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मंगलवार, 20 मई 2025

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर : योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण (7 जनवरी, 1941-9 मई, 2025) 

प्रतिष्ठित कवि, कथाकार, बाल साहित्यकार, समीक्षक, शिक्षाविद, स्तंभ लेखक और मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं प्राकृत तथा अपभ्रंश के विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ (7 जनवरी, 1941) का निधन 9 मई, 2025 को हो गया।

डॉ. ‘अरुण’ ने अपभ्रंश भाषा और जैन साहित्य के गहन अध्येता तथा व्याख्याकार के रूप में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतविद्या (इंडोलॉजी) के क्षेत्र में उल्लेखनीय तथा अविस्मरणीय योगदान किया है। इस दृष्टि से उनकी ‘अपभ्रंश’, ‘पुष्पदंत’, ‘जैन रामकाव्य और महाकवि स्वयंभूदेव प्रणीत पउमचरिउ’, ‘जैन रामायण की कहानियाँ’, ‘जैन कहानियाँ’, ‘स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र’ तथा ‘प्राकृत-अपभ्रंश इतिहास दर्शन’ जैसी कृतियाँ अपना सानी नहीं रखतीं। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

एम.ए. (हिंदी), साहित्य रत्न, पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधियों से अलंकृत डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ जीवट व्यक्तित्व के धनी थे। जैन रामकथा के अंतर्गत स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र : तुलनात्मक अनुशीलन, स्वयंभू प्रणीत ’पउमचरिउ’ में समाज, संस्कृत एवं दर्शन की अभिव्यंजना पर उन्होंने पीएचडी और डीलिट की उपाधियाँ अर्जित कीं। शंभू दयाल कॉलेज, ग़ाज़ियाबाद (मेरठ विश्वविद्यालय), बी.एस.एम. (स्नातकोत्तर) कॉलेज, रुड़की (मेरठ विश्वविद्यालय), पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज, पीलीभीत (एम.जे.पी. रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली) आदि में अध्यापन कार्य से जुड़े रहे। उनके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने शोधोपाधियाँ अर्जित कीं।

डॉ. ‘अरुण’ की सतत साधना का सम्मान करते हुए 1975 में उन्हें थियोसोफ़िकल सोसायटी, अड्यार (चेन्नई) ने यूनिवर्सल ब्रदरहुड अवार्ड प्रदान किया। अन्य अनेक सम्मानों-पुरस्कारों के अतिरिक्त उन्हें 2006 में अपभ्रंश साहित्य अकादमी, जयपुर ने ‘स्वयंभू सम्मान’ से तथा 28 जनवरी, 2019 को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने ‘भाषा सम्मान’ से अलंकृत किया। 2010 में दूसरी बार ‘स्वयंभू सम्मान’ से अलंकृत हुए। साथ ही, भारतविद्या के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने ‘स्वामी विवेकानंद पुरस्कार’, ‘तुलसी सम्मान’ और ‘विद्यानिवासमिश्र स्मृति सम्मान’ भी प्रदान किए। अन्य अनेक संस्थानों ने भी उन्हें सम्मानित कर गौरव का अनुभव किया।

अपभ्रंश साहित्य के विद्वान के रूप में प्रख्यात ‘अरुण’ जी ने मौलिक पुस्तकों के साथ-साथ अनेक संपादित पुस्तकें, अनूदित पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित करके पाठकों का मार्गदर्शन किया। ‘आशा कभी न छोड़िए’, ‘आशा जीवित है’, ‘अक्षर अक्षर हो अमर’, ‘अँधियारों से लड़ना सीखें’, ‘बहती नदी हो जाइए’, ‘जीवन-अमृत’, ‘वैदुष्यमणि विद्योत्तमा’ आदि उनकी काव्य कृतियाँ उल्लेखनीय हैं।

‘अरुण’ जी आशावादी थे। जीवन को हमेशा एक नई दृष्टि से देखते थे। परेशानियाँ हर किसी के सामने उपस्थित होती हैं। ‘अरुण’ जी ने भी इन परेशानियों का सामना किया, पर हँसते-हँसते कहते हैं – ‘परेशानियाँ बहुत हैं/ हँस कर टालो यार/ कुछ को डालो वक़्त पर/ यह जीवन का सार।’ उनके भीतर की जिजीविषा को उनकी कविताओं में तथा उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियों में भी देखा जा सकता है। वे हमेशा अपने आप पर भोरसा रखने के लिए कहते हैं क्योंकि ‘हैं जिन्हें खुद पर भरोसा, पाते हैं मंजिल वही,/ उनकी हिम्मत तो कभी, मिटती नहीं है दोस्तो।'


‘अरुण’ जी हमेशा ही मानवीय संबंधों और मूल्यों को महत्व देते थे। वे जहाँ भी जाते थे वहाँ के लोगों से एक आत्मीय रिश्ता बना लेते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। वे सबके दुख-दर्द में शामिल हो जाते थे। वे अपने दिल का दरवाजा खोलकर सबके दर्द को अपना समझकर आगे बढ़ते थे और लोगों को ढाढ़स बँधाते थे – ‘दिल का दरवाजा खुला है, आइए, आ जाइए/ हम भी बंदे आपके हैं, यह यकीं ले आइए।’ ‘सबका दर्द समझकर् अपना, सहते आए सदा से हम/ नश्वर जग को अपना ही घर, कहते आए सदा से हम।’

‘अरुण’ जी अपने आसपास के वातावरण को प्रेममय बना ही डालते थे। वे कबीर की इस उक्ति को बार-बार दोहराते थे और आज के इस अमानवीय संसार को देखकर चिंतित होते हुए कहते थे– ‘पढ़ी किताबें सारी हमने, ‘ढाई आखर’ भूल गए/ दौलत कर झूले पर देखो, दुनिया वाले झूल गए।’ वे ढाई आखर प्रेम को अत्यंत महत्व देते हैं, क्योंकि आज दुनिया में हर व्यक्ति मुखौटा पहनकर जी रहा है, ऐसे में सच्चा प्यार मिलना मुश्किल है। अतः अरुण जी कहते हैं कि ‘प्यार जहाँ मिलता सखे,/ जाएँ वहाँ जरूर।/ प्यार अनूठी चीज़ है,/ तोड़े व्यर्थ गुरूर।’

आज दुनिया लोभ और स्वार्थ से भरी हुई है। ऐसी स्थिति में प्रेम, भाईचारा आदि गायब ही हो जाते हैं। ‘अरुण’ जी लोभ को मनुष्य का परम शत्रु मानते थे और धैर्य को अस्त्र बनाने के लिए कहते थे, ताकि इस लोभ को जीता जा सके – ‘लोभ महा शत्रु मनुज का,/ इससे लड़ा न जाय।/ लोभ शत्रु को जीतो सखे,/ धैर्य को अस्त्र बनाय।’

आज सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हर एक के पास धन-दौलत, सोना-चाँदी, ऐश्वर्य के अनेकानेक साधनों की बाढ़ है, लेकिन संवेदनाएँ खो गई हैं, लगता है मर-सी गई हैं। ‘अरुण’ जी इससे चिंतित रहते थे। अतः उनकी रचनाएँ हमें इस संकट से रू-ब-रू कराती हैं। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘अब बचाना आदमीयत, हो गया अनिवार्य-सा/ वरना सब कुछ खत्म खुद ही, आदमी कर जाएगा।’

यह नफ़रतों का दौर है। मूल्यों का ह्रास चरम पर है। नफरत, छल, कपट, बेईमानी, ईर्ष्या आदि का साम्राज्य चारों तरह फैल रहा है। ‘अरुण’ जी यह प्रश्न उठाते हैं कि ‘नफ़रतों का दौर ये कब तक चलेगा/ आदमी खुद को भला कब तक छलेगा?’ इस तरह की स्थितियों में सामान्य जनता का निराश होना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। इसी तर्ज पर निराशा की घड़ी में भी आशा को जगाए रखने की हिम्मत देते हुए वे कहते हैं कि ‘हो निराशा की घड़ी गहरी भले ही/ दृढ़ इरादा है तो हर रास्ता फलेगा।’ अरुण जी के भीतर अपार आत्मविश्वास और जिजीविषा गुँथी हुई मिलती हैं। अपने जीवनकाल में उन्होंने तमाम उलझनों को हँसते हुए झेला। विकट परिस्थितियों में भी वे टूटे नहीं बल्कि कुंदन की तरह तपकर सोना बन गए – ‘तपकर ही कुंदन बनता है, सोना इस दुनिया में,/ आ जाती वो आभा दुनिया जिसकी दीवानी है।’

‘अरुण’ जी बच्चों को बहुत पसंद करते थे। अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ‘मेरा बचपन संघर्षों का साक्षी रहा, जिन्होंने कभी-कभी तो मेरी कल्पनाओं को चूर-चूर करके रख दिया, लेकिन बचपन में ही सौभाग्य से मुझे स्वामी विवेकानंद का जीवन-दर्शन पढ़ने को मिला, जिसने मेरी लहूलुहान हुई कल्पनाओं में कब हिम्मत, साहस और आशा को अमृत-सा मरहम लगाकर मुझमें जूझने की ताकत भर दी, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे हर सफलता संघर्षों के बाद, निराशा के जंगल में बिछे कष्ट के नुकीले काँटों से जूझ कर ही मिली है।’ इसीलिए उनकी रचनाओं का मूल स्वर हिम्मत से आगे बढ़ने और निराशा के घटाटोप में एक दीपक जलाए रखने की उत्कट अभिलाषा का रहा है। इसीलिए वे कहते हैं – ‘जीवन में अब अभाव को, अड़चन न मानिए/ साधन अगर नहीं हैं तो साधन बनाइए।’ ‘कोई काम नहीं है मुश्किल, अगर इरादा पक्का/ पर्वत झुक जाते हैं आगे, मंजिल सब मिल जाएँ।’

‘अरुण’ जी कहा करते थे कि मृत्यु जीवन का परम सत्य है। जिस तरह जीवन को खुशी-खुशी अपनाते हैं, उसी तरह मृत्यु को भी अपनाना चाहिए। भारतीय संस्कृति का सूत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय...’ उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है। बहुत बार मृत्य उनके निकट आई लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण हार मानकर चुपचाप चली गई। परंतु इस बार 9 मई को मृत्यु दबे पाँव आई और जीत हासिल करके चली गई। ‘अरुण’ जी ने मृत्यु को भी हँसते-हँसते स्वागत किया।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा विशेष रूप से हैदराबाद शाखा के प्रति ‘अरुण’ जी का रुझान अविस्मरणीय है। 2015 में जब ‘मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' : अर्धशती समारोह' विषयक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हैदराबाद शाखा द्वारा किया गया था, उस वक्त हृदयाघात से पीड़ित होने के बावजूद, डॉक्टरों से अनुमति लेकर वे उस समारोह में पहुँचे और अपने साथ डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को भी हैदराबाद ले आए। तीनों दिन सुबह से लेकर शाम तक चर्चा-परिचर्चा में भाग लिए और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किए। ऐसे जीवट व्यक्ति थे ‘अरुण’ जी। उनके मार्गदर्शन में हैदराबाद सभा में अनेक ऐसी संगोष्ठियों का आयोजन किया गया है।

‘स्रवंति’ पत्रिका के साथ ‘अरुण’ जी का विशेष लगाव था। पत्रिका में उनकी रचनाएँ नियमित प्रकाशित हुईं हैं। कविता, गीत, गजल आदि के साथ-साथ उनके समसामयिक विचार समय-समय पर प्रकाशित हुए। ‘स्रवंति’ का नया अंक मिलते ही वे एक संदेश अवश्य भेजते थे उस अंक से संबंधित। उनकी टिप्पणी बहुत ही महत्वपूर्ण होती थी, पत्रिका की गुणवत्ता को बनाए रखने में। यदि अंक प्रकाशित होने में विलंब हो जाता, तो फोन करके विलंब का कारण पूछ ही लेते थे। 


‘अरुण’ जी सही अर्थों में ‘स्रवंति’ पत्रिका के परामर्शदाता हैं। ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को उनकी ही बातों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ –
मर गए तो किसने देखा, बादशाहों की तरफ
गीत लेकिन हम फकीरों का जमाना गाएगा

मौत उनकी है जो दुनिया लूटने को आए हैं
बाँट कर अमृत जगत में तू अमर हो जाएगा

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर
बाद तेरे नाम तेरा यह जहाँ दोहराएगा

शुक्रवार, 7 जून 2024

हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं : मुनव्वर राना




मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं,
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,

कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

कहने वाले मुनव्वर राना 14 जनवरी, 2024 को सदा के लिए अलविदा कह गए। 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मुनव्वर 26 नवंबर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में जन्मे। उनका मूल नाम सय्यद मुनव्वर अली था। भारत-पाक विभाजन के समय उनके रिश्तेदार और पारिवारिक सदस्य भारत छोड़कर पाकिस्तान में जा बसे, लेकिन मुनव्वर का परिवार यहीं बस गया। उस दिन को याद करते हुए वे कहते हैं कि “मेरे वालिद और मैं स्टेशन पर उन्हें छोड़ने गए, उनके जाते वक्त मेरे वालिद लड़खड़ाए। मैंने लपककर सहारा देना चाहा। उन्होंने अपना जिस्म मेरे हवाले कर दिया और मैं उस दिन जवान हो गया।” (मुनव्वर राना, मुन्नवरनामा, संकलन एवं संपादन सचिन चौधरी)

साहित्य अकादमी जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित मुनव्वर राना की जिंदगी फूलों की सेज नहीं थी। उनका बचपन अभावों में बीता। इस संबंध में उनका यह कथन द्रष्टव्य है – “ज़ख्म कैसी भी हो, कुरेदिए तो अच्छा लगता है। माज़ी कैसा भी रहा हो, सोचिए तो मज़ा आता है। बचपन जैसा भी गुज़रा हो, राज-सिंहासन से अच्छा होता है। मुझे नहीं मालूम ज़मींदारी कैसी होती है, क्योंकि मैंने बारहा माँ को भूखे पेट सोते देखा है। मुझे क्या पता ज़मींदार कैसे होते हैं, क्योंकि मैंने मुद्दतों अपने अब्बू के हाथों में ट्रक का स्टेयरिंग वील देखा है।” (वही)

मुनव्वर राना की दुनिया आशाओं, जिज्ञासाओं, उमंगों और ख्वाबों से भरी दुनिया थी। उनके अभिन्न मित्र अरविंद मंडलोई का कहना है कि उनके पास “डिग्रियों, पदवियों का अंबार नहीं है, फिर भी वे आम आदमी के बोलते शायर हैं, उनके प्रशंसकों की एक लंबी फेहरिस्त है।” (वही)। माँ पर लिखी उनकी कविता को लोगों ने बहुत पसंद किया। जब ग़ज़ल में हुस्न और इश्क की बातें खुलकर हो रही थीं तो मुनव्वर उस जमीन पर रिश्ते बोने लगे। वे ग़ज़ल की दुनिया को इश्क़बाजी से घसीटकर ‘माँ’ के पास ले आए। उनकी कविताओं व गज़लों में माँ जरूर दिखाई देती हैं – “मामूली एक कलम से कहाँ तक घसीट लाए/ हम इस ग़ज़ल को कोठे से माँ तक घसीट लाए/ लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती/ बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती/ किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई/ मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई।” अपने पिता को याद करते हुए वे अत्यंत भावुक हो जाते थे – “हँसते हुए चेहरे ने भरम रखा हमारा/ वो देखने आए थे कि किस हाल में हम।” वे रिश्तों को महत्व देने वाले शायर थे। उनकी रचनाओं में उनके व्यक्तित्व को देखा जा सकता है। वाणी से प्रकाशित उनके ग़ज़ल संग्रह ‘बदन सराय’ की भूमिका में गोपालदास नीरज लिखते हैं कि “भाई मुनव्वर राना की ग़ज़लें पढ़ कर दिल और दिमाग़ को जो ठंडक और जो सुकून मिला, वह अनुभूति का विषय है, शब्दों का नहीं। माँ का आंचल, बाप की दुआएँ, बुज़ुर्गों की यादें, बच्चों के खिलौने और बहनों की राखियाँ कितनी पवित्र-पावन होती हैं और साथ ही किसान का पसीना, मज़दूर की थकान, शायरों को क्या-क्या नए अर्थ प्रदान करती है – अगर आपको यह समझना हो तो राना के दो-चार शेर गुनगुना कर देखिए।” किसानों के संबंध में मुनव्वर राना कहते हैं – “इसी गली में वो भूखा किसान रहता है/ ये वो ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है।”

मुनव्वर राना की रचनाओं में कहो ज़िल्ले इलाही से, बदन सराय, बग़ैर नक़्शे का मकान, मान, सफ़ेद जंगली कबूतर, जंगली फूल, चेहरे याद रहते हैं, शाहदाबा आदि प्रमुख हैं। वे अनेक सम्मानों से नवाजे गए। माटी रतन सम्मान, खुसरो पुरस्कार, मीर तकी मीर पुरस्कार, गालिब पुरस्कार, डॉ. जाकिर हुसैन पुरस्कार, सरस्वती समाज पुरस्कार एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रमुख हैं। 2014 में ‘शाहदाबा’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। दादरी में अखलाक, सीपीआई नेता गोविंद पनसारे और लेखक कलबुर्गी की हत्या के प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर उदयप्रकाश, काशीनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, अशोक वाजपेयी जैसे अनेक साहित्यकारों ने इस पुरस्कार को लौटा दिया। इसी क्रम में मुनव्वर राना ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाया था। एक लाइव शो में उन्होंने कहा कि “मैं यह अवार्ड लौटा रहा हूँ... और यह रहा एक लाख रुपये का चेक। इस पर मैंने कोई नाम नहीं लिखा है। आप चाहें तो इसे कलबुर्गी को भिजवा दीजिए, या पनसारे को भिजवा दीजिए या अखलाक को भिजवा दीजिए या किसी ऐसे मरीज को भिजवा दीजिए, जो अस्पताल में इलाज न करवा पा रहा हो और हुकूमत के लोग उसे न देख पा रहे हो।”

मुनव्वर धर्मनिरपेक्ष, शांति से युक्त देश को कायम रखना चाहते थे, लेकिन हमेशा विवादों से घिरे रहे। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि “बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है/ बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है।” वे इंसानी रिश्तों को महत्व देते वाले शायर थे। कविताओं में, गज़लों में और सामान्य बातचीत में इन्हीं रिश्तों को वे आगे रखते थे। उनका मानना था कि “जिसको अहसासे ग़म नहीं होगा/ संग होगा सनम नहीं होगा।” रिश्तों की अहमियत को जानने वाला व्यक्ति ही हमारा सच्चा हमदर्द बन सकता है।

बचपन से ही मुनव्वर को शायरी करना बेहद पसंद था। इस बात का खुलासा उन्होंने स्वयं किया था। बचपन की स्मृतियों को वे बार-बार दोहराते रहते। उनकी गजलों में क्या-क्या नहीं हैं। एक ओर वे अपने बचपन को याद करते हैं। उनकी गज़लों में गाँव का नीम का पेड़ (नीम का पेड़ था, बरसात थी और झूला था/ गाँव में गुजरा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था), गाँव का टूटा हुआ घर (ऐ शहर! कुछ दिनों के लिए गाँव भेज दे/ याद आ रहा है टूटा हुआ अपना घर हमें), बचपन के खिलौने (मेरा बचपन था, मेरा घर था, खिलौने थे मेरे/ सर पे माँ-बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था) आदि को देखा जा सकता है तो दूसरी ओर रेल के डिब्बों में झाड़ू लगाने वाले बच्चे (फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर खुशबू लगाते हैं/ वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं), मस्जिद की चटाई पर सोते हुए बच्चे (मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे/ इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा)।

वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि शहरी वातावरण विषैला बन चुका है। यदि बच्चों के बचपन को, उनकी मासूमियत को जिंदा रखना हो तो गाँव की ओर लौटना होगा – “भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो/ शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा।” शहरी वातावरण में जीना मुश्किल होता जा रहा है। यहाँ अनेक लोग गरीबी-रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों का बचपन भी छिनता जा रहा है। किताबों के बजाय उन नन्हें कंधों पर कल-कारख़ानों के औजार हैं, हाथों में हथौड़े हैं। मुनव्वर पूछते हैं कि “ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है।” किसी भी व्यक्ति की जिंदगी में बचपन एक सुनहरा पड़ाव है। उससे जुड़े हुए जज़्बात को उन्होंने इस कदर सँजोया है कि पढ़ने/ सुनने वाले का दिल पसीज जाता है – “क़सम देता है बच्चों की, बहाने से बुलाता है/ धुआँ चिमनी हमको कारख़ाने से बुलाता है/ किताबों के वरक़ तक जल गए फ़िरक़ापरस्ती में/ ये बच्चा अब नहीं बोलेगा बस्ता बोल सकता है/ इनमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं/ देखना हाथ से अख़बार न गिरने पाए।” मुनव्वर राना यह कहते हैं कि “बचपन खुशबू की तरह होता है, बहुत देर नहीं ठहरता या बचपन को पर लग जाते हैं।” (मुनव्वर राना, मुन्नवरनामा, संकलन एवं संपादन सचिन चौधरी)।

मुनव्वर राना की ग़ज़लें उनके अपने अनुभवों और अनुभूतियों का ही बयान हैं। इसीलिए उनकी गजलों में माँ, पिता, भाई, बहन से लेकर तमाम रिश्तों को देखा जा सकता है। साथ ही बचपन, गाँव, शहर आदि जगहों की स्मृतियों को। वे कहने में संकोच नहीं करते कि “मैं तो आपबीती को जगबीती और जगबीती को आपबीती के लिबास से आरास्ता करके ग़ज़ल बनाता हूँ। आपको अच्छी लगे तो शुक्रिया, न अच्छी लगे तो भी शुक्रिया।” (वही)

मुनव्वर राना कहते हैं कि “मौत का आना तो तय है मौत आएगी” मगर उससे डरना नहीं चाहिए। यह जिंदगी बढ़ नहीं सकती, पर हाँ जितने दिन हम जिएँगे उतने दिन चारों ओर खुशियाँ बिखेरने की कोशिश करनी चाहिए। “मौत तो खुद अपने ठिकाने पे बुला लेती है।” वह हर पल “तकाज़े को खड़ी रहती है। कब तलक हम उसे वादे पे टाल जाते।” शायद मुनव्वर राना अपना वादा निभाने यह कहते हुए इस नश्वर दुनिया को पीछे छोड़ गए कि-

                            मेरी मुट्ठी से ये बालू सरक जाने को कहती है
                                        ये ज़िंदगी भी अब मुझसे थक जाने को कहती है
                                                    मैं अपनी लड़खड़ाहट से परेशान हूँ मगर
                                                                पोती मेरी ऊँगली पकड़ के दूर तक जाने को कहती है 
                                                                                      (मुनव्वर राना)

समय के इस सिंधु में है बिंदु भर अस्तित्व मेरा : मालती जोशी



हिंदी साहित्य जगत में मालती जोशी एक जाना पहचान नाम है। मालती जोशी का नाम लेते ही पाठक को - मोरी रंग दे चुनरिया, बोल री कठपुतली, महकते रिश्ते, बाबुल का घर, मन ना भये दस बीस, रहिमन धागा प्रेम का, पाषण युग, निष्कासन, पटाक्षेप, शोभायात्रा आदि - रचनाएँ याद आना स्वाभाविक है। साहित्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान हेतु भारत सरकार ने 2018 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया था। उन्होंने साहित्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया है, साथ ही स्त्री के अधिकारों के लिए आवाज उठाई है। उनके साहित्य में परंपरा, आधुनिकता और संस्कृति का त्रिवेणी-संगम देखा जा सकता है। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

मालती जोशी का जन्म 4 जून, 1934 को औरंगाबाद में हुआ था। मातृभाषा मराठी थी, पर शिक्षा-दीक्षा हिंदी में हुई। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिंदी) की उपाधि अर्जित की। अपनी पढ़ाई के संबंध में उन्होंने बताया है कि “पिता पुरानी ग्वालियर रियासत में मजिस्ट्रेट थे। छोटे-छोटे कस्बों में स्थानांतरित होते रहते थे। इसलिए पढ़ाई में एकरूपता नहीं रह पाई। चौथी कक्षा तक घर में पढ़ाई की। पाँचवीं में लड़कों के स्कूल में दाखिला लिया क्योंकि कन्याशाला केवल चौथी तक थी। आठवीं में थी तब पिताजी का स्थानांतरण हुआ। फिर आठवीं प्राइवेट करनी पड़ी। उन दिनों राज्य ग्वालियर की मिडिल परीक्षा की बहुत मान्यता थी। नौवीं, दसवीं मालव कन्या विद्यालय, इन्दौर से पास की। उन दिनों दसवीं (मैट्रिक) स्कूल की अंतिम कक्षा हुआ करती थी। उसके बाद इंटर प्राइवेट किया। बीए और एमए होलकर कॉलेज इंदौर से किया।” इस प्रकार मालती जोशी की पढ़ाई जारी रही।

लेखन के प्रति रुझान के संबंध में बात करते हुए मालती जोशी ने एक संस्मरण में लिखा है कि “मैंने सन 1950 में मैट्रिक पास किया था। उन दिनों स्कूल में अध्यापिकाएँ या तो उम्रदराज होती थीं या फिर वे युवतियाँ जो हालात की मार से हताश, निराश और जीवन से उदासीन होती थीं। ऐसे में ठंडी हवा के झोंके की तरह हिंदी की नई टीचर का आगमन हुआ। लखनऊ कॉलेज से ताजा ग्रेजुएट होकर आई थीं। रहन-सहन में, बातचीत में नफासत थी, नजाकत थी। छात्राओं से उनका व्यवहार भी मित्रवत था, जो एक नई बात थी। लड़कियाँ तो उन पर लट्टू हो गईं। मुझमें तब कविता के अंकुर फूटने लगे थे। मैंने उन पर ढेरों कविताएँ लिख डालीं। उनकी शादी और हमारी फाइनल परीक्षा आस-पास ही संपन्न हुई थी। फेयरवेल पार्टी के दिन मैंने अपनी कविताओं की कापी उन्हें सादर भेंट कर दी थी।” छात्र जीवन से ही मालती जोशी गीतकार के रूप में लोकप्रियता अर्जित करने लगीं। लोग उन्हें ‘मालवा की मीरा’ कहने लगे थे। नवंबर 1979 में ‘धर्मयुग’ में एक कहानी छपी, जिसने मालती जोशी को अखिल भारतीय मंच पर स्थापित कर दिया, उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मालती जोशी अपने आस-पास के वातावरण से गृहीत अनुभवों को शब्दों में पिरोकर पाठकों के सामने प्रस्तुत कर देती थीं। उनकी कहानियों एवं उपन्यासों में संवेदना के अलग संसार को देखा जा सकता है। उनके कहानी संग्रहों में - पाषाण युग, मध्यांतर, समर्पण का सुख, मन न हुए दस बीस, एक घर हो सपनों का, विश्वास गाथा, आखिरी शर्त, मोरी रंग दी चुनरिया, अंतिम संक्षेप, एक सार्थक दिन, शापित शैशव, महकते रिश्ते, पिया पीर न जानी, बाबुल का घर, औरत एक रात है, मिलियन डालर नोट आदि - उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार उपन्यासों में - पटाक्षेप, सहचारिणी, शोभा यात्रा और राग विराग। दादी की घड़ी, जीने की राह, परीक्षा और पुरस्कार, स्नेह के स्वर, सच्चा सिंगार - आदि बालकथा संग्रह हैं, तो - हार्ले स्ट्रीट - व्यंग्य। इनके अतिरिक्त और भी अनेक श्रेष्ठ रचनाओं का सृजन उन्होंने किया। मालती जोशी की कुछ कहानियाँ सिर्फ दूरदर्शन पर धारावाहिक के रूप में प्रसारित करने के लिए ही लिखी गई थीं। विशेष रूप से जया बच्चन द्वारा निर्मित टेलीविजन शो ‘सात फेरे’ और गुलज़ार द्वारा निर्मित ‘किरदार’ के लिए।

मालती जोशी की कहानियों में वैविध्य को देखा जा सकता है। उनके कथा-पात्र उनके इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं। उन्हें तो कहीं भटकने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इस संदर्भ में उनका यह कथन उल्लेखनीय है – “मध्यवर्गीय परिवार से हूँ। ससुराल और पीहर दोनों ओर विशाल, लंबा चौड़ा परिवार है। और जिसे अंग्रेजी में close knit कहते हैं - दोनों परिवार वैसे ही हैं। पतिदेव घोर सामाजिक प्राणी थे। उनके मित्रों की संख्या कम न थी। इसलिए पात्र और कथानक के लिए मुझे कभी भटकना नहीं पड़ा। वैसे भी लेखक का संवेदनशील मन अपने आस-पास से अनजाने ही कुछ न कुछ इकट्ठा करता रहता है। यह सामग्री उसके अवचेतन में जमा होती रहती है। कहानी लिखते समय कोई व्यक्ति, कोई बात, कोई प्रसंग अनायास याद आ जाता है और कहानी में फिट हो जाता है।”

मालती जोशी ने कहानीकार के रूप में काफी लोकप्रियता अर्जित की। इसमें कोई दो राय नहीं। सुधा अरोड़ा ने लिखा है कि मालती जोशी पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय और समीक्षकों द्वारा सर्वाधिक उपेक्षित कथाकार हैं! इस संबंध में मालती जोशी ने लिखा है कि “सर्वाधिक लोकप्रियता की बात अतिशयोक्ति हो सकती है, परंतु समीक्षकों की उपेक्षा वाली बात सौ फीसदी सच है। मेरी सीधी-सादी नितांत घरेलू कहानियों को श्रेष्ठीजन कोई तवज्जो नहीं देते। उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है, या यों कहें कि एक तरह से खारिज कर दिया जाता है। स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ, साठोत्तरी कहानियाँ, महिला रचनाकार जैसे लेखों में मेरे नाम का उल्लेख तक नहीं होता। अगर मैं कहूँ कि इस बात का मुझे कोई मलाल नहीं है तो यह झूठ बोलना होगा। शुरू में इस बात से सचमुच दुख होता था, पर अब मैंने मन को समझा लिया है। मैं जिन लोगों के लिए लिखती हूँ, वे तो मुझे सिर-आँखों पर लेते हैं – फिर दुख कैसा!” (मालती जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ, भूमिका)। मालती जोशी का कथन पढ़ते समय तेलुगु साहित्यकार मालती चंदूर का नाम बार-बार मानस पटल पर उभर रहा है। उन्होंने भी मालती जोशी की भाँति अपने आस-पास के ही परिवेश से कथासूत्र का ताना-बाना बुना है। उनकी कहानियों और उपन्यासों को भी समीक्षकों ने ‘एक गृहस्थ की मामूली रचनाएँ’ कहकर उपेक्षित किया था। लेकिन उनकी कलम रुकी नहीं, थकी नहीं। 1992 में उनके उपन्यास ‘हृदयनेत्री’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। साहित्य के क्षेत्र में ढूँढ़ने पर हमें मालती जोशी, मालती चंदूर जैसी अनेक लेखिकाएँ अवश्य मिलेंगी जिन्हें इस समाज में अपने आपको स्थापित करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।

मालती जोशी पारिवारिक जीव हैं। वे स्वयं अपने आपको वही कहती हैं। रिश्तों को बेहद महत्व देने वाली रचनाकार हैं मालती जोशी। उनकी कहानियों में अनेक संबंधों के बीच प्रेमपूर्ण व्यवहार रहता है। प्रेम को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है कि “मेरी पीढ़ी के लिए प्रेम महज एक टाइम पास नहीं था। हमारे लिए प्रेम का अर्थ त्याग, बलिदान, समर्पण आदि हुआ करता था। प्रेम एक उदात्त अनुभव, एक पवित्र भावना थी। एक मीठा दर्द था जो चुपके-चुपके सहा जाता था। वह एक व्रत था।” (चाँद अमावस की, भूमिका)। उनकी कहानियों में प्रेम एक अंत:धारा की तरह प्रवाहित होता रहता है।

मालती जोशी की कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन शैली को भलीभाँति देखा जा सकता है। स्वयं मध्यवर्गीय परिवार से होने के नाते मालती जोशी अपने देखे हुए और भोगे हुए अनुभव जगत को कहानियों के माध्यम से व्यक्त करती हैं। इसका खुलासा उन्होंने स्वयं किया है – “सारी कहानियों को अगर एक शीर्षक में बाँधना हो तो कहना पड़ेगा कि ये मध्यमवर्गीय जीवन का दस्तावेज हैं। मैं स्वयं इसी वर्ग से हूँ इसलिए मध्यमवर्ग के सुख-दुख, राग-द्वेष, आशा-आकांक्षा से अच्छी तरह परिचित हूँ। मध्यमवर्गीय परिवार या मध्यमवर्गीय नारी मेरी कहानियों का केंद्रबिंदु रहे हैं।” (रहिमन धागा प्रेम का, भूमिका)

15 मई,, 2024 को मालती जोशी का निधन हो गया। उनको भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सूर्यबाला कहती हैं कि “वरिष्ठ कथा लेखिका मालती जोशी अगले चार जून को अपने जीवन के 90 गौरवशाली वर्ष पूरे करतीं, लेकिन अफसोस, इसके पूर्व ही 15 मई को वे अंतिम यात्रा पर चली गईं। यह मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति से अधिक कथा लेखन के एक युग का अवसान है। वे जीवन और लेखन दोनों में संयम, संतुलन और समरसता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करने वाली रचनाकार थीं। उनकी लेखनी मध्यवर्ग का आईना बन गई। मालती जोशी ने अपनी कहानियों में मानवीय संबंधों के इतने जटिल और विरल यथार्थ उकेरे हैं कि वे अपने समय और समाज की क्लाइडोस्कोप कही जा सकती हैं। हमारे समय की कोई स्थिति नहीं है, जो उनकी लेखनी से छूट गई हो।”

मालती जोशी की कविता ‘आत्मकथ्य’ की इन पंक्तियों से हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं –

समय के इस सिंधु में है बिंदु भर अस्तित्व मेरा
इसलिए अभिमान भी कभी करती नहीं मैं
प्राप्य जो मेरा रहा है, वह मुझे सब मिल गया है
परम तृप्ति से हृदय का कलश नित भरती रही मैं
                        छू न पाता है मुझे यह तुमुल कोलाहल जगत का
                        क्योंकि अपने आप से संवाद होता है निरंतर
                        एक दुनिया साथ मेरे चल रही है जन्म से ही
                        और भीतर पल रही है, दूसरी दुनिया समांतर
उम्र के सोपान चढ़ती जा रही हूँ अनवरत मैं
कब कहाँ विश्राम होगा, यह अभी अज्ञात है
आज तक जो भी रचा सब उस रचयिता की कृपा है
श्रेय की भागी बनी मैं यह अनोखी बात है
                        थी नहीं स्पर्धा किसी से, और ईर्ष्या भी नहीं है
                        हैं प्रभु के रूप हम सब, सत्य मैं यह जानती हूँ
                        राह में जो भी मिले सब बंधु थे, सब मित्र ही थे,
                        आज मैं नतशीश हो आभार सब का मानती हूँ 
                                                                            (वीणा मासिक, फरवरी 2023)

भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?


जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

इन पंक्तियों को पढ़कर क्या कोई पाठक सहज ही अनुमान नहीं लगा सकता है कि इन पंक्तियों के रचनाकार कौन हैं? इन पंक्तियों को पढ़कर पंत, बच्चन, भगवती चरण वर्मा अथवा शमशेर का नाम ले भी सकते हैं; लेकिन ये पंक्तियाँ ‘क्रांतिकारी की कथा’ कहने वाले भोलाराम के जीव की ओर सबका ध्यान खींचने वाले व्यंग्य को विधा के रूप में दर्जा दिलाने वाले व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की हैं।

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 को होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में हुई। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे नागपुर गए। अध्ययन के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र में उतरे, लेकिन बाद में नौकरी करने के बजाय लेखक बनकर जीवनयापन करना श्रेयस्कर समझा। हिंदी ही नहीं, किसी भी भाषा में महज लेखन के माध्यम से आजीविका जुटाना आसान काम नहीं है। लेकिन परसाई जी जीवनपर्यंत अपने निर्णय पर अटल रहे। उन्होंने ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। यह पत्रिका उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वे अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से गौरवान्वित हुए।

परसाई जी के साहित्य का केंद्रीय तत्व है व्यंग्य। उनकी साहित्यिक कृतियों में कहानी, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार आदि विधाओं का समुच्चय देखा जा सकता है। आमतौर पर व्यंग्य को एक शैली के रूप में देखा जाता था, लेकिन हरिशंकर परसाई ने उसे एक अलग स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया। आस-पास घटित घटनाओं एवं व्याप्त विसंगतियों को देखकर जब कोई व्यक्ति भीतर से उद्वेलित हो उठता है, तो उसकी कलम से ‘सदाचार का ताबीज’, ‘बेईमानी की परत’, ‘न्याय का दरवाजा’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘आवारा भीड़ के खतरे’, ‘हरिजन को पीटने का यज्ञ’ जैसी रचनाओं का सृजन स्वाभाविक है। इस संबंध में श्रीलाल शुक्ल का यह कथन उल्लेखनीय है – “परसाई विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सुस्पष्ट विचारों को आधार बनाकर उन्होंने राजनीतिक व्यंग्य को एक खास दिशा दी और गुणवत्ता में नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं।” (श्रीलाल शुक्ल, कुछ साहित्य चर्चा, पृ.216)

हरिशंकर परसाई की लेखन शैली नितांत निजी है। वे यह नहीं मानते कि साहित्य सृजन के लिए किसी पारंपरिक ढाँचे को ही अपनाना पड़ेगा। वे तो रूढ़ियों को तोड़ने पर बल देते थे। वे हमेशा यही कहा करते थे कि ‘सत्य शुभ हो, अशुभ हो, काला हो, सफेद हो – साहित्य उसी से बनता है।’ (हरिशंकर परसाई, देश के लिए दीवाने आये)। परसाई आम आदमी की जिंदगी में व्याप्त विसंगतियों से इस कदर बेचैन हो उठते हैं कि उनका अंतस कराह उठता है। उन्होंने स्वयं कहा है कि “मैं निहायत बेचैन मन का घोर संवेदनशील आदमी हूँ। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता। इसलिए गर्दिश नियति है।” (सं. कमलेश्वर, गर्दिश के दिन, पृ.128)।

हिंदी साहित्य को धारदार व्यंग्य के माध्यम से समृद्ध करने वाले, पाठकों को हँसाने वाले, चुटकी लेने का मौका न छोड़ने वाले हरिशंकर परसाई के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानना हो तो उनके द्वारा लिखी हुई उनकी कहानी को ही पढ़ना होगा। जी हाँ! परसाई की कहानी अपनी जुबानी! (उनके इस बयान के सब सूत्र ‘गर्दिश के दिन’ में छिपे हैं।) तो, सुनिए!

मैं हरिशंकर परसाई! एक शताब्दी के बाद आपके सामने आ रहा हूँ। ‘घायल बसंत’ को देखकर डर गया था। इसलिए ‘भोलाराम का जीव’ बनकर अपने आपको छुपा लिया था। ‘ठिठुरता गणतंत्र’ को देखकर ‘शिकायत मुझे भी है’, लेकिन क्या कर सकता हूँ! लाचार हूँ न! यहाँ तो सबकी ‘अपनी अपनी बीमारी’ है। सब के सब ‘भेड़ें और भेड़िये’ ही तो हैं। ‘बेईमानी की परत’ खोलने में सफल हो सकता हूँ क्या? ‘तुलसीदास चंदन घिसें’ तो मैं क्या ‘तिरछी रेखाएँ’ नहीं खींच सकता! करना तो बहुत कुछ चाहता हूँ। करने के लिए इस संसार में बहुत कुछ है, लेकिन जब जब मैं ‘पाखंड का अध्यात्म’ देखता हूँ तब तब बेचैन हो उठता हूँ। मेरी अंतरात्मा पुकारने लगती है ‘सुनो भाई साधो’। पर मेरी आवाज जनता तक नहीं पहुँचती। ‘एक मध्यवर्गीय कुत्ता’ कर क्या सकता है भला! सोच रहा हूँ कि ‘जैसे उनके दिन फिर’ मेरे भी फिरेंगे। ‘सुदामा का चावल लेकर ‘बस की यात्रा’ करूँगा और ‘क्रांतिकारी की कथा’ लिखूँगा पर ‘समझौता’ नहीं करूँगा।

यादें तो मेरे पास बहुत हैं। आपकी दिलचस्पी किस बात में है? क्या आप जानना चाहते हो कि हरिशंकर परसाई नामक यह आदमी जो हँसता है, मस्ती करता है, जो तीखा है, कटु है – इसकी अपनी जिंदगी कैसी है? यह कब गिरा? कब उठा? कैसे टूटा? कैसे फिर से जुड़ा? जानने की इच्छा है! मैं तो एक निहायत कटु निर्मम और ‘धोबीपछाड़’ आदमी हूँ। बचपन में मुझे जिस घटना ने तोड़ा, पहले उसके बारे में ही बताऊँगा। बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। शायद 1936 या 37 होगा। उस वक़्तशायद मैं आठवीं में पढ़ रहा था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में रहने चली गई थी। हम नहीं गए थे। माँ सख्त बीमार थी। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। सब लोग जा चुके थे। कस्बा वीरान हो चुका था। भाँय-भाँय करते पूरे आसपास में हमारे घर में ही चहल-पहल थी। काली रातें। इनमें हमारे घर जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गए थे। ऐसी स्थिति में तो रात के सन्नाटे में हमारी ही आवाजें हमें डरावनी लगती थीं। वह रात भयंकर थी। उसे याद कर रहा हूँ, तो आज भी मेरी आत्मा काँप रही है। मरणासन्न माँ के सामने हम आरती गा रहे थे। गाते गाते पिताजी सिसकने लगे, माँ बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपका रही है और हम रो रहे हैं। यह रोज रोज की बात हो गई। पिताजी, चाचा जी और एक-दो रिश्तेदार लाठी-बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूमकर पहरा देते। ऐसे भयंकर वातावरण में एक रात माँ हम सब को बिलखते छोड़कर कहीं दूर चली गई। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया। कुत्ते भी सिमटकर आ गए कहीं से योगदान देने। पाँच भाई-बहनों में माँ की मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था – सबसे बड़ा जो हूँ! प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं। जिस आतंक, निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे, उसके सही अंकन के लिए हिम्मत चाहिए। हममें से कोई इस कदर टूटे नहीं थे, जिस कदर पिताजी टूटे थे।

दिन बीतते गए। मैं पढ़ाई और नौकरी में व्यस्त हो गया। मेट्रिक हुआ कि नहीं जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता था। चूहे, बिच्छू और साँपों ने खूब काटा, लेकिन ज़हरमोहरा मुझे शुरू में ही मिल गया था। इसलिए ‘बेचारा परसाई’ का मौका ही नहीं आने दिया। मुझे दिखाऊ सहानुभूति से बेहद नफरत है। अभी भी है। दिखाऊ सहानुभूति दिखाने वालों को चाँटा मार देने की इच्छा होती है। फिर स्कूल में मास्टरी की थी। टीचिंग ट्रेनिंग और फिर नौकरी की तलाश। पिताजी अपनी अंतिम साँसें गिन रहे थे। परिस्थितियों के कारण मैं अनिश्चय में जी लेना सीख ही गया।

मैं बहुत भावुक, संवेदनशील और बेचैन तबीयत का आदमी हूँ। सामान्य स्वभाव का आदमी ठंडे-ठंडे जिम्मेदारियाँ भी निभा लेता है। दुनिया से तालमेल भी बिठा लेता है। व्यक्तित्वहीन नौकारीपेशी आदमी की तरह जिंदगी साधारण संतोष से भी गुजार लेता है। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मैं अपने व्यक्तित्व और चेतना की रक्षा करने में जुट गया। तब मैंने सोचा ही नहीं था कि लेखक बनूँगा। पर मैं अपने विशिष्ट व्यक्तित्व की रक्षा तब भी करना चाहता था। मैंने अपने आपको समझाया – हे परसाई! किसी से मत डरो! ‘भीतर तुम जो भी हो, जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी के साथ निभाओ। यदि जिम्मेदारी के साथ निभाओगे तो नष्ट हो जाओगे।’ अपने से बाहर निकल आओ। दुनिया देखो, समझो और हँसो!

मैं डरा नहीं। ‘लोगों से नहीं डरा, तो नौकरियाँ गईं। लाभ गए, पद गए, ईनाम गए। पहले अपने दुखों के प्रति सम्मोहन था। अपने आपको दुखी मानकर मनवाकर आदमी राहत भी पा लेता है। बहुत लोग अपने लिए ‘बेचारा’ शब्द सुनकर संतुष्ट हो जाते हैं। अपार आनंद का अनुभव करने लगते हैं। मुझे भी पहले ऐसा ही लगा। आखिर मैं भी एक साधारण इंसान ही तो हूँ। पर मैंने आस-पास देखा। तब मुझे लगा ‘इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा! इतने विकट संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष!’ इन सब परिस्थितियों के बीच मेरे भीतर लेखक कैसे जन्मा यह सोचता हूँ तो कुछ सूझता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैंने दुनिया से लड़ने के लिए लेखन को एक हथियार के रूप में अपनाया। इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा। ‘अपने को अविशिष्ट होने से बचाने के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया। पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दुख के जाल से निकल गया।’ इस संसार में दुखी, अन्याय से पीड़ित तथा शोषित और भी हैं। अतः मैंने अपने आपको विस्तार दिया। मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना संपन्न हूँ। यहीं से व्यंग्य लेखक ‘पर-साई’ का जन्म हुआ।

इस संसार में सर्वत्र मनुष्य किसी न किसी रूप में संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ‘मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता।’ पाप से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य छटपटाता रहता है। पर बड़ी लड़ाई केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। ‘अकेले वही सुखी हैं जो लड़ना ही नहीं चाहते। न उनके मन में सवाल उठते हैं, न शंका उठती है। ये जब-तब सिर्फ शिकायत कर लेते हैं। शिकायत भी सुख देती है। और वे ज्यादा सुखी हो जाते हैं।’ कबीर ने ठीक ही कहा है – ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै/ दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।’ जागने वाले का रोना कभी खत्म नहीं होता। व्यंग्य लेखक की गर्दिश भी कभी खत्म नहीं होगी। मेरी गर्दिश सौ सालों के बाद भी ताजा है। इस भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

2024! हरिशंकर परसाई का जन्मशताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर उनको याद करके उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ। 

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

गुमनामी के अँधेरे में से रा यात्री की यात्रा

साहित्यिक जगत में से रा यात्री के नाम से प्रसिद्ध सेवा राम अग्रवाल 17 नवंबर, 2023 को कभी न लौटने वाली महायात्रा पर प्रस्थान कर गए। उत्तर प्रदेश के जनपद मुज़फ़्फ़रनगर के गाँव जड़ोदा में 1933 में जन्मे सेवा राम की साहित्यिक यात्रा कविताओं के माध्यम से शुरू हुई थी। उसके बाद यह यात्रा तेज गति चलती रही। उनकी पहली कहानी है ‘गर्द गुबार’ जो प्रसिद्ध कहानी पत्रिका ‘नई कहानी’ में प्रकाशित हुई और पहला कहानी संग्रह है ‘दूसरे चहरे’ (1971)। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मुजफ्फरनगर में हुई। तत्पश्चात आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान (1955) और हिंदी साहित्य (1957) में एम.ए. की उपाधि अर्जित की। सागर विश्वविद्यालय से शोधकार्य संपन्न करके उन्होंने अपनी आजीविका अध्यापन से शुरू की।

से रा यात्री प्रसाद, महादेवी वर्मा, निराला, पंत, बच्चन और नरेंद्र शर्मा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों से प्रभावित थे। वे बेहद संवेदनशील कथाकार थे। समसामयिक सामाजिक एवं राजनैतिक परिदृश्य को देखकर वे चिंता व्यक्त करते थे। उनका व्यक्तिव बहुत सरल था। उनकी सरलता एवं सादगी का एकमात्र कारण यह है कि वे जमीन से जुड़े साहित्यकार थे। कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य और संस्मरण विधाओं में उन्होंने अपनी लेखनी चलाई।

से रा यात्री सचमुच साहित्य के ‘सेरा’ (शेरा) थे। उनकी किताबों का संसार विशाल है। उनकी लेखनी से दराजों में बंद दस्तावेज, लौटते हुए, कई अँधेरों के पार, अपरिचित शेष, चाँदनी के आरपार, बीच की दरार, टूटते दायरे, चादर के बाहर, प्यासी नदी, भटका मेघ, आकाशचारी, आत्मदाह, बावजूद, अंतहीन, प्रथम परिचय, जली रस्सी, युद्ध अविराम, दिशाहारा, बेदखल अतीत, सुबह की तलाश, घर न घाट, आखिरी पड़ाव, एक जिंदगी और, अनदेखे पुल, कलंदर, सुरंग के बाहर जैसे उपन्यासों का सृजन हुआ। साथ ही केवल पिता, धरातल, अकर्मक क्रिया, टापू पर अकेले, दूसरे चेहरे, अलग-अलग अस्वीकार, काल विदूषक, सिलसिला, खंडित संवाद, नया संबंध, भूख तथा अन्य कहानियाँ, अभयदान, पुल टूटते हुए, विरोधी स्वर, खारिज और बेदखल, परजीवी जैसे कहानी संग्रहों में संकलित कहानियाँ पाठकों को सोचने पर बाध्य करती हैं। किस्सा एक खरगोश का, दुनिया मेरे आगे उनके प्रमुख व्यंग्य संग्रह हैं। लौटना एक वाकिफ उम्र का संस्मरण है। वे सफल संपादक भी थे। उन्होंने मासिक ‘वर्तमान साहित्य’ का सफल संपादन किया था। इतनी महत्वपूर्ण कृतियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के बावजूद यात्री जी कहते हैं कि ‘मैं मैं को नहीं लिख पाया। यहाँ आकर मेरी शक्ति खत्म हो गई। जहाँ मुझे स्वयं को लिखना था... ये जो मैंने सब लिखा है, ये तो दिशांतर है।’

से रा यात्री अनेक सम्मानों से सम्मानित हुए। जैसे राजस्थान पत्रिका, जयपुर द्वारा वर्ष 1998 में ‘विरोधी स्वर’ कहानी के लिए पुरस्कृत हुए। राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, डूंगरगढ़, राजस्थान द्वारा 1993 में ‘साहित्यश्री’ सम्मान से अलंकृत हुए। सावित्री देवी चैरिटेबल ट्रस्ट, गाजियाबाद द्वारा 1986 में पुरस्कृत हुए। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा कथा संग्रह ‘धरातल’ (1979), ‘सिलसिला’ (1980), ‘अकर्मक क्रिया’ (1980), ‘अभयदान’ (1979) तथा संस्मरण ‘लौटना एक वाकिफ उम्र का’ (1998) के लिए पुरस्कृत हुए। यात्री जी 2006 में साहित्य भूषण, 2007 में समन्वय द्वारा सारस्वत सम्मान, 2011 में महात्मा गांधी साहित्य सम्मान तथा 2017 में पीटरबर्ग्स अमेरिका के सेतु शिखर सम्मान से भी अलंकृत हुए।

यात्री जी ने भले ही अपनी साहित्यिक यात्रा कविता से शुरू की, लेकिन बहुत जल्दी ही उसकी सीमा को देखते हुए उन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया। उसके बाद उपन्यास, संस्मरण आदि एक के बाद एक लिखते रहे। उनके कवि रूप को उनकी कहानियों और उपन्यासों में भी जीवित देखा जा सकता है। उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की है। यात्री जी का जीवन बहुत ही सरल और पारदर्शी रहा। उनके बाह्य व्यक्तित्व का रेखाचित्र रवींद्र कालिया ने कुछ इस तरह खींचा है – ‘ऊँचा कद, गोरा रंग, काले बाल, चोगे की तरह लंबा घुटनों से नीचे तक सफेद कुर्ता, ढीला पायजामा, कंधे पर समाजवादी झोला, पीछे-पीछे कुत्तों की लंबी कतार, गाजियाबाद की किसी सड़क पर लंबे-लंबे डग भरता हुआ ऐसा कोई आदमी दिखाई दे जाय तो समझ लेना लीजिए, वह कहानीकार से रा यात्री है।’ (रवींद्र कालिया, कॉमरेड मोनालिज़ा तथा अन्य संस्मरण, पृ. 178)। यात्री जी अपने झोले में रोटी के टुकड़े रखते और उन टुकड़ों को रास्ते में कुत्तों को खिलाते। यह उनकी आदत थी। इसीलिए उनके पीछे कुत्तों की लंबी कतार लगी रहती। रवींद्र कालिया उन्हें ‘एक खुली किताब’ मानते हैं। यात्री जी उन ‘अनसंग हीरोज़’ के समान हैं जिनके बारे में लोग बहुत ही कम चर्चा करते हैं। उन्होंने कभी भी यह नहीं चाहा कि लोग उनकी तारीफ के पुल बाँधें। उन्होंने तो मस्त कलंदर की तरह ज़िंदगी बिताई थी।

यात्री जी की रचनाओं में समाज के हर तबके के दर्द को देखा जा सकता है। बच्चों की मानसिकता से लेकर वार्धक्य तक की स्थितियों को यात्री जी ने बखूबी उकेरा है। ‘दराजों में बंद दस्तावेज’ उनका पहला उपन्यास है। इसमें नायक-नायिका के मानसिक द्वंद्व का चित्रण है। ‘लौटे हुए’ में जीवन मूल्यों का निरूपण है। ‘दरारों के बीच’ में बेरोजगारी का चित्रण है। ‘कई अँधेरों के पार’ में मध्यवर्गीय मानसिकता है। ‘आत्मदाह’ में युवा पीढ़ी की पलायन करने की प्रवृत्ति को उजागर किया गया है। ‘उखड़े हुए’ शीर्षक कहानी में शिक्षण संस्था की आड़ में चल रहे शोषण-चक्र का खुलासा किया गया है। ‘किस्सा कोताह’ कहानी में अध्यापकों के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के प्रति कटाक्ष है तो ‘उजरत’ कहानी विद्यार्थी जीवन का दस्तावेज है। ‘जोंक’ में संकीर्ण मानसिकता का चित्रण है। इस प्रकार हर रचना में एक नई समस्या को देखा जा सकता है। उनकी रचनाओं के पात्र हमारे इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं। कभी-कभी तो हम स्वयं एक पात्र बनकर उपस्थित हो जाते हैं।

आज के रचनाकारों के संदर्भ में से रा यात्री का कहना है कि ‘...जोखिम नहीं है। लेखन के लिए एक प्रतिबद्धता होती है, कमिटमेंट होता है। विद आउट कमिटमेंट आप हैं कहाँ? ढोल है…। आज सबसे बड़ी कमी लेखन में कमिटमेंट की है। मैं जोखिम उठाता हूँ और अपने लेखन में रेखांकित करता हूँ।  सारे आजादी के जमाने की जो जद्दोजहद स्टैंड करती है… व्हाई गांधी स्टुड… गांधी क्यों खड़े रहे गए? गांधी इसलिए खड़े रह गए कि उनका शायद मंत्र था। आज कोई मंत्र नहीं है।’

आज संवेदनशून्यता हर दिशा में फैली हुई है। अपने काम के प्रति कमिटमेंट तो है ही नहीं। एक साक्षात्कार में जब उनसे यह पूछा गया कि क्या कोई और आप के बारे में उस तरह लिख सकते हैं जिस तरह आप चाहते हों तो उन्होंने कहा कि ‘मुझ पर 35 लोगों ने पीएचडी की है, लेकिन सब खोखलापन है। ‘उजरत’ कहानी का किसी ने कोई जिक्र नहीं किया। 35 स्कॉलर्स में से... एक ने भी जिक्र नहीं किया ‘उजरत’ का।’ ‘उजरत’ कहानी विद्यार्थी जीवन का जीवंत दस्तावेज है। ‘कितने बचने की कोशिश है, कितना सामने आने का जज्बा है, दोनों चीजें हैं इस कहानी में।’ उनकी बातों में एक संदेश और उनकी चिंता स्पष्ट रूप से मुखरित है। वह यह है कि आज के शोधार्थी महज उपाधि पाने के लिए काम कर रहे हैं, न कि कमिटमेंट से। फिर ऐसी उपाधि किस काम की! एक अलंकरण मात्र!!

आज की पीढ़ी को संदेश देते हुए यात्री जी कहते हैं कि ‘खूब पढ़ना चाहिए। क्लासिक पढ़ना चाहिए। प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए। रेणु को पढ़ना चाहिए। हिमांशु श्रीवास्तव को पढ़ना चाहिए। दिनकर की कविता पढ़नी चाहिए। 34 साल की उम्र में मेरी पहली कहानी छपी ‘धर्मयुग’ में। आज 34 साल की उम्र में 34 किताबें छप जाती हैं।’ हममें ऐसे कितने लोग हैं जो इन रचनाकारों को पूरा पढ़ पाए! पढ़ने का अर्थ यह नहीं कि किताबों के पन्नों को पढ़ लिया। यहाँ पढ़ने का अर्थ है उन किताबों में निहित संवेदनशील तत्वों को ग्रहण करना और अपने जीवन में उतारना। हम ऐसा नहीं करते। ऐसा करने के लिए समय किसके पास है! भागदौड़ की जिंदगी में हम अपने आपसे कटते जा रहे हैं।

सामाजिक विसंगतियों से विचलित यात्री जी हमेशा बेचैन रहे। अपने अंतिम दिनों में भी उनके अंदर यही बेचैनी थी, यही चिंता थी। 16 नवंबर, 2023 को से रा यात्री को अपनी सृजन यात्रा के लिए ‘दीपशिखा’ सम्मान से अलंकृत करने की घोषणा हुई। इस घोषणा के 24 घंटे में ही यात्री जी ‘कई अँधेरों के पार’ ‘गुमनामी के अँधेरे में’ ‘आखिरी पड़ाव’ पर पहुँचकर कभी वापस न लौटने की यात्रा पर निकल पड़े। जन सरोकारों के इस अप्रतिम यात्री को ‘स्रवंति’ की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है! 

रविवार, 2 जून 2019

प्रतिरोध में उठता मन : रमणिका गुप्ता


                                                           
"हमने तो कलियाँ माँगी ही नहीं
काँटे ही माँगे
पर वो भी नहीं मिले
यह न मिलने का अहसास
जब सालता है
तो काँटों से भी अधिक गहरा चुभ जाता है
तब
प्रतिरोध में उठ जाता है मन-
भाले की नोकों से अधिक मारक बनकर"

... कहने वाली बेबाक साहित्यकार रमणिका गुप्ता का जन्म 22 अप्रैल, 1930 को सुनाम (पंजाब) में हुआ था। उन्होंने अपने पिता से उदारता और माता से जिद्दी स्वभाव अर्जित की। अपनी आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की। 

रमणिका गुप्ता ने आजीवन आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के उत्थान हेतु कार्य किया। स्त्रियों की मुक्ति के संदर्भ में उनका कथन उल्लेखनीय है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि "जब मैं स्त्री मुक्ति का नाम भी नहीं सुनी थी, तभी से स्त्री के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रही हूँ। घर से ही मैंने नौकरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी है।" स्त्री विमर्श का दिशा निर्धारित करते हुए उन्होंने कहा है कि - "स्त्री विमर्श ने औरत में वस्तु से व्यक्ति बनने की समझ पैदा की है। स्त्री विमर्श से स्त्रियों में आटोनामी यानी स्वायत्तता की इच्छा जगी है। उनमें निर्णय लेने की शक्ति पनपी है। हालांकि इतना ही काफी नहीं है क्योंकि अब भी और बहुत कुछ करना बाकी है। भारत की 99 प्रतिशत स्त्रियाँ सुहाग-भाग पति-परमेश्वर, पारिवारिक इज्जत की अवधारणओं से ग्रस्त हैं। ये अवधारणाएँ एक ग्रंथि की सीमा तक पहुँच चुकी हैं, उनके अंतर्मन में कुंडली जमाकर बैठी हुई हैं। हमें इनसे निजात पानी है तो अपने को इनसे मुक्त करना ही होगा।" (गुप्ता, रमणिका. स्त्री मुक्ति, संघर्ष और इतिहास, नई दिल्ली : सामयिक प्रकाशन. पृ.66) 

रमणिका गुप्ता की कृतियों में (कविता संग्रह) भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूँ, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदम से आदमी तक, विज्ञापन बनते कवि, कैसे करोगे बँटवारा इतिहास का, निज घरे परदेसी, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल : एक कविता यात्रा, आम आदमी के लिए, खूँटे, अब और तब, गीत-अगीत; (उपन्यास) सीता, मौसी; (कहानी संग्रह) बहू जुठाई; (गद्य पुस्तकें) कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे, दलित चेतना : साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण-वाम के कठघरे और दलित साहित्य, असम नरसंहार : एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज; (आत्मकथा) हादसे, आपहुदरी उल्लेखनीय हैं। उत्कृष्ठ साहित्य के लिए वे अनेक सम्मानों एवं पुरस्कारों से अलंकृत हो चुकी हैं। 

रमणिका गुप्ता ने स्वयंसेवी कार्यकर्ता एवं साहित्यकार के रूप में हमेशा ही स्त्री, आदिवासी, दलित और मजदूरों के मुद्दों को उकेरा। उनके साहित्य को ध्यान से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने आदि से अंत तक मुक्ति की कामनी की। अनेक रूपों एवं आयामों में यह मुक्ति उनके साहित्य में निहित है। अपनी कविता ‘मैं आजाद हुई हूँ’ में वे कहती हैं कि "हाँ! डरो मत! आओ न!/ भीतर चले आओ तुम/ अब तुम पर कोई खिड़कियाँ/ बंद करने वाला नहीं है/ अब मैं अपने वश में हूँ/ किसी और के नहीं/ इसलिए रुको मत/ मैं आजाद हुई हूँ।" 

रमणिका गुप्ता जो भी लिखती हैं बेबाक लिखती हैं। वे हमेशा विवादों के कटघरे में खड़ी रही। उनका कहना है कि पुरुषों का आर्थिक दोहन होता है तो स्त्रियों का दैहिक दोहन होता है। वे कहती हैं कि "हम राजनीतिक तौर पर आजाद तो चुके हैं, पहनावे में भी पश्चिम की नकल कर रहे हैं किंतु सोच के स्तर पर विशेषकर स्त्री और सेक्स के बिंदु पर, हमारी मानसिकता मध्यवर्गीय ही है – बल्कि कहा जाए तो 16वीं सदी की मानसिकता ही हम आज भी ढो रहे हैं। हम सूडोमॉडर्न हैं – मॉडर्न नहीं।" (गुप्ता, रमणिका. 2005. हादसे. नई दिल्ली : राधाकृष्ण पेपरबैक्स) 

रमणिका गुप्ता ने एक साक्षात्कार में स्त्रियों की स्थिति के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि "देश में लाखों की संख्या में जो महिलाएँ खेतों में खटती हैं वे हमसे ज्यादा स्वतंत्र हैं। मध्य वर्ग की स्त्री को क्या चाहिए वर्जनाओं से मुक्ति, काम करने की छूट, स्वावलंबी बनने की छूट। निम्न वर्ग की स्त्रियाँ पहले से ही स्वावलंबी हैं। कई बार वो पति से ज्यादा कमाती हैं। बच्चों को पालती हैं। उनको छूट है शादी करने की, छोड़ने की और दूसरा मर्द करने की। पर उनके यहाँ दबाव दूसरी तरह के हैं। वहाँ दबंग हावी हैं। उच्च वर्ग की बात करें तो यहाँ की महिला या तो बिजनेस वीमेन है या फिर वे ड्राइंग रूम डॉटर्स हैं। वो उसी में खुश हैं। हमारी 90 फीसदी औरतें अपनी गुलामी का जश्न मनाती हैं। वो सुहाग, पति परमेश्वर जैसी बातों में रहती हैं। निम्न वर्ग में बलात्कार होता है तो जुल्म होता है और हमारे यहाँ बलात्कार होता है तो इज्जत लुटती है। इज्जत का सिंड्रोम शुचिता, कुंवारीं लड़की, इसका सिंड्रोम औरत को गुलाम बनाए रखता है। परिवार ने महिलाओं को पुरुष के नजरिये से सोचने वाला बना दिया है। कामकाजी महिला अपने पति से मार खाती है, डॉक्टर महिला मजार-मंदिर पर जाकर लड़के की माँग करती है। परिवार के टूटने से ही स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार होगा। वह स्वतंत्र बनेगी, बाहर निकलेगी, काम करेगी तब कहीं जाकर वह अपनी इज्जत करना सीखेगी। जब वह अपनी इज्जत करेगी तभी दूसरे भी उसका सम्मान करेंगे।" 

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे’ के संबंध में सीताराम येचुरी का कहना है कि ‘हादसे’ मुठभेड़ों की शृंखला है। सुकृता पॉल रमणिका गुप्ता को व्यक्ति के बजाए संस्था के रूप में रेखांकित करते हुआ कहती हैं कि यदि उन्होंने आत्मकथा (हादसे) में खुद को ‘कोयले की रानी’ और ‘पानी की रानी’ बताती हैं तो इसके पीछे का तथ्य यह है कि उन्होंने झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कोयले और पानी के लिए संघर्ष किया था। रमणिका गुप्ती की कथनी और करनी में अंतर नहीं दीखती। वे आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ हमेशा लड़ती रहीं। 

‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के माध्यम से रमणिका गुप्त ने हाशियेकृत समाजों के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। इसकी शुरूआत उन्होंने 1986 में त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हजारीबाग से की थी। बाद में इसका प्रकाशन दिल्ली से होने लगा और 2013 अक्टूबर से मासिक के रूप में परिवर्तित हुई। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की सृजनशीलता को प्लेटफार्म प्रदान करना था। स्त्री अधिकारों के संघर्षरत रमणिका गुप्ता 27 मार्च, 2019 को पंचतत्व में विलीन हुई। स्त्री, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक की मुक्ति की कामना करने वाली रमणिका गुप्ता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं।

शनिवार, 13 जनवरी 2018

ओ मेरे पिता !



श्री गुर्रमकोंडा श्रीकांत 
जन्म : 5 अगस्त, 1939 
निधन ; 12 जनवरी, 2018 



तुम ऊपर से कठोर दीखते हो 


पर अंदर से बहुत ही कोमल हो

अपने जज्बात को रोक लेते हो

कभी अपना प्यार व्यक्त नहीं करते



अपनी जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते

घर की बागडोर संभालते-संभालते

दिन-रात एक कर देते हो

अपनी छोटी-छोटी खुशियों को भी त्याग देते हो



सुख-शय्या को त्याग

अपना सब कुछ दाँव पर लगा

खून-पसीना सींचकर

खुशियाँ उगाते हमारे लिए



जूझते रहे तकलीफों से चट्टान बनकर

अहसास तक होने न दिया

छिपाए रहे मन में लाखों घाव

आँखों से बहने न दिया



पापा !

आज भी मुझे याद है तुम्हारा

गंभीर चेहरा, निश्छल आँखें

डाँट-फटकार और कठोर अनुशासन



पर पापा, आज मैं पहचान गई हूँ

उस चेहरे के पीछे से झाँकती हँसी को

फटकार और अनुशासन के पीछे

तुम्हारे अपार स्नेह को



कभी जब मैं डर जाती थी अँधेरे से

तुम सूर्य बन जाते थे

रोती थी तो गोद में ले

दुलराते थे

कंधों पर बिठाकर घुमाते थे

परियों की कहानी सुनाकर सुलाते थे



जब-जब मैं हालात से टूटी हूँ

तुमने ही संजीवनी पिलाई है

जब भी घायल होकर पीछे हटी हूँ

शस्त्र देकर शक्ति बढ़ाई है



तुम्हीं ने व्यवस्था दी मेरे जीवन को

चिड़िया को तूफान से भिड़ना सिखाया

दिखाया पहचान बनाने का मार्ग

मूर्छित स्वाभिमान को जगाया



काल को पीछे धकेलते

जिजीविषा से भरे

तुम ही तो हो सच्चे योद्धा

धरती के सुंदरतम पुरुष,



मेरे पापा!

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

श्रद्धांजलि...

जगदीश सुधाकर
21 नवंबर, 1946 - 6 जनवरी, 2017
जाना एक जनकवि का....

अभावों में जन्मे, 
अभावों में पले,
और हम मर गए, 
अभावों के तले. 
लकड़ियाँ भी थीं इतनी 
कि रह गए अधजले. 

इन हृदयविदारक पंक्तियों के रचनाकार जगदीश ‘सुधाकर’ अभी इसी माह अपनी इहलीला समेटकर परलोक गमन कर गए. अपनी अंतिम साँस तक अभावों से जूझते रहे सुधाकर जी को लगभग छह महीने पहले जून 2016 में ‘ब्रेन-अटैक’ आया था. उस समय तो वे उबर गए पर दूसरी कई रुग्णताओं ने उन्हें घेर लिया और अंततः 6 जनवरी, 2017 के सूर्योदय से पहले हास्य-व्यंग्यपूर्ण जनकविता के क्षेत्र का यह ‘सुधाकर’ अस्त हो गया. 

शब्द-क्रीड़ा और आशु कविता के महारथी इस जनकवि का जन्म 21 नवंबर, 1946 को कलूरकोट, जिला मियाँवाली (अब पाकिस्तान) में हुआ था. भारत विभाजन से उजड़ और उखड़ कर उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश के कस्बे खतौली में आए तो शिशु जगदीश माँ की गोद में थे. धर्म के घोर पाखंड और उन्माद से जन्मे द्वि-राष्ट्रवाद के घातक सिद्धांत को इसीलिए वे आजीवन कोसते रहे. अपनी किशोरावस्था में उन्होंने नए राष्ट्र के सपने को परवान चढ़ने से पहले ही ध्वस्त होते हुए देखा और उनके भीतर के कवि ने सहज ही चिर प्रतिपक्ष की स्थायी भूमिका अंगीकार कर ली. जैसा कि उनके अंतिम पलों में उनके साथ रहे उनके कविमित्र जसवीर सिंह राणा का मानना है, बिना लाग-लपेट के सामाजिक और राजनैतिक
अधूरी आजादी (काव्य संकलन)
जगदीश सुधाकर
2001
हिंदी लेखक मंच, मणिपुर 
जीवन के हर दोगलेपन पर हँस-हँसकर चोट करना उसी के लिए संभव है जिसका दिल इस सब पाखंड और भ्रष्टाचार को देखकर भीतर-भीतर ज़ार-ज़ार रोता हो. ऐसे ही थे जगदीश सुधाकर. 

जगदीश सुधाकर ने 1964-65 के दिनों में विधिवत लिखना शुरू किया – लिखना भी क्या, डायरी तो वे रखते नहीं थे, किसी भी मुड़े-तुड़े कागज़ पर लिखते थे और संदूकची में डाल देते थे. कहानी और नाटक भी उन्होंने लिखे. पर कभी उन्हें हाथ में कागज़ लेकर रचना बाँचते नहीं देखा गया. कवि सम्मेलनों के मंच पर दोनों हाथ चलाकर आँखें मटकाकर अपनी सद्यः रचित अलिखित कविताओं के द्वारा वे श्रोताओं को लोटपोट करते थे और कई बार वहाँ पधारे हुए तथाकथित बड़े लोगों के कोपभाजन भी बनते थे. पर सच कहने और खरी-खरी सुनाने से बाज़ नहीं आते थे. शायद यही कारण रहा हो कि वे किसी टीम में शामिल नहीं थे. उनके कविधर्म की प्रथम प्रतिज्ञा थी – जो मुझे गलत दिखेगा उसे गलत कहूँगा. उनका यह गुण बाबा नागार्जुन को बड़ा प्रिय था. बाबा प्रो. देवराज के यहाँ खतौली आए तो अपनी-अपनी तरह के इन दोनों अक्खड़ जनकवियों की संगत खूब जमी. प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं सुधाकर जी हाँक लगाते थे – ‘आदरणीय जी!’ और बाबा छौंक लगाते थे – ‘फादरणीय जी!’ वैसे भी बाबा को सुधाकर जी के हाथ की मछली काफी पसंद थी – डॉ. देवराज के कॉलेज चले जाने पर वे सुधाकर जी की रसोई में पहुँच जाते थे. पर अब बस कहानियाँ रह गईं! मैंने उनके अभिन्न मित्र डॉ. ऋषभदेव शर्मा से श्रद्धांजलि में कुछ कहने के लिए कहा तो उन्होंने कवि आलम की पंक्तियाँ दुहरा दी - 

“जा थल कीन्हें बिहार अनेकन, ता थल काँकरी बैठि चुन्यो करैं।
जा रसना सों करी बहु बातन, ता रसना सो चरित्र गुन्यो करैं॥
आलम जौन से कुंजन में करी केलि, तहाँ अब सीस धुन्यो करैं।
नैंनन में जो सदा रहते, तिनकी अब कान कहानी सुन्यो करैं॥“ 

इन्हीं शब्दों के साथ हम जनकवि जगदीश सुधाकर को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं और परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार को यह महाकष्ट सहन करने की शक्ति प्रदान करे. 

- गुर्रमकोंडा नीरजा, हैदराबाद 

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

नहीं रहे उत्कट जीवट के धनी साहित्यकार बालशौरि रेड्डी

हिंदी-तेलुगु का एक सुदृढ़ सेतु गिर गया 

1 जुलाई, 1928 - 15 सितंबर, 2015
यह अत्यंत दुखद समाचार है कि तेलुगु और हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, ‘चंदामामा’ के पूर्व संपादक और बालसाहित्यकार, उत्कट जीवट के धनी बालशौरि रेड्डी हमारे बीच नहीं रहे. 15 सितंबर, 2015 को सुबह लगभग 10 बजे के आस-पास फोन की घंटी बजी और उठाते ही यह दुखद समाचार सुनने को मिला. अपने कानों पर यकीन नहीं कर पाई क्योंकि 8 सितंबर को उनसे फोन पर बात हुई थी तो कह रहे थे - बेटी भोपाल जा रहा हूँ विश्व हिंदी सम्मलेन में भाग लेने. आने के बाद बात करेंगे. वे मुझे बेटी कहकर संबोधित करते थे 

चूंकि रड्डी जी और मेरे पिताजी अच्छे दोस्त थे. बचपन में तो मैं उनकी गोद में खेली थी. उनकी जिजीविषा इतनी सक्षम थी कि वे दो बार मौत से जीत चुके थे. संकोच करते हुए रड्डी जी के घर फोन किया. उधर से भैया (उनके सुपुत्र) ने फोन उठाया और जब मैंने उनसे यह कहा कि ‘भैया यह मैं क्या सुन रही हूँ?’ तो उन्होंने कहा – ‘ठीक ही सुना है. सुबह 8.30 बजे चाय पी रहे थे और हम सबसे बात करते करते अचानक ही लुढ़क गए.’ बस इतना ही कह पाए. उनकी सिसकियाँ सुनाई दे रही थी. 

बालशौरि रेड्डी का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिला में स्थित गोल्लल गूडूर में 1 जुलाई, 1928 को हुआ था. उनकी मातृभाषा तेलुगु थी. अपनी मातृभाषा के साथ साथ हिंदी के लिए भी वे समर्पित थे. वे हमेशा यही कहा करे थे कि मेरी दो-दो मातृभाषाएँ हैं - तेलुगु और हिंदी. तेलुगु के साथ साथ हिंदी में भी उन्होंने अनेक मौलिक रचनाओं का सृजन किया. बालसाहित्य के साथ साथ उपन्यास, कहानी, नाटक निबंध, समीक्षा, आलोचना आदि विधाओं के माध्यम से उन्होंने दक्षिण भारत की संस्कृति को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का काम किया. मौलिक लेखन के साथ साथ अनुवादों के माध्यम से भी उन्होंने दक्षिण और उत्तर के भेद को मिटाने का प्रयास किया. 

पाश्चात्य देशों की तुलना में भारत में आज भी बालसाहित्य की कमी है. इस क्षेत्र में बालशौरि रेड्डी का प्रयास सराहनीय है. ‘चंदामामा’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने बालसाहित्य लेखन को आगे बढ़ाया. उनकी मान्यता थी कि देश का भविष्य बच्चों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास पर ही निर्भर होता है. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने हिंदी के बालपाठकों के लिए ‘तेलुगु की लोक कथाएँ’, ‘आंध्र के महापुरुष’, ‘तेनाली राम के लतीफे’, ‘तेनाली राम के नए लतीफे’, ‘बुद्धू से बुद्धिमान’, ‘न्याय की कहानियाँ’, ‘तेनाली राम की हास्य कथाएँ’, आदर्श जीवनियाँ’, ‘आमुक्तमाल्यदा’ जैसी बालोपयोगी रचनाएँ कलात्मक रूप से प्रस्तुत की. बालसाहित्य के संबंध एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि “बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य मनोरंजक हो. उनका हित करने वाला हो. साहित्य का कार्य है मानव मात्र को योग्य नागरिक एवं उत्कृष्ट सामाजिक बनाना, जीवन यात्रा में सही दिशा में बोध कराना. साहित्य मनोरंजन भी करे, साथ ही परोक्ष रूप से उसमें सामाजिक और नैतिक मूल्यों से युक्त मानदंड स्थापित करने की क्षमता भी हो.” उल्लेखनीय है कि उनकी पहली रचना बालसाहित्य की ही रचना थी. 

हिंदी प्रचार-प्रसार में बालशौरि रेड्डी का योगदान उल्लेखनीय है. यदि उन्हें राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत व्यक्ति कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. नेताओं की कथनी और करनी में अंतर देखकर वे चिंतित हो जाते थे. इसीलिए वे कहा करते थे - “हमारे राष्ट्रीय नेता तथा शासन तंत्र से जुड़े हुए लोग मंच पर अथवा हिंदी दिवस, सप्ताह या पखवाड़े के समारोहों में उत्तेजित स्वर में हिंदी के प्रति जोश प्रकट करते हैं तथा प्राचीन सांस्कृतिक वैभव का गुणगान करते थकते नहीं. किंतु व्यावहारिक रूप में कार्यान्वयन का जब प्रश्न उठता है, तब नाना प्रकार की समस्याओं की दुहाई देकर अपने को अधिक उदार होने की, प्रशस्ति पाने का नाटकीय अभिनय करते हैं. हमारे यहाँ कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर दर्शित होता है.” जो लोग यह मानते हैं कि हिंदी के विकास में क्षेत्रीय भाषाएँ बाधक बनती हैं उनकी धारणा को खंडित करते हुए वे कहा करते थे कि “मातृभाषा कभी भी राष्ट्रभाषा के मार्ग में बाधक नहीं बन सकती. सभी क्षेत्रीय भाषाएँ पुष्प हैं जो राष्ट्र रूपी हार की शोभा बढ़ाते हैं. हिंदी के विकास के पड़ाव में अंतर्धारा के रूप में मातृभाषा कार्य कर सकती है.” 

बालशौरि रड्डी क्रियाशील व्यक्ति थे. वे यह मानते थे कि आराम हराम है. महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और उनके विचारों से वे प्रभावित हुए तथा अपने जीवनकाल में उनके विचारों का पालन करते रहे. उनसे जब भी मुलाकात होते थी तो वे कहा करते थे – मुझे तो 100 साल तक जीने की उम्मीद है. उनकी जिजीविषा को देखकर हम सब आश्चर्य व्यक्त करते थे. हिंदी-तेलुगु का एक सुदृढ़ सेतु गिर गया. आज 13 साल पहले ही उनके सौ साल पूरे हो गए. ऐसे महान व्यक्तिव को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि. 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

'मिसाइल मैन' डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

27 जुलाई, 2015. शिलांग. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के सम्मेलन में हिस्सा लेते समय ‘मिसाइल मैन’ के नाम से विख्यात भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मूर्छित हो गए और बाद में उनका निधन हो गया. 

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु के रामेश्वरम जिले के धनुषकोडी नामक गाँव में 15 अक्टूबर, 1931 को हुआ था. मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे कलाम ने कठिन परिश्रम से जीवन में सफलता अर्जित की. 1954 में मद्रास विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद 1958 में मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अंतरिक्ष विज्ञान की उपाधि प्राप्त की. उसके बाद हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिए भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश लिया. 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से जुड़े और अनेक उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में भाग लिया. स्मरणीय है कि परियोजना निदेशक के रूप में उन्होंने भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएलवी 3) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके परिणास्वरूप जुलाई 1982 में ‘रोहिणी’ उपग्रह अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजा जा सका. इतना ही नहीं उन्होंने ‘अग्नि’ एवं ‘पृथ्वी’ जैसे प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण में स्वदेशी तकनीक को अपनाया. 1988 में उनकी देखरेख में भारत ने पोखरण में सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया. यदि कहा जाय कि अब्दुल कलाम के कठिन परिश्रम के कारण ही भारत परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ तो गलत नहीं होगा. प्रक्षेपास्त्रों के विकास के संबंध में उन्होंने कहा कि ‘2000 वर्षों के इतिहास में भारत पर 600 वर्षों तक अन्य लोगों ने शासन किया है. यदि आप विकास चाहते हैं तो देश में शांति की स्थिति होना आवश्यक है और शांति की स्थापना शक्ति से होती है. इसी कारण प्रक्षेपास्त्रों को विकसित किया गया ताकि देश शक्ति संपन्न हो.’ 18 जुलाई, 2002 को डॉक्टर कलाम भारत के 11 वें राष्ट्रपति चुने गए. 

सफल वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ के साथ साथ अब्दुल कलाम समर्थ साहित्यकार भी थे. विंग्स ऑफ़ फायर (अग्नि की उड़ान), इंडिया 2020 - ए विज़न फ़ॉर द न्यू मिलेनियम (भारत 2020 नवनिर्माण की रूपरेखा), माई जर्नी, इग्नाइटेड माइंड्स - अनलीशिंग द पावर विदिन इंडिया’, महाशक्ति भारत, हमारे पथ प्रदर्शक, हम होंगे कामयाब, अदम्य साहस, छुआ आसमान, भारत की आवाज़ और टर्निंग प्वॉइंट्स आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं. ‘अग्नि की उड़ान’ में अब्दुल कलाम की जीवनी के साथ साथ 'अग्नि', 'पृथ्वी', 'त्रिशूल' और 'नाग' मिसाइलों के विकास की भी कहानी अंकित है. 

अब्दुल कलाम भारत के विकास और निर्माण के बारे में सोचा करते थे. इस संबंध में उन्होंने लिखा भी था कि ‘हमारे पास वह सब कुछ है, जो हमें ऐसे राष्ट्र में रूपांतरित कर सकता है कि दुनिया के देशों में हम गर्व से सिर उठाकर चल सके. वैभव के शिखर पर जाने का रोडमैप क्या है? शोध, डिजाइन, विकास, उत्पादन और फिर सच्चे अर्थों में भारत में निर्मिति. यही है मैक इन इंडिया को साकार करने का अर्थ. हमारे पास ऐसी बौद्धिक क्षमता है कि जो चीज हमें दूसरे देश नहीं देते हम उन्हें विकसित कर लेते हैं. दुनिया के 15 बड़े निर्यातक देशों में मैन्यूफैक्चरिंग की सबसे कम लागत हमारे यहाँ है और उद्यमशीलता के मामले में हमारी बराबरी अमेरिका की सिलिकॉन वैली से होती है. जाहिर है नौजवानों के लिए व्यापक अवसर हैं.’ डॉ. कलाम अपने संबोधन में अक्सर यही कहा करते थे कि देश को आगे ले जाना है तो बच्चों को कमर कसकर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार मुक्त देश का निर्माण उन्हीं के हाथों संभव है. वे कहा करते थे कि ‘अपने मिशन में कामयाब होने के लिए, आपको अपने लक्ष्य के प्रति एकचित्त निष्ठावान होना पड़ेगा.’ 

अब्दुल कलाम इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स का नेशनल डिजाइन अवार्ड, एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया का डॉ. बिरेन रॉय स्पेस अवार्ड, एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया का आर्यभट्ट पुरस्कार, विज्ञान के लिए जी.एम. मोदी पुरस्कार, राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए. 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण तथा 1997 में भारत रत्न से सम्मनित हुए. लेकिन दंभ व अहंकार लेशमात्र के लिए भी उन्हें छू न सके. 

मानवता के प्रबल समर्थक अब्दुल कलाम को ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि. 

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को प्रो. देवराज (वर्धा) की भावभीनी श्रधांजलि 

महावृक्ष की रोशनी 
- देवराज 
                                       एक छतनार महावृक्ष 
                                       धरती पर आ गिरा 
                                       पूर्वोत्तर की पहाड़ियों को 
                                       अमृत-फल बाँटते हुए 
                                       भीतर कहीं एक विस्फोट जा धँसा 
                                       तने को चीरते हुए 
                                       थरथराईं शाखा-प्रशाखाएँ 
                                       कुछ ही क्षण, 
                                       शांत पड़ती गईं 
                                       एक-एक कर सारी पत्तियाँ, 
                                       फटी की फटी रह गईं 
                                       डालियों पर चहचहाते 
                                       पंछियों की आँखें, 
                                       छटपटाए बेतरह 
                                       उड़ते रहे चारों तरफ 
                                       एक दूसरे से सवाल करते हुए 
                                       ‘क्या करें कि लौट आये 
                                       शिराओं में रक्त का बहाव?’ 
                                       आवाजें लगाते रहे हलक फाड़ 
                                       नहीं सुना 
                                       दूर जाते स्पंदन ने, 
                                       नहीं लौटा वह 
                                       पंछियों के लिए महावृक्ष के पास, 
                                       असफल हुईं प्रार्थनाएँ 
                                       रिक्त होती गईं हवाएँ 
                                       पास आती गई रात 
                                       धीरे-धीरे टहलते हुए 
                                       ........... ............ 
                                       मगर एक रोशनी भी 
                                       तेजवंती आभा लिए 
                                       फूट रही है महावृक्ष के फलों से 
                                       पंछियों की दिशा में बढ़ती रात को 
                                       पीछे धकेलने का आह्वान 
                                       रश्मि-जाल के तंतुओं में. 
                                       क्या सुन पा रहे हैं पंछी 
                                        महावृक्ष को? 

रविवार, 25 मई 2014

नहीं रहे जादुई यथार्थवाद के जादूगर !

गेब्रियल गार्सिया मार्केज़
6 मार्च 1927 - 17 अप्रैल 2014
गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ उर्फ गाबो ! यह नाम हिंदी साहित्य जगत के लिए अपिरिचित नाम नहीं है; अंग्रेजी साहित्य जगत के लिए तो सुपरिचित है ही. ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिटयूड’ (1967) के रचनाकार के रूप में विश्वविख्यात साहित्यकार मार्केज़ भले ही भौतिक रूप से साहित्य जगत से विदा ले चुके हैं पर अपनी कालजयी कृतियों के माध्यम से पाठकों के हृदय में अमिट छाप छोड़ गए हैं. 

मार्केज़ का जन्म 6 मार्च 1927 को कोलंबिया के अरैकाटैका (Aracataca) में हुआ था. उनका बचपन ननिहाल में गुजरा. उनके नाना कर्नल निकोलास रिकर्डो मार्केज़ ने गेब्रियल को परियों की कहानियों के स्थान पर युद्धों की भीषण त्रासदी के विवरण सुनाकर उन्हें यथार्थ दुनिया के साथ जोड़ा. दूरसे ओर, उनकी नानी जादुई कहानियों को इस तरह सुनाती थीं कि सुनने वाले उन्हें सच मान बैठते थे. इस तरह ग्रेब्रियल के मन पर बचपन से ही एक छाप जादूई किस्म की कहानियों की पड़ी और दूसरी छाप यथार्थपरक किस्सों की. इनका इतना गहरा प्रभाव उनके अचेतन पर पड़ा कि बाद में वह जादुई यथार्थवाद की शैली के रूप में उनकी रचनाओं में प्रस्फुटित हुआ. उनकी राजनैतिक एवं साहित्यिक विचारधारा के गठन में भी काफी हद तक इन कहानियों का योगदान रहा. अतः कहा जा सकता है कि गेब्रियल के व्यक्तित्व और वैचारिकता के निर्माण में उनके नाना-नानी का योगदान उल्लेखनीय है. 

कोलंबिया राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई के साथ साथ गेब्रियल मार्केज़ ने अपनी आजीविका पत्रकारिता से शुरू की. 1948 और 1949 में उन्होंने ‘एल यूनिवर्सल’ (El Universal) में काम किया तथा 1950-1952 तक रोम और पैरिस में ‘स्पेक्टेटर’ के संवाददाता के रूप में कार्यरत रहे. उसके बाद उन्होंने 1959 से 1961 तक हवाना और न्यूयार्क में क्यूबा की संवाद एजेंसी के लिए काम किया. उनके लिए पत्रकारिता आजीविका थी और साहित्य शौक. 

गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यासों में ‘इन ईविल अवर’ (In Evil Hour, 1962), ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिटयूड’ (One Hundred Years of Solitude,1967), ‘द ऑटम ऑफ द पैट्रिआर्क’ (The Autumn of the Patriarch, 1975), ‘लव इन द टाईम ऑफ कॉलेरा’ (Love in the Time of Cholera, 1985), ‘द जेनरल इन हिस लेबरिंथ’ (The General in His Labyrinth, 1989) तथा ‘ऑफ लव एंड अदर डेमंस’ (Of Love and Other Demons,1994) काफी चर्चित हैं. लघुउपन्यासों में ‘लीफ स्टॉर्म’ (Leaf Storm, 1955), ‘नो वन राइट्स टु द कर्नल’ (No One Writes to the Colonel, 1961), ‘क्रॉनिकल ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड’ (Chronicle of a Death Foretold, 1981) तथा ‘मेमोरीज ऑफ माइ मेलंकॉली व्होर्स’ (Memories of My Melancholy Whores, 2004) उल्लेखनीय हैं. उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं – कहानी संग्रह : ‘आइज़ ऑफ ए ब्लूडॉग’ (Eyes of a Blue Dog, 1947), ‘बिग मामास फ्युनरेल’(Big Mama's Funeral, 1962), ‘द इनक्रेडिबल एंड सैड टेल ऑफ इन्नोसेंट एरंडीरा एंड हर हार्टलेस ग्रैंडमदर’ (The Incredible and Sad Tale of Innocent Erendira and Her Heartless Grandmother (1978), ‘स्ट्रेंज पिल्ग्रिम्स’ (Strange Pilgrims, 1993) आदि. 

उनका प्रथम लघुउपन्यास ‘लीफ स्टार्म’ 1955 में प्रकाशित हुआ था. इसमें लेखक ने एक ऐसे बच्चे के अनुभवों, अनुभूतियों तथा मानसिक स्थिति को मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है जिसने जिंदगी में पहली बार मृत्यु से साक्षात्कार किया है. यह वस्तुतः एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है जो बालक के मनोविज्ञान को परत-दर-परत खोलता है. साथ ही इसमें लेखक ने कर्नल की बेटी इसाबेल के दृष्टिकोण को उजागर किया है जिसमें उत्तरआधुनिक विमर्श, मुख्य रूप से स्त्री विमर्श, के अनेक पहलू उभर कर सामने आए हैं. उसके बाद वे लगातार सृजनात्मक साहित्य लिखते रहे. शिल्प और शैली की दृष्टि से उनकी रचनाएँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं. 

1972 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उनके कालजयी उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिटयूड’ (One Hundred Years of Solitude,1967) आज भी बहुचर्चित है. कहा जाता है कि 18 वर्ष की आयु से ही गेब्रियल के मन में बचपन की स्मृतियों को अक्षरबद्ध करने की प्रबल इच्छा थी. यह इच्छा समय के साथ बलबती होती गई. अपने विचारों एवं बचपन की स्मृतियों को कथासूत्र के एक निश्चित साँचे में ढालने के लिए वे जूझते रहे. पूरे उपन्यास को लिखने के लिए उन्हें डेढ़ साल लग गया. उस समय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई. परिवार को चलाने के लिए उधार लेना पड़ा. लेकिन जब 1967 में यह उपन्यास पुस्तक के रूप में पाठक जगत के सामने आया तो उनकी आर्थिक समस्याएँ दूर हो गईं. इसकी 2 करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं. विश्व की लगभग 37 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है. 

‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिटयूड’ (एकांत के सौ वर्ष). 363 पृष्ठों के इस उपन्यास में लेखक ने एक काल्पनिक परिवार बुएंदिआ (Buendia) की सात पीढ़ियों की कथा को एकसूत्र में पिरोया है. इस कहानी का घटना स्थल कोलंबिया देश के ओरिनोको नदी के तट पर स्थित माकोंदो नामक शहर है. इस शहर को बुएंदिआ परिवार का पितामह जोस आर्कादियो बुएंदिआ (Jose Arcadio Buendia) स्थापित करता है. इस उपन्यास में लेखक ने सच (यथार्थ) और जादू का सम्मिश्रण बखूबी किया है. संपन्न जीवन जीने के लिए एक दिन जोस आर्कादियो बुएंदिआ अपनी पत्नी के साथ कोलंबिया से किसी दूसरे शहर में बसने के लिए जाता है. रात को वे दोनों ओरिनोको नदी के किनारे रुक जाते हैं. जोस अजीब सपना देखता है. उस सपने में पूरी तरह से शीशों से भरा हुआ एक शहर देखता है जो दुनिया की सब चीजों के बारे में जानकारी देता है. वह मन ही मन निश्चय कर लेता है कि वह नदी के तट पर स्थित उस माकोंदो शहर को ढूँढ़ निकालेगा. वह इधर उधर भटकता है. जंगल जंगल घूमता है और पाता है कि वह एक स्वप्नलोक है. आदर्शलोक है. वह यह पाता है कि माकोंदो शहर एक द्वीप है. वहाँ से जोस अपनी धारणाओं के अनुसार दुनिया का आविष्कार करने लगता है. बुएंदिआ परिवार बदकिस्मती का शिकार हो जाता है. समुद्री तूफ़ान शीशों के शहर माकोंदो को तहस नहस कर देता है. कथा के अंत में एक पात्र उस अनबूझे रहस्य को विखंडित करता है जिसके कारण बुएंदिआ परिवार सात पीढ़ियों से शापग्रस्त है. उस रहस्यमय संदेश में हर वह सूचना निहित होती है जिसके कारण सौभाग्य और दुर्भाग्य बुएंदिआ परिवार के साथ होते हैं. 

इस उपन्यास में प्रयुक्त जादुई यथार्थवादी शैली ने सबका ध्यान आकृष्ट किया है. एक ओर लेखक ने सच्ची घटनाओं को आधार बनाकर उपन्यास का सृजन किया तो दूसरी ओर बीच बीच में जादुई घटनाओं का मिश्रण भी बखूबी किया है. लेखक ने प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से कथासूत्र को बुना है. एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस उपन्यास में लेखक ने उत्तर कोलंबिया के माकोंदो शहर से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर किया है. साथ ही मुख्य पात्रों के चित्रण में अतीत और समय की जटिलताओं को पिरोया गया है. उपन्यास के आदि से लेकर अंत तक सभी पात्र भूतों से साक्षात्कार करते हैं. भूत यहाँ प्रतीक हैं अपने अतीत के जो व्यक्ति को हर वक्त हांट करता है. मार्केज़ ने रंगों को भी प्रतीकों के रूप में प्रयोग किया है. इस उपन्यास में पीतवर्ण और सुवर्ण का ज्यादा प्रयोग दिखाई पड़ता है. ये दोनों ही वस्तुतः साम्राज्यवाद के प्रतीक हैं. सुवर्ण आर्थिक स्थिति का द्योतक है तथा पीतवर्ण परिवर्तन, विनाश और मृत्यु का द्योतक है. माकोंदो शहर बदकिस्मती का द्योतक है. कथा के अंत तक आते आते शीशों का शहर मृगतृष्णा का द्योतक बन जाता है. माकोंदो शहर वह सुनहरा शहर है जिसे निर्मित करने के लिए अमेरिका ने लोगों को दिवास्वप्न दिखाया और अंततः वह केवल एक मृगतृष्णा साबित हुई. इसी यथार्थ को इस उपन्यास में बड़े रोचक ढंग से दर्शाया गया है. इस उपन्यास में मार्केज़ ने लेटिन-अमेरिकी सांस्कृतिक घटकों को भी उभारा है. साथ ही, आशा, आकांक्षा, सुख, दुःख, भय, अकेलापन, संत्रास, विसंगति और मृत्युबोध आदि का चित्रण भी प्रभावी बन पड़ा है. 

8 दिसंबर 1982 को गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ को साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था. यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम कोलंबिया निवासी गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ ही हैं. 17 अप्रैल 2014 को मेक्सिको में उनका देहावसान हो गया. कोलंबिया के राष्ट्रपति ने अपनी श्रद्धांजलि में उन्हें ‘सार्वकालिक महानतम कोलंबियन’ के रूप में याद किया. 

हम उनकी स्मृति के नमन करते हैं.