
हैदराबाद
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में 29-30 मार्च 2014 को संस्थान के बेलगाम [कर्नाटक] केंद्र में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी [पुण्य-स्मरण] आयोजित की गई.यह राष्ट्रीय संगोष्ठी गत दिनों दिवंगत हुए चार साहित्यकारों राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया और ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुण्य-स्मृति को समर्पित थी. इस अवसर पर आंध्र-सभा की पत्रिका ‘
स्रवंति’ का इन्हीं साहित्यकारों पर केंद्रित विशेषांक भी प्रकाशित किया गया.
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| प्रबुद्ध श्रोता गण |
संगोष्ठी के निदेशक
प्रो. दिलीप सिंह, संयोजक डॉ. वी. एन. हेगडे तथा डॉ. सी.एन. मुगूटकर की अपील पर साहित्य प्रेमियों, प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने दो दिन के इस राष्ट्रीय समारोह में बड़ी संख्या में शिरकत की.
29 मार्च 2014.
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में बेलगाम [कर्नाटक] में 'पुण्य स्मरण : कैलाश चंद्र भाटिया, राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, ओमप्रकाश वाल्मीकि' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संपन्न हुआ.
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उद्घाटन दीप प्रज्वलित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. एम. वेंकटेश्वर.
साथ में बाएं से - प्रो. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. वी.एन. हेगडे, प्रो. हीरालाल बाछोतिया, प्रो. दिलीप सिंह
व अन्य |
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| बीज भाषण करते हुए प्रो. दिलीप सिंह |
बीज भाषण देते हुए प्रमुख समाजभाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह ने विगत 14 महीने में दिवंगत हुए विभिन्न साहित्यकारों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी. विजयदान देथा को मनुष्य की जिजीविषा को अभिव्यक्त करने वाले तथा राजस्थानी लोककथाओं को हिंदी में लाने वाले कथाकार के रूप में याद किया तो के.सी. सक्सेना को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे हास्य-व्यंग्य के जीवट से परिपूर्ण कथाकार थे जो अपने ऊपर भी हंस सकते थे.
डॉ. रघुवंश के साथ जुड़ी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. रघुवंश के साथ उन्होंने समसामयिक कविता पर काम किया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के एम.ए. पाठ्यक्रम के लिए 'समसामयिक हिंदी कविता' पुस्तक का संपादन किया. उन्होंने आगे कहा कि वे डॉ. रघुवंश से प्रभावित थे क्योंकि दोनों हाथों से लाचार होते हुए भी उन्होंने पैर की अंगूठी और उंगली के बीच कलम रखकर लिखने का अभ्यास किया. उन्होंने कहा कि रघुवंश अपनी तरह के अकेले काव्यालोचक थे. वे आलोचना से ज्यादा पाठक को महत्व देते थे.
डॉ. सी. प्रसाद को अच्छे बाल साहित्यकार के रूप में याद किया तो शैलेश मटियानी के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि शैलेश मटियानी ने मजदूर की जिंदगी जी. इसलिए उनकी कलम कटु यथार्थ की अभिव्यंजना का हथियार है. अमरकांत के बारे में उन्होंने कहा कि कस्बाई जीवन के पहलुओं को अपने लेखन में समेटने में अमरकांत दक्ष थे. वे लिखते नहीं थे, बोलते थे.
डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया का स्मरण करते हुए उन्हें हिंदी भाषा के गहरे अध्येता एवं चिंतक बताया तथा डॉ. परमानंद श्रीवास्तव को 'नई राहों के अन्वेषी आलोचक' के रूप में याद करते हुए कहा कि वे जीवन पर्यंत मार-काट वाली आलोचना का विरोध करते रहे. राजेंद्र यादव के बारे में बात करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि हिंदी साहित्य जगत में उनसे जयादा बखेड़े किसी अन्य साहित्यकार ने नहीं खड़े किए होंगे. राजेंद्र यादव की भाषा पर प्रकाश डालते हुए प्रो. सिंह ने उसे चुनौती और ललकार की भाषा बताया. बीजभाषणकर्ता ने ओमप्रकाश वाल्मीकि को हिंदी साहित्य जगत में पहली बार दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को लाने वाले साहित्यकार के रूप में स्मरण किया और कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का सारा साहित्य स्वयं में दलित आंदोलन है और उनकी कवितायें वस्तुतः छोटी छोटी चित्रावालियाँ लगती है.
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| मुख्य अतिथि का संबोधन : प्रो. एम. वेंकटेश्वर |

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि साहित्य का पठन-पाठन सतही स्तर पर करना या व्याख्या भर करना काफी नहीं होता. गहन अध्ययन और विश्लेषण की आवश्यकता आज की माँग है. पाठक को चिंतन एवं भावनात्मक स्तर पर किसी भी साहित्यकार के साथ तादात्म्य करना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि यह संगोष्ठी निश्चय ही चुनौती से भरी हुई है चूंकि यह ऐसे साहित्यकारों पर केंद्रित है जिन्होंने साहित्य, भाषा, आलोचना, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान जैसे क्षेत्रों के लिए दिशा निर्देशक कार्य किया है. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से प्रकाशित द्विभाषी मासिक 'स्रवंति' का मार्च 2014 का अंक इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए कर्टन रेसर है क्योंकि यह अंक विशेष रूप से परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राजेंद्र यादव और अमरकांत के पुण्य स्मरण पर केंद्रित है.
अध्यक्षीय भाषण में दिल्ली से पधारे वरिष्ठ कवि एवं भाषाविद प्रो. हीरालाल बाछोतिया ने कहा कि चारों स्मरणीय विभूतियों ने अपने रचनाकर्म द्वारा हिंदी को अक्षुण्ण विचार संपदा से समृद्ध किया है. परमानंद श्रीवास्तव आलोचक और संपादक के साथ साथ विरले कवि थे तो राजेंद्र यादव कथाकार और संपादक के साथ विरले विमर्शकार थे. इसी प्रकार ओमप्रकाश वाल्मीकि केवल दलित साहित्य के ही रचनाकार नहीं थे, विरले समाज चिंतक भी थे तथा डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया पुरातन और अधुनातन का समन्वय करने वाले विरले हिंदी भाषावैज्ञानिक थे.
उद्घाटन सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, धारवाड़ की अध्यक्ष प्रो. अमरज्योति ने किया.
29 मार्च 2014.
उद्घाटन सत्र के बाद पहला विचार सत्र प्रारंभ हुआ. परमानंद श्रीवास्तव को समर्पित इस सत्र की अध्यक्षता दिल्ली से पधारे प्रो. रामजन्म शर्मा ने की. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. नजीम बेगम (चेन्नै), डॉ. शकीला बेगम (धारवाड़), डॉ. बिष्णुकुमार राय (एरणाकुलम) और डॉ.सी.एन. मुगूटकर (बेलगाम) मंचासीन थे. इस सत्र में पाँच शोधपत्र प्रस्तुत किए गए.

डॉ. नजीम बेगम ने परमानंद श्रीवास्तव के संपादक रूप को उदाहरणों सहित उभारा तो डॉ. शकीला बेगम ने परमानंद श्रीवास्तव के चिंतक रूप को काव्य भाषा के संदर्भ में स्पष्ट किया. डॉ. बिष्णुकुमार राय ने काव्य प्रयोजन के संदर्भ में उनके चिंतक रूप को स्पष्ट किया तो डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने उनके चिंतन में निहित साहित्य और मनुष्य के संबंध को रेखांकित किया. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने डॉ. परमानंद श्रीवास्तव के कवि-आलोचक पक्ष पर अपना शोध पत्र पढ़ा.
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| प्रो. रामजन्म शर्मा |
अध्यक्षीय भाषण में प्रो. रामजन्म शर्मा ने परमानंद श्रीवास्तव के साथ बिताए हुए क्षणों का स्मरण करते हुए कहा कि वे कर्मठ और सुशील व्यक्ति थे. वे नए लोगों को प्रोत्साहित करते थे और उन्हें कविता और लेखन कर्म के गुर सिखाते थे. गोरखपुर में अनेकानेक कवियों और लेखकों को बनाने का काम उन्होंने किया. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि दिल्ली एन सी ई आर टी के पास उनसे संबंधित दुर्लभ पांडुलिपि है 'साहित्यकारों के पत्र' जो आज तक अप्रत्याशित कारणों से अप्रकाशित है. उन्होंने ठोंक बजाकर यह कहा कि हिंदी साहित्य जगत में परमानंद श्रीवास्तव ही ऐसे व्यक्ति थे जो लगातार कविता और आलोचना कर्म को एक साथ साधे हुए थे. उन्होंने आगे कहा कि परमानंद श्रीवास्तव ने जीवनपर्यंत साहित्य की सेवा की. सामाजिक सरोकार उनकी कविता की अंतर्वस्तु है तथा लोकतत्व उनकी कविता का अनुगूंज. यदि वे किसी रचना को उठाते हैं तो उसकी जड़ तक पहुँचते हैं और उस रचना की वस्तु से लेकर शिल्प और शैली तक की संरचना की बात करते हैं. परमानंद श्रीवास्तव का साहित्य उत्तर आधुनिक ही नहीं बल्कि उत्तरोत्तर साहित्य है.
सत्र का सचालन डॉ. के.एस. पाटील (बेलगाम) ने किया.
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| बाएं से - डॉ. के.एस. पाटील, डॉ. एच. आर. घरपणकर, प्रो. अर्जुन चव्हाण और प्रो. पी. राधिका |
29 मार्च 2014.
भोजनोपरांत राजेंद्र यादव की स्मृतियों को समर्पित दूसरा विचार सत्र प्रारंभ हुआ. इस सत्र की अध्यक्षता कोल्हापुर विश्विद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अर्जुन चव्हाण ने की.
इस सत्र में एर्णाकुलम से पधारी प्रो. पी. राधिका ने राजेंद्र यादव के साहित्य में निहित स्त्री पक्ष को उजागर किया तो धारवाड़ से पधारे डॉ. एच.आर. घरपणकर ने दलित पक्ष से संबंधित राजेंद्र यादव के विचारों को स्पष्ट करने का प्रयास किया. डॉ. के.एस. पाटील ने सांप्रदायिकता के संदर्भ में राजेंद्र यादव की मान्यताओं पर चर्चा की.
यह सत्र विचारोत्तेजक सत्र रहा. अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए हैदराबाद से पधारे प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि हिंदी में आज दलित साहित्य की स्थिति मजबूत है. आज हिंदी में दलित पत्रकारिता भी सशक्त है. दलित समस्या वर्गगत समस्या नहीं है बल्कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है. राजेंद्र यादव को मानवतावादी संवेदना से युक्त साहित्यकार बताया जो पाश्चात्य साहित्य के गजब अध्येता थे तथा मानते थे कि जीवन को डिक्टेट नहीं किया जा सकता है बल्कि उसे वैसे ही जीना पड़ता है जैसे वह हमें मिलता है, परंतु इसे दूसरों के लिए जीने योग्य बनाना भी आवश्यक है.
अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. अर्जुन चव्हाण ने कहा कि राजेंद्र यादव एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्था का नाम है. वे जिंदगी से भागने वाले व्यक्ति नहीं थे, जिंदगी में सबको साथ लेकर चलने वाले कर्मठ और जुझारू व्यक्ति थे. वे किसी भी मुद्दे पर बेबाक टिप्पणी करते थे.
सत्र का संयोजन डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने किया.
अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. टी.आर. भट्ट ने कहा कि आज के अवर्णों के बीच एक ऐसा वर्ग तैयार हो रहा है जो अपने आपको उच्च मानता है और दूसरे अवर्णों को निम्न. आज सवर्ण और अवर्णों के बीच नहीं बल्कि अवर्ण और अवर्ण के बीच जातिभेद प्रबल होता जा रहा है. उन्होंने कन्नड़ दलित साहित्य की बात करते हुए कहा कि वेंकट सुब्बय्या और देवनूर महादेव जैसे अनेक साहित्यकारों ने दलित लेखन को आगे बढाया है. उन्होंने आगे कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की भांति कन्नड़ में भी देवनूर महादेव (1948) दलित साहित्य के अत्यंत सशक्त व प्रतिनिधि कथाकार हैं जिन्होंने भोगे हुए यथार्थ को अपने कथासाहित्य में सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया. उनका लेखन स्वानुभूतिपरक सृजनात्मक लेखन है. उन्होंने 1971 में मैसूर जनजातियों की भाषा में उपन्यास का सृजन किया. यह ध्यान देने की बात है कि देवनूर महादेव को उनके उपन्यास 'कुसुम बाले' के लिए 1990 में केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा 2011 में 'पद्मश्री' से अलंकृत किया गया है.
इस सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, एरणाकुलम केंद्र के प्राध्यापक डॉ. बिष्णुकुमार राय ने किया.