शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

डॉ. कविता वाचक्नवी और डॉ. राधेश्याम शुक्ल का सम्मान समारोह


हैदराबाद, ३० अगस्त २०११ .

दोपहर के समय  डॉ.अहिल्या मिश्र का फोन आया. सूचना मिली कि  शाम को ठीक साढ़े चार बजे आथर्स  गिल्ड ऑफ़ इण्डिया के हैदराबाद चैप्टर की विशेष बैठक है. पहुँचने पर पता चला दो विद्वानों का सम्मान समारोह था. एक तो डॉ कविता वाचक्नवी जी जो कुछ ही दिन के लिए लन्दन से आई थीं . दूसरे डॉ. राधेश्याम शुक्ल जिन्हें दो दिन पहले ही कमला गोइन्का फाउंडेशन ने पत्रकार शिरोमणि का ५१ हज़ार का पुरस्कार दिया था.

मंच पर दोनों सम्माननीय अतिथियों के साथ विशेष अतिथि प्रो.ऋषभदेव शर्मा , डॉ. एम् प्रभु , मधुसूदन सोंथालिया और अध्यक्ष डॉ. अहिल्या मिश्र बैठीं. खूब भावभीना स्वागत हुआ. बाद में  हास्य व्यंग्य   के महारथी वेणुगोपाल की अध्यक्षता में ''कविता की एक शाम डॉ. कविता के नाम'' का आयोजन हुआ. कई भाषाओँ की कविताएँ सुनने का मौका मिला. बहुत अच्छा लगा. मुझे भी काव्य पाठ के लिए बुलाया गया. मैंने कविता जी की तीन छोटी कविताओं का तमिल अनुवाद प्रस्तुत किया, तो सबने खूब आशीर्वाद दिया. कविता जी को अनुवाद पसंद आया इससे मुझे संतोष हुआ ; नहीं तो मैं तो डरी हुई थी.

मैं इस साहित्यिक शाम को भूल न सकूँगी.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

बुधवार, 27 जुलाई 2011

‘नानीलु’ के प्रवर्तक प्रो.एन.गोपि



"समय है एक धागा
है कहाँ आखिरी सिरा
ढूँढ़ते जाना ही तो
जिंदगी है." (एन.गोपि, नन्हे मुक्‍तक)

‘नानीलु’ नामक नन्हीं कविता के प्रवर्तक तेलुगु कवि एन.गोपि का जन्म 25 जून, 1948 को नलगोंडा जिले के भुवनगिरि में हुआ. उनका वास्तविक नाम गोपाल है. उनकी माता का नाम लक्ष्मम्मा है और पिता का नाम चिन्नय्या. गोपि ग्राम जीवन और लोक संस्कृति के प्रति समर्पित एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएँ वैविध्यपूर्ण एवं बहुआयामी हैं. वे अपनी जमीन से इस तरह से जुड़े हुए हैं कि उनकी कविताओं में मिट्टी का सोंधापन पाठकों के मन-मस्तिष्क को सहज ही आप्‍लावित करता है.

प्रो.गोपि के प्रमुख काव्य संग्रह हैं - तंगेडु पूलु (पीले फूल, 1976), मैलुराई (मील का पत्थर, 1982), चित्र दीपालु (रंगीन दीप, 1989), वंतेना (सेतु, 1993), कालान्नि निद्रपोनिव्वनू (समय को सोने नहीं दूँगा, 1998), नानीलू (नन्हे मुक्‍तक, 1998), एंडपोडा (धूप, 2002), जलगीतम्‌ (जलगीत, 2002) आदि. इनमें से अधिकांश काव्य संग्रह किसी न किसी संस्था द्वारा पुरस्कृत हैं : तंगेडु पूलु - आंध्र महिला सभा द्वारा देवुलपल्ली कृष्णशास्त्री पुरस्कार (1980); मैलुराई - प्रिवर्स फ्रंट अवार्ड, (1982); चित्रदीपालु - डॉ.सी.नारायण रेड्डी कविता पुरस्कार, (1990); वंतेना - अमलापुरम्‌ लेखक संघ द्वारा सरसम पुरस्कार, (1994); कालान्नि निद्र्पोनिव्वनू - केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार,(2001).

‘नानीलु’ (नन्हे मुक्‍तक) के कारण डॉ.गोपि तेलुगु कविता के क्षेत्र में ट्रेंड सेटर के रूप में प्रसिद्धि प्राप्‍त कर चुके हैं. वस्तुतः नन्हे मुक्‍तक छोटी कविताएँ हैं, पर बहुत छोटी भी नहीं. इस संदर्भ में कवि ने स्वयं कहा है कि "बिना अतीव कसावट और बिना अनावश्‍यक ढिलाई के साथ नानी (नन्हा मुक्‍तक) मेरे द्वारा रूपायित 20-25 अक्षरोंवाला एक ढाँचा है, एक छंद है. इनमें अक्षरों की संख्या 20 से कम नहीं, और 25 से अधिक नहीं. नानी माने मेरे (ना; नावि = मेरे) और तेरे (नी; नीवी = तेरे) हैं. मतलब है हम सब के. नानी माने नन्हा बच्चा भी है. ये भी नन्ही कविताएँ हैं न! इनमें मैंने चार चरणों के ही नियम का पालन किया. चरणों के विभाजन में ‘वचन कविता’ के अंतर्गत जो संगीत है वह इन में नहीं है. फिर भी निर्माण की दृष्‍टि से इन में भी नियमबद्धता देखी जा सकती है. कुछ नन्हे मुक्‍तक ऐसे हैं जिनके दो दो चरणों में एक एक भाव का अंश निहित है. इनमें प्रथम दो चरणों में एक भाव का अंश है तो अंतिम दो चरणों में दूसरा. प्रथम भावांश का समर्थन करते हुए या उस की सार्थकता का प्रतिपादन करते हुए दूसरा भावांश रहता है :
"घड़ा फूट गया
कुढ़ते हो क्यों? 
माटी दूसरा रूप लेने की
कर रही है तैयारी."

इस मुक्‍तक में प्रथम भावांश का समर्थन दूसरा भावांश कर रहा है."

गोपि हमेशा मनवता पर जोर देते हैं. वे निराडंबर जीवन व्यतीत करने में आस्था रखते हैं. वे मिलनसार और संवेदनशील व्यक्‍ति हैं. उनका हृदय इतना कोमल है कि समाज में व्याप्‍त विसंगतियों, विद्रूपताओं, मूल्यह्रास और अपसंस्कृति को देखकर विचलित हो जाता है. इसीलिए तो उनका कवि हृदय कहता है - "इंसानों के बीच/ रुपय्या ही गर पुल है/ तो इंसानियत का/ तो समझो काम तमाम." (नन्हे मुक्‍तक).

गोपि अपने भावों और विवारों को कविता के माध्यम सी अभिव्यक्‍ति करते हैं. उनके लिए तो कविता ही सब कुछ है. एक ‘पैशन’ है. अतः वे कहते हैं - "सब के सो जाने पर/ चोरी से टी.वी. देखने वाले बच्चे की भाँति/ रचता हूँ मैं कविताएँ." (वही).

प्रेम स्वाभाविक मानव प्रवृत्ति है. यदि व्यक्‍ति और व्यक्‍ति के बीच निहित संबंधों को ही लें तो इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं. माता-पिता एवं पुत्र-पुत्री के बीच, भाई-बहन के बीच, प्रेमी-प्रेमिका के बीच, पति-पत्‍नी के बीच. और फिर यही प्रेम समाज और देश के लोगों से भी जुड़ जाता है. गोपि की कविताओं में भी प्रेम के विविध रूप दिखाई पड़ता है. एक ओर पर्यावरण के प्रति अमित प्यार दीख पड़ता है तो दूसरी ओर मानवीय संबंधों के प्रति. मातृभूमि के प्रति उनका प्रेम निर्विवाद है. वे कहते हैं - "प्रेम/ अधिक बतियाता नहीं/ द्वेष की/ कोई सीमा नहीं." (वही). कवि उन लोगों पर भी व्यंग्य कसते हैं जो प्यार के नाम पर अपनी जिंदगी को जला डालते हैं - "प्यार से/ जला लिया क्या जिंदगी को?/ तब तो/ बर्नाल भी प्रेम ही है." (वही).

गोपि की कविताओं में वृद्धावस्था विमर्श से लेकर पर्यावरण विमर्श, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श जैसे उत्तरआधुनिक विमर्श के अनेक आयाम भी दिखाई पड़ते हैं.

बचपन सबको प्रिय लगता है क्योंकि वह एक ऐसी अवस्था है जो छलरहित और निर्मल है. राग-द्वेष से परे, सुनहला समय. अपने बचपन को याद करते हुए कवि कहते हैं - "निर्मलता बचपन की/ जब तक याद आ जाती/ यदि हर दिन याद आती तो/हम शायद कुछ और होते." (वही).

कवि जहाँ बचपन को याद करके उल्लसित होते हैं वहीं दूसरी ओर अपने बच्चों की राह देखते हुए बूढ़े माँ-बाप को देखकर विचलित होते हैं - "सेलवुल्लो वच्चिना ना चिरंजीविकि/ इंडिया अंता डर्टी डस्टबिन ला कनिपिस्तुंदि/ ***/ प्रपंचम्‌ एंतो/ मारिंदंटुन्नारू/ अदेमोगानी/ इंडिया मात्रं वृद्धाश्रमम्‌गा मारुतुन्नदि." (चुट्टियाँ बिताने आए अपने लाडले को/ इंडिया एक डर्टी डस्टबिन-सा लग रहा है/ ***/ सब कहते अहिं कि दुनिया काफी बदल चुका है/ पर/ इंडिया तो वृद्धाश्रम बन रहा है; ‘होम फर द एजड’, कविता दशाब्दी, (सं) प्रो.एस.वी.सत्यनारायण, डॉ.पेन्ना शिवरामकृष्णा).

सृष्‍टि निर्माण में स्त्री-पुरुष दोनों ही समान है. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. पर अपनी शारीरिक कमजोरी के कारण स्त्री को अबला के रूप में चित्रित किया जाता है अतः कवि कहते हैं - "सृष्टिकाव्य को/ रचते हैं दोनों/ पर कापीराइट होता है/ पुरुष का ही." (नन्हे मुक्‍तक). वे आधुनिक स्त्री के बारे में कहते हैं कि "आज की महिला/ है नहीं उपग्रह/ शोषण के खिलाफ/ शाब्दिक प्रहार है." (वही).

स्त्री ही नहीं बल्कि दलित और निम्न जाति के लोग भी बरसों से हाशिए पर ही रहे. आज धीरे धीरे वे केंद्र में आ रहे हैं, कहा जाए तो आ भी चुके हैं. सवर्ण जातियाँ सदियों से निम्न जाति के लोगों को अछूत कहकर धिक्कारती रही हैं. उन्हें कीड़े-मकौड़ों की तरह कुचलती रही हैं. श्रम का शोषण करती रही हैं. दलित पीढ़ी दर पीढ़ी जमीनदारों के यहाँ पालेरू/बंधुआ मजदूर बनकर रह जाता है - "कोमरय्या कोमरेल्ली मल्लन्नला अन्नप्पुडु/ इक मुंदु कोमरय्या डप्पु/ बुल्लि कोमरय्या भवितव्यान्नी पाडुतुंदि काबोलु." (कोमरय्या अब/ दिख रहा है - शिव-सा/ कोमरय्या की डफली अब/ नन्हे कोमरय्या का भविष्य गाएँगी शायद; ‘डफली’, समय को सोने नही दूँगा). आंध्र प्रदेश में शव यात्रा में डफली बजाने वालों को ‘कोमरय्या’ कहकर संबोधित किया जाता है. आज के जमाने में कोई भी गुलाम बनकर रहना पसंद नहीं करते - "गुलामी/ भाती नहीं किसी को/ यहाँ तक कि/ कीड़े को भी." (नन्हे मुक्‍तक).

गोपि संवेदनशील और जागरूक कवि हैं. उन्होंने अपनी लंबी कविता ‘जलगीतमु’ (जलगीत) में पाठकों को पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश दिया है. आधुनिकता और विकास के नाम पर मनुष्य ने धरती के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है. एक ओर बढ़ती आबादी है तो दूसरी ओर उस आबादी के कारण पैदा होनेवाली अनेकानेक समस्याएँ हैं जिसके कारण संतुलन बिगड़ रहा है और प्रदूषण तथा प्राकृतिक विपदाएँ बढ़ रही हैं. कवि कहते हैं कि "यह प्रदूषण शताब्दी है/ यह शताब्दी है जल के दंश की." (जलगीत). कवि पानी की महत्ता को भली भाँति समझते हैं. इसलिए तो वे उद्वेलित होकर कहते हैं - "जलहीनता/ जन्म देती है योद्धाओं को/ जलहीनता/ क्रूरता में प्राण फूँकती है/ जलहीनता/ आश्रयदाता के प्राणों को डस लेती है." (वही). आधुनिक मानव की त्रासदी को देखने पर कवि को लगता है कि "धरती माँ मौत की चारपाई पर अंतिम साँसें गिन रही है,/ जमीन पर घास ही नहीं उगती तो कागजों पर कविता कहाँ से आएगी?" (वही).

आज के कार्पोरेट कल्चर की ओर इशारा करते हुए कवि कहते हैं कि "कम्यूनिकेशनल होरुकु/ पावुरालु एगिरिपोतुन्नाइ/ पट्टुकोनि आपंडि/ ‘हेलो’ अने ओक्का बाणम्‌तो/ रसार्द्र जीव विन्यास संपुटान्नि चंपकंडी." (‘कम्यूनिकेशन’ के शोर से घबराकर/ कबूतर उड़ते चले जा रहे हैं/ उन्हें पकड़कर रोकिए/ ‘हेलो’ के एक ही तीर से/ रसार्द्र-जीवन के खज़ाने को मत नष्‍ट कीजिए; ‘मरती हुई चिट्ठी’, समय को सोने नहीं दूँगा).

गोपि ने अपनी कविताओं के माध्यम से समसामयिक घटनाओं और परिस्थितियों को उकेरा है. उनकी कविताओं में ग्राम जीवन से लेकर शहर के आभिजात्य जीवन का अकेलापन भी परिलक्षित होता है. इसलिए तो वे कहते हैं - "जिंदगियाँ हैं हजारों की/ हाथों में / ‘स्पाट वेल्यूएशन’ में/ घायल मत करो प्रतियाँ." (नन्हे मुक्‍तक).



बुधवार, 20 जुलाई 2011

‘कादंबिनी क्लब’ में शमशेर पर विशेष व्याख्यान



‘कादंबिनी क्लब’ में शमशेर पर विशेष व्याख्यान

हैदराबाद.

स्थानीय कादंबिनी क्लब, के तत्वावधान में 17 जुलाई, 2011 को हिंदी प्रचार सभा परिसर में क्लब की 227वीं मासिक गोष्ठी आयोजित की गई|  प्रो. ऋषभदेव शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न इस गोष्ठी के प्रथम चरण में  शमशेर बहादुर सींह के शताब्दी के संदर्भ में ‘शमशेर बहादुर सिंह को समझने की कोशिश’ विषय पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की प्राध्यापक डॉ.जी.नीरजा ने विशेष व्याख्यान दिया. ‘देसिल बयना’ के अध्यक्ष दयानाथ झा मुख्य अतिथि रहे तथा संयोजन क्लब की संयोजिका डॉ.अहिल्या मिश्र ने किया.

विशेष व्याख्यान देते हुए डॉ.जी.नीरजा ने शमशेर को आंतरिक ऊर्जा से संपन्न कवि बताते हुए उनके व्यक्‍तित्व और कृतित्व की संघर्षशीलता और रचनाधर्मिता पर विशेष चर्चा की. डॉ.जी.नीरजा ने कहा कि "गद्‍य हो या पद्‍य - शमशेर की भाषा बनावटी नहीं है। वे खड़ीबोली क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और उसका ठेठ तथा एक सीमा तक खुरदरा अंदाज उनकी भाषा में भी है। खास तौर से उनकी कहानियाँ पढ़ते समय यह साफ दिखाई देता है कि उनका गद्‍य बातचीत की शैली का है। वे जैसे बोलते हैं, वैसे ही लिखते भी हैं। कहने का मतलब यह है कि लिखते समय भी वे बातचीत का खुलापन लाते हैं।" डॉ.जी.नीरजा ने शमशेर की अनेक कविताओं के उदाहरण देते हुए यह प्रतिपादित किया है कि "शमशेर की कविताओं में एक ओर प्रेम की आकांक्षा, नारी सौंदर्य की कल्पना और निराशा से उत्पन्न व्यथा का मार्मिक चित्रण है तो दूसरी ओर उनका मिज़ाज इन्क़लाबी है."


डॉ.ऋषभ देव शर्मा ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि शमशेर बहादुर सिंह एक कवि, समीक्षक, संस्मरणकार, कहानीकार और कोशकार के रूप में हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय योगदान के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने बताया कि शमशेर भारतीय और पश्‍चिमी साहित्यिक परंपराओं के साथ साथ हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी तथा साहित्य, चित्रकला, वास्तुकला और संगीत के संगम के प्रतीक हैं तथा उन्होंने हिंदी कविता के क्षेत्र में ‘हिंदुस्तानियत’ के संस्कार को परिपुष्‍ट किया. डॉ.शर्मा ने शमशेर की भाषा में हिंदवी की लय की चर्चा करते हुए उसकी बिंबात्मकता और समाजविद्‍धता की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि शमशेर की तमाम कविता में प्रगतिशीलता के प्रति एक खास तरह का रुझान निहित है जो नारेबाजी और बड़बोलेपन के बिना शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है. डॉ.शर्मा ने शमशेर की कुछ चर्चित रचनाओं का वाचन भी किया.

दूसरे चरण में लक्ष्मीनारायण अग्रवाल के संचालन में कवि गोष्ठी हुई, जिसमें प्रो.ऋषभ देव शर्मा, कुंजबिहारी गुप्ता, सत्यनारायण काकड़ा, गौतम दीवाना, सूरजप्रसाद सोनी, उमा सोनी, डॉ. रमा द्विवेदी, आज्ञा खंडेलवाल, डॉ. अहिल्या मिश्र, मीना मूथा, भंवरलाल उपाध्याय, नीरज त्रिपाठी, डॉ. देवेन्द्र शर्मा, विनीता शर्मा, मीना खोंड, जयश्री कुलकर्णी, मुकुंददास डांगरा, जुगल बंग जुगल', डॉ. सीता मिश्र, सरिता सुराणा जैन, पवित्रा अग्रवाल, संपत देवी मुरारका, दत्तभारती गोस्वामी, भावना पुरोहित आदि ने विविध विषयों को केंद्रित करते हुए काव्यपाठ किया| 

सरिता सुराणा जैन के धन्यवाद के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ|

(रिपोर्ट एवं चित्र : संपतदेवी मुरारका)

शमशेर बहादुर सिंह को समझने की कोशिश

"ओ मेरे घर
ओ हे मेरी पृथ्वी
साँस के एवज़ तूने क्‍या दिया मुझे
- ओ मेरी माँ?

तूने युद्ध ही मुझे दिया
प्रेम ही मुझे दिया क्रूरतम कटुतम
और क्या दिया
मुझे भगवान दिए कई-कई
मुझसे भी निरीह मुझसे भी निरीह!"
(शमशेर; ‘ओ मेरे घर’, इतने पास अपने; पृ.19)

हिंदी साहित्य जगत में ‘नई कविता’ के सशक्‍त हस्ताक्षर शमशेर बहादुर सिंह (13 जनवरी,1911 - 12 मई,1993) का अपना एक सुनिश्‍चित स्थान है। उनका जन्‍म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक गाँव एलम में हुआ था। शिक्षा-दीक्षा देहरादून तथा प्रयाग में हुई। वे हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी के विद्वान थे। इन तीनों ही भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - दोआब(1948), प्लाट का मोर्चा : काहानियाँ और स्केच(1952), कुछ कविताएँ(1959), कुछ और कविताएँ(1961), चुका भी हूँ नहीं मैं(1975), इतने पास अपने(1980), उदिता : अभिव्यक्‍ति का संघर्ष(1980), बात बोलेगी(1981), काल तुझसे होड़ है मेरी(1988), टूटी हुई बिखरी हुई(1990), कुछ गद्‍य रचनाएँ(1989) तथा कुछ और गद्‍य रचनाएँ (1992)। स्मरणीय है कि शमशेर ‘दूसरा सप्‍तक’ (1952) में सम्मिलित थे तथा उन्हें 1977 में ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का तुलसी पुरस्कार प्राप्‍त हुए थे। 1987 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें मैथिलीशरण गुप्‍त पुरस्कार और 1989 में कबीर पुरस्कार से सम्मानित किया।

शमशेर और उनकी कविताओं पर कुछ कहना एक चुनौती है क्योंकि उनकी काव्य यात्रा छायावादोत्तर रोमांटिक भावधारा से शुरू होकर प्रगतिवाद और प्रयोगवाद को पार करती हुई नई कविता से जुड़ती है और उसके पार भी चली जाती है। सच तो यह है कि उन्होंने कविता के क्षेत्र में छाए हुए वादों की जकड़न से अपने आपको अलग रखा और काव्य भाषा को चित्रात्मकता, संगीत, बिंब विधान और लय के माध्यम से तराशा। इस संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत द्रष्‍टव्य है - "शमशेर की कविताओं में संगीत की मनःस्थिति बराबर चलती रहती है।एक ओर चित्रात्मकता की मूर्तता उभरती है, और फिर वह संगीत की अमूर्तता में डूब जाती है। भाषा में बोलचाल के गद्‍य का लहजा और लय में संगीत का चरम अमूर्तन।"(रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदान का विकास; पृ.205)। वे अपनी कविताओं में संवेदनाओं का मूर्त चित्रण करते हैं। इस संदर्भ में मुक्‍तिबोध का मत है कि "शमशेर की मूल प्रवृत्ति एक इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार की है। इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार अपने चित्र में केवल उन अंशों को स्थान देगा जो उसके संवेदना-ज्ञान की दृष्‍टि से प्रभावपूर्ण संकेत शक्‍ति रखते हैं।... दूसरे शब्दों में इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार दृश्‍य के सर्वाधिक संवेदनाघात वाले अंशों को प्रस्तुत करेगा और यह मानकर चलेगा कि यदि वह संवेदनाघात दर्शक के हृदय में पहुँच गया तो दर्शक अचित्रित शेष अंशों को अपनी सृजनशील कल्पना द्वारा भर लेगा।" (मुक्‍तिबोध, नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध; पृ.92)

शमशेर कविता में आंतरिक ऊर्जा को महत्व देते हैं। वे खड़ीबोली के बोलचाल के रूप को महत्व देते हैं। उनका मत है कि ‘पाठक के मन की बात को पाठक की ही भाषा में व्यक्‍त करना चाहिए।’ इस संदर्भ में वे उर्दू को भी याद करते हैं और कहते हैं - "मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूँ। मैं वह आईना हूँ जिसमें आप हैं।" (शमशेर, बाढ़)

यहाँ एक बात ध्यान रखने की है कि गद्‍य हो या पद्‍य - शमशेर की भाषा बनावटी नहीं है। वे खड़ीबोली क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और उसका ठेठ तथा एक सीमा तक खुरदरा अंदाज उनकी भाषा में भी है। खास तौर से उनकी कहानियाँ पढ़ते समय यह साफ दिखाई देता है कि उनका गद्‍य बातचीत की शैली का है। वे जैसे बोलते हैं, वैसे ही लिखते भी हैं। कहने का मतलब यह है कि लिखते समय भी वे बातचीत का खुलापन लाते हैं।

शमशेर बहादुर सिंह को भली भाँति उनके साहित्य के माध्यम से जाना जा सकता है चूँकि उनका जीवन और साहित्य वस्तुतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पाखंड और दिखावा न तो उनके व्यक्‍तित्व में था और न ही उनके साहित्य में । उनका संसार निजीपन का संसार है। अनुभव का संसार है। जीवन के ताप को सहकर वे सहज बने। यही सहजता उनके व्यक्‍तित्व और रचनाओं में मुखरित है। इसी के कारण उनके विचार भी उदात्त बने। वे हमेशा अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हैं और कहते हैं - "भूल कर जब राह - जब-जब राह... भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तुम ही आँख बन मेरे लिए।"

शमशेर का समूचा जीवन अभावों के कटघरे में बीता पर उन्होंने कभी उफ तक नहीं की। हालात के आगे घुटने टेकना तो शायद वे जानते ही नहीं थे। शमशेर के साथ बिताए तीन वर्षों को याद करते हुए हेमराज मीणा बताते हैं कि "शमशेर जी साधारण चाय के स्थान पर हल्दी की चाय खुद बनाकर पीते थे और आर्थिक विपन्नता का आलम यह था कि घिसे और फटे हुए कुर्ते को हाथ से सिलकर काम चलाना पड़ता था।" ऐसी स्थिति में भी शमशेर टूटे नहीं, बिखरे नहीं। अड़िग होकर आगे बढ़ते रहें। यही आस्था और जिजीविषा उनकी रचनाओं में भी मुखरित है - "मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल/ जीवन:/ कण-समूह में हूँ मैं केवल/ एक कण।/ -कौन सहारा!/ मेरा कौन सहारा!"

शमशेर की कविताओं में एक ओर प्रेम की आकांक्षा, नारी सौंदर्य की कल्पना और निराशा से उत्पन्न व्यथा का मार्मिक चित्रण है - "गोद यह/ रेशमी गोरी/ अस्थिर/ अस्थिर/ हो उठती/ आज/ किसके लिए? जा/ ओ बहार/ जा! मैं जा चुका कब का/ तू भी-/ ये सपने न दिखा?"  तो दूसरी ओर उनका मिज़ाज इन्क़लाबी है - "सरकारें पलटती हैं जहाँ हम दर्द से करवट बदलते हैं।? हमारे अपने नेता भूल जाते हैं हमें जब,? भूल जाता है ज़माना भी उन्हें, हम भूल जाते हैं उन्हें खुद/ और तब/ इन्क़लाब आता है उनके दौर को गुम करने।"

शमशेर कम बोलनेवाले व्यक्‍ति थे। उनकी धारणाएँ उनकी कविता में बोलती हैं। उनकी प्रसिद्ध उक्‍ति है कि "बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी/ बात ही।/ सत्य का/ क्या रंग/ पूछो, एक रंग/ एक जनता का दुःख एक/ हवा में उड़ती पताकाएँ अनेक।" (बात बोलेगी)। कभी कभी यह भी प्रतीत होता है कि शमशेर आधुनिक मानवीय दाह को शांत करनेवाले कलाकार हैं - "आधुनिकता आधुनिकता/ डूब रही है महासागर में/ किसी कोंपले के ओंठ पे/ उभरी ओस के महासागर में / डूब रही है/ तो फिर क्षुब्ध क्यों है तू।" (‘सारनाथ की एक शाम’ (त्रिलोचन के लिए); चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.21)

शमशेर ने बदलती हुई जटिल और भयावह दुनिया में मनुष्‍य की पीड़ा और मूल्यहीनता को चित्रित किया है। मनुष्‍य परिस्थितियों और उनके सुख-दुःख को विविध धरातलों पर अभिव्यक्‍त किया है। उनकी कविता का केंद्र व्यक्‍ति है। उन्होंने अपने आप को व्यक्‍ति के प्रति समर्पित कर दिया है - "समय के/ चौराहों के चकित केंद्रों से।/ उद्‍भूत  होता है कोई : "उसे-व्यक्‍ति-कहो" :/ कि यही काव्य है।/ आत्मतमा/ इसलिए उसमें अपने को खो दिया।" (‘एक नीला दरिया बरस रहा’; चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.13)। उन्होंने मध्यवर्ग की अधकचरी स्थिति को ऐतिहासिक संदर्भों में देखते हुए कहा है कि - "इतिहास में भी तू/ असहनीय रूप से दयनीय।" इसी प्रकार साम्राज्यवाद के नाम पर आम लोगों को धोखा दिए जाने पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं कि "बनियों ने समाजवाद को जोखा है/ गहरा सौदा है काल भी चोखा है/ दुकानें नई खुली हैं आजादी की/ कैसा साम्राज्यवाद का धोखा है!" (‘बनियों ने समाजवाद को जोखा है’; सुकून की तलाश; पृ.56)।

शमशेर ने अनेक रचनाओं में सामाजिक सच्चाई और लोकतंत्र की ताकत को स्वर प्रदान किया है। उनकी दृष्‍टि में "दरअसल आज की कविता का असली भेद और गुण उन लोक कलाकारों के पास है जो जन आंदोलान में हिस्सा ले रहे हैं।"((सं) वक्‍तव्य; दूसरा सप्‍तक; पृ.77)। भारत-चीन युद्ध के समय कवि ने ‘सत्यमेव जयते’ पर जोर दिया - "शिव लोक में चीनी दीवार न उठाओ!/ वहाँ सब कुछ गल जाता है/ सिवाए सच्चाई की उज्ज्वलता के!/ असत्य कहीं नहीं है!/ शक्‍ति आकार में नहीं,/ सत्य में है!/ हमारी शक्‍ति/ सत्य की विजय/ ...याद रखो/ सत्यमेव जयते!/ सत्यमेव जयते!/ सत्यमेव जयते!" (‘सत्यमेव जयते’(भारत-चीन युद्ध); चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.43)। कवि की मान्यता है कि मानव मात्र के लिए बुनियादी चीज है-शांति। अतः वे कहते हैं - "अगर तुमसे पूछा जाय कि/ सबसे बुनियादी वह पहली चीज़ कौन-सी है/ कि मानव मात्र के लिए जिसका होना आवश्यक है?/ तो एक ही जवाब होगा तुम्हारा :/ एकदम पहली ही बार,/ फिर दूसरी बार भी,/ और अंतिम बार भी/ यही एक जवाब :-/ शांति!" (‘शांति के ही लिए’; चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.57)

समाज में धर्म के नाम पर होनेवाले पाखंड पर भी शमशेर कुठाराघात करते हैं - "जो धर्मों के अखाड़े है/ उन्हें लड़वा दिया जाए!/ जरूरत क्या कि हिंदुस्तान पर/ हमला किया जाए!!/ ***/ मुझे मालूम था पहले ही/ ये दिन गुल खिलाएँगे/ ये दंगे और धर्मों तक भी/ आख़िर फैल जाएँगे/ ***/ जो हश्र होता है/ फ़र्दों का वही/ क़ौमों का होता है/ वही फल मुल्क को/ मिलना है, जिसका/ बीज बोता है।" (‘धार्मिक दंगों की राजनीति’, सुकून की तलाश; पृ.71)। वे यह भी कहते हैं कि "जितना ही लाउडस्पीकर चीखा/ उतना ही ईश्‍वर दूर हुआ :/ (-अल्ला-ईश्‍वर दूर हुए!)/ उतने ही दंगे फैले, जितने/ ‘दीन-धरम’ फैलाए गए।" (‘राह तो एक थी हम दोनों की’, सुकून की तलाश; पृ.33)। शमशेर बौद्धिक स्तर पर मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद से प्रभावित है। उनकी कविताओं में मार्क्स के विचारों के साथ साथ कला, प्रेम और प्रकृति के विविध रंग विद्‍यमान है। इस संदर्भ में उन्होंने अपने आत्मसंघर्ष को व्यक्‍त करते हुए कहा कि - "वाम वाम वाम दिशा,/ समय साम्यावादी।/ पृष्‍ठभूमि का विरोध अंधकार - लीन। व्यक्‍ति .../ कुहास्पष्‍ट हृदय-भार, आज हीन।/ हीनभाव, हीनभाव/ मध्यवर्ग का समाज, दीन।/ पथ-प्रदर्शिका मशाल/ कमकर की मुट्ठी में किंतु उधर :/ लाल-लाल/ वज्र कठिन कमकर की मुट्ठी में / पथ प्रदर्शिका मशाल।" (‘वाम वाम वाम दिशा’; कुछ और कविताएँ)

कलासृजन, संरचना और शिल्प की दृष्‍टि से शमशेर की लंबी कविता ‘अम्न का राग’को विशेष रूप से  उल्लेखनीय माना जाता है। इसमें कवि ने समाजशास्त्रीय संबंधों को बखूबी उकेरा है। इस कविता में उन्होंने दो राष्‍ट्रों की संस्कृतियों को प्रतिबिंबित किया है तथा वैश्‍विक दृष्‍टिकोण को उभारा है। शमशेर शोषण, हिंसा और युद्ध का विरोध करते हैं और यह चाहते हैं कि सर्वत्र शांति कायम हो। ‘अम्न का राग’ की शुरुआत में ही बसंत के नए प्रभात की ओर संकेत किया  है - "सच्चाइयाँ/ जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं/ हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चाँदी के उन्‍मुक्‍त नाचते/ परों में झिलमिलाती रहती हैं/ जो एक हजार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है/ उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ/ कि बसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं।" इस काव्यांश में कवि ने प्रतीकों के माध्यम से सत्य और शांति को उजागर किया है। आगे देश की सीमाओं को अतिक्रमित करते हुए कहते हैं कि - "ये पूरब-पश्‍चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं/ मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द लपेट लिया।" शमशेर भारतीय एवं पाश्‍चात्य संस्कृतियों को अपनी आत्मा मानते हैं। उनक दृष्‍टिकोण वैश्‍विक है। इसी वैश्‍विक परिदृश्‍य को उकेरते हुए वे कहते हैं कि "मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आँच की धूप-छाँव पर/ बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूँ/ सब संस्कृतियाँ मेरे संगम में विभोर हैं/ क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख शांति का राग हूँ/ बहुत आदिम, बहुत अभिनव।" इतना ही नहीं भारतीय एवं पाश्‍चात्य विचारकों, शायरों, दार्शनिकों, संगीतकारों और रचनाकारों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि - "देखो न हक़ीकत हमारे समय की जिसमें/ होमर एक हिंदी कवि सरदार जाफ़री को/ इशारे से अपने क़रीब बुला रहा है/ ***/ और आज तो मेरा टैगोर मेरा हाफ़िज मेरा तुलसी मेरी/ ग़ालिब/ एक एक मेरे दिल के जगमग पावर हाउस का/ कुशल आपरेटर हैं।" शमशेर को अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है जितना मास्को का लाल तारा। पीकिंग का स्वर्गीय महल मक्का मदीना से कम पवित्र नहीं - "मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है/ जितना मास्को का लाल तारा/ और मेरे दिल में पीकिंग का स्वर्गीय महल/ मक्का-मदीना से कम पवित्र नहीं/ मैं काशी में उन आर्यों का शंख-नाद सुनता हूँ/ जो वोल्गा से आए/ मेरी देहली में प्रह्‍लाद की तपस्याएँ दोनों दुनियाओं की/ चौखट पर/ युद्ध के हिरण्यकश्‍य को चीर रही हैं।" यह कविता उनकी अद्‍भुत सृजनात्मक प्रतिभा का परिचायक है।

शमशेर समस्त संसार में शांति कायम करना चाहते हैं। उन्होंने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य के सपने को एक साथ पिरोया है - "ये आँखें हमारे माता-पिता की आत्मा और हमारे बच्चों/ का दिल है/ ये आँखें हमारे इतिहास की वाणी/ और हमारी कला का सच्चा सपना हैं/ ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं/ ये आँखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और/ हक़ीक़त का अमर सपना हैं/ इनको देख पाना ही अपने आपको देख पाना है, समझ/ पाना है।/ हम मानते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों।"

शमशेर संवेदनशील ही नहीं अपितु भावुक भी थे। नामवर सिंह ने उनकी भावुकता का जिक्र करते हुए हैदराबाद में एक समारोह में बताया था कि कैसे एक बार नरेंद्र शर्मा की गिरफ्तारी की सूचना ने उन्हें विचलित कर दिया था। प्रेमलता वर्मा शमशेर के व्यक्‍तित्व के कुछ आयामों को सामने रखते हुए कहती हैं कि शमशेर की दुनिया ‘वाइब्रेंट’ थी। वे छलरहित मगर चुंबकीय आकर्षण वाले व्यक्‍ति थे। वे हमेशा कहा करते थे कि "कविता के माध्यम से मैंने प्यार करना - अधिक से अधिक चीजों को प्यार करना - सीखा है। मैं उसके द्वारा सौंदर्य तक पहुँचा हूँ।" अनेक विद्वानों ने शमशेर को अनेक तरह से संबोधित किया है। मलयज के लिए वे ‘मूड्स के कवि’ हैं तो अज्ञेय के लिए ‘कवियों के कवि।’ रामस्वरूप चतुर्वेदी उन्हें ‘एब्स्ट्रैक्‍ट के कवि’ मानते हैं तो नामवर सिंह ‘सुंदरता के कवि।’ गोपाल कृष्‍ण कौल ने उन्हें ‘फार्मलिस्ट’ माना है तो मधुरेश उन्हें ‘तनाव और अंतर्द्वन्द्वों के कवि’ मानते हैं। विजय देव नारायण साही ने उन्हें ‘बिंबों का कवि’ घोषित किया है तो सत्यकाम ने ‘कवियों का पुंज’ तक कह दिया है। पर शमशेर कहते हैं - 

" मैं समय की लंबी आह
मौन लंबी आह...
होना था - समझना न था कुछ भी शमशेर...
आत्मा है
अखिल की हठ - सी..."

  • (शताब्दी संदर्भ के अंतर्गत १७ जुलाई, २०११ को कादंबिनी क्लब में प्रस्तुत किया गया आलेख  )