कार्यशाला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कार्यशाला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

బాల్యం


బాల్యం…

పొద్దున్నె వెలుతురు లాంటిదీ,

పిచ్చుక గీతంలా అమాయకమైంది.

చిన్న పాదాల్లో పెద్ద కలలు,

చిరునవ్వులో చిలకరించే వెలుగు.


మట్టితో కోటలు కట్టి

లోకాన్నే గెలిచేసే వయసది—

బాల్యం…

జ్ఞాపకాల్లో నిత్యం పూసే

అందమైన 

మొదటి పువ్వు.

बुधवार, 17 जून 2015

खोज

बालकनी में बैठकर
आसमान को ताकना कितना भला लगता है!
अभी कल की ही बात है,
काले काले बादलों को देख
रोमांचित हो उठी थी मैं.

अचानक बिजली चमक उठी
कभी दाएँ - कभी बाएँ.
मेरा दिल धड़क सा गया.
तुम्हें ढूँढ़ने लगी.
ढूँढ़ने से तुम कभी नहीं मिलते,
कल भी नहीं मिले.

तुम ठहरे बादल
कभी यहाँ बरसे कभी वहाँ
कभी धरती की प्यास बुझाई
कभी पर्वत शृंखलाओं से खेले

वर्षा थम गई
आज वातावरण शांत है
धूप खिल आई है
मेरा मन भरा है कोलाहल से
तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ हर दिशा में
ढूँढ़ने से तुम कभी नहीं मिलते,
आज भी नहीं मिले!

बगिया फूल उठी है
मैं तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ
भँवरा कलियों पर मंडरा रहा है
फूलों का रस पी रहा है.
यह तुम्हीं तो नहीं?
तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ
गली-गली कली-कली
ढूँढ़ने से तुम कभी नहीं मिले.
कभी तो मिलो -
खुद ढूँढ़कर! 

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

కీలుగుఱ్ఱం

అనగనగా ధర్మపురి పట్టణాన్ని ధర్మంగూడను రాజు పరిపాలించేవాడు. ఒక రోజు రాజు తన మంత్రితోపాటు వేటకి బైలుదేరాడు. ఆ రోజు నిరాశే చవిచూశాడు. అలిసిపోయిన రాజు సేద తీర్చుకోవడం కోసరం ఓ నది ఒడ్డుకు చేరాడు. అక్కడ ఓ అందమైన అమ్మాయిని చూసి మనసు పడ్డాడు. ఆ అమ్మాయి తండ్రి దెగ్గరికి తన రాజభటులను పంపించాడు. ఆగ్రహించిన ఆమె తండ్రి రాజభటులతో ఇలా అన్నాడు – ‘పెళ్లి ఎవరికి? మీకా మీ రాజుకా? స్వయంగా వచ్చి అడగలేని వాడికి పెళ్ళెందుకు?’ ఇది విన్న రాజుకు కోపం వచ్చింది. కాని మంత్రి రాజుకు నచ్చచెప్పడంతో రాజు స్వయంగా వెళ్లి ఆ పిల్ల తండ్రిని అడగటంతో వారి వివాహం జరిగింది. కొత్త రాణితో పాటు రాజు తన రాజ్యానికి తిరిగి వెళ్ళాడు. కొత్త రాణిని చూసి మిగతా ముగ్గురు రాణులు ఈర్ష్యాసూయలతో మండిపడ్డారు. 

కొన్ని నెలలకు చిన్న రాణి గర్భం ధరించింది. పొరుగూరు వెళ్తూ రాజు ముగ్గురు రాణులను పిలిచి చిన్న రాణిని జాగ్రత్తగా చూసుకోమని చెప్పాడు. రాణికి కొడుకు పుడితే రాజుతో పాటు రాజ్య్యంకూడా చేయి జారిపోతుందని భయపడి పుట్టిన పసికందును చంపేయమని భటులకు ఆజ్ఞాపించారు. భటులు రాకుమారుడుని చంపలేక అడవిలో వదిలేసి రాజ్యానికి తిరిగి వచ్చేసారు. పోరుగూరునుంచి తిరిగి వచ్చిన రాజుకు చిన్న రాణికి ముసలం పుట్టిందని చెప్పారు. 

కాలం గడిచిపోతుంది. ఒక రోజు రాజభవనంలోకి చొరబడ్డాడని ఓ చిన్న పిల్లవాడిని భటులు బందించి రాజుగారిముండు హాజరుపరిచారు. ప్రశ్నించగా ఆ పిల్లవాడు రాజుతో ఇలా అన్నాడు – ‘నా గుర్రానికి దాహం వేస్తె నీళ్ళకోసం వెతుకుతూ ఇక్కడకి వచ్చాను.’ ఇది విన్న రాజు ఆ పిల్లవాడిని ఆశ్చర్యంగా చూసి ‘కీలుగుఱ్ఱం నిళ్ళు త్రాగుతుందా!’ అని అడిగాడు. దానితో ఆ పిల్లవాడు అన్నాడు – ‘ఈ రాజ్యంలో ఏమైన జరగవచ్చు. రాణికి ముసలం పుట్టగాలేనిది నా కీలుగుఱ్ఱం నీళ్ళు ఎందుకు త్రాగలేదు!’ అని అన్నాడు. ఇది విన్న రాజు ఆరా తీయగా నిజం తెలిసింది. తన కుమారుడుని అక్కున చేర్చుకొని రాజ్యాభిషేకం చేసాడు. 

बुधवार, 22 जनवरी 2014

FEELINGS

Sometime before
Trees dozed and were motionless
Wind disappeared
Your memories stroked my thoughts
Your whisper lingered in my ears
Some-sort of anxiety smouldered in me
Trees spread their branches
Blossoms spread delicate fragrance
Breeze became soothing
A strong feeling aroused in me. 

तुम ... ?


कौन हो तुम?
कौन हूँ मैं?
एक हुए इस अनंत विश्व में

तुम नहीं जानते
कि मेरे लिए तुम क्या हो!

मेरे हृदय की पुकार हो तुम
मन की  प्यास बुझाने वाले हो तुम
मुझे मुझसे मिलाने वाले हो तुम

                                                     तुम नहीं मिलते तो ...... ? 

बुधवार, 21 अगस्त 2013

प्रो. ऋषभदेव शर्मा की हिंदी कविताओं का तमिल अनुवाद -1

अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2011/  INR 250/=
आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.
गुड़िया–गाय–गुलाम (मूल : ऋषभ देव शर्मा)

परसों तुमने मुझे
चीखने वाली गुड़िया समझकर
जमीन पर पटक दिया
और पैरों से रौंद डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की.

कल तुमने मुझे
अपने खूँटे की गाय समझकर
मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी
और मेरे थनों को दुह डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की.

आज तुमने मुझे
अपने हुक्म का गुलाम समझ कर
गरम सलाख से मेरी जीभ दाग दी है और अब भी चाहते हो
मैं कोई शिकायत न करूँ

नहीं!
मैं गुड़िया नहीं,
मैं गाय नहीं,
मैं गुलाम नहीं!! 
(देहरी: 2011: पृष्ठ1)


तमिल अनुवाद (नीरजा)

போம்மை-பஸு-அடிமை 


ரொம்ப காலமாய நீ ஏந்நை
சத்தமபோடும் பொம்மை என்று நிநைத்து
தீரையில நிர்லாக்ஷ்யமாஈ விஸிரிநாய
காலால மிதைத்தாய ஆநாலும நாந வாய் அஸைக்யவில்லை.

நேட்ரு நீ ஏந்நை
உந கம்புக்கு கட்டிய பஸு என்று நிநைத்து 
ஏந காலில கயிரை மாட்ரீநாய
ஏந பால மடியை கரைத்திநாய ஆநாலும நாந வாய் அஸைக்யவில்லை.

இன்று நீ என்னை
உன் அடிமை என்று நினைத்து
ஏன் நாக்கை இரும்பு ஈட்டியால் ஸுட்ரிவிட்டாய ஆனாலும் நீ நினைக்கிறா
நான் வாய் அசைக்யமாட்டேன் என்று! 

இல்லை!
நான் பொம்மை இல்லை!
நான் பசுவும் இல்லை!! 
நான் அடிமை இல்லை!!!


हिंदी लिप्यंतरण


बोम्मै-पसु-अडिमै


रोंभ कालमाय नी एन्नै 
चत्तमपोडुम बोम्मै एंड्रु निनैत्तु 
तिरैयिल निर्लाक्ष्यमाई विसिरिनाय 
कालाल मिदैत्ताय आनालुम नान वाई असैक्यविल्लै. 

नेट्रु नी एन्नै 
उन कम्बुक्कु कट्टिय पसु एंड्रू निनैत्तु 
एन कालिल कयिरै माट्रीनाय 
एन पाल मडियै करैत्तिनाय आनालुम नान वाई असैक्यविल्लै. 

इंद्रु नी एन्नै 
उन अडिमै एंड्रु निनैत्तु 
एन नक्कै इरुम्बु ईट्टीयाल सुट्रिविट्टाय आनालुम नी निनैक्कराया 
नान वाई असैक्यमाटेन एंड्रू ! 

इल्लै ! 
नान बोम्मै इल्लै ! 
नान पसुवुम इल्लै !! 
नान अडिमै इल्लै !!!



शुक्रवार, 17 मई 2013

निःशब्द



उस अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए
शब्द नहीं हैं
मौन का साम्राज्य है चारों ओर
भीतर तो तुमुलनाद है
भीगी हूँ प्यार में 

रेशमी स्पर्श

मेरी देह पर तैरती तुम्हारी उँगलियाँ
मन के तार को छेड़ गईं
एक रेशमी स्पर्श ने जगा दी
रोम रोम में नई उमंग
तुमने जब जब मुझको छुआ
तब तब तन-मन में ऊर्जा का संचार हुआ

......

और मैं पागल हो गई! 

रविवार, 12 मई 2013

अंकुरण

मैं तो बीज
वर्षों से प्रसुप्त चिर निद्रा में

तुमने मुझे जगाने की कोशिश की
सींच दिया अमृत की धार से
फूट पड़ा अंकुर अनायास ही

प्यार  से पोसा
बेल बढ़ती गई
पल्लवित हुई
पुष्पित हुई

कौन देता मुझे पहचान मेरी
तुम न आते तो

लू चल रही है

हवा गरम है
तन भी
मन भी.

तरस रही हैं आँखें -
तुम आते क्यों नहीं?

मन मचल रहा है -
कहाँ रह गए मीत?

शनिवार, 11 मई 2013

प्यार की खातिर


प्यार की खातिर मैं
तुम्हारी हमदर्द बनी
हमराज बनी
बदले में तुमने सरेआम मुझ पर
कीचड़ उछाला

तुम्हारे हर झूठ पर मैंने परदा डाला
बदले में तुमने मेरे सारे चीर हर लिए

तुम्हारे भीतर जीने की आस जगाई मैंने
बदले में तुमने मुझे मौत के मुख में धकेल दिया!!

धोखा


मैंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया
पर तुमने दोस्त बनकर दुश्मनी निभाई
मुसीबत के वक्त मैंने तुम्हें सहारा दिया
पर तुमने पीछे से मुझी पर वार किया

तुम्हें अपना समझ दर्द का घूँट पी लिया मैंने
फिर भी तुमने मुझे लहूलुहान किया

नादान समझकर हर बार  माफ किया मैंने
तुमने बेवकूफ समझ मेरा गला घोंट दिया

अब मैं भूत हूँ!
दोस्ती का भूत!!

रविवार, 5 मई 2013

हरजाई

मैंने तुमसे प्यार किया
सब अपनों को त्याग दिया
तुम्हारे घर आँगन को अपनाया
सब सपनों को त्याग दिया.
मैंने अपनी हँसी तुम्हें दे दी,
 तुमने मुझे क्या दिया?

चार जगह मुँह झूठा किया
मेरी भावनाओं को झुठला दिया.
पहले तो मेरी आत्मा को  मार डाला
ज़िंदा लाश बना दिया;
फिर मंगलसूत्र की दुहाई देकर
मेरे तन को भी नोच डाला!

कब तक खेलोगे इस ज़िंदा लाश से !!

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

कोलाहल


चिडियाँ चहक रही हैं
बगियाँ महक रही हैं.
बच्चियों की हँसी से
खिलखिला रहा है आँगन
खुशी से घर की आँखें थिरक उठी हैं.

तपिश


तप रहा है बदन
तप रहा है मन
युग युगों से
तुम्हारी कैद में
सोने के पंजरे में

बुना तो था प्यार का घोंसला
बन गया जाने कब
बिना दरवाजों का अंधेरा तलवार.

रिश्ते कफन बन गए
घर चिता.

मैं झुलसती रही
इस आग में.

नचाते रहे तुम
नाचती रही मैं.
कभी चाभी के सहारे
कभी चाबुक के साहरे.

बस हो गया
अब नहीं नाचूँगी

मेरी चाभी मुझे दे दो
रोक दो अब तो चाबुक

चाहती हूँ मैं
'मैं' बनकर जिऊँ
सदियों तक. 

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

खबरदार !

तुम रक्षक हो या भक्षक?
मासूमों की चीख सुनकर भी
तुम्हारे कान नहीं खुलते!

कब तक बहलाओगे
झूठी कहानियों से?

शिकारी को छोड़कर
शिकार को लूट रहे हो!
इन्साफ माँगने वालों को सजा दे रहे हो!!

खबरदार! सारे शिकार एकजुट हो रहे हैं,
तुम्हारे खिलाफ बगावत तय है!

रविवार, 21 अप्रैल 2013

खतरे में बेटियाँ


भीगी भीगी ठंडी शब्दहीन चीख
पर उसने तो वीभत्स हँसी हँसकर अट्टहास किया.

मैं तो बस छोटी-सी गुड़िया हूँ
गुड्डे-गुड़ियों से खेलती हूँ.
उस दिन भी मैंने खेलने के लिए ही तो
खुशी खुशी घर की दहलीज पार की थी.
पर मुझे क्या पता
कि दरिंदा मुझे वहीं से उठाकर ले जाएगा
मुझे नोच-नोचकर खसोट-खसोटकर खा जाएगा

मुझे तो उसने मार डाला ही
मेरे माँ-बाप को ज़िंदा लाश बना दिया.

वे सड़क पर चलते हैं
पीछे से कोई पदचाप सुनाई दे तो घबरा जाते हैं
डर के मारे पसीने पसीने हो जाते हैं
होंठ दबाकर चीख को रोक लेते हैं.

जब कभी किसी नन्ही गुड़िया को देखते हैं
तो बस चीख उठते हैं -
‘गुड़िया घर से बाहर न जा
यह समाज तेरे लिए नहीं बना है
बाहर न जा
तुम्हें नोचकर खाने के लिए गिद्ध इंतजार कर रहा है
तू बाहर न जा’.

यहाँ भी देखा जा सकता है 
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in/2014_04_01_archive.html