शुक्रवार, 25 मार्च 2022

मुझे नहीं मरना है कभी : नरेश मेहता



अब जो निश्चित रूप से अपने बारे में पता है
वह यह कि
मुझे नहीं मरना है
कभी -

कहकर घोषणा करने वाले ‘नई कविता’ के प्रमुख हस्ताक्षर नरेश मेहता का यह 'शताब्दी वर्ष' है। उनका जन्म 15 फरवरी, 1922 को मालवा के कस्बे शाजापुर में हुआ। उनका वास्तविक नाम था पूर्णशंकर। नरसिंहगढ़ की राजमाता ने उनकी काव्य प्रतिभा से प्रसन्न होकर उन्हें ‘नरेश’ उपनाम दिया था। इस उपनाम से पूर्णशंकर इतना प्रभावित हो गए कि इस नाम को अपना लिया। आगे चलकर वे नरेश मेहता के नाम से प्रसिद्ध हुए। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक जगह यह उल्लेख किया कि नरेश मेहता अपने नाम के आगे ‘श्री’ लगाना पसंद करते थे। यों, अनेक स्थलों पर उनका नाम 'श्रीनरेश मेहता' भी मिलता है।

नरेश मेहता ने काशी विश्वविद्यालय से एमए की उपाधि अर्जित की थी। विद्यार्थी जीवन से ही वे अनेक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सेना में भर्ती होकर देश के लिए संघर्ष भी किया था। आकाशवाणी में अधिकारी के रूप में नौकरी की थी। अपने प्रगतिशील विचारों के कारण 1953 में वे सरकारी नौकरी से मुक्त हो गए। उसके बाद उन्होंने निरंतर साहित्य सृजन में ही समय बिताया। इस संदर्भ में ममता मेहता का यह कथन द्रष्टव्य है - “रेडियो की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने रेडियो की या अन्य कोई नौकरी करने का विचार अपने मन से निकालकर इलाहाबाद में रहते हुए स्वयं को रचनाकर्म के लिए समर्पित कर दिया था।” (समावर्तन, सितंबर 2017, पृ.15)

नरेश मेहता के संबंध में रामस्वरूप चतुर्वेदी का कहना है कि वे प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चितेरे हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिंदी काव्य का इतिहास’ में नरेश मेहता और शमशेर बहादुर सिंह की तुलना करते हुए लिखा है कि “दोनों आरंभिक रचना-काल में मार्क्स के चिंतन को स्वीकार करते हैं, तथा लंबे समय तक साम्यवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। बाद में दोनों अध्यात्म की ओर उन्मुख होते हैं, नरेश काफी पहले विस्तार में, शमशेर महज संकेतात्मक रूप में।” (पृ.104)।

नरेश मेहता भारतीयता की अपनी गहरी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। भारतीयता के संदर्भ में केशवचंद्र वर्मा से बात करते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीयता की तलाश “स्वतंत्रता के बाद और तेज हो गई, क्योंकि तब हमें उसी रास्ते अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र की मान्यता दिलाने की बाध्यता हो गई।” (मेरे साक्षात्कार, पृ.18)

नरेश मेहता किसी भी ‘वाद’ के कटघरे में न ही अपने आपको रखते थे और न ही अपनी कविता को। वे अपनी कविता को संकीर्णता से बचाए रखना चाहते थे। बनपाखी सुनो (1957), बोलने दो चीड़ को (1962), मेरा समर्पित एकांत (1962), उत्सवा (1979), तुम मेरा मौन हो (1982), अरण्या (1985), आखिर समुद्र से तात्पर्य (1988), पिछले दिनों नंगे पैरों (1990), देखना एक दिन (1991), चैत्या (1993), समिधा (दो खंड, 2000) आदि उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह हैं। संशय की एक रात (1962), महाप्रस्थान (1965), प्रवाद पर्व (1977), शबरी (1979) और प्रार्थना पुरुष (1985) प्रसिद्ध खंड काव्य हैं। उन्होंने 1936 से कविता लिखना शुरू किया था। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के माध्यम से वे पाठकों के सामने आए। प्रभाकर श्रोत्रिय उन्हें ‘मधुकरी के कवि’ मानते थे।

काव्य एक गंभीर सृजनात्मक प्रक्रिया है। कविता को समझने के लिए पाठक को भी उसी भावभूमि में उतरना ही होगा जिस भावभूमि में कवि विराजमान है, नहीं तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। कविता के संदर्भ में नरेश मेहता का यह कथन उल्लेखनीय है - “काव्य हमारे लिए केवल मनोरंजन या तात्कालिक प्रतिक्रिया अथवा फतवेबाजी है तो काव्य की इस प्रकृति, स्वरूप और सत्ता को जानने में कोई खास परेशानी नहीं होगी, लेकिन यदि वह हमारे लिए एक गंभीर सृजनात्मक कर्म अथवा रचनात्मक दायित्व अथवा संज्ञा है जिससे हम अनिवार्य रूप से ग्रथित हैं, तो हमारी जिज्ञासा और पड़ताल का दायरा भी अधिक गहन और विशाल होगा। *** यदि काव्य की कोई मुद्रा संभव है तो वह ‘अर्धनारीश्वर’ जैसी होगी।” (चैत्या, पृ.7)

नरेश मेहता का अपना जीवन दर्शन था। उनकी पत्नी ममता मेहता ने अपनी पुस्तक ‘उत्सव पुरुष : श्रीनरेश मेहता’ में लिखा है कि अकसर नरेश मेहता यह कहते थे कि किसी बात की चिंता नहीं करनी चाहिए। उनकी इन बातों से उनकी वैचारिकता को समझा जा सकता है - ‘क्या यह काफी नहीं कि अगर चार व्यक्ति आपको गलत समझते हैं तो चार व्यक्ति आपको सही भी समझते हैं। जिस तरह प्रकृति में असंतुलन नहीं है, वैसे ही समाज में भी संतुलन बना रहता है। ऊपर वाला अपनी सृष्टि में बराबर संतुलन बनाए रखता है। प्रकृति में देखो, जहाँ विशाल पर्वत हैं, वहाँ धरती के समानांतर बहने वाली नदी है। यदि कठोर चट्टानें हैं तो मसृण माटी भी है। ऊँचे-ऊँचे विशाल देवदारु वृक्ष हैं तो छोटी-छोटी घास भी हैं। बस, ऐसा ही संतुलन समाज में भी है। हमें चिंता नहीं करनी चाहिए।’ (पृ.26-27)।

नरेश मेहता कभी भी इस बात से चिंतित नहीं होते थे कि लोग उनके बारे में क्या सोच रहे हैं और क्या कह रहे हैं। वे कभी किसी बात की सफाई नहीं देते थे। लोगों पर ही छोड़ देते थे। इस संदर्भ में ममता मेहता कहती हैं कि “असल में अपने पक्ष में, अपनी सफाई देने में इनका विश्वास ही नहीं था। साहित्यिक जीवन में भी अपने प्रति फैले भ्रम को दूर करने का इन्होंने कभी कोई प्रयत्न नहीं किया - न बोलकर, न लिखकर। इनकी मान्यता थी कि कई बार जब सामने वाला आपको गलत मान लेता है तो फिर वह आपकी हर बात को उसी नजरिए से देखता है, चाहे वह आपकी ओर से दी गई सफाई ही क्यों न हो। दुनिया की कोई सफाई आपके प्रति उसके दृष्टिकोण को उस समय तो नहीं ही बदल सकती। इसलिए उसके पीछे समय और शक्ति का अपव्यय करने की क्या आवश्यकता? अगर सामने वाले में आपके प्रति थोड़ी-सी सदाशयता होगी तो समय के साथ उसकी गलतफहमी अपने आप दूर हो जाएगी। और अगर न हो तो न सही, क्या फर्क पड़ता है।” (उत्सव पुरुष : श्रीनरेश मेहता, पृ.26)

‘हम अनिकेत’ में नरेश मेहता ने लिखा है कि “जीवन किसी भी उपन्यास से कहीं अधिक औपन्यासिक होता है।” रवींद्र कालिया से बातचीत करते हुए उन्होंने एक बार कहा था कि उनके लिए जीवन कविता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अम्बीशन्स पर उनका विश्वास नहीं। “मुझ पर जो लांछन बार-बार लगाया जाता है - वह सही भी होगा, मुझे कोई आपत्ति नहीं - कि साहब इनकी तो प्रोजेक पोएट्री है। ठीक है। बेसिकली मेरी सारी मानसिक तैयारी एक कवि की है।” (रवींद्र कालिया, स्मृतियों की जन्मपत्री, पृ.119)

नरेश मेहता मूलतः कवि हैं। उनकी कविताओं में असंख्य प्रकृति चित्रों को देखा जा सकता है। आकाश, बादल, सूरज, चाँद, नदी, झील, पर्वत, हिमालय, जंगल, आम्रछाँह, घाटियाँ, पृथ्वी, फूल, वृक्ष आदि अनेक रूपों में उपस्थित होते हैं। इस संदर्भ में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का यह कथन उल्लेखनीय है - “नरेश जी की कविता में असंख्य प्रकृति चित्रों को देखकर लगता है जैसे कवि मन पर प्रकृति का जादू है। जहाँ प्राकृतिक दृश्य आते हैं उनका वर्णन कवि बड़े उल्लास के साथ करता है।” उदाहरण के लिए देखें उनकी कविता ‘किरन-धेनुएँ’। इसमें प्रातः काल के रूपक को देखा जा सकता है, साथ ही श्रम संस्कृति को भी -

“उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला।

******

बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ’ धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।”

नरेश मेहता प्रकृति को ही सर्वोपरि मानते थे। इसीलिए वे कहते हैं -

“प्रकृति से बड़ा
कोई व्‍यक्ति नहीं होता
कोई शास्‍त्र नहीं होता, पार्थ।”

नरेश मेहता की कविता में प्रकृति ही नहीं, रिश्ते भी मुखरता के साथ विद्यमान है। उनकी कविता ‘माँ’ हृदयस्पर्शी है-

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी-
पर, जो भी
जहाँ भी लीपता होता है
गोबर के घर-आँगन,
जो भी
जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना,
जो भी
जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है
मेथी की भाजी,
जो भी
जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है
दूर तक का पथ-
वही,
हाँ, वही है माँ!!

नरेश मेहता के लिए “रचना प्रतिश्रुति है अपने भोगे हुए उस अनुभव की- जिसे हमने अपने से पृथक की प्राप्ति के लिए वाणी दी।” ‘संशय की एक रात’ में उन्होंने युद्ध और शांति की प्रतिष्ठा की है -

तुम्हें लड़ना युद्ध
अपने से नहीं
अनास्था से नहीं
संशय व्यक्तित्व से भी नहीं
असत्य से

‘संशय की एक रात’ में उन्होंने मानवीय अस्तित्व की चिंता को भी दिखाया है -

कितने ही लघु हो
इससे क्या?
सार्थक हैं।
स्वत्व है हमारा
कर्म हमारी जलती हुई आँखों में
बंधी हुई मुट्ठी में
भींचे हुए ओठों में

नरेश मेहता का मानना है कि लूट-खसोट, युद्ध, षड्यंत्र होते ही रहेंगे, तो एक दिन मानव का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। संपन्न होने का अर्थ है मनुष्य का स्वत्वहीन होना। इसी प्रकार ‘प्रवाद पर्व’ में उन्होंने राम के यथार्थवादी दृष्टिकोण को सामयिक संदर्भों से परख कर जीवन मूल्यों की स्थापना की है-

क्या यही है मनुष्य का प्रारब्ध? कि
कर्म
निर्मम कर्म
केवल असंग कर्म करता ही चला जाए?

‘महाप्रस्थान’ में नरेश मेहता ने व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न उठाने के साथ-साथ राज्य व्यवस्था में पनपते विकारों को उजागर किया है -

या उसे इतना विवश, पंगु बना दे कि
उनका अग्नि व्यक्तित्व
राज्य-व्यवस्था की निरंकुशता को कभी चुनौती न दे पाए।

नरेश मेहता के व्यक्तित्व के संबंध में ममता मेहता का यह कथन उल्लेखनीय है- “नरेश जी उस प्रजाति के व्यक्ति थे, जिस प्रजाति को रचनाकर्म संस्कार के रूप में मिला है। वे अंदर से कोमल हृदय प्रेमी जीव थे और दुख-दर्द में संघर्ष को देखते थे। उनके चिंतन का संसार असीमित था और वे बरामदे में बैठकर घंटों आसमान की तरफ देखा करते थे। उनकी मूल मानसिकता कवि की थी।” (समावर्तन, सितंबर 2017, पृ.15)।

यह सच है कि नरेश मेहता मूलतः कवि हैं पर उन्होंने गद्य साहित्य का भी सृजन किया। ‘डूबते मस्तूल’ (1954), ‘यह पथ बंधु था’ (1963), ‘धूमकेतु : एक श्रुति’ (1962), ‘नदी यशस्वी है’ (1964), ‘दो एकांत’ (1964), ‘प्रथम फाल्गुन’ (1968), ‘उत्तरकथा’ भाग-1, भाग-2 (1979 से 1982) आदि उनके उपन्यास हैं, तो ‘तथापि’ (1962), ‘एक समर्पित महिला’ (1965), ‘जलसाघर और अन्य कहानियाँ’ (1980) कहानी संग्रह। (नाटक) ‘सुबह के घंटे’ (1955), ‘खंडित यात्राएँ’ (1962), (रेडियो एकांकी) ‘सनोवर के फूल’ (1962), ‘पिछली रात की बरफ़’ (1962), (यात्रावृत्त) ‘साधु न चलै जमात’ (1991), (संस्मरण) ‘प्रदक्षिणा : अपने समय की’, (आलोचना) ‘काव्य का वैष्णव व्यक्तित्व’ (1972), ‘मुक्तिबोध : एक अवधूत कविता’ (1987), ‘शब्द पुरुष : अज्ञेय’ (1988), ‘काव्यात्मकता दिक्काल’ (1991), ‘हम अनिकेत’, (संपादन) ‘वाग्देवी’, ‘गांधी गाथा’, ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन का इतिहास’ आदि उल्लेखनीय गद्य कृतियाँ हैं।

गद्य लेखन के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए नरेश मेहता ने कहा कि “मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि कभी गद्य भी लिखूँगा। घटनाओं में अपने आपको बाँध पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है, इसलिए मेरी कहानी में कोई घटना नहीं होती।” (रवींद्र कालिया, स्मृतियों की जन्मपत्री, पृ.120)। उन्होंने अपने सृजनात्मक लेखन से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। इस योगदान के लिए उन्हें सारस्वत सम्मान (1983), मध्यप्रदेश शिखर सम्मान (1984), उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान : भारत भारती सम्मान (1985), मंगला पारितोषक (1886), साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1988) और भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1992) आदि से सम्मानित किया गया।

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करते समय उनके द्वारा दिए गए वक्तव्य के अंश को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है-

आज का मनुष्य भयाक्रांत है, इसी करण वह इतना हिंसक और आक्रांत हो उठा है कि वह सब कुछ पादाक्रांत कर डालना चाहता है। भय के वलयों में व्यष्टि और सृष्टि ही नहीं बल्कि समष्टि के अस्तित्व का भी प्रश्न उत्तरोत्तर गहराता जा रहा है। यह मदांध स्थिति आज के सर्जनात्मकता के किसी भी पूर्व काल के संकल्प और प्रतिश्रुति से भी बड़ा संकल्प और प्रतिश्रुति चाहती है। और वह तभी संभव है जब स्वयं कवि और सर्जक निर्भय हो। कवि और काव्य को अपनी इस केंद्रीयता को समझना ही होगा कि उसकी वाणी ही चैत्य-वाणी है, उसका स्वर ही आश्वस्ति का स्वर है, अतः सृष्टि के इस छंद-महोत्सव में काव्य को ही दक्षिणावर्त शंख बनना होगा।

जाने अनजाने योग दिया जिनने
वे सब वरेण्य हैं
मुझ अपात्र के निर्माता हैं
मनुज देह में वे स्मयक हैं।