शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

EVIL THOUGHTS

Be awake, be vigilant, because your adversary,
the devil, prowls around as a roaring lion looking for someone to eat and destroy.
1 Pet 5:8 


Fiery darts, a poisoned rain,
Evil thoughts, a searing pain.
They pierce the mind, a sudden strike,
Leaving truth and terror alike.


Whispers rise, a soft hissed sound,
Where shadows creep and fears are bound.
They bend the truth with cunning art,
And steal the calm within the heart.


A burning brand, a hateful gleam,
They shatter hope, and break the dream.
A venomous tide, they start to flow,
Where seeds of malice darkly grow.

Raise up your shield, stand firm and strong,
Let truth and light to you belong.
For fiercest flames and piercing night
Can’t overcome brave hearts alight.

चौदह फरवरी के बाद

गाँव की डाकघर में आज भी वही पुराना बोर्ड टँगा है - “स्पीड पोस्ट उपलब्ध है।”
लेकिन रामदुलारी के लिए समय कभी 'स्पीड' से नहीं चला। वह चौदह फरवरी के बाद जैसे वहीं ठहर गया। उसका बेटा रवि हर साल इसी दिन फोन करता था- “माँ, आज सब वैलेंटाइन डे मना रहे होंगे, आप मेरे लिए खीर बना लेना।”

उस साल फोन नहीं आया। आया तो सिर्फ एक सरकारी वाहन और तिरंगे में लिपटा सन्नाटा।

बरसों बाद भी जब 14 फरवरी आता है, टीवी पर बहस शुरू हो जाती है - कौन ज़िम्मेदार, किसने क्या किया, किसने क्या कहा। गाँव के चौराहे पर भी लोग मोबाइल पर वीडियो दिखाकर गुस्सा दोहराते हैं।

रामदुलारी अब बहस नहीं सुनतीं। वे आँगन में तुलसी के पास दिया जलाती हैं। पास में पड़ोस की नाज़िया खड़ी रहती है - जिसका भाई भी उसी हमले में गया था। दोनों अलग धर्म की हैं, पर उनके आँसू का रंग एक है।

आज नाज़िया का छोटा बेटा रामदुलारी से पूछ बैठा, “दादी, लोग लड़ते क्यों हैं?”

रामदुलारी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जब लोग इंसान को भूलकर सिर्फ नाम और पहचान याद रखते हैं, तब लड़ते हैं।”

“तो हम क्या याद रखें?”

उन्होंने आकाश की ओर देखा, जैसे किसी दूर खड़े जवान से बात कर रही हों और कहा- “हम यह याद रखें कि हर शहीद पहले किसी का बेटा था, किसी का भाई था। और अगर हम सच में उन्हें मान देते हैं, तो हमें ऐसा देश बनाना होगा जहाँ किसी माँ को यह सवाल न पूछना पड़े—क्यों?”

वह रामदुलारी की बातें तो आज समझ नहीं पाया लेकिन उसके मन में बेटा और भाई शब्द तो हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो गए।

दूर कहीं लाउडस्पीकर पर देशभक्ति गीत बज रहा था। पर उस छोटे से आँगन में, दो माताएँ बिना शोर के देश को थोड़ा और बड़ा बना रही थीं - नफ़रत से नहीं, सहने की ताकत से।

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

బాల్యం


బాల్యం…

పొద్దున్నె వెలుతురు లాంటిదీ,

పిచ్చుక గీతంలా అమాయకమైంది.

చిన్న పాదాల్లో పెద్ద కలలు,

చిరునవ్వులో చిలకరించే వెలుగు.


మట్టితో కోటలు కట్టి

లోకాన్నే గెలిచేసే వయసది—

బాల్యం…

జ్ఞాపకాల్లో నిత్యం పూసే

అందమైన 

మొదటి పువ్వు.

रविवार, 12 अक्टूबर 2025

साथी सरहद पार के....



कहते हैं खुदा ने इस जहाँ में सभी के लिए

किसी न किसी को है बनाया हर किसी के लिए
कुछ राबता है तुमसे (2025) 
प्रवीण प्रणव 
संभावना प्रकाशन, हापुड़ 


तेरा मिलना है उस रब का इशारा मानो

मुझको बनाया तेरे जैसे ही किसी के लिए
कुछ तो है तुझसे राब्ता
कुछ तो है तुझसे है राब्ता
कैसे हम जाने हमें क्या पता
कुछ तो है तुझसे राब्ता
तू हमसफर है तो क्या फिकर है

****

कहते हैं खुदा ने इस जहाँ में सभी के लिए
किसी न किसी को है बनाया हर किसी के लिए

जब मैंने डॉ. प्रवीण प्रणव की किताब ‘कुछ राब्ता है तुमसे : साहित्यिक जीवनी’ देखी, तो अनायास ही मुझे उक्त गाना याद आ गया। खैर...

कुछ राब्ता है तुमसे : पहली मुलाक़ात

पुस्तक ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ (2025) के रचनाकार प्रवीण प्रणव (1975) से मेरी पहली मुलाक़ात उस वक़्त हुई थी, जब वे अपनी पहली पुस्तक की पाण्डुलिपि लेकर परिलेख प्रकाशन के अमन त्यागी से मिलने हमारे घर आए थे। बस दो बातें ही हुई थी, उस समय उनसे। उस वक़्त मैंने यह सोचा भी नहीं था कि उनसे आगे भी मुलाक़ात होगी। लेकिन कहते हैं न कि इस दुनिया में किसी न किसी से मिलना रब का ही इशारा होता है। रब ने भाई प्रवीण प्रणव से मेरा परिचय करवाया है।

साहित्यिक जुड़ाव : आईटी से साहित्य तक की यात्रा

‘स्रवंती’ पत्रिका के तो ये नियमित पाठक और लेखक भी हैं। माइक्रोसोफ्ट और ब्रॉडकॉम जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से संबद्ध, तकनीकी दुनिया से ताल्लुक रखने वाली शख्सियत का साहित्य की दुनिया में इस कदर छा जाना साधारण बात नहीं हो सकती।

सूचना प्रौद्योगिकी उनका व्यावसायिक करियर है, लेकिन साहित्य से वे सक्रिय रूप से जुड़े हैं। यदि मैं कहूँ कि सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से जुड़े प्रवीण प्रणव की गहरी रुचि ग़ज़ल और हिंदी कविता में है, तो गलत नहीं होगा। उनकी इसी रुचि का परिणाम हैं उनके काव्य संकलन - 'खलिश', 'चुप रहूँ या बोल दूँ', और समीक्षात्मक कृतियाँ - 'मुक्ता की परख', 'लिए लुकाठी हाथ'। समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में उनकी पुस्तक समीक्षाएँ और आलोचनात्मक लेख प्रकाशित होते ही रहते हैं। इतना ही नहीं, हैदराबाद जैसे प्रेम के शहर में हर महीने के दूसरे शनिवार को नियमित रूप से होने वाले कार्यक्रम ‘क से कविता’ के माध्यम से प्रवीण प्रणव हिंदी और उर्दू साहित्य प्रेमियों को एक मंच प्रदान कर रहे हैं। यह एक ऐसा मंच है जो स्थानीय स्तर पर हिंदी और उर्दू कविता के पाठकों को एक साथ लाता है। यह मंच बहुत विशेष है, क्योंकि यह सिर्फ और सिर्फ पाठकों का मंच है। यह मंच स्वरचित कविताओं के लिए अनुमति नहीं देता है। और यही बात इसे एक विशुद्ध पाठक-केंद्रित साहित्यिक मंच बनाती है।

कुछ तो है तुझसे राब्ता….

प्रवीण प्रणव ने अपनी नई पुस्तक 'कुछ राब्ता है तुमसे' में सरल भाषा का इस्तेमाल करते हुए रोचक जानकारी देने का प्रयास किया है, जिससे यह किताब हर पाठक के लिए पठनीय और ज्ञानवर्धक बन गई है। इस किताब के ज़रिए प्रवीण प्रणव ने 18 महान साहित्यकारों से पाठकों को मिलवाया है। इनमें से कुछ तो मेरे प्रिय लेखक हैं, जबकि कुछ के केवल नामों से ही मैं पहले परिचित थी। एक तो ऐसा भी नाम इस पुस्तक में शामिल है, जिनके बारे में मैंने इसी पुस्तक के माध्यम से नाता जोड़ा। परवीन शाकिर।

आदत के अनुसार, पहले मैंने किताब का कवर बार-बार पलटा। पहले कवर पर ‘ईस्टमैन कलर’ में 18 महान साहित्यकारों के चित्र थे। मेरी नज़र उन चित्रों से हट ही नहीं रही थी, क्योंकि मुझे उनमें चेहरे कम और भारत का नक्शा ज़्यादा दिख रहा था।

किताब के पिछले कवर पर, भाई प्रवीण प्रणव ने यह घोषणा की है कि, "यह किताब अठारह रचनाकारों के जीवन से परिचय कराती है; कुछ अनसुने किस्से सुनाती है, कुछ भूले हुए सच बताती है...। यह किताब उन सभी के लिए है जो जानना चाहते हैं कि रचनाएँ कैसे रचनाकारों की दुनिया से जन्म लेती हैं।"

मम्मी और पापा को समर्पित यह किताब सचमुच एक अमूल्य धरोहर है। इसके छठे पृष्ठ पर विक्टर ह्यूगो का यह वाक्य लिखा है - "लेखक व्यक्ति में क़ैद एक संपूर्ण संसार होता है।" इस किताब में शामिल अठारह जीवनीपरक लेख इस वाक्य को सही साबित करते हैं। इनके माध्यम से पाठक हिंदी, उर्दू और भोजपुरी के साहित्यकारों के जीवन और उनके साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।

पुस्तक के अनुक्रम पर मेरी नज़र गई तो पहला ही आलेख चंद्रधर शर्मा गुलेरी का है। इसका शीर्षक भी रोचक है – अमर कहानी का अमर कहानीकार। कौन नहीं जानता कि ‘उसने कहा था’ एक ऐसी कहानी है जिसने चंद्रधर शर्मा गुलेरी को अमर बना दिया। इसी रोचकता को प्रवीण जी ने भिखारी ठाकुर, जोश मलीहाबादी, सुभद्रा कुमारी चौहान, मखदूम मुहिउद्दीन, महादेवी वर्मा, फैज अहमद फैज, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, कैफी आज़मी, फणीश्वरनाथ रेणु, साहिर लुधियानवी, गोपाल दास नीरज, दुष्यंत कुमार, केदारनाथ सिंह, धूमिल, अदम गोंडवी और परवीन शाकिर पर केंद्रित लेखों में बरकरार रखा है।

साथी सरहद पार के....

सरहद पार के तीन ऐसे व्यक्तित्वों की चर्चा मैं करना चाहूँगी जो उर्दू साहित्य के मील के पत्थर हैं – जोश मलीहाबादी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और परवीन शाकिर।

जोश मलीहाबादी (1898 – 1982) के नाम से जाने गए शब्बीर हसन ख़ाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद में हुआ। इनके पूर्वज फ़्रंटियर प्रोविन्स में पश्तूनों के आफरीदी कबीले से थे, जो मलीहाबाद में आकर बस गए थे। शब्बीर का तेवर बचपन से विद्रोही था। वे ‘जोश’ उपनाम से ग़ज़ल और नज़्म लिखते थे। उनकी ग़ज़लों में विद्रोह, क्रांति और स्वतंत्रता की गूँज निहित है। उन्होंने अपने उपनाम के साथ जन्म स्थान का नाम भी जोड़कर ‘जोश मलीहाबादी’ के नाम से साहित्य जगत में अपना एक निजी स्थान बना लिया था। वे उर्दू साहित्य में क्रांतिकारी विचारधारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक बदलाव की छाप गहरी दिखती है। 1956 में वे पाकिस्तान चले गए और वहीं जीवन के अंतिम वर्षों तक रहे। प्रवीण प्रणव जोश मलीहाबादी के संदर्भ में लिखते हैं कि -

"एक जमींदार, एक बगावती तेवर का शायर, एक ऐसा शख़्स जिसके ताल्लुकात प्रधानमंत्री से थे; फिर भी जोश ने अपनी जिंदगी में क्या नहीं देखा। लोगों का प्यार देखा, बगावत की वजह से मुश्किलात का सामना किया। एक समय था जब वह सब छोड़ कर सब्ज़ी बेचने का मन बना चुके थे, यह 1948 का दौर था। पाकिस्तान जाने का भावनात्मक निर्णय लिया, जिसकी वजह से बाद के उनके दिन बेबसी और गुमनामी में बीते। लेकिन काश इनसान के हाथों में होता भविष्य जान पाना और उसी के अनुरूप निर्णय ले पाना। जोश भले ही पाकिस्तान चले गए लेकिन उनकी शायरी सरहद से परे है।” (प्रणव : 25 : 56)

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911 – 1984) का जन्मस्थान है सियालकोट, जो अब पाकिस्तान में है। आधुनिक उर्दू शायरी के महानतम शायरों में से एक हैं फ़ैज़। उन्हें ‘शायर-ए-इंक़लाब’ और ‘रोमांटिक-रिवोल्यूशनरी’ कहकर संबोधित किया जाता है। जोश मलीहाबादी की ही तरह फ़ैज़ की ग़ज़लों और नज़्मों में प्रेम और इंक़लाब का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े रहे। प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय सदस्य थे। इस नाते जेल भी गए। 1962 में सोवियत संघ ने उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया। फ़ैज़ ने आम जनता के दर्द को समझा। उसे अपनी शायरी में अभिव्यक्त किया। वे सच के साथ खड़े होने और उस सच के हक में आवाज़ बुलंद करने के लिए गुहार लगाते हैं - “बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है/ जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले/ बोल कि सच ज़िंदा है अब तक/ बोल जो कुछ कहना है कह ले।” ऐसे निर्भीक और बेबाक शायर फ़ैज़ के संदर्भ में प्रवीण जी कहते हैं –

"फ़ैज़ ने कई रूमानी ग़ज़ल और नज़्म लिखीं। बाद में उनकी शायरी में तबदीली आई और जनता से सरोकार के मुद्दों पर फ़ैज़ ने खुल कर लिखा।” (प्रणव : 25 : 120)

परवीन शाकिर (1952 – 1994) के नाम से प्रसिद्ध सैयदा परवीन बानो शाकिर का जन्म पाकिस्तान के कराची में हुआ। उनके पिताजी सैयद शाकिर हुसैन बिहार के दरभंगा जिले में स्थित लहेरियासराय के रहने वाले थे। भारत-पाक विभाजन से पहले ही वे नौकरी की तलाश में कराची चले गए थे। विभाजन के बाद वे वहीं के होकर रह गए। परवीन उर्दू की आधुनिक और लोकप्रिय कवयित्री थीं। उन्होंने ग़ज़ल और नज़्म में एक संवेदनशील स्त्री आवाज़ को भरा और सबसे अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में प्रेम, स्त्री-स्वतंत्रता, निजी संवेदनाएँ और सामाजिक यथार्थ की झलक मिलती है। उनकी रचनाओं के संबंध में प्रवीण जी का कहना है कि

“परवीन शाकिर की रचनाओं में तीव्र विद्रोह नहीं है। संघर्ष का तेज आह्वान नहीं है। लेकिन उनकी रचनाएँ एक आईना बन कर हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं जिनमें हमारा असली अक्स नज़र आता है और इससे आँखें मिलाते हुए हमें शर्मिंदगी होती है। उनकी रचनाओं के शब्द कठोर नहीं हैं, लेकिन उनका असर गहरा है।” (प्रणव : 25 : 208)

पुस्तक को कहीं से भी खोलिए - आपके सामने कोई न कोई सूत्रवाक्य अवश्य होगा। आप स्वयं को उस व्यक्ति के बारे में और अधिक जानने के लिए मजबूर पाएँगे। पुस्तक को पढ़ने के बाद मुझे यह स्पष्ट हुआ कि प्रवीण जी ने छठे पृष्ठ पर विक्टर ह्यूगो के कथन का उल्लेख क्यों किया है। यदि मैं कहूँ कि प्रवीण जी के भीतर एक संपूर्ण संसार क़ैद है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनके भीतर की जिज्ञासा निरंतर कुलबुलाती रहती है - कुछ और जानने की, कुछ और अभिव्यक्त करने की बेचैनी। इसी अनबुझ जिज्ञासा और बेचैनी का परिणाम है उनकी यह किताब।

कुल 303 पृष्ठों के इस रोचक और संभावनापूर्ण ‘कोश’ को हापुड़ के संभावना प्रकाशन ने सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया है। पुस्तक का मूल्य 499/- रुपये है, लेकिन इसमें निहित सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर निःसंदेह अमूल्य है।

नोट : मैंने इस पुस्तक को ‘कोश’ की संज्ञा इसलिए दी है क्योंकि यह वास्तव में सूत्रवाक्यों का एक संग्रहणीय कोश है।



मंगलवार, 20 मई 2025

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर : योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण

योगेन्द्रनाथ शर्मा 'अरुण (7 जनवरी, 1941-9 मई, 2025) 

प्रतिष्ठित कवि, कथाकार, बाल साहित्यकार, समीक्षक, शिक्षाविद, स्तंभ लेखक और मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं प्राकृत तथा अपभ्रंश के विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ (7 जनवरी, 1941) का निधन 9 मई, 2025 को हो गया।

डॉ. ‘अरुण’ ने अपभ्रंश भाषा और जैन साहित्य के गहन अध्येता तथा व्याख्याकार के रूप में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतविद्या (इंडोलॉजी) के क्षेत्र में उल्लेखनीय तथा अविस्मरणीय योगदान किया है। इस दृष्टि से उनकी ‘अपभ्रंश’, ‘पुष्पदंत’, ‘जैन रामकाव्य और महाकवि स्वयंभूदेव प्रणीत पउमचरिउ’, ‘जैन रामायण की कहानियाँ’, ‘जैन कहानियाँ’, ‘स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र’ तथा ‘प्राकृत-अपभ्रंश इतिहास दर्शन’ जैसी कृतियाँ अपना सानी नहीं रखतीं। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

एम.ए. (हिंदी), साहित्य रत्न, पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधियों से अलंकृत डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ जीवट व्यक्तित्व के धनी थे। जैन रामकथा के अंतर्गत स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र : तुलनात्मक अनुशीलन, स्वयंभू प्रणीत ’पउमचरिउ’ में समाज, संस्कृत एवं दर्शन की अभिव्यंजना पर उन्होंने पीएचडी और डीलिट की उपाधियाँ अर्जित कीं। शंभू दयाल कॉलेज, ग़ाज़ियाबाद (मेरठ विश्वविद्यालय), बी.एस.एम. (स्नातकोत्तर) कॉलेज, रुड़की (मेरठ विश्वविद्यालय), पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज, पीलीभीत (एम.जे.पी. रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली) आदि में अध्यापन कार्य से जुड़े रहे। उनके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने शोधोपाधियाँ अर्जित कीं।

डॉ. ‘अरुण’ की सतत साधना का सम्मान करते हुए 1975 में उन्हें थियोसोफ़िकल सोसायटी, अड्यार (चेन्नई) ने यूनिवर्सल ब्रदरहुड अवार्ड प्रदान किया। अन्य अनेक सम्मानों-पुरस्कारों के अतिरिक्त उन्हें 2006 में अपभ्रंश साहित्य अकादमी, जयपुर ने ‘स्वयंभू सम्मान’ से तथा 28 जनवरी, 2019 को केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने ‘भाषा सम्मान’ से अलंकृत किया। 2010 में दूसरी बार ‘स्वयंभू सम्मान’ से अलंकृत हुए। साथ ही, भारतविद्या के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने ‘स्वामी विवेकानंद पुरस्कार’, ‘तुलसी सम्मान’ और ‘विद्यानिवासमिश्र स्मृति सम्मान’ भी प्रदान किए। अन्य अनेक संस्थानों ने भी उन्हें सम्मानित कर गौरव का अनुभव किया।

अपभ्रंश साहित्य के विद्वान के रूप में प्रख्यात ‘अरुण’ जी ने मौलिक पुस्तकों के साथ-साथ अनेक संपादित पुस्तकें, अनूदित पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित करके पाठकों का मार्गदर्शन किया। ‘आशा कभी न छोड़िए’, ‘आशा जीवित है’, ‘अक्षर अक्षर हो अमर’, ‘अँधियारों से लड़ना सीखें’, ‘बहती नदी हो जाइए’, ‘जीवन-अमृत’, ‘वैदुष्यमणि विद्योत्तमा’ आदि उनकी काव्य कृतियाँ उल्लेखनीय हैं।

‘अरुण’ जी आशावादी थे। जीवन को हमेशा एक नई दृष्टि से देखते थे। परेशानियाँ हर किसी के सामने उपस्थित होती हैं। ‘अरुण’ जी ने भी इन परेशानियों का सामना किया, पर हँसते-हँसते कहते हैं – ‘परेशानियाँ बहुत हैं/ हँस कर टालो यार/ कुछ को डालो वक़्त पर/ यह जीवन का सार।’ उनके भीतर की जिजीविषा को उनकी कविताओं में तथा उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियों में भी देखा जा सकता है। वे हमेशा अपने आप पर भोरसा रखने के लिए कहते हैं क्योंकि ‘हैं जिन्हें खुद पर भरोसा, पाते हैं मंजिल वही,/ उनकी हिम्मत तो कभी, मिटती नहीं है दोस्तो।'


‘अरुण’ जी हमेशा ही मानवीय संबंधों और मूल्यों को महत्व देते थे। वे जहाँ भी जाते थे वहाँ के लोगों से एक आत्मीय रिश्ता बना लेते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। वे सबके दुख-दर्द में शामिल हो जाते थे। वे अपने दिल का दरवाजा खोलकर सबके दर्द को अपना समझकर आगे बढ़ते थे और लोगों को ढाढ़स बँधाते थे – ‘दिल का दरवाजा खुला है, आइए, आ जाइए/ हम भी बंदे आपके हैं, यह यकीं ले आइए।’ ‘सबका दर्द समझकर् अपना, सहते आए सदा से हम/ नश्वर जग को अपना ही घर, कहते आए सदा से हम।’

‘अरुण’ जी अपने आसपास के वातावरण को प्रेममय बना ही डालते थे। वे कबीर की इस उक्ति को बार-बार दोहराते थे और आज के इस अमानवीय संसार को देखकर चिंतित होते हुए कहते थे– ‘पढ़ी किताबें सारी हमने, ‘ढाई आखर’ भूल गए/ दौलत कर झूले पर देखो, दुनिया वाले झूल गए।’ वे ढाई आखर प्रेम को अत्यंत महत्व देते हैं, क्योंकि आज दुनिया में हर व्यक्ति मुखौटा पहनकर जी रहा है, ऐसे में सच्चा प्यार मिलना मुश्किल है। अतः अरुण जी कहते हैं कि ‘प्यार जहाँ मिलता सखे,/ जाएँ वहाँ जरूर।/ प्यार अनूठी चीज़ है,/ तोड़े व्यर्थ गुरूर।’

आज दुनिया लोभ और स्वार्थ से भरी हुई है। ऐसी स्थिति में प्रेम, भाईचारा आदि गायब ही हो जाते हैं। ‘अरुण’ जी लोभ को मनुष्य का परम शत्रु मानते थे और धैर्य को अस्त्र बनाने के लिए कहते थे, ताकि इस लोभ को जीता जा सके – ‘लोभ महा शत्रु मनुज का,/ इससे लड़ा न जाय।/ लोभ शत्रु को जीतो सखे,/ धैर्य को अस्त्र बनाय।’

आज सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हर एक के पास धन-दौलत, सोना-चाँदी, ऐश्वर्य के अनेकानेक साधनों की बाढ़ है, लेकिन संवेदनाएँ खो गई हैं, लगता है मर-सी गई हैं। ‘अरुण’ जी इससे चिंतित रहते थे। अतः उनकी रचनाएँ हमें इस संकट से रू-ब-रू कराती हैं। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘अब बचाना आदमीयत, हो गया अनिवार्य-सा/ वरना सब कुछ खत्म खुद ही, आदमी कर जाएगा।’

यह नफ़रतों का दौर है। मूल्यों का ह्रास चरम पर है। नफरत, छल, कपट, बेईमानी, ईर्ष्या आदि का साम्राज्य चारों तरह फैल रहा है। ‘अरुण’ जी यह प्रश्न उठाते हैं कि ‘नफ़रतों का दौर ये कब तक चलेगा/ आदमी खुद को भला कब तक छलेगा?’ इस तरह की स्थितियों में सामान्य जनता का निराश होना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। इसी तर्ज पर निराशा की घड़ी में भी आशा को जगाए रखने की हिम्मत देते हुए वे कहते हैं कि ‘हो निराशा की घड़ी गहरी भले ही/ दृढ़ इरादा है तो हर रास्ता फलेगा।’ अरुण जी के भीतर अपार आत्मविश्वास और जिजीविषा गुँथी हुई मिलती हैं। अपने जीवनकाल में उन्होंने तमाम उलझनों को हँसते हुए झेला। विकट परिस्थितियों में भी वे टूटे नहीं बल्कि कुंदन की तरह तपकर सोना बन गए – ‘तपकर ही कुंदन बनता है, सोना इस दुनिया में,/ आ जाती वो आभा दुनिया जिसकी दीवानी है।’

‘अरुण’ जी बच्चों को बहुत पसंद करते थे। अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ‘मेरा बचपन संघर्षों का साक्षी रहा, जिन्होंने कभी-कभी तो मेरी कल्पनाओं को चूर-चूर करके रख दिया, लेकिन बचपन में ही सौभाग्य से मुझे स्वामी विवेकानंद का जीवन-दर्शन पढ़ने को मिला, जिसने मेरी लहूलुहान हुई कल्पनाओं में कब हिम्मत, साहस और आशा को अमृत-सा मरहम लगाकर मुझमें जूझने की ताकत भर दी, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे हर सफलता संघर्षों के बाद, निराशा के जंगल में बिछे कष्ट के नुकीले काँटों से जूझ कर ही मिली है।’ इसीलिए उनकी रचनाओं का मूल स्वर हिम्मत से आगे बढ़ने और निराशा के घटाटोप में एक दीपक जलाए रखने की उत्कट अभिलाषा का रहा है। इसीलिए वे कहते हैं – ‘जीवन में अब अभाव को, अड़चन न मानिए/ साधन अगर नहीं हैं तो साधन बनाइए।’ ‘कोई काम नहीं है मुश्किल, अगर इरादा पक्का/ पर्वत झुक जाते हैं आगे, मंजिल सब मिल जाएँ।’

‘अरुण’ जी कहा करते थे कि मृत्यु जीवन का परम सत्य है। जिस तरह जीवन को खुशी-खुशी अपनाते हैं, उसी तरह मृत्यु को भी अपनाना चाहिए। भारतीय संस्कृति का सूत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय...’ उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है। बहुत बार मृत्य उनके निकट आई लेकिन उनकी जिजीविषा के कारण हार मानकर चुपचाप चली गई। परंतु इस बार 9 मई को मृत्यु दबे पाँव आई और जीत हासिल करके चली गई। ‘अरुण’ जी ने मृत्यु को भी हँसते-हँसते स्वागत किया।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा विशेष रूप से हैदराबाद शाखा के प्रति ‘अरुण’ जी का रुझान अविस्मरणीय है। 2015 में जब ‘मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' : अर्धशती समारोह' विषयक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हैदराबाद शाखा द्वारा किया गया था, उस वक्त हृदयाघात से पीड़ित होने के बावजूद, डॉक्टरों से अनुमति लेकर वे उस समारोह में पहुँचे और अपने साथ डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को भी हैदराबाद ले आए। तीनों दिन सुबह से लेकर शाम तक चर्चा-परिचर्चा में भाग लिए और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किए। ऐसे जीवट व्यक्ति थे ‘अरुण’ जी। उनके मार्गदर्शन में हैदराबाद सभा में अनेक ऐसी संगोष्ठियों का आयोजन किया गया है।

‘स्रवंति’ पत्रिका के साथ ‘अरुण’ जी का विशेष लगाव था। पत्रिका में उनकी रचनाएँ नियमित प्रकाशित हुईं हैं। कविता, गीत, गजल आदि के साथ-साथ उनके समसामयिक विचार समय-समय पर प्रकाशित हुए। ‘स्रवंति’ का नया अंक मिलते ही वे एक संदेश अवश्य भेजते थे उस अंक से संबंधित। उनकी टिप्पणी बहुत ही महत्वपूर्ण होती थी, पत्रिका की गुणवत्ता को बनाए रखने में। यदि अंक प्रकाशित होने में विलंब हो जाता, तो फोन करके विलंब का कारण पूछ ही लेते थे। 


‘अरुण’ जी सही अर्थों में ‘स्रवंति’ पत्रिका के परामर्शदाता हैं। ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को उनकी ही बातों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ –
मर गए तो किसने देखा, बादशाहों की तरफ
गीत लेकिन हम फकीरों का जमाना गाएगा

मौत उनकी है जो दुनिया लूटने को आए हैं
बाँट कर अमृत जगत में तू अमर हो जाएगा

इक नया इतिहास रचना है तो कोई काम कर
बाद तेरे नाम तेरा यह जहाँ दोहराएगा

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

SILENT SCREAM

 

My heart aches, a hollow sound,

Like wind through ruins, lost and bound.

A heavy weight, a leaden stone,

Where joy and laughter once had flown.


The vibrant hues have turned to gray,

And shadows lengthen, day by day.

A silent scream, a muffled plea,

Lost in the vast immensity.


The threads of hope, once woven tight,

Now fray and break in fading light.

A fragile shell, a broken wing,

No solace that the hours can bring.


The memories dance, a cruel ballet,

Of moments stolen, slipped away.

A phantom touch, a whispered name,

Fueling the ever-burning flame.


And yet, within the deepest pain,

A flicker stirs, a gentle rain.

A whisper soft, a fragile seed,

A hope that blooms, a silent creed.


That even in this aching void,

A strength remains, to be employed.

To mend the cracks, to heal the scars,

And find the light among the stars.



शुक्रवार, 7 जून 2024

हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं : मुनव्वर राना




मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं,
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,

कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

कहने वाले मुनव्वर राना 14 जनवरी, 2024 को सदा के लिए अलविदा कह गए। 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मुनव्वर 26 नवंबर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में जन्मे। उनका मूल नाम सय्यद मुनव्वर अली था। भारत-पाक विभाजन के समय उनके रिश्तेदार और पारिवारिक सदस्य भारत छोड़कर पाकिस्तान में जा बसे, लेकिन मुनव्वर का परिवार यहीं बस गया। उस दिन को याद करते हुए वे कहते हैं कि “मेरे वालिद और मैं स्टेशन पर उन्हें छोड़ने गए, उनके जाते वक्त मेरे वालिद लड़खड़ाए। मैंने लपककर सहारा देना चाहा। उन्होंने अपना जिस्म मेरे हवाले कर दिया और मैं उस दिन जवान हो गया।” (मुनव्वर राना, मुन्नवरनामा, संकलन एवं संपादन सचिन चौधरी)

साहित्य अकादमी जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित मुनव्वर राना की जिंदगी फूलों की सेज नहीं थी। उनका बचपन अभावों में बीता। इस संबंध में उनका यह कथन द्रष्टव्य है – “ज़ख्म कैसी भी हो, कुरेदिए तो अच्छा लगता है। माज़ी कैसा भी रहा हो, सोचिए तो मज़ा आता है। बचपन जैसा भी गुज़रा हो, राज-सिंहासन से अच्छा होता है। मुझे नहीं मालूम ज़मींदारी कैसी होती है, क्योंकि मैंने बारहा माँ को भूखे पेट सोते देखा है। मुझे क्या पता ज़मींदार कैसे होते हैं, क्योंकि मैंने मुद्दतों अपने अब्बू के हाथों में ट्रक का स्टेयरिंग वील देखा है।” (वही)

मुनव्वर राना की दुनिया आशाओं, जिज्ञासाओं, उमंगों और ख्वाबों से भरी दुनिया थी। उनके अभिन्न मित्र अरविंद मंडलोई का कहना है कि उनके पास “डिग्रियों, पदवियों का अंबार नहीं है, फिर भी वे आम आदमी के बोलते शायर हैं, उनके प्रशंसकों की एक लंबी फेहरिस्त है।” (वही)। माँ पर लिखी उनकी कविता को लोगों ने बहुत पसंद किया। जब ग़ज़ल में हुस्न और इश्क की बातें खुलकर हो रही थीं तो मुनव्वर उस जमीन पर रिश्ते बोने लगे। वे ग़ज़ल की दुनिया को इश्क़बाजी से घसीटकर ‘माँ’ के पास ले आए। उनकी कविताओं व गज़लों में माँ जरूर दिखाई देती हैं – “मामूली एक कलम से कहाँ तक घसीट लाए/ हम इस ग़ज़ल को कोठे से माँ तक घसीट लाए/ लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती/ बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती/ किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई/ मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई।” अपने पिता को याद करते हुए वे अत्यंत भावुक हो जाते थे – “हँसते हुए चेहरे ने भरम रखा हमारा/ वो देखने आए थे कि किस हाल में हम।” वे रिश्तों को महत्व देने वाले शायर थे। उनकी रचनाओं में उनके व्यक्तित्व को देखा जा सकता है। वाणी से प्रकाशित उनके ग़ज़ल संग्रह ‘बदन सराय’ की भूमिका में गोपालदास नीरज लिखते हैं कि “भाई मुनव्वर राना की ग़ज़लें पढ़ कर दिल और दिमाग़ को जो ठंडक और जो सुकून मिला, वह अनुभूति का विषय है, शब्दों का नहीं। माँ का आंचल, बाप की दुआएँ, बुज़ुर्गों की यादें, बच्चों के खिलौने और बहनों की राखियाँ कितनी पवित्र-पावन होती हैं और साथ ही किसान का पसीना, मज़दूर की थकान, शायरों को क्या-क्या नए अर्थ प्रदान करती है – अगर आपको यह समझना हो तो राना के दो-चार शेर गुनगुना कर देखिए।” किसानों के संबंध में मुनव्वर राना कहते हैं – “इसी गली में वो भूखा किसान रहता है/ ये वो ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है।”

मुनव्वर राना की रचनाओं में कहो ज़िल्ले इलाही से, बदन सराय, बग़ैर नक़्शे का मकान, मान, सफ़ेद जंगली कबूतर, जंगली फूल, चेहरे याद रहते हैं, शाहदाबा आदि प्रमुख हैं। वे अनेक सम्मानों से नवाजे गए। माटी रतन सम्मान, खुसरो पुरस्कार, मीर तकी मीर पुरस्कार, गालिब पुरस्कार, डॉ. जाकिर हुसैन पुरस्कार, सरस्वती समाज पुरस्कार एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रमुख हैं। 2014 में ‘शाहदाबा’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। दादरी में अखलाक, सीपीआई नेता गोविंद पनसारे और लेखक कलबुर्गी की हत्या के प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर उदयप्रकाश, काशीनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, अशोक वाजपेयी जैसे अनेक साहित्यकारों ने इस पुरस्कार को लौटा दिया। इसी क्रम में मुनव्वर राना ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाया था। एक लाइव शो में उन्होंने कहा कि “मैं यह अवार्ड लौटा रहा हूँ... और यह रहा एक लाख रुपये का चेक। इस पर मैंने कोई नाम नहीं लिखा है। आप चाहें तो इसे कलबुर्गी को भिजवा दीजिए, या पनसारे को भिजवा दीजिए या अखलाक को भिजवा दीजिए या किसी ऐसे मरीज को भिजवा दीजिए, जो अस्पताल में इलाज न करवा पा रहा हो और हुकूमत के लोग उसे न देख पा रहे हो।”

मुनव्वर धर्मनिरपेक्ष, शांति से युक्त देश को कायम रखना चाहते थे, लेकिन हमेशा विवादों से घिरे रहे। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि “बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है/ बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है।” वे इंसानी रिश्तों को महत्व देते वाले शायर थे। कविताओं में, गज़लों में और सामान्य बातचीत में इन्हीं रिश्तों को वे आगे रखते थे। उनका मानना था कि “जिसको अहसासे ग़म नहीं होगा/ संग होगा सनम नहीं होगा।” रिश्तों की अहमियत को जानने वाला व्यक्ति ही हमारा सच्चा हमदर्द बन सकता है।

बचपन से ही मुनव्वर को शायरी करना बेहद पसंद था। इस बात का खुलासा उन्होंने स्वयं किया था। बचपन की स्मृतियों को वे बार-बार दोहराते रहते। उनकी गजलों में क्या-क्या नहीं हैं। एक ओर वे अपने बचपन को याद करते हैं। उनकी गज़लों में गाँव का नीम का पेड़ (नीम का पेड़ था, बरसात थी और झूला था/ गाँव में गुजरा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था), गाँव का टूटा हुआ घर (ऐ शहर! कुछ दिनों के लिए गाँव भेज दे/ याद आ रहा है टूटा हुआ अपना घर हमें), बचपन के खिलौने (मेरा बचपन था, मेरा घर था, खिलौने थे मेरे/ सर पे माँ-बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था) आदि को देखा जा सकता है तो दूसरी ओर रेल के डिब्बों में झाड़ू लगाने वाले बच्चे (फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर खुशबू लगाते हैं/ वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं), मस्जिद की चटाई पर सोते हुए बच्चे (मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे/ इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा)।

वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि शहरी वातावरण विषैला बन चुका है। यदि बच्चों के बचपन को, उनकी मासूमियत को जिंदा रखना हो तो गाँव की ओर लौटना होगा – “भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो/ शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा।” शहरी वातावरण में जीना मुश्किल होता जा रहा है। यहाँ अनेक लोग गरीबी-रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों का बचपन भी छिनता जा रहा है। किताबों के बजाय उन नन्हें कंधों पर कल-कारख़ानों के औजार हैं, हाथों में हथौड़े हैं। मुनव्वर पूछते हैं कि “ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है।” किसी भी व्यक्ति की जिंदगी में बचपन एक सुनहरा पड़ाव है। उससे जुड़े हुए जज़्बात को उन्होंने इस कदर सँजोया है कि पढ़ने/ सुनने वाले का दिल पसीज जाता है – “क़सम देता है बच्चों की, बहाने से बुलाता है/ धुआँ चिमनी हमको कारख़ाने से बुलाता है/ किताबों के वरक़ तक जल गए फ़िरक़ापरस्ती में/ ये बच्चा अब नहीं बोलेगा बस्ता बोल सकता है/ इनमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं/ देखना हाथ से अख़बार न गिरने पाए।” मुनव्वर राना यह कहते हैं कि “बचपन खुशबू की तरह होता है, बहुत देर नहीं ठहरता या बचपन को पर लग जाते हैं।” (मुनव्वर राना, मुन्नवरनामा, संकलन एवं संपादन सचिन चौधरी)।

मुनव्वर राना की ग़ज़लें उनके अपने अनुभवों और अनुभूतियों का ही बयान हैं। इसीलिए उनकी गजलों में माँ, पिता, भाई, बहन से लेकर तमाम रिश्तों को देखा जा सकता है। साथ ही बचपन, गाँव, शहर आदि जगहों की स्मृतियों को। वे कहने में संकोच नहीं करते कि “मैं तो आपबीती को जगबीती और जगबीती को आपबीती के लिबास से आरास्ता करके ग़ज़ल बनाता हूँ। आपको अच्छी लगे तो शुक्रिया, न अच्छी लगे तो भी शुक्रिया।” (वही)

मुनव्वर राना कहते हैं कि “मौत का आना तो तय है मौत आएगी” मगर उससे डरना नहीं चाहिए। यह जिंदगी बढ़ नहीं सकती, पर हाँ जितने दिन हम जिएँगे उतने दिन चारों ओर खुशियाँ बिखेरने की कोशिश करनी चाहिए। “मौत तो खुद अपने ठिकाने पे बुला लेती है।” वह हर पल “तकाज़े को खड़ी रहती है। कब तलक हम उसे वादे पे टाल जाते।” शायद मुनव्वर राना अपना वादा निभाने यह कहते हुए इस नश्वर दुनिया को पीछे छोड़ गए कि-

                            मेरी मुट्ठी से ये बालू सरक जाने को कहती है
                                        ये ज़िंदगी भी अब मुझसे थक जाने को कहती है
                                                    मैं अपनी लड़खड़ाहट से परेशान हूँ मगर
                                                                पोती मेरी ऊँगली पकड़ के दूर तक जाने को कहती है 
                                                                                      (मुनव्वर राना)

मैं गुड़िया नहीं, गाय नहीं, गुलाम नहीं!



समाज में किसी व्यक्ति व समुदाय की अस्मिता अथवा पहचान का मुख्य आधार उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा ही होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए समाज में अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि दुनिया के सभी समाजों में सदियों से पुरुष और स्त्री को अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है। स्त्री को कमजोर माना जाता है और उसे हमेशा ही अबला, दीन, कमजोर, वीक जेंडर आदि अनेक विशेषणों से संबोधित किया जाता है; लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है कि स्त्री भले ही शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर है पर मानसिक रूप से वह किसी भी स्तर पर कम नहीं है। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का यह कथन उल्लेखनीय है: “नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव अधिक तीव्र तथा स्थायी होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अंतर है जितना विद्युत और झड़ी में। एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं, परंतु प्यास नहीं बुझाई जा सकती। दूसरी से शांति मिलती है, परंतु पशुबल की उत्पत्ति संभव नहीं। दोनों के व्यक्तित्व, अपनी पूर्णता में समाज के एक ऐसे रिक्त स्थान को भर देते हैं जिससे विभिन्न सामाजिक संबंधों में सामंजस्य उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण कर देता है।” (महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृ.11-12)। स्त्री-पुरुष साहित्य के केंद्र में भी आ चुके हैं। साहित्यकार इनके विविध रूपों और विविध संबंधों का चित्रण करते रहे हैं।

1990 के बाद विमर्शों का साहित्य भारतीय भाषाओं में उभरने लगा। इसकी भूमिका एक तरह से उसी समय तैयार हो चुकी थी जब ‘नई कविता’ अस्तित्व और अस्मिता की खोज की बात कर रही थी। नई कविता में व्यक्ति की जिजीविषा और अस्तित्व के संघर्ष की बात थी। आगे चलकर यही व्यक्ति समुदाय में बदल गया - हाशियाकृत समुदाय में। उस समुदाय का संघर्ष ही विमर्श है। जीने की इच्छा, अस्तित्व और अस्मिता को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद, शोषण के प्रति आक्रोश और संघर्ष के परिणामस्वरूप स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, तृतीय लिंगी, पर्यावरण आदि विमर्श सामने आए।

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, अतः स्त्री विमर्श पर दृष्टि केंद्रित करना समीचीन होगा। स्त्री विमर्श की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करने से पूर्व ‘स्त्री’ शब्द पर विचार करना आवश्यक है। स्त्री शब्द के अनेक पर्याय हैं। जैसे हिंदी में नारी, औरत, महिला, कन्या, मादा, श्रीमती, लुगाई आदि और अंग्रेजी में female, woman, damsel. इसी तरह तेलुगु में स्त्री, आडदी, इंति, महिला, कन्या, श्रीमती, आविडा, आडपिल्ला, अम्मायी, मगुवा आदि शब्दों का प्रयोग संदर्भ के अनुसार किया जाता है। इसी तरह तमिल में पेन, मंगै, श्रीमत आदि का प्रयोग किया जाता है। यदि ‘स्त्री’ शब्द के व्युत्पत्तिमूलक अर्थ पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होता है कि यास्क ने अपने ‘निरुक्त’ में ‘स्त्यै’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति मानी है जिसका अर्थ लगाया गया है – लज्जा से सिकुड़ना। पाणिनि ने भी ‘स्त्यै’ धातु से ही ‘स्त्री’ की व्युत्पत्ति सिद्ध की है, पर इस धातु का अर्थ इकट्ठा करना लगाया है – ‘‘स्त्यै शब्द-संघातयोः’ (धातुपाठ)। साहित्य में स्त्री को दया, माया, श्रद्धा, देवी आदि अनेक रूपों में संबोधित किया जाता है। स्त्री को इस तरह अनेक रूपों में विभाजित करके देखने के बजाय उसके व्यक्तित्व को समग्र रूप में अर्थात मानवी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

भारतीय स्त्री को बचपन से ही घर और समाज की मर्यादाओं की पट्टी पढ़ाई जाती है। पुराने समय में लड़की को एक सीमा तक ही शिक्षा प्रदान की जाती थी। उसे घरेलू काम-काज में प्रशिक्षण दिया जाता था। उसके लिए तरह-तरह की पाबंदियाँ होती थीं। हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है न कि ‘न स्त्री स्वातंत्र्यम् अर्हति’। यही माना जाता रहा है कि स्त्री पिता, पति और पुत्र के संरक्षण में सुरक्षित रहती है। लेकिन शास्त्रकार यह भूल जाते हैं कि स्त्री भी है तो मनुष्य ही। वह मानवी है। उसके भीतर भी भावनाएँ हैं। पुरुषसत्तात्मक समाज ने उसे माँ और देवी का रूप प्रदान करके उसे ऐसे सिंहासन पर बिठा दिया कि वह कठपुतली बनती गई। स्त्री को जहाँ एक ओर देवी, माँ, भगवती आदि कहकर संबोधित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर उसकी अवहेलना की जाती है। “नारी के देवत्व की कैसी विडंबना है!” (शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 35)। पुरुष के समान स्त्री भी इस समुदाय का हिस्सा है, तो सारे प्रतिबंध उसी के लिए क्यों!? पुरुष के लिए क्यों नहीं?

स्त्री को यह कहकर घर की चारदीवारी तक सीमित किया गया कि घर के बाहर वह असुरक्षित है। घर ही उसका साम्राज्य है। “कितना मनहूस था वह दिन जब किसी पिता ने, किसी भाई ने, किसी बेटे ने,/ किसी बेटी को/ किसी बहन को/ किसी माँ को, किसी पत्नी को सुझाव दिया था/ घर में रहने का, हिदायत दी थी/ देहरी न लाँघने की/ और बँटवारा कर दिया था/ दुनिया का - घर और बाहर में।/ बाहर की दुनिया पिता की थी – वे मालिक थे, संरक्षक थे/ भीतर की दुनिया माँ की थी – वे गृहिणी थीं संरक्षिता थीं।” (ऋषभदेव शर्मा, क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें, देहरी, पृ. 36)।

स्त्री जिस घर में जन्म लेती है वह घर विवाह के बाद उसके लिए पराया हो जाता है। उस घर के लिए वह मेहमान बन जाती है। विवाह के बाद नए घर में प्रवेश करके वहाँ अपने आपको जड़ से रोपने की कोशिश करती है। और यह कोशिश निरंतर चलती है। रुकने का नाम नहीं लेती। इस रोपने की क्रिया में उसे तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उसकी एक नई पहचान बनती है। और वह नए रिश्ते में बंध जाती है। सबकी जरूरतों के बारे में सोचने वाली स्त्री अपनी जरूरतों को दरकिनार कर देती है। इस संदर्भ में मुझे तेलुगु कवयित्री एन. अरुणा की प्रसिद्ध कविता ‘सुई’ याद आ रही है। उस कविता में उन्होंने सुई के माध्यम से स्त्री जीवन को व्यक्त किया है। यहाँ सुई प्रतीक है। जिस तरह फटे कपड़ों को सुई जोड़ती है उसी तरह स्त्री भी अपने परिवार को आत्मीयता के धागों से पिरोती है - इन्सानों को जोड़कर सी लेना चाहती हूँ/ फटे भूखंडों पर/ पैबंद लगाना चाहती हूँ/ कटते भाव-भेदों को रफू करना चाहती हूँ/ आर-पार न सूझने वाली/ खलबली से भरी इस दुनिया में/ मेरी सुई है/ और लोकों की समष्टि के लिए खुला कांतिनेत्र। (एन. अरुणा, मौन भी बोलता है, पृ. 53-54)। इतना करने पर भी स्त्री को क्या मिलता है! कभी-कभी तो उसे घर के सदस्यों की अवहेलना और तिरस्कार भी झेलना पड़ता है। चाहे गलती किसी की भी क्यों न हो स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है। “युगों से उसको उसकी सहनशीलता के लिए दंडित होना पड़ रहा है।” (महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृ.17)।

समय के साथ-साथ स्त्री भी मूलभूत मानवाधिकारों के प्रति सचेत हो गई। सदियों से हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी। यदि महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो “स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है। कारण वह जान गई है कि एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाना है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना है जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे। आज उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उत्तीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है।” (वही, पृ.105)। शोषण के प्रति स्त्री अपनी आवाज उठाने लगी: “नहीं! मैं गुड़िया नहीं,/ मैं गाय नहीं,/ मैं गुलाम नहीं!” (ऋषभदेव शर्मा, गुड़िया-गाय,-गुलाम, देहरी, पृ.10)। परिणामस्वरूप स्त्री विमर्श की अवधारणा सामने आई।

स्त्री विमर्श की अवधारणा भारत एवं पाश्चात्य संदर्भ में बिल्कुल अलग-अलग है क्योंकि भारतीय दृष्टि में स्त्री ‘मूल्य’ है जबकि पाश्चात्य दृष्टि में वह मात्र ‘वस्तु’ है। स्त्री विमर्श एक प्रतिक्रिया है। युगों की दासता, पीड़ा और अपमान के विरुद्ध स्त्री की सकारात्मक प्रतिक्रिया है अपनी अस्मिता एवं अस्तित्व की रक्षा हेतु। 1949 में सिमोन द बुआ ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में स्त्री को वस्तु रूप में प्रस्तुत करने की स्थिति पर प्रहार किया। डोरोथी पार्कर का मानना है कि स्त्री को स्त्री के रूप में ही देखना होगा क्योंकि पुरुष और स्त्री दोनों ही मानव प्राणी हैं। 1960 में केट मिलेट ने पुरुष की रूढ़िवादी मानसिकता पर प्रहार किया। वर्जीनिया वुल्फ़, जर्मेन ग्रीयर आदि ने भी स्त्री के अधिकारों की बात की। इन स्त्रीवादी चिंतकों का प्रभाव भारतीय समाज पर भी पड़ा। भारतीय स्त्रीचिंतकों में वृंदा करात, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, महाश्वेता देवी, मेधा पाटकर, अरुंधति राय, वोल्गा, अब्बूरी छायादेवी, जयाप्रभा, अंबै (सी.एस.लक्ष्मी) आदि उल्लेखनीय हैं।

स्त्री, समाज को अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर देखती है। वह जब से यह महसूस करने लगी कि वह पुरुष से किसी भी स्तर पर कम नहीं तब से ही वह अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए आवाज उठाने लगी। स्त्री विमर्श में महत्वपूर्ण कारक है ‘जेंडर’। स्त्री इसी लिंग केंद्रित जड़ता को तोड़ना चाहती है। इसे स्त्री मुक्ति का पहला चरण माना जा सकता है। वैश्विक स्तर पर घटित विभिन्न आंदोलन स्त्रीवादी सैद्धांतिकी को निर्मित करने में सहायक सिद्ध हुए। प्रमुख रूप से उदारवादी स्त्रीवाद, समाजवादी-मार्क्सवादी स्त्रीवाद, रेडिकल स्त्रीवाद, सांस्कृतिक स्त्रीवाद, पर्यावरणीय स्त्रीवाद, वैयक्तिक स्त्रीवाद स्त्री प्रश्नों पर प्रकाश डालते हैं।

वस्तुतः स्त्री विमर्श के लिए कुछ समीक्षाधार निर्धारित करना अनिवार्य है। समाज में स्त्री की स्थिति, स्त्री विषयक पारंपरिक मान्यताओं पर पुनर्विचार, पारंपरिक स्त्री संहिता की व्यावहारिक अस्वीकृति, शोषण के विरुद्ध स्त्री का असंतोष और आक्रोश, देह मुक्ति, पुरुषवादी वर्चस्व के ढाँचे को तोड़ना, स्त्री सशक्तीकरण और सार्वजनिक जीवन में स्त्री की भूमिका आदि को प्रमुख रूप से स्त्री विमर्श की कसौटियाँ माना जा सकता है। इनके आधार पर साहित्य का स्त्री विमर्शमूलक विश्लेषण आसानी से किया जा सकता है।

भाषा की दृष्टि यदि स्त्री विमर्श को देखा जाए तो रोचक तथ्य सामने आते हैं। स्त्री-भाषा पुरुष की भाषा से भिन्न होती है। स्त्री अपने अनुभव जगत से शब्द चयन करती है। जहाँ पुरुष-भाषा में वर्चस्व, रौब और अधिकार की भावनाओं को देखा जा सकता है वहीं स्त्री-भाषा में सखी भाव अर्थात मैं से हम की यात्रा को देखा जा सकता है। सामान्य स्त्री के भाषिक आचरण में पुरुष की रुचि-अरुचि का ध्यान रखने की प्रवृत्ति, परिवार की शुभेच्छा की प्रवृत्ति, स्त्री सुलभ कलाओं में रुचि की प्रवृत्ति, घर-परिवार और संस्कारों में रुचि की प्रवृत्ति, घरेलू चिंताओं की प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। इसी प्रकार एक शिक्षित स्त्री के भाषिक आचरण में पूर्ण आत्मविश्वास, निडरता, जागरूकता, स्थितियों के विश्लेषण की क्षमता आदि प्रवृत्तियों को देखा जा सकता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि स्त्री विमर्श से अभिप्राय है स्त्री में आत्मनिर्णय की प्रवृत्ति होना जिससे वह उस रूढ़िगत स्त्री संहिता का अतिक्रमण कर सकती है जो उसकी अस्मिता एवं अस्तित्व के लिए घातक है तथा सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभा सकती है। 8 मार्च को हर.वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अभियान के रूप में मनाया जाता है। यह 1909 से शुरू होकर आज तक चल रहा है। इस वर्ष का थीम है इंस्पायर इनक्लूजन। अर्थात हर क्षेत्र की स्त्री को प्रोत्साहित करना और उन्हें आगे बढ़ने में सहायता करना।

‘हिंदी प्रचार समाचार’ के पाठकों को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।

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8 मार्च को वैश्विक स्तर पर महिला दिवस का आयोजन होता है। स्त्रियों के सम्मान में मनाया जाने वाला यह दिन महत्वपूर्ण है। ध्यान देने की बात है कि कुछ देशों में - विशेष रूप से अफगानिस्तान, जॉर्जिया, अंगोला, आर्मेनिया, चीन, अजरबाइजान, बुर्किना फासो, कंबोडिया, क्यूबा, गिन्नी-बिसाउ, बेलारूस, कजाखिस्तान, किर्गिस्तान, लाओस जैसे देशों में - अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस घोषित अवकाश है। इन देशों के अतिरिक्त मकदूनिया, मेडागास्कर, माल्डोवा, मंगोलिया, नेपाल, रूस, ताजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूगांडा, यूक्रेन, वियतनाम और जाम्बिया में भी आधिकारिक तौर पर अवकाश होता है।

इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि महिला दिवस की शुरूआत 1908 में तब हो गई थी जब लगभग 15 हजार स्त्रियों ने न्यूयॉर्क शहर में एक परेड निकाली थी। उनकी प्रमुख माँग यही थी कि स्त्रियों के काम के घंटे कम हों, वेतन अच्छा मिले और उन्हें वोट डालने का हक भी मिले। 1909 में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की घोषणा की। 1910 में क्लारा जेटकिन नामक महिला ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बुनियाद रखी। आगे चलकर 1975 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 8 मार्च को महिला दिवस के रूप में चिह्नित किया गया। ‘महिलाओं में निवेश करें : प्रगति में तेजी लाएँ’ – यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2024 की थीम है।

यह तो हुई वैश्विक स्तर की बात। अब हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्रियों की दशा और दिशा पर बात करेंगे। भारत में, वैदिककालीन स्त्री स्वतंत्रता के इतिहास को भुलाकर, मध्यकाल में स्त्री को घर की चारदीवारी के अंदर ‘सुरक्षित’ (!?) क्षेत्र तक सीमित कर दिया गया था। यह कब हुआ, कैसे हुआ यह बताना कठिन है। लेकिन पुनर्जागरण काल के भारतीय इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि उस समय भारतीय स्त्री ने सार्वजनिक रूप से स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाई। यह भी ध्यान देने की बात है कि साहित्य के किसी काल-खंड में ऐसा नहीं हुआ कि ‘स्त्री’ प्रमुख विषय न रहा हो। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक साहित्य के केंद्र में स्त्री किसी न किसी रूप में रही है। इस साहित्य से पुष्टि होती है कि समाज में पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था होने के कारण प्रमुख विषयों में निर्णय लेना का अधिकार पुरुष को प्राप्त हुआ। 19 वीं सदी के पूर्वार्ध में बाल विवाह, कन्या भ्रूणहत्या, पर्दा प्रथा, सती प्रथा, दहेज आदि सामाजिक विसंगतियाँ बहुत बढ़ी हुई थीं। उचित शिक्षा के अभाव में स्थितियाँ बदतर होने लगीं और स्त्री घर-परिवार तक सीमित होती गई। एक ओर उसे देवी के रूप में पूजा जाता है, तो दूसरी ओर उसे दानवी कहकर धिक्कारा जाता है। ये दोनों ही स्थितियाँ घातक हैं। स्त्री न ही अपने आपको देवी मानती है और न ही दानवी। वह तो बस इस समाज से यही चाहती है कि उसे ‘मानवी’ का दर्जा प्राप्त हो। वह भी इनसान है। समाज में अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती है। स्त्री बार-बार यही गुहार लगाती है कि वह एक स्त्री है, ममता की प्रतिमूर्ति है। उसके पास दो चेहरे, दो मुँह और दो तरह का जीवन नहीं है। जैसा भी है वह अपनी उस स्थिति को स्वीकारती है। अफसोस नहीं करती कि वह सीता-सावित्री के साँचे में फिट नहीं बैठती। उसके लिए तो बस इतना काफी है कि वह मनुष्य है - अपनी सारी कमजोरियों और खूबियों के साथ।

यहाँ हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में स्त्री के बारे में कुछ बातें महात्मा गांधी के बहाने करना चाहेंगे। गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ से यह स्पष्ट होता है कि गांधी जी स्त्रियों के अधिकारों के प्रति जागरूक थे और स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। वे इस बात पर बल देते थे कि स्त्री सहनशीलता की मूर्ति है। वे स्त्री और पुरुष में भेदभाव करने का विरोध करते थे। स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव को मन में रखकर जीने को वे मानसिक कमजोरी व बीमारी मानते थे। उनका मानना था कि पुरुष स्त्री की क्षमाशीलता जैसे स्वाभाविक गुणों का भरपूर लाभ उठाते हैं। अतः स्त्री को हर तरह से सक्षम होने की आवश्यकता है।

महात्मा गांधी ने स्त्रियों की राजनैतिक भागीदारी को पारंपरिक और पारिवारिक भूमिकाओं के विस्तार के रूप में देखते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि स्त्रियों में विदेशी शासन के प्रलोभनों का विरोध करने की क्षमता अधिक है। इसीलिए उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए स्त्रियों का आह्वान किया। स्वतंत्रता आंदोलन को महात्मा गांधी ने एक नई दिशा दी और बड़ी संख्या में स्त्रियों को इसमें शामिल किया।

गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ से यह बात स्पष्ट होती है कि वे स्त्रियों के अधिकारों के प्रति जागरूक थे; और स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक। ‘यंग इंडिया’ (1921) में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने लिखा कि ‘पुरुष द्वारा खुद बनाई गई बुराइयों में से कोई भी इतनी अपयश-जनक, पाशविक और अप्रिय नहीं है जितनी कि मानवता के आधे हिस्से यानि महिलाओं के साथ किया गया दुर्व्यवहार है। हालांकि महिला कमजोर लिंग नहीं है।’ स्त्री पुरुष से शारीरिक स्तर पर भले ही कमजोर हो सकती है, लेकिन मानसिक स्तर पर वह उससे कम नहीं है।

‘हरिजन’ के एक अंक में गांधी जी ने स्त्री शिक्षा पर बल देते हुए लिखा कि ‘मैं स्त्रियों की समुचित शिक्षा की हिमायती हूँ, लेकिन यह भी मानता हूँ कि स्त्री दुनिया की प्रगति में अपना योग पुरुष की नकल करके या उसकी प्रतिस्पर्धा करके नहीं दे सकती है, चाहे तो वह प्रतिस्पर्धा कर सकती है, परंतु पुरुष की नकल करके वह उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकती। उसे पुरुष का पूरक बनना चाहिए।’ महात्मा गांधी स्त्रियों के अधिकारों के प्रति सजग थे। वे इस बात पर बल देते थे कि स्त्री भी एक व्यक्ति है। वे पहले ही यह बात जान चुके थे कि भारतीय स्त्री की कानूनी एवं पारंपरिक स्थिति खराब रही है। अतः वे इस स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की कोशिश करते रहे। ‘मेरे सपनों का भारत’ में गांधी जी भारतीय स्त्री के पुनरुत्थान की बात करते हुए कहते हैं कि ‘जिस रूढ़ि और कानून के बनाने में स्त्री का कोई हाथ नहीं था और जिसके लिए सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार है, उस कानून और रूढ़ि के जुल्मों ने स्त्री को लगातार कुचला है। अहिंसा की नींव पर रचे गए जीवन की योजना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को भी अपने भविष्य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्त्री को भी अपना भविष्य तय करने का है।’ (मेरे सपनों का भारत, पृ. 188)। पर यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि ‘अहिंसक समाज की व्यवस्था में जो अधिकार मिलते हैं, वे किसी न किसी कर्तव्य या धर्म के पालन से प्राप्त होते हैं। इसीलिए यह भी मानना चाहिए कि सामाजिक आचार-व्यवहार के नियम स्त्री-पुरुष दोनों आपस में मिलकर और राजी-खुशी से तय करें।’ (वही)। जब स्त्री और पुरुष एक ही तरह की जिंदगी जीते हैं, तो उनमें भेदभाव क्यों? क्या उनकी जिम्मेदारियों और भूमिकाओं के कारण इस तरह का भेदभाव प्रचलित है? यह सोचने की बात है।

अकसर कहा जाता है कि स्त्री-पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक ही रथ के दो पहिये हैं, आदि आदि आदि। पर व्यावहारिक रूप से कभी भी स्त्री को पुरुष के समान अधिकार नहीं दिए जाते। यह भेद तो घर-परिवार से ही शुरू हो जाता है। लड़की से कहा जाता है – तुम लड़की हो, घर के भीतर ही बैठो। बाहर घूमने न जाना। अकेले मत जाना, छोटे भाई को साथ ले जाना। लेकिन लड़का बिना कोई बंदिश घूम सकता है, क्योंकि वह ‘लड़का’ है। पति रूपी पुरुष स्त्री को अपना मित्र व साथी मानने के बजाय अपने को उसका स्वामी मानता है तथा उसे अपनी दासी। हिंदुस्तान की स्त्रियों को इस गिरी हुई हालत से ऊपर उठाने की बात गांधी जी करते हैं और स्त्री शिक्षा पर जोर देते हुए कहते हैं कि ‘स्त्रियों को उनकी मौलिक स्थिति का पूरा बोध करावें और उन्हें इस तरह की तालीम दें, जिससे वे जीवन में पुरुषों के साथ बराबरी के दरजे से हाथ बँटाने लायक बनें।’ (वही, पृ.189)। यह तभी संभव होगा जब पुरुष स्त्री को मन बहलाने की गुड़िया न समझकर उसे सम्मान देगा। हम यह भी देख सकते हैं कि कुछ समुदायों में गाँव की स्त्रियाँ हर काम में पुरुषों से टक्कर लेती हैं। कुछ मामलों में निर्णय भी लेती हैं, हुकूमत भी करती हैं। इससे स्पष्ट है कि स्त्रियों में घर और समाज को नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता अंतर्निहित है।

महात्मा गांधी की दृष्टि में स्त्री-पुरुष समान हैं। वे यह नहीं चाहते कि ऐसा कोई भी कानूनी प्रतिबंध स्त्री पर लगे, जो पुरुष पर न लगाया गया हो। कहने का आशय है कि उनके साथ पूरी समानता का व्यवहार होना चाहिए। स्त्रियों को पहले स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनना होगा। उल्लेखनीय है कि 22 फरवरी, 1944 को अपनी सहधर्मिणी कस्तूरबा गांधी के निधन के बाद एक अप्रैल, 1945 को महात्मा गांधी ने कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की स्थापना की थी। इस ट्रस्ट का उद्देश्य भी यही है कि समस्त स्त्रियों को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाया जाए। याद रहे कि स्त्री की आत्मनिर्भरता का मतलब यह कतई नहीं है कि इससे पुरुषों की स्थिति हीन हो जाएगी। बल्कि केवल इतना है कि स्त्रियों की स्थिति सुधर जाएगी। गांधी जी यही चाहते थे कि स्त्रियाँ अपनी ऊर्जा रचनात्मक कार्यों में लगाएँ ताकि उनकी स्थिति में आश्चर्यजनक सुधार हो।

इन्हीं शब्दों के‘स्रवंति’ के पाठकों को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ...

आग से मत खेलिए, आग में औरतों को मत झोंकिए : संजीव



अत्यंत हर्ष का विषय है कि कथाकार संजीव को ‘मुझे पहचानो’ शीर्षक उपन्यास हेतु साहित्य अकादमी पुरस्कार 2023 से सम्मानित किया गया है। संजीव का यह उपन्यास ‘मुझे पहचानो’ भारत में प्रचलित सती प्रथा पर आधारित है। राजा राममोहन राय ने इस कुप्रथा का उन्मूलन करने के लिए अनेक यत्न किए। संजीव ने राजा राममोहन राय की भाभी पर सती प्रथा को लेकर हुए उत्पीड़न को केंद्र में रखकर यह उपन्यास लिखा है। कथाकार संजीव ने साहित्य अकादमी की घोषणा पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उनका यह उपन्यास स्त्रियों के शोषण की कथा कहता है। इसमें सती प्रथा, स्त्रियों के शोषण और उस समय के सामाजिक परिवेश से संबंधित कई मुद्दों को शामिल किया गया है।

संजीव का जन्म 6 जुलाई, 1947 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के बांगर कला गाँव में हुआ। उनका बचपन का नाम था राम संजीवन प्रसाद। उनके पिता का नाम था राम शरण प्रसाद और माता का नाम था जयराजीदेवी। संजीव अपनी माँ से बेहद प्यार करते थे। बच्चों को माता-पिता से प्यार होना स्वाभाविक है। अपनी माँ को याद करते हुए वे कहते हैं कि “मेरी जिद पर रात-रात भर भीगनेवाली माँ, मुझे वीरानी रात में कटीली झाड़ों के बीच से गुलाब का फूल तोड़कर ला देनेवाली प्यारी माँ।” (संजीव, मैं और मेरा समय, कथादेश, पृ.7)। इस संसार में माँ के लिए कोई विकल्प हो ही नहीं सकता।

संजीव का बचपन संघर्षों से ही गुजरा। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए संजीव कहते हैं कि यदि गाँव के ही वातावरण में रहते तो शायद आज वे इस स्तर तक नहीं पहुँचे होते। बांगर गाँव वस्तुतः ठाकुरों और ब्राह्मणों का गाँव था। ऐसे में अन्य जाति के लोगों की स्थिति क्या हो सकती है, यह समझने की बात है। गाँव के जातिगत विसंगतिपूर्ण वातावरण से बाहर निकालकर कुलटी (पश्चिम बंगाल) के पाठशाला में प्रवेश दिलाने में उनके काका जी का योगदान अविस्मरणीय है। उन दिनों को याद करते हुए संजीव कहते हैं कि कुलटी के शिवाजी चौरा पर एक पीपल के पेड़ के नीचे रामेश्वर गुरु जी की पाठशाला में ‘स्लेट’ पकड़ना सीखा। पढ़ने और भेड़ चराने में उस वक्त उन्हें एक जैसा लगता था, क्योंकि जंगल में भेड़ चराते समय सूरज के प्रकोप को सहना पड़ता था। और पाठशाला में भी परिस्थिति ऐसी ही हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि पढ़ने और भेड़ की सर लड़ाने में एक जैसी ख्याति हासिल की। सजा के रूप में मूर्ख मॉनिटर सूरज की ओर ताकते रहने को कहता। उनके बड़े भैया उन्हें डॉक्टर अथवा इंजीनियर बनाना चाहते थे, लेकिन संजीव मेंढक अथवा मछलियों से घृणा करते थे। काका और बड़े भैया के डर से न चाहते हुए भी उन्होंने बीएससी की पढ़ाई पूरी की।

शिक्षा ने संजीव की जिंदगी को बदल ही दिया है। इस में कोई दो-राय नहीं। बचपन से ही साहित्य के प्रति रुचि जगाने में उनके स्कूल के अध्यापक नंद किशोर दास सोनी, अनिल कुमार मेहता, पारसनाथ पाठक, केदार पांडेय, मिलिंद कश्यप आदि का योगदान अतुलनीय है। उनकी बचपन की स्मृतियों को उनके कथा-साहित्य में देखा जा सकता है। एक साक्षात्कार उन्होंने इस बात की खुलासा की कि उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज है। बचपन की कुछ घटनाएँ उस बालक की स्मृति में इस कदर घर कर गईं कि बाद में चिंगारी बनकर लेखन के माध्यम से बाहर निकलने लगीं। स्मृतियों के संबंध में संजीव कहते हैं कि “मेरे सामने नित नई दुनिया खिलती रहती है। कुछ पानी के अंदर, कुछ कोहरे में, कुछ बाहर। शिशुपन के तीन वर्ष से लेकर आज तक की दुनिया। बेशुमार घटनाएँ, बेशुमार चरित्र, बेशुमार जीवन स्थितियाँ। जो भी देखता, भोगता और महसूसता हूँ, स्मृतिकोशिका में दर्ज हो जाता है। लाख-लाख, कोटि-कोटि, गड्डमड्ड स्मृतियाँ, कुछ देर तक बनी रहती हैं, कुछ फीकी पड़ जाती हैं। कुछ चमकीले क्षण, कुछ मुद्राएँ, कुछ टीसें, कुछ धारधार संवाद, कुछ चित्र, कुछ चरित्र! फिर कोई समानधर्मी घटना, फिल्म, पुस्तक अंश, बातचीत या निपट तनहाइयों के कल्पना-प्रसंगों की उद्दीपना पाकर वे चीजें जाग जाते हैं, अपने ढंग से सूत्र जोड़कर आकार लेने लगती हैं।” (संजीव, मेरी रचना प्रक्रिया (भूमिका), संजीव की कथा यात्रा : दूसरा पड़ाव, पृ. 6)। इससे स्पष्ट है कि संजीव ने अपने अनुभवों एवं अनुभूतियों को कथा-सूत्र में पिरोकर पाठकों के समक्ष रखा। उनकी पहली कहानी है ‘किस्सा एक बीमा कंपनी की एजेंसी का’। इस कहानी को उन्होंने राम संजीवन नाम से ‘सारिका’ पत्रिका को भेजा, तो कमलेश्वर ने ‘संजीव’ नाम से उस कहानी को प्रकाशित किया। तब से राम संजीवन प्रसाद की साहित्यिक यात्रा ‘संजीव’ के नाम से शुरू हुई।

संजीव का कथा-साहित्य स्वानुभूति का साहित्य है। मधु कांकरिया कहती हैं कि संजीव की कहानियों का अनुभव संसार डराने के साथ-साथ दिमाग में खरोंचें भी डाल देता है। “बदलाव का स्वप्न देखनेवाले संजीव की कहानियाँ सर्वहारा समाज के तमाम मनुष्य विरोधी चेहरे को सामने लाती हैं। संजीव को पढ़ना उत्तर आधुनिक जीवन के सामूहिक अवचेतन में झाँकने जैसा है। बिना अपनी पक्षधरता का शोर मचाए हुए पूरी निर्भीकता के साथ संजीव अपने समय और समय की हिंसक सत्ता संरचनाओं में भीतर तक धँसकर कथानक के रेशे-रेशे बुनते हैं।” (मधु कांकरिया, धरती पर मनुष्य को बचाने की चेष्टा है ये कहानियाँ (भूमिका), प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव)

कविता हो या कहानी, उपन्यास हो या संस्मरण, चित्रकारी हो या नृत्य कला – अभिव्यक्त करना इतना आसान नहीं, जितना सोचा जाता है। मस्तिष्क में बहुत कुछ रहता है, लेकिन उन विचारों को कागज या कैनवास पर उतारना आसान नहीं, क्योंकि मस्तिष्क से लेकर कागज तक की यात्रा में बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है और जुड़ जाता है। रचनाकार अपने आस-पास व्याप्त समाज और समय के अनुरूप पात्रों का गठन करता है, अतः समाज, समय, पात्र और रचनाकार कुल मिलाकर चतुर्आयाम बन जाते हैं तथा कहानी ग्राफ परवान चढ़ता है। जब तक मनुष्य भीतर से उस अनुभूति को नहीं महसूस करता तब तक उसे अभिव्यक्त नहीं कर सकता। अपनी लेखन की रचना प्रक्रिया के संबंध में संजीव कहते हैं कि “कोई भी सृजन कर्म स्रष्टा की निजी वैयक्तिकता और शेष विश्व और काल के साथ उसकी द्वंद्वात्मकता का प्रतिफलन है। कोई कहानी क्यों लिखता है, सिर्फ वही और वैसी ही क्यों लिखता है, रचना के उपादानों का कहाँ-कहाँ से संधान व संश्लेषण करता है, संवर्धन और संशोधन की वे क्रियाएँ किस तरह अंजाम पाती हैं – यह एक नितांत गूढ़ रहस्य है, चेतन से अवचेतन, संस्कार से सरोकार और स्वतः स्फूर्तता से दबावों तक फैली हुई बहुआयामी क्रिया।” (संजीव, मेरी रचना प्रक्रिया (भूमिका), संजीव की कथा यात्रा : दूसरा पड़ाव, पृ. 5)।

कथाकार संजीव के प्रमुख उपन्यास हैं – सूत्रधार, धार, सावधान! नीचे आग है, किशनगढ़ के अहेरी, सर्कस, जंगल जहाँ शुरू होता है, पाँव तले की दूब, फाँस, आकाश चंपा, रह गईं दिशाएँ इसी पार, मुझे पहचानो आदि। उनकी संपूर्ण कहानियाँ संजीव की कथायात्रा : पड़ाव : 1,2,3 में सम्मिलित हैं। रानी की सराय और डायन बाल उपन्यास हैं। अनेक पुरस्कारों एवं सम्मानों से संजीव सम्मानित हो चुके हैं। ‘मुझे पहचानो’ शीर्षक उपन्यास के लिए 2023 का साहित्य अकादमी पुरस्कार से वे सम्मानित हैं। अब थोड़ी सी चर्चा इस कृति पर करना समीचीन होगा।

संजीव के उपन्यासों की कथा-भूमि में वैविध्य देखा जा सकता है। ‘किशनगढ़ के अहेरी’ में किशनगढ़ और गोमती नदी का तट, वहाँ का ग्रामीण परिवेश तथा सेठ-साहूकारों का शोषण और उस शोषण के विरुद्ध संघर्ष चित्रित है। सर्कस में काम करनेवालों की त्रासद कहानी ‘सर्कस’ शीर्षक उपन्यास में अंकित है तो ‘सावधान! नीचे आग है’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’, ‘धार’, ‘पाँव तले की दूब’ आदि में आदिवासी जीवन-गाथा है। ‘फाँस’ किसान विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय उपन्यास है तो ‘सूत्रधार’ भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर पर केंद्रित उपन्यास है। ‘मुझे पहचानो’ रचना अपने आप में एक अलग कथा-सूत्र लेकर चलती है।

‘मुझे पहचानो’ उपन्यास छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें उपन्यासकार ने राजे-रजवाड़ों और हीरा उत्खनन करने वाले व्यापारियों के चेहरे भी सामने लाने का प्रयास किया है। उपन्यास की नायिका एक दलित स्त्री है। उसे एक जमींदार अपनी पत्नी का दर्जा देता है। वह जमींदारी के काम में अपने पति का भरपूर सहयोग करती है। जब वह विधवा हो जाती है तो जमींदार की अन्य पत्नियों के बजाय उसे ही सती बनाने की साजिश की जाती है। यह उपन्यास सती प्रथा पर प्रहार करता है। सती प्रथा के उन्मूलन के लिए जिस राजा राम मोहन राय ने अपना जीवन नौछावर कर दिया, उन्हीं की भाभी को इसी प्रथा से गुजरना पड़ा। इस घटना को नींव बनाकर संजीव ने इस उपन्यास का सृजन किया। इस उपन्यास में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि स्वयं स्त्रियाँ इस तरह के कुकृत्य को धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यता कहकर सहमती देती थीं। उपन्यास में एक स्त्री कहती हैं, “जीवन में कभी-कभी तो ऐसे पुण्य का मौका देते हैं राम!” उपन्यासकार एक पात्र के माध्यम से टिप्पणी करते हैं – “सोचिए। क्योंकि आप मनुष्य हैं, सोच सकते हैं, पशु नहीं सोच सकते। यह यौन शुचिता, गर्भ शुचिता या रक्त शुचिता से भी जुड़ती है, मगर उसके लिए स्त्रियाँ ही क्यों दोषी मान ली जाएँ? ये बातें सिर्फ हिंदू नहीं, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब पर लागू होती हैं। ईश्वर या प्रकृति के सिरजी सृष्टि में कोई किसी का गुलाम नहीं है, फिर यह डायन, यह मॉब लिचिंग, यह ऑनरकिलिंग जैसे बर्बर हुड़दंग क्यों, जिसका शिकार औरत ही तो होती है, आप उस पर ही सती का मूल्य कैसे लाद सकते हैं जो आप खुद नहीं कर सकते। आग...! मैं हाथ जोड़ कर अरज करता हूँ, आग से मत खेलिए, आग में औरतों को मत झोंकिए।”

संजीव अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त विसंगतियों के प्रति आवाज उठाते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि लेखन से अंधेरा छँट सकता है। ऐसे साहित्यकार को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त होने के उपलक्ष्य में ‘दक्षिण भारत’ के लेखक और पाठक समुदाय के ओर से हार्दिक अभिनंदन।

समय के इस सिंधु में है बिंदु भर अस्तित्व मेरा : मालती जोशी



हिंदी साहित्य जगत में मालती जोशी एक जाना पहचान नाम है। मालती जोशी का नाम लेते ही पाठक को - मोरी रंग दे चुनरिया, बोल री कठपुतली, महकते रिश्ते, बाबुल का घर, मन ना भये दस बीस, रहिमन धागा प्रेम का, पाषण युग, निष्कासन, पटाक्षेप, शोभायात्रा आदि - रचनाएँ याद आना स्वाभाविक है। साहित्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान हेतु भारत सरकार ने 2018 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया था। उन्होंने साहित्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया है, साथ ही स्त्री के अधिकारों के लिए आवाज उठाई है। उनके साहित्य में परंपरा, आधुनिकता और संस्कृति का त्रिवेणी-संगम देखा जा सकता है। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

मालती जोशी का जन्म 4 जून, 1934 को औरंगाबाद में हुआ था। मातृभाषा मराठी थी, पर शिक्षा-दीक्षा हिंदी में हुई। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिंदी) की उपाधि अर्जित की। अपनी पढ़ाई के संबंध में उन्होंने बताया है कि “पिता पुरानी ग्वालियर रियासत में मजिस्ट्रेट थे। छोटे-छोटे कस्बों में स्थानांतरित होते रहते थे। इसलिए पढ़ाई में एकरूपता नहीं रह पाई। चौथी कक्षा तक घर में पढ़ाई की। पाँचवीं में लड़कों के स्कूल में दाखिला लिया क्योंकि कन्याशाला केवल चौथी तक थी। आठवीं में थी तब पिताजी का स्थानांतरण हुआ। फिर आठवीं प्राइवेट करनी पड़ी। उन दिनों राज्य ग्वालियर की मिडिल परीक्षा की बहुत मान्यता थी। नौवीं, दसवीं मालव कन्या विद्यालय, इन्दौर से पास की। उन दिनों दसवीं (मैट्रिक) स्कूल की अंतिम कक्षा हुआ करती थी। उसके बाद इंटर प्राइवेट किया। बीए और एमए होलकर कॉलेज इंदौर से किया।” इस प्रकार मालती जोशी की पढ़ाई जारी रही।

लेखन के प्रति रुझान के संबंध में बात करते हुए मालती जोशी ने एक संस्मरण में लिखा है कि “मैंने सन 1950 में मैट्रिक पास किया था। उन दिनों स्कूल में अध्यापिकाएँ या तो उम्रदराज होती थीं या फिर वे युवतियाँ जो हालात की मार से हताश, निराश और जीवन से उदासीन होती थीं। ऐसे में ठंडी हवा के झोंके की तरह हिंदी की नई टीचर का आगमन हुआ। लखनऊ कॉलेज से ताजा ग्रेजुएट होकर आई थीं। रहन-सहन में, बातचीत में नफासत थी, नजाकत थी। छात्राओं से उनका व्यवहार भी मित्रवत था, जो एक नई बात थी। लड़कियाँ तो उन पर लट्टू हो गईं। मुझमें तब कविता के अंकुर फूटने लगे थे। मैंने उन पर ढेरों कविताएँ लिख डालीं। उनकी शादी और हमारी फाइनल परीक्षा आस-पास ही संपन्न हुई थी। फेयरवेल पार्टी के दिन मैंने अपनी कविताओं की कापी उन्हें सादर भेंट कर दी थी।” छात्र जीवन से ही मालती जोशी गीतकार के रूप में लोकप्रियता अर्जित करने लगीं। लोग उन्हें ‘मालवा की मीरा’ कहने लगे थे। नवंबर 1979 में ‘धर्मयुग’ में एक कहानी छपी, जिसने मालती जोशी को अखिल भारतीय मंच पर स्थापित कर दिया, उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मालती जोशी अपने आस-पास के वातावरण से गृहीत अनुभवों को शब्दों में पिरोकर पाठकों के सामने प्रस्तुत कर देती थीं। उनकी कहानियों एवं उपन्यासों में संवेदना के अलग संसार को देखा जा सकता है। उनके कहानी संग्रहों में - पाषाण युग, मध्यांतर, समर्पण का सुख, मन न हुए दस बीस, एक घर हो सपनों का, विश्वास गाथा, आखिरी शर्त, मोरी रंग दी चुनरिया, अंतिम संक्षेप, एक सार्थक दिन, शापित शैशव, महकते रिश्ते, पिया पीर न जानी, बाबुल का घर, औरत एक रात है, मिलियन डालर नोट आदि - उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार उपन्यासों में - पटाक्षेप, सहचारिणी, शोभा यात्रा और राग विराग। दादी की घड़ी, जीने की राह, परीक्षा और पुरस्कार, स्नेह के स्वर, सच्चा सिंगार - आदि बालकथा संग्रह हैं, तो - हार्ले स्ट्रीट - व्यंग्य। इनके अतिरिक्त और भी अनेक श्रेष्ठ रचनाओं का सृजन उन्होंने किया। मालती जोशी की कुछ कहानियाँ सिर्फ दूरदर्शन पर धारावाहिक के रूप में प्रसारित करने के लिए ही लिखी गई थीं। विशेष रूप से जया बच्चन द्वारा निर्मित टेलीविजन शो ‘सात फेरे’ और गुलज़ार द्वारा निर्मित ‘किरदार’ के लिए।

मालती जोशी की कहानियों में वैविध्य को देखा जा सकता है। उनके कथा-पात्र उनके इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं। उन्हें तो कहीं भटकने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इस संदर्भ में उनका यह कथन उल्लेखनीय है – “मध्यवर्गीय परिवार से हूँ। ससुराल और पीहर दोनों ओर विशाल, लंबा चौड़ा परिवार है। और जिसे अंग्रेजी में close knit कहते हैं - दोनों परिवार वैसे ही हैं। पतिदेव घोर सामाजिक प्राणी थे। उनके मित्रों की संख्या कम न थी। इसलिए पात्र और कथानक के लिए मुझे कभी भटकना नहीं पड़ा। वैसे भी लेखक का संवेदनशील मन अपने आस-पास से अनजाने ही कुछ न कुछ इकट्ठा करता रहता है। यह सामग्री उसके अवचेतन में जमा होती रहती है। कहानी लिखते समय कोई व्यक्ति, कोई बात, कोई प्रसंग अनायास याद आ जाता है और कहानी में फिट हो जाता है।”

मालती जोशी ने कहानीकार के रूप में काफी लोकप्रियता अर्जित की। इसमें कोई दो राय नहीं। सुधा अरोड़ा ने लिखा है कि मालती जोशी पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय और समीक्षकों द्वारा सर्वाधिक उपेक्षित कथाकार हैं! इस संबंध में मालती जोशी ने लिखा है कि “सर्वाधिक लोकप्रियता की बात अतिशयोक्ति हो सकती है, परंतु समीक्षकों की उपेक्षा वाली बात सौ फीसदी सच है। मेरी सीधी-सादी नितांत घरेलू कहानियों को श्रेष्ठीजन कोई तवज्जो नहीं देते। उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है, या यों कहें कि एक तरह से खारिज कर दिया जाता है। स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ, साठोत्तरी कहानियाँ, महिला रचनाकार जैसे लेखों में मेरे नाम का उल्लेख तक नहीं होता। अगर मैं कहूँ कि इस बात का मुझे कोई मलाल नहीं है तो यह झूठ बोलना होगा। शुरू में इस बात से सचमुच दुख होता था, पर अब मैंने मन को समझा लिया है। मैं जिन लोगों के लिए लिखती हूँ, वे तो मुझे सिर-आँखों पर लेते हैं – फिर दुख कैसा!” (मालती जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ, भूमिका)। मालती जोशी का कथन पढ़ते समय तेलुगु साहित्यकार मालती चंदूर का नाम बार-बार मानस पटल पर उभर रहा है। उन्होंने भी मालती जोशी की भाँति अपने आस-पास के ही परिवेश से कथासूत्र का ताना-बाना बुना है। उनकी कहानियों और उपन्यासों को भी समीक्षकों ने ‘एक गृहस्थ की मामूली रचनाएँ’ कहकर उपेक्षित किया था। लेकिन उनकी कलम रुकी नहीं, थकी नहीं। 1992 में उनके उपन्यास ‘हृदयनेत्री’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। साहित्य के क्षेत्र में ढूँढ़ने पर हमें मालती जोशी, मालती चंदूर जैसी अनेक लेखिकाएँ अवश्य मिलेंगी जिन्हें इस समाज में अपने आपको स्थापित करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।

मालती जोशी पारिवारिक जीव हैं। वे स्वयं अपने आपको वही कहती हैं। रिश्तों को बेहद महत्व देने वाली रचनाकार हैं मालती जोशी। उनकी कहानियों में अनेक संबंधों के बीच प्रेमपूर्ण व्यवहार रहता है। प्रेम को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है कि “मेरी पीढ़ी के लिए प्रेम महज एक टाइम पास नहीं था। हमारे लिए प्रेम का अर्थ त्याग, बलिदान, समर्पण आदि हुआ करता था। प्रेम एक उदात्त अनुभव, एक पवित्र भावना थी। एक मीठा दर्द था जो चुपके-चुपके सहा जाता था। वह एक व्रत था।” (चाँद अमावस की, भूमिका)। उनकी कहानियों में प्रेम एक अंत:धारा की तरह प्रवाहित होता रहता है।

मालती जोशी की कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन शैली को भलीभाँति देखा जा सकता है। स्वयं मध्यवर्गीय परिवार से होने के नाते मालती जोशी अपने देखे हुए और भोगे हुए अनुभव जगत को कहानियों के माध्यम से व्यक्त करती हैं। इसका खुलासा उन्होंने स्वयं किया है – “सारी कहानियों को अगर एक शीर्षक में बाँधना हो तो कहना पड़ेगा कि ये मध्यमवर्गीय जीवन का दस्तावेज हैं। मैं स्वयं इसी वर्ग से हूँ इसलिए मध्यमवर्ग के सुख-दुख, राग-द्वेष, आशा-आकांक्षा से अच्छी तरह परिचित हूँ। मध्यमवर्गीय परिवार या मध्यमवर्गीय नारी मेरी कहानियों का केंद्रबिंदु रहे हैं।” (रहिमन धागा प्रेम का, भूमिका)

15 मई,, 2024 को मालती जोशी का निधन हो गया। उनको भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सूर्यबाला कहती हैं कि “वरिष्ठ कथा लेखिका मालती जोशी अगले चार जून को अपने जीवन के 90 गौरवशाली वर्ष पूरे करतीं, लेकिन अफसोस, इसके पूर्व ही 15 मई को वे अंतिम यात्रा पर चली गईं। यह मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति से अधिक कथा लेखन के एक युग का अवसान है। वे जीवन और लेखन दोनों में संयम, संतुलन और समरसता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करने वाली रचनाकार थीं। उनकी लेखनी मध्यवर्ग का आईना बन गई। मालती जोशी ने अपनी कहानियों में मानवीय संबंधों के इतने जटिल और विरल यथार्थ उकेरे हैं कि वे अपने समय और समाज की क्लाइडोस्कोप कही जा सकती हैं। हमारे समय की कोई स्थिति नहीं है, जो उनकी लेखनी से छूट गई हो।”

मालती जोशी की कविता ‘आत्मकथ्य’ की इन पंक्तियों से हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं –

समय के इस सिंधु में है बिंदु भर अस्तित्व मेरा
इसलिए अभिमान भी कभी करती नहीं मैं
प्राप्य जो मेरा रहा है, वह मुझे सब मिल गया है
परम तृप्ति से हृदय का कलश नित भरती रही मैं
                        छू न पाता है मुझे यह तुमुल कोलाहल जगत का
                        क्योंकि अपने आप से संवाद होता है निरंतर
                        एक दुनिया साथ मेरे चल रही है जन्म से ही
                        और भीतर पल रही है, दूसरी दुनिया समांतर
उम्र के सोपान चढ़ती जा रही हूँ अनवरत मैं
कब कहाँ विश्राम होगा, यह अभी अज्ञात है
आज तक जो भी रचा सब उस रचयिता की कृपा है
श्रेय की भागी बनी मैं यह अनोखी बात है
                        थी नहीं स्पर्धा किसी से, और ईर्ष्या भी नहीं है
                        हैं प्रभु के रूप हम सब, सत्य मैं यह जानती हूँ
                        राह में जो भी मिले सब बंधु थे, सब मित्र ही थे,
                        आज मैं नतशीश हो आभार सब का मानती हूँ 
                                                                            (वीणा मासिक, फरवरी 2023)

भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?


जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

इन पंक्तियों को पढ़कर क्या कोई पाठक सहज ही अनुमान नहीं लगा सकता है कि इन पंक्तियों के रचनाकार कौन हैं? इन पंक्तियों को पढ़कर पंत, बच्चन, भगवती चरण वर्मा अथवा शमशेर का नाम ले भी सकते हैं; लेकिन ये पंक्तियाँ ‘क्रांतिकारी की कथा’ कहने वाले भोलाराम के जीव की ओर सबका ध्यान खींचने वाले व्यंग्य को विधा के रूप में दर्जा दिलाने वाले व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की हैं।

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 को होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में हुई। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे नागपुर गए। अध्ययन के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र में उतरे, लेकिन बाद में नौकरी करने के बजाय लेखक बनकर जीवनयापन करना श्रेयस्कर समझा। हिंदी ही नहीं, किसी भी भाषा में महज लेखन के माध्यम से आजीविका जुटाना आसान काम नहीं है। लेकिन परसाई जी जीवनपर्यंत अपने निर्णय पर अटल रहे। उन्होंने ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। यह पत्रिका उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वे अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से गौरवान्वित हुए।

परसाई जी के साहित्य का केंद्रीय तत्व है व्यंग्य। उनकी साहित्यिक कृतियों में कहानी, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार आदि विधाओं का समुच्चय देखा जा सकता है। आमतौर पर व्यंग्य को एक शैली के रूप में देखा जाता था, लेकिन हरिशंकर परसाई ने उसे एक अलग स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया। आस-पास घटित घटनाओं एवं व्याप्त विसंगतियों को देखकर जब कोई व्यक्ति भीतर से उद्वेलित हो उठता है, तो उसकी कलम से ‘सदाचार का ताबीज’, ‘बेईमानी की परत’, ‘न्याय का दरवाजा’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘आवारा भीड़ के खतरे’, ‘हरिजन को पीटने का यज्ञ’ जैसी रचनाओं का सृजन स्वाभाविक है। इस संबंध में श्रीलाल शुक्ल का यह कथन उल्लेखनीय है – “परसाई विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सुस्पष्ट विचारों को आधार बनाकर उन्होंने राजनीतिक व्यंग्य को एक खास दिशा दी और गुणवत्ता में नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं।” (श्रीलाल शुक्ल, कुछ साहित्य चर्चा, पृ.216)

हरिशंकर परसाई की लेखन शैली नितांत निजी है। वे यह नहीं मानते कि साहित्य सृजन के लिए किसी पारंपरिक ढाँचे को ही अपनाना पड़ेगा। वे तो रूढ़ियों को तोड़ने पर बल देते थे। वे हमेशा यही कहा करते थे कि ‘सत्य शुभ हो, अशुभ हो, काला हो, सफेद हो – साहित्य उसी से बनता है।’ (हरिशंकर परसाई, देश के लिए दीवाने आये)। परसाई आम आदमी की जिंदगी में व्याप्त विसंगतियों से इस कदर बेचैन हो उठते हैं कि उनका अंतस कराह उठता है। उन्होंने स्वयं कहा है कि “मैं निहायत बेचैन मन का घोर संवेदनशील आदमी हूँ। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता। इसलिए गर्दिश नियति है।” (सं. कमलेश्वर, गर्दिश के दिन, पृ.128)।

हिंदी साहित्य को धारदार व्यंग्य के माध्यम से समृद्ध करने वाले, पाठकों को हँसाने वाले, चुटकी लेने का मौका न छोड़ने वाले हरिशंकर परसाई के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानना हो तो उनके द्वारा लिखी हुई उनकी कहानी को ही पढ़ना होगा। जी हाँ! परसाई की कहानी अपनी जुबानी! (उनके इस बयान के सब सूत्र ‘गर्दिश के दिन’ में छिपे हैं।) तो, सुनिए!

मैं हरिशंकर परसाई! एक शताब्दी के बाद आपके सामने आ रहा हूँ। ‘घायल बसंत’ को देखकर डर गया था। इसलिए ‘भोलाराम का जीव’ बनकर अपने आपको छुपा लिया था। ‘ठिठुरता गणतंत्र’ को देखकर ‘शिकायत मुझे भी है’, लेकिन क्या कर सकता हूँ! लाचार हूँ न! यहाँ तो सबकी ‘अपनी अपनी बीमारी’ है। सब के सब ‘भेड़ें और भेड़िये’ ही तो हैं। ‘बेईमानी की परत’ खोलने में सफल हो सकता हूँ क्या? ‘तुलसीदास चंदन घिसें’ तो मैं क्या ‘तिरछी रेखाएँ’ नहीं खींच सकता! करना तो बहुत कुछ चाहता हूँ। करने के लिए इस संसार में बहुत कुछ है, लेकिन जब जब मैं ‘पाखंड का अध्यात्म’ देखता हूँ तब तब बेचैन हो उठता हूँ। मेरी अंतरात्मा पुकारने लगती है ‘सुनो भाई साधो’। पर मेरी आवाज जनता तक नहीं पहुँचती। ‘एक मध्यवर्गीय कुत्ता’ कर क्या सकता है भला! सोच रहा हूँ कि ‘जैसे उनके दिन फिर’ मेरे भी फिरेंगे। ‘सुदामा का चावल लेकर ‘बस की यात्रा’ करूँगा और ‘क्रांतिकारी की कथा’ लिखूँगा पर ‘समझौता’ नहीं करूँगा।

यादें तो मेरे पास बहुत हैं। आपकी दिलचस्पी किस बात में है? क्या आप जानना चाहते हो कि हरिशंकर परसाई नामक यह आदमी जो हँसता है, मस्ती करता है, जो तीखा है, कटु है – इसकी अपनी जिंदगी कैसी है? यह कब गिरा? कब उठा? कैसे टूटा? कैसे फिर से जुड़ा? जानने की इच्छा है! मैं तो एक निहायत कटु निर्मम और ‘धोबीपछाड़’ आदमी हूँ। बचपन में मुझे जिस घटना ने तोड़ा, पहले उसके बारे में ही बताऊँगा। बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। शायद 1936 या 37 होगा। उस वक़्तशायद मैं आठवीं में पढ़ रहा था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में रहने चली गई थी। हम नहीं गए थे। माँ सख्त बीमार थी। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। सब लोग जा चुके थे। कस्बा वीरान हो चुका था। भाँय-भाँय करते पूरे आसपास में हमारे घर में ही चहल-पहल थी। काली रातें। इनमें हमारे घर जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गए थे। ऐसी स्थिति में तो रात के सन्नाटे में हमारी ही आवाजें हमें डरावनी लगती थीं। वह रात भयंकर थी। उसे याद कर रहा हूँ, तो आज भी मेरी आत्मा काँप रही है। मरणासन्न माँ के सामने हम आरती गा रहे थे। गाते गाते पिताजी सिसकने लगे, माँ बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपका रही है और हम रो रहे हैं। यह रोज रोज की बात हो गई। पिताजी, चाचा जी और एक-दो रिश्तेदार लाठी-बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूमकर पहरा देते। ऐसे भयंकर वातावरण में एक रात माँ हम सब को बिलखते छोड़कर कहीं दूर चली गई। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया। कुत्ते भी सिमटकर आ गए कहीं से योगदान देने। पाँच भाई-बहनों में माँ की मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था – सबसे बड़ा जो हूँ! प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं। जिस आतंक, निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे, उसके सही अंकन के लिए हिम्मत चाहिए। हममें से कोई इस कदर टूटे नहीं थे, जिस कदर पिताजी टूटे थे।

दिन बीतते गए। मैं पढ़ाई और नौकरी में व्यस्त हो गया। मेट्रिक हुआ कि नहीं जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता था। चूहे, बिच्छू और साँपों ने खूब काटा, लेकिन ज़हरमोहरा मुझे शुरू में ही मिल गया था। इसलिए ‘बेचारा परसाई’ का मौका ही नहीं आने दिया। मुझे दिखाऊ सहानुभूति से बेहद नफरत है। अभी भी है। दिखाऊ सहानुभूति दिखाने वालों को चाँटा मार देने की इच्छा होती है। फिर स्कूल में मास्टरी की थी। टीचिंग ट्रेनिंग और फिर नौकरी की तलाश। पिताजी अपनी अंतिम साँसें गिन रहे थे। परिस्थितियों के कारण मैं अनिश्चय में जी लेना सीख ही गया।

मैं बहुत भावुक, संवेदनशील और बेचैन तबीयत का आदमी हूँ। सामान्य स्वभाव का आदमी ठंडे-ठंडे जिम्मेदारियाँ भी निभा लेता है। दुनिया से तालमेल भी बिठा लेता है। व्यक्तित्वहीन नौकारीपेशी आदमी की तरह जिंदगी साधारण संतोष से भी गुजार लेता है। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मैं अपने व्यक्तित्व और चेतना की रक्षा करने में जुट गया। तब मैंने सोचा ही नहीं था कि लेखक बनूँगा। पर मैं अपने विशिष्ट व्यक्तित्व की रक्षा तब भी करना चाहता था। मैंने अपने आपको समझाया – हे परसाई! किसी से मत डरो! ‘भीतर तुम जो भी हो, जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी के साथ निभाओ। यदि जिम्मेदारी के साथ निभाओगे तो नष्ट हो जाओगे।’ अपने से बाहर निकल आओ। दुनिया देखो, समझो और हँसो!

मैं डरा नहीं। ‘लोगों से नहीं डरा, तो नौकरियाँ गईं। लाभ गए, पद गए, ईनाम गए। पहले अपने दुखों के प्रति सम्मोहन था। अपने आपको दुखी मानकर मनवाकर आदमी राहत भी पा लेता है। बहुत लोग अपने लिए ‘बेचारा’ शब्द सुनकर संतुष्ट हो जाते हैं। अपार आनंद का अनुभव करने लगते हैं। मुझे भी पहले ऐसा ही लगा। आखिर मैं भी एक साधारण इंसान ही तो हूँ। पर मैंने आस-पास देखा। तब मुझे लगा ‘इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा! इतने विकट संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष!’ इन सब परिस्थितियों के बीच मेरे भीतर लेखक कैसे जन्मा यह सोचता हूँ तो कुछ सूझता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैंने दुनिया से लड़ने के लिए लेखन को एक हथियार के रूप में अपनाया। इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा। ‘अपने को अविशिष्ट होने से बचाने के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया। पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दुख के जाल से निकल गया।’ इस संसार में दुखी, अन्याय से पीड़ित तथा शोषित और भी हैं। अतः मैंने अपने आपको विस्तार दिया। मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना संपन्न हूँ। यहीं से व्यंग्य लेखक ‘पर-साई’ का जन्म हुआ।

इस संसार में सर्वत्र मनुष्य किसी न किसी रूप में संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ‘मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता।’ पाप से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य छटपटाता रहता है। पर बड़ी लड़ाई केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। ‘अकेले वही सुखी हैं जो लड़ना ही नहीं चाहते। न उनके मन में सवाल उठते हैं, न शंका उठती है। ये जब-तब सिर्फ शिकायत कर लेते हैं। शिकायत भी सुख देती है। और वे ज्यादा सुखी हो जाते हैं।’ कबीर ने ठीक ही कहा है – ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै/ दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।’ जागने वाले का रोना कभी खत्म नहीं होता। व्यंग्य लेखक की गर्दिश भी कभी खत्म नहीं होगी। मेरी गर्दिश सौ सालों के बाद भी ताजा है। इस भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

2024! हरिशंकर परसाई का जन्मशताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर उनको याद करके उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।