है। इसलिए इन आलेखों के प्रतिपाद्य विषयों में एकसूत्रता न मिलना स्वाभाविक है। हाँ, विविधता मिलेगी।“ इस स्पष्टवादिता के कुछ नुकसान तो होंगे लेकिन पाठकों की अपेक्षाओं को यह सही दिशा देगी।

किताब का खंड एक कवि और कविताओं को समर्पित है। इस खंड में नौ लेख हैं जिनमें रसलीन, बालमुकुंद गुप्त, भगवतीचरण वर्मा, मुक्तिबोध, नरेश मेहता और रामावतार त्यागी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सारगर्भित लेख तो हैं ही, समकालीन कविता के सहयात्रियों जैसे अहिल्या मिश्र, ऋषभदेव शर्मा और ईश्वर करुण के व्यक्तित्व और कृतित्व से भी पाठकों का परिचय करवाया गया है।

‘आख्यान की बुनावट’ शीर्षक खंड दो में पाँच आलेख हैं जिनमें ‘शमशेर की कहानियाँ’ और ‘श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य’ विशेष रूप से पठनीय है। ‘अर्थ की खोज’ शीर्षक तीसरे खंड में दो लेख हैं जिनमें आलोचक के तौर पर आचार्य रामस्वरूप चतुर्वेदी और परमानंद श्रीवास्तव के आलोचना कर्म और इसी बहाने हिंदी साहित्य में आलोचना के महत्व पर महत्वपूर्ण चर्चा की गई है।

बारह आलेखों से युक्त चौथे खंड का शीर्षक है ‘स्मरण और संदर्शन’। यह खंड विशेष है और इन्हें पढ़ते हुए स्मृति में कई संस्मरण जीवंत हो उठते हैं। खंड में हमारी कई धरोहरों जैसे - स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी (1909 में गुजराती में लिखी गई उनकी पहली पुस्तक 'हिंद स्वराज' के बहाने), अटल बिहारी वाजपेयी, हज़ार चौरासी की माँ के बहाने महाश्वेता देवी, रमणिका गुप्ता, राजेंद्र यादव और डॉ. धर्मवीर पर अच्छे लेख हैं। कई ऐसे साहित्यकारों को भी आलेखों के माध्यम से याद किया गया है जो हाल में ही हमसे बिछड़ गए। जगदीश सुधाकर, शशि नारायण 'स्वाधीन', मृदुला सिन्हा और मंगलेश डबराल पर आधारित आलेख इनमें शामिल हैं। विश्व साहित्य में वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड (1967) के माध्यम से अपना नाम दर्ज कराने वाले साहित्यकार गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ उर्फ़ गाबो, जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला, को स्मरण करते हुए एक लेख उनके नाम भी है। साहित्यकारों से संबंधित जानकारी में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह किताब इस खंड की वजह से विशेष रूप से संग्रहणीय है।

‘भारतीय साहित्य का क्षितिज’ शीर्षक से खंड पाँच में चार लेख संकलित हैं। दो लेख तमिल भाषा के योगदान से संबंधित हैं और दो कवींद्र रवींद्र नाथ ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हैं। तमिल भाषा का बहुत पुराना और बहुत समृद्ध इतिहास है। अनेक साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने अनुवाद के माध्यम से तमिल और हिंदी भाषा-समाजों के बीच पुल का काम किया है। कई तमिल साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने हिंदी में मौलिक लेखन कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। इस किताब के लेख पाठकों के लिए इन मायनों में महत्वपूर्ण होंगे कि इनसे तमिल साहित्य और साहित्यकारों की एक संक्षिप्त जानकारी मिलती है। गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। इस किताब में भी दो लेख संकलित हैं जो गुरुदेव के बारे में सरल, सहज, और रोचक तरीके से पाठकों तक महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाते हैं।

किताब का आखिरी खंड ‘संचार की शक्ति’ है जिसमें तीन लेख हैं। खंड का पहला लेख ‘चाँद का फाँसी अंक’ पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक है। 'चाँद' पत्रिका का गौरवशाली इतिहास रहा है। रामरख सिंह सहगल और महादेवी वर्मा जैसी हस्तियाँ इस पत्रिका की संपादक रही हैं। 1928 नवंबर में 'चाँद' पत्रिका का ‘फाँसी’ अंक प्रकाशित हुआ था। लेखिका ने पत्रिका के इसी अंक पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए अपनी बात रखी है। ‘फाँसी’ के पक्ष और विपक्ष में चर्चा वर्षों से होती आ रही है। फाँसी की सजा को अमानवीय और क्रूर मानते हुए कई देशों ने इसे प्रतिबंधित भी किया है। कहा जाता है कि अब तक 600 से भी अधिक तरीके/ यंत्र ईजाद किए गए हैं फाँसी देने के लिए। स्वतंत्रता आंदोलन में जिस तरह क्रांति में भाग लेने वालों को फाँसी की सजा दी गई, वैसे में यह अंक बहुत महत्वपूर्ण है। इस अंक में हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ कुछ नहीं लिखा गया लेकिन प्रकाशित सामग्री को भड़काऊ मानते हुए ब्रिटिश सरकार ने 'चाँद: पत्रिका के इस अंक को जब्त कर लिया था। रोचक तथ्य यह भी है कि पत्रिका में शहीद भगत सिंह ने छद्म नाम से कई लेख लिखे थे। पत्रिका के इस विशेषांक के बारे में लेखिका नीरजा ने संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित लेख लिखा है जो पाठकों को इस पत्रिका के बारे में खोज-पड़ताल करने के लिए प्रेरित करेगा। इस खंड के अन्य लेखों में मीडिया का महत्व, मीडिया पर बढ़ता बाज़ार का दबाव और राजनीतिक साँठ-गाँठ की वजह से मीडिया की गिरती साख जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर लेखिका की पैनी नज़र गई है और उनकी कलम चली है।

‘परख और पहचान’ के लेखों को पढ़ते हुए कई चेहरे और कई कृतियाँ स्मृति के झरोखों में आती-जाती रहती हैं। इन शख्सियतों में से कई के साथ व्यक्तिगत और कई के साथ साहित्यिक राब्ता, पाठकों का होगा ही। ऐसे में इनसे जुड़ी सूचनाओंऔर जानकारियों को समेटे इस संग्रह के लेख पाठकों को प्रिय लगेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। अकबर इलाहाबादी ने कहा था- "बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है/ तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता।" लेकिन "परख और पहचान" को पढ़ने के बाद पाठक इसमें संगृहीत साहित्यकारों को इस कदर समझ सकेंगे कि वे दिल में भी आ बसें और उनकी कृति समझ में भी आए।

प्रवीण प्रणव
सीनियर डायरेक्टर, माइक्रोसॉफ्ट, हैदराबाद
praveen.pranav@gmail.com

बुधवार, 22 दिसंबर 2021

'समकालीन साहित्य विमर्श' से गुजरते हुए डॉ गोपाल शर्मा

'समकालीन साहित्य विमर्श' से गुजरते हुए
डॉ गोपाल शर्मा


गुर्रमकोंडा नीरजा की पुस्तक ‘समकालीन साहित्य विमर्श’ में क्या है? कोई भी विषय क्रम देखकर पता लगा सकता है। कोई विद्योत्तमा पूछे “अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः” तो वह इस पुस्तक में प्रथमतः प्रस्तुत की गईं रमेश चन्द्र शाह की शुभाशंसा और दिविक रमेश की भूमिका पढ़कर जान सकती है।

यह युग विमर्शों का है। यह युग उन विमर्शों का है जिनको अब तक विमर्श के बाहर रखा जाता रहा। इस दृष्टि से यह पुस्तक उन विमर्शों का सोदाहरण प्रस्तुतीकरण है। 24 आलेख हैं और लगभग सभी इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में लिखे या प्रकाशित हुए हैं। पुस्तक में कुल पाँच खंड हैं – हरित, किन्नर, स्त्री, लघुकथा और विविधा। यदि कोई इन्हें कविता के शिल्प में रखे तो कहेगा –

हरित किन्नर स्त्री विविधा लघुकथा।
विमर्शों से पुस्तक को इस तरह बांधा।


कविता बनाई है तो बने बनाए एक शेर को पेश करने में क्या हर्ज़ है ?

ये दुनिया है यहाँ असली कहानी पुश्त पर रखना।
लबों पर प्यास रखना और पानी पुश्त पर रखना॥


पता नहीं कौन लिख कर चला गया किंतु लगता है कि ठीक ही लिखा था। पुस्तक है ही ऐसी संज्ञा, इसके आने से पुश्त दर पुश्त विचारों का संचरण जो होता है। क्या ‘पुस्तक’ इसका ही स्वरूप है?

नहीं, पुस्तक में विचार होते हैं और ये विचार ही तो सब कुछ हैं। जैसा लेखिका आभार प्रकट करते समय कहने से चूकती नहीं, "यह आलेखों का समुच्चय है।" और इस वाक्य को पूर्ण अर्थ देता है, यह कथन – सभी में अध्येता के सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक मुद्दों पर विशेष आग्रह है।

इसलिए लेखिका के द्वारा चाहे ‘हरित विमर्श’ की बात की गई हो या ‘किन्नर विमर्श’ की ये तीन मुद्दे रेखांकित किए जा सकते हैं – सामाजिक, भाषिक और सांस्कृतिक। क्रम कुछ भी हो कमल की पंखुड़ियों की तरह जब ज्ञान का शतदल कमल खिलता है तब उनका प्रकाशन इसी तरह पुस्तकाकार में होता है। लेखिका में सैद्धांतिक विवेचन के अनुप्रयोग की अद्भुत और अनूठी क्षमता है यह तो उनकी पूर्व प्रकाशित कृति 'अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख' (2015) से पता चल ही गया था। अब उन्होंने यह भी दिखा दिया है कि वे भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के अनुप्रयोग में ही सिद्धहस्त नहीं हैं वे साहित्य के विविध विमर्शों को भी उसी शिद्दत और सहजता से कलमबंद कर सकती हैं ।


यहाँ मैं कुछ सूत्र सूक्तियों में पहले लेखिका के सैद्धांतिक आग्रह को प्रस्तुत करूँगा -

हरित विमर्श – जब तक मनुष्य प्रकृति पर्यावरण के साथ घनिष्ठ आत्मीय संबंध का निर्वाह करता है तब तक पर्यावरण के लिए कोई खतरा नहीं होता। ( पृष्ठ 20)

यदि प्रदूषण को नहीं रोका गया तो प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ मनुष्य का अस्तित्व भी इस पृथ्वी से मिट सकता है। ( पृष्ठ 28)

किन्नर विमर्श 
21 वीं सदी की पूर्वोक्त कृतियों को किन्नर विमर्श का नया उत्थान कह सकते हैं। इस दौर की इन रचनाओं में समाजशास्त्रीय शोध पद्यति का प्रयोग किया गया है। और कहीं-कहीं तो ये रचनाएँ रिसर्च की रिपोर्ट जैसी लगती हैं। ( पृष्ठ 42)

लेकिन जब बात आती है किन्नरों की, तो सभी आदर्शवादी बातें हाशिये पर चली जाती हैं । (पृष्ठ 55)

स्त्री विमर्श 
सिद्धान्त और सोच को किस प्रकार विवेचन और विश्लेषण में बदलकर प्रस्तुत किया जा सकता है इसका सर्वोत्तम उदाहरण लेखिका नीरजा का ‘स्त्री विमर्श’ विषयक खंड है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यहाँ खुलकर और स्वतंत्र रूप से मत व्यक्त किया गया है। रचनाओं के विवेचन से आगे जाकर जब जब वे अपनी टीका-टिप्पणी करती हैं तो ‘स्त्री’ के मर्म को ही उद्घाटित नहीं करतीं बल्कि उसे पुरुष के समक्ष और समकक्ष भी खड़ा करती हैं । ‘समकालीन स्त्री प्रश्न’ (पृष्ठ 75-78) इस दृष्टि से कई बार पढ़ा जा सकता है। विमर्शों की पुस्तक में ऐसा भी लिखा मिलेगा, यह सोचा न था –

आज की स्त्री चाहती है कि पुरुष समय-असमय अपना ‘पति-पना’ न दिखाया करे। स्त्री को भी गाहे बगाहे प्रति पल अपना ‘पत्नीपना’ दिखाने की प्रवृत्ति से बाज़ आना होगा। वह जमाना गया जब पति-पत्नी ‘दो शरीर एक प्राण’ होते थे क्योंकि इस एक प्राणता के लिए दो में से किसी एक को अपना व्यक्तित्व दूसरे के व्यक्तित्व में विलीन करना होता था। आज की स्त्री अपने व्यक्तित्व को इस तरह पुरुष के व्यक्तित्व में विलीन करने के लिए तैयार नहीं है। उसे अपनी स्पष्ट पहचान और परिवार तथा समाज में अपना स्थान व सम्मान चाहिए। (पृष्ठ  77)

स्पष्ट है पुस्तक में सबसे ज्यादा पृष्ठ इसी विमर्श को मिले हैं। हरित विमर्श के लिए कुल छह पृष्ठ है, किन्नर के लिए भी इतने नहीं पर स्त्री विमर्श के लिए सबसे ज्यादा। आधे में हम, और आधे में सब। ठीक भी है “हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास” लिखकर अमर हो गए शुक्ल जी के बाद यदि अब कोई सुमन राजे इसको पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाती है तो उसे डॉ नीरजा की पुस्तक के विमर्श से राह मिलेगी। ‘मिश्र बंधु विनोद' से अब हम बहुत आगे निकल आए हैं। कहना चाहिए कि अब अपनी परंपराओं को शुद्ध करने का समय भी निकल चुका है। अब तो बक़ौल नीरजा जी के “आज स्त्री जागरूक हो गई है। अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की लड़ाई लड़ रही है। पुरुष पक्षीय परंपराओं को तोड़ना सीख गई है।” (पृष्ठ 83 )। इन ‘जगी हुई आहटों का सम्मान’ क्यों किया जाना चाहिए? क्योंकि – “पुराने विधि विधान और पुरानी स्मृतियाँ आज के संदर्भ में अर्थहीन हो गए हैं। आज नई स्मृतियों और नई संहिताओं की जरूरत है। सब कुछ बदलना होगा, सारे समाज की मानसिकता को बदलना होगा।” (पृष्ठ 95)।

लघुकथा विमर्श 
इस खंड में लेखिका का भाषा-अध्येता रूप खिलकर आया है। लघुकथा की गुरुता का भाषाई पक्ष वे खूब खंगाली हैं। साथ में बहुत सी सूत्र पंक्तियाँ भी हैं , जैसे –

लघुकथाकार संक्षिप्त फ़लक पर भाव ,घटना, या विचार की बीज बोता है और प्रभावशाली अभिव्यक्ति के माध्यम से उसे पल्लवित करता है। वह अपनी बात को दो टूक कहने के लिए व्यंजना का सहारा लेता है। समय की माँग और विषय के चयन के अनुरूप लघुकथाकार ‘पंच’ का प्रयोग करते हुए अपनी बात को अभिव्यक्त करता है और पाठक को उद्वेलित करता है। (पृष्ठ 156) 

विमर्श विविधा
‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ के समान विमर्श अनंत हैं और उनकी गाथा हनुमान की पूंछ सी बढ़ती ही चली जाती है। पुस्तक में पृष्ठों की सीमा होती है, यहाँ भी है। खैर यह है कि विविधा में वैविध्य दर्जन की संख्या पार नहीं करता। फिर भी यह क्या कम है? विस्थापन विमर्श और वृद्धावस्था विमर्श तो अपने नाम से भी नवीन लगते हैं। इन विमर्शों पर अभी लेखन हुआ ही कितना है? हाँ, उत्तर आधुनिक विमर्श के नाम पर बहुत कुछ परोसा जाता रहा है। नीरजा जी स्त्री, दलित, आदिवासी, किन्नर, अल्पसंख्यक आदि के साध साथ ‘वृद्धावस्था’ को भी अपने विमर्श में स्थान दिया है। अंत में ही दिया है, पर खूब दिया है। यह बात नहीं कि यह विमर्श पहले नहीं था। उदाहरण के लिए केशव सफ़ेद होते बालों की चिंता में कठिन काव्य के प्रेत हो गए थे। इस चिंता ‘जो आ के न जाये वो बुढ़ापा देखा’ को चिंतन में शामिल करते हुए नीरजा जी ‘वृद्धावस्था विमर्श’ को एक वाक्य में परिभाषित करती हैं – वृद्धावस्था विमर्श इस उपेक्षित समुदाय की दृष्टि से, अथवा वृद्धावस्था को केंद्र में रखते हुए, समाज, साहित्य और संस्कृति की नई व्याख्या करने वाला विमर्श है । (पृष्ठ 212)

जब यह पुस्तक ‘समकालीन साहित्य विमर्श’ नाम से है तो इसमें विमर्श और भी होंगे ही। हैं भी। पर उन पुस्तकों और उन रचनाकारों का उल्लेख करने से बचते हुए मैं यह कहकर आगे बढ़ूँगा कि इस पुस्तक में ‘सर्वथा अपूर्वानुमेय – किंतु अत्यंत आत्मीय और गहरी संवेदना के साथ खोजी और प्रस्तुत की गई सामग्री मिलती है’ (शुभाशंसा – रमेशचंद्र शाह)। और यह भी कि लेखिका ने अपनी साहित्यिक खोज को केवल तथाकथित मशहूर हस्तियों तक सीमित नहीं रखा है। उनके साथ-साथ कम चर्चित रचनाकारों की ओर भी उनका ध्यान गया है। (दिविक रमेश)।

‘कुछ न कुछ लिखा जाता रहा है’ कहकर जिस लेखन को बड़ी विनम्रता से लेखिका ने यहाँ सँजोया है उसका हिंदी के उन अध्येताओं को तुरत फायदा पहुँचेगा जो समकालीन साहित्य के सजग पाठक और अध्येता हैं। उनको भी यह पुस्तक रुचेगी जो शोध की नवीन दिशाओं की खोज में हैं। एंड्रू बेनेट और निकोलस रॉयल ने ‘एन इंट्रोडक्शन टू लिटरेचर, क्रिटिसिज़्म एंड थियरि’ में जिस प्रकार विविध विमर्शों पर लिखकर उसे विश्वविद्यालयों के लिए वांछित पुस्तक के रूप में पेश किया और उसके छह संस्करणों में विमर्शों की संख्या लगातार बढ़ी है, ऐसा ही इस पुस्तक के साथ भी हो। यही कामना और आशा है कि इसके आगामी प्रत्येक संस्करण में विमर्शों की संख्या बढ़ती जाए और हिंदी पाठ क जगत लाभान्वित हो।

बारह मसाले तेरह स्वाद : समकालीन साहित्य विमर्श

- प्रवीण प्रणव

लेखिका गुर्रमकोंडा नीरजा की किताब ‘समकालीन साहित्य विमर्श’, वर्तमान समय के कई ज्वलंत मुद्दे, जो नए नहीं हैं, पर एक नई दृष्टिकोण डालने का प्रयास है। हालांकि लेखिका ने लिखा है कि इस किताब में संकलित लेख 2008 से 2020 के बीच अलग-अलग संदर्भों में लिखे गए हैं लेकिन इससे न तो क्रमबद्धता और न ही पठनीयता प्रभावित होती है। हम सब साक्षी हैं कि कुछ वर्षों पहले जब किसी पुल का निर्माण होता था, महीनों, सालों तक मजदूर काम करते थे और आरंभ से अंत तक पुल का निर्माण वहीं होता था। लेकिन आज पुल बनाने की प्रक्रिया में बदलाव आया है। पुल के कई भाग अलग-अलग जगहों पर बनते हैं और अंत में उन्हें जहाँ पुल बनना होता है, वहाँ ला कर जोड़ा जाता है। साहित्य की दृष्टि से पहले पुल बनाने की प्रक्रिया को आधुनिक काल कह सकते हैं और वर्तमान तरीके को उत्तर आधुनिक काल। उत्तर आधुनिक साहित्य जिसे समकालीन साहित्य भी कहा जाता है, के विभिन्न विमर्शों को जी. नीरजा ने पुल के अलग-अलग भागों की तरह एक साथ ला कर इस तरह जोड़ा है कि इस किताब के स्वरूप में लेख, अपनी पूर्णता को प्राप्त करते हैं।


आज के दौर में विमर्शों का बोलबाला है। हर साल-दो साल के बाद कोई नया विमर्श ‘चलन’ में आता है और साहित्यकारों की लेखनी उस विमर्श पर ऐसे-ऐसे लेख लिखती है कि भविष्य में इस विमर्श से जनित किसी भी क्रांति के लिए ‘गंगा की गंगोत्री’ उनके ही लेख को ठहराया जा सके। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर साहित्यकारों की दृष्टि पूर्वाग्रहों से प्रेरित रही है। अज्ञेय ने कहा “अगर मैं मानता भी हूँ कि समाज को बदलने में साहित्य का योग होता है, कि उसमें साहित्यकार की भी कुछ जिम्मेदारी होती है, तो भी आज साहित्यिक रचना और सामाजिक परिवर्तन में जैसा सीधा समीकरण बनाया जा रहा है, उसे मैं बिल्कुल स्वीकार नहीं करता। मैं समझता हूँ कि पिछले लगभग 50 वर्षों से इस तरह का सीधा संबंध बनाने और सिद्ध करने का जो एक प्रयत्न होता रहा है, उसने साहित्य का बहुत अहित किया है। आलोचना को, जिसका लोचन से संबंध ही स्पष्ट करता है कि उसे स्वच्छ प्रकाश की अनिवार्य आवश्यकता है, उसने एक धुंधलके में भटका दिया है। रचना की दृष्टि को एक रंगीन चश्मा पहनाकर उसने एकांगी और असमर्थ बना दिया है।“ संतोषप्रद है कि जी. नीरजा साहित्यिक विश्लेषण और विमर्श के लिए किसी रंगीन चश्मे का इस्तेमाल न करते हुए, अपने लेखों के माध्यम से, इन विमर्शों में पूर्व में स्थापित और सत्यापित तथ्यों से इतर कुछ नये आयाम जोड़ती हैं।

इस किताब में 24 लेख हैं जिन्हें पाँच खंडों में संकलित किया गया है। पहला खंड ‘हरित विमर्श’ है। यूं तो इस खंड में सिर्फ दो लेख हैं लेकिन लेखिका इन दो लेखों के माध्यम से पर्यावरण और इससे जुड़ी समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट करने में सफल रही हैं। बिहारी सतसई का दोहा “देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर”, इन दोनों लेखों के लिए सटीक बैठता है।

“हरित विमर्श की प्रस्तावना” शीर्षक लेख में लेखिका ने पर्यावरण विमर्श को स्त्री विमर्श के साथ जोड़ते हुए लिखा है कि “सामान्यतः धरती को स्त्री के समान और स्त्री को धरती के समान माना जाता रहा है। लेकिन अधिकार और सत्ता की अपार इच्छा पुरुषवादी व्यवस्थाओं के चरित्र को शोषण की मनोवृत्ति से संपन्न करती रही है। इस मनोवृत्ति के कारण ही पुरुष केंद्रित समाज का विकास, पर्यावरण और स्त्री के निरंतर दोहन पर टिका है। इस दोहन के पीछे पुरुष की आधिपत्य की भावना है।“ केरल की प्रसिद्ध साहित्यकार के. वनजा भी स्त्री और धरती में समानता की बात करती हैं। दुनिया की प्रकृति पर पितृसत्ता के अधिकार के खिलाफ़ स्त्री एवं प्रकृति केंद्रित इको फेमिनिज्म की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। के. वनजा ने अपने तीन किताबों की शृंखला - “साहित्य का पारिस्थितिक दर्शन”, “इकोफेमिनिज्म”, और “हरित भाषा वैज्ञानिक विमर्श” में इस विषय पर महत्वपूर्ण काम किया है।

“पर्यावरण के प्रश्न और कविता” शीर्षक लेख में लेखिका ने समकालीन कवियों की कविताओं के माध्यम से पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की बात की है। प्रो. ऋषभदेव शर्मा की कविता की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लेखिका सशंकित हैं कि पर्यावरण प्रदूषण की तरफ हम इतनी दूर आ गए हैं जहाँ से वापसी का रास्ता सरल नहीं। "हैलो, मनुष्य,/ मैं आकाश हूँ। /कल सृजन था, निर्माण था,/ आज प्रलय हूँ, विनाश हूँ।/ मेरी छाती में जो छेद हो गए हैं काले काले,/ ये तुम्हारे भालों के घाव हैं,/ ये कभी नहीं भरने वाले।"


पेड़ों की कटाई और कंक्रीट के जंगल बसाए जाने से संभावित खतरों की बात करते हुए लेखिका, कविता वाचक्नवी की कविता उद्धृत करती हैं "मेरे हृदय की कोमलता को / अपने क्रूर हाथों से / बेध कर / ऊँची अट्टालिकाओं का निर्माण किया/ उखाड़ कर प्राणवाही पेड़-पौधे/ बो दिए धुआँ उगलते कल - कारखाने / उत्पादन के सामान सजाए / मेरे पोर-पोर को बींध कर / स्‍तंभ गाड़े / विद्‍युत्वाही तारों के / जलवाही धाराओं को बाँध दिया। / तुम्हारी कुदालों, खुरपियों, फावडों, / मशीनों, आरियों, बुलडोज़रों से/ कँपती थरथराती रही मैं। / तुम्हारे घरों की नींव / मेरी बाहों पर थी / अपने घर के मान में / सरो-सामान में / भूल गए तुम। / ... मैं थोड़ा हिली / तो लो / भरभराकर गिर गए / तुम्हारे घर। / फटा तो हृदय / मेरा ही।"

पर्यावरण ने सदा हमारे अस्तित्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और हमारे पूर्वजों ने इसे भली -भांति समझा। विकास की अंधी दौड़ में शामिल हो कर आज हम प्रकृति से दूर होते गए और परिणाम स्वरूप समय-समय पर हमने इसके दुष्परिणाम भी झेले हैं। पेड़ लगाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा कि वनवास के दौरान सीता और लक्ष्मण वृक्षारोपण कर रहे हैं "तुलसी तरुवर विविध सुहाए/ कहुं कहुं सिया कहुं लखन लगाए।" यही नहीं जब राम वनवास से वापस आते हैं तब भी इस उपलक्ष्य में अयोध्या में वृक्षारोपण किया जाता है "सफल पूगफल कदलि रसाला। /रोपे बकुल कदम्ब तमाला।।" गोस्वामीजी ने यह भी लिखा कि प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का विवेक पूर्ण उपयोग ही उचित है। पेड़ से फल तोड़ कर खाना तो उचित है लेकिन पेड़ को काटना अनुचित – “रीझि-खीझी गुरूदेव सिष सखा सुसाहित साधु।/ तोरि खाहु फल होई भलु तरु काटे अपराधू ।।"

पर्यावरण और इससे जुड़ी चिंताओं पर बहुत काम हुआ है लेकिन ज्यादातर काम वैज्ञानिक है। इस समस्या पर साहित्य में कम ही काम हुआ है और ऐसे में लेखिका के दोनों लेख महत्वपूर्ण हैं। एन्नी लेमोट (Annie Lamott) जो अमेरिका की प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं ने एक प्रसिद्ध पंक्ति लिखी “ ‘No’ is a complete sentence.” यानि ‘नहीं’ एक सम्पूर्ण वाक्य है। सरकार ने धूम्रपान रोकने के लिए न जाने कितने प्रयास किए, न जाने कितने बड़े-बड़े आलेख लिख कर इसके दुष्प्रभावों की चर्चा की गई, लेकिन हम सब जानते हैं कि सिगरेट के डब्बे पर लिखा सिर्फ दो शब्द “Smoking Kills” या “धूम्रपान जानलेवा है” से ज्यादा प्रभावी कुछ भी साबित नहीं हुआ। ऐसे ही लेखिका के पर्यावरण पर दोनों लेख संक्षिप्त लेकिन बहुत ही प्रभावी है।

किताब का खंड दो ‘किन्नर विमर्श’ है जिसमें पाँच लेख संकलित हैं। ‘जो नर है न नारी’ शीर्षक लेख में लेखिका महेंद्र भीष्म द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘किन्नर कथा’ और प्रदीप सौरभ के उपन्यास ‘तीसरी ताली’ की समीक्षात्मक आलोचना करते हुए किन्नरों की पीड़ा, उनकी पहचान, उनकी पूजा पद्धति आदि के बारे में विस्तृत विवरण देती हैं जो आम पाठकों के लिए रुचिकर और महत्वपूर्ण है। महेंद्र भीष्म के उपन्यास ‘किन्नर कथा’ की कहानी को लेखिका ने संक्षेप में लेकिन इतने प्रभावी ढंग से लिखा है कि पाठक इस कहानी का शब्द-चित्र अपनी आँखों के सामने बनता हुआ महसूस करेंगे।

“इक्कीसवीं सदी और किन्नर विमर्श” शीर्षक लेख में लेखिका ने नीरजा माधव कृत ‘यमदीप’, निर्मला भुराडिया कृत ‘गुलाम मंडी’, महेंद्र भीष्म कृत ‘किन्नर कथा’, प्रदीप सौरभ कृत ‘तीसरी ताली’ आदि किताबों के उद्धरण के साथ किन्नरों के साथ होने वाले भेद-भाव, सामाजिक अस्वीकार्यता, और रोजगार की समस्या के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए वांछित कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

“एक समांतर दुनिया: ‘तीसरी ताली’ ” शीर्षक लेख प्रदीप सौरभ के उपन्यास ‘तीसरी ताली’ की विस्तृत समीक्षा समेटे हुए है। प्रदीप सौरभ के लेखन की प्रशंसा में लेखिका लिखती है “लेखक ने छानबीन के बाद हिजड़ों की जीवन शैली, उनके बीच गद्दियों, इलाकों और गद्दी के वारिस को लेकर होने वाले खूनखराबे, किसी को जबरदस्ती हिजड़ा बनाने, चुनरी की रस्म, गुरु परंपरा का निर्वाह, मूंछों वाले गिरिया रखने, हिजड़ों के अंदर छिपी स्त्रीत्व की भावना, उनकी मानवीय संवेदना और ममत्व, हिजड़े होने के दर्द, उनके आक्रोश और संघर्ष आदि को विस्तार से परत-दर-परत खोला है। हिजड़ों के जीवन के साथ-साथ इस उपन्यास में एक समांतर दुनिया है समलैंगिकों की, विकृत प्रवृत्ति वालों की। इतना ही नहीं, लेखक ने राजनैतिक पैंतरेबाज़ी को भी उजागर किया है। उनकी मारक टिप्पणी देखिए – ‘असली हिजड़े तो वे हैं जो जनता के वोटों से संसद और विधानसभा में जाकर उन्हीं का खून चूसने की योजनाएँ बनाते हैं और अपना पेट भरते हैं।’ ” किन्नर समुदाय अपनी स्थिति से किस कदर निराश है इसे लेखिका के इस कथन से समझा जा सकता है “दिल्ली में आमतौर पर हिजड़े के शव को रात को डंडों से मारते, उस पर चप्पल-जूते बरसाते और सड़क पर खींचते हुए श्मशान घाट ले जाते हैं। इस तरह शव को श्मशान में ले जाने के पीछे मान्यता है कि मरने वाला दोबारा तीसरी योनि में जन्म नहीं लेगा।” तीसरी ताली उपन्यास की समीक्षा के साथ ही लेखिका ने किन्नर होने के वैज्ञानिक कारणों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखिका का विज्ञान की पृष्ठभूमि से होना सहायक सिद्ध होता है।

“सम्मान की ज़िंदगी जीने की चाहत : नाला सोपारा” शीर्षक लेख चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ (2016) पर आधारित है जिसके लिए उन्हें 2018 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह उपन्यास पत्रात्मक शैली में लिखा गया है जिसमें एक पुत्र का बेबस माँ से संवाद है। उपन्यास में कुल मिलाकर सत्रह पत्र और उपसंहार में दो समाचार सम्मिलित हैं। उपन्यास के पात्र विनोद, जो एक किन्नर है, द्वारा लिखे गए पत्र इतने मार्मिक हैं जिसे पढ़ते समय पाठक भी अपने आप को विनोद के दर्द से जुड़ा हुआ पाते हैं। आज-कल किसी भी विमर्श पर किसी भी लेखक द्वारा आनन-फ़ानन में कुछ लिख देने की परंपरा चल पड़ी है लेकिन ऐसे लेखों में विश्वसनीयता का अभाव झलकता है। यह उसी तरह है कि कोई लोहार, हलवाई को सुझाव दे कि अच्छे रसगुल्ले कैसे बनाए जाते हैं। किसी विमर्श पर लेख या तो स्वयं के अनुभव जनित होने चाहिए या उसे लेखक ने किसी और के माध्यम से इस तरह आत्मसात किया हो कि आप प्रभावी ढंग से उस विषय पर कुछ कह सकें। प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने ‘देहरी’ शीर्षक से जो स्त्री-पक्षीय कविताएं लिखी हैं, उनमें स्त्रियों की पीड़ा इस तरह उभर कर सामने आती है जिसे शायद कोई स्त्री भी इस रूप में न लिख पाती। चित्रा मुद्गल भी इस उपन्यास में किन्नर की भावनाओं के इतने यथार्थ विवरण के पीछे के कारणों का उल्लेख करते हुए कहती हैं “जब मैं मुंबई के नाला सोपारा में रहती थी, तब मैं एक ऐसे ही युवक से मिली थी। उसे किन्नर होने की वजह से घर से निकाल दिया गया था। यह उपन्यास उसी युवक के विद्रोह की कहानी है। मैंने उसे अपने घर पर बहुत दिनों तक साथ रखा।”

“समसामयिक हिंदी साहित्य : किन्नर विमर्श” लेख, किन्नर विषय पर लिखे गए कई उपन्यासों, कहानियों और कविताओं के माध्यम से इस चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास है। यह लेख लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी’ (2015) की भी बात करता है जिसमें लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने अपने खुद के अनुभव के आधार पर किन्नर समुदाय के सच को उजागर किया है। यह देखना सुखद है कि साहित्यकारों का ध्यान किन्नर विमर्श की ओर गया है और इस दिशा में बहुत प्रयास हुए हैं लेकिन असली बदलाव तब होगा जब लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की ही तरह इसी समुदाय से और लेखक/लेखिका सामने आएं और अपने खुद के अनुभव और सत्य को सामने रखें।

स्त्री विमर्श खंड में छः लेख हैं। विमर्शों में सबसे ज्यादा शायद स्त्री विमर्श पर ही लिखा गया है लेकिन आज भी समस्या बनी हुई है। इन लेखों में लेखिका किसी किताब और किताब की समीक्षा के माध्यम से स्त्री विमर्श के विभिन्न आयामों को एक बार फिर से पाठकों के सामने लाती हैं और उम्मीद जताती हैं कि परिस्थितियाँ जल्द बदलें।

“कविता में स्त्री” शीर्षक लेख में लेखिका लिखती हैं ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भी स्त्री को पग-पग पर अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है। घर की दहलीज पार करके जहाँ स्त्री समाज में पुरुषों से कदम मिलाकर आगे चल रही है वहीं उसे जिल्ल्त भी उठानी पड़ रही है। प्रो. ऋषभदेव शर्मा की कविता ‘प्रशस्तियाँ’, स्त्रियों के इस दर्द को भली-भांति दर्शाती है - "मैंने जब भी कुछ पाया /मर खप कर पाया /खट खट कर पाया /अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया /पाने की खुशी /लेकिन कभी नहीं पाई /***शिक्षा हो या व्यवसाय /प्रसिद्धि हो या पुरस्कार /हर बार उन्होंने यही कहा- /चर्म-मुद्रा चल गई! /[चर्म-चर्वणा से परे वे कभी गए ही नहीं!]”

“सनातन स्त्री : देह भी विदेह भी” शीर्षक से लेख में लेखिका ने दिनकर के काव्य उर्वशी के माध्यम से प्रेम की व्याख्या की है। “स्त्री-पुरुष की परस्पर-आश्रयता” शीर्षक से लेखिका यह स्थापित करती है कि भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष एक दूसरे के विरोधी या प्रतिबल नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। ‘अर्द्धनारीश्वर’ के देश में.... शीर्षक लेख में विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ के बहाने लेखिका ने निर्भया और अन्य कई स्त्रियों के शारीरिक, मानसिक यातना और बलात्कार जैसी घटनाओं की चर्चा की है और न्याय मिलने में विलंब या न्याय न मिल पाने को इस समस्या की जड़ माना है। पुरुष प्रधान इस समाज में स्त्रियाँ या तो अपने साथ हुए अन्याय को बता ही नहीं पातीं और यदि बताया तो सामाजिक लांछन और न्याय न मिल पाने की वजह से ताउम्र बदनामी का दंश झेलने पर विवश होती हैं। गोस्वामी जी ने लिखा “कामिहि नारि पिआरि जिमि” यह पुरुष प्रधान समाज की सोच को दर्शाता है। काम के अधीन औरत यदि सिर्फ प्यार की बात सोचती है तो काम के अधीन पुरुष क्या सोचता है? या पुरुष काम के अधीन होता ही नहीं? लेखिका ने इस सोच को बदले जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए लिखा है “पुराने विधि-विधान और पुरानी स्मृतियाँ आज के संदर्भ में अर्थहीन हैं। आज नई स्मृतियों और नई संहिताओं की जरूरत है। सब कुछ बदलना होगा, सारे समाज की मानसिकता को बदलना होगा।”

“अल्पसंख्यक स्त्री का आधा गाँव “ शीर्षक लेख राही मासूम रज़ा कृत उपन्यास ‘आधा गाँव‘ पर आधारित है जो गंगौली गाँव के मुसलमानों का बेपर्द जीवन यथार्थ है। राही मासूम रज़ा ने गाँव के हिन्दू और मुस्लिमों के बीच पहले भाईचारे और उसके बाद बदलते हालात में आए परिवर्तन को बड़े ही प्रभावी ढंग से लिखा है। आम तौर पर स्त्री को फला की बेटी, फला की पत्नी, फला की माँ आदि कहकर संबोधित किया जाता है। उससे उसका नाम छीन लिया जाता है। इसी ओर इशारा करते हुए राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गाँव‘ में कहा - ‘‘बेनाम होना तो बहुओं की तकदीर है। फ़र्क बस इतना हो जाता है कि अच्छे घरानों में वह या तो बहू कही जाती हैं या दुल्हन या दुलहिन। हमारे समाज में या तो यह होता है कि मैकेवाले दहेज देकर बेटी से अपना दिया हुआ नाम छीन लेते हैं या फिर यह कहिए कि ससुराल वाले इसे गवारा नहीं करते कि उनके यहाँ किसी और घर का दिया हुआ नाम चले। कभी-कभी यह बेनामी उन लड़कियों से ऐसी चिपक जाती है कि मरते-मरते पिंड नहीं छोड़ती।‘‘ इस संबंध में मुझे राजम पिल्लई की कविता याद आती है जिसका शीर्षक है "गांधारी तुम्हारा नाम क्या है?" और गौर करने पर अचानक हम पाते हैं कि उस दौर में स्त्रियों के अपने नाम गुम हो गए। केकय देश की राजकुमारी केकई बन गईं तो कोशल देश की राजकुमारी कौशल्या। स्त्रियों को अपने नाम से भी अलग कर दिए जाने से ज्यादा अन्याय उनके साथ और क्या होगा। राही मासूम रज़ा झंगोटिया-बो और सईदा दो पात्रों के बारे में लिखते हैं जिन्हें आर्थिक परेशानियों की वजह से अपने शरीर से समझौता करना पड़ा। नीरजा लिखती हैं "सर्वत्र शरीर संबंध है और इस संबंध के पीछे सवाल आर्थिक हैं। परदे के भीतर भी स्त्री का संघर्ष और उसका आत्मसंघर्ष चलता रहता है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भी चल रहा है।"

लघुकथा विमर्श खंड में लेखिका ने श्याम सुंदर अग्रवाल, कमल चोपड़ा और सीमा सिंह की लघुकथाओं का विस्तृत विश्लेषण और विवेचन किया है। लेखिका का कहना है कि आज की लघुकथाओं को देखने से यह स्पष्ट होता है कि पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक विसंगतियों को लघुकथाकारों ने अपना कथ्य बनाया है। लघुकथा आंदोलन से जुड़कर अनेक साहित्यकारों एवं पत्र-पत्रिकाओं ने इस विधा को सशक्त बनाया। विष्णु प्रभाकर ने अपने लघुकथा संग्रह ‘आपकी कृपा है’ की भूमिका में लिखा कि “विकास की एक सुनिश्चित परंपरा आज की लघुकथा के पीछे देखी जा सकती है। न जाने किस काल-खंड में मनीषियों ने अपने सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में स्पष्ट करने के लिए दृष्टांत देने की आवश्यकता अनुभव की, इसी अनजाने क्षण में लघुकथा का बीजारोपण हुआ। तब उसका नाम दृष्टांत या ऐसा ही कुछ रहा होगा।” लेखिका ने कहा है कि 1901 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित माधवराव सप्रे की रचना ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की पहली लघुकथा माना जाता है।

श्याम सुंदर अग्रवाल की कई लघु कथाओं का विश्लेषण करते हुए लेखिका ने उनकी लघुकथाओं में सामाजिक कुरीति पर प्रहार, व्यवस्था पर व्यंग्य, गरीबी आदि को तो रेखांकित किया ही है, वैज्ञानिक समालोचना करते हुए लघु कथा शिल्प, कथाओं में संवाद, विवरण, निपातों का प्रयोग, स्थानीय भाषा प्रयोग, विस्मयादिबोधक/ प्रश्न चिन्ह/ पुनरावृति/ अल्पविराम आदि के प्रयोगों को उदाहरण के साथ पाठकों के सम्मुख रखा है जो पाठकों को लघु कथा के स्वरूप, औचित्य, शिल्प और महत्व को समझने में सहायक सिद्ध होगी। श्याम सुंदर अग्रवाल की लघु कथाओं के बारे में लेखिका ने लिखा है “श्याम सुंदर अग्रवाल अपनी लघुकथाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त मूल्यहीनता, मानवाधिकारों के हनन और सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व नैतिक विडंबनाओं पर सीधे-सीधे प्रहार करते हैं। गरीबी और भूख के अमानुषिक सच को उन्होंने इस तरह उकेरा है कि व्यंजनापूर्ण शब्दावली पाठक के हृदय को छील देती है। वे सरल संप्रेषणीय भाषा प्रयोग द्वारा भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर व्यंग्य कसते ही हैं अनेक लघुकथाओं के अंत में झिड़की भी देते हैं।“

कमल चोपड़ा के लघुकथाओं का भी नीरजा साहित्यिक और वैज्ञानिक विश्लेषण तो करती ही हैं, साथ ही लघु-कथा के बारे में कई साहित्यकारों के कथन के माध्यम से लघु कथा की परिभाषा और लघु कथा के महत्व को स्थापित करती हैं। कमल चोपड़ा की लघु कथाओं में अच्छी कथा होने के सभी अवयव होने की बात करते हुए लेखिका लिखती हैं “अपनी लघुकथाओं में कमल चोपड़ा सामाजिक विसंगतियों पर सीधा प्रहार करते हैं और कथा के अंत में ‘पंच’ के साथ उनकी धज्जियाँ उड़ाते हैं। इनकी भाषा बोधगम्य तथा परिवेश और पात्र के अनुरूप है। इनकी लघुकथाओं में व्यंग्य भी है और फटकार भी; आक्रोश भी है और चेतना तथा जागरूकता भी।“ सीमा सिंह की लघु कथाओं के बारे में लेखिका का यह कथन द्रष्टव्य है “सीमा सिंह ने स्त्री जीवन के विविध पक्षों पर लेखनी चलाई है। सरल, सहज और संप्रेषणीय भाषिक प्रयोग से स्त्री-प्रश्नों को उकेरा है और साथ ही उनका निदान किया है। वे सड़ी-गली मान्यताओं को तोड़ कर नवीन जीवन मूल्यों को स्थापित करने में विश्वास रखती हैं और यह आशा करती हैं कि स्त्री को खुलकर जीने का अधिकार प्राप्त हो।"

“विमर्श विविधा” इस किताब का पाँचवां और आखिरी खंड है जिसमें अलग-अलग विमर्शों के आठ लेख संकलित हैं। डॉ. रमेशचंद्र शाह को उनके उपन्यास ‘विनायक’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए जाने की बात से आरंभ करते हुए “सृजन के आयाम : रमेशचंद्र शाह” शीर्षक से लेख में नीरजा ने लेख के पहले भाग में डॉ. रमेश चंद्र शाह का परिचय और उनके साहित्य का परिचय दिया है, भाग दो में लेखिका के डॉ. रमेश चंद्र से मुलाकात से संस्मरण है जिनमें लेखिका के प्रति डॉ. रमेश चंद्र शाह का कथन दक्षिण भारत में हिंदी की सेवा में लगे साहित्यकारों के लिए भी महत्वपूर्ण है “मैं जहाँ भी जाता हूँ वहाँ हमेशा यही कहता हूँ कि हिंदी का उद्धार दक्षिण भारतीय ही करते हैं और वे ही यह काम कर सकते हैं। क्योंकि वे अपनी मातृभाषा के साथ हिंदी को भी आगे ले जाने का काम कर रहे हैं।” इसी लेख में लेखिका ने साहित्यकार डॉ. रमेश चंद्र की एक आलोचक के तौर पर, एक कवि के रूप में, एक दार्शनिक के रूप में मीमांसा की है। उनके उपन्यास ‘विनायक’ के माध्यम से लेखिका ने उनके गद्य लेखन पर भी विस्तृत चर्चा की है।

“समाज विमर्श : रमेश पोखरियाल ‘निशंक’” शीर्षक से लेखिका ने डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के बारे में परिचय देते हुए उनकी कविताओं और कहानियों के माध्यम से परिवार और समाज के प्रति उनके विचारों को सामने रखा है। डॉ. निशंक ने खुद कहा है कि एक राजनेता होने से पहले वे साहित्यकार और समाजसेवी हैं। लेखिका ने लिखा है “रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की दृष्टि सुधारवादी है। वे मनुष्यता को कायम रखने की बात करते हैं। उनकी कहानियों में आदर्श की स्थिति को देखा जा सकता है। वे यथार्थ की परिस्थितियों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं, उन्हें सोचने के लिए बाध्य करते हैं और उन परिस्थितियों को सुधारने के लिए राह भी सुझाते हैं। वे मानवीय मूल्यों एवं आदर्श परिवार को प्रमुखता देते हैं।”

वरिष्ठ हिंदी कवि केदारनाथ सिंह को सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार (2013) से सम्मानित किए जाने के संदर्भ में “लोकतंत्र और लोक विमर्श : केदारनाथ सिंह” शीर्षक से लेख में लेखिका ने केदारनाथ सिंह की कविताओं में ज़मीन से जुड़ाव और मिट्टी की खुशबू की बात की है। लेखिका ने लिखा है कि केदारनाथ सिंह की कविताओं में गाँव की प्राकृतिक आभा की अनेक छवियाँ दिखाई देती हैं। इनकी कविताओं के बिंब में नदी, नाले, फूल, जंगल, तट धूप, सरसों के खेत, धानों के बच्चे, बन, सांध्यतारा, बसंत, फागुनी हवा, पकड़ी के पात, कोयल की कूक, पुरवा-पछुवा हवा, शरद प्रात, हेमंती रात, चिड़िया, घास, फुनगी आदि बार-बार आते हैं जो इनके मिट्टी से जुड़ाव का परिचायक है। बिंब के बारे में केदारनाथ सिंह का कथन महत्वपूर्ण है “बिंब पाठक को रोकता-टोकता चलता है और एक हद तक उसे विवश करता है कि वह रुके और सोचे और समग्र कविता के बारे में तुरत-फुरत कोई फैसला न दे। यह रचनात्मक बाधा शायद एक ऐसी कसौटी है जिस पर हम कविता का श्रेणी विभाजन कर सकते हैं।”

“समकालीन कविता : उत्तरआधुनिक विमर्श” शीर्षक लेख में लेखिका ने संप्रेषणीयता को कविता की मुख्य चुनौती माना है। आज की नई पीढ़ी जिनकी पहुँच विश्व साहित्य तक है और इंटरनेट के माध्यम से विश्व घर जैसा है, की कविताओं के बिंब वैश्विक परिदृश्य से प्रभावित हैं। लेखिका ने कुमार लव की कविता का उल्लेख किया है “प्रोमेथ्यूज़ का कलेजा/ हर रोज़ नोचती चील/ सोचती होगी/ कैसा मूर्ख है यह,/ देवताओं से लड़ता है भला कोई!!” यहाँ प्रोमेथ्यूज़ के बारे में जाने बिना इस बिंब को समझा नहीं जा सकता। दूसरी तरफ वह पीढ़ी है जो आज भी गाँव को याद करते हुए अपने को उस मिट्टी से जुड़ा हुआ पाती है और उनकी कविताओं के बिंब में यह भाव आयातित होता है। लेखिका ने प्रो. ऋषभदेव शर्मा की कविता का उल्लेख किया है “चिकनी पीली मिटटी को/ कुएँ के मीठे पानी में गूँथकर/ बनाया था माँ ने वह चूल्हा/ और पूरे पंद्रह दिन तक/ तपाया था जेठ की धूप में/ दिन दिन भर/ उस दिन/ आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,/ हमारे घर का बगड़/ बूंदों में नहा कर महक उठा,/ रसोई भी महक उठी थी –/ नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था।/ गाय के गोबर में/ गेहूँ का भुस गूँथ कर/ उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से/ और आषाढ़ के पहले/ बिटौड़े में सजाती थी उन्हें/ बड़ी सावधानी से।” आज की युवा पीढ़ी अपने आप को इन कविताओं से तारतम्य बिठाने में सहज नहीं पाती। डॉ. नीरजा ने हालांकि यह नहीं लिखा कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा और कुमार लव पिता-पुत्र हैं लेकिन फिर भी यह न सिर्फ कविता के स्तर पर बल्कि दो पीढ़ियों के बीच आपसी संवाद के स्तर पर भी संप्रेषणीयता के संकट को दर्शाती है। दो चुंबक के ध्रुव जब समान दिशा में हों तो उनमें विकर्षण होता है। कविता और वर्तमान पीढ़ी दोनों ही इस विकर्षण के दौर से गुजर रही है जहाँ संप्रेषणीयता एक बड़ी समस्या है। अगली पीढ़ी तक आते-आते जब दोनों ही पीढ़ी के लोग वैश्विक समझ रखने वाले होंगे तब शायद चुंबक के दोनों ध्रुव आसमान दिशा में हों जाएं और यह दूरी मिट जाए । ‘वक्तव्य प्रधानता’ और ‘अभिव्यक्ति का खतरा’ को लेखिका ने कविता की अन्य चुनौतियों में शामिल किया है।

“नई सदी की कविता का दलित परिप्रेक्ष्य” शीर्षक लेख में लेखिका विभिन्न कविताओं के माध्यम से दलित विमर्श पर चर्चा करती हैं तो “विस्थापन विमर्श : भाषा की आजादी” शीर्षक लेख से महुआ माजी के उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' की समीक्षा करते हुए लेखिका ने विस्थापन के दर्द को उकेरा है। “संताल संस्कृति की संघर्ष महागाथा : बाजत अनहद ढ़ोल” शीर्षक लेख संताल आदिवासियों के संघर्ष को याद करते हुए उनकी समस्याओं को सामने लाने का प्रयास है। किताब का आखिरी लेख “वृद्धावस्था विमर्श” है। जिस तरह जीवन का आखिरी पड़ाव वृद्धावस्था है वैसे ही सभी विमर्शों की चर्चा के बाद लेखिका ने वृद्धावस्था विमर्श की बात की है, हालांकि यह last but not the least है। इस महत्वपूर्ण विमर्श में वृद्ध लोगों के साथ स्नेह और सद्भाव बनाए रखने के आह्वान के साथ लेखिका लिखती हैं “वास्तव में वृद्धों को चाहिए थोड़ा सा स्नेह और आत्मीयता। उन्हें आश्वासन चाहिए कि वे सुरक्षित हैं। बस यही उनकी अपेक्षाएँ हैं।” और इतना तो हम उन्हें दे ही सकते हैं।

जी. नीरजा के इन लेखों को पढ़ते हुए अनायास ही मेरे ज़ेहन में बचपन में की गई रेल यात्रा उभरती है जिसमें खट्टी-मीठी चौकलेट बेचने वाला ‘बारह मसाले तेरह स्वाद’ की आवाज़ लगाता था। ये सभी लेख अलग-अलग समय में लिखे गए हैं इसलिए इनकी अपनी अलग पहचान तो है ही लेकिन इस किताब में संकलित हो जाने और इन्हें एक साथ पढ़ने से पाठक इन लेखों के ‘तेरहवें स्वाद’ से भी परिचित हो सकेंगे। जी. नीरजा अपने लेखों में, स्थापित किताबों के माध्यम से मजबूत तटबंध बनाती हैं और फिर इन तटबंधों के बीच अपनी बात प्रखरता से रखती हैं इस बात से आश्वस्त कि ये तटबंध उन्हें विषयांतर से बचाते हुए अपनी बात रखने की आज़ादी देंगे। लेखिका के शब्दों की सरलता सुनिश्चित करती है कि इन तटबंधों के बीच इनके विचारों का प्रवाह अवरुद्ध न हो। हालांकि यह किताब आधुनिक साहित्य की बात करती है लेकिन इसमें संकलित कई विमर्श हमें इस परिधि से परे देखने का आग्रह करते हैं। अज्ञेय ने भी लिखा “आधुनिक हिंदी साहित्य की परंपरा अथवा उसका परिदृश्य उतना लंबा नहीं है कि कुछ बातों की परीक्षा हम उसी की सीमा के भीतर रहते हुए कर सकें। लेकिन यह बिल्कुल जरूरी भी नहीं है, उचित भी नहीं है, कि हम अपने को उसी सीमा से बांध कर रखें।“ मितभाषी नीरजा, जो बहुत ही कम बोलती हैं, के आसपास शब्दों का सन्नाटा रहता है लेकिन उनके लिखे शब्द राष्ट्रीय परिदृश्य पर कोलाहल मचा रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कोलाहल थमेगा भी नहीं।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की दो पुस्तकें लोकार्पित

हैदराबाद, 19.2.2021 (मीडिया विज्ञप्ति)।

'तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा' का लोकार्पण 


यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित परिसर में विगत 11 फरवरी को डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की दो पुस्तकों ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ और ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए सभा के सचिव श्री जी. सेल्वराजन ने कहा कि एक तेलुगुभाषी लेखिका के रूप में डॉ. नीरजा की उपलब्धियों पर सभा गर्व का अनुभव करती है।

दोनों पुस्तकों का लोकार्पण लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक डॉ. रमेश कुमार पांडेय ने किया। उन्होंने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि हिंदीतरभाषी हिंदी सेवियों ने ही हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया है। उन्होंने आगे कहा कि डॉ. नीरजा की ये दोनों पुस्तकें हिंदी और तेलुगु भाषा-समाजों के बीच सेतु को सुदृढ़ करने वाली हैं।

विशेष अतिथि के रूप में पधारे केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपनिदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने यह जानकारी दी कि विमोचित पुस्तकों में सम्मिलित ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ के लिए लेखिका को केंद्रीय हिंदी निदेशालय से एक लाख रुपए का ‘हिंदीतरभाषी हिंदी लेखक पुरस्कार’ भी प्राप्त हुआ है। उन्होंने इस पुस्तक में शामिल तेलुगु भाषा और साहित्य विषयक सामग्री को भारतीय साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

'कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा' का लोकार्पण

लोकार्पित पुस्तकों की समीक्षा करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ में जहाँ कवयित्री की हिंदी में रचित मौलिक कविताएँ शामिल हैं, वहीं उनके द्वारा किया गया हिंदी, तमिल और तेलुगु के कुछ प्रसिद्ध रचनाकारों की कविताओं का अनुवाद भी सम्मिलित है। उन्होंने बताया कि ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ में जहाँ तेलुगु भाषा और साहित्य के उदय से लेकर इक्कीसवीं सदी तक के विकास को अलग-अलग निबंधों के माध्यम से दर्शाया गया है, वहीं इसमें सम्मिलित 76 तेलुगु साहित्यकारों का ‘परिचय कोश’ इसकी उपादेयता को और भी बढ़ा देता है।

लेखिका का परिचय देते हुए शिक्षा महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. के. चारुलता ने कहा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा बहुभाषाविद लेखिका हैं और उन्होंने साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के सह-संपादक के रूप में साहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बनाई है।

इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और शिक्षा महाविद्यालय, हैदराबाद की ओर से लेखिका का भावभीना अभिनंदन किया गया। 000


- वुल्लि श्रीसाहिती 
304, मेधा टावर्स, राधाकृष्ण नगर
अत्तापुर, हैदराबाद - 500048 

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

जिंदगी को चाहिए दोनों ही – ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’



जिंदगी को चाहिए दोनों ही – ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ 

- प्रवीण प्रणव 

गद्य साहित्य और शोध प्रबंधों के संपादन में गुर्रमकोंडा नीरजा जाना-माना नाम है। यूँ तो नीरजा छिटपुट कविताएँ भी लिखती रही हैं, लेकिन परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद से प्रकाशित कविता संग्रह ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’, उनकी कविताओं का पहला पुस्तकाकार प्रकाशन है। तीन खंडों में संकलित कविताओं में पहला खंड उनकी मौलिक कविताओं का है, दूसरे खंड में तेलुगु से हिंदी में अनूदित कविताएँ हैं और तीसरे खंड में हिंदी से तमिल में अनूदित कविताएँ हैं। नीरजा की मातृभाषा तेलुगु है लेकिन इस संग्रह के तीनों खंड दर्शाते हैं कि हिंदी, तमिल और तेलुगु तीनों पर उनका समान अधिकार है। मैं तमिल और तेलुगु से अनभिज्ञ हूँ तो मेरी समीक्षा उनके मौलिक हिंदी कविताओं तक ही सीमित है। 

पुस्तक की भूमिका में गंगा प्रसाद विमल लिखते हैं कि ‘अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह अपने भाषिक जादू से थोड़ी देर विचलित कर फिर फुर्र हवा में न उड़ जाए।‘ देवी नागरानी ने भी भूमिका में डॉ. किशोर काबरा की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए लिखा है ‘सच्ची कविता की पहली शर्त है कि हमें उसका कोई भार नहीं लगता। जिस प्रकार पक्षी अपने परों से स्वच्छंद आकाश में विचरण करता है, उसी प्रकार कवि स्वांतःसुखाय और लोक हिताय के दो पंखों पर अपनी काव्य यात्रा का गणित बिठाता है।‘ नीरजा की कविताएँ इन सभी पैमानों पर खड़ी उतरती हैं। बिना लच्छेदार भाषा का प्रयोग किए, बिना बिंब और प्रतीक में अपनी बात उलझाए, उन्होंने सरल और सहज भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है और यही वजह है बिना किसी आवरण में लिपटी ये भावनाएँ सीधे हृदय में उतरती हैं। कहीं ये भावनाएँ कोलाहल बन उद्वेलित करती हैं, कुछ करने को तो कहीं ये गहरे सोच में छोड़ जाती हैं, नीरव सन्नाटे की तरह। 

मुझे बालस्वरूप राही की कविता ‘कोलाहल के बाद’ की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं: 

जब कोलाहल में बात नहीं खोती
वह घड़ी हमेशा रात नहीं होती 

सन्नाटा नहीं, तोड़नी है जड़ता
वह चाहे भीतर हो या बाहर हो
रचना है ऐसा वातावरण हमें
काँटों का नहीं, फूल का आदर हो

हमको सूरज की तरह दहकना है
जब तक हर स्याही मात नहीं होती। 

नीरजा की कविताएँ सिर्फ प्रकृति या सौंदर्य वर्णन तक अपने को सीमित नहीं करतीं। ये कविताएँ उनकी आकुलता को, उनकी विवशता को, उनकी आकांक्षा को और उनके सपने को आवाज़ देती हैं। यह आवाज इतनी वास्तविक है, इतनी सरल भाषा में है और इतने गंभीर विषय पर है कि नीरजा की कविताएँ सिर्फ उनकी न रह कर पाठकों की आवाज़ बन जाती हैं और यही इनकी सफलता है। 

‘माँ’ शीर्षक कविता में जब वे लिखती हैं: 

आज वह मेरी राह देख रही है 
मेरा माथा चूमने के लिए तरस रही है 
आखिरी बार मुझसे बात करने के लिए 
आँखों में प्रतीक्षा सँजोए। 

मैं काले कोसों बैठी हूँ 
सात समंदर पार, 
लाचार। 

मन तो कभी का पहुँच चुका उसके पास, 
तन काट नहीं पा रहा 
परिस्थिति का पाश। 
उदास हूँ। 
दास हूँ न ? 
स्वामी की अनुमति नहीं! 

इन पंक्तियों में नीरजा सिर्फ अपने भावों की अभिव्यक्ति नहीं करतीं, वरन न जाने कितनी महिलाओं की आवाज़ बन जाती हैं जो चाह कर भी अपने माता-पिता के लिए तब उपलब्ध नहीं हो पाती जबकि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। 

नीरजा अपनी कविताओं में संबंधों और उनसे जुड़े भावनाओं का ताना-बना बुनती हैं। ‘बेटी वाली माँ’ कविता में तीन पीढ़ियों से एक सी ही समस्या को रेखांकित करते हुए वे लिखती हैं: 

आज तक काट रही हो तुम 
बेटी जनने की सज़ा 
बिना उफ़ किए। 
पर मैं कराहती हूँ कभी जब दर्द से 
मुझे अपने गोद में लेकर 
सींच देती हो आँसुओं से मेरा माथा। 
आँखों-आँखों में देती हो नसीहत – 
‘बेटी की माँ हो, कमजोर मत पड़ना!’ 

नीरजा अपने पिता से बहुत प्रभावित रही हैं। अपने पिता को समर्पित कविता में वे लिखती हैं: 

काल को पीछे धकेलते 
जिजीविषा से भरे 
तुम ही तो हो सच्चे योद्धा 
धरती के सुंदरतम पुरुष, 
मेरे पापा ! 

नीरजा ने एक बेटी, एक माँ, एक पत्नी सबका धर्म निभाया है इसलिए इनकी कविताएँ भी इस सभी संबंधों को अपने अंदर आत्मसात करती हैं। समाज में छोटी बच्चियों के साथ हो रहे अनाचार पर ‘माँ नीरजा’ व्यथित हो कर लिखती हैं: 

जब कभी किसी नन्ही गुड़िया को देखते हैं 
बेसाख्ता चीख उठते हैं – 
‘गुड़िया घर से बाहर न जा 
यह समाज तेरे लिए नहीं बना है 
बाहर न जा 
तुझे नोचकर खाने के लिए गिद्ध इंतज़ार कर रहा है 
तू बाहर न जा।‘ 

प्रेम के कई रंग होते हैं और नीरजा ने प्रेम के कई आयाम अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किए हैं। सबसे पहले तो प्रेम में होने की जो मधुर अनुभूति है उसे बड़ी खूबसूरती से बयाँ करते हुए अपनी कविता ‘रेशमी स्पर्श’ में लिखती हैं: 

मेरी देह पर तैरती तुम्हारी उँगलियाँ 
मन के तार को छेड़ गई 
एक रेशमी स्पर्श ने जगा दी 
रोमरोम में नई उमंग 
तुमने जब-जब मुझको छुआ 
तब-तब तन-मन में ऊर्जा का संचार हुआ 

और में पागल हो गई ! 
लोक-लाज खो गई !! 

जब प्यार होता है तो मन में प्यार धीरे-धीरे घुलता है और ये उन खामोशियों की जगह लेता जाता है जो वर्षों से मन में घर कर गई होती हैं और भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं होने देतीं। अपनी कविता ‘निःशब्द’ में प्यार में होने के खुशनुमा एहसास को आवाज़ देती हुई लिखती हैं: 

उस अनुभूति को व्यक्त करने के लिए 
शब्द नहीं हैं 
मौन का साम्राज्य है चारों ओर 
भीतर तो तुमुलनाद है 
भीगी हूँ प्यार में 

जब प्यार होता है तो साथ ही होता है उस प्यार में नोक-झोंक। ये नोक-झोंक कई बार प्यार को पटरी से उतार देते हैं तो कई बार इनसे प्यार और मजबूत होता है। प्यार के नोक-झोंक में जरूरी है अहं का न होना। नीरजा अपनी कविता ‘संधिपत्र’ के माध्यम से दिखलाती हैं कि नोक-झोंक के बाद वापस प्यार को पटरी पर लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। 

चाहूँ तो तुम्हारी तरह मैं भी 
कोस सकती हूँ सारी दुनिया को 
पर ऐसा भी क्या गुस्सा 
कि जीवन बीत जाए, गुस्सा न बीते। 

इसलिए भेजा करती हूँ हर सुबह 
तुम्हारे लिए दोस्ती के गुलाब। 

तुम विजेता हो – चिर विजेता; 
मैं पराजित हूँ – प्रेम में पराजित। 

कभी तो मैं बनकर देखो........... 

प्यार कई बार वह मोड़ नहीं लेता जो हम चाहते हैं। प्यार में होना जितनी सुखद अनुभूति है उससे कहीं ज्यादा दुखद है दिल का टूटना। प्यार में होना आवाज़ देता है भावनाओं को लेकिन दिल का टूटना भावनाओं का उबाल लाता है दिल के अंदर लेकिन जुबाँ खामोश रहती है। ऐसे में बहुत मुमकिन है टूट जाना लेकिन नीरजा अपनी कविता में दुहराती हैं कि दिल का टूटना अंत नहीं। अपनी कविता ‘आशियाना’ में वे इस टूटन के बाद के संकल्प को दर्शाती हैं ये कहते हुए: 

उसके लिए मैंने सारी दुनिया से टक्कर ली 
लेकिन उसने मुझे बैसाखियों के सहारे छोड़ दिया। 

हवाओं से लड़ता रहा देर तक मेरा घोंसला 
बिखर गया मेरा सपना । 
पर मैं नहीं बिखरी। न बिखरूँगी। 
एक-एक तिनका जोड़कर 
फिर बनाऊँगी अपना आशियाना, 
सजाऊँगी-सँवारूँगी। 

नीरजा अपनी कविताओं को सिर्फ अपनी आवाज़ नहीं बनाना चाहतीं। उनकी कविताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे उन सभी औरतों की आवाज़ बनें जो इन हालात से गुज़रती हैं और जब अपनी कविता ‘तपिश’ में वो लिखती हैं: 

मेरी चाभी मुझे दे दो 
रोक दो अब तो चाबुक 
चाहती हूँ मैं 
मैं बन कर जीऊँ 
सदियों तक 

सदियों तक जीने की कल्पना नीरजा की अपने लिए नहीं हो सकती, वे आज़ादी की तलबगार हैं सभी औरतों के लिए जो किसी बंधन में फँस कर अपनी आकांक्षाओं को दबा देती हैं, वे हर संभव प्रयास करती हैं कि ख़ुद पर हुए ज़ुल्म के बाद भी किसी तरह साथ बना रहे। लेकिन ज़ुल्म सहने की भी एक सीमा होती है और इस सीमा के बाद होती है आज़ादी की ख़्वाहिश। 

डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने नीरजा के परिचय में लिखा है, उनके पिता साहित्यकार थे, उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन किया। साथ ही वे आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता श्री एन० टी० रामाराव के पी० आर० ओ० के रूप में कार्यरत रहे। नीरजा ने साहित्य और राजनीति का ये सम्मिश्रण बचपन से देखा और ये उनकी कविता में भी परिलक्षित होता है। अपनी कविता ‘राजनीति’ में नीरजा लिखती हैं: 

लोग अकसर कहते हैं 
राजनीति एक खेल है 
पर मेरे पापा कहते हैं 
यह एक कमर्शियल फिल्म है 

और इसी कविता के अंत में लिखती हैं: 

इस फिल्म के बारे में खूब सुना है 
लेकिन देखने के लिए सेंसर का कहना है 

- ‘ओनली फॉर क्रिमिनल्स’। 
- ‘भले मानुषों का प्रवेश वर्जित’। 

साहित्य में आने से पहले नीरजा ने विज्ञान की पढ़ाई की, माइक्रोबायोलॉजी में उन्होंने बी० एससी० किया और एक वर्ष तक अपोलो अस्पताल में कार्यरत रहीं। उनका ये अनुभव उनकी कविता ‘दर्द’ में दिखता है: 

मैंने 
दर्द को दबाने की कोशिश की 
वह गिद्ध बन 
मेरा शिकार करता रहा 

मैंने 
उससे छुटकारा पाने के लिए 
स्लीपिंगपिल्स लीं 
ट्रैंक्विलाइज़र लिए 
और न जाने क्या क्या लिया 
पर वह इम्यून हो गया। 

आज 
मैं सोचती हूँ – 
यदि सीने में यह दर्द नहीं होता 
तो मेरा क्या होता। 

नीरजा ने इस संकलन में कुछ अच्छे हाइकु भी लिखे हैं। सीमित शब्दों में विभिन्न विषयों पर लिखे हुए हाइकु प्रभावित करते हैं। 

कन्या भ्रूण ने 
लगाई है गुहार 
मुझे न मार। 

टेसू फूले हैं 
बौराया यह मन 
आया फागुन। 

अलमारी में 
किताबों का ढेर है 
निद्रा में लीन। 

नुकीला काँटा 
धँसा पाँव में मेरे, 
रोये तुम थे। 

कच्ची मिट्टी हूँ 
आकार दो हाथों से 
ढल जाऊँगी। 

अपनी कविता ‘सीखना’ में उन्होंने अपने गुरुओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए लिखा है: 

तुमसे सीख ही लिया मैंने 
तुमुल कोलाहल के बीच सन्नाटे को जीना; 
सन्नाटा जो कविता है – 
कविता जो जीवन है ! 

लेकिन मेरी ख़्वाहिश है कि नीरजा न सिर्फ सन्नाटे को जीना सीखें बल्कि कोलाहल को भी अपनाए रखें। न तो सन्नाटे की कोई सीमा है, न ही कोलाहल की, लेकिन जरूरी है कि हम इन दोनों में सामंजस्य बनाए रखें और इनसे सीखते रहें। मुझे राजेश रेड्डी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं: 

दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और 
छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और 
कोई अंत नहीं मन के सूने-पन का 
सन्नाटे के पार है इक सन्नाटा और। 

इस पहले कविता संग्रह के लिए गुर्रमकोंडा नीरजा को बहुत बहुत शुभकामनाएँ। 


समीक्षित कृति : कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा (कविता)/ गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2019/ नजीबाबाद : पारिलेख प्रकाशन/ वितरक : श्रीसाहती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल - +91 9849986346

- प्रवीण प्रणव 
सीनियर प्रोग्राम मैनेजर, माइक्रोसॉफ़्ट 
B-415, गायत्री क्लाससिक्स 
लिंगमपल्ली, हैदराबाद 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

(पुस्तक समीक्षा) जो कविता है !

 पुस्तक समीक्षा
जो कविता है ! 
- प्रो. गोपाल शर्मा 

यदि आप मेरे इस आलेख को किसी पढ़े-लिखे का समझकर पढ़ रहे हैं और गुर्रमकोंडा नीरजा को नहीं जानते तो मेरी बेशकीमती सलाह है – आप पहले इस कविता-संग्रह (कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा. गुर्रमकोंडा नीरजा. 2019. नजीबाबाद : पारिलेख प्रकाशन) का परिशिष्ट पढ़ें। डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने “नत नयन, प्रिय कर्मरत मन नीरजा” शीर्षक से सुसज्जित करके 2014 में इसे लिखा था। आप जानते हैं 2014 और 2019 में अंतर है। अब नीरजा जी का मुकुल भी इस ‘थैंकलेस’ जमाने में अच्छे दिनों की मानिंद खिल उठा है। उन्हें वह स्थान अब मिल गया है जिसकी वे मुस्तहक हैं। लखटकिया पुरस्कार और वह भी केंद्रीय हिंदी निदेशालय से, यह हुई न कोई बताने वाली बात! 

‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ नीरजा की विविध काव्यात्मक अभिव्यक्तियों का गुलदस्ता है जिसमें किसिम किसिम के फूल हैं; कुछ मौलिक कविताएँ, कुछ अनूदित (तेलुगु और तमिल से)। बड़े अरमानों से रक्खा गया यह कदम बड़े लोगों के द्वारा सराहा गया है – अभी यह शुरूआत है (गंगा प्रसाद विमल) और अनूठे काव्य संग्रह की हर रचना मन को उकेरती है (देवी नागरानी)। 

कवि लोग होते बहुत उस्ताद हैं, कहते हैं वे कुछ कोलाहल और कुछ सन्नाटे की कविता लेकर आए हैं। मुगम्बो खुश हुआ – जब से गाँव से नाता टूटा है – किसी ब्याह बरात में बूँदी के लड्डू के साथ ‘सन्नाटा’ पीने का मौका ही नहीं मिला। पहले तो कोई अब बुलाता नहीं, दूसरे अब कोई जा नहीं पाता, तीसरे ‘सन्नाटा’ अब मिलता नहीं। जो है वह हलाहल सा कोलाहल है । 

भवानी भाई ने कहा था - मैं सन्नाटा हूँ, फिर भी बोल रहा हूँ। कहना न होगा कि इस कविता संग्रह की कविताएँ बोलती हैं – कुछ कोलाहल भी है और कुछ उद्वेग भी। और अनुवाद को चाहे कविता के शिल्प में कहने वाले – कविता कहाँ अनुवाद है – कहते रहें, फिर भी उन्हें नीरजा का शुक्रगुजार होना होगा क्योंकि उन्होंने अनुवाद करके एक नई रचना को जन्म दिया और अनुसृजन पीड़ा का भार भी वहन किया। कवि की कविता तभी सही अर्थों में कालजयी होती है जब वह किसी अनुवादक के माध्यम से काल-जायी होने का सौभाग्य प्राप्त कर सके। यह जोड़ देना जरूरी है कि इन कविताओं के अनुवादक के रूप में कविताओं को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान का सजग प्रयोक्ता और लेखक मिला इसलिए यह नवसृजन है। कृष्ण पर देवकी से अधिक यशोदा का अधिकार हो जाता है। 

यदि मैं इन कविताओं के कथ्य को प्रस्तुत कर दूँगा तो पाठकीय आनंद में बाधक बनूँगा। फिर भी इतना तो कहना ही होगा – कोख में अपने रक्त मांस से सींचकर कवि ने कविता को जन्म दिया और इस बेटी वाली माँ ने स्त्री-मन को विवेचित ही नहीं विरेचित और विकसित भी किया है। यह विवेचन ऐमिली डिकिन्सन सी संक्षिप्तता और मार्मिकता की अभिव्यक्ति कवयित्री नीरजा से करा ले गया है और इस कोलाहल में उन्हें पता भी नहीं चला। यही खूबसूरती है इस सिरजन की – कच्ची मिट्टी हूँ / आकार दो हाथों से / ढल जाऊँगी। 

इस प्रकार से प्रस्तुत संस्करण की कविताएँ एक तरफ तो सन्नाटे को कविता के शिल्प में पिरोकर जीवन के तुमुल कोलाहल को जीने की सीख हैं, दूसरी तरफ उनका ‘बोम्मै-पसु-अडिमै’ और ‘अन्ना पिरवै’ है (!)। एक पक्ष और भी है जो गौरय्या, चिड़िया, पंखुड़ी, पंख, गाय, थन आदि का तमिल-तेलुगु पाठ रचकर हिंदी के पाठकों को जिज्ञासु बनाता है। दूसरी तरफ इस पट्टी के लोगों को हिंदी पट्टी के लोगों से मिलवाता है। समझ में आ जाता है कि सरोकार एक ही है, सरकार अलग होने के बावजूद। 

ग्लोत्फेल्टी (Glotfelty) ने कुछ वर्ष पूर्व साहित्य और उसके फिजिकल एनवायर्नमेंट के संबंध के मद्देनजर उत्तर-आधुनिक समीक्षा करने का विचार प्रस्तुत किया था। इस पुस्तक का एक पाठ उन ‘गिद्धों, शिकार, आग, बसंत, तितली, पंछी, डालियाँ और फूलों’ को लेकर भी होगा। पर उसके लिए मुझे उत्तर-आधुनिक का बाना पहनना पड़ेगा। फिर कभी, इत्यलम।

समीक्षित कृति : कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा (कविता)/ गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2019/ नजीबाबाद : पारिलेख प्रकाशन/ वितरक : श्रीसाहती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल - +91 9849986346

- प्रो. गोपाल शर्मा 
प्रोफेसर, अरबा मिंच विश्वविद्यालय 
अरबा मिंच, इथियोपिया 
prof.gopalsharma@gmail.com 

अवनी पर अमन कायम हो

अवनी पर अमन कायम हो

डॉ. चंदन कुमारी 

कुछ कोलाहल कुछ सन्नाटा  गुर्रमकोंडा नीरजा
2019/ परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
150 रुपये 

डॉ. जी. नीरजा (1975) प्रतिष्ठित रचनाकार और समीक्षक होने के साथ ही अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान और तेलुगु साहित्य के इतिहास की जानी मानी विदुषी हैं। ये द्विभाषी मासिक पत्रिका‘स्रवंति’के सह संपादक तथा मासिक पत्रिका‘शोधादर्श’के संयुक्त संपादक की महती भूमिका का निर्वाह भी कर रही हैं। ये अनुवादक के रूप में तेलुगु, तमिल और हिंदी के साहित्य को समृद्ध करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। इनकी हिंदी सेवा के लिए इन्हें केंद्रीय हिंदी निदेशालय, युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (नई दिल्ली), परिलेख कला समिति (नजीबाबाद) तथा अन्य संस्थाओं से सम्मानित किया गया है। 

साहित्य अपने हर रूप में जीवन और जगत की छवि ही उकेरता है - कभी वीभत्स, कभी शांत, कभी रोमांच से भरा और कभी कल्पनाओं की सुंदर दुनिया का सपना जो हर खौफ से आजाद और सबके लिए महफूज हो – इन सबसे ही साहित्य उदित होता है! जीवन केवल संगीत की सुरीली तान सा सरस किसी का नहीं होता। सबके जीवन में सुकून के साथ कोलाहल और सन्नाटे के लिए पर्याप्त जगह होती है। डॉ. जी. नीरजा के काव्य संग्रह ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ (2019) की कविताएँ अपनी समग्रता में जीवन संघर्ष की सपाटबयानी है। कवयित्री की इच्छा इस धरा पर शांति की स्थापना करने की है। पर यह अमन कायम कैसे हो? महानगरीय सभ्यता में अपने आप तक सिमट कर रहनेवाले लोग कोलाहल और सन्नाटे के आदि हो चुके हैं। शांति से उनका वास्ता भंग हो चुका है। ऐसे में प्रेम और शांति कायम करने की चाह रखते हुए कवयित्री की चिंता है कि इस ‘स्व’ के संकुचित दायरे का विस्तार कैसे करें! उनके शब्दों में, “टूटे दिलों को जोड़कर / ऊँच नीच की दीवार तोड़कर / अपनी तकदीर रचें कैसे?/ इस आक्रमण से बचें कैसे?” (यही है महानगर, पृ.29) । 

बार-बार संघर्ष में मात खाने पर जो टूट जाए वह आज की नई स्त्री नहीं। ‘आशियाना’ कविता हिम्मतवाली नई स्त्री का चित्र है। स्त्री विमर्श कवयित्री का प्रिय विषय रहा है। स्त्री जीवन और संघर्ष से जुड़ी कई कविताएँ इस संग्रह में हैं, जैसे –‘हक की लड़ाई’, ‘स्त्री’, ‘खतरे में बेटियाँ’, ‘गर्भ से’ इत्यादि। ‘एक ही तत्व’ और ‘मेरे साजन’ जैसी कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति है। प्रेम दुनिया का सबसे सुंदर पक्ष है तभी ‘विरेचन’ कविता के माध्यम से वे संदेश देती हैं कि क्यों न प्रेम उन सबसे भी किया जाय जिनका प्रिय कार्य निरंतर आपको कोसना हो। चौरासी योनि में भटकने के बाद जो मानव जन्म मिला है। उसे क्यों क्रोध में जलाकर राख़ करना! ‘संधिपत्र’ कविता का एक अंश यहाँ द्रष्टव्य है, “पर ऐसा भी क्या गुस्सा/ कि जीवन बीत जाए, गुस्सा न बीते। ... तुम विजेता हो – चिर विजेता;/ मैं पराजित हूँ – प्रेम में पराजित ।/ कभी तो मैं बनकर देखो।” (पृ॰ 46)। प्रेम का यह संधिपत्र जो दो जन के बीच का करार है क्यों न इस करारनामे पर सबके हस्ताक्षर हो ताकि सच में ‘अवनी पर अमन कायम हो’।

दुनिया में हो रहे अत्याचार पर कवयित्री की नजर है और वे अत्याचारियों को शांतिपूर्ण चेतावनी के लहजे में कहती है, “सारे शिकार एकजुट हो रहे हैं,/ तुम्हारे खिलाफ बगावत तय है!” (खबरदार, पृ.50)। ऐसा होता तो अच्छा था पर शिकार शिकारी के डर से त्रस्त अपनी चोट को एक–दूसरे से छिपाए रखते हैं। इन मुट्ठी भर शिकारियों ने पूरी मानव जाति को आतंकित कर रखा है। एकजुटता के इस अभाव को भरना होगा! कब तक आतंक से दहलते रहेंगे! कब तक जीवित ही मरते रहेंगे! यह घुटने का सिलसिला केवल बाहर ही नहीं है, घर में भी चलता है। संग्रह की कविता ‘तपिश’ की कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं, “बुना तो था प्यार का घोंसला/ बन गया जाने कब/ बिना दरवाजों का अँधेरा तलघर।/ रिश्ते कफन बन गए/ घर चिता।/ मैं झुलसती रही/ इस आग में।” (पृ56)। ‘चमड़ा’ कविता भी अत्याचार की कहानी कहता है। प्रस्तुत है एक अंश, “लेकिन अत्याचार का इतिहास/ लिखा जाता है/ आज भी/ चमड़े पर ..../ चमड़ा पशुओं का,/ चमड़ा मनुष्यों का -/ औरतों और बच्चों का/ किसानों और मजदूरों का।” (पृ.64)। अत्याचार से त्रस्त मानव का धैर्य छूटना लाजिमी है पर कवयित्री ने इस छूटते हुए धैर्य को गुरु कहा है – “निरंतर छूटता धैर्य ही गुरु है/ तुमसे सीख ही लिया मैंने/ तुमुल कोलाहल के बीच सन्नाटे को जीना।” (सीखना, पृ 72)। 

इस संग्रह में होली के हाइकु के साथ कुछ अन्य त्रिपदी भी हैं। टैलेंट जो शिक्षा और तकनीक के सीमित अर्थ में प्रायः प्रयुक्त होता है उसका विस्तार मिट्टी की दुनिया तक दिखाते हुए कवयित्री कहती हैं, “खून टपकती अंगुलियों से/ टोकरियाँ बनाना टेलेंट है,/ कच्ची मिट्टी को आकार देना टेलेंट है।” (पृ. 33)। यह सच है वास्तविक टैलेंट वही है जो आत्मनिर्भर जीवन जीने में सहायक हो। कागज के मोटे पुलिंदों के साथ सड़क पर भटकाने वाली शिक्षा के पक्षधर बापू भी कहाँ थे! अक्षर ज्ञान आवश्यक है पर हुनर उसके समकक्ष आवश्यक है। इंसान की योग्यता का प्रमाण उसका ओहदा नहीं उसकी कर्मठता है।

कवयित्री ने अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग किया है। उनका यह प्रयोग उनकी कविताओं में उनके शब्द प्रवाह को और गतिमान करता है और संदर्भ के उपयुक्त जान पड़ता है। इस प्रयोग से हिंदी का स्वरूप बोझिल नहीं हुआ है। इसमें अंग्रेजी शब्दों का हिंदीकरण करते हुए उनकी सहज ग्राह्यता झलकती है। इस काव्य संग्रह के अंत मे कालोजी नारायण राव की तेलुगु से हिंदी में अनूदित कविताएँ हैं। उन कविताओं के शीर्षक हैं – ‘एक और महाभारत, इच्छा, विडंबना, वोटों का क्या कहना, झूठी प्रशंसा, मुझे क्या हुआ इत्यादि। इसके बाद प्रो. ऋषभदेव शर्मा की हिंदी से तमिल में अनूदित कविताएँ हैं जिनके शीर्षक हैं –‘गुड़िया – गाय – गुलाम’, ‘मुझे पंख दोगे’ और ‘प्यार’। इसी क्रम में डॉ. कविता वाचक्नवी की कविताओं का तमिल अनुवाद है। और सबसे आखिर में ‘नत नयन प्रिय कर्म रत मन’ निराला के इन शब्दों से कवयित्री को सुशोभित करता हुआ डॉ. पूर्णिमा शर्मा का वक्तव्य है जिसमें उन्होने कवयित्री के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला है। आरंभ में डॉ. गंगा प्रसाद विमल एवं देवी नागरानी द्वारा पुस्तक पर पूर्ण प्रकाश डाला गया है। इस कृति के पुरोवाक लेखक डॉ. गंगा प्रसाद विमल अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

डॉ. चंदन कुमारी 
हिंदी विभाग
ए के दोशी महिला महाविद्यालय
 जामनगर 
08210915046