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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

चाणक्य वार्ता सम्मान - 2018

'चाणक्य वार्ता' का तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश विशेषांक का लोकार्पण 
28 अक्टूबर, 2018 को हैदराबाद गच्चिबावली में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एंड हॉस्पिटालिटी मैनेजमेंट में अपराह्न 3.30 बजे आयोजित 'चाणक्य वार्ता' के 'तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश विशेषांक' का विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का निमंत्रण देते हुए पत्रिका के संपादक डॉ.अमित जैन ने फोन किया था तो मैंने उनसे कहा कि मैं कार्यक्रम में जरूर आऊँगी क्योंकि नई दिल्ली से हैदराबाद आकर तेलंगाना और आंध्र से संबंधित विशेषांक का विमोचन करना हम हैदराबादवासियों के लिए गौरव की बात है। उस कार्यक्रम में उपस्थित रहना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने यह भी सूचना दी कि विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए संस्थाओं और व्यक्तियों का सम्मान भी किया जाएगा। बातों-बातों में उन्होंने मुझसे कहा कि तेलुगु साहित्य लेखन और हिंदी अध्यापन के लिए 'आचार्य चाणक्य सम्मान - 2018' के लिए चार-पाँच व्यक्तियों ने मेरा नाम नामित किया है और इस सम्मान के लिए मेरा नाम चयनित किया गया है तो मैं निःशब्द हो गई।

डॉ. अमित जैन,
संपादक 'चाणक्य वार्ता' 
कार्यक्रम भव्य था। जब मैं समारोह स्थल पर पहुँची तो एक क्षण के लिए मुझे लगा कि कहीं मैं गलत स्थान पर तो नहीं पहुँच गई। लेकिन जब अंदर पहुँचकर बैनर देखा तो निश्चिंत हुई। इतने में डॉ. अमित जैन जी से मुलाकात हो गई। पहली बार मिले लेकिन उनकी आत्मीयता के कारण ऐसा नहीं लगा कि हम अपरिचित थे। 

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के आते ही कार्यक्रम शुरू हुआ। लक्ष्मीनारायण भाला की अध्यक्षता में संपन्न इस कार्यक्रम में स्वामी परिपूर्णानंद, डॉ. कृष्ण चंद्र चौराड़िया, डॉ. अमित जैन, डॉ. नरेंद्र, धनराज भांभी व अन्य उपस्थित रहें। 'चाणक्य वार्ता' के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश विशेषांक का लोकार्पण हुआ। सम्मान कार्यक्रम शुरू हुआ। विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान हेतु चार संस्थाओं को, हिंदी और तेलुगु साहित्य के विभिन्न विद्वानों को तथा मीडियाकर्मियों को लगभग 25 लोगों को सम्मानित किया गया। 

दक्षिण में हिंदी प्रचार-प्रसार करके घर-घर में हिंदी की मशाल जलाकर असंख्य विद्यार्थियों को हिंदी सीखने का अवसर प्रदान करने हेतु दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद को 'आचार्य चाणक्य सम्मान - 2018' से सम्मानित किया गया। सभा के प्रतिनिधि के रूप में सचिव सी. एस. होसगौडर ने यह सम्मान स्वीकार किया।

अश्विनी कुमार चौबे के हाथों 
'आचार्या चाणक्य सम्मान - 2018' स्वीकार करते हुए 
प्रो. ऋषभ देव शर्मा 

श्रद्धेय गुरुवर प्रो. ऋषभ देव शर्मा को हिंदी साहित्य लेखन, शोध एवं हिंदी प्रचार हेतु सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र, लघुकथाकार पवित्रा अग्रवाल, चित्रकार नरेंद्र राय और हास्य-व्यंग्य कवि वेणुगोपाल भट्टड के साथ मुझे भी सम्मानित किया गया।
अश्विनी कुमार चौबे के हाथों सम्मान स्वीकार करते हुए 

सोमवार, 31 मार्च 2014

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने किया 4 दिवंगत साहित्यिकों का पुण्य स्मरण


हैदराबाद 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में 29-30 मार्च 2014 को संस्थान के बेलगाम [कर्नाटक] केंद्र में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी [पुण्य-स्मरण] आयोजित की गई.यह राष्ट्रीय संगोष्ठी गत दिनों दिवंगत हुए चार साहित्यकारों राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया और ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुण्य-स्मृति को समर्पित थी. इस अवसर पर आंध्र-सभा की पत्रिका ‘स्रवंति’ का इन्हीं साहित्यकारों पर केंद्रित विशेषांक भी प्रकाशित किया गया.
प्रबुद्ध श्रोता गण
संगोष्ठी के निदेशक प्रो. दिलीप सिंह, संयोजक डॉ. वी. एन. हेगडे तथा डॉ. सी.एन. मुगूटकर की अपील पर साहित्य प्रेमियों, प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने  दो दिन के इस राष्ट्रीय समारोह में बड़ी संख्या में शिरकत की.

 उद्घाटन  सत्र : विरले साहित्यकारों  का आत्मीय स्मरण 
29 मार्च 2014. 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में बेलगाम [कर्नाटक] में 'पुण्य स्मरण : कैलाश चंद्र भाटिया, राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, ओमप्रकाश वाल्मीकि' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संपन्न हुआ.
उद्घाटन दीप प्रज्वलित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. एम. वेंकटेश्वर.
साथ में बाएं से - प्रो. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. वी.एन. हेगडे, प्रो. हीरालाल बाछोतिया, प्रो. दिलीप सिंह
व अन्य 

बीज भाषण करते हुए प्रो. दिलीप सिंह 
बीज भाषण देते हुए प्रमुख समाजभाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह ने विगत 14 महीने में दिवंगत हुए विभिन्न साहित्यकारों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी. विजयदान देथा को मनुष्य की जिजीविषा को अभिव्यक्त करने वाले तथा राजस्थानी लोककथाओं को हिंदी में लाने वाले कथाकार के रूप में याद किया तो के.सी. सक्सेना को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे हास्य-व्यंग्य के जीवट से परिपूर्ण कथाकार थे जो अपने ऊपर भी हंस सकते थे.

डॉ. रघुवंश के साथ जुड़ी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. रघुवंश के साथ उन्होंने समसामयिक कविता पर काम किया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के एम.ए. पाठ्यक्रम के लिए 'समसामयिक हिंदी कविता' पुस्तक का संपादन किया. उन्होंने आगे कहा कि वे डॉ. रघुवंश से प्रभावित थे क्योंकि दोनों हाथों से लाचार होते हुए भी उन्होंने पैर की अंगूठी और उंगली के बीच कलम रखकर लिखने का अभ्यास किया. उन्होंने कहा कि रघुवंश अपनी तरह के अकेले काव्यालोचक थे. वे आलोचना से ज्यादा पाठक को महत्व देते थे.

डॉ. सी. प्रसाद को अच्छे बाल साहित्यकार के रूप में याद किया तो शैलेश मटियानी के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि शैलेश मटियानी ने मजदूर की जिंदगी जी. इसलिए उनकी कलम कटु यथार्थ की अभिव्यंजना का हथियार है. अमरकांत के बारे में उन्होंने कहा कि कस्बाई जीवन के पहलुओं को अपने लेखन में समेटने में अमरकांत दक्ष थे. वे लिखते नहीं थे, बोलते थे.

डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया का स्मरण करते हुए उन्हें हिंदी भाषा के गहरे अध्येता एवं चिंतक बताया तथा डॉ. परमानंद श्रीवास्तव को 'नई राहों के अन्वेषी आलोचक' के रूप में याद करते हुए कहा कि वे जीवन पर्यंत मार-काट वाली आलोचना का विरोध करते रहे. राजेंद्र यादव के बारे में बात करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि हिंदी साहित्य जगत में उनसे जयादा बखेड़े किसी अन्य साहित्यकार ने नहीं खड़े किए होंगे. राजेंद्र यादव की भाषा पर प्रकाश डालते हुए प्रो. सिंह ने उसे चुनौती और ललकार की भाषा बताया. बीजभाषणकर्ता ने ओमप्रकाश वाल्मीकि को हिंदी साहित्य जगत में पहली बार दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को लाने वाले साहित्यकार के रूप में स्मरण किया और कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का सारा साहित्य स्वयं में दलित आंदोलन है और उनकी कवितायें वस्तुतः छोटी छोटी चित्रावालियाँ लगती है.

मुख्य अतिथि का संबोधन : प्रो. एम. वेंकटेश्वर 

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि साहित्य का पठन-पाठन सतही स्तर पर करना या व्याख्या भर करना काफी नहीं होता. गहन अध्ययन और विश्लेषण की आवश्यकता आज की माँग है. पाठक को चिंतन एवं भावनात्मक स्तर पर किसी भी साहित्यकार के साथ तादात्म्य करना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि यह संगोष्ठी निश्चय ही चुनौती से भरी हुई है चूंकि यह ऐसे साहित्यकारों पर केंद्रित है जिन्होंने साहित्य, भाषा, आलोचना, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान जैसे क्षेत्रों के लिए दिशा निर्देशक कार्य किया है. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से प्रकाशित द्विभाषी मासिक 'स्रवंति' का मार्च 2014 का अंक इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए कर्टन रेसर है क्योंकि यह अंक विशेष रूप से परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राजेंद्र यादव और अमरकांत के पुण्य स्मरण पर केंद्रित है.

अध्यक्षीय भाषण में दिल्ली से पधारे वरिष्ठ कवि एवं भाषाविद प्रो. हीरालाल बाछोतिया ने कहा कि चारों स्मरणीय विभूतियों ने अपने रचनाकर्म द्वारा हिंदी को अक्षुण्ण विचार संपदा से समृद्ध किया है. परमानंद श्रीवास्तव आलोचक और संपादक के साथ साथ विरले कवि थे तो राजेंद्र यादव कथाकार और संपादक के साथ विरले विमर्शकार थे. इसी प्रकार ओमप्रकाश वाल्मीकि केवल दलित साहित्य के ही रचनाकार नहीं थे, विरले समाज चिंतक भी थे तथा डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया पुरातन और अधुनातन का समन्वय करने वाले विरले हिंदी भाषावैज्ञानिक थे.

उद्घाटन सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, धारवाड़ की अध्यक्ष प्रो. अमरज्योति ने किया.

विचार सत्र 1 : परमानंद श्रीवास्तव 


29 मार्च 2014.
उद्घाटन सत्र के बाद पहला विचार सत्र प्रारंभ हुआ. परमानंद श्रीवास्तव को समर्पित इस सत्र की अध्यक्षता दिल्ली से पधारे प्रो. रामजन्म शर्मा ने की. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. नजीम बेगम (चेन्नै), डॉ. शकीला बेगम (धारवाड़), डॉ. बिष्णुकुमार राय (एरणाकुलम) और डॉ.सी.एन. मुगूटकर (बेलगाम) मंचासीन थे. इस सत्र में पाँच शोधपत्र प्रस्तुत किए गए. 

डॉ. नजीम बेगम ने परमानंद श्रीवास्तव के संपादक रूप को उदाहरणों सहित उभारा तो डॉ. शकीला बेगम ने परमानंद श्रीवास्तव के चिंतक रूप को काव्य भाषा के संदर्भ में स्पष्ट किया. डॉ. बिष्णुकुमार राय ने काव्य प्रयोजन के संदर्भ में उनके चिंतक रूप को स्पष्ट किया तो डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने उनके चिंतन में निहित साहित्य और मनुष्य के संबंध को रेखांकित किया. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने डॉ. परमानंद श्रीवास्तव के कवि-आलोचक पक्ष पर अपना शोध पत्र पढ़ा. 

प्रो. रामजन्म शर्मा 
अध्यक्षीय भाषण में प्रो. रामजन्म शर्मा ने परमानंद श्रीवास्तव के साथ बिताए हुए क्षणों का स्मरण करते हुए कहा कि वे कर्मठ और सुशील व्यक्ति थे. वे नए लोगों को प्रोत्साहित करते थे और उन्हें कविता और लेखन कर्म के गुर सिखाते थे. गोरखपुर में अनेकानेक कवियों और लेखकों को बनाने का काम उन्होंने किया. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि दिल्ली एन सी ई आर टी के पास उनसे संबंधित दुर्लभ पांडुलिपि है 'साहित्यकारों के पत्र' जो आज तक अप्रत्याशित कारणों से अप्रकाशित है. उन्होंने ठोंक बजाकर यह कहा कि हिंदी साहित्य जगत में परमानंद श्रीवास्तव ही ऐसे व्यक्ति थे जो लगातार कविता और आलोचना कर्म को एक साथ साधे हुए थे. उन्होंने आगे कहा कि परमानंद श्रीवास्तव ने जीवनपर्यंत साहित्य की सेवा की. सामाजिक सरोकार उनकी कविता की अंतर्वस्तु है तथा लोकतत्व उनकी कविता का अनुगूंज. यदि वे किसी रचना को उठाते हैं तो उसकी जड़ तक पहुँचते हैं और उस रचना की वस्तु से लेकर शिल्प और शैली तक की संरचना की बात करते हैं. परमानंद श्रीवास्तव का साहित्य उत्तर आधुनिक ही नहीं बल्कि उत्तरोत्तर साहित्य है.      

सत्र का सचालन डॉ. के.एस. पाटील (बेलगाम) ने किया. 

विचार सत्र 2 : राजेंद्र यादव 
बाएं से - डॉ. के.एस. पाटील, डॉ. एच. आर. घरपणकर, प्रो. अर्जुन चव्हाण और प्रो. पी. राधिका 

29 मार्च 2014.
भोजनोपरांत राजेंद्र यादव की स्मृतियों को समर्पित दूसरा विचार सत्र प्रारंभ हुआ. इस सत्र की अध्यक्षता कोल्हापुर विश्विद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अर्जुन चव्हाण ने की.

इस सत्र में एर्णाकुलम से पधारी प्रो. पी. राधिका ने राजेंद्र यादव के साहित्य में निहित स्त्री पक्ष को उजागर किया तो धारवाड़ से पधारे डॉ. एच.आर. घरपणकर ने दलित पक्ष से संबंधित राजेंद्र यादव के विचारों को स्पष्ट करने का प्रयास किया. डॉ. के.एस. पाटील ने सांप्रदायिकता के संदर्भ में राजेंद्र यादव की मान्यताओं पर चर्चा की.

यह सत्र विचारोत्तेजक सत्र रहा. अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए हैदराबाद से पधारे प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि हिंदी में आज दलित साहित्य की स्थिति मजबूत है. आज हिंदी में दलित पत्रकारिता भी सशक्त है. दलित समस्या वर्गगत समस्या नहीं है बल्कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है. राजेंद्र यादव को मानवतावादी संवेदना से युक्त साहित्यकार बताया जो पाश्चात्य साहित्य के गजब अध्येता थे तथा मानते थे कि जीवन को डिक्टेट नहीं किया जा सकता है बल्कि उसे वैसे ही जीना पड़ता है जैसे वह हमें मिलता है, परंतु इसे दूसरों के लिए जीने योग्य बनाना भी आवश्यक है. 

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. अर्जुन चव्हाण ने कहा कि राजेंद्र यादव एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्था का नाम है. वे जिंदगी से भागने वाले व्यक्ति नहीं थे, जिंदगी में सबको साथ लेकर चलने वाले कर्मठ और जुझारू व्यक्ति थे. वे किसी भी मुद्दे पर बेबाक टिप्पणी करते थे. 

सत्र का संयोजन डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने किया.

विचार सत्र 3 : ओमप्रकाश वाल्मीकि 
बाएं से - डॉ. संजय मादार, डॉ. अमर ज्योति, डॉ. टी.आर. भट्ट,
डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. वी.एन. हेगड़े , डॉ. मंजुनाथ अंबिग और डॉ. मृत्युंजय सिंह  

30 मार्च 2014.
दूसरे दिन का पहला सत्र (विचार सत्र-3) ओमप्रकाश वाल्मीकि पर केंद्रित रहा.  अध्यक्ष थे प्रो. टी.आर. भट्ट.

डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. अमर ज्योति, डॉ. मंजुनाथ अंबिग, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. संजय मादार और डॉ. वी.एन. हेगडे ने क्रमशः आत्मकथा साहित्य, कथा साहित्य, काव्य, सौंदर्यशास्त्र, दलित प्रश्न तथा भाषिक वैशिष्ट्य की दृष्टि से ओमप्रकाश वाल्मीकि के योगदान का विश्लेषण किया. 

अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. टी.आर. भट्ट ने कहा कि आज के अवर्णों के बीच एक ऐसा वर्ग तैयार हो रहा है जो अपने आपको उच्च मानता है और दूसरे अवर्णों को निम्न. आज सवर्ण और अवर्णों के बीच नहीं बल्कि अवर्ण और अवर्ण के बीच जातिभेद प्रबल होता जा रहा है. उन्होंने कन्नड़ दलित साहित्य की बात करते हुए कहा कि वेंकट सुब्बय्या और देवनूर महादेव जैसे अनेक साहित्यकारों ने  दलित लेखन को आगे बढाया है. उन्होंने आगे कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की भांति कन्नड़ में भी देवनूर महादेव (1948) दलित साहित्य के अत्यंत सशक्त व प्रतिनिधि कथाकार हैं जिन्होंने  भोगे हुए यथार्थ को अपने कथासाहित्य में सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया. उनका लेखन स्वानुभूतिपरक सृजनात्मक लेखन है. उन्होंने 1971 में मैसूर जनजातियों की भाषा में उपन्यास का सृजन किया. यह ध्यान देने की बात है कि देवनूर महादेव को उनके उपन्यास 'कुसुम बाले' के लिए 1990 में केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा 2011 में 'पद्मश्री' से अलंकृत किया गया है. 

इस सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, एरणाकुलम केंद्र के प्राध्यापक डॉ. बिष्णुकुमार राय ने किया. 

विचार सत्र 4  : डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया 
बाएं से - डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ, हीरालाल बाछोतिया, डॉ. दिलीप सिंह, डॉ. एम. वेंकटेश्वर और डॉ. ऋषभ देव शर्मा 

30 मार्च 2014.
भाषाविद डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया पर केंद्रित चौथे विचार सत्र की अध्यक्षता प्रमुख समाजभाषाविज्ञानी प्रो. दिलीप सिंह ने की. साथ में, डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. हीरालाल बाछोतिया मंचासीन थे. 

प्रो. एम. वेंकटेश्वर 
डॉ. एम. वेंकटेश्वर ने डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के कोशकार रूप को रेखांकित किया. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाटिया जी के 'अंग्रेजी-हिंदी अभिव्यक्ति कोश', 'हिंदी-अंग्रेजी मुहावरा लोकोक्ति कोश' और 'अंग्रेजी-हिंदी प्रशासनिक कोश' आदि बहुत ही महत्वपूर्ण हैं तथा उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अनुवाद, राजभाषा, प्रयोजनमूलक क्षेत्र, प्रशासन आदि क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लिए ये महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. विशिष्ट प्रयुक्तिगत क्षेत्रों में शब्द चयन के लिए मानक कोश हैं. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कैलाशचंद्र भाटिया कोश निर्माण और कोश प्रयोग पर बल देते थे. वे जुनून के साथ काम करते थे. भाटिया जी ने द्वितीय भाषा शिक्षण के लिए भी सहायक सामग्री तैयार की थी. वे कुशल शिक्षक थे. 

प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने यह भी स्पष्ट किया कि इन हस्ताक्षरों के जाने से हिंदी भाषा, साहित्य और भाषाविज्ञान के क्षेत्र में रिक्तता पैदा हो गई है चूंकि दूसरी पीढ़ी अभी तक तैयार नहीं हो पाई. अतः उन्होंने साहित्य, भाषा, शिक्षण आदि क्षेत्रों से जुड़े हस्ताक्षरों से यह अपील की कि वे दूसरी पीढ़ी को तैयार करें. उन्होंने इस अवसर पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह को बधाई दी क्योंकि वे निरंतर अगली पीढ़ी को तैयार करने में जुटे हुए हैं. इतना ही नहीं उन्होंने युवा पीढ़ी से कहा कि अहंकार को त्याग कर कार्य करने में जुनून के साथ जुट पड़े. उन्होंने आगे यह भी कहा कि यह सिर्फ गुरु के समक्ष अपने आपको समर्पित करने से संभव होगा.

डॉ. हीरालाल बाछोतिया 
डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने कैलाशचंद्र भाटिया के अनुवाद चिंतन को उदाहरणों के साथ स्पष्ट किया और कहा कि भाटिया जी भाषा की मानकता की रक्षा करने के पक्षधर थे. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाटिया जी ने प्रयोजनमूलक रूप को पारिभाषित करने के लिए विविधतापूर्ण सामग्री तैयार की और उनकी दृष्टि हमेशा भाषा के अनुप्रयोग पक्ष पर  रहती थी. आगे उन्होंने भाटिया जी के अनुवाद चिंतन को स्पष्ट करते हुए कहा कि वे अनुवाद और अनुवादक को दोयम दर्जे का न मानकर उच्च कोटि का मानते थे तथा उन्होंने हिंदी भाषा के आधुनिकीकरण के आलोक में अनुवाद की चर्चा की है. उनकी मान्यता है कि हर भाषा की अपनी निजी क्षमताएँ होती हैं. वे लोक बोलियों के पक्षधर थे. वे मानते थे कि भाषा मूलतः शब्द है और शब्द 'संस्कृति' के वाहक. वे अक्सर इस बात पर बल देते थे कि जिस भाषा से अनुवाद कर रहे हैं उस भाषा से टकराना अनिवार्य है चूंकि दो शब्दोंकी  टकराहट से ही अर्थ की आग पैदा होती है. उन्होंने कैलाशचंद्र भाटिया के साथ गुजारे हुए क्षणों को भी याद किया.

प्रो. ऋषभ देव शर्मा 
डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने कैलाशचंद्र भाटिया के काव्य भाषा संबंधी विचारों की व्याख्या करते हुए कहा कि भाटिया जी साहित्य के मर्मज्ञ ऋषि थे. उनकी स्मरण शक्ति विलक्षण थी. उन्हें प्राचीन कवियों से लेकर आधुनिक कवियों तक की अनेक काव्य पंक्तियाँ कंठस्थ थीं. काव्यभाषा के अध्ययन के लिए उन्होंने अपना निजी मॉडल अपनाया जो ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का अनुप्रयुक्त मॉडल है. वे यह मानते थे कि अनुभूति और अभिव्यक्ति में अन्योन्याश्रय संबंध है. उनकी मान्यता है कि वस्तु और रूप को अलग अलग नहीं देखा जा सकता. उनकी पुस्तक 'हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ' में राउलवेल (शिलांकित काव्य) से लेकर नई कविता तक 22 निबंध सम्मिलित हैं. वे इन निबंधों में भाषा विकास के वर्तन बिंदुओं  को बार बार रेखांकित करते चलते हैं. वे साधारणता की ओर जाते हैं. वे मानते हैं की सृजनात्मकता के लिए तद्भवता और देशजता अनिवार्य है. वे हर निबंध के अंत में निर्भ्रांत टिप्पणी के रूप में अपनी स्थापना देते हैं. उनकी भाषा में वागाडम्बर नहीं है. वे मानते हैं  कि  काव्यभाषा के रूप में समय समय पर जनभाषा को ही अपनाया गया.

प्रो. रामजन्म शर्मा 
डॉ. रामजन्म शर्मा ने कैलाशचंद्र भाटिया के साथ बिताए हुए क्षणों को याद करते हुए कहा कि वे सरल और कोमल व्यक्ति थे; साथ ही कठोर, नियमबद्ध और अनुशासनप्रिय व्यक्ति भी. वे हालात से समौझाता नहीं करते. वे मानते थे कि  समाज ही भाषा का वास्तविक रजिस्टर होता है.

अत्यंत भावपूर्ण अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि कैलाशचंद्र भाटिया ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की धारा बदल दी. वे बोलीविज्ञान और क्षेत्रीय भाषाविज्ञान पर बल देते थे. उन्होंने यह आक्रोश वक्त किया कि कैलाशचंद्र भाटिया के बाद भाषाविज्ञान विशेष रूप से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान में बहुत बड़ा गैप पैदा हो चुका है जिसे कवर पाना बहुत ही कठिन कार्य है. उन्होंने बल देते हुए कहा कि धीरेंद्र वर्मा और भाटिया जी ने हिंदी के लिए बहुत काम किया है जिसे देखना और समझना हमारा कर्तव्य है. उन्होंने आगे यह कहा कि आज वे भी लड़खड़ाते हुए उन्हीं पगडंडियों पर चलते हैं. उन्होंने कहा  कि सबकी अपनी अपनी मातृभाषाएँ हैं. इन मातृभाषाओं में  क्षेत्रीय विकल्प हैं. उन्होंने सबके सामने प्रश्न चिह्न लगाया कि उन बोलियों की ओर कितने लोगों का ध्यान जा रहा है. क्या उन विकल्पों पर कोई काम करेगा, उन बोलियों में लिखे गए साहित्य का अनुवाद किया जाएगा, या फिर पिछड़ों और दलितों की भाषा कहकर उन्हें यों ही नष्ट होने दिया जाएगा. ये ऐसे प्रश्न हैं जो बार बार प्रो. दिलीप सिंह को कचोट रहे हैं. वे इस बात से विचलित हैं कि आगे इन भाषाओं का क्या होगा! उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र में कितना शोधकार्य हो रहा है? उन्होंने कहा कि भाटिया जी के साथ साथ दस लोगों ने इस क्षेत्र में कार्य किया अपने निजी मॉडल के साथ, पर उनकी भी अपनी अपनी सीमा थी.

प्रो.दिलीप सिंह के साथ
प्रो. एम. वेंकटेश्वर और प्रो. ऋषभ देव शर्मा
 
प्रो. दिलीप सिंह ने यह याद दिलाया कि रमानाथ सहाय, कैलाशचंद्र भाटिया और रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने मिलकर एन सी ई आर टी के लिए हिंदी का व्याकरण तैयार किया था जिसमें कामताप्रसाद गुरु जी के व्याकरण की सीमाओं को पहचान कर आधुनिक और व्यावहारिक व्याकरण का निर्धारण किया गया था  क्योंकि गुरु जी के समय तक  आधुनिक हिंदी का इतना विकास नहीं हुआ था. लेकिन आज तक भी व्याकरण की यह किताब एन सी ई आर टी के गोदाम में  धूल फाँक रही है.  उन्होंने यह भी कहा कि भाटिया जी बोली के बिना भाषा की बात स्वीकार नहीं करते. उनकी मान्यता है कि बोलियों का एसेंस/ स्वाद/ ज़ायका किसी भी साहित्य के लिए अनिवार्य तत्व है.

इस सत्र का संचालन स्नातकोत्तर कॉलेज, बेलगाम की प्राध्यापक डॉ. माधव बागी ने किया.

बाएं से - डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. टी.आर. भट्ट, डॉ. जयशंकर यादव और डॉ. अर्जुन चव्हाण 

30 मार्च 2014

समापन समारोह में डॉ. टी. आर. भट्ट (धारवाड़) और डॉ. ऋषभ देव शर्मा (हैदराबाद) ने संगोष्ठी की समीक्षा की और आशा व्यक्त की कि यह रागात्मक और भावनात्मक संबंध बना रहे. बतौर मुख्य अतिथि डॉ. अर्जुन चव्हाण (कोल्हापुर) ने संगोष्ठी के आयोजकों को बधाई दी. अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए डॉ. जयशंकर यादव (बेलगाम) ने कहा कि बेलगाम के इस स्नातकोत्तर भवन में दो दिनों तक भाषाई सौहार्द अंतःसलिला के रूप में प्रवाहित होता रहा. यह आनंद ही साहित्य और जीवन का सरोकार है.

समापन सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, बेलगाम केंद्र के प्रभारी डॉ. वी.एन. हेगडे ने किया. प्राध्यापक डॉ. सी.एन. मुगुटकर ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा सामूहिक जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

(प्रस्तुति - डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, बेलगाम से लौटकर) 

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

अशआर अशरफ गिल के, पसंद ऋषभ देव शर्मा की


'शब्द सुगंध' के तत्वावधान में 20 जनवरी 2014 को राजस्थानी स्नातक संघ (हैदराबाद) के प्रेक्षागार में अमेरिका से पधारे पाकिस्तान मूल के वरिष्ठ साहित्यकार अशरफ़ गिल की उर्दू गज़लों के हिंदी रूपांतर को प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लोकार्पित किया. इस अवसर पर उन्होंने विस्तार से अशरफ गिल की गज़लों के कथ्य, शिल्प और काव्यभाषा का विवेचन किया. उन्होंने पाँच श्रेणियों में बाँटकर कवि के कुछ शेरों को उदाहरण के रूप में भी पेश किया जिन्हें पाठकों के रसास्वादन के लिए यहाँ उद्धृत किया जा रहा है.  









अशरफ गिल के चुनिंदा अशआर
मुहब्बत
  1. जो बस रही है कसक बनके मेरे सीने में
     तुझे वो पेश मुहब्बत, करूँ करूँ न करूँ
 
  1. ज़रा इस ने देखा जो दरिया की जानिब
     तो पानी को भी इस ने प्यासा किया है
 
  1. इश्क से ‘अशरफ़’ ना घबराया कोई
     इश्क की गरचे है कीमत ज़िंदगी
 
  1. खुदा रा ! न तुम अपनी आदत बदलना
     सितम से तिरे दिल को आराम आए
 
  1. सुनसान थे वीरान थे आमद से तेरी पेशतर
     तूने दरखशां कर दिए मेरी गली के रास्ते 
  1. ‘अशरफ़’ इस दुनिया की रस्में करते करते अपने बस में
     हर आशिक़ ने जान गंवाई फिर भी मुहब्बत रास न आई
 
  1. तुझे याद करने के शौक में, कई रोग जां को लगा लिए
     तुझे भूलने की लगन में भी, कई दर्द सीने में पल गए
 
  1. हमेशा अश्क ख़्वाहिश जुस्तजू की आड़ में ‘अशरफ़’
     मिरी यादों की बस्ती में बसी अक्सर गलतफ़हमी !
 
  1. व आप से जब तलक आशनाई न थी
     ज़िन्दगानी मिरी मुसकुराई न थी
 
  1. जो लोग मुहब्बत की इबादत नहीं करते
     वो लोग इबादत से मुहब्बत नहीं करते
 
  1. यहाँ यार कोई भी जब मिला, वो मिला के हाथ जुदा हुआ
     जो किसी ने मुझसे बुरा किया, मेरे वास्ते वो भला हुआ
 
  1. इश्क का नाम दूसरा है जुनून
     रोज़ बढ़ता है, कम नहीं होता

व्यक्ति
  1. उसकी हर पल नई कहानी है
     आदमी ! आज की ख़बर ही नहीं
 
  1. कल तलक जिस में रह न पाएँगे
     उसको अपना मकान कहते हैं
 
  1. अगरचे चलते-चलते थक गया हूँ
     मगर फिर भी मुसलसल चल रहा हूँ
 
  1. ज़रूरतों से मुझे बांध कर जहाँ वाले
     मिरी ज़बान को पाबंदियों से कसते हैं
 
  1. दुश्मन बनाने को हमें कोशिश नहीं करना पड़ी
     हमवार यारों ने किए बेगानगी के रास्ते
 
  1. दोस्ती को पड़ रही हैं दुश्मनी की आदतें
     और यकीं से उठ रहा सभी का एतबार है
 
  1. वो इश्क है बे मतलब, वो प्यार है बे मानी
     इंसान का जो ऊंचा, मेयार न कर पाए
 
  1. मालूम न था हम पे ही तनकीद करेगा
     जिस से भी सलीके या शराफ़त से मिलेंगे
 
समाज/ राजनीति
  1. जो मुल्क ऐटम बना रहे हैं, वुह मुफ़लिसी को बढ़ा रहे हैं
     दिलों की धरती हसीन तर है, दिलों का नक्शा बदल के देखें
 
  1. ऐसी नगरी में भला कैसे रहें क्योंकर रहें
     जिसमें हो हर आदमी ही आदमी से डर गया?
 
  1. कितने मज़ाहिब मुखतलिफ है मुखतलिफ सब की रविश
     लेकिन रवां अल्लाह की जानिब सभी के रास्ते
 
  1. पास रखिए, ना यह नेमतें
     गर हंसी आए मुसकाइए 
  1. पकड़िए हाथ भी सूझ से
     सोचकर हाथ पकड़ाइए
 
  1. मैं वोट मर्ज़ी के इक रहनुमा को दे बैठा
     तभी हुकूमती दरबारियों की ज़द में हूँ
 
  1. मैं कर्बला हूँ जो प्यासों को पानी दे ना सका
     तभी मैं रोज़ ही बमबारियों की ज़द में हूँ
 
  1. अखबार की हर सुर्खी यूँ सुर्ख लगे हर दिन
     सतरों के बदन छलनी अलफ़ाज़ के सर ज़ख्मी 
  1. खोखली ऐसी हुकूमत की जड़ें हैं जिसने
     एक तराज़ू को भी तलवार बना के छोड़ा
 
  1. हथियार हथिया लो मगर कर पाओगे वापिस कभी?
     बदले में मासूमों की जो मासूमियत जाती रही
 
  1. तिजोरी थी अमीरों की भरी जानी
     पसीना बस ग़रीबों ने बहाना था
 
  1. इनसान का तो साँस भी लेना मुहाल है
     चारों तरफ़ फ़ज़ाओं में बारूद है यहाँ
 
  1. ऐटमी मुल्क का सोचें जो ये खुशहाल लगे
     पर यहाँ भूख से मरते है न जाने कितने

जिंदगी

  1. तुझ को बच्चों से भी मैं रखता अज़ीज़
     जानता गर तेरी बाबत ज़िंदगी
 
  1. वही ज़िन्दगानी मिरी हुई, मेरे हुक्म पर जो चली रुकी
     जो बिखर गई ना सिमट सकी, वही आप लोगों के नाम है
 
  1. एक खेल है जीना मरना भी
     बस आना जाना होता है
 
  1. रो ज़ाना बाप बनके डराती है ज़िन्दगी
     माँ बन के ख़ौफ़ दिल से मिटाती है ज़िन्दगी
 

कथन भंगिमा
  1. वह मेरे इज़हार-ए-उलफ़त पर यूं घबरा से गए
     पौ फटे जैसे अंधेरा रोशनी से डर गया
 
  1. याद की खेती सूख न जाए
     अक्सर आँखें तर करता हूँ
 
  1. मैं आंधी और अंधेरे का हूँ साथी
     दीया हूँ ! बुझ रहा हूँ जल रहा हूँ
 
  1. खुदा भी मुसतरद कैसे करेगा
     कि मैं इंसान हूँ माँ की दुआ हूँ?
 
  1. चाहता हूँ मैं तेरी नज़दीकी
     तू मगर मुझ से से फ़ासिला माँगे
 
  1. मेरी आँखों की चुभन शायद हो कम
     आप नज़रों से अगर सहलाइए 
  1. सुन के या पढ़ के ही जानोगे मेरे अशआर में
     रंग हैं अनमोल यकता ज़ायका मौजूद है
 
  1. महफ़िल-ए-गिल में जब जी करे
     आइए जाइए आइए जाइए
 
  1. प्यार तूफ़ान है आंधी है गरजता बादल
     जो सुझाई क्या, दिखाई भी नहीं देता है
 
  1. न तिरी वफ़ा थी नसीब में, न तिरी नज़र का करम हुआ
     ये तो खुदफ़रेबी का खेल था, जो हम आसरों से बहल गए
 
  1. उस की आँखें तरकर डालें
     जिससे आँख मिलाएं आँसू
 
  1. जता के प्यार तुम को कर लिया नाराज़, उफ़ तौबा !
     तुम्हारे रूठ जाने से तो थी बेहतर गलतफ़हमी ! 
  1. अपनी मर्ज़ी से हुआ शहर में सूरज तकसीम
     मेरी बारी है तो अब रात हुई जाती है
 
  1. आँखों की ख़ताओं के बदले
     दिल पर जुरमाना होता है
 
  1. जिस उम्र में आँखें मिलती हैं
     क्या ख़ूब ज़माना होता है
 
  1. एक दिन ये ख़ामुशी से घर को छोड़ जाएगी
     सांस ! जो मकान-ए-जिस्म में किराएदार है
 
  1. मिरा जिस वक्त हँसने का ज़माना था
     ज़माने को इसी दम ही रुलाना था
 
  1. खिलौनों की तरह पाबंद हम तेरी रज़ा के
     हमारी किस्मतों पर है फकत तेरा इजारा
 
  1. प्यार है हादसे का नाम अगर
     फिर ज़रूर एक हादसा कीजे
 
  1. कभी गम में माँ याद आयी है ‘अशरफ़’
     कभी उलझनों में खुदा याद आया
कविता

  1. होता रहेगा खुद-बखुद अशआर का नुज़ूल
     आएंगे जब वो बज़्म में होगी गज़ल तमाम
 
  1. ‘अशरफ़’ कुबूलियत नहीं पाता वही कलाम
     जो ख़ासो आम से नहीं होता है हमकलाम

सोमवार, 20 जनवरी 2014

‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ पढ़ते हुए

[हैदराबाद के हिंदी दैनिक 'मिलाप' ने 19 जनवरी 2014 के अपने रविवारीय परिशिष्ट 'फुर्सत का पन्ना' में यह समीक्षा स्थानाभाव के कारण अंग-भंग करके छापी है. नीचे पूरा आलेख प्रस्तुत है.]
‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ पढ़ते हुए 


तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ

 ऋषभ देव शर्मा

2013

 पृष्ठ – 204

 मूल्य – रु. 395

 जगत भारती प्रकाशन, सी-3-77, दूरवाणी नगर, 
ए डी ए, नैनी, इलाहाबाद – 211008 (उत्तर प्रदेश )

डॉ. ऋषभ देव शर्मा (1957) कई दशक से दक्षिण भारत में रहकर निष्ठापूर्वक हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे हैं. इस अवधि में आपने एक सफल अध्यापक, जिज्ञासु अनुसंधानकर्ता, सुधी समीक्षक, विवेकशील संपादक और ओजस्वी वक्ता के रूप में ख्याति अर्जित की है. आपकी काव्य कृतियों में तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (स्त्री पक्षीय कविताएँ, 2011), प्रेम बना रहे (2012) और सूँ साँ माणस गंध (2013), आलोचना कृतियों में तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता : आठवाँ-नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000) और कविता का समकाल (2011) तथा संपादित ग्रंथों में अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), अनुवाद : नई पीठिका नए संदर्भ (2003), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), प्रेमचंद की भाषाई चेतना (2006) एवं भाषा की भीतरी परतें (2012) जैसी पुस्तकें बहुप्रशंसित रही हैं. एक खास बात जो डॉ. शर्मा को अपने अनेक समकालीन और समशील रचनाकारों से अलग करती है वह यह है कि आप निरंतर नई प्रतिभाओं को प्रेरित और पोषित करते हैं. शायद यही कारण है कि उन्हें हिंदीतरभाषी हिंदीसेवियों का बड़ा स्नेह मिला है. लगभग एक दशक पूर्व प्रो. दिलीप सिंह ने उनके संबंध में ठीक ही लिखा था कि “हैदराबाद के हिंदी जगत् में ऋषभदेव जी अत्यंत लोकप्रिय हैं. सब उनका साथ चाहते हैं, और वे भी किसी को निराश नहीं करते.” यह लोकप्रियता उन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य के प्रति अपने प्रेम के बल पर अर्जित की है. इस प्रेम की ही परिणति है उनका सद्यःप्रकाशित निबंध संग्रह ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ (2013).

इस पुस्तक (तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ) में छह खंड हैं जिनमें 36 आलेख और 1 विस्तृत शोधपत्र सम्मिलित हैं. पहले खंड में आंध्र के महान भक्त कवियों अन्नमाचार्य, रामदास, क्षेत्रय्या, पोतना, मोल्ला और वेंगमाम्बा तथा संत कवि वेमना पर केंद्रित हिंदी पुस्तकों का विवेचन करते हुए भारतीय साहित्य में भक्ति आंदोलन के योगदान पर कुछ टिप्पणियाँ शामिल हैं. दूसरा खंड आधुनिक तेलुगु कविता को समर्पित है. इसमें जिन अनेक तेलुगु कवियों की अनूदित कृतियों की विवेचना की गई है उनमें श्रीश्री, डॉ. सी. नारायण रेड्डी, कालोजी, दिगंबर कविगण (नग्नमुनि, निखिलेश्वर, चेरबंड राजु, महास्वप्न, ज्वालामुखी और भैरवय्या), पेर्वारम, अजंता, वासा प्रभावती, डॉ. एस. शरत ज्योत्स्ना रानी, मुस्लिमवादी कविगण (एस. ए. अज़ीम, अली, ख्वाजा, आजम, दिलावर, शाहजहाना, सिकिंदर, गौस मोहिउद्दीन और स्काई बाबा), डॉ. एन. गोपि, डॉ. शिखामणि, डॉ. सी. भवानी देवी, डॉ. पी. विजयलक्ष्मी पंडित, वाणी रंगाराव, डॉ. मसन चेन्नप्पा और डॉ. एस. वी. सत्यनारायण के नाम शामिल हैं. इसी प्रकार तीसरे और चौथे खंड में कथा साहित्य और नाट्य साहित्य के अनुवादों की तटस्थ समीक्षा देखी जा सकती है. यहाँ विवेचित कृतियाँ हैं बैरिस्टर पार्वतीशम (मोक्कपाटी नरसिंह शास्त्री), द्रौपदी (डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद), नई इमारत के खंडहर (सय्यद सलीम), अहल्या (चलसानी वसुमती), सोने की वर्षा (डॉ. भार्गवी राव), बारिश थम गई (एल. आर. स्वामी), आक्रमण कब का हो चुका (पेद्दिन्टि अशोक कुमार), पंचामृत (डॉ. डी. विजय भास्कर) तथा अक्षर (नंदि राजु सुब्बाराव). साथ ही, आरंभिक भारतीय उपन्यासों पर एक शोधग्रंथ (आर. एस. सर्राजू) और प्रतिनिधि तेलुगु कहानियों के 2 संकलनों की भी विवेचना की गई है जिसके कारण तेलुगु कथा साहित्य के संपूर्ण परिदृश्य का विहंगम अवलोकन संभव हो सका है. पाँचवे खंड में 4 आलेख हैं – तेलुगु साहित्य का परिवर्तनशील परिदृश्य, बीसवीं सदी का तेलुगु साहित्य, हिंदी तेलुगु तुलना और हिंदी में दक्षिण भारतीय साहित्य जिनमें क्रमशः निखिलेश्वर, डॉ. आई. एन. चंद्रशेखर रेड्डी, डॉ. शकीला खानम और डॉ. विजय राघव रेड्डी की हिंदी पुस्तकों के बहाने तेलुगु साहित्य के इतिहास, आलोचना और अनुवाद पक्ष की चर्चा की गई है. पुस्तक के छठे खंड में तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद की परंपरा और उसके प्रदेय पर केंद्रित 56 पृष्ठों का एक सुविस्तृत शोधपत्र प्रकाशित किया गया है. मुझे भी सहलेखक के रूप में इस शोधपत्र के लिए काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. यह अपनी प्रकार का शायद पहला शोधपत्र है जिसमें अनुवाद परंपरा की चर्चा के बाद तेलुगु से अनूदित पाठों का गहराई से विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदी के भाषा समाज को ये अनुवाद किस प्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक और साहित्यिक स्तर पर समृद्ध करते हैं. ‘भास्वर भारत’ (दिसंबर 2013) में प्रो. गोपाल शर्मा ने इस खंड को इस पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंश मानते हुए लिखा है “कहना न होगा कि इस विस्तृत खंड में हिंदी में आए तेलुगु साहित्य के कुछ पाठों से ही ज्ञात हो जाता है कि तेलुगु भाषासमाज की सांस्कृतिक विशेषताएं एक ओर तो समग्र भारत के समान है और दूसरी ओर इसमें किंचित इंद्रधनुषी विभिन्नताएँ भी हैं. तेलुगुभाषी लेखक समय-समय पर तेलुगु जीवन शैली का विवरण-विश्लेषण भी करते जाते हैं और हिंदी के पाठक समझ जाते हैं कि आंध्र जीवनशैली में किन-किन सांस्कृतिक चिह्नों का प्रयोग आज भी हो रहा है. इस प्रकार के तुलनात्मक समाजभाषावैज्ञानिक अध्ययन की हिंदी में यह पहली मिसाल देखने में आई है.” वस्तुतः यह अनुवाद का सेतुधर्म है और प्रो. शर्मा की यह पुस्तक इस सेतुधर्म को ही विशेष रूप से रेखांकित करती है. 

तेलुगु और हिंदी के भाषासमाजों के बीच इस साहित्यिक सेतु के निर्माण में मूल रचनाकारों और प्रस्तुत ग्रंथकार का संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. परंतु यहाँ यह कहना जरूरी है कि यह संवाद अनुवादकों के बल पर ही संभव हुआ है. प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने इस पुस्तक में जिन 23 अनुवादकों के द्वारा अनूदित सामग्री का विवेचन किया है वे हैं डॉ. भीमसेन निर्मल, डॉ. एम. बी. वी. आई. आर. शर्मा, डॉ. निर्मलानंद वात्स्यायन, डॉ. एम. रंगैया, डॉ. पी. माणिक्यांबा, डॉ. जे.एल. रेड्डी, डॉ. टी. मोहन सिंह, प्रो. पी. आदेश्वर राव, डॉ. विजय राघव रेड्डी, डॉ. भागवतुल सीता कुमारी, डॉ. वाई. वेंकटरमण राव, आर. शांता सुंदरी, एस. शंकराचार्लु, निखिलेश्वर, पारनंदि निर्मला, डॉ. आर. सुमनलता, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, जी. परमेश्वर, डॉ. म. लक्ष्मणाचारी, डॉ. वेन्ना वल्लभ राव, डॉ. के. श्याम सुंदर, डॉ. संतोष अलेक्स एवं डॉ. बी. विश्वनाथाचारी. वस्तुतः, जैसा कि प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने ‘भूमिका’ में निर्दिष्ट किया है, “यह ग्रंथ अनूदित साहित्य के प्रति ऋषभ देव शर्मा की सहज संवेदना को प्रदर्शित करता है. भारतीय संदर्भ में हिंदी में इतर भाषा से अनूदित साहित्य मूल भाषासमाज की सांस्कृतिक अस्मिता को समझने के लिए वृहत पाठक वर्ग को अवसर प्रदान करता है. यह ग्रंथ हिंदीभाषी पाठकों एवं शोधार्थियों के लिए तेलुगु साहित्य के गणनीय हिस्से को समझने में न केवल सहायक होगा बल्कि यह शोध के क्षेत्र में नई संभावनाओं को भी विकसित करेगा. तेलुगु साहित्य के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए यह ग्रंथ उत्प्रेरक की भूमिका अवश्य निभाएगा.” 

अंत में, मैं यह उल्लेख करना चाहूँगी कि इस पुस्तक का समर्पण-वाक्य अत्यंत भावपूर्ण और श्लाघनीय है “समकालीन भारतीय कविता के उन्नायक ‘नानीलु’ के प्रवर्तक परम आत्मीय अग्रज कवि प्रो. एन. गोपि को सादर” समर्पित यह कृति हिंदी और तेलुगु साहित्यकारों के बीच भावपूर्ण स्नेह-संबंध की प्रतीक और प्रतिमान बन गई है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रो. ऋषभ देव शर्मा की इस आलोचना कृति को हिंदी के साथ साथ तेलुगु समाज का भी भरपूर स्नेह प्राप्त होगा.
- गुर्रमकोंडा नीरजा  


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