सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

Role of Language Classrooms in Transforming the students into Better Citizens


I got an opportunity to hear the renowned Resouce Person Prof. Gopal Sharma (Professor, Department of English Language and Literature, Arba Minch University, Ethiopia) on "THE ROLE OF LANGUAGE CLASSROOMS IN TRANSFORMING THE STUDENTS INTO BETTER CITIZENS" in an international webinar conducted by English department of Sardar Patel College, Secunderabad in collaboration with IQAC.

I am presenting a zist of it what I recollected.

1. It's a well known fact that every language has 4 SKILLS - LSRW - Listening, Speaking, Reading📖 and ✍️Writing. But there is one more skill which is very important and that is the CRITICAL THINKING. This will transform students 👩 into better students👩‍🎓

2. Language is the medium of expression. So we have to use positive ➕ language. We can comment on one's behavior to change them and their arrogant attitude but we should never comment ON THEM. If we comment on them there is a possibility for that student Or a person to develop negativity ❎ We should never hurt one's feelings with our vocabulary. So we should be careful while speaking. We should never use such a language which focuses on the weakness of a person. We should use the language that focuses on self-esteem.

3. Every student 👩‍ is unique and different. Hence the teacher 👩‍🏫‍ should be flexible and also should give space to students. And the student👩‍🎓 should also be responsible. Flexibility should not be taken for granted.

4. Most of the things can be corrected ✅ if we adopt ALLNESS AND TOGETHERNESS along with the INVOLVEMENT.

5. Always a teacher 👩‍🏫‍ should be an observant. When he or she is an observant then they can create a lively, interactive and a happy atmosphere in the classroom.

6. An observant teacher can bring out the unique talents hidden in the students. A teacher should become a role model for the students.

7. A teacher can expect more from the students. High expectations must be there so that they can encourage students to face challenges and to prove themselves.

8. Everyone should cross the gender wall to achieve the goal.

9. We all should know that THE REAL CLASSROOM IS AN EXTENDED FORM. IT IS NOT RESTRICTED TO THE FOUR 4⃣ WALLS.

10. Hence keep a broader aspect. We are all equally responsible to create a healthy atmosphere in the classrooms.

11. Then definitely students 👩‍🎓can be transformed into better CITIZENS.

"WE SEEK HARM TO NONE
AND HARMONY TO ALL" (AMANDA GORMAN)

(This is just a zist of what I recollected.)

'नई कविता : साहित्यिक और सामाजिक संदर्भ' पर व्याख्यान

 

हिंदी विभाग, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर, तमिलनाडु द्वारा आयोजित एकदिवसीय व्याख्यान में विषय विशेषज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित तेवरीकार, कवि, भाषाविद, समीक्षक और शिक्षाविद प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने "नई कविता: साहित्यिक और सामाजिक संदर्भ" पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला.

उनके व्याखान का सार संक्षेप यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है.

1. सामाजिक संदर्भ के बदलने से लोगों की चित्तवृत्ति बदलती है. साथ ही साहित्य का संदर्भ भी बदल जाता है.

2. दुनिया भर में घटित परिवर्तनों से भी जनता की चित्तवृत्ति में परिवर्तन आता है.

3. तार सप्तकीय प्रयोगवादी कविता एक तरह से 'नई कविता' की भूमिका है.

4. नई कविता को दो मुख्य धाराओं में विभाजित किया जा सकता है -
(अ) आत्मनिष्ठ या व्यक्तिनिष्ठ धारा और
(आ) समाजनिष्ठ या जनवादी धारा. इन दोनों धाराओं ने नई कविता को विस्तार दिया.

5. नई कविता एक आंदोलन के रूप में उस काल खंड का एक हिस्सा है अर्थात स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर इमर्जेंसी लगने तक का समय.

6. नई कविता का सामाजिक संदर्भ उसके साहित्यिक अवदान का आधार बनाकर अभिव्यक्ति पक्ष में ढलता है.

7. नई कविता में 'नई' शब्द नवीन या काल सापेक्ष न रहकर विशिष्ट/ नए भाव बोध को व्यक्त करता है तथा 'कविता' शब्द अभिव्यक्ति के नए माध्यम और नए शैली रूपों को व्यक्त करता है.

8. 1920 में डी. एच. लारेंस ने 'न्यू पोयट्स' शीर्षक पुस्तक का संपादन किया. यहीं से नवलेखन के संदर्भ में 'न्यू/ नया' शब्द की शुरूआत हुई।

9. 1950 के आसपास समसामयिक कविता को 'न्यू पोयट्री/ न्यू वर्स' कहा जाने लगा. इसमें 'नई कविता' के वैश्विक साहित्यिक संदर्भ के सूत्र निहित हैं।

10. जी. एस. फ्रेज़र ने उस समय के नए काव्य को 'न्यू मूवमेंट' कहा.

11. डेनाल्ड हाल ने नए अमेरिकी काव्य को 'न्यू पोयट्री' कहा.

12. 1952 में आकाशवाणी, पटना के एक प्रसारण में अज्ञेय ने 'नई कविता' शब्द का प्रयोग किया. इससे पहले इलाहाबाद की 'परिमल' नामक संस्था द्वारा आयोजित एक गोष्ठी में पहली बार इस पदबंध का प्रयोग हुआ था।

13. डॉ. रामविलास शर्मा: “अज्ञेय ने सन् '37 में निराला के लिए जो लिखा था “एज ए लिटररी फोर्स, एट ऐनी रेट, निराला इज़ आलरेडी डेड", वही बात सन् '61 की नई पीढ़ी ने अज्ञेय के लिए दुहराई।"

14. 'नई कविता' की विशिष्ट संवेदना या साहित्यिक व सामाजिक लक्ष्य हैं -
¶ आधुनिक सभ्यता के आंतरिक संघर्ष की अभिव्यक्ति
¶ वैज्ञानिक एवं रूढ़ चिंतन के बीच टकराव की अभिव्यक्ति
¶ परंपरा का पुनर्मूल्यांकन
¶ बढ़ते मशीनीकरण के प्रभाव की अभिव्यक्ति
¶ युद्ध की विभीषिका का चित्रण
¶ इकाई व्यक्ति को महत्व

15. नई कविता में इकाई व्यक्ति के अस्तित्व के लिए संघर्ष है, जिजीविषा है.

16. 1990 के बाद जो विमर्शीय कविता उभरी, उसकी भूमिका नई कविता के अस्तित्व/ अस्मिता की खोज वाले मूल्य से तैयार होती है.

17. नई कविता में जहाँ 'व्यक्ति' की जिजीविषा और अस्तित्व के संघर्ष की बात है, वहीं आगे चलकर विमर्शीय कविता में यह व्यक्ति हाशियाकृत समुदाय में बदल जाता है. उस समुदाय की जद्दोजहद ही विमर्श है. जैसे स्त्री/ दलित/ अल्पसंख्यक/ आदिवासी/ इतरलिंगी विमर्श।


शुक्रवार, 1 मई 2020

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कहानियों में सुधारवादी दृष्टिकोण

साहित्यकार समाज से जुड़ा हुआ उत्तरदायी प्राणी होता है। कोई भी उत्तरदायी साहित्यकार जागरूक होता है और वह अपने समय के यथार्थ से असंतुष्ट रहता है चूँकि समाज में चारों ओर विसंगतियाँ और विकृतियाँ होती हैं। ऐसी स्थिति में साहित्य अपने आप में सुधारवादी होता है। यदि यह कहा जाए कि आदर्श और मूल्य सुधारवादी दृष्टिकोण के आधार तत्व हैं या प्रतिरूप हैं तो गलत नहीं होगा। एक तरह से आदर्श समाज की इच्छा करना सुधारवादी दृष्टिकोण का ही परिचायक है। रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ एक ऐसे ही जागरूक तथा उत्तरदायी साहित्यकार हैं। उनके साहित्य में पग-पग पर सुधारवादी दृष्टिकोण को भलीभाँति देखा जा सकता है। इसीलिए वे कहते हैं 
“लक्ष्य उसका क्या निहित, गंतव्य उसका कहाँ है, 
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ हैं।
सोच कोरी रह गई
हर श्वास दूषित हो गई,
आज तो बस हर कदम पर 
मनुजता भी रो रही।
आज तो सब छोड़ कर, इनसान ढूँढ़ो कहाँ है?
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।
आदर्श का चोला लिए/ अब बात लंबी हो गई,
मतलब नहीं इस बात का, कि
क्या गलत है क्या सही।
खो गया क्यों सत्य ढूँढ़ो, सत्यवादी कहाँ है?
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।
बंधु-बांधव को समझना 
अब दिखावा रह गया,
प्रेम था वह है कहाँ
स्वार्थ में सब बह गया।
कहाँ है आत्मीयता,बंधुत्व खोया कहाँ है?
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।” (इनसान ढूँढ़ो कहाँ हैं?)।



उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के ग्राम पिलानी में 15 अगस्त, 1959 को जन्मे रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने पत्रकारिता में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ अर्जित की हैं। वे कवि के साथ-साथ उपन्यासकार, कहानीकार, बाल साहित्यकार, यात्रावृत्तकार, निबंधकार और संपादक हैं। वे अनेक सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं। समर्पण, नवांकुर, मुझे विधाता बनना है, तुम भी मेरे साथ चलो, मातृभूमि के लिए, जीवन पथ में, कोई मुश्किल नहीं, प्रतीक्षा, ए वतन तेरे लिए आदि उनके कविता संग्रह हैं तो रोशनी की एक किरण, बस एक ही इच्छा, क्या नहीं हो सकता, भीड़ साक्षी है, खड़े हुए प्रश्न, विपदा जीवित है, एक और कहानी, मेरे संकल्प, टूटते दायरे, मील का पत्थर, केदारनाथ आपदा की सच्ची कहानियाँ आदि कहानी संग्रह हैं। निशांत, मेजर निराला, बीरा, पहाड़ से ऊँचा, छूट गया पड़ाव, अपना पराया, पल्लवी, प्रतिज्ञा, भागोंवाली, शिखरों से संघर्ष और कृतघ्न उनके उपन्यास हैं। मेरी व्यथा-मेरी कथा पत्र संकलन है। सफलता के अचूक मंत्र, भाग्य पर नहीं परिश्रम पर विश्वास करें, संसार कायरों के लिए नहीं और सपने जो सोने न दें आदि व्यक्तित्व विकास से संबंधित कृतियाँ हैं। उनके साहित्य को देश-विदेश में विश्व की विभिन्न भाषाओं जैसे- जर्मन, अंग्रेजी, फ्रेंच, तेलुगु, मलयालम, मराठी, कन्नड आदि में अनूदित किया जा चुका है।

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की दृष्टि सुधारवादी है। वे मनुष्यता को कायम रखने की बात करते हैं। उनकी कहानियों में आदर्श की स्थिति को देखा जा सकता है। वे यथार्थ की परिस्थितियों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं, उन्हें सोचने के लिए बाध्य करते हैं और उन परिस्थितियों को सुधारने के लिए राह भी सुझाते हैं। वे मानवीय मूल्यों एवं आदर्श परिवार को प्रमुखता देते हैं। ‘दे सको तो’ शीर्षक कहानी में कामिनी नितिन को उसके परिवार से अलग करना चाहती है। लेकिन नितिन यह सहन नहीं कर सकता। वह किसी भी हालत में अपने भाई से अलग नहीं होना चाहता। माता-पिता, भाई और छोटी बहन को वह पहले ही खो चुका था और शेष बचा हुआ है उसका एक मात्र भाई जिससे भी कामिनी दूर करना चाहती है। लेकिन नितिन “उससे अलग रहना तो दूर अलग होने की कल्पना तक नहीं कर सकता।” (निशंक : 2007. पृ. 8)। ज्यादा खुशियाँ पाकर नितिन सहम जाता है कहीं “ये खुशियाँ गम के बादल न बन जाएँ।” (वही)। इसीलिए वह कामिनी से कहता है कि “दे सको तो मुझे वचन दो कि मुझे भाई से अलग होने की बात नहीं कहोगी।” (वही)। यहाँ निशंक एक आदर्श परिवार की कल्पना करते हैं और यह दर्शाते हैं कि एक बार रिश्तों से दूर हो जाएँगे तो वापस मिल नहीं सकते। ‘दरार कहाँ पड़ी’ शीर्षक कहानी में भी परिवार के महत्व को दर्शाया गया है। मंगल की पत्नी कंपनी में नौकरी करती है। अहं की टकराहट के कारण छोटी-छोटी बातों पर दोनों झगड़ते रहते हैं। रिश्तों में कड़ुवाहट आ जाती है। मंगल अपने दोस्त से आक्रोश में कह उठता है - “इसने तो वर्षों पहले मुझे जीते जी मार डाला, सबसे संबंध तोड़ डाला, मेरे माँ-बाप, भाई-बहन किसी से भी तो रिश्ता नहीं रहा मेरा।” (2007 : 36)। निशंक ऐसी स्थितियों से दूर रहने की सलाह देते हैं और बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि मिलजुलकर रहने में ही सबकी भलाई है चूँकि इन सबका बुरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। रिश्तों के बीच कड़ुवाहट अहं के कारण ही बढ़ती है। नौकरी करने वाली स्त्री के बारे में पुरुष यह सोचता है कि “सर्विस वाली लड़की का मतलब पूरा परिवार अस्त-व्यस्त।” (2007 : 12)। निशंक मानते हैं कि इस दकियानूसी सोच में बदलाव आना जरूरी है; तभी परिवार का वातावरण स्वस्थ रहेगा और बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव होगा।

स्त्री को अपने से कमतर और कमजोर समझने वाले पुरुष उसकी सत्ता को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। ऐसी मानसिकता से ग्रस्तपति पत्नी पर अधिकार जमाता है और गुस्से में उस पर हाथ भी उठाता है। ‘दरार कहाँ पड़ी’ शीर्षक कहानी का मंगल गुस्से में पत्नी को ज़ोर से पेट पर लात मारता है। (2007 : 34)। मंगल की पत्नी स्वावलंबी है। वह मंगल के व्यवहार से आहत हो उठती है और कहती है कि “किसी की भीख पर नहीं जी रही हूँ। नौकरी करती हूँ नौकरी! ठाठ से रहूँगी और अलग रहूँगी तो कम से कम ये रोज-रोज का सिर दर्द तो मेरा दूर होगा।” (2007 : 35)। निशंक अपने स्त्री पात्रों को कमजोर नहीं पड़ने देते बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने के लिए तथा अभद्र पुरुष व्यवहार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित करते हैं।

समाज में चारों ओर भष्ट तंत्र पनप चुका है। लोकतंत्र इतना भ्रष्ट हो चुका है कि ईमानदार व्यक्ति चारों तरफ़ से पिस रहा है। “अब तो ठीक काम करने वाले दंडित होते हैं, उन्हें सजा मिलती है।” (2007: 23)। ईमानदार व्यक्ति को ही दर दर भटकना पड़ता है। अधिकारियों की चापलूसी न करें तो उसकी सजा भुगतनी पड़ती है स्थानांतरण के रूप में। ‘किसे दोष दूँ’ शीर्षक कहानी के धर्मेंद्र को नौकरी में कभी भी इच्छित स्थान नहीं मिल पाता। हर बार आवेदन पत्र देता है पर उसे आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिलता। और तो और तीन-चार साल में इतना जरूर होता है कि यदि वह पश्चिम माँगता तो उसका पूरब दिशा में स्थानांतरण कर दिया जाता । अपनी इस हालत पर आक्रोश व्यक्त करते हुए वह कहता है कि “कुछ भ्रष्ट और क्रूर लोगों के कारण मुझे यह खामियाजा भुगतना पड़ा”। (2007 : 29)। निशंक अपने पाठक को सचेत करते हैं कि भले ही मुसीबतों का सामना करना पड़ जाए पर कभी भी ईमानदारी की राह से न हटें क्योंकि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं।

समाज में गरीबी और आर्थिक समस्या के कारण बेरोजगारी, रिश्वतख़ोरी, मौकापरस्ती और भ्रष्टाचार का साम्राज्य है। यदि मंत्री की सिफ़ारिश न हो तो पैसे खिलाने की हिम्मत होनी चाहिए। यदि वह भी न हो तो प्रतिभा होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलेगी। आज तो ईमानदार लोगों को उँगलियों पर गिना जा सकता है। स्थिति यह है कि “पैसा दो और नौकरी लो, सब बिके हुए हैं।” (2007 : 14)। लेकिन इस भ्रष्ट तंत्र से ऊब कर आत्महत्या करने के लिए सोचने वाले युवाओं को निशंक यह संदेश देते हैं कि ईमानदार रहकर मेहनत करने से क्या नहीं हो सकता। नौकरी के चक्कर में पड़कर मालिक बनने की इच्छा रखते हैं तो लघुउद्योग शुरू करके भी तो अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। इस प्रकार निशंक युवा पीढ़ी में सकारात्मक सोच को विकसित करते हैं।

नेता भी भ्रष्ट होते जा रहे हैं। अपने स्वार्थ के लिए शहर में हड़ताल करवाते हैं, दुकानें बंद करवाते हैं और तोड़-फोड़ करवाते हैं। इन सबसे जनता को नुकसान झेलना पड़ता है। गरीब मजदूरों की स्थिति तो और भी दयनीय होती है। दंगे-फसाद में बच्चे भूखों मरते हैं और जनता को जान से हाथ धोना पड़ जाता है। निशंक अपने पात्रों के माध्यम से इस भ्रष्ट तंत्र पर टिप्पणी करते हैं कि “एक तरफ राजनीतिक पार्टियाँ बंद और चक्का-जाम करती हैं, दूसरी ओर ट्रेड यूनियनों के नेता आए दिन हड़ताल करवाते हैं, बचे थे सरकारी कर्मचारी तो वे भी अब इससे अछूते नहीं रहे। रोज-रोज का चक्कर हो गया है ये। सबको अपनी-अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने से मतलब है। जरा मेहनत करें तो पता चले इनको।” (2007 : 19)। मेहनत करने वाले ज़िंदगी के महत्व को समझते हैं अतः वे इस तरह के ओछे काम नहीं करते। यह तो कम दिमाग वालों का काम होता है। ऐसे व्यक्तियों से न तो दोस्ती अच्छी है और न ही दुश्मनी। इसलिए रहीम भी कह गए –‘रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।/ काटे चाटे स्वान के, दोउभाँति विपरीत।’

महँगाई दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। उसके विरोध में हड़ताल की जाती है।लेकिन उस हड़ताल के कारण आम जनता को पिसना पड़ता है। इस पर निशंक का पात्र यह कहकर टिप्पणी करता है कि “महँगाई ने भी तो आसमान छू लिया है। रोज़मर्रा की चीजों के दाम तो इतने बढ़ गए हैं कि सामान्य वर्ग की तो कमर ही टूट जाएगी।” (2007 : 20)। पर हड़ताल और बंद से महँगाई घट तो नहीं जाएगी न! ऐसे बंद और हड़ताल से काम-काज ठप्प पड़ेगा। इससे देश को करोड़ों का नुकसान भुगतना पड़ेगा।निशंक व्यंग्य कसते हैं कि “आने वाला बच्चा पैदा होने से पहले ही विदेशी कर्जवान बना है।” (2007 : 20)।

लालच और लोभ के चक्कर में पड़कर आदमी अपनी बात से मुकर जाता है। पहले यह स्थिति थी कि दुष्ट और अपराधियों को सजा मिलती थी लेकिन आज यह स्थिति है कि अपराधी और हत्यारे चिल्ला-चिल्लाकर हत्याएँ कर रहे हैं और खुले आम सीना चौड़ा करके घूम रहे हैं। पुलिस कुछ नहीं कर पा रही है। भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारियों की अधिक से अधिक सजा निलंबन है।जेल में सरकार महीनों तक उन्हें मेहमान बनाकर खिलाती-पिलाती है। (2007 : 22)। निशंक भारतीय रेल व्यवस्था पर भी टिप्पणी करते हैं। टी.टी.बीस-तीस रुपए के आरक्षण पर खुलकर लोगों से सौ-सौ रुपए लेता है। लोगों की मजबूरी का फायदा उठाता है। यदि गरीब के पास पाँच रुपया कम मिले तो उसे डिब्बे से बेरहमी से उतार देता हैऔर ऊपर से ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है!

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि डॉ. निशंक अपनी कहानियों में समाज की वास्तविकताओं का चित्रण करते हुए भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं और श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त आदर्श की स्थापना की दिशा में अपने पाठक को प्रेरित करना चाहते है। इस प्रकार उनकी कहानियाँ स्वस्थ समाज के निर्माण के प्रति उनके सकारात्मक दृष्टिकोण की परिचायक हैं।

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

जिंदगी को चाहिए दोनों ही – ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’



जिंदगी को चाहिए दोनों ही – ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ 

- प्रवीण प्रणव 

गद्य साहित्य और शोध प्रबंधों के संपादन में गुर्रमकोंडा नीरजा जाना-माना नाम है। यूँ तो नीरजा छिटपुट कविताएँ भी लिखती रही हैं, लेकिन परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद से प्रकाशित कविता संग्रह ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’, उनकी कविताओं का पहला पुस्तकाकार प्रकाशन है। तीन खंडों में संकलित कविताओं में पहला खंड उनकी मौलिक कविताओं का है, दूसरे खंड में तेलुगु से हिंदी में अनूदित कविताएँ हैं और तीसरे खंड में हिंदी से तमिल में अनूदित कविताएँ हैं। नीरजा की मातृभाषा तेलुगु है लेकिन इस संग्रह के तीनों खंड दर्शाते हैं कि हिंदी, तमिल और तेलुगु तीनों पर उनका समान अधिकार है। मैं तमिल और तेलुगु से अनभिज्ञ हूँ तो मेरी समीक्षा उनके मौलिक हिंदी कविताओं तक ही सीमित है। 

पुस्तक की भूमिका में गंगा प्रसाद विमल लिखते हैं कि ‘अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह अपने भाषिक जादू से थोड़ी देर विचलित कर फिर फुर्र हवा में न उड़ जाए।‘ देवी नागरानी ने भी भूमिका में डॉ. किशोर काबरा की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए लिखा है ‘सच्ची कविता की पहली शर्त है कि हमें उसका कोई भार नहीं लगता। जिस प्रकार पक्षी अपने परों से स्वच्छंद आकाश में विचरण करता है, उसी प्रकार कवि स्वांतःसुखाय और लोक हिताय के दो पंखों पर अपनी काव्य यात्रा का गणित बिठाता है।‘ नीरजा की कविताएँ इन सभी पैमानों पर खड़ी उतरती हैं। बिना लच्छेदार भाषा का प्रयोग किए, बिना बिंब और प्रतीक में अपनी बात उलझाए, उन्होंने सरल और सहज भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है और यही वजह है बिना किसी आवरण में लिपटी ये भावनाएँ सीधे हृदय में उतरती हैं। कहीं ये भावनाएँ कोलाहल बन उद्वेलित करती हैं, कुछ करने को तो कहीं ये गहरे सोच में छोड़ जाती हैं, नीरव सन्नाटे की तरह। 

मुझे बालस्वरूप राही की कविता ‘कोलाहल के बाद’ की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं: 

जब कोलाहल में बात नहीं खोती
वह घड़ी हमेशा रात नहीं होती 

सन्नाटा नहीं, तोड़नी है जड़ता
वह चाहे भीतर हो या बाहर हो
रचना है ऐसा वातावरण हमें
काँटों का नहीं, फूल का आदर हो

हमको सूरज की तरह दहकना है
जब तक हर स्याही मात नहीं होती। 

नीरजा की कविताएँ सिर्फ प्रकृति या सौंदर्य वर्णन तक अपने को सीमित नहीं करतीं। ये कविताएँ उनकी आकुलता को, उनकी विवशता को, उनकी आकांक्षा को और उनके सपने को आवाज़ देती हैं। यह आवाज इतनी वास्तविक है, इतनी सरल भाषा में है और इतने गंभीर विषय पर है कि नीरजा की कविताएँ सिर्फ उनकी न रह कर पाठकों की आवाज़ बन जाती हैं और यही इनकी सफलता है। 

‘माँ’ शीर्षक कविता में जब वे लिखती हैं: 

आज वह मेरी राह देख रही है 
मेरा माथा चूमने के लिए तरस रही है 
आखिरी बार मुझसे बात करने के लिए 
आँखों में प्रतीक्षा सँजोए। 

मैं काले कोसों बैठी हूँ 
सात समंदर पार, 
लाचार। 

मन तो कभी का पहुँच चुका उसके पास, 
तन काट नहीं पा रहा 
परिस्थिति का पाश। 
उदास हूँ। 
दास हूँ न ? 
स्वामी की अनुमति नहीं! 

इन पंक्तियों में नीरजा सिर्फ अपने भावों की अभिव्यक्ति नहीं करतीं, वरन न जाने कितनी महिलाओं की आवाज़ बन जाती हैं जो चाह कर भी अपने माता-पिता के लिए तब उपलब्ध नहीं हो पाती जबकि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। 

नीरजा अपनी कविताओं में संबंधों और उनसे जुड़े भावनाओं का ताना-बना बुनती हैं। ‘बेटी वाली माँ’ कविता में तीन पीढ़ियों से एक सी ही समस्या को रेखांकित करते हुए वे लिखती हैं: 

आज तक काट रही हो तुम 
बेटी जनने की सज़ा 
बिना उफ़ किए। 
पर मैं कराहती हूँ कभी जब दर्द से 
मुझे अपने गोद में लेकर 
सींच देती हो आँसुओं से मेरा माथा। 
आँखों-आँखों में देती हो नसीहत – 
‘बेटी की माँ हो, कमजोर मत पड़ना!’ 

नीरजा अपने पिता से बहुत प्रभावित रही हैं। अपने पिता को समर्पित कविता में वे लिखती हैं: 

काल को पीछे धकेलते 
जिजीविषा से भरे 
तुम ही तो हो सच्चे योद्धा 
धरती के सुंदरतम पुरुष, 
मेरे पापा ! 

नीरजा ने एक बेटी, एक माँ, एक पत्नी सबका धर्म निभाया है इसलिए इनकी कविताएँ भी इस सभी संबंधों को अपने अंदर आत्मसात करती हैं। समाज में छोटी बच्चियों के साथ हो रहे अनाचार पर ‘माँ नीरजा’ व्यथित हो कर लिखती हैं: 

जब कभी किसी नन्ही गुड़िया को देखते हैं 
बेसाख्ता चीख उठते हैं – 
‘गुड़िया घर से बाहर न जा 
यह समाज तेरे लिए नहीं बना है 
बाहर न जा 
तुझे नोचकर खाने के लिए गिद्ध इंतज़ार कर रहा है 
तू बाहर न जा।‘ 

प्रेम के कई रंग होते हैं और नीरजा ने प्रेम के कई आयाम अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किए हैं। सबसे पहले तो प्रेम में होने की जो मधुर अनुभूति है उसे बड़ी खूबसूरती से बयाँ करते हुए अपनी कविता ‘रेशमी स्पर्श’ में लिखती हैं: 

मेरी देह पर तैरती तुम्हारी उँगलियाँ 
मन के तार को छेड़ गई 
एक रेशमी स्पर्श ने जगा दी 
रोमरोम में नई उमंग 
तुमने जब-जब मुझको छुआ 
तब-तब तन-मन में ऊर्जा का संचार हुआ 

और में पागल हो गई ! 
लोक-लाज खो गई !! 

जब प्यार होता है तो मन में प्यार धीरे-धीरे घुलता है और ये उन खामोशियों की जगह लेता जाता है जो वर्षों से मन में घर कर गई होती हैं और भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं होने देतीं। अपनी कविता ‘निःशब्द’ में प्यार में होने के खुशनुमा एहसास को आवाज़ देती हुई लिखती हैं: 

उस अनुभूति को व्यक्त करने के लिए 
शब्द नहीं हैं 
मौन का साम्राज्य है चारों ओर 
भीतर तो तुमुलनाद है 
भीगी हूँ प्यार में 

जब प्यार होता है तो साथ ही होता है उस प्यार में नोक-झोंक। ये नोक-झोंक कई बार प्यार को पटरी से उतार देते हैं तो कई बार इनसे प्यार और मजबूत होता है। प्यार के नोक-झोंक में जरूरी है अहं का न होना। नीरजा अपनी कविता ‘संधिपत्र’ के माध्यम से दिखलाती हैं कि नोक-झोंक के बाद वापस प्यार को पटरी पर लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। 

चाहूँ तो तुम्हारी तरह मैं भी 
कोस सकती हूँ सारी दुनिया को 
पर ऐसा भी क्या गुस्सा 
कि जीवन बीत जाए, गुस्सा न बीते। 

इसलिए भेजा करती हूँ हर सुबह 
तुम्हारे लिए दोस्ती के गुलाब। 

तुम विजेता हो – चिर विजेता; 
मैं पराजित हूँ – प्रेम में पराजित। 

कभी तो मैं बनकर देखो........... 

प्यार कई बार वह मोड़ नहीं लेता जो हम चाहते हैं। प्यार में होना जितनी सुखद अनुभूति है उससे कहीं ज्यादा दुखद है दिल का टूटना। प्यार में होना आवाज़ देता है भावनाओं को लेकिन दिल का टूटना भावनाओं का उबाल लाता है दिल के अंदर लेकिन जुबाँ खामोश रहती है। ऐसे में बहुत मुमकिन है टूट जाना लेकिन नीरजा अपनी कविता में दुहराती हैं कि दिल का टूटना अंत नहीं। अपनी कविता ‘आशियाना’ में वे इस टूटन के बाद के संकल्प को दर्शाती हैं ये कहते हुए: 

उसके लिए मैंने सारी दुनिया से टक्कर ली 
लेकिन उसने मुझे बैसाखियों के सहारे छोड़ दिया। 

हवाओं से लड़ता रहा देर तक मेरा घोंसला 
बिखर गया मेरा सपना । 
पर मैं नहीं बिखरी। न बिखरूँगी। 
एक-एक तिनका जोड़कर 
फिर बनाऊँगी अपना आशियाना, 
सजाऊँगी-सँवारूँगी। 

नीरजा अपनी कविताओं को सिर्फ अपनी आवाज़ नहीं बनाना चाहतीं। उनकी कविताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे उन सभी औरतों की आवाज़ बनें जो इन हालात से गुज़रती हैं और जब अपनी कविता ‘तपिश’ में वो लिखती हैं: 

मेरी चाभी मुझे दे दो 
रोक दो अब तो चाबुक 
चाहती हूँ मैं 
मैं बन कर जीऊँ 
सदियों तक 

सदियों तक जीने की कल्पना नीरजा की अपने लिए नहीं हो सकती, वे आज़ादी की तलबगार हैं सभी औरतों के लिए जो किसी बंधन में फँस कर अपनी आकांक्षाओं को दबा देती हैं, वे हर संभव प्रयास करती हैं कि ख़ुद पर हुए ज़ुल्म के बाद भी किसी तरह साथ बना रहे। लेकिन ज़ुल्म सहने की भी एक सीमा होती है और इस सीमा के बाद होती है आज़ादी की ख़्वाहिश। 

डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने नीरजा के परिचय में लिखा है, उनके पिता साहित्यकार थे, उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन किया। साथ ही वे आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता श्री एन० टी० रामाराव के पी० आर० ओ० के रूप में कार्यरत रहे। नीरजा ने साहित्य और राजनीति का ये सम्मिश्रण बचपन से देखा और ये उनकी कविता में भी परिलक्षित होता है। अपनी कविता ‘राजनीति’ में नीरजा लिखती हैं: 

लोग अकसर कहते हैं 
राजनीति एक खेल है 
पर मेरे पापा कहते हैं 
यह एक कमर्शियल फिल्म है 

और इसी कविता के अंत में लिखती हैं: 

इस फिल्म के बारे में खूब सुना है 
लेकिन देखने के लिए सेंसर का कहना है 

- ‘ओनली फॉर क्रिमिनल्स’। 
- ‘भले मानुषों का प्रवेश वर्जित’। 

साहित्य में आने से पहले नीरजा ने विज्ञान की पढ़ाई की, माइक्रोबायोलॉजी में उन्होंने बी० एससी० किया और एक वर्ष तक अपोलो अस्पताल में कार्यरत रहीं। उनका ये अनुभव उनकी कविता ‘दर्द’ में दिखता है: 

मैंने 
दर्द को दबाने की कोशिश की 
वह गिद्ध बन 
मेरा शिकार करता रहा 

मैंने 
उससे छुटकारा पाने के लिए 
स्लीपिंगपिल्स लीं 
ट्रैंक्विलाइज़र लिए 
और न जाने क्या क्या लिया 
पर वह इम्यून हो गया। 

आज 
मैं सोचती हूँ – 
यदि सीने में यह दर्द नहीं होता 
तो मेरा क्या होता। 

नीरजा ने इस संकलन में कुछ अच्छे हाइकु भी लिखे हैं। सीमित शब्दों में विभिन्न विषयों पर लिखे हुए हाइकु प्रभावित करते हैं। 

कन्या भ्रूण ने 
लगाई है गुहार 
मुझे न मार। 

टेसू फूले हैं 
बौराया यह मन 
आया फागुन। 

अलमारी में 
किताबों का ढेर है 
निद्रा में लीन। 

नुकीला काँटा 
धँसा पाँव में मेरे, 
रोये तुम थे। 

कच्ची मिट्टी हूँ 
आकार दो हाथों से 
ढल जाऊँगी। 

अपनी कविता ‘सीखना’ में उन्होंने अपने गुरुओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए लिखा है: 

तुमसे सीख ही लिया मैंने 
तुमुल कोलाहल के बीच सन्नाटे को जीना; 
सन्नाटा जो कविता है – 
कविता जो जीवन है ! 

लेकिन मेरी ख़्वाहिश है कि नीरजा न सिर्फ सन्नाटे को जीना सीखें बल्कि कोलाहल को भी अपनाए रखें। न तो सन्नाटे की कोई सीमा है, न ही कोलाहल की, लेकिन जरूरी है कि हम इन दोनों में सामंजस्य बनाए रखें और इनसे सीखते रहें। मुझे राजेश रेड्डी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं: 

दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और 
छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और 
कोई अंत नहीं मन के सूने-पन का 
सन्नाटे के पार है इक सन्नाटा और। 

इस पहले कविता संग्रह के लिए गुर्रमकोंडा नीरजा को बहुत बहुत शुभकामनाएँ। 


समीक्षित कृति : कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा (कविता)/ गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2019/ नजीबाबाद : पारिलेख प्रकाशन/ वितरक : श्रीसाहती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल - +91 9849986346

- प्रवीण प्रणव 
सीनियर प्रोग्राम मैनेजर, माइक्रोसॉफ़्ट 
B-415, गायत्री क्लाससिक्स 
लिंगमपल्ली, हैदराबाद