हलचल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हलचल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 21 दिसंबर 2014

ऋषभ देव शर्मा सहित 3 साहित्यकारों को मिलेगा जीवनोपलब्धि सम्मान


हैदराबाद, 21 दिसंबर 2014.
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के हैदराबाद परिसर में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत साहित्यकार डॉ. ऋषभ देव शर्मा को हिंदी भाषा एवं साहित्य की उनकी सेवाओं के लिए तमिलनाडु हिंदी साहित्य आकादमी द्वारा ‘जीवनोपलब्धि सम्मान’ (लाइफटाइम एचीवमेंट एवार्ड) प्रदान करने की घोषणा की गई है. तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नै द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह सम्मान उन्हें 10 जनवरी, 2015 को ‘विश्व हिंदी दिवस’ के अवसर पर आयोजित अकादमी के तृतीय अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में दिया जाएगा. इस सम्मलेन में मुख्य अतिथि के रूप में पधार रहीं गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा यह पुरस्कार प्रदान करेंगी. 

विज्ञप्ति के अनुसार इस वर्ष का जीवनोपलब्धि सम्मान डॉ पि. के. बालसुब्रमण्यम (तमिल-हिंदी साहित्यकार, चेन्नै), डॉ. ऋषभ देव शर्मा (साहित्यकार-समालोचक, हैदराबाद) एवं वी. जी. भूमा (शास्त्रीय तमिल अनुवादक, चेन्नै) को प्रदान किया जाएगा. इन्हें 21000 रुपए की राशि, अभिनंदन पत्र, स्मृति चिह्न आदि से सम्मानित किया जाएगा. उल्लेखनीय है कि डॉ. ऋषभ देव शर्मा को आक्रोशपूर्ण हिंदी कविता के आंदोलन ‘तेवरी’ के प्रवर्तन का श्रेय प्राप्त है. उन्हें आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी और कमला गोइन्का फाउंडेशन द्वारा भी पुरस्कृत और सम्मानित किया जा चुका है. 57 वर्षीय डॉ. ऋषभ देव शर्मा के अब तक 7 कविता संग्रह और 5 आलोचना ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने 15 पुस्तकों और कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया है. सैकड़ों पुस्तकों की समीक्षा और शताधिक ग्रंथों की भूमिका लिखने वाले डॉ. शर्मा के निर्देशन में 125 शोधार्थी विभिन्न शोध उपाधियाँ प्राप्त कर चुके हैं. 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मैं ऋणी हूँ!

12 जून 2014 को नजीबाबाद में परिलेख हिंदी साधक सम्मान समारोह में उस समय मैं कृतज्ञता और आनंद से भर कर मन ही मन रो दी जब पता चला कि आदरणीय मैडम डॉ. पूर्णिमा शर्मा द्वारा लिखे गए मेरे इस परिचय को पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है. मैडम! मैं आजीवन आपकी ऋणी रहूँगी. 
--

नत नयन, प्रिय कर्मरत मन नीरजा 
-    डॉ. पूर्णिमा शर्मा


डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
सहज समर्पण भाव और विनम्रता से हिंदी की मौन सेवा में लगी रहने वाली डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा भाषा और साहित्य से अपेक्षाविहीन प्रेम करती हैं. उन्हें आज तक किसी ने किसी तरह की शिकायत करते नहीं सुना. असुविधाएँ हैं, तो हुआ करें. वे बस अपने कर्म में किसी निष्काम कर्मयोगी की भाँति लगी रहती हैं. ‘नत नयन, प्रिय कर्मरत मन’ – तोड़ती पत्थर! कभी कोई धन्यवाद दे दे तो तरल मुस्कान से चेहरा खिल उठता है. लेकिन ज्यादातर धन्यवाद कोई देता नहीं – लोग काम निकलवाने में तो माहिर होते हैं लेकिन अपनी ओर से आगे बढ़कर सहयोग व सहायता देने वालों को धन्यवाद देना कतई जरूरी नहीं समझते. ऐसा नहीं है कि डॉ. नीरजा लोगों के इस ‘नाशुक्रे’ स्वभाव को नहीं जानतीं लेकिन इसे क्या कहिए कि तमाम तरह के ‘थैंकलेस’ काम करने के अपने स्वभाव को बदलना ही नहीं चाहतीं. तो ऐसी हैं हमारी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा. वे सदा हिंदी के नाम पर हर किसी का सहयोग करने को तत्पर रहती हैं और यही कारण है कि हैदराबाद के हिंदी जगत में – छात्रों, शोधार्थियों, अध्यापकों, पत्रकारों और साहित्यकारों के बीच – वे अच्छी खासी लोकप्रिय हैं. 


डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का जन्म 11 मार्च 1975 को चेन्नै में हुआ. उनकी माताजी का नाम श्रीमती कुसुमा और पिताजी का नाम श्री गुर्रमकोंडा श्रीकांत है. माताजी सुशिक्षित गृहिणी हैं और पिताजी तेलुगु के सम्मानित पत्रकार एवं साहित्यकार. बचपन से ही नीरजा ने माँ से आत्मगोपन और पिता से गंभीरता का संस्कार पाया. उसी काल में उनके मन में कला, साहित्य, संगीत और नृत्य के प्रति प्रेम के बीज रोपे गए. आरंभिक शिक्षा-दीक्षा उन्होंने तमिल और अंग्रेजी माध्यम से प्राप्त की. घर में मातृभाषा तेलुगु का व्यवहार सीखा तथा तीन वर्ष की आयु से ही हिंदी की भी विधिवत शिक्षा प्राप्त की. मैट्रिक के बाद उन्होंने चिकित्सा संबंधी क्षेत्र में जाने का सपना देखा और विज्ञान विषयों की विधिवत पढ़ाई की. इसी बीच उन्हें अपने पिता और परिवार सहित चेन्नै से हैदराबाद आना पड़ा. दरअसल उनके पिता चेन्नै से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘सोवियत भूमि’ के तेलुगु संस्करण के संपादक थे जो सोवियत संघ के विघटन के बाद बंद हो गई. श्रीकांत जी सपरिवार हैदराबाद आ गए और कई वर्ष तक आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता-अभिनेता श्री एन.टी. रामाराव के पी.आर.ओ. के रूप में कार्यरत रहे. एन.टी.आर. के निधन के बाद तेलुगु समाचार पत्रों ‘उदयम’ और ‘वार्ता’ में काम किया. कुछ वर्ष वे ‘वार्ता’ समूह द्वारा संचालित पत्रकारिता विद्यालय के प्राचार्य भी रहे. परिवार के इस साहित्य और राजनीति मिश्रित परिवेश को आत्मसात करते हुए डॉ. जी. नीरजा ने 1995 में माइक्रोबायोलॉजी, जेनेटिक्स और केमिस्ट्री विषय लेकर उस्मानिया विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.एससी. उत्तीर्ण की. इसके बाद मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी में पीजी डिप्लोमा भी कर डाला. जैसा कि होना था, इस पाठ्यक्रम के बाद वे एक वर्ष अपोलो अस्पताल में माइक्रोबायोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत रहीं. अर्थात चिकित्सा संबंधी क्षेत्र में जाने का सपना पूरा हो गया. लेकिन पारिवारिक संस्कार शायद इस सपने से अधिक प्रबल था. भाषा और साहित्य का प्रेम बार-बार जोर मारता था. और एक दिन संस्कार ने सपने को जीत लिया. नीरजा ने वह नौकरी छोड़ दी और हिंदी क्षेत्र में छलांग लगा दी. 



2000 ई. में गुर्रमकोंडा नीरजा ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च शिक्षा और शोध संस्थान से प्रथम श्रेणी में एमए हिंदी की उपाधि अर्जित की तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया. सौभाग्यवश उन्हें प्रो. दिलीप सिंह जैसे भाषावैज्ञानिक और प्रो. ऋषभ देव शर्मा जैसे साहित्य मर्मज्ञ अध्यापकों का अहेतुक स्नेह मिला तथा इन दोनों गुरुजन की प्रेरणा से उन्होंने अनुवाद समीक्षा और अनुवाद तुलना जैसे अछूते क्षेत्र में शोधकार्य का निर्णय लिया. 2001 में उन्होंने ‘कुरुक्षेत्र : अंग्रेजी अनुवाद की समीक्षा’ पर एमफिल की शोधोपाधि प्राप्त की तथा एक और स्वर्ण पदक अर्जित किया. आगे उन्होंने ‘श्रवणकुमार कृत उपन्यास ‘प्रेत’ : अंग्रेजी अनुवाद का संदर्भ’ विषय पर शोधप्रबंध प्रस्तुत करके 2006 में पीएचडी उपाधि प्राप्त की. अपने इन शोधकार्यों के आधार पर डॉ. जी. नीरजा को बहुभाषाविद अनुवाद समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई. इस अवधि में उन्होंने स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा और पत्रकारिता डिप्लोमा की परीक्षाएँ भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर डालीं.



एमए के बाद से ही गुर्रमकोंडा नीरजा ने कई विद्यालयों में हिंदी अध्यापन का कार्य आरंभ कर दिया था. पीएचडी के बाद 2007 में उन्हें उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद परिसर में प्राध्यापक के रूप में विधिवत नियुक्ति प्राप्त हो गई. और यहाँ से शुरू हुआ भाषा और साहित्य की सेवा का उनके जीवन का नया अध्याय. उन्होंने अपनी निष्ठा और श्रमशीलता के आधार पर अल्प अवधि में ही छात्रों के मन में अपनी जगह बना ली. उन्हें स्नातकोत्तर कक्षाओं में सामान्य भाषाविज्ञान, अनुवाद विज्ञान, व्यतिरेकी विश्लेषण, अन्य भाषा शिक्षण, प्रयोजनमूलक हिंदी और समाजभाषाविज्ञान जैसे विषयों की विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है. 



शोध निर्देशक के रूप में भी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की उपलब्धियाँ प्रशंसनीय रही हैं. उनके निर्देशन में संपन्न शोधकार्यों की सूची के अवलोकन से यह पता चलता है कि उनका ज्ञान क्षेत्र कितना व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण है. उनके द्वारा निर्देशित तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद समीक्षा संबंधी शोधकार्यों में तेलुगु-हिंदी कविताओं में विद्रोही चेतना, विश्वनाथ सत्यनारायण कृत ‘वेयिपडगलु’ का हिंदी अनुवाद ‘सहस्रफण’ : अनुवाद समीक्षा, एन. गोपि कृत तेलुगु काव्य ‘कालान्नि निद्रपोनिव्वनु’ का हिंदी अनुवाद : तुलनात्मक अध्ययन, माधवीकुट्टी कृत मलयालम उपन्यास ‘वंडीकालकल’ का हिंदी अनुवाद, मुदिकोंडा शिवप्रसाद के तेलुगु उपन्यास ‘रेज़िडेंसी’ का हिंदी अनुवाद : अनुवाद समीक्षा एवं अनुवाद मूल्यांकन जैसे शोधकार्य सम्मिलित हैं. इसी प्रकार भाषा संबंधी शोधकार्य के रूप में वाणिज्यिक हिंदी : समस्याएँ और संभावनाएँ (बैंकिंग हिंदी के विशेष संदर्भ में) का उल्लेख किया जा सकता है. मीडिया विमर्श जैसे नए क्षेत्र में शोध कराना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है. डॉ नीरजा ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अलका सरावगी के उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ में मीडिया विमर्श, हिंदी ब्लॉगिंग में महिला ब्लॉगरों का योगदान विषयों पर भी शोधकार्य कराए हैं. स्त्री विमर्श डॉ. नीरजा का विशेष रुचि क्षेत्र है जिसका प्रमाण उनके द्वारा निर्देशित महुआ माजी के उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला’ में स्त्री विमर्श, चंद्रकांता कृत ‘हाशिए की इबारतें’ में स्त्री विमर्श, नीलम कुलश्रेष्ठ के कहानी संग्रह ‘हैवेनली हेल’ में स्त्री विमर्श, सिम्मी हर्षिता के उपन्यास ‘जलतरंग’ में स्त्री विमर्श, विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ में स्त्री विमर्श, मनोज सिंह के उपन्यास ‘कशमकश’ में स्त्री विमर्श जैसे शोधप्रबंध बाकायदा देते हैं. इसी प्रकार दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श का क्षेत्र भी उन्होंने अछूता नहीं छोड़ा है. इस संदर्भ में उनके द्वारा निर्देशित के.एस. तूफ़ान का दलित विमर्श : ‘टूटते संवाद’ का विशेष संदर्भ, मधुकर सिंह के उपन्यास ‘बाजत अनहद ढोल’ में आदिवासी विमर्श, नई शती के कथा साहित्य में अल्पसंख्यक विमर्श (मुस्लिम समाज के विशेष संदर्भ में) शीर्षक शोधकार्यों का अवलोकन किया जा सकता है. उनके द्वारा निर्देशित अन्य शोधप्रबंधों में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन, पुनर्जागरण के संदर्भ में बालकृष्ण भट्ट कृत ‘निबंधों की दुनिया’ का अनुशीलन, अनंत काबरा के कविता संग्रह ‘पड़ाव पर ठहरे कदम’ में सामाजिक यथार्थ, विश्वनाथ अय्यर के ललित निबंधों में दक्षिण भारत की झलक, रामदरश मिश्र के उपन्यास ‘जल टूटता हुआ’ में आंचलिकता, हरिशंकर परसाई के निबंधों में व्यक्तित्व और वैचारिकता (‘निबंधों की दुनिया’ का विशेष संदर्भ), कमलेश्वर के कहानी संग्रह ‘देस-परदेस’ में चित्रित सामाजिक समस्याएँ, उषा प्रियंवदा के कहानी संग्रह ‘एक कोई दूसरा नहीं’ में वस्तु और शिल्प, क्षमा शर्मा के कहानी संग्रह ‘रास्ता छोड़ो डार्लिंग’ में मध्यवर्ग, श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दराबारी’ में राजनैतिक चेतना, अमरकांत के उपन्यास ‘सूखा पत्ता’ में आधुनिकताबोध, राजेंद्र अवस्थी की कहानियों में आधुनिकताबोध, रामदरश मिश्र की कहानियों में ग्राम चेतना शामिल हैं. 


'परिलेख हिंदी साधक सम्मान' समारोह (12/6/2014) के अवसर पर प्रकाशित  परिचय पुस्तिका का आवरण 


नीरजा को कविताएँ लिखने का शौक छात्र जीवन से रहा. यदाकदा छपती भी रहीं. लकिन जब 2008 में उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की द्विभाषी (हिंदी-तेलुगु) साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के संपादन का दायित्व मिला, तब से उनके लेखन में नियमितता आई. यही समय था जब उन्होंने गंभीरता से तेलुगु के पुराने-नए साहित्य का अध्ययन आरंभ किया और सहज सरल भाषा शैली में तेलुगु साहित्य तथा साहित्यकारों के संबंध में लिखना आरंभ किया. उनके तेलुगु भाषा-साहित्य विषयक लेखन को ‘स्रवंति’ के साथ साथ उनके ब्लॉग ‘सागरिका’ के माध्यम से पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हुई. उनके ऐसे लेखों का एक संग्रह ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ शीर्षक से 2012 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ जिसे सुधी पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला. शीर्षस्थ तेलुगु कवि प्रो. एन.गोपि ने इस कृति की प्रशंसा करते हुए लिखा कि “तेलुगु भारत में हिंदी के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. अतः तेलुगु में निहित साहित्यिक धरोहर से हिंदी जगत को परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है. डॉ. नीरजा केवल विदुषी भर नहीं अपितु समय समय पर अपने आप को अद्यतन रखने वाली आलोचक भी हैं. इसलिए वे स्वाभाविक रूप से इतिहास बोध से भी संपन्न हैं. खास तौर पर समकालीन तेलुगु साहित्य को वे जिस दृष्टि से देख रही हैं, वह निरंतर परिवर्तित होते साहित्य के अनुशीलन का परिचायक है.” इसी प्रकार प्रमुख हिंदी भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह ने भूमिका में कहा कि “गुर्रमकोंडा नीरजा ने तेलुगु साहित्य का परिचयात्मक आकलन अपनी इस पुस्तक में दिया है. लेखिका ने जटिलता भरे विस्तार की जगह उन मुद्दों को उभारने की कोशिश की है जिनसे तेलुगु साहित्य की सामाजिकता अथवा लौकिकता का उद्घाटन हो सके और इसके जरिए तेलुगु साहित्य में मनुष्य और मनुष्यता का जो भाव प्रारंभ से ही अंतर्भुक्त है, उभार पा सके. जी.नीरजा की यह पैनी दृष्टि ही पुस्तक की प्राण-रेखा है.” इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लिखा है कि “पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ में लेखिका डॉ. जी.नीरजा ने तेलुगु के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों का साहित्यिक परिचय देते हुए जहाँ एक ओर इस बात का खयाल रखा है कि सूचना और विवेचन दोनों का मणिकांचन संयोग हो सके, वहीं यह भी ध्यान रखा है कि इन निबंधों के माध्यम से हिंदीभाषी समाज आंध्र प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को भी हृदयंगम कर सके. विषयवस्तु की दृष्टि से यह निबंध संग्रह तेलुगु साहित्य के विविध कालों, विविध विधा प्रकारों, विविध प्रवृत्तियों और विविध साहित्यकारों को समेटे हुए है.” इतना ही नहीं, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. देवराज ने नीरजा की इस पुस्तक की विस्तृत समीक्षा करते हुए ‘संकल्य’ मासिक में लिखा है कि “गुर्रमकोंडा नीरजा की इस पुस्तक में अन्नमाचार्य, कृष्णदेव राय, त्यागराज, वीरेशलिंगम पंतुलु, कशीनाथुनि नागेश्वराराव पंतुलु, गुरजाडा वेंकट अप्पाराव, उन्नव लक्ष्मीनारायण, जनकवि श्री श्री, दिगंबर कवि ज्वालामुखी, त्रिपुरनेनि गोपीचंद, आरुद्रा, डी. कामेश्वरी आदि के साहित्यिक अवदान के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराई गई है. स्मरणीय है कि भारतीय नवजागरण का सांस्कृतिक और साहित्यिक परिदृश्य वीरेशलिंगम पंतुलु और गुरजाडा अप्पाराव जैसे कालजयी रचनाकारों के कृतित्व को जाने बिना नहीं समझा जा सकता. नीरजा की पुस्तक से पता चलता है कि वीरेशलिंगम पंतुलु आंध्र साहित्य के भारतेंदु हैं. उन्हें गद्य ब्रह्म और गद्य तिक्कना भी कहा जाता है. उन्होंने आंध्र में जाति-विरोध आंदोलन का सूत्रपात किया था. वे लिखती हैं, “तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर वीरेशलिंगम ने जनता को चिर निद्रा से जगाया, चेताया, स्त्री सशक्तीकरण को प्रोत्साहित किया, स्त्री शिक्षा पर बल दिया, बालविवाह का खंडन किया, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और ज़मींदारी प्रथा का विरोध किया. उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर दिखाई नहीं देता. उन्होंने 11 दिसंबर, 1881 को प्रथम विधवा पुनर्विवाह संपन्न करवाया जिसके कारण उनकी कीर्ति देश-विदेश में फ़ैल गई. वीरेशलिंगम पंतुलु ने अपने एक-सौ तीस ग्रंथों से तेलुगु साहित्य को समृद्ध किया, जिनमें राजशेखर चरित्रमु जैसा मौलिक उपन्यास तथा कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम का तेलुगु रूपांतर शामिल है.” प्रो. देवराज ने आगे लिखा है कि “वर्तमान में भारतीय भाषाओं के साहित्य और भारतीय साहित्य पर नए सिरे से विमर्श की शुरूआत हुई है. इस परिघटना में हिंदी समालोचना से सबसे अधिक सक्रियता की अपेक्षा है. जो समीक्षक हिंदी में हिंदी के इतर भाषाओं और उनके साहित्य पर केंद्रित कार्य करने में समर्थ हैं वे भारतीय साहित्य की परिकल्पना को यथार्थ बनाने में वास्तविक रचना-घटक की भूमिका निभा सकते हैं. इस अभियान में इतनी सावधानी भी ज़रूरी है कि उनके द्वारा प्रतुत सामग्री विश्लेषणपरक और प्रामाणिक हो. उसमें अंतिम निष्कर्ष देने की जल्दबाजी न हो. गुर्रमकोंडा नीरजा भारतीय साहित्य के इस अभियान से जुड़ने को संकल्पबद्ध हुई हैं, उन्हें मेरी शुभकामनाएँ; और उनसे यह अपेक्षा भी कि वे अपने अध्ययन में और अधिक गंभीरता, और अधिक गहराई लाने की कोशिश करेंगी.” 



नीरजा अध्यापक, संपादक, समीक्षक और कवयित्री तो हैं ही, बहुभाषाविद होने के नाते अच्छी अनुवादक भी हैं. उन्होंने हिंदी से तमिल और तेलुगु में तथा अंग्रेजी से हिंदी व हिंदी से अंग्रेजी में काफी साहित्यिक और साहित्येतर पाठों का अनुवाद किया है. तेलुगु के नागार्जुन माने जाने वाले प्रजाकवि पद्मविभूषण डॉ. कालोजी नारायणराव की जन्मशताब्दी पर विशेष रूप से प्रकाशित 100 कविताओं के हिंदी अनुवाद कार्य से वे अनुवादक मंडल के एक सदस्य के रूप में तो संबद्ध रहीं ही, अनुवाद-संपादन का कार्य भी अत्यंत मनोयोग और सफलता से निभाया जिसकी तेलुगु और हिंदी दोनों ही के साहित्यिक हलकों में भूरि भूरि प्रशंसा हुई है. 



परिचयकर्ता  डॉ. पूर्णिमा शर्मा और सम्मानित  डॉ. जी. नीरजा 
हिंदी भाषा और साहित्य की निष्काम सेवा में रत डॉ. नीरजा के काम पर विभिन्न साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थाओं का ध्यान जाना स्वाभाविक है. यही कारण है कि उन्हें कई सम्मानों-पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है जिनमें आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी का ‘युवा लेखक पुरस्कार (2012)’ तथा तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी का ‘साहित्य सेवी सम्मान (2014)’ उल्लेखनीय हैं. इतना ही नहीं, 2012 में जब हैदराबाद से भाषा, संस्कृति और विचारों की अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘भास्वर भारत’ आरंभ हुई तो उसके संपादक-प्रकाशक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने डॉ. नीरजा को मानद साहयक संपादक के रूप में उसमें शामिल करना आवश्यक समझा. 



कुलमिलाकर यह कहना उचित होगा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा हिंदी और तेलुगु के बीच साहित्यिक सेतुबंध के महान अनुष्ठान में अपना शक्तिभर योगदान करने में सदा निरभिमान हिंदी सेवी की तरह तत्पर रहती है.उनको ''परिलेख हिंदी साधक सम्मान -2014'' से सम्मानित किया जाना उचित ही है. मैं उनके उज्ज्वल भविष्य और समृद्ध जीवन के लिए शुभकामना करती हूँ. 



  डॉ. पूर्णिमा शर्मा, 



208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013, मो. 08125336300

सोमवार, 31 मार्च 2014

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने किया 4 दिवंगत साहित्यिकों का पुण्य स्मरण


हैदराबाद 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में 29-30 मार्च 2014 को संस्थान के बेलगाम [कर्नाटक] केंद्र में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी [पुण्य-स्मरण] आयोजित की गई.यह राष्ट्रीय संगोष्ठी गत दिनों दिवंगत हुए चार साहित्यकारों राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया और ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुण्य-स्मृति को समर्पित थी. इस अवसर पर आंध्र-सभा की पत्रिका ‘स्रवंति’ का इन्हीं साहित्यकारों पर केंद्रित विशेषांक भी प्रकाशित किया गया.
प्रबुद्ध श्रोता गण
संगोष्ठी के निदेशक प्रो. दिलीप सिंह, संयोजक डॉ. वी. एन. हेगडे तथा डॉ. सी.एन. मुगूटकर की अपील पर साहित्य प्रेमियों, प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने  दो दिन के इस राष्ट्रीय समारोह में बड़ी संख्या में शिरकत की.

 उद्घाटन  सत्र : विरले साहित्यकारों  का आत्मीय स्मरण 
29 मार्च 2014. 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में बेलगाम [कर्नाटक] में 'पुण्य स्मरण : कैलाश चंद्र भाटिया, राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, ओमप्रकाश वाल्मीकि' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संपन्न हुआ.
उद्घाटन दीप प्रज्वलित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. एम. वेंकटेश्वर.
साथ में बाएं से - प्रो. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. वी.एन. हेगडे, प्रो. हीरालाल बाछोतिया, प्रो. दिलीप सिंह
व अन्य 

बीज भाषण करते हुए प्रो. दिलीप सिंह 
बीज भाषण देते हुए प्रमुख समाजभाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह ने विगत 14 महीने में दिवंगत हुए विभिन्न साहित्यकारों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी. विजयदान देथा को मनुष्य की जिजीविषा को अभिव्यक्त करने वाले तथा राजस्थानी लोककथाओं को हिंदी में लाने वाले कथाकार के रूप में याद किया तो के.सी. सक्सेना को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे हास्य-व्यंग्य के जीवट से परिपूर्ण कथाकार थे जो अपने ऊपर भी हंस सकते थे.

डॉ. रघुवंश के साथ जुड़ी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. रघुवंश के साथ उन्होंने समसामयिक कविता पर काम किया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के एम.ए. पाठ्यक्रम के लिए 'समसामयिक हिंदी कविता' पुस्तक का संपादन किया. उन्होंने आगे कहा कि वे डॉ. रघुवंश से प्रभावित थे क्योंकि दोनों हाथों से लाचार होते हुए भी उन्होंने पैर की अंगूठी और उंगली के बीच कलम रखकर लिखने का अभ्यास किया. उन्होंने कहा कि रघुवंश अपनी तरह के अकेले काव्यालोचक थे. वे आलोचना से ज्यादा पाठक को महत्व देते थे.

डॉ. सी. प्रसाद को अच्छे बाल साहित्यकार के रूप में याद किया तो शैलेश मटियानी के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि शैलेश मटियानी ने मजदूर की जिंदगी जी. इसलिए उनकी कलम कटु यथार्थ की अभिव्यंजना का हथियार है. अमरकांत के बारे में उन्होंने कहा कि कस्बाई जीवन के पहलुओं को अपने लेखन में समेटने में अमरकांत दक्ष थे. वे लिखते नहीं थे, बोलते थे.

डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया का स्मरण करते हुए उन्हें हिंदी भाषा के गहरे अध्येता एवं चिंतक बताया तथा डॉ. परमानंद श्रीवास्तव को 'नई राहों के अन्वेषी आलोचक' के रूप में याद करते हुए कहा कि वे जीवन पर्यंत मार-काट वाली आलोचना का विरोध करते रहे. राजेंद्र यादव के बारे में बात करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि हिंदी साहित्य जगत में उनसे जयादा बखेड़े किसी अन्य साहित्यकार ने नहीं खड़े किए होंगे. राजेंद्र यादव की भाषा पर प्रकाश डालते हुए प्रो. सिंह ने उसे चुनौती और ललकार की भाषा बताया. बीजभाषणकर्ता ने ओमप्रकाश वाल्मीकि को हिंदी साहित्य जगत में पहली बार दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को लाने वाले साहित्यकार के रूप में स्मरण किया और कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का सारा साहित्य स्वयं में दलित आंदोलन है और उनकी कवितायें वस्तुतः छोटी छोटी चित्रावालियाँ लगती है.

मुख्य अतिथि का संबोधन : प्रो. एम. वेंकटेश्वर 

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि साहित्य का पठन-पाठन सतही स्तर पर करना या व्याख्या भर करना काफी नहीं होता. गहन अध्ययन और विश्लेषण की आवश्यकता आज की माँग है. पाठक को चिंतन एवं भावनात्मक स्तर पर किसी भी साहित्यकार के साथ तादात्म्य करना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि यह संगोष्ठी निश्चय ही चुनौती से भरी हुई है चूंकि यह ऐसे साहित्यकारों पर केंद्रित है जिन्होंने साहित्य, भाषा, आलोचना, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान जैसे क्षेत्रों के लिए दिशा निर्देशक कार्य किया है. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से प्रकाशित द्विभाषी मासिक 'स्रवंति' का मार्च 2014 का अंक इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए कर्टन रेसर है क्योंकि यह अंक विशेष रूप से परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राजेंद्र यादव और अमरकांत के पुण्य स्मरण पर केंद्रित है.

अध्यक्षीय भाषण में दिल्ली से पधारे वरिष्ठ कवि एवं भाषाविद प्रो. हीरालाल बाछोतिया ने कहा कि चारों स्मरणीय विभूतियों ने अपने रचनाकर्म द्वारा हिंदी को अक्षुण्ण विचार संपदा से समृद्ध किया है. परमानंद श्रीवास्तव आलोचक और संपादक के साथ साथ विरले कवि थे तो राजेंद्र यादव कथाकार और संपादक के साथ विरले विमर्शकार थे. इसी प्रकार ओमप्रकाश वाल्मीकि केवल दलित साहित्य के ही रचनाकार नहीं थे, विरले समाज चिंतक भी थे तथा डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया पुरातन और अधुनातन का समन्वय करने वाले विरले हिंदी भाषावैज्ञानिक थे.

उद्घाटन सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, धारवाड़ की अध्यक्ष प्रो. अमरज्योति ने किया.

विचार सत्र 1 : परमानंद श्रीवास्तव 


29 मार्च 2014.
उद्घाटन सत्र के बाद पहला विचार सत्र प्रारंभ हुआ. परमानंद श्रीवास्तव को समर्पित इस सत्र की अध्यक्षता दिल्ली से पधारे प्रो. रामजन्म शर्मा ने की. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. नजीम बेगम (चेन्नै), डॉ. शकीला बेगम (धारवाड़), डॉ. बिष्णुकुमार राय (एरणाकुलम) और डॉ.सी.एन. मुगूटकर (बेलगाम) मंचासीन थे. इस सत्र में पाँच शोधपत्र प्रस्तुत किए गए. 

डॉ. नजीम बेगम ने परमानंद श्रीवास्तव के संपादक रूप को उदाहरणों सहित उभारा तो डॉ. शकीला बेगम ने परमानंद श्रीवास्तव के चिंतक रूप को काव्य भाषा के संदर्भ में स्पष्ट किया. डॉ. बिष्णुकुमार राय ने काव्य प्रयोजन के संदर्भ में उनके चिंतक रूप को स्पष्ट किया तो डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने उनके चिंतन में निहित साहित्य और मनुष्य के संबंध को रेखांकित किया. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने डॉ. परमानंद श्रीवास्तव के कवि-आलोचक पक्ष पर अपना शोध पत्र पढ़ा. 

प्रो. रामजन्म शर्मा 
अध्यक्षीय भाषण में प्रो. रामजन्म शर्मा ने परमानंद श्रीवास्तव के साथ बिताए हुए क्षणों का स्मरण करते हुए कहा कि वे कर्मठ और सुशील व्यक्ति थे. वे नए लोगों को प्रोत्साहित करते थे और उन्हें कविता और लेखन कर्म के गुर सिखाते थे. गोरखपुर में अनेकानेक कवियों और लेखकों को बनाने का काम उन्होंने किया. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि दिल्ली एन सी ई आर टी के पास उनसे संबंधित दुर्लभ पांडुलिपि है 'साहित्यकारों के पत्र' जो आज तक अप्रत्याशित कारणों से अप्रकाशित है. उन्होंने ठोंक बजाकर यह कहा कि हिंदी साहित्य जगत में परमानंद श्रीवास्तव ही ऐसे व्यक्ति थे जो लगातार कविता और आलोचना कर्म को एक साथ साधे हुए थे. उन्होंने आगे कहा कि परमानंद श्रीवास्तव ने जीवनपर्यंत साहित्य की सेवा की. सामाजिक सरोकार उनकी कविता की अंतर्वस्तु है तथा लोकतत्व उनकी कविता का अनुगूंज. यदि वे किसी रचना को उठाते हैं तो उसकी जड़ तक पहुँचते हैं और उस रचना की वस्तु से लेकर शिल्प और शैली तक की संरचना की बात करते हैं. परमानंद श्रीवास्तव का साहित्य उत्तर आधुनिक ही नहीं बल्कि उत्तरोत्तर साहित्य है.      

सत्र का सचालन डॉ. के.एस. पाटील (बेलगाम) ने किया. 

विचार सत्र 2 : राजेंद्र यादव 
बाएं से - डॉ. के.एस. पाटील, डॉ. एच. आर. घरपणकर, प्रो. अर्जुन चव्हाण और प्रो. पी. राधिका 

29 मार्च 2014.
भोजनोपरांत राजेंद्र यादव की स्मृतियों को समर्पित दूसरा विचार सत्र प्रारंभ हुआ. इस सत्र की अध्यक्षता कोल्हापुर विश्विद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अर्जुन चव्हाण ने की.

इस सत्र में एर्णाकुलम से पधारी प्रो. पी. राधिका ने राजेंद्र यादव के साहित्य में निहित स्त्री पक्ष को उजागर किया तो धारवाड़ से पधारे डॉ. एच.आर. घरपणकर ने दलित पक्ष से संबंधित राजेंद्र यादव के विचारों को स्पष्ट करने का प्रयास किया. डॉ. के.एस. पाटील ने सांप्रदायिकता के संदर्भ में राजेंद्र यादव की मान्यताओं पर चर्चा की.

यह सत्र विचारोत्तेजक सत्र रहा. अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए हैदराबाद से पधारे प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि हिंदी में आज दलित साहित्य की स्थिति मजबूत है. आज हिंदी में दलित पत्रकारिता भी सशक्त है. दलित समस्या वर्गगत समस्या नहीं है बल्कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है. राजेंद्र यादव को मानवतावादी संवेदना से युक्त साहित्यकार बताया जो पाश्चात्य साहित्य के गजब अध्येता थे तथा मानते थे कि जीवन को डिक्टेट नहीं किया जा सकता है बल्कि उसे वैसे ही जीना पड़ता है जैसे वह हमें मिलता है, परंतु इसे दूसरों के लिए जीने योग्य बनाना भी आवश्यक है. 

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. अर्जुन चव्हाण ने कहा कि राजेंद्र यादव एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्था का नाम है. वे जिंदगी से भागने वाले व्यक्ति नहीं थे, जिंदगी में सबको साथ लेकर चलने वाले कर्मठ और जुझारू व्यक्ति थे. वे किसी भी मुद्दे पर बेबाक टिप्पणी करते थे. 

सत्र का संयोजन डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने किया.

विचार सत्र 3 : ओमप्रकाश वाल्मीकि 
बाएं से - डॉ. संजय मादार, डॉ. अमर ज्योति, डॉ. टी.आर. भट्ट,
डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. वी.एन. हेगड़े , डॉ. मंजुनाथ अंबिग और डॉ. मृत्युंजय सिंह  

30 मार्च 2014.
दूसरे दिन का पहला सत्र (विचार सत्र-3) ओमप्रकाश वाल्मीकि पर केंद्रित रहा.  अध्यक्ष थे प्रो. टी.आर. भट्ट.

डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. अमर ज्योति, डॉ. मंजुनाथ अंबिग, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. संजय मादार और डॉ. वी.एन. हेगडे ने क्रमशः आत्मकथा साहित्य, कथा साहित्य, काव्य, सौंदर्यशास्त्र, दलित प्रश्न तथा भाषिक वैशिष्ट्य की दृष्टि से ओमप्रकाश वाल्मीकि के योगदान का विश्लेषण किया. 

अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. टी.आर. भट्ट ने कहा कि आज के अवर्णों के बीच एक ऐसा वर्ग तैयार हो रहा है जो अपने आपको उच्च मानता है और दूसरे अवर्णों को निम्न. आज सवर्ण और अवर्णों के बीच नहीं बल्कि अवर्ण और अवर्ण के बीच जातिभेद प्रबल होता जा रहा है. उन्होंने कन्नड़ दलित साहित्य की बात करते हुए कहा कि वेंकट सुब्बय्या और देवनूर महादेव जैसे अनेक साहित्यकारों ने  दलित लेखन को आगे बढाया है. उन्होंने आगे कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की भांति कन्नड़ में भी देवनूर महादेव (1948) दलित साहित्य के अत्यंत सशक्त व प्रतिनिधि कथाकार हैं जिन्होंने  भोगे हुए यथार्थ को अपने कथासाहित्य में सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया. उनका लेखन स्वानुभूतिपरक सृजनात्मक लेखन है. उन्होंने 1971 में मैसूर जनजातियों की भाषा में उपन्यास का सृजन किया. यह ध्यान देने की बात है कि देवनूर महादेव को उनके उपन्यास 'कुसुम बाले' के लिए 1990 में केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा 2011 में 'पद्मश्री' से अलंकृत किया गया है. 

इस सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, एरणाकुलम केंद्र के प्राध्यापक डॉ. बिष्णुकुमार राय ने किया. 

विचार सत्र 4  : डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया 
बाएं से - डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ, हीरालाल बाछोतिया, डॉ. दिलीप सिंह, डॉ. एम. वेंकटेश्वर और डॉ. ऋषभ देव शर्मा 

30 मार्च 2014.
भाषाविद डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया पर केंद्रित चौथे विचार सत्र की अध्यक्षता प्रमुख समाजभाषाविज्ञानी प्रो. दिलीप सिंह ने की. साथ में, डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. हीरालाल बाछोतिया मंचासीन थे. 

प्रो. एम. वेंकटेश्वर 
डॉ. एम. वेंकटेश्वर ने डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के कोशकार रूप को रेखांकित किया. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाटिया जी के 'अंग्रेजी-हिंदी अभिव्यक्ति कोश', 'हिंदी-अंग्रेजी मुहावरा लोकोक्ति कोश' और 'अंग्रेजी-हिंदी प्रशासनिक कोश' आदि बहुत ही महत्वपूर्ण हैं तथा उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अनुवाद, राजभाषा, प्रयोजनमूलक क्षेत्र, प्रशासन आदि क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लिए ये महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. विशिष्ट प्रयुक्तिगत क्षेत्रों में शब्द चयन के लिए मानक कोश हैं. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कैलाशचंद्र भाटिया कोश निर्माण और कोश प्रयोग पर बल देते थे. वे जुनून के साथ काम करते थे. भाटिया जी ने द्वितीय भाषा शिक्षण के लिए भी सहायक सामग्री तैयार की थी. वे कुशल शिक्षक थे. 

प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने यह भी स्पष्ट किया कि इन हस्ताक्षरों के जाने से हिंदी भाषा, साहित्य और भाषाविज्ञान के क्षेत्र में रिक्तता पैदा हो गई है चूंकि दूसरी पीढ़ी अभी तक तैयार नहीं हो पाई. अतः उन्होंने साहित्य, भाषा, शिक्षण आदि क्षेत्रों से जुड़े हस्ताक्षरों से यह अपील की कि वे दूसरी पीढ़ी को तैयार करें. उन्होंने इस अवसर पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह को बधाई दी क्योंकि वे निरंतर अगली पीढ़ी को तैयार करने में जुटे हुए हैं. इतना ही नहीं उन्होंने युवा पीढ़ी से कहा कि अहंकार को त्याग कर कार्य करने में जुनून के साथ जुट पड़े. उन्होंने आगे यह भी कहा कि यह सिर्फ गुरु के समक्ष अपने आपको समर्पित करने से संभव होगा.

डॉ. हीरालाल बाछोतिया 
डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने कैलाशचंद्र भाटिया के अनुवाद चिंतन को उदाहरणों के साथ स्पष्ट किया और कहा कि भाटिया जी भाषा की मानकता की रक्षा करने के पक्षधर थे. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाटिया जी ने प्रयोजनमूलक रूप को पारिभाषित करने के लिए विविधतापूर्ण सामग्री तैयार की और उनकी दृष्टि हमेशा भाषा के अनुप्रयोग पक्ष पर  रहती थी. आगे उन्होंने भाटिया जी के अनुवाद चिंतन को स्पष्ट करते हुए कहा कि वे अनुवाद और अनुवादक को दोयम दर्जे का न मानकर उच्च कोटि का मानते थे तथा उन्होंने हिंदी भाषा के आधुनिकीकरण के आलोक में अनुवाद की चर्चा की है. उनकी मान्यता है कि हर भाषा की अपनी निजी क्षमताएँ होती हैं. वे लोक बोलियों के पक्षधर थे. वे मानते थे कि भाषा मूलतः शब्द है और शब्द 'संस्कृति' के वाहक. वे अक्सर इस बात पर बल देते थे कि जिस भाषा से अनुवाद कर रहे हैं उस भाषा से टकराना अनिवार्य है चूंकि दो शब्दोंकी  टकराहट से ही अर्थ की आग पैदा होती है. उन्होंने कैलाशचंद्र भाटिया के साथ गुजारे हुए क्षणों को भी याद किया.

प्रो. ऋषभ देव शर्मा 
डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने कैलाशचंद्र भाटिया के काव्य भाषा संबंधी विचारों की व्याख्या करते हुए कहा कि भाटिया जी साहित्य के मर्मज्ञ ऋषि थे. उनकी स्मरण शक्ति विलक्षण थी. उन्हें प्राचीन कवियों से लेकर आधुनिक कवियों तक की अनेक काव्य पंक्तियाँ कंठस्थ थीं. काव्यभाषा के अध्ययन के लिए उन्होंने अपना निजी मॉडल अपनाया जो ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का अनुप्रयुक्त मॉडल है. वे यह मानते थे कि अनुभूति और अभिव्यक्ति में अन्योन्याश्रय संबंध है. उनकी मान्यता है कि वस्तु और रूप को अलग अलग नहीं देखा जा सकता. उनकी पुस्तक 'हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ' में राउलवेल (शिलांकित काव्य) से लेकर नई कविता तक 22 निबंध सम्मिलित हैं. वे इन निबंधों में भाषा विकास के वर्तन बिंदुओं  को बार बार रेखांकित करते चलते हैं. वे साधारणता की ओर जाते हैं. वे मानते हैं की सृजनात्मकता के लिए तद्भवता और देशजता अनिवार्य है. वे हर निबंध के अंत में निर्भ्रांत टिप्पणी के रूप में अपनी स्थापना देते हैं. उनकी भाषा में वागाडम्बर नहीं है. वे मानते हैं  कि  काव्यभाषा के रूप में समय समय पर जनभाषा को ही अपनाया गया.

प्रो. रामजन्म शर्मा 
डॉ. रामजन्म शर्मा ने कैलाशचंद्र भाटिया के साथ बिताए हुए क्षणों को याद करते हुए कहा कि वे सरल और कोमल व्यक्ति थे; साथ ही कठोर, नियमबद्ध और अनुशासनप्रिय व्यक्ति भी. वे हालात से समौझाता नहीं करते. वे मानते थे कि  समाज ही भाषा का वास्तविक रजिस्टर होता है.

अत्यंत भावपूर्ण अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि कैलाशचंद्र भाटिया ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की धारा बदल दी. वे बोलीविज्ञान और क्षेत्रीय भाषाविज्ञान पर बल देते थे. उन्होंने यह आक्रोश वक्त किया कि कैलाशचंद्र भाटिया के बाद भाषाविज्ञान विशेष रूप से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान में बहुत बड़ा गैप पैदा हो चुका है जिसे कवर पाना बहुत ही कठिन कार्य है. उन्होंने बल देते हुए कहा कि धीरेंद्र वर्मा और भाटिया जी ने हिंदी के लिए बहुत काम किया है जिसे देखना और समझना हमारा कर्तव्य है. उन्होंने आगे यह कहा कि आज वे भी लड़खड़ाते हुए उन्हीं पगडंडियों पर चलते हैं. उन्होंने कहा  कि सबकी अपनी अपनी मातृभाषाएँ हैं. इन मातृभाषाओं में  क्षेत्रीय विकल्प हैं. उन्होंने सबके सामने प्रश्न चिह्न लगाया कि उन बोलियों की ओर कितने लोगों का ध्यान जा रहा है. क्या उन विकल्पों पर कोई काम करेगा, उन बोलियों में लिखे गए साहित्य का अनुवाद किया जाएगा, या फिर पिछड़ों और दलितों की भाषा कहकर उन्हें यों ही नष्ट होने दिया जाएगा. ये ऐसे प्रश्न हैं जो बार बार प्रो. दिलीप सिंह को कचोट रहे हैं. वे इस बात से विचलित हैं कि आगे इन भाषाओं का क्या होगा! उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र में कितना शोधकार्य हो रहा है? उन्होंने कहा कि भाटिया जी के साथ साथ दस लोगों ने इस क्षेत्र में कार्य किया अपने निजी मॉडल के साथ, पर उनकी भी अपनी अपनी सीमा थी.

प्रो.दिलीप सिंह के साथ
प्रो. एम. वेंकटेश्वर और प्रो. ऋषभ देव शर्मा
 
प्रो. दिलीप सिंह ने यह याद दिलाया कि रमानाथ सहाय, कैलाशचंद्र भाटिया और रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने मिलकर एन सी ई आर टी के लिए हिंदी का व्याकरण तैयार किया था जिसमें कामताप्रसाद गुरु जी के व्याकरण की सीमाओं को पहचान कर आधुनिक और व्यावहारिक व्याकरण का निर्धारण किया गया था  क्योंकि गुरु जी के समय तक  आधुनिक हिंदी का इतना विकास नहीं हुआ था. लेकिन आज तक भी व्याकरण की यह किताब एन सी ई आर टी के गोदाम में  धूल फाँक रही है.  उन्होंने यह भी कहा कि भाटिया जी बोली के बिना भाषा की बात स्वीकार नहीं करते. उनकी मान्यता है कि बोलियों का एसेंस/ स्वाद/ ज़ायका किसी भी साहित्य के लिए अनिवार्य तत्व है.

इस सत्र का संचालन स्नातकोत्तर कॉलेज, बेलगाम की प्राध्यापक डॉ. माधव बागी ने किया.

बाएं से - डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. टी.आर. भट्ट, डॉ. जयशंकर यादव और डॉ. अर्जुन चव्हाण 

30 मार्च 2014

समापन समारोह में डॉ. टी. आर. भट्ट (धारवाड़) और डॉ. ऋषभ देव शर्मा (हैदराबाद) ने संगोष्ठी की समीक्षा की और आशा व्यक्त की कि यह रागात्मक और भावनात्मक संबंध बना रहे. बतौर मुख्य अतिथि डॉ. अर्जुन चव्हाण (कोल्हापुर) ने संगोष्ठी के आयोजकों को बधाई दी. अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए डॉ. जयशंकर यादव (बेलगाम) ने कहा कि बेलगाम के इस स्नातकोत्तर भवन में दो दिनों तक भाषाई सौहार्द अंतःसलिला के रूप में प्रवाहित होता रहा. यह आनंद ही साहित्य और जीवन का सरोकार है.

समापन सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, बेलगाम केंद्र के प्रभारी डॉ. वी.एन. हेगडे ने किया. प्राध्यापक डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा सामूहिक जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

(प्रस्तुति - डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, बेलगाम से लौटकर) 

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिंदी दिवस पर ‘आधुनिक रामायण’

सितंबर का महीना आते ही हिंदी से जुड़े सब अध्यापक, प्राध्यापक, प्रोफेसर और हिंदी अधिकारी आदि बहुत ही व्यस्त हो जाते हैं हिंदी दिवस के कार्यक्रमों में. आज मुझे निर्णायक के रूप में ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ जाने का सुअवसर मिला. वहाँ जाने के बाद मुझे यह पता चला कि ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ के तत्वावधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में द्विदिवसीय हिंदी उत्सव – ‘उमंग 2013’ का आयोजन किया गया. इस आयोजन का उद्घाटन 12 सितंबर को हुआ था. उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद की विभा भारती उपस्थित रहीं. ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ की प्राचार्या क्षमा गोस्वामी के निर्देशन में कार्यक्रम की शुरुआत हुई. हिंदी विभाग की वरिष्ठ अध्यापक मीरा ठाकुर और अन्य साथियों के मार्गदर्शन में बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए. 

आज (13 सितंबर 2013) कार्यक्रम के दूसरे दिन अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया - हास्य-व्यंग्य नाटक, नुक्कड़ नाटक, भाषण और निबंध लेखन. हास्य-व्यंग्य और नुक्कड़ नाटक के निर्णायकगण थे विक्रम सूर्यवंशी (इंटरनेशनल स्कूल, शेक्पेट) और आयशा बेगम (इनसाइट स्कूल). प्रीति सिंह (आर्मी स्कूल, गोलकोंडा) और मैं भाषण और निबंध प्रतियोगिता के निर्णायक थे. हमारे साथ ‘ग्लेंडेल अकादमी इंटरनेशनल’ की अंग्रेजी अध्यापक प्रीति भी निर्णायक के रूप में उपस्थित रही. 

भाषण प्रतियोगिता शुरू होने में समय था तो हम भी हास्य-व्यंग्य प्रतियोगिता देखने के लिए बैठ गए. सिर्फ एक ही नाटक देख पाई क्योंकि उसके बाद भाषण प्रतियोगिता शुरू. मैं उस नाटक के बारे में आप से शेयर करना चाहती हूँ. 

आर्मी स्कूल, गोलकोंडा के पांचवी सेसातवीं कक्षा के विद्यार्थियों ने हास्य-व्यंग्य नाटक ‘आधुनिक रामायण’ का मंचन किया. वनवास का दृश्य. सीता राम से पिज्जा और बर्गर की जिद कर रही थी. राम सीता को समझाने में व्यस्त थे और लक्ष्मण मोबाइल फोन में. सीता की जिद को पूरा करने के लिए राम और लक्ष्मण पिज्जा और बर्गर को दूँढ़ने के लिए जाते हैं तो रावण मोबाइल की भिक्षा मांगते हुए आ जाता है और सीता का अपहरण करके लंका ले जाता है. राम और लक्ष्मण सीता को मोबाइल सिग्नल्स के माध्यम से खोज निकालते हैं. वानर सेना के साथ राम-लक्ष्मण लंका पहुँच जाते हैं. उनके बीच युद्ध होता है. स्टेनगन के साथ युद्ध करते हैं. रावण को मारने के लिए लक्ष्मण गूगल सर्च इंजन में समाधान दूंढ़ता है – रावण को कैसे मारा जा सकता है? रावण को मार कर सीता के साथ अयोध्या वापस जाते हैं और जाते समय राम सीता को बर्गर भेंट के रूप में देते हैं. नाटक का अंत हुआ इस पंच लाइन के साथ – ‘नई टेकनोलॉजी का कमाल! जय मोबाइल!!’ 

सभी बाल कलाकरों ने बहुत आत्मविश्वास के साथ मंचन किया. वहाँ उपस्थित सभी ने खूब मजा लिया. इस नाटक ने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल किया. 

भाषण प्रतियोगिता में आठवीं से लेकर बारहवीं कक्षाओं तक के विद्यार्थियों ने भाग लिया. सभी ने आत्मविश्वास के साथ परफोर्म किया. निर्णय लेना कठिन हो गया था कि किसको प्रथम दें और किसको द्वितीय. खैर प्रतियोगिता है तो एक को ज्यादा और एक को कम अंक देना ही पड़ता है. लेकिन सभी प्रतिभागी विजेता ही हैं.

निबंध प्रतियोगिता में भी वही हुआ. तीनों निर्णायकों के अंकों को मिलाकर प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों की घोषणा हुई. 

समापन समारोह में विजेताओं को पुरस्कार दिया गया. 

आज का दिन बहुत अच्छा बीता.

बुधवार, 1 मई 2013

आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी पुरस्कार - 2012


आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद द्वारा 29 अप्रैल 2013  को आयोजित हिंदी महोत्सव के अवसर पर   
बाएँ से - डॉ.बी.सत्यनारायण, शशि नारायण  स्वाधीन, डॉ.ए.वी.सुरेश कुमार, अजय मिश्रा,
  'पद्मभूषण डॉ मोटूरि सत्यनाराण पुरस्कार' ग्रहीता ईमनि  दयानंद,  डॉ .के.दिवाकराचारी. 
 'तेलुगुभाषी युवा हिंदी लेखक पुरस्कार' ग्रहीता  डॉ.जी.नीरजा और मुनुकुटला पद्माराव


वरिष्ठ तेलुगुभाषी हिंदी लेखक  ईमनि दयानंद को
 'पद्मभूषण डॉ मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार' प्रदान करते हुए
मुख्य अतिथि अजय मिश्र और अकादमी के अध्यक्ष डॉ.के.दिवाकराचारी  

आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के निदेशक डॉ. के. दिवाकराचारी और
 समारोह के मुख्य अतिथि व उच्च शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव  अजय मिश्र  के हाथों 
 'तेलुगुभाषी युवा हिंदी लेखक पुरस्कार'  ग्रहण करते हुए डॉ.जी.नीरजा 

डॉ. जी. नीरजा को 'तेलुगुभाषी युवा हिंदी लेखक पुरस्कार' का स्मृति चिह्नभेंट करते हुए 
आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के निदेशक डॉ. के. दिवाकराचारी और 
समारोह के मुख्य अतिथि व उच्च शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव अजय मिश्र 


हिंदी अकादमी का पुरस्कार वितरण संपन्न


आंध्र-प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद के तत्वावधान में ‘हिंदी दिवस 2012’ के उपलक्ष्य में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह प्रतिष्ठित पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार ईमनि दयानंद को दिया गया | इसके तहत उन्हें एक लाख रुपये की राशि दी गयी | 

गगन विहार स्थित आंध्र-प्रदेश हिंदी अकादमी सभागार में आयोजित समारोह में उपस्थित मुख्य अतिथि प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव अजय मिश्र ने ईमनि दयानंद को पुरस्कार दिया | इसके अलावा हिंदी युवा लेखक पुरस्कार डॉ.नीरजा को, तमिल भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार डॉ.ए. वी. सुरेश कुमार को, हिंदी भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार शशिनारायण स्वाधीन को, उत्तम हिंदी अनुवाद पुरस्कार पारनंदि निर्मला को व मराठी भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार श्रीनिवास सावरीकर को दिया गया | इन्हें भी अजय मिश्र ने पुरस्कृत करते हुए 25-25 हजार रुपये की राशि प्रदान की | कार्यक्रम की अध्यक्षता अकादमी के निदेशक डॉ. के. दिवाकर चारी ने की | मंच का संचालन अकादमी के अनुसंधान अधिकारी डॉ. बी. सत्यनारायण एवं पी. उज्जवला वाणी ने किया | मुख्य अतिथि अजय मिश्र का सम्मान निदेशक डॉ. के दिवाकर चारी ने किया | इन्द्राणी व पद्मजा ने अतिथियों को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका सम्मान किया एन. उप्पल नायुडू ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया |

 उल्लेखनीय है कि पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार ग्रहीता ईमनि दयानंद ने हिंदी और तेलुगु में लेखन कार्य किया है और ‘पत्थर भी गाते हैं’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘जनता बनी अनाड़ी’, ‘एकलव्य की मूक वेदना’, ‘वेमन पदावली’ आदि हिंदी रचनाएँ की है | 

श्रीमती पारनंदि निर्मला ने आचार्य वकुला भरण रामकृष्णा की पुस्तक ‘कन्दुकुरि वीरेशलिंगम’ का हिंदी में उत्तम अनुवाद किया है | डॉ. ए. वी. सुरेश कुमार ने अंग्रेजी उपन्यास ‘लव स्टोरी’ का ‘प्रेम कहानी’ के नाम से हिंदी में अनुवाद किया है | श्रीनिवास सावरीकर ने ‘गुरु महिमा’ को अंग्रेजी से मराठी में तथा यार्लागडा लक्ष्मीप्रसाद के तेलुगु उपन्यास द्रौपदी का मराठी में अनुवाद किया है | 

डॉ.जी. नीरजा द्विभाषिक मासिक पत्रिका स्रवंति में सह-संपादिका है | शशिनारायण स्वाधीन ने ‘सोच के गलीच पर’, ‘अपनी जमीन पर सड़क सिर्फ रास्ता नहीं’, ‘दस्तक का सच’, ‘कालजयी’ इत्यादि पुस्तकें प्रकाशित की हैं | इस अवसर पर यात्रा विवरण लेखिका संपत देवी मुरारका द्वारा शशिनारायण स्वाधीन जी को “यात्रा-क्रम द्वितीय भाग” पुस्तक सादर भेंट किया गया एवं डॉ. जी. नीरजा जी को मुक्तामाला भेंट कर उनका भी सम्मान किया | इस अवसर पर टी. मोहन सिंह, मदन देवी पोकरणा, संपत देवी मुरारका, गोविन्द मिश्र, एवं नगरद्वय के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे |

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

‘हिंदी उपन्यास साहित्य को श्रीलाल शुक्ल की देन’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


हैदराबाद, 31 दिसंबर, 2012.
यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभागार में प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल के 88 वें जन्मदिन पर ‘हिंदी उपन्यास साहित्य को श्रीलाल शुक्ल की देन’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ‘भास्वर भारत’ पत्रिका के संपादक डॉ.राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि श्रीलाल शुक्ल ने अपने साहित्य द्वारा पाठकों को सामाजिक और राजनैतिक भ्रष्टाचार और विसंगतियों के विरुद्ध आंदोलित किया. उन्होंने आगे कहा कि साहित्य में व्यक्त होनेवाले विचारों को आंदोलन का रूप दिए जाने की आवश्यकता है ताकि समाज में उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना हो सके.

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के निदेशक कुमार विश्वजीत सपन ने साहित्य की सामाजिक भूमिका की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि लगभग 40-50 साल पहले लिखे गए ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ने गाँव का जैसा चित्र खींचा था, आज के भारतीय गाँवों का चेहरा उसकी तुलना में बहुत अधिक विकृत हो चुका है; ऐसे यथार्थवादी लेखन ने ही उन्हें कालजयी कीर्ति प्रदान की है. विश्वजीत सपन ने स्वरचित गज़ल का सस्वर वाचन भी किया.

बीज व्याख्यान उसमानिया विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम बोर्ड की अध्यक्ष प्रो.शुभदा वांजपे ने दिया. प्रो.शुभदा वांजपे ने अपने विद्वत्तापूर्ण भाषण में यह प्रतिपादित किया कि श्रीलाल शुक्ल ग्रामकथा की दृष्टि से प्रेमचंद और रेणु की परंपरा में होते हुए भी ग्राम जीवन की विद्रूपता की व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति के कारण हिंदी उपन्यास साहित्य में अपना अलग विशिष्ट स्थान रखते हैं.

इस अवसर पर इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.एम.वेंकटेश्वर ने राही मासूम रज़ा और विभूति नारायण राय के उपन्यासों के साथ श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों की तुलना करते हुए उन्हें हिंदी में राजनैतिक व्यंग्यप्रधान उपन्यासकार के रूप में उच्च स्थान का अधिकारी बताया.

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने श्रीलाल शुक्ल की व्यंग्य शैली की मौलिकता की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि पूर्णाकार व्यंग्यात्मक उपन्यास के क्षेत्र में श्रीलाल शुक्ल ने अभिव्यक्ति की नई पद्धति की खोज की और हिंदी उपन्यास साहित्य को व्यापकता प्रदान की.

आरंभ में आकाश तिवारी ने शंखनाद करके सरस्वती वंदना की तथा कार्यक्रम की संयोजक डॉ.सीमा मिश्रा ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि श्रीलाल शुक्ल ने अपने प्रशासकीय जीवन में जो विशिष्ट अनुभव प्राप्त किए, उन्हें उन्होंने अभिधा में व्यक्त न करके व्यंग्य के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त किया कि उसकी चोट करने की शक्ति बढ़ गई.
उल्लेखनीय है कि सीमा मिश्रा ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से श्रीलाल शुक्ल के साहित्य पर एम.फिल. और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं तथा श्रीलाल शुक्ल पर उनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है. इस उपलक्ष्य में सीमा मिश्रा ने अपनी शोध निर्देशक डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा का सारस्वत सम्मान करते हुए उन्हें स्मृति चिह्न भेंट किया.

इस अवसर पर पंसरिया से पधारे वयोवृद्ध कवि पं.सूर्य प्रसाद तिवारी के अतिरिक्त वरिष्ठ कवयित्री डॉ.अहिल्या मिश्र और ठाकुर शंकर सिंह ने भी श्रीलाल शुक्ल के कथासाहित्य के अलग अलग पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किए.

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में पर्यावरणवादी वयोवृद्ध कवि डॉ.किशोरीलाल व्यास ‘नीलकंठ’ की ‘यहाँ मच्छर नहीं है’ और ‘धरती सागर पर्यावरण’ शीर्षक दो पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया. 

कार्यक्रम में विनीता शर्मा, डॉ. देवेंद्र शर्मा, संगीता जी, नागेश्वर राव, राधाकृष्ण मिरियाला, प्रमोद परीट, ज्योति नारायण, डॉ.एम. रंगय्या, डॉ. रमा द्विवेदी, आशा देवी सोमानी, मंजू शर्मा, डॉ.रामुलु, रामकृष्ण, शिवकुमार, अजय कुमार मौर्य सहित नगरद्वय के अनेक साहित्य प्रेमी और शोध छात्र उपस्थित रहे. संचालन श्रीमिलिंद प्रकाशन की प्रबंधक विभा भारती ने किया.
[प्रस्तुति- डॉ. सीमा मिश्र]

शनिवार, 10 नवंबर 2012

कथाकार अशोक भाटिया का ''कथा-कथन'' 11 नवंबर को



हैदराबाद, 10 नवंबर 2012.
कुरुक्षेत्र [हरियाणा] से हैदराबाद पधारे कवि एवं लघुकथाकार डॉ. अशोक भाटिया के सम्मान में नवोदित मासिक पत्रिका ''भास्वर भारत'' के तत्वावधान में रविवार, 11 नवंबर को अपराह्न 3 बजे से खैरताबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में ''कथा-कथन'' कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. कार्यक्रम की अध्यक्षता अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व-हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. एम. वेंकटेश्वर करेंगे तथा नगरद्वय के विशिष्ट साहित्यकार उपस्थित रहेंगे.आयोजकों ने सभी साहित्यप्रेमियों से अनुरोध किया है  यथासमय पधार कर ''कथा-कथन'' का रसास्वादन करें और अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम को सफल बनाएँ.

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

तुलसी भवन में प्रेमचंद जयंती : प्रेमचंद की भाषा-चेतना



उस्मानिया विश्वविद्यालय, थियेटर ऑफ आर्ट्स के अध्यक्ष प्रो.प्रदीप कुमार के संयोजन में 31/7/2012 को उस्मानिया विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस के सेमिनार हाल में तुलसी भवन के तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई. उद्घाटन और प्रथम सत्र में तो मैं उपस्थित नहीं हो पाई थी क्योंकि हमारे संस्थान में भी 'प्रेमचंद जयंती' पर परिचर्चा थी जिसमें रहना मेरा नैतिक कर्तव्य था. दूसरे सत्र में मुझे आलेख प्रस्तुत करना था इसलिए मैं उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में प्रेमचंद जयंती मनाने के बाद 12.30 बजे तक सेमिनार हाल पहुँची. तब प्रथम सत्र के अध्यक्ष उस्मानिया विश्वविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो.टी.मोहन सिंह अपना अध्यक्षीय वक्तव्य दे रहे थे. 

जैसे ही प्रथम सत्र समाप्त हुआ तुरंत दूसरा सत्र आरंभ कर दिया गया. इस सत्र के अध्यक्ष थे केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद के आचार्य प्रो.हेमराज मीणा. इस सत्र में डॉ.शीला मिश्र, डॉ.वंदना प्रदीप कुमार और डॉ.रेखा रानी के साथ मैं भी मंच पर उपस्थित थी. प्रथम वक्ता के रूप में अध्यक्ष जी ने डॉ.शीला मिश्र को बुलाया. उनका विषय था 'निर्मला में नारी चेतना'. विषय बढ़िया था जिस पर पूरे 30 मिनट के वक्तव्य में राजेन्द्र यादव और 'हंस', मैत्रेयी पुष्पा आदि की नारी विषयक मान्यताओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्रसंगात प्रेमचंद और उनके उपन्यास 'निर्मला' का भी उल्लेख किया.

डॉ.शीला मिश्र के बाद यों तो डॉ.वंदना प्रदीप कुमार को बोलना था और लिस्ट के अनुसार मेरा नाम सबसे अंत में था. पर संयोजकों के इशारों के आधार पर अध्यक्ष जी ने दूसरे वक्ता के रूप में मुझे बुलाया और कहा कि मैं अपने वक्तव्य को सीमित रखूँ. मैंने संगोष्ठी के लिए 'प्रेमचंद की भाषा-चेतना' को चुना था, परंतु जैसा आम तौर पर हुआ करता है, लंच के लिए परचे को काटना पड़ा. बस कुछ मूल बिंदुओं को सूत्र रूप में प्रस्तुत कर संतोष किया..

संगोष्ठी में पूरा आलेख प्रस्तुत नहीं किया जा सका अतः यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ.

प्रेमचंद की भाषा-चेतना

आज प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) की 132 वीं जयंती है. प्रेमचंद अपने समय के लिए जितने प्रासंगिक थे आज भी वे उतने ही प्रासंगिक हैं. अगर प्रो.दिलीप सिंह के शब्दों में कहें तो "यह तथ्य इस बात से ही प्रमाणित हो जाता है कि आज दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, बाजारीकरण, भ्रष्ट व्यवस्था, संवेदनात्मक छीजन आदि पर जब भी कहीं चर्चा होती है तो वह अंततः प्रेमचंद के ही इर्द-गिर्द आकार अपनी सार्थकता पाती है. प्रेमचंद की भाषा भी आज तक नए गद्यकारों का आदर्श बनी हुई है. यह अलग बात है कि प्रेमचंद के निकट कोई नहीं पहुँच सका." (प्रो.दिलीप सिंह, संपादकीय, प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ. 5).

मानव जीवन में भाषा की भूमिका निर्विवाद है चूंकि भाषा के अभाव में मनुष्य केवल जैविक जंतु है. भाषा ही वह चीज है जो उसे समाज-सांस्कृतिक प्राणी के रूप में परिवर्तित करती है. शायद इसीलिए प्रेमचंद ने अपने एक व्याख्यान में कहा था, "जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बनती है. भाषा सुंदरी को कोठरी में बंद करके आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं, लेकिन उसके स्वास्थ्य का मूल्य देकर. उसकी आत्मा इतनी बलवान बनाइए कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ्य दोनों की ही रक्षा कर सके. .... हमारा आदर्श तो यह होना चाहिए कि हमारी भाषा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें." (नमिता सिंह, 'प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य और भाषा के मंतव्य'; साहित्य और संवेदना, (सं) पी.वी.विजयन, पृ. 268 से उद्धृत). भाषा एक तरफ व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करती है तो दूसरी तरफ वह सामाजिक संबंधों को व्यक्त करती है. प्रेमचंद की भाषा इन दोनों कर्तव्यों को बखूबी निभाना जानती है, इसीलिए वह आज भी सर्वाधिक अनुकरणीय और प्रासंगिक कथाभाषा के रूप में स्वीकृत है.

समाज में हिंदी की तीन शैलियाँ प्रचलित हैं – उच्च हिंदी, उच्च उर्दू और हिंदुस्तानी. प्रेमचंद पहले तो उर्दू में लिखते थे, लेकिन बाद वे हिंदी – बोलचाल की हिंदुस्तानी में लिखने लगे. वे हिंदुस्तानी के प्रबल पक्षधर बने. उन्होंने यह महसूस किया था कि हिंदी का यह शैलीभेद प्रायः राजनीतिक था. उनकी भाषा-चेतना बहुत गहरी थी. इसलिए उन्होंने बार बार यह लिखा कि "बंगाल का मुसलमान बंगला बोलता है और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मद्रास का तमिल और पंजाब का पंजाबी आदि. यहाँ तक कि उसने अपने अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है. उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक-सांस्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्य प्रति के जीवन में उसे उर्दू की बिलकुल आवश्यकता नहीं पड़ती." (प्रो.दिलीप सिंह, 'प्रेमचंद की भाषाई चेतना', प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ. 23 से उद्धृत). इतना ही नहीं उनके मतानुसार हिंदुओं और मुसलमानों की भाषा में कोई अंतर नहीं है तथा हिंदुस्तानी बोलचाल की हिंदी का सहज और सरल रूप है. ध्यान से देखा जाए तो प्रेमचंद के लिए हिंदुस्तानी केवल एक भाषा-शैली ही नहीं थी, बल्कि उनके लिए तो वह जातीय अस्मिता का एक प्रतीक थी. इसलिए उन्होंने कहा था कि "बोलचाल की हिंदी और उर्दू प्रायः एक-सी हैं. उर्दू-हिंदी के सर्वनाम एक हैं – वह, तुम, मैं, हम इत्यादि. हिंदी-उर्दू की क्रियाएँ एक ही हैं – जाना, सोना, खाना, पीना, करना, मरना, जीना, लिखना, पढ़ना इत्यादि. उर्दू के संबंधवाचक शब्द – पर, का, में, से आदि वही हैं जो हिंदी के. दोनों का मूल शब्दभंडार भी एक है, लेकिन यहाँ बहुत दिनों तक फारसी के राजभाषा रहने से हिंदी शब्दों के फारसी या अरबी पर्यायवाची शब्द भी प्रचलित हो गए हैं. जैसे : देश – मुल्क, आकाश – आसमान, नदी – दरिया, रोगी – बीमार आदि. इन शब्दों का व्यवहार बोलचाल की हिंदी-उर्दू में बिना किसी भेदभाव के होता है." (वही, पृ. 25 से उद्धृत). उनकी मान्यता थी कि "बोलचाल की हिंदी समझने में न तो साधारण मुसलमानों को कोई कठिनाई होती है और न बोलचाल की उर्दू समझने में हिंदुओं को ही." (वही, पृ. 24 से उद्धृत). अभिप्राय यह कि इस दुष्प्रचार के खंडन का प्रेमचंद ने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया कि हिंदी और उर्दू दो अलग भाषाएँ हैं तथा इनका किसी धर्म-मजहब से कुछ लेना देना है.

प्रेमचंद ने अपनी बातों को सिर्फ सैद्धांतिक स्तर तक सीमित नहीं रखा बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी उन्हें लागू किया. उनकी रचनाओं में घटना और अनुभव की बहुलता है. वे अपनी रचनाप्रक्रिया में भाषा का संपूर्णतः दोहन कर लेते हैं. (रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास). इसीलिए वे कहा करते थे कि "साधारण वकीलों की तरह साहित्यकार अपने मुवक्किल की ओर से उचित-अनुचित सब तरह के दावे नहीं पेश करता, अतिरंजना से काम नहीं लेता, अपनी ओर से बातें गढ़ता नहीं. वह जानता है कि इन युक्तियों से वह समाज की अदालत पर असर नहीं डाल सकता. उस अदालत का हृदय परिवर्तन तभी संभव है, जब आप सत्य से तनिक भी विमुख न हों, नहीं तो अदालत की धारणा आपकी ओर से खराब हो जाएगी और वह आपके खिलाफ फैसला सुना देगी." (नंदकिशोर नवल, 'प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र', प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र, पृ. 13)

विद्वानों ने यह लक्षित किया है कि मृदु और ललित शब्दयोजना, गूढ़शब्दार्थहीनता और जनपद सुखबोध्यता वास्तव में काव्यभाषा के लक्षण हैं लेकिन प्रेमचंद ने अपने साहित्य को व्यापक जनता से जोड़ने के लिए जनपद की भाषा को अपनाया. जब वे यह कहते हैं कि "साहित्य न चित्रण का नाम है, न अच्छे शब्दों को चुनकर सजा देने का, न अलंकारों से वाणी को शोभायमान बना देने का" तो वे निस्संदेह बोलचाल की हिंदुस्तानी – देशजता की बात कर रहे होते हैं. प्रेमचंद अपनी जमीन से जुड़े साहित्यकार हैं. इसलिए उनकी रचनाओं में ठेठ देहाती शब्द पाए जाते हैं. उन्होंने "ग्रामीण जन की बोली-बानी में निहित ऊर्जा का दोहन करके ही अपनी कथाभाषा का गठन किया है."(प्रो.ऋषभ देव शर्मा, 'प्रेमचंद दे देसिल बयाना : संदर्भ 'गुल्ली डंडा' का", प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ.36). 

प्रेमचंद की भाषा - विशेष रूप से ग्रामीण पात्रों की भाषा - को देखने से यह स्पष्ट होता है कि "देहाती बोली और हिंदी के एकीकरण में उन्हें इतनी सफलता मिली है कि गाँव का रहने वाला पाठक भी प्रेमचंद के किसानों की बात सुनकर उसे अस्वाभाविक नहीं कह सकता. *** परंतु प्रेमचंद किसानों की बातचीत के लिए ही देहात से शब्द नहीं लेते; उनकी भाषा का गठन ही उस देहाती बोली की भूमि पर हुआ है। जो सुन्दर मुहावरे, कहावतें, उपमाएं और हास्य के पुट उनके गद्य में हमें मिलते हैं उन्हें प्रेमचंद ने अपने गाँव की बोली से सीखा था। अपनी उपमाएँ उन्होंने बहुधा ग्रामीण जीवन से ली हैं. *** प्रेमचंद की भाषा के अलंकार उसके प्रवाह में सहज ही सज जाते हैं. सारी बात अनुभव और सचाई की है. प्रेमचंद जनता को जानते थे, उसकी भाषा को जानते थे; वहीं से उन्हें शक्ति मिली है।" (डॉ.रामविलास शर्मा, प्रेमचंद, पृ.138).

'गोदान' का ही एक उदाहरण देखें – प्रेमचंद का होरी अपने विद्रोही पुत्र गोबर को समझाता है–

· "फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है. मजूरी मजूरी है, किसानी किसानी है। मजूर लाख हो, तो मजूर ही कहलाएगा। सर पर घास रखे जा रहे हो, कोई इधर से पुकारता है, ओ घासवाले, कोई उधर से। किसी की मेड पर घास धर लो तो गालियाँ मिलें. किसानी में मरजाद है।" 

होरी 'मरजाद' अर्थात मर्यादा के लिए अपने आपको समर्पित/ होम कर देता है।

'कर्मभूमि' का अमरकांत कहता है –

· काम की कौन कमी है घास भी काट लो, तो एक रुपए रोज की मजूरी हो जाए। नहीं जूते का काम है. बल्लियाँ बनाओ, चरसे बनाओ. मेहनत करने वाला आदमी भूखों नहीं मरता. धेली की मजूरी कहीं नहीं गई।"

ऐसे कथन स्वतः सिद्ध करते हैं कि प्रेमचंद की भाषा में देसी मुहावरे सहज रूप से उभरते हैं जो उसे जनभाषा बनाते हैं.

'गुल्ली-डंडा' कहानी बहुत ही छोटी है पर प्रेमचंद की भाषा के इस देशज पक्ष को उजागर करने में सक्षम है. इस कहानी में देशजता के साथ आभिजात्यता भी निहित है। इस कहानी में पग पग पर प्रेमचंद का ठेठ देसीपन झलकता है. यहाँ प्रेमचंद भारतीय खेल गुल्ली-डंडा के हवाले से यह कहते हैं – "हमारे अँग्रेजीदां दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। ..... न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया। विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैंकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता। यहाँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रूपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाएँ, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो?" खेल से लेकर शिक्षा तक का जो महंगा अंग्रेजीपन आज भी हम अपने सिर पर ढो रहे हैं प्रेमचंद ने उसके खतरे को अपने समय में भली प्रकार भांप लिया था. यदि गुल्ली-डंडा को प्रतीक मान लें तो कहना होगा कि उन्होंने इस महंगे अंग्रेजीपन का विकल्प भी यहाँ सुझाया है – गुल्ली-डंडा अर्थात देहातीपन या देसीपन के वरण के रूप में.

अंततः डॉ.रामविलास शर्मा के शब्दों में कहे तो "प्रेमचंद की कला का रहस्य एक शब्द में उनका देहातीपन ही है; ग्रामीण होने के कारण वह समाज के हृदय में पैठकर उसके सभी तारों से संबंध स्थापित कर सके हैं." (प्रो.ऋषभ देव शर्मा, 'प्रेमचंद के देसिल बयना : सन्दर्भ 'गुल्ली डंडा' का'; प्रेमचंद की भाषाई चेतना, (सं) प्रो.दिलीप सिंह, प्रो.ऋषभ देव शर्मा, पृ.40 से उद्धृत).