हैदराबाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हैदराबाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018


2 फरवरी 2018 को मुझे बैंक स्ट्रीट, कोठी, हैदराबाद में स्थित भारतीय स्टेट बैंक के स्थानीय प्रधान कार्यालय में नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (बैंक) और भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM BANK) के तत्वावधान में आयोजित हिंदी संगोष्ठी और हिंदी समाचार वाचन प्रतियोगिता में बतौर मुख्य वक्ता और निर्णायक भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। एक दिन पहले भारतीय निर्यात-आयात बैंक के मुख्य प्रबंधक श्री अमरेंद्र कुमार ने मुझे फोन पर सूचना दी कि मुझे इस आयोजन ‘ग क्षेत्र में हिंदी शिक्षण और प्रशिक्षण’ के संबंध में बात करनी होगी। अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए भी मैं आमतौर पर बिना तैयारी के नहीं जाती हूँ। लेकिन इस संगोष्ठी में बिना तैयारी के ही जाना पड़ गया। मैं तो मन ही मन डर रही थी क्योंकि मुझे बैंक राजभाषा अधिकारियों को संबोधित करना था।


उद्घाटन सत्र 10.30 बजे शुरू हुआ। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय स्टेट बैंक के महाप्रबंधक श्री प्रबोध पारिख ने कहा कि भाषा में सरलता और लचीलापन होना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया किया कि तकनीकी शब्दावली का प्रयोग करना चाहिए लेकिन इतना भी नहीं कि भाषा की बोधगम्यता ही समाप्त हो जाए और भाषा जटिल बन जाए। उन्होंने आगे यह चिंता व्यक्त की कि आजकल हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी शब्द हिंदी शब्दों को अपदस्थ कर रहे हैं। उन्होंने चर्चा के लिए यह विषय छेड़ दिया कि इस तरह का भाषा मिश्रण क्या हिंदी समाज के लिए श्रेयस्कर है! 

इस अवसर पर भारतीय निर्यात-आयात बैंक के उप महाप्रबंधक श्री नवेंदु वाजपेयी, भारतीय स्टेट बैंक के महाप्रबंधक और नराकास के महासचिव डॉ. विष्णुभगवान शर्मा, भारतीय निर्यात-आयात बैंक के मुख्य प्रबंधक श्री अमरेंद्र कुमार मंचासीन थे। हैदराबाद के विभिन्न बैंकों से मुख्य प्रबंधक, सहायक महाप्रबंधक, महाप्रबंधक उपस्थित रहे। 

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में ‘स्वतंत्र वार्ता’ के पत्रकार और एवी कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शशिकांत मिश्र ने ‘अखबारों में हिंदी का बदलता स्वरूप : कल, आज और कल’ पर अपने विचार व्यक्त किए तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (ISRO) से संबद्ध वैज्ञानिक एवं ‘शिक्षा’ तथा ‘ज्ञानम’ संस्थाओं के संस्थापक डॉ. टी.पी. शशिकुमार ने ‘वर्क, लाइफ, बैलेंस’ के संबंध में अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हर नागरिक की ज़िंदगी में ‘क्षण’ महत्वपूर्ण है क्योंकि संतोष के पल क्षणिक होते हैं तो उन्हें पहचानना जरूरी है सुखी ज़िंदगी जीने के लिए।

भोजन अवकाश के उपरांत विष्णु भगवान शर्मा ने संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण तथा प्रश्नावली भरने में आवश्यक सावधानियों के संबंध में विस्तार से अधिकारियों को समझाया। 

उसके पश्चात मेरी पारी थी। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बात कहाँ से शुरू करूँ। उस समय मुझे मेरे गुरुजी श्रद्धेय प्रो. ऋषभदेव शर्मा की बात याद आई। वे हमेशा यही कहा करते हैं कि कहीं से भी शुरू कीजिए वही शुरूआत हो जाती है। इसी तर्ज पर मैंने अपनी बात शुरू कर दी। उसीका सार संक्षेप मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। 

सबसे पहले मैंने अपनी बात ‘भाषा’ से शुरू की। भाषा को हम दो प्रकार से विभाजित कर सकते हैं – LGP (Language for General Purposes/ सामान्य प्रयोजनों की भाषा – अर्थात दैनंदिन जीवन की संप्रेषण संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली सामान्य संप्रेषण की भाषा) और LSP (Language for Specific/ Special Purposes/ प्रयोजनमूलक भाषा)। विशेष प्रयोजनों के लिए हमें विशेष भाषा की जरूरत पड़ती है. प्रयोग क्षेत्र के अनुसार प्रयोजनमूलक भाषा रूप विकसित होते हैं। प्रयोजनमूलक भाषा रोजीरोटी से संबंधित भाषा है। आज के बदलते परिप्रेक्ष्य में परंपरागत पाठ्यक्रमों के अलावा प्रयोजनपरक पाठ्यक्रमों की आवश्यकता है। अर्थात बैंकों, कार्यालयों आदि में प्रयुक्त भाषा के साथ-साथ मंच संचालन, एंकरिंग के कार्यक्रम चलाने तक की भाषिक प्रयुक्ति को सिखाना जरूरी है। ‘पढ़ाई के साथ कमाई’ की योजना जोड़ी जाएँ तो विद्यार्थी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ जरूर सीखेंगे। विविध व्यवसायों में काम आने वाली भाषा से संबंधित पाठ्यक्रम भी चलाना आवश्यका है। जैसे - मेडिकल हिंदी, बैंकिंग हिंदी, इंजीनियरिंग हिंदी, प्रबंधकों के लिए हिंदी आदि। 

उत्तर भारत में हिंदी प्रथम भाषा है लेकिन दक्षिण भारत में हिंदी दूसरी या तीसरी भाषा है। ऐसी स्थिति में समस्याएँ होती ही हैं। बुनियादी शिक्षा कमजोर होती जा रही है। सरलीकरण के तर्ज पर बच्चों को मूलभूत अवधारणाएँ नहीं समझा रहे हैं। हमारी पीढ़ी को अध्यापकों ने तो इंद्रधनुष के सात रंगों को अंग्रेजी में याद रखने के लिए ‘विब्गयोर’ को याद रखना सिखाया है – वायोलेट, इंडिगो, ब्ल्यू, ग्रीन, येल्लो, ऑरेंगे और रेड। लेकिन सरलीकरण की प्रक्रिया इतनी सरल हो चुकी है कि वायोलेट और इंडिगो का स्थान पर्पल और पिंक ने ले लिया है। बच्चे भी अब यही रट रहे हैं। मेरी 8 वर्षीय बेटी जब यह गाना गा रही थी – ‘रेड, ऑरेंगे, येल्लो, ग्रीन, ब्ल्यू, पर्पल एंड पिंक मेक्स रेनबो कलर्स’ तो मैं अवाक रह गई। आखिर सरलीकरण को अपनाते अपनाते हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं। 

भाषा सीखने के लिए सबसे पहले उस भाषिक समुदाय की संस्कृति और पृष्ठभूमि को जानना अनिवार्य है। भाषिक अभिव्यक्ति को जानना अनिवार्य है। भाषा की कम जानकारी होने के कारण छात्र प्रायः इस प्रकार की त्रुटियाँ करते हैं – 

उदाहरण के लिए He ‘Hardly’ works. इस वाक्य का अनुवाद कुछ छात्र इस प्रकार करते हैं – वह कठोर परिश्रम करता है। जबकि इस का आशय है कि अमुक व्यक्ति कामचोर है। वह कभीकभार ही काम करता है। 

‘Well’ equipped hospitals – कुओं से सुसज्जित अस्पताल (संसाधन युक्त अस्पताल)। I am feeling ‘chilly’ – मुझे मिर्ची लग रही है। (मेरे तो कुल्फी जमी जा रही है या मुझे ठंड लग रही है)। 

एक कविता को देखें – I saw a black crow/ sitting on a hemlock tree/ showering dew drops upon me.’ इस कविता में प्रयुक्त शब्द सभी परिचित शब्द हैं। इसका सामान्य रूप से अनुवाद इस तरह किया जा सकता है – मैंने देखा एक काला कौआ/ हेमलोक पेड़ पर बैठा हुआ/ मुझ पर छिड़क रहा है ओस की बूँदें।‘ 

लेकिन इस कविता में निहित प्रतीकार्थ को समझना होगा। इसके लिए स्रोत भाषा की संस्कृति को समझना आवश्यक है। अब ध्यान से रेखांकित शब्दों को देखिए hemlock tree – यह एक विषैला वृक्ष है। कविता में यह शब्द मृत्यु का प्रतीक है।  black – काला रंग शोक का संकेत देता है। crow priest का प्रतीक है और dew drops पवित्र जल का प्रतीक है। अब देखिए पहले जो चित्र आपकी आँखों के सामने उपस्थित हुआ वह तो गायब ही है, अब तो दूसरा ही चित्र है।  

भाषाओं में अनेक ऐसे शब्द पाए जातें हैं जो अपने मूल अर्थ से भिन्न अर्थ का बोध कराते हैं। उदहारण के लिए ‘मामू’ शब्द को ही लें। यह रिश्ते-नाते की शब्दावली है। माँ के भाई। जबकि मुम्बइया हिंदी में पुलिस वाले के लिए ‘मामू’ कहा जाता है। तेलुगु में भी इस तरह का प्रयोग पाया जाता है। तेलुगु भाषा समाज में ससुराल के लिए कभी-कभी ‘श्रीकृष्ण जन्मस्थान’ का प्रयोग भी किया जाता है।    
             
इसीलिए हम बार बार यही कहते हैं कि कार्यालयीन हिंदी, बैंकिंग हिंदी, मौसम विज्ञान की हिंदी हो या फिर साहित्यिक हिंदी जब तक विषय की जानकारी नहीं होगी, संकल्पनाओं की जानकारी नहीं होगी, भाषिक परिवेश की जानकारी नहीं होगी, संस्कृति की जानकारी नहीं होगी तब तक समस्याओं का निदान होना असंभाव है। इस तरह की समस्याएँ सिर्फ ‘ग’ क्षेत्र में ही नहीं ‘क’ और ‘ख’ क्षेत्र में भी उपस्थित हो सकती हैं।
धन्यवाद।

रविवार, 3 दिसंबर 2017

दिनकर की उर्वशी पर पुराणों का प्रभाव

डॉ. सुनीति/ दिनकर की उर्वशी : स्रोत एवं मौलिक उद्भावना (2017)
 मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/ मूल्य : रु. 600/ पृष्ठ 394



“रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी, 
क्योंकि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है।“ (उर्वशी, पृ. 45-46) 

इस उद्घोष पर आधारित काव्य रूपक ‘उर्वशी’ पुराण प्रसिद्ध उर्वशी और पुरुरवा की कथा पर आधारित है। दिनकर की इस रचना पर अनेक समीक्षात्मक कृतियाँ उपलब्ध हैं। यही नहीं, हैदराबाद शहर को यह श्रेय भी प्राप्त है कि यहाँ से निकलने वाली अद्वितीय पत्रिका ‘कल्पना’ ने अपने 4 अंकों में उर्वशी और उससे जुड़े विवाद पर धारावाहिक सामग्री प्रकाशित की थी. आज लोकार्पित हो रही डॉ. सुनीति की शोधपूर्ण कृति ‘दिनकर की उर्वशी : स्रोत एवं मौलिक उद्भावना’ (2017) इस चर्चा को एक नया आयाम देने वाली कृति है. 

लेखिका ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक दिनकर की ‘उर्वशी’ के स्रोत और कवि की मौलिक उद्भावनाओं को रेखांकित किया है। आमुख में लेखिका ने स्वयं इस बात को स्पष्ट किया है कि “नारी के विविध रूपों का समन्वय एवं उसके ममता से भरे भावों को जिस अनोखे एवं यथार्थ रूप में ‘उर्वशी’ में प्रस्तुत किया गया है, उस प्रभाव की अभिव्यक्ति ही, प्रस्तुत ग्रंथ की पृष्ठभूमि रही है।“ (आमुख)

इस शोधग्रंथ में 9 अध्याय हैं। पहले अध्याय में वेदों में निहित उर्वशी-पुरुरवा की कहानी को रेखांकित करते हुए लेखिका कहती हैं कि वेदों में उर्वशी आख्यान सृष्टि विद्या के वैज्ञानिक तथ्य को प्रकट करने वाला आख्यान प्रतीत होता है। आगे तीन अध्यायों में उन्होंने क्रमशः उर्वशी के पौराणिक स्वरूप, संस्कृत साहित्य में निहित उर्वशी की कथा तथा कवींद्र रवींद्र, योगिराज अरविंद और जयशंकर प्रसाद के साहित्य में प्रस्तुत उर्वशी के रूपों का मूल्यांकन करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि “पौराणिक काव्यों में फैला हुआ उर्वशी का कथानक आधुनिक युग में भी अपनी सरसता को लिए विविध रूप में अपना सौंदर्य बिखेर रहा है। इन सभी बिखरे रूपों का एक उत्कृष्टतम रूप दिनकर की उर्वशी में सहज ही प्रतिभासित होता है।“ (पृ. 185)। आगे के 5 अध्यायों में डॉ. सुनीति ने दिनकर की ‘उर्वशी’ की कथावस्तु, चरित्र चित्रण, दार्शनिक रूप, काम और मनोविज्ञान के सामंजस्य आदि को रेखांकित करते हुए प्रतिपादित किया है कि ‘उर्वशी’ एक ऐसा काव्य है जो रस से रहस्य में प्रवेश करता है और काम के द्वारा मोक्ष का द्वार खटखटाता है। लेखिका यह भी कहती हैं कि “युगों-युगों तक ‘उर्वशी’ महाकाव्य, नर-नारी की चिरंतन कामगत समस्याओं को सुलझाता, जीवन को सँवारता, मानव में उस अद्भुत शक्ति का संचरण करेगा, जिससे कि मानव अपने मूलभूत गुणों के कारण गौरवान्वित हो सके.” (पृ. 388) 

यों तो इस ग्रंथ के सभी अध्याय अत्यंत गहन हैं जिन्हें बार-बार पढ़े जाने की जरूरत है। लेकिन अध्याय 2 जिसका शीर्षक ‘उर्वशी का पौराणिक स्वरूप’ है, खास तौर पर ध्यान खींचता है। इस अध्याय में भारतीय पौराणिक वाङ्मय में उर्वशी-पुरुरवा के आख्यान का अत्यंत रोचक अनुशीलन किया गया है। वास्तव में उर्वशी और पुरुरवा की कहानी दुनिया की सबसे पुरानी प्रेम कहानी है जिसमें अप्सरा और मनुष्य का प्रणय दर्शाया गया है। यह कहानी ऋग्वेद से चलकर पुराणों और कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम’ से होती हुई दिनकर के काव्य रूपक ‘उर्वशी’ तक पहुँचती है। इस अध्याय में लेखिका ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि दिनकर ने पुराणों में वर्णित उर्वशी-पुरुरवा के कथानक को अंशतः ही ग्रहण किया है क्योंकि उर्वशी द्वारा तीन शर्तें रखना, मेषों का अपहरण, गंधर्वों का वरदान आदि अनेक घटनाओं को दिनकर ने छुआ तक नहीं है। डॉ. सुनीति को लिखे हुए पत्र में दिनकर ने स्वयं इस बात को स्पष्ट किया है कि महर्षि अरविंद ने उर्वशी को आत्मा के आध्यात्मिक उद्देश्य के रूप में चित्रित किया है। जब उर्वशी चली जाती है तो पुरुरवा उसे खोजता हुआ हिमालय की घाटियों में भटकता फिरता है। भरत के शाप को दिनकर उर्वशी के चले जाने का कारण मानते हैं। दिनकर की दृष्टि में पुरुरवा सनातन नर का प्रतीक है और उर्वशी सनातन नारी का। उन्होंने ‘उर्वशी’ की भूमिका में इस बात को रेखांकित किया है कि वैदिक आख्यान की पुनरावृत्ति अथवा वैदिक प्रसंग का प्रत्यावर्तन उनका ध्येय नहीं है। (उर्वशी, भूमिका)

इस दूसरे अध्याय का सबसे बड़ा महत्व यही है कि दिनकर की उर्वशी के परंपरागत स्वरूप और आधुनिक उद्भावनाओं को इस चाभी के बिना खोला नहीं जा सकता।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

'साहित्यिक पत्रकारिता' : नई पुस्तक

साहित्यिक पत्रकारिता
आशा मिश्र 'मुक्ता'
2016
गीता प्रकाशन, हैदराबाद
मूल्य : रु. 595
पृष्ठ : 176 

भूमिका

श्रीमती आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ की प्रस्तुत शोधपूर्ण कृति के प्रकाशन के अवसर पर मैं अत्यंत हर्ष का अनुभव कर रही हूँ क्योंकि इस कृति के प्रणयन में उन्होंने अत्यंत सदाशयतापूर्वक पग-पग पर मुझसे चर्चा की है. यह पुस्तक इस दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है कि इसमें हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के विराट मानचित्र पर दक्षिण भारत की रेखाओं को खासतौर पर उभारा गया है. हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता आरंभ से ही अत्यंत तेजस्वी रही है और उसके विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, अज्ञेय, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, धर्मवीर भारती, राजेंद्र अवस्थी और मृणाल पांडे जैसे दिग्गज हस्ताक्षरों का योगदान अविस्मरणीय है. इन बड़े नामों के आभामंडल के कारण बहुत बार हिंदीतर भाषी क्षेत्रों की हिंदी पत्रकारिता हाशिए पर धकेल दी जाती है. यह युग हाशियाकृत समुदायों के विमर्श का युग है. इसलिए इतिहास के मुख्य पृष्ठ पर अनुपस्थित रह गए समुदाय अब अपनी उपस्थिति और अस्मिता को नए सिरे से रेखांकित कर रहे हैं. हिंदीतर भाषी क्षेत्रों की साहित्यिक पत्रकारिता भी ऐसा ही एक उपेक्षित समुदाय है. प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से लेखिका ने हिंदीतर भाषी क्षेत्र की हिंदी पत्रकारिता पर विमर्श का नया प्रस्थान दर्ज कराया है. इसके लिए उन्होंने हैदराबाद से प्रकाशित होने वाली पहले अनियतकालीन और अब त्रैमासिक पत्रिका ‘पुष्पक’ का विशिष्ट और गहन अध्ययन करके यह प्रतिपादित किया है कि लोकल सरोकारों से उद्भूत होने के बावजूद इस क्षेत्र की साहित्यिक पत्रकारिता ग्लोबल सरोकारों को भी पूरी तरह संबोधित करती है. वस्तुतः हिंदी साहित्य का सार्वदेशिक और समेकित इतिहास लिखते समय ‘पुष्पक’ जैसी पत्रिकाएँ आधारभूत सामग्री का प्रामाणिक स्रोत सिद्ध होंगी. इसलिए यदि यह कहा जाए कि प्रस्तुत पुस्तक साहित्यिक पत्रकारिता ही नहीं समेकित हिंदी साहित्य की इतिहास रचना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. 

स्मरणीय है कि इस पुस्तक में विवेचित पत्रिका ‘पुष्पक’ हैदराबाद (वर्तमान तेलंगाना) से प्रकाशित होती है. इसलिए लेखिका ने हिंदी पत्रकारिता के उद्भव और विकास का इतिहास प्रस्तुत करने से पहले अत्यंत संक्षेप में तेलंगाना के इतिहास की रेखाओं को उकेरा है. तदनंतर दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता की चर्चा करने के बाद साहित्यिक हिंदी पत्रिकाओं का इस क्षेत्र के संदर्भ में सर्वेक्षण किया है. ‘कल्पना’, ‘अजंता’, ‘पूर्णकुंभ’, ‘स्रवंति’, ‘विवरण पत्रिका’, ‘संकल्य’, ‘पुष्पक’, ‘समुच्चय’, ‘भास्वर भारत’, ‘अग्रतारा’, ‘महिला सुधा’, ‘मध्यांतर’ और ‘दक्षिण समाचार’ की यह झांकि इस सत्य का साक्षात्कार कराने में समर्थ है कि साहित्यिक पत्राकरिता की दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ रहा है जिसकी अब तक उपेक्षा की जाती रही है. 

लेखिका ने अपने विवेचन के केंद्र में जिस महत्वपूर्ण पत्रिका को रखा है उसके 25 अंकों की सामग्री का विश्लेषण करते हुए उसकी संपादकीय दृष्टि के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और साहित्यिक आयामों की जमकर पड़ताल की है. साथ ही उसके कथासाहित्य, काव्य, निबंध, समीक्षा एवं अन्य विधाओं के योगदान को भी इन विधओं की विषय वस्तु और भाषा शैली की कसौटी पर कसकर स्थापना की है. विवेचित पत्रिका की प्रधान संपादक का साक्षात्कार इस पुस्तक को और भी परिपूर्णता प्रदान करता है. 

आशा है, कि आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ की इस पुस्तक का हिंदी जगत में व्यापक स्वागत होगा तथा सुधी पाठक इसे उन्हें अपना स्नेह और आशीर्वाद प्रदान करेंगे. 

शुभकामनाओं सहित

- गुर्रमकोंडा नीरजा  

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

(शुभाशंसा : प्रो. ऋषभदेव शर्मा) 'अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख'

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख 

गुर्रमकोंडा नीरजा 
2015
वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु. 495
ISBN : 978-93-5229-249-3
पृष्ठ 304
                                      शुभाशंसा

हमारी परंपरा ने पंचभूतों की उत्पत्ति चिदाकाश से मानी है जिसमें नाद, शब्द, वाक् या भाषा व्याप्त है. इसीलिए हमारा सारा चिंतन भाषामूलक है. वाक् और अर्थ के संबंधों को समझने के लिए ही भाषाविज्ञान और काव्यशास्त्र विकसित हुए हैं. ये दोनों एक दूसरे को प्रभावित तो करते ही हैं, प्रतिच्छादित भी करते हैं. इन दोनों में भी भाषाविज्ञान अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक है और अपनी वैज्ञानिक विश्लेषण प्रक्रिया के कारण अनुप्रयोग की अनंत संभावनाएँ भी प्रस्तुत करता है. अनुप्रयोग से जुड़कर भाषाविज्ञान के सिद्धांत विभिन्न ज्ञान शाखाओं का विस्तार करते हुए नित्य नए क्षितिजों का उद्घाटन कर रहे हैं. इससे अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के कई क्षेत्र सामने आए हैं. भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, शैलीविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, संचार अभियांत्रिकी, कंप्यूटर विज्ञान आदि क्षेत्रों में भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग ने नई संभावनाओं को उजागर किया है. इसलिए अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की अलग अलग क्षेत्रों में व्यावहारिक परख भी आवश्यक हो गई है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की यह पुस्तक इसी दृष्टिकोण से लिखी गई है. 

लेखिका डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को दक्षिण भारत में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन, पठन-पाठन और तत्संबंधी शोधकार्य का अच्छा अनुभव है. वे समाजभाषिकी, अनुवाद, भाषा शिक्षण, व्यतिरेकी विश्लेषण, संचार, पत्रकारिता और साहित्यालोचन से व्यावहारिक रूप से प्रत्यक्षतः जुड़ी हुई हैं और इन विषयों पर प्रायः सोचती, पढ़ती और लिखती रहती हैं. यह पुस्तक उनके भाषा-साहित्य के स्वाध्याय और साधना का प्रीतिकर प्रतिफलन है. लेखिका ने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के विभिन्न मुद्दों को आत्मसात करके उन्हें सोदाहरण सरल एवं सटीक भाषाशैली में इस पुस्तक में पिरोया है. 

सात खंडों वाली इस पुस्तक की प्रस्तुति पूर्णतः तर्कसंगत और क्रमिक विकास की दृष्टि से सोपानबद्ध है. ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ खंड में भाषा अध्ययन की दृष्टियों पर चर्चा करते हुए अनुप्रयोग के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर प्रकाश डाला गया है. इस संक्षिप्त पीठिका के साथ अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख की ओर अगले छह खंडों में क्रमशः प्रस्थान किया गया है. इस प्रस्थान के बिंदु हैं – भाषा शिक्षण, अनुवाद विमर्श, साहित्य पाठ विमर्श या शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण, प्रयोजनमूलक भाषा विमर्श, समाजभाषिक विमर्श और भाषाचिंतन. 

इसमें संदेह नहीं कि यह पुस्तक अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अनेक आयामों की व्यावहारिकता को उद्घाटित करने के साथ साथ उनका परीक्षण एवं मूल्यांकन भी करती है. इस दृष्टि से डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की यह कृति भाषा और साहित्य, दोनों ही के जिज्ञासु पाठकों और शिक्षकों के लिए अत्यंत उपादेय सिद्ध होगी तथा नई पीढ़ी को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की ओर आकृष्ट करने में भी सफल होगी, ऐसा मेरा विश्वास है. 

शुभकामनाओं सहित
25 अप्रैल, 2015                                                                                                  -  ऋषभ देव शर्मा

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

(फ्लैप वक्तव्य : प्रो. देवराज) 'अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख'

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख 

गुर्रमकोंडा नीरजा 
2015
वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु. 495
ISBN : 978-93-5229-249-3
पृष्ठ 304
पुस्तक के बारे में  

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की सैद्धांतिकी पर चाहे जितना लिखा गया हो, उसकी व्यावहारिक परख के बारे में पुस्तकाकार नहीं लिखा गया है. इसका कारण लेखकों के समक्ष इकहरेपन से उभरी चुनौतियाँ हैं. प्रायः या तो हम कोरी सैद्धांतिकी को समर्पित होते हैं या उसे समझने की आवश्यकता अनुभव न करते हुए उसके निपट प्रयोक्ता. हम यह विचारने की भी कोशिश नहीं करते कि किसी भी लेखक, अध्येता, अनुवादक और कभी-कभी पाठक की दृष्टि से भी यह इकहरापन हमारे कार्य की गंभीरता, उपादेयता और प्रासंगिकता को हल्का बनाता है. हमें सार्थक होने और करने के लिए अपने इकहरेपन से मुक्त होने की महती आवश्यकता है. जो लेखक इस बात को समय पर स्वीकार कर लेता है, उसी का लिखा पीढ़ियों तक चल पाता है. इसके लिए उदाहरण खोजने बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, हमारे आसपास ही कुछ बड़े सटीक उदाहरण मिल जाते हैं.

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान ने भाषा, पाठ और अनुवाद में जो हस्तक्षेप किया है उसने लेखन, शिक्षण, समालोचना, अनुवाद आदि के परिदृश्य बदल डाले हैं. जिस अनुवाद को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान का अंग माना जाता है वह भी आज एक स्वतंत्र अनुशासन के रूप में ढलने के लिए अपना व्याकरण तेज़ी से तैयार कर रहा है. भाषा तो उसके सहारे अपना नया परिवेश रच ही चुकी है. अब देखना यह है कि इस वैज्ञानिक उपलब्धि के सहारे हम पाठ को कितनी दूर तक ले जाने का कौशल विकसित करते हैं और कहाँ तक उसे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक संदर्भों के साथ जोड़े रख कर भाषा, साहित्य व मनुष्य के रिश्ते की नई इबारत लिख पाते हैं.

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर भरपूर सामग्री तैयार की है जो अन्य लोगों के लिए रचनात्मक स्तर पर चुनौती बना हुआ है. उनकी अध्ययनशीलता और संकल्पशीलता के लिए मेरी शुभकामनाएँ!

- देवराज, आचार्य, अनुवाद अध्ययन विभाग, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा – 442001.

सोमवार, 19 जनवरी 2015

संवेदनाओं के धनी एक रचनाकार के सम्मान में .....

[1]
रमेशचंद्र शाह
देर आयद दुरुस्त आयद ! यह कहावत साहित्य अकादमी के वर्ष 2014 के पुरस्कारों की घोषणा पढ़ने सुनने पर अपने आप याद आ गई. संदर्भ था डॉ. रमेशचंद्र शाह को उनके उपन्यास ‘विनायक’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए जाने की घोषणा का. डॉ. रमेशचंद्र शाह का साहित्य लंबे समय से इस सम्मान का दावेदार और हकदार था. सुना तो यहाँ तक है कि इससे पहले उनकी औपन्यासिक कृतियाँ, कविता संग्रह और डायरी इस पुरस्कार के लिए छह बार शोर्ट लिस्ट हो चुकी हैं. अब सातवीं बार जाकर यह चिर प्रतीक्षित घोषणा सामने आई है. इससे पूर्व वे पद्मश्री, व्यास सम्मान, मध्य प्रदेश शासन के संस्कृत विभाग द्वारा ‘शिखर सम्मान’, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा ‘पूर्वापर’ उपन्यास के लिए, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद द्वारा आलोचना, उपन्यास तथा काव्य संग्रह के लिए क्रमशः नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार, वीरसिंह देव पुरस्कार तथा भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं. इतना ही नहीं उन्हें 2015 के लिए गजानन माधव मुक्तिबोध राष्ट्रीय साहित्य सम्मान 8 फरवरी को आयोजित समारोह में प्रदान किया जाएगा. 

साहित्य अकादमी से पुरस्कृत उपन्यास ‘विनायक’ के बारे में बताते हुए रमेशचंद्र शाह ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के संवादताता अभिनय शुक्ल से कहा कि “Vinayak is the hero of the novel. When the novel starts, he is about 55. He is going to retire in a few years. The novel is about with the grown up Vinayak, but Vinayak is the name of the protagonist of my first novel Gobar Ganesh also, which has run in six editions. Although, Vinayak is complete in itself yet there is a link between Vinayak and Gobar Ganesh. Gobar ganesh dealt with the childhood, youth and boyhood of Vinayak, but this novel deals with the middle age of Vinayak.” 

अल्मोड़ा में जन्में डॉ. रमेशचंद्र शाह (1937) हिंदी के विरिष्ठ कवि, कथाकार और आलोचक हैं. 1997 में भोपाल के शासकीय हमीदिया कॉलेज से अंग्रेजी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए. तत्पश्चात 1997-2000 तक वे भोपाल स्थित निराला सृजनपीठ के निदेशक भी रह चुके हैं. 78 वर्ष की आयु में भी वे निरंतर साहित्य सृजन कर रहे हैं. उनकी प्राकशित कृतियों में [निबंध संग्रह] रचना के बदले (1967), शैतान के बहाने (1980), आडू का पेड़ (1984), सबद निरंतर (1987), पढ़ते-पढ़ते (1980), स्वधर्म और कालगति (1994), स्वाधीन इस देश में (1995), नेपथ्य से; [काव्य संग्रह] कछुए की पीठ पर, हरिश्चंद्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुंद को, देखते हैं शब्द भी अपना समय, अनागरिक, चक पर समय; [उपन्यास] गोबर गणेश, किस्सा गुलाम (नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित), पूर्वापर, आखिरी दिन, पुनर्वास, आप कहीं नहीं रहते, विभूतिबाबू, कम्बित इस मोड़ पर और विनायक; [आलोचना] छायावाद की प्रासंगिकता, समानांतर, वागर्थ, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय (साहित्य अकादमी मोनोग्राफ), भूलने के विरुद्ध, अज्ञेय : वागर्थ का वैभव, आलोचना का पक्ष, [डायरी] इस खिड़की से और जंगल जुही आदि उल्लेखनीय हैं. इनके अतिरिक्त कई कहानी संग्रह, नाटक, निबंध, यात्रावृत्त तथा कई संपादित ग्रंथ भी प्रकाशित हो चुके हैं. टेमोनोस अकादमी, लंदन से व्याख्यानों की पुस्तक ‘Ancestral Voices : Four Essays towards a Philosophy of Imagination’ भी प्रकाशित है. उनकी धर्मपत्नी ज्योत्सना मिलन (19 जुलाई 1941-5 मई 2014) भी सुप्रसिद्ध साहित्यकार थीं. ‘अ अस्तु का’ उनका चर्चित उपन्यास है. 

[2]

डॉ. रमेशचंद्र शाह से मेरी मुलाकात हैदराबाद में 30 जुलाई 2012 को आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी में हुई थी. मैं उनका व्याख्यान सुनने गई थी. बड़े ही निश्छल भाव से वे सबसे मिल रहे थे. मैं मन ही मन सोच रही थी - इतनी बड़ी हस्ती और इतना सहज! कुर्ता पजामा में थे. चेहरे की आकृति न ही पूरी तरह से गोलाकार है और न ही पूरी तरह से अंडाकार. दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण. चश्मेदार तो थे ही. पूरी तरह से पके हुए बाल. चहरे पर चमक. उन्हें बस देखती रह गई. व्याख्यानमाला शुरू हुई. उन्होंने भारतीय भाषाओं पर अपना सुव्यवस्थित विचार प्रस्तुत किए. व्याख्यान समाप्त होने के बाद सबसे विदा लेते समय मैं संकोच करते हुए उनसे जाकर मिली और अपनी पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद की पत्रिका ‘स्रवंति’ उन्हें भेंट की तो वे बहुत ही आत्मीय भाव से मुझसे मिले और मेरी पुस्तक के पन्ने पलटते हुए आशीर्वाद दिए – ‘यशश्वी भवः’. उसके बाद 20 अक्टूबर 2012 को ‘भास्वर भारत’ के प्रवेशांक के लोकार्पण समारोह में एक बार फिर उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ. आगे बढ़कर जैसे ही मैंने उनका चरण स्पर्श किया तो उन्होंने कहा – ‘बेटी, तुम्हारी किताब पढ़ डाला. बहुत अच्छा लगा. हिंदी भाषाभाषियों को तेलुगु साहित्य और साहित्यकारों की जानकारी देने का यह कार्य स्तुत्य है. मेरा आशीर्वाद सदा ही तुम्हारे साथ रहेगा.’ मैं गद्गद हो गई. उसके बाद न ही डॉ. रमेशचंद शाह से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और न ही उनसे बातचीत करने का. लेकिन समय समय पर ‘भास्वर भारत’ के माध्यम से उनके विचारों से रू-ब-रू होना का अवसर प्राप्त होता रहा. 

साहित्य आकादमी की पुरस्कार की घोषणा होने पर ऊहापोह में रहने के बाद कि इतने बड़े लेखक को मेरा फोन करना ठीक भी होगा या नहीं, मैंने 21 दिसंबर 2014 को बधाई देने हेतु जब उन्हें फोन किया तो उन्होंने अत्यंत प्रसन्न स्वर में आशीर्वाद देते हुए कहा – ‘मैं जहाँ भी जाता हूँ वहाँ हमेशा यही कहता हूँ कि हिंदी का उद्धार दक्षिण भारतीय ही करते हैं और वे ही यह काम कर सकते हैं. क्योंकि वे अपनी मातृभाषा के साथ हिंदी को भी आगे ले जाने का काम कर रहे हैं. ‘स्रवंति’ के माध्यम से जो काम आप लोग आंध्र प्रदेश में रह कर रहे हैं वह अभिनंदनीय है.’ उनका स्नेह और आशीर्वाद पाकर मैं धन्य हो गई. 

[3]

वस्तुतः लेखन के लिए प्रेरणा की जरूरत होती है. साथ ही संवेदनशील सहृदय की भी. देखा जाय तो बचपन से ही हर एक मनुष्य के मानस पर लाखों हजारों स्मृतियाँ अंकित हो जाती हैं. जो अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर सकते हैं वे साहित्यकार बन जाते हैं और हर साहित्यकार के लिए अपनी एक निजी रचना प्रक्रिया होती है. रमेशचंद्र शाह के लिए तो रचना एक अटूट साधना है. अपनी रचना प्रक्रिया के संबंध में उन्होंने स्वयं कहा है कि “मेरी रचनात्मक चेतना के निर्माण में प्रकृति का बहुत योगदान है. मेरी स्मृति पहाड़ से जुड़ी है. वह मेरी चेतना की पूँजी है. मेरे बचपन में मेरी स्मृति में प्रकृति है. लेकिन आज की छापें जो पड़ती हैं स्मृति पर, चेतना पर उनसे मेरा संघर्ष होता है. आज भी प्रकृति मेरा सहारा है.” (रमेशचंद्र शाह से रवींद्र स्वप्निल प्रजापति की बातचीत)

रमेशचंद्र शाह सुधी आलोचक हैं. नामवर सिंह को वे आलोचक से जयादा आस्वादक लगते हैं. उनका मानना है कि रमेशचंद्र शाह स्वाद लेने और स्वाद प्रदान करने वाले आलोचक हैं. वे मुझ जैसे नवांकुरों की छोटी सी छोटी पुस्तक पर भी उसी गंभीरता के साथ लिखते हैं जिस गंभीरता के साथ प्रतिष्ठित रचनाकारों की कृति पर लिखते हैं. इस संदर्भ में डॉ. नामवर सिंह का कथन द्रष्टव्य है – ‘लगता है वे पुस्तकों को चुनते नहीं. आलोचना के लिए जो भी कृति उनके सामने आ जाए, उस पर लिख देते हैं.’ (सृजनात्मकता के बचाव में, नामवर सिंह से विष्णु खरे की बातचीत, कहना न होगा [एक दशक की बातचीत नामवर सिंह के साथ], पृ. 53). रमेशचंद्र शाह भारतीय संस्कृति और दर्शन के साथ साथ पाश्चत्य संस्कृति और दर्शन के भी ज्ञाता हैं. उनके अनुसार आलोचना एक बौद्धिक रचना है. हिंदी आलोचना के संबंध में उनका कहना है कि “हिंदी में सैद्धांतिक आलोचना तो एक कुहेलिका है. हर आलोचक अपना झंडा अलग ही लहराना चाहता है.” (गजानन माधव मुक्तिबोध के नाम पत्र, मेरे युवजन मेरे परिजन, (सं) रमेश गजानन मुक्तिबोध, अशोक वाजपेयी) 

रमेशचंद्र शाह के बारे में रामस्वरूप चतुर्वेदी का कहना है कि “रमेशचंद्र शाह नए साहित्य की समस्याओं को लेकर चलने वाले आलोचक हैं. वे बड़े संवेदनशील समझ के धनी हैं, और उनका अध्ययन भी अत्यंत व्यापक है. इस तैयारी के साथ यदि वे कोई समग्र आलोचना-कृति लिखते तो निश्चय ही अच्छी बनती. पर वे भी स्फुट रूप में निबंध लिखकर संतुष्ट हो जाने वाले आलोचक हैं, जहाँ प्रस्तुत रचनाकार के बारे में निरपेक्ष भाव से कुछ कहा सकना आसान है.” (रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 264) 

रमेशचंद्र शाह की आलोचना के बारे में नामवर सिंह कहते हैं कि “रमेशचंद्र शाह की आलोचना में सबसे बड़ी कठिनाई उनकी भाषा है. लगता है अपनी आलोचना में वे रचना से होड़ लेने लगते हैं.” (सृजनात्मकता के बचाव में, नामवर सिंह से विष्णु खरे की बातचीत, कहना न होगा [एक दशक की बातचीत नामवर सिंह के साथ], पृ. 53) 

रमेशचंद्र शाह वाद के कठघरे में फिट होना पसंद नहीं करते. आज के हिंदी लेखन के बारे में वे कहते हैं कि “हिंदी का लेखन अधिकतर ‘सेफ्टी वैल्यू’ की खोज का परिणाम होता है. यों तो एक प्रकार से बड़े-से-बड़े साहित्यकार भी अंतःसुख के लक्ष्य से न्यूनांश से प्रेरित होता है. अधिकांश में होना भी अपने आप में कोई दोष नहीं है. स्वांतःसुखाय में मानव-द्रोह हो यह कतई आवश्यक नहीं फिर भी हम देखते हैं कि मूर्धन्य कलाकारों का जीवन कला से ऊपर उठकर ही अपने उच्च्तम लक्ष्य को प्राप्त कर पाया है.” (गजानन माधव मुक्तिबोध के नाम पत्र, मेरे युवजन मेरे परिजन, (सं) रमेश गजानन मुक्तिबोध, अशोक वाजपेयी) 

[4]

रमेशचंद्र शाह मूलतः कवि हैं. वे कवि होने के नाते कविता की आलोचना करते हुए कहते हैं कि कविता एक ऐसी चीज है जिसमें हमारे नाक और कान भी सक्रिय हो जाते हैं. इतना ही नहीं भाव तंत्र के साथ साथ विचार तंत्र भी सक्रिय होता है. उनके अनुसार कविता एक समन्वित और एकीकृत प्रक्रिया है. वे बल देकर कहते हैं कि कविता से मिलने वाला सुख अन्य किसी चीज से मिलने वाले सुख से अधिक होता है. कविता से जो अभिव्यक्ति मिलती है वह भी अनोखी होती है. कविता में कवि के समूचे व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति मिलती है. “कविता अभिव्यक्ति और संप्रेषण दोनों है. जब आप कविता लिखते हैं तो आपका चित्त लगातार बोलता रहता है. उसमें एकाग्र हो जाता है. शांत हो जाता है. ये कैसे होता है, क्यों हो जाता है, यह प्रक्रिया चलती है.” (रवींद्र स्वप्निल प्रजापति से बातचीत) 

रमेशचंद्र शाह की कविता को ध्यान से देखें तो यह प्रतीत होता है कि वह हम से बार बार प्रश्न करती है. उदाहरण स्वरूप उनकी कविता ‘शब्द, बताओ’ को ही देखा जा सकता है – “शब्द, बताओ/ कहना क्या है?/ शब्द, बताओ/ गहना क्या है?/ मेरा तुम्हें/ तुम्हारा मुझे/ उलहना क्या है?/ शब्द, बताओ/ कहना क्यों है?/ शब्द, बताओ/ सहना क्यों है?/ तुमने हमको/ हमने तुमको/ पहना क्यों है? (शब्द, बताओ; प्यारे मुचकुंद को, पृ. 12) 

रमेशचंद्र शाह की कविता के बारे में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि “भाषा, चीजें, भूदृश्य, आख्या, छंद-लय आदि सब घुल-मिलकर वह रसायन रचते हैं जो रमेशचंद्र शाह की कविता है. उसकी चिंताएँ भावप्रवण हैं पर निश्चय ही बैद्धिक और आध्यात्मिक भी. वह चीजों को उनकी निरपेक्ष अर्थमयता में देखने के बाजय हमारी आज की जिंदगी और वैचारिक संघर्ष के प्रसंग में उनके गहरे अर्थ और आशय खोजने-देखने की चेष्टा करती है. *** रमेशचंद्र शाह के यहाँ कविता मौलिक प्रश्न पूछने का दुस्साहस करती है और अपनी प्रश्नाकुलता से ही अपना काव्यरूप अर्जित करती है. उसमें जीवंत ब्यौरे, टटकी चित्रमयता, कौशल की परिपक्वता सब हैं.” (अशोक वाजपेयी, ‘प्यारे मुचकुंद को’ के फैल्प से). रमेशचंद्र शाह ने बाल कविताओं का भी सृजन किया है. उनकी बाल कविता का एक उदाहरण देखिए – “पूछ रही मछली कछुए से/ क्या लगते हो मेरे?/ साँप पूछता है कछुए से/ हाल-चाल क्या तेरे?/ सूरज ने धरती से पूछा/ लगा रही क्यों फेरा?/ धरती ने सागर से पूछा/ क्यों मुझको है घेरा?/ लगे हाथ मैंने भी पूछा/ आसमान से जाकर/ ढूँढ़ रहे तुम किसको दादा/ इतने दिए जलाकर?” 

रमेशचंद्र शाह बच्चों के व्यवहार में तथा वर्तमान शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन लाने के पक्ष में है. उनका कहना है कि “हम अपने बच्चों का इस्तेमाल अपनी मनमानी लालसाओं और आकांक्षाओं की तुष्टि के लिए कदापि नहीं करेंगे – जैसा कि हम करते आए हैं – हजारों सालों से. ‘प्रेम’ की हमारी समझ कितनी उथली और बंजर है यह हमारी समझ में तभी आएगा, जब हम सबसे पहले बच्चों को नहीं, उनके शिक्षकों को शिक्षित करने का बीड़ा उठा लें.” (जंगल जुही, पृ. 138) 

[5]

यह पहले भी संकेत किया जा चुका है कि रमेशचंद्र शाह संस्कृति और दर्शन के ज्ञाता हैं. रमेशचंद्र शाह के कुछ विचारों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है – 
  • संस्कृतियाँ आत्मावलंबी भी होती हैं और दूसरी ओर, अपने ऐतिहासिक विकास क्रम में पारस्परिक आदान प्रदान द्वारा अधिकाधिक अंतरावलंबन की ओर अभिमुख भी. (भूलने के विरुद्ध, पृ. 216) 
  • कोई संस्कृति यदि अपनी पहचान तक के लिए दूसरों द्वारा की गई व्याख्या पर निर्भर हो उठे – दूसरों द्वारा दी गई समझ और मूल्य दृष्टि के परावर्तित प्रकाश में ही अपने को और अपने जीवन मूल्यों को देखने की आदि हो जाए तो ऐसी हालत में उसका आत्मबोध और आत्माभिव्यक्ति दोनों खंडित होंगे ही. ऐसे औपनिवेशिक मानसिकता और पराधीनता को हम अनुवादजीवी संस्कृति न कहें तो क्या कहें? (वही)
  • प्रत्येक विकासमान और जीवंत संस्कृति में एक दोहरी प्रक्रिया कार्यरत देखे जा सकती है : उसके अपने केंद्र से होने वाला आत्म विकास और बाहर के – दूसरी संस्कृतियों की टकराहट से पैदा होने वाले संघातों का अनुकूलन, याकि आत्मीकरण. (वही, पृ. 218) 
  • मनुष्य भोक्ता भी है और साक्षी भी. स्वयं अपने भोक्तृत्व का साक्षी. ‘कर्म का भोग, भोग का कर्म/ यही जड़ का चेतन आनंद.’ अपने साक्षीपन का उत्तरोत्तर विकसित होता बोध ही मनुष्य को अपनी ‘आत्मा’ का पता देता है – अपने आत्मस्वरूप होने का (‘उपभोक्ता-संस्कृति और उसका विकल्प’, स्वधर्म और कालगति, पृ. 40) 
  • उपभोक्ता संस्कृति आत्म-प्रत्यभिज्ञा और स्वातंत्र्य साधना दोनों के विरुद्ध जाती है. उसमें मानवीय उत्तरदायित्व का ह्रास और विलोप अवश्यंभावी रूप से निहित रहता है. मनुष्य अपने मानवीय उत्तरदायित्व को तभी अनुभव कर सकता है, तभी निभा सकता है, जब वह अपनी स्वतंत्रता की मर्यादाओं को भी साथ-साथ पहचाने. (वही, पृ. 42)
  • भारत की परंपरागत दृष्टि मनुष्य और उसके परिवेश के बीच जिस तरह के संबंध सूत्र का निर्वाह करती रही है, वह उसके आत्म-प्रत्यभिज्ञा के लक्ष्य के अनुरूप ही है. स्वातंत्र्य की परिकल्पना भी मानवजीव तक ही सीमित नहीं, उसकी परिधि में जीव मात्र का सहज समावेश है. इसी अर्थ में वह लोक संसक्त दृष्टि है. (वही) 
[6]

अंततः यह और कहना है कि मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित उपन्यास ‘विनायक’ अपने ‘वृद्धावस्था विमर्श’ के कारण अन्य समकालीन उपन्यासों में विरला प्रतीत होता है. इसलिए नववर्ष की शुभकामनाएँ देते हुए, इस उपन्यास के दो अनुच्छेद यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा – 

“मालती जीवन-संगिनी है. जीवन-संगिनी से सहानुभूति न हो, यह कैसे संभव है? मगर क्या विनायक भी उतनी ही, बल्कि मालती की तुलना में कुछ अधिक ही, सहानुभूति का पात्र नहीं? विनायक खुद को अकसर ‘लेट स्टार्टर’ कहा करता है अकसर, तो क्या यूँ ही? सब कुछ विलंब से ही घटित हुआ उसके जीवन में. समय पर सब कुछ होता चलता तो उसकी महत्वाकांक्षा खुद उसके घर के लोगों को अनर्गल लगती? मालती तो कई बार यह बात दुहरा चुकी है कि रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े आदमी को अपने लिए नहीं, अपने बच्चों के लिए जीना चाहिए. उन्हीं के बारे में सोचना चाहिए. उन्हीं की सफलता में अपनी सफलता और उन्हीं की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी देखनी चाहिए. - क्यों साहब, क्यों? आपने क्या अपना यह आश्रम बच्चों की खुशी के लिए खोला है?...तो फिर? ‘पर उपदेश कुसल बहुतेरे’....

मार्गरेट...हाँ, हाँ, मार्गरेट तक ने उस दिन क्या कह दिया था जिससे विनायक का बल्ब एकदम ‘फ्यूज’ हो गया था. ‘एम्बिशन कम्ज व्हेन अर्ली फोर्स इज स्पेंट’ (महत्वाकांक्षा तब जागती है जब प्राणऊर्जा का असली सोता सूख चुका होता है). उसने तो यों ही सहज भाव से जो उसे सूझा या याद आ गया उस प्रसंग में अनायास, उसी को व्यक्त भर किया था. विनायक कहीं से भी लक्ष्य नहीं था उस सूक्ति का; मगर पता नहीं क्यों विनायक को वह बात चुभ गई थी. बेचारी मार्गरेट को तो इसका भान ही नहीं था रत्ती भर, कि अनजाने में यूँ ही, उसके मुँह से निकल गया जुमला विनायक को कितने गहरे विषाद में डुबो गया. मगर क्यों? ऐसा क्या था उस जुमले में? उसका कार्टून सरीखा बनाता हुआ?”