बुधवार, 13 मार्च 2013

“स्त्री-पुरुष की परस्पर-आश्रयता का प्रतीक है ‘अर्धनारीश्वर’

आज की स्त्री चाहती है अपने युग की स्मृति खुद रचने का अधिकार


वह निरभ्र आकाश, जहाँ की निर्विकल्प सुषमा में,
न तो पुरुष मैं पुरुष, न तुम नारी केवल नारी हो;
दोनों हैं प्रतिमान किसी एक ही मूलसत्ता के,
देह-बुद्धि से परे, नहीं जो नर अथवा नारी है.” (दिनकर, उर्वशी, तृतीय अंक, पृ.48)

अक्सर कुछ लोगों के मुँह से सुनने को मिलता है कि ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’. लोग स्त्री को अबला, दीन, कमजोर, फेयर सेक्स, वीक जेंडर आदि अनेकानेक विशेषणों से अलंकृत करते रहते हैं. यह भी सुनने को मिलता है कि स्त्री को देवी, माँ आदि गरिमामय स्थान देकर उसे बंधनों में जकड़ लिया जाता है. दूसरी ओर ‘ऐसा कुछ नहीं है’ कहकर कुछ लोग स्त्री-प्रश्न को सिरे से रद्द करने वाले भी मिलते हैं. इन अतिवादी फतवों के बीच समझना यह है कि भारतीय संस्कृति के अनुसार स्त्री अबला या कमजोर नहीं है. जैसा कि महादेवी वर्मा कहती हैं, “’नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव तीव्र तथा स्थायी होते हैं. इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं. इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अंतर है जितना विद्युत और झड़ी में. एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं, परंतु प्यास नहीं बुझाई जा सकती. दूसरी से शान्ति मिलती है, परंतु पशुबल की उत्पत्ति संभव नहीं. दोनों के व्यक्तित्व, अपनी उपस्थिति से समाज के एक ऐसे रिक्त स्थान को भर देते हैं जिससे विभिन्न सामाजिक संबंधों में सामंजस्य उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण कर देता है”.’

भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष एक दूसरे के विरोधी या प्रतिबल नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं. दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं. ‘उर्वशी’ में दिनकर यही कहते हैं कि “’नारी नर को छूकर तृप्त नहीं होती, न नर नारी के आलिंगन में संतोष मानता है. कोई शक्ति है जो नारी को नर तथा नर को नारी से अलग रहने नहीं देती, और जब वे मिल जाते हैं, तब भी, उनके भीतर किसी ऐसी तृषा का संचार करती है, जिसकी तृप्ति शरीर के धरातल पर अनुपलब्ध है. नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है. इस नारी का संधान पुरुष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते, उसे मन के समुद्र में फेंक देती है, जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँच कर निस्पंद हो जाता है. और पुरुष के भीतर भी एक और पुरुष है, जो शरीर के धरातल पर नहीं रहता, जिससे मिलने की आकुलता में नारी अंग-संज्ञा के पार पहुँचना चाहती है.”’

स्त्री-पुरुष के इस मूलभूत युग्म के लिए हमारे पास एक बहुत सुंदर प्रतीक है ‘अर्द्धनारीश्वर’. दिनकर की मान्यता है कि “अर्द्धनारीश्वर केवल इस बात का प्रतीक नहीं है कि नारी और नर जब तक अलग हैं, तब तक दोनों अधूरे हैं, बल्कि इस बात का भी द्योतक है जिसमें नारीत्व अर्थात संवेदना नहीं है, वह पुरुष अधूरा है. जिस नारी में पुरुषत्व अर्थात अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस नहीं है, वह भी अपूर्ण है.” अभिप्राय यह है कि भले ही हम पुरुष हों या स्त्री, दरअसल हम संवेदना के स्तर पर स्त्री और पुरुष का युग्म ही होते हैं – इस युग्मता में ही हमारे अस्तित्व की पूर्णता है.

यहाँ एक और बात ध्यान खींचती है. यह नहीं कहा जाता कि शिव के बिना शक्ति अधूरी है, बल्कि यही कहा जाता है कि शक्ति के बिना शिव अपूर्ण है. अर्थात कहीं न कहीं हमारी परंपरा स्त्री को पूर्ण मानती है – और पूर्ण करने वाली भी. इस परंपरा में स्त्री ‘पर-निर्भर’ और ‘अबला’ नहीं थी. भारतीय परंपरा के अनुसार वह पुरुष के मनोरंजन की वस्तु भी नहीं है. स्त्री भी पुरुष के समान पूर्ण है. उसकी रचना किसी आदिपुरुष के मनोरंजन के लिए नहीं की गई बल्कि वह भी पुरुष के साथ ही अस्तित्व में आई और सृष्टि के लिए उतनी ही अहम है जितना पुरुष. इसीलिए अर्धनारीश्वर का मिथक हमारी संस्कृति का सबसे मनोरम मिथक है. इस मिथक का अत्यंत सटीक और सामयिक प्रयोग विष्णु प्रभाकर ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ में किया है और यह दर्शाया है कि स्त्री-पुरुष संबंधी विसंगतियों का निदान है ‘अर्द्धनारीश्वर’. विष्णु प्रभाकर यह कहते हैं कि “नारी की स्वतंत्र सत्ता का, नारी की सैक्स-इमेज से कोई संबंध नहीं है. उसका अर्थ है समान अधिकार, समान दायित्व, एक स्वस्थ समाज के निर्माण के दोनों समान रूप से भागीदार हैं. अर्द्धनारीश्वर का प्रतीक इस कल्पना का साकार रूप है, एक-दूसरे से विसर्जित नहीं, एक-दूसरे से स्वतंत्र, फिर भी जुड़े हुए. आगे वे यह भी कहते हैं कि नारी को बस नारी बनना है, सुंदरी और कामिनी नहीं.”

हमारी आज की यह चिंता भी विष्णु प्रभाकर की चिंता है कि वर्ण-व्यवस्था और उसके अंतर्गत फलती-फूलती जाति व्यवस्था ने आज समाज को खोखला बना दिया है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की स्थिति सोचनीय बन गई. आज वह न ही घर में सुरक्षित है, न ही बाहर. “एक ओर नारियों को परेशान करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध क़ानून बनाकर जनता से एक जागरूक और प्रगतिशील संस्कार होने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करते हैं; दूसरी ओर, दूषित साहित्य, कामुक फिल्म और फूहड़ विज्ञापनों के माध्यम से जनमत की कोमल वृत्तियों को उत्तेजित करके उन्हें नारियों के प्रति अपराध करने को उकसाते हैं.” कहना न होगा कि यह एक तरह से भोगवादी दृष्टि है जो पश्चिमी सभ्यता का परिणाम है. इसके कारण पुरुष स्त्री को एक खिलौना व मनोरंजन की वस्तु के रूप में देख रहा है. वास्तव में जो पुरुष सुविधाभोगी होता है वह कायर होता है. इस कायरता के कारण ही वह स्त्री की गरिमा को नकारता है और स्त्री के प्रति प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से हिंसक हो उठता है. हीनताग्रंथि से ग्रस्त तथाकथित आधुनिक पुरुष समाज के हाथों स्त्री की गरिमा के प्रतिदिन तार-तार होने का यह एक बड़ा कारण है.

‘मनुस्मृति’ में कहा गया है कि स्त्री की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में क्रमशः पिता, पति और पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात वह अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए, चूंकि वह कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है. यों तो विद्वान लोग इस वचन की अनेक उदारतावादी व्याख्याएं कर सकते हैं,लेकिन यह सच है कि ऐसे ही वचनों के सहारे स्त्री की स्वतंत्रता को पूरी तरह से पुरुष ने अपने हक में कर लिया और स्त्री को भी इस तरह ट्यून किया कि वह भी वही करती है जो पुरुष चाहता है. ‘युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए दंड देता आ रहा है.’ (महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ). विष्णु प्रभाकर भी अपने उपन्यास में यही दर्शाते है कि "जो समाज युगों से मातृशक्ति को शीर्षस्थ स्थान पर बैठा कर और शाब्दिक पूजा करके भी अपमानित करता आया है, शब्द को महिमामंडित करने में उसने ज़रा भी कृपणता नहीं की है. परंतु अर्थ की दुनिया में उसने पत्नी को पति-परमेश्वर की संपत्ति ही माना है, धरती है वह. इसलिए अन्नपूर्णा होकर भी निष्प्राण-निष्पंद है. उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है. पुरुष के पापों का दंड उसने भोगा है, पर उसे दंडित करने का अधिकार उसे कभी नहीं मिला.” सभ्यता के जिस सामंती दौर में स्त्री इस तरह मानवी से संपत्ति बन् गई उसे सबसे अंधा दौर कहा जाना चाहिए!

स्त्री केवल पुरुष की सहभागिनी, सहधर्मिणी तथा छाया मात्र बनकर नहीं रहना चाहती है. वह स्वतंत्रता चाहती है. वह आत्मनिर्भर बनना चाहती है. निर्णय लेने, चुनाव करने, वरण करने का अधिकार चाहती है. वह यह नहीं चाहती कि देवी के रूप में उसकी पूजा की जाए, बल्कि वह यही अपेक्षा करती है कि पुरुषसत्तात्मक समाज मानवी के रूप में उसे देखे और उसके अस्तित्व को सुरक्षित रखे. देवी बनाकर भी हमने औरत से त्याग की ही माँग की और कहा कि चूंकि वह पति और परिवार के सुख के लिए अपने सुख का त्याग करती है अतः पूजनीय है. इस तरह पूजनीय बनाकर उसके निजत्व को नष्ट करने वाली व्यवस्था महान होते हुए भी स्त्रीत्ववादी दृष्टि से तो स्त्रीविरोधी और अमानवीय ही मानी जाएगी. महादेवी इस पर वुयांग्य करते हुए कहती हैं कि “पुरुष के विचार में नारी मानव नहीं है, देवी है और देवताओं को मनुष्य के लिए आवश्यक सुविधाओं का करना ही क्या है! नारी के देवत्व की कैसी सी विडंबना है!”

आज तो समाज में स्त्री की कोई गरिमा नहीं है. आए दिन नन्हीं बच्चियों से लेकर बुजर्ग महिलाओं तक हो रहे अपहरण, बलात्कार, कन्याभ्रूण हत्या जैसे दुष्कांड समाज की घोर अनैतिकता के प्रतीक हैं.पर यही समाज दिन रात मर्यादा और नैतिकता के ढोल पीटता नहीं थकता. संवेदनशील स्त्री अपने इस जीवन से परेशान है, वह इससे छुटकारा चाहती है. इस संदर्भ में पुनः विष्णु प्रभाकर का कथन उल्लेखनीय है. वे कहते हैं कि “इन दोहरे मूल्यों का परिहार तभी किया जा सकता है जब नारी की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया जाय. तब इस प्रकार की घटनाएँ नहीं घटेंगी क्योंकि उनके लिए कोई कारण ही नहीं रहेगा. नर-नारी अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार स्वतंत्र रूप से आचरण करेंगे. वे यह भी ध्यान दिलाते हैं कि असंयम निश्चय ही घातक है, पर अतिसंयम नितांत अप्राकृतिक है. आदिवासी समाज में ‘बलात्कार’ शब्द ही नहीं है क्योंकि उन्होंने अपना सामाजिक जीवन इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि उसकी संभावना ही नहीं रहती.

स्त्री जब तक अपने आपको सशक्त नहीं बनाएगी तब तक इस दासता से मुक्ति संभव नहीं है. इसके लिए उसे खुद यह समझना अनिवार्य है कि स्त्री-पुरुष एक दूसरे के विरोधी तत्व नहीं है बल्कि इस सृष्टि के निर्माण में दोनों एक-दूसरे के पूरक है. दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं. यह आश्रयता पराधीनता नहीं है बल्कि सिद्धि है. सार्थकता है. “नारी जब अपनी स्वतंत्र सत्ता के रूप में अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ पुरुष के बराबर आकर खड़ी होगी तब समाज का बल अनंत गुणा बढ़ जाएगा. दो परिणत स्वाधीन सत्ताओं का मिलन एक-दूसरे की सिद्धि और सार्थकता को तेज गति प्रदान करेगा.”

अगर थोड़ा पीछे जाकर देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आज जो स्थिति स्त्री की है वह पुराने जमाने में नहीं थी. उस जमाने में स्त्री गरिमामय थी. राम, कृष्ण और शिव भारतीय समाज में संबंधों के ऐसे प्रतीक हैं जो सामाजिक जीवन शैली को नियंत्रित करने में सहायक हैं. पूरे विश्व में कृष्ण जैसा दूसरा व्यक्तित्व नहीं मिलता जिसने नैतिकता के विकृत रूप पर प्रहार किया और सही अर्थों में जो नारी का सखा है, इसीलिए डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था, ‘मैं समझता हूँ नारी कहीं अगर नर के बराबर हुई है तो बृज में और कान्हा के पास’.” नैतिकता की अवधारणा को व्यक्त करने के उद्देश्य से विष्णु प्रभाकर ने ‘अर्द्धनारीश्वर’ के एक स्त्री पात्र के माध्यम से मार्मिक चोट की है उस समाज पर जिसने स्त्री को केवल भोग्या माना है - “’’मैं इसमें इतना और जोड़ सकती हूँ कि पाँच पांडवों की पत्नी द्रौपदी भी कृष्ण की सखी है, उसका चीर वही तो बढ़ाता है. मैं पूछती हूँ कि किसी ने समझा है इस प्रतीक का अर्थ? समझा होता तो क्यों होतीं वधू-दहन और बलात्कार की असंख्य जघन्य घटनाएँ इस देश में?”’’

पुरुष समाज यह कहता थकता नहीं कि ‘स्त्री कभी मुक्त नहीं हो सकती.’ वह कभी कभी यह कहकर भी स्त्री को निराश करता रहता है कि ‘मुक्ति बाहर वालों से ही नहीं, अपने अंतरमन से भी पानी होती है.’ ऐसे कहने वालों के समक्ष विष्णु प्रभाकर ने भारतीय वाङ्मय में समग्रता की खोज करते हुए उदाहरण दिए हैं – “राम की मर्यादा से कृष्ण की लीला तक की यात्रा मनुष्य की शब्द से अर्थ तक की यात्रा है. सत्य की खोज की जननी यात्रा है. सत्य तो ‘नेति नेति’ है. निरंतर यात्रा करता है. सत्य की इस विकास यात्रा से ही सारा वाङ्मय, सारा विज्ञान, सारी संस्कृति विकसित हुई है. इसलिए हर युग में कविता के छंद वाल्मीकि से व्यास तक और जीवन के छंद राम से कृष्ण तक निरंतर यात्रा करते हैं. राम शब्दों की यानी नियमों की कारा में बंद है. क्योंकि विकसित होते समाज में उसकी जरूरत होती है. यही नैतिकता है, लेकिन शब्द जब अर्थ खोकर जड़ हो रहते हैं तब कृष्ण आकर शब्दों की कारा से यानी जड़ नैतिकता से मुक्ति का संदेश देते हैं.”. अब समय आ गया है कि भारतीय समाज जड़ नैतिकता से मुक्त हो और स्त्री को उसकी मानवीय गरिमा तथा स्त्रीत्व का सम्मान बहाल करे ताकि स्त्री-जीव होना अधमता न माना जाए वरना न तो भ्रूण हत्याएं थमेंगी, न बलात्कार – क्योंकि ये तमाम स्त्रीविरोधी अपराध इसीलिए विद्यमान हैं कि हम सच्चे हृदय से स्त्री और स्त्रीत्व का सम्मान नहीं करते.

इसे शुभ लक्षण माना जाना चाहिए कि आज समाज भी जाग रहा है और स्त्री भी अपनी चिर निद्रा से जाग चुकी है. वह अपने अधिकारों के प्रति सजग हो उठी है. शिक्षा ने उसे आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाया है. वह आज यह सवाल कर रही है कि “हमें अपने युग की आचार संहिता, अपने युग की स्मृति बनाने का अधिकार क्यों न मिले? ऐसी स्मृति जिसमें नारी की स्वतंत्र सत्ता हो. मनुष्य-मनुष्य में सामाजिक स्तर पर कोई भेद-विभेद न हो. दलित कोई न हो. नर नर हो– नारी नारी.”

स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं. इनमें से कोई उच्च या कोई निम्न नहीं है. दोनों का अस्तित्व बराबर है. दोनों ही इंसान हैं. इस तथ्य को समझने के लिए पहले हमारे भीतर निहित अहं को समाप्त करना होगा. इस संबंध में विष्णु प्रभाकर का कथन द्रष्टव्य है – ‘“बस ‘मैं’ को मारना है. यानी ‘स्वयं’ को ‘स्व’ से मुक्त करना है आदमी बनना है.’ ” भले ही भारतीय संस्कृति विरोधाभासों से आप्लावित हो उसे स्त्रीत्व की गरिमा को, उसकी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करके पुष्ट किया जा सकता है. “प्रश्नाकुलता, चिरंतन खोज के आधार पर आज एक नई स्मृति, एक नई संहिता की आवश्यकता है.

यह सब महज कागज़ी बातें होने से काम नहीं चलेगा. भाषण झाड़ने से कोई फायदा नहीं होगा. अगर समाज में स्त्री को गरिमामय स्थान प्राप्त होना है तो ऑपेरेशन करके स्त्रीविरोधी सड़े-गले विचारों को काट फेंकना होगा. “कलम की नोक से कागज़ पर कुछ भी लिखा जा सकता है. आवश्यकता है हमारी मज्जा में पैबस्त हुए विचारों को ऑपरेशन करके निकाल फेंकने की, मन के पटल पर खिंचे दायरों को मिटाने की, लेकिन हर समाज शक्ति की भाषा समझता है. शक्ति तलवार में नहीं, विचारों में होती है. अतः वैचारिकता में मूलगामी बदलाव लाने के लिए सभी स्तरों पर प्रयास ज़रूरी है ताकि पुरुषवर्चस्व के टूटने को सहजता से स्वीकार करके समाज स्त्री का सम्मान लौटा सके.

स्मरण रहे कि अतीत हमारी शक्ति है पर वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता, हमारे वर्त्तमान और भविष्य पर आरोपित नहीं हो सकता. अतीत से शक्ति वैसे ही मिलती है जैसे वृक्ष को जड़ों से, लेकिन जड़ कभी ऊपर नहीं फैलती; ताल में रहकर ही वह वृक्ष को पुष्पित, पल्लवित करती है. जड़ ही तो बीज है और बीज के भीतर ही कोंपल फूटती है, तभी वह धन्य होता है.” विष्णु प्रभाकर कहते हैं कि “हमारा सामाजिक ढांचा युगों पूर्व बनी स्मृतियों और संहिताओं पर आधारित है. हिंदू समाज में, जो प्राचीन काल में आर्य या भारतीय समाज था, चौथी या छठी शताब्दी के बाद कोई नई स्मृति नहीं बनी. जैन समाज बहुत प्राचीन है, पर उनकी ऐसी कोई स्मृति नहीं . बौद्धों में भी अपनी कोई विशेष परंपरा नहीं है. ईसाई, मुसलमान – इन अल्पसंख्यक समाजों की अपनी परम्परा है, वही भी दो हजार – डेढ़ हजार वर्ष पुरानी है. आदिवासियों के अपने अलिखित क़ानून हैं. सिख, ब्रह्म समाज, आर्य समाज आधुनिक भारत की देन हैं, लेकिन इनके विधि-विधान में विशेष नया नहीं है. अब जब हम सब सुगठित समाज के रूप में जीना चाहते हैं तो हमें आधुनिक मानव मूल्यों पर आधारित एक सांझी सामाजिक संहिता की रचना करनी होगी.”

अंततः विष्णु प्रभाकर अर्धनारीश्वर को एक और अर्थ देते है. वह यह कि भारत में स्त्री न्याय चाहती है लेकिन पुरुष से मुक्ति नहीं. आज उसमें यह कहने का साहस आ गया है कि “बलात्कार से सतीत्व नष्ट होता हो तो हो, पर नारीत्व नष्ट नहीं होता. और नारी के लिए नारीत्व सर्वोपरि है.” स्त्री-गरिमा और स्त्री-मुक्ति का यह अर्थ कदापि नहीं कि स्त्री अपनी कोमल भावनाओं को छोड़ दे. स्त्री, स्त्री भी रहे, अपनी संवेदनाओं और सुकोमलता को बरकरार रखे और साथ ही मनुष्य भी बने. उसे शिकार न होना पड़े. वह अपमानित महसूस न करे. आज वह कह रही है, “मैं वही हूँ. वही रहूँगी जो शंकर के अर्द्धनारीश्वर के रूप में कल्पित की गई है.”

सोमवार, 4 मार्च 2013

सामान्य साहित्य

[प्रो. ऋषभ देव शर्मा के कक्षा-व्याख्यान पर आधारित ]

तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन करते समय तीन परस्पर निकटस्थ अवधारणाओं से टकराना पड़ता है. ये हैं – राष्ट्रीय साहित्य (National Literature), विश्व साहित्य (World Literature) और सामान्य साहित्य (General Literature). प्रो. इंद्रनाथ चौधुरी ने ‘तुलनात्मक साहित्य की भूमिका’ में इन अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए तुलनात्मक साहित्य और सामान्य साहित्य के संबंध पर सम्यक प्रकाश डाला है. 

साधारण रूप से सामान्य साहित का अर्थ हम किसी भी साहित्य के प्रचलित स्वरूप से लगा सकते हैं. परंतु यहाँ यह एक पारिभाषिक पद के रूप में व्यवहृत है जिसकी अलग अलग विद्वानों ने अलग अलग परिभाषाएँ दी हैं. जैसे – सामान्य साहित्य का प्रारंभिक अर्थ था काव्यशास्त्र या साहित्य सिद्धांत का अध्ययन. जेम्स मांटुगमरी ने 1833 में सामान्य साहित्य पर भाषण देते हुए इसके अंतर्गत काव्यशास्त्र अथवा सामान्य सिद्धांत पर ही चर्चा की थी. इसे प्रकार इरविन कोपेन ने तो स्पष्ट कहा है की सामान्य साहित्य मूलतः साहित्य सिद्धांत ही है. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए हार्स्ट फ्रेंज़ ने कहा ही कि सामान्य साहित्य से तात्पर्य है साहित्यिक प्रवृत्तियों, समस्याओं एवं सिद्धांतों का सामान्य अध्ययन अथवा सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन. यहाँ यह बात स्मरणीय है कि तुलनात्मक साहित्य भी साहित्य सिद्धांत अथवा काव्यशास्त्र का भी अध्ययन करता है. मगर उसके अध्ययन की पद्धति तुलनात्मक होती है जबकि सामान्य साहित्य इस प्रकार की किसी पद्धति का निर्धारण नहीं करता. 

दरअसल सामान्य साहित्य पद का प्रयोग कुछ पाठ्यक्रमों में परस्पर अंतर को दर्शाने के लिए किया जाता रहा है. जैसे कि अमेरिका में सामान्य साहित्य उन विदेशी साहित्य के पाठ्यक्रमों या प्रकाशनों के लिए किया जाता है जो या तो अंग्रेज़ी अनुवादों में उपलब्ध हैं या राष्ट्रीय साहित्य के पाठ्यक्रमों के अंतर्गत स्वतंत्र अध्ययन के विषय हैं. कभी कभी अनेक साहित्यों की कृतियों के संग्रह, आलोचनात्मक अध्ययन या विवरण को भी इस वर्ग में स्थान दिया जाता है. परंतु लगभग ऐसी ही विषयों के लिए अलग अलग संदर्भों में तुलनात्मक साहित्य और विश्व साहित्य जैसे नामकरण भी कम में लिए जाते हैं. अतः कहना होगा कि सामान्य साहित्य की अवधारणा बहुत स्पष्ट नहीं है. रेनेवेलक ने भी इसे अयुक्तियुक्त और अव्यावहारिक माना है. वान्टिग्हेम ने तुलनात्मक और सामान्य साहित्य का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा है कि तुलनात्मक साहित्य दो साहित्यों के आपसी संबंधों के अध्ययन तक सीमित है जबकि सामान्य साहित्य का संबंध उन आंदोलनों और फैशनों से है जो अनेक साहित्यों में विद्यमान दिखाई देते हैं. इसमें संदेह नहीं कि यह अंतर भी बहुत सूक्ष्म अंतर है और इन दोनों प्रकार के साहित्यों की सीमाएँ एक-दूसरे पर अपनी छाया अवश्य डालती हैं. 

अनतः क्रेग के निम्नलिखित मत को यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा कि – 

“राष्ट्रीय साहित्य की चारदीवारी के भीतर जो अध्ययन है वह राष्ट्रीय साहित्य है और इस चारदीवारी के परे साहित्य का अध्ययन तुलनात्म साहित्य है तथा दीवारों के ऊपर जो साहित्यिक अध्ययन है वह सामान्य साहित्य है.” 

जैसा कि प्रो.चौधुरी ने कहा है कि पता नहीं इस प्रकार के सीमा निर्धारण से इनमें अंतर निश्चित होता पाता है या नहीं परंतु इनके पारस्परिक संबंध अपने आप में बहुत स्पष्ट है. 

द्रष्टव्य - इंद्रनाथ चौधरी, तुलनात्मक साहित्य की भूमिका, पृ. 23-26

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

राष्ट्रीय साहित्य और विश्व साहित्य

[प्रो.ऋषभ देव शर्मा के कक्षा-व्याख्यान पर आधारित]

मनुष्य मात्र की भावनाओं, राग-विराग और संवेदनशीलता की समानता के आधार पर यह माना जाता है कि मनुष्य जाति की एक समेकित संस्कृति है. इस समेकित संस्कृति का निर्माण करने के लिए अलग-अलग देशकाल में मनुष्यों के समूहों ने जो अलग-अलग प्रयत्न किए, साधनाएँ कीं उनका समेकित रूप ‘विश्व संस्कृति’ है और यह उन मानव समूहों के अपने अपने साहित्यों के माध्यम से व्यक्त होती है. इन अलग अलग देशकाल में रचित साहित्यों के समेकित रूप का नाम ही ‘विश्व साहित्य’ है. स्मरणीय है कि अलग अलग देशकाल और जाति समूहों से संबंधित होते हुए भी अपनी मूल संवेदना में ये सारे साहित्य परस्पर अविरोधी होते हैं क्योंकि ये संबंधित जातियों के, मनुष्यों के सांस्कृतिक प्रयत्न है. इसी प्रकार किसी राष्ट्र के अलग अलग भाषा-भाषी समुदायों द्वारा अपनी संस्कृति के उत्थान और अभिव्यक्तीकरण के क्रम में रचे गए भिन्न भिन्न भाषाओं के साहित्य का समेकित रूप उस देश का ‘राष्ट्रीय साहित्य’ होता है. हम यह भी कह सकते हैं कि राष्ट्रीय साहित्य भिन्न भिन्न भाषाओं में रचे जाने के बावजूद उस राष्ट्र की सामासिक पहचान को व्यक्त करता है और विश्व साहित्य अलग अलग राष्ट्रों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों में निहित समग्र मानव चेतना का सम्पुंजन होता है. राष्ट्रीयता और वैश्विकता यहाँ परस्पर पूरक भाव से जुड़ी होती हैं, अविरोधी होती हैं अतः विश्व साहित्य, साहित्य के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र को संभव कर दिखाता है. जहाँ विभिन्न राष्ट्रीय अस्मिताएँ विश्व नागरिक की भाँति एक-दूसरे के साथ अस्तित्व में रहती हैं. 

यहाँ प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का यह कथन द्रष्टव्य है कि “भारत एक बहुभाषी देश है. यहाँ न केवल 1652 मातृभाषाएँ हैं अपितु अनेक समुन्नत साहित्यिक भाषाएँ भी हैं. पर जिस प्रकार अनेक वर्षों के आपसी संपर्क और सामाजिक द्विभाषिकता के कारण भारतीय भाषाएँ अपनी रूप रचना में भिन्न होते हुए भी आर्थी संरचना में समरूप हैं, उसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि अपने जातीय इतिहास, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक मूल्य एवं साहित्यिक संरचना के संदर्भ में भारतीय साहित्य एक है, भले ही वह विभिन्न भाषाओं के अभिव्यक्ति माध्यम द्वारा व्यक्त हुआ है.” यदि इस संकल्पना का आगे विस्तार करें और भाषा भेद की सीमा को तोड़कर मनुष्य के इतिहास और विकास के देखने का प्रयत्न करें तो विश्व साहित्य की अवधारणा सामने आती है. वास्तव में प्रत्येक भाषा के साहित्य की विषय वस्तु और रूप अभिव्यक्ति एवं उसकी मूल्य चेतना और विधा निरूपण के इतिहास का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी हुआ करता है जो उसे क्रमशः राष्ट्रीय साहित्य और विश्व साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करता है. 

राष्ट्रीय साहित्य 

वस्तुतः राष्ट्रीय साहित्य द्वारा तुलनात्मक साहित्य का आधार तैयार होता है. इसे यों भी कह सकते हैं कि तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही राष्ट्रीय साहित्य और उसमें निहित राष्ट्रीयता की तत्वों की पहचान की जा सकती है. इसीलिए आर. ए. साइसी ने तुलनात्मक साहित्य को ‘विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यों का एक-दूसरे से आश्रय से तुलनात्मक संबंधों का अध्ययन’ कहा है. इसी प्रकार गोयते ने विश्व साहित्य के संदर्भ में अपनी साहित्यिक परंपराओं से इतर दूसरी परंपराओं के बोध को अनिवार्य माना है. ऐसा करने से विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे को पहचान या समझ सकते हैं तथा अगर एक-दूसरे से प्रेम न भी कर सकें तो कम-से-कम एक-दूसरे को बर्दाश्त करना तो सीख सकते हैं. वास्तव में आपसी पहचान आदान-प्रदान द्वारा राष्ट्रीय साहित्य अपनी विलक्षणता को बनाए रख सकता है. 

जैसा कि पहले भी कहा गया भारत जैसे बहुभाषी देश में राष्ट्रीय साहित्य का अर्थ है विभिन्न भाषाओं में राष्ट्रीय संस्कृति और मूल्यों की अभिव्यक्ति. इसके लिए तुलनात्मक पद्धती का सहारा लिया जाता है. और यह भी देखा जाता है कि किसी साहित्यिक कृति को दूसरे भाषा भाषियों द्वारा किस प्रकार ग्रहण किया जाता है. या कोई एक साहित्य दूसरे साहित्य पर किस प्रकार प्रभाव डालता है. उदाहरण के लिए हम बंगला और तेलुगु के संबंध की चर्चा कर सकते है. बंगला के कथा साहित्य को तेलुगु में इतनी सहजता से ग्रहण किया जाता है कि बहुत से पाठक तो शरत को बंगला के बजाए तेलुगु का ही साहित्यकार समझते हैं. रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्य ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य पर जो प्रभाव डाला वह भी भारत के राष्ट्रीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण भाग है. इसी प्रकार बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर के चिंतन से प्रभावित होकर जब मराठी में दलित साहित्य का उदय हुआ तो उसका प्रभाव तेलुगु, हिंदी, उर्दू, पंजबी यहाँ तक की समकालीन संस्कृत साहित्य पर भी पड़ा – यह भारतीय साहित्य की समस्वरता का द्योतक है. इतना ही नहीं अलग अलग प्रांत की प्रबुद्ध महिलाओं ने अलग अलग भाषाओं में भले ही स्वयं को अलग अलग प्रकार से अभिव्यक्त किया हो लेकिन स्त्री विमर्श आज किसी एक भाषा के साहित्य की प्रवृत्ति न होकर भारतीय साहित्य की समेकित प्रवृत्ति है. ओल्गा और घंटसाला निर्मला भले ही तेलुगु की कवयित्रियाँ हों, अनामिका और कात्यायिनी हिंदी की हों, निर्मला पुतुल संताली की हों, दर्शन कौर और तरन्नुम रियाज़ पंजाबी की हों – इन सबके द्वारा स्त्री की यातना का चित्रण एक जैसा है और समग्रतः भारतीय स्त्री की यातना का द्योतक है. यह समरसता ही इस तमाम स्त्री विमर्श को भारतीय साहित्य का हिस्सा बनाती है. 

इसी प्रकार विभिन्न भाषाओं के साहित्य में प्रयुक्त अंतरवस्तु, मोटिफ, मिथक और काव्य सौंदर्य के उपकरण भी मिलकर किसी देश की राष्ट्रीय साहित्य का रूप निर्धारण करते हैं. अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीय साहित्य किसी राष्ट्र की किसी एक भाषा का नहीं बल्कि उसकी विभिन्न भाषाओं के उस साहित्य का सामासिक रूप होता है जिसमें उसके नागरिकों की सांस्कृतिक चेतना और एक समान संवेदना प्रतिबिंबित होती है. यहाँ हम भारतीय साहित्य के संदर्भ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के एक काव्यांश को देख सकते हैं जिसमें प्रकारांतर से भारत के राष्ट्रीय साहित्य की पहचान का सूत्र दिया गया है - 

“भारत नहीं स्थान का वाचक, 

गुण-विशेष नर का है, 

एक देश का नहीं, 

शील वह भूमंडल भर का है. 

जहाँ कहीं एकता अखंडित, 

जहाँ प्रेम का स्वर है 

देश देश में वहाँ खड़ा 

जीवित भारत भास्वर है.” 

विश्व साहित्य 

विश्व साहित्य की अवधारणा का आधार आरंभ में यूरोप का दृष्टिकोण रहा जिसके अनुसार विश्व साहित्य का प्रारंभिक अर्थ यूरोपीय साहित्य तक सीमित था. गोयते ने भी ‘वेल्ट लित्रातुर’ पद का प्रयोग इसी अर्थ में किया था. इसमें संदेह नहीं कि यह अर्थ अत्यंत सीमित था और आज इसे स्वीकार नहीं किया जाता. 

20 वीं शताब्दी में विश्व साहित्य के अर्थ में क्रांतिकारी परिवर्तन आया. विश्व के बारे में जो यूरोप केंद्रित जातिगत विशिष्ट अवधारणा थी, उसके अर्थ में एक खास तरह की व्यापकता आई. इस प्रकार विश्व साहित्य का दायरा यूरोप के बाहर तक फ़ैला और उसके अंतर्गत विश्व के दूसरे क्षेत्रों के साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन को स्थान दिया गया. अब विश्व साहित्य का तात्पर्य है – पृथ्वी के किसी भी साहित्य का अध्ययन. अर्थात सार्वभौमिक स्तर पर साहित्य के इतिहास को ही विश्व साहित्य माना जाता है. प्रो.इंद्रनाथ चौधुरी ने लिखा है कि ‘विश्व साहित्य के इतिहास विषयक ग्रंथों में विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यों को विभिन्न माध्यमों में बाँट कर या एक-दूसरे के सान्निध्य में रखकर अध्ययन किया जाता है. या फिर विश्व साहित्य के विभिन्न आंदोलनों, प्रवृत्तियों या कालों का विवरण देते हुए विश्लेषण होता है.’ जे.ब्रांट कॉर्स्टियस (J. Brandt Corstius) ने इस प्रकार रचे गए विश्व साहित्य के इतिहास की संभावनाओं और सीमाओं का विस्तार से विवेचन किया है. स्पष्ट है कि विश्व साहित्य बड़ी सीमा तक राष्ट्रीय साहित्यों का समूह है अतः इसमें राष्ट्र अथवा देश का तत्व जुड़ा रहता है. कहना न होगा कि इस तत्व के कारण ही विश्व साहित्य की तुलनात्मक दृष्टि का विकास होता है और वे बिंदु उभरते हैं जो विभिन्न राष्ट्रों के साहित्यों में व्यक्त होनेवाली मानव जाति की एक जैसी चिंताओं को दर्शित है. 

विश्व साहित्य का एक अर्थ यह भी है कि केवल देश ही नहीं ‘काल’ के संदर्भ में भी जो महान है अर्थात काल की कसौटी पर जिसकी श्रेष्ठता सिद्ध हो चुकी है वह कालजयी और श्रेष्ठ साहित्य विश्व साहित्य है. जैसे ‘डिवाइन कॉमेडी’, ‘डान कोहटे’, ‘पैराडाइज लॉस्ट’, ‘अभिज्ञान शाकुंतल’, ‘कुमार संभव’ आदि की श्रेष्ठता देश और काल से ऊपर है. अतः ये अपने अपने राष्ट्र और भाषा की महान कृतियाँ तो है ही. विश्व साहित्य का भी अमर धरोहर हैं. इतना ही नहीं वर्तमान में भी जिन रचनाओं को अपने राष्ट्र के परिधि के बाहर प्रसिद्धि प्राप्त होती है उन्हें भी विश्व साहित्य के अंतर्गत गिना जाता है. परंतु यह विश्व साहित्य का गौण अर्थ है. विश्व साहित्य का मुख्य स्वरूप तो समस्त राष्ट्रों के साहित्य के समुच्चय द्वारा ही प्रकट होता है. 

फ्रिट्ज स्टाइच के अनुसार विश्व साहित्य के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं – 
  1. अपने राष्ट्रीय साहित्य की परम्परा के साथ ही दूसरे राष्ट्रीय साहित्यों की परम्पराओं से परिचित होना.
  2. दूसरे देशों या भाषाओं में लिखित साहित्य के प्रति खुलापन रखना. 
  3. विभिन्न साहित्यों में परस्पर आदान-प्रदान का अवसर देना. 

विश्व साहित्य के इस स्वरूप के अंतर्गत प्रकाशित ग्रंथों के शीर्षकों की सहायता से भी समझा जा सकता है. जैसे लेयार्ड द्वारा संपादित ‘The World Through Literature’ और ‘रिप्ले’ द्वारा संपादित ‘Dictionary of World Literature’ अथवा ‘ Encyclopaedia of Literature’ में भी विश्व साहित्य की यही संकल्पना स्वीकार की गई है. तुलनात्मक साहित्य की पद्धतियों का विश्व साहित्य के अध्ययन के लिए उपयोग सहज है, परंतु अनिवार्य नहीं. अर्थात विविध साहित्यों की तुलना के स्थान पर उनका संकलन करना भी विश्व साहित्य के लिए पर्याप्त है. उदाहरण के लिए यदि तुर्गनेव, हाथॉर्न, थैकरे और मोपसां के निबंधों के संकलन को ‘Figures of World Literature’ नाम दिया जाए तो यह सहज ही विश्व साहित्य के अंतर्गत स्वीकार्य होगा. भले ही इसमें तुलनात्मक अध्ययन संमिलि हो या न हो. 

विश्व साहित्य का भारतीय संदर्भ 

विश्व साहित्य पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में विचार करते हुए प्रो.इंद्रनाथ चौधुरी ने ‘तुलनात्मक साहित्य की भूमिका’ में यह बताया है कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने सन् 1907 में तुलनात्मक साहित्य के लिए ‘विश्व साहित्य’ शब्द का प्रयोग किया था. कवींद्र रवींद्र यह मानते थे कि यदि हमें उस मनुष्य को समझना है जिसकी अभिव्यक्ति उसके कर्मों, प्रेरणाओं और उद्देश्यों में होती है तो संपूर्ण साहित्य के माध्यम से उसके अभिप्रायों से परिचित होना होगा. वास्तव में मनुष्य इतिहास में स्थानीय या सीमित व्यक्ति की अपेक्षा शाश्वत या सार्वभौमिक मनुष्य को देखना चाहता है. उसकी इस अपेक्षा को विश्व साहित्य ही पूरा करता है. विश्व साहित्य में मनुष्य अपनी आत्मा के आनंद को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है. अतः विश्व साहित्य की एक बड़ी कसौटी उसमें मनुष्य की आत्मा के आनद और रागात्मक संबंधों की अभिव्यक्ति को माना जा सकता है. 

रवींद्रनाथ ठाकुर के अनुसार ‘जिस प्रकार यह विश्व जमीन के टुकड़ों का योगफल नहीं है उसी प्रकार साहित्य विभिन्न लेखकों द्वारा रचित कृतियों का योगफल नहीं है. हमें राष्ट्रीयता की संपूर्ण मनोवृत्ति से अपने को मुक्त करना है. प्रत्येक कृति को उसकी संपूर्ण इकाई में देखना है और इस संपूर्ण इकाई या मनुष्य की शाश्वत सृजनशीलता की पहचान विश्व साहित्य के द्वारा ही हो सकती है.’ 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य मनुष्य की शाश्वत सृजनशीलता की खोज का परिणाम है तथा विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यों का समुच्चय होता हुए भी वह राष्ट्रीय संकीर्णताओं से मुक्त तथा 'वसुधैव कुटुंबकं'  की वैश्विक चेतना से अनुप्राणित होता है. 


संदर्भ : 

1तुलनात्मक साहित्य की भूमिका – इंद्रनाथ चौधुरी, 1983, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास, टी.नगर, चेन्नई - 600017 

2. भारतीय साहित्य : अवधारणा, समन्वय एवं सादृश्य, (सं) जगदीश यादव, 2011, सिंघई पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, एल-654, सेक्टर – 2, आर.एस.यूनिवर्सिटी, रायपुर - 492010 

3. भारतीय साहित्य की पहचान, (सं) डॉ.सियाराम तिवारी, 2009, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, तीसरा तल, बिस्कोमान भवन, पश्चिमी गांधी मैदान, पटना - 800001

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

पहले अन्न-वस्त्र की व्यवस्था करो, फिर भागवत सुनना-सुनाना

‘’तुम लोग क्या कर रहे हो? ... जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? ...किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशीगीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी-जान से तडप रहे हो - यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुंड के झुंड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ' रोटी दो, रोटी दो ' चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड-मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि 'हाँ' तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पीछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क वाले युवकों का, पशुओं का नहीं।‘’ - स्वामी विवेकानंद. 

स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी, 1863 – 4 जुलाई 1902) भारतीय नवजागरण काल के उन पुरोधाओं में है जिन्होंने दबी-कुचली भारतीय अस्मिता को उसकी मौलिक तेजस्विता पुनः प्रदान की और दुनिया को बताया कि ज्ञान-विज्ञान, चिंतन-दर्शन, साहित्य-वाङ्मय और भौतिक-आधिभौतिक सभी क्षेत्रों में भारतीय सभ्यता अग्रणी रही है. वे ऐसे संस्कृति पुरुष हैं जिन्होंने भारत की लंबी गुलामी के कारणों को भी विवेचित किया और भारतीयों की अकर्मण्यता पर आक्रोश भी व्यक्त किया. नवजागरणकालीन सामाजिक नेता के नाते विवेकानंद ने युवा वर्ग को उपनिषद की वाणी में संबोधित करते हुए उठने, जागरूक रहने और कर्मठ जीवन जीने के लिए सचेत किया. यही कारण है कि देशकाल की सीमाओं के परे युवा वर्ग को सकारात्मक चिंतन से ओतप्रोत करने के लिए आज भी उनकी वाणी अत्यंत प्रासंगिक है. 

स्वामी विवेकानंद ने युवा पीढ़ी के सामने सदा सकारात्मक सोच का आदर्श रखा. वे मानते थे कि निषेधात्मक विचार लोगों को दुर्बल बना देते हैं जब कि सकारात्मक विचार मनुष्यत्व का संचार करते हैं और व्यक्ति को अपने पैरों पर खडा होना सिखाते हैं. उनकी मान्यता थी कि राष्ट्र निर्माण के लिए चरित्रवान युवकों की आवश्यकता होती है और सद्चरित्रता की नींव शिक्षा द्वारा मजबूत बनाई जा सकती है. इसलिए वे चाहते थे कि राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुसार शिक्षा में परिवर्तन होना चाहिए. जानकारी और बोध का अंतर करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि तुम केवल पाँच ही परखे हुए विचार आत्मसात कर उनके अनुसार अपने जीवन और चरित्र का निर्माण कर लेते हो, तो तुम एक पूरे ग्रंथालय को कंठस्थ करने वाले की अपेक्षा अधिक शिक्षित हो. यदि शिक्षा का अर्थ जानकारी ही होता, तब तो पुस्तकालय संसार में सब से बड़े संत हो जाते और विश्वकोश महान ऋषि बन जाते. 

आधुनिक संदर्भ में यह याद रखना उपयोगी हो सकता है कि विवेकानंद भारतीय संस्कृति के जड़ और रूढ़ अंशों को बाहर निकाल फेंकने के पक्षधर थे. उन्होंने देखा कि अभिजात उच्च वर्णों ने अपने स्वार्थ के लिए समाज को इस तरह विभाजित कर रखा है कि मनुष्य मनुष्य का दास बना हुआ है. उन्होंने अफ़सोस ज़ाहिर किया कि हमारे अभिजात पूर्वज साधारण जन समुदाय को ज़माने से पैरों तले कुचलते रहे जिस कारण वे बेचारे एकदम इतने असहाय हो गए कि अपने आप को मनुष्य मानना भी भूल गए. देश की युवा शक्ति का आह्वान करते हुए इसीलिए विवेकानंद ने कहा कि इस बात को हमेशा ध्यान रखो कि राष्ट्र झोंपडियों में बस्ता है. किसान, जूते बनाने वाले, मेहतर और भारत के ऐसे ही निचले वर्गों में तुमसे कहीं ज्यादा काम करने और स्वावलंबन की क्षमता है. वे लोग युग-युग में चुपचाप काम करते रहे हैं. वे ही है, जो इस देश की समस्त संपदा के उत्पादक हैं. फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की. अभिजात वर्ग को सचेत करते हुए विवेकानंद ने यहाँ तक कहा कि तुम लोगों ने अब तक इस जनता को दबाया है, अब उनकी बारी है और तुम लोग रोजगार की तलाश में भटकते-भटकते नष्ट हो जाओगे, क्योंकि यही तुम्हारे जीवन का सर्वस्व बन गया है. 

उल्लेखनीय है कि अपने एक व्याख्यान में जातिभेद का खंडन करते हुए विवेकानंद ने कहा कि - भारत के इन दीन-हीन लोगों को, इन पददलित जाती के लोगों को, उनका अपना वास्तविक रूप समझा देना परमावश्यक है. जात-पाँत का भेद छोड़कर, कमजोर और मजबूत का विचार छोड़कर, हर एक स्त्री-पुरुष को, प्रत्येक बालक-बालिका को, यह संदेश सुनाओ और सिखाओ कि ऊँच-नीच, अमीर-गरीब और बड़े-छोटे, सभी में उसी एक अनंत आत्मा का निवास है, जो सर्वव्यापी है; इसलिए सभी लोग महान तथा सभी लोग साधु हो सकते हैं. आओ हम प्रत्येक व्यक्ति में घोषित करें – उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत – ‘उठो, जागो और जब तक तुम अपने अंतिम ध्येय तक नहीं पहुँच जाते, तब तक चैन न लो.’ 

विवेकानंद के इस संदेश को अगर हम कोरा आध्यात्मिक संदेश मान लेंगे तो बड़ी भूल होगी. अध्यात्म से पहले वे भारतीयों को भौतिक उपलब्धियों के क्षेत्र में, अन्न-वस्त्र के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए करते हैं. उन्होंने एक स्थान पर पूछा है, ‘अन्न-वस्त्र की कमी और उसकी चिंता से देश बुरी अवस्था में चला जा रहा है – इसके लिए तुम लोग क्या कर रहे हो?’ और दृढ़ शब्दों में निर्देश दिया है, ‘फेंक दो अपने शास्त्र-वास्त्र गंगा जी में. देश के लोगों को पहले अन्न की व्यवस्था करने का उपाय सिखा दो. इसके बाद उन्हें भागवत का पाठ सुनाना. कर्मतत्परता के द्वारा इहलोक का अभाव दूर न होने तक कोई धर्म की कथा ध्यान से न सुनेगा. इसीलिए कहता हूँ, पहले अपने में अंतर्निहित आत्मविश्वास को जाग्रत कर, फिर देश के समस्त व्यक्तियों में जितना संभव हो, उस शक्ति के प्रति विश्वास जगाओ. पहले अन्न की व्यवस्था कर, बाद में उन्हें धर्म प्राप्त करने की शिक्षा देना. अब अधिक बैठे रहने का समय नहीं – कब किसकी मृत्यु होगी, कौन कह सकता है?’ 

स्वामी विवेकानंद ने हर प्रकार की धर्मान्धता और शोषण का विरोध किया. यहाँ तक कि शिकागो में दिए 1893 के विश्व धर्म महासभा के संबोधन में भी उन्होंने बड़ी तड़प के साथ यह कहा था कि सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं. वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं. यदि ये बीभत्स चुड़ैलें न होतीं, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता. कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमारा प्यारा भारत वर्ष आज भी सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और धर्मान्धता रूपी इन तीन चुड़ैलों के शिकंजों में फँसा हुआ है जिनसे मुक्त होने के लिए विवेकानंद के मानवता और राष्ट्रीयता का समन्वय करने वाले विचारों की आज पहले से ज्यादा जरूरत है.