शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

बालशौरि रेड्डी और उनका साहित्य




दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार-प्रसार में वरिष्ठ लेखक बालशौरि रेड्डी का योगदान सराहनीय है. उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, समीक्षा, आलोचना आदि साहित्यिक विधाओं के माध्यम से दक्षिण भारत की संस्कृति को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का काम किया है. मौलिख लेखन के साथ-साथ अनुवादों के माध्यम से भी उन्होंने दक्षिण और उत्तर के भेद को मिटाने का प्रयास किया है. डॉ.जी.मल्लेशम (1959) ने बालशौरि रेड्डी के समग्र साहित्य का अनुशीलन किया है. इसीका परिणाम है उनकी किताब ‘बालशौरि रेड्डी और उनका साहित्य : एक अनुशीलन’ (2008).



भारतीय संस्कृति जड़ न होकर प्रगतिशील रही है और इसका एक सुनिश्चित इतिहास है. भारतीय संस्कृति असांप्रदायिक है और इसमें अखिल भारतीय भावना निहित है. किसी राष्ट्र अथवा देश के सांस्कृतिक विकास में उस राष्ट्र या देश की भाषा, वहाँ का वाङमय, वहाँ का दर्शन तथा वहाँ की ललित कलाएँ अपनी अहम भूमिका निभाति हैं. भारत की संस्कृति तथा सभ्यता अतिप्राचीन है. आवश्यकता इस बात की है कि इसे किशोर वय बालकों तक अवश्य पहुँचाया जाए, साथ ही नव शिक्षित प्रौढ़ों को भी इससे परिचित कराया जाए ताकि वे अपने वर्तमान और भविष्य को सुखद बनाने के लिए दिशा प्राप्त कर सकें. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए रेड्डी जी ने आंध्र, तमिलनाडु तथा कर्नाटक राज्यों से संबंधित संस्कृति, सभ्यता आदि की चर्चा अपनी कृतियों में की है.



पाश्चात्य देशों की तुलना में भारत में आज भी बाल साहित्य की कमी है. इस क्षेत्र में बालशौरि रेड्डी का प्रयास सराहनीय है. ‘चंदामामा’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने बाल साहित्य लेखन को आगे बढ़ाया. उनकी मान्यता है कि देश का भविष्य बच्चों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास पर ही निर्भर होता है. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने हिंदी पाठकों के लिए ‘तेलुगु की लोक कथाएँ’, ‘आँध्र के महापुरुष’, ‘तेनाली राम के लतीफ़े’, ‘तेनाली राम के नए लतीफ़े’, ‘बुद्धू से बुद्धिमान’, ‘न्याय की कहानियाँ’, ‘तेनाली राम की हास्य कथाएँ’, ‘आदर्श जीवनियाँ’ और ‘आमुक्त माल्यदा’ जैसे बालोपयोगी रचनाएँ कलात्मक रूप से प्रस्तुत की.



लेखक ने यह प्रतिपादित किया है कि बालशौरि रेड्डी एक प्रतिभा संपन्न साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने उपन्यासों, कहानियों, नाटकों आदि के माध्यम से भारतीय समाज की विभिन्न समस्याओं पर प्रकाश डाला है और साथ ही उनके निदान हेतु समुचित सुझाव भी प्रस्तुत किए हैं. वस्तुतः आंध्र का इतिहास, उसकी सभ्यता व संस्कृति से हिंदी पाठकों को परिचित कराना ही रेड्डी जी के साहित्य का मुख्य उद्धेश्य रहा है, इस तथ्य को उभारने में यह पुस्तक बड़ी सीमा तक सफल है.


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* बालशौरि रेड्डी और उनका साहित्य : एक अनुशीलन/डॉ.जी.मल्लेशम/2008/मिलिंद प्रकाशन,4-3-178/2 कंदास्वामी बाग, हनुमान व्यायामशाला की गली, सुलतान बाज़ार, हैदराबाद-500 095/पृष्ठ : 320/मूल्य: रु.375/-
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1 टिप्पणी:

taruna dadhich ने कहा…

JI haan maine yah book pdhi he Dr Bala Showri Reddy ji k bare me yah book mahtvporn h...