शुक्रवार, 7 जून 2024

समय के इस सिंधु में है बिंदु भर अस्तित्व मेरा : मालती जोशी



हिंदी साहित्य जगत में मालती जोशी एक जाना पहचान नाम है। मालती जोशी का नाम लेते ही पाठक को - मोरी रंग दे चुनरिया, बोल री कठपुतली, महकते रिश्ते, बाबुल का घर, मन ना भये दस बीस, रहिमन धागा प्रेम का, पाषण युग, निष्कासन, पटाक्षेप, शोभायात्रा आदि - रचनाएँ याद आना स्वाभाविक है। साहित्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान हेतु भारत सरकार ने 2018 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया था। उन्होंने साहित्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया है, साथ ही स्त्री के अधिकारों के लिए आवाज उठाई है। उनके साहित्य में परंपरा, आधुनिकता और संस्कृति का त्रिवेणी-संगम देखा जा सकता है। उनका निधन साहित्यिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

मालती जोशी का जन्म 4 जून, 1934 को औरंगाबाद में हुआ था। मातृभाषा मराठी थी, पर शिक्षा-दीक्षा हिंदी में हुई। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिंदी) की उपाधि अर्जित की। अपनी पढ़ाई के संबंध में उन्होंने बताया है कि “पिता पुरानी ग्वालियर रियासत में मजिस्ट्रेट थे। छोटे-छोटे कस्बों में स्थानांतरित होते रहते थे। इसलिए पढ़ाई में एकरूपता नहीं रह पाई। चौथी कक्षा तक घर में पढ़ाई की। पाँचवीं में लड़कों के स्कूल में दाखिला लिया क्योंकि कन्याशाला केवल चौथी तक थी। आठवीं में थी तब पिताजी का स्थानांतरण हुआ। फिर आठवीं प्राइवेट करनी पड़ी। उन दिनों राज्य ग्वालियर की मिडिल परीक्षा की बहुत मान्यता थी। नौवीं, दसवीं मालव कन्या विद्यालय, इन्दौर से पास की। उन दिनों दसवीं (मैट्रिक) स्कूल की अंतिम कक्षा हुआ करती थी। उसके बाद इंटर प्राइवेट किया। बीए और एमए होलकर कॉलेज इंदौर से किया।” इस प्रकार मालती जोशी की पढ़ाई जारी रही।

लेखन के प्रति रुझान के संबंध में बात करते हुए मालती जोशी ने एक संस्मरण में लिखा है कि “मैंने सन 1950 में मैट्रिक पास किया था। उन दिनों स्कूल में अध्यापिकाएँ या तो उम्रदराज होती थीं या फिर वे युवतियाँ जो हालात की मार से हताश, निराश और जीवन से उदासीन होती थीं। ऐसे में ठंडी हवा के झोंके की तरह हिंदी की नई टीचर का आगमन हुआ। लखनऊ कॉलेज से ताजा ग्रेजुएट होकर आई थीं। रहन-सहन में, बातचीत में नफासत थी, नजाकत थी। छात्राओं से उनका व्यवहार भी मित्रवत था, जो एक नई बात थी। लड़कियाँ तो उन पर लट्टू हो गईं। मुझमें तब कविता के अंकुर फूटने लगे थे। मैंने उन पर ढेरों कविताएँ लिख डालीं। उनकी शादी और हमारी फाइनल परीक्षा आस-पास ही संपन्न हुई थी। फेयरवेल पार्टी के दिन मैंने अपनी कविताओं की कापी उन्हें सादर भेंट कर दी थी।” छात्र जीवन से ही मालती जोशी गीतकार के रूप में लोकप्रियता अर्जित करने लगीं। लोग उन्हें ‘मालवा की मीरा’ कहने लगे थे। नवंबर 1979 में ‘धर्मयुग’ में एक कहानी छपी, जिसने मालती जोशी को अखिल भारतीय मंच पर स्थापित कर दिया, उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मालती जोशी अपने आस-पास के वातावरण से गृहीत अनुभवों को शब्दों में पिरोकर पाठकों के सामने प्रस्तुत कर देती थीं। उनकी कहानियों एवं उपन्यासों में संवेदना के अलग संसार को देखा जा सकता है। उनके कहानी संग्रहों में - पाषाण युग, मध्यांतर, समर्पण का सुख, मन न हुए दस बीस, एक घर हो सपनों का, विश्वास गाथा, आखिरी शर्त, मोरी रंग दी चुनरिया, अंतिम संक्षेप, एक सार्थक दिन, शापित शैशव, महकते रिश्ते, पिया पीर न जानी, बाबुल का घर, औरत एक रात है, मिलियन डालर नोट आदि - उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार उपन्यासों में - पटाक्षेप, सहचारिणी, शोभा यात्रा और राग विराग। दादी की घड़ी, जीने की राह, परीक्षा और पुरस्कार, स्नेह के स्वर, सच्चा सिंगार - आदि बालकथा संग्रह हैं, तो - हार्ले स्ट्रीट - व्यंग्य। इनके अतिरिक्त और भी अनेक श्रेष्ठ रचनाओं का सृजन उन्होंने किया। मालती जोशी की कुछ कहानियाँ सिर्फ दूरदर्शन पर धारावाहिक के रूप में प्रसारित करने के लिए ही लिखी गई थीं। विशेष रूप से जया बच्चन द्वारा निर्मित टेलीविजन शो ‘सात फेरे’ और गुलज़ार द्वारा निर्मित ‘किरदार’ के लिए।

मालती जोशी की कहानियों में वैविध्य को देखा जा सकता है। उनके कथा-पात्र उनके इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं। उन्हें तो कहीं भटकने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इस संदर्भ में उनका यह कथन उल्लेखनीय है – “मध्यवर्गीय परिवार से हूँ। ससुराल और पीहर दोनों ओर विशाल, लंबा चौड़ा परिवार है। और जिसे अंग्रेजी में close knit कहते हैं - दोनों परिवार वैसे ही हैं। पतिदेव घोर सामाजिक प्राणी थे। उनके मित्रों की संख्या कम न थी। इसलिए पात्र और कथानक के लिए मुझे कभी भटकना नहीं पड़ा। वैसे भी लेखक का संवेदनशील मन अपने आस-पास से अनजाने ही कुछ न कुछ इकट्ठा करता रहता है। यह सामग्री उसके अवचेतन में जमा होती रहती है। कहानी लिखते समय कोई व्यक्ति, कोई बात, कोई प्रसंग अनायास याद आ जाता है और कहानी में फिट हो जाता है।”

मालती जोशी ने कहानीकार के रूप में काफी लोकप्रियता अर्जित की। इसमें कोई दो राय नहीं। सुधा अरोड़ा ने लिखा है कि मालती जोशी पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय और समीक्षकों द्वारा सर्वाधिक उपेक्षित कथाकार हैं! इस संबंध में मालती जोशी ने लिखा है कि “सर्वाधिक लोकप्रियता की बात अतिशयोक्ति हो सकती है, परंतु समीक्षकों की उपेक्षा वाली बात सौ फीसदी सच है। मेरी सीधी-सादी नितांत घरेलू कहानियों को श्रेष्ठीजन कोई तवज्जो नहीं देते। उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है, या यों कहें कि एक तरह से खारिज कर दिया जाता है। स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ, साठोत्तरी कहानियाँ, महिला रचनाकार जैसे लेखों में मेरे नाम का उल्लेख तक नहीं होता। अगर मैं कहूँ कि इस बात का मुझे कोई मलाल नहीं है तो यह झूठ बोलना होगा। शुरू में इस बात से सचमुच दुख होता था, पर अब मैंने मन को समझा लिया है। मैं जिन लोगों के लिए लिखती हूँ, वे तो मुझे सिर-आँखों पर लेते हैं – फिर दुख कैसा!” (मालती जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ, भूमिका)। मालती जोशी का कथन पढ़ते समय तेलुगु साहित्यकार मालती चंदूर का नाम बार-बार मानस पटल पर उभर रहा है। उन्होंने भी मालती जोशी की भाँति अपने आस-पास के ही परिवेश से कथासूत्र का ताना-बाना बुना है। उनकी कहानियों और उपन्यासों को भी समीक्षकों ने ‘एक गृहस्थ की मामूली रचनाएँ’ कहकर उपेक्षित किया था। लेकिन उनकी कलम रुकी नहीं, थकी नहीं। 1992 में उनके उपन्यास ‘हृदयनेत्री’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। साहित्य के क्षेत्र में ढूँढ़ने पर हमें मालती जोशी, मालती चंदूर जैसी अनेक लेखिकाएँ अवश्य मिलेंगी जिन्हें इस समाज में अपने आपको स्थापित करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।

मालती जोशी पारिवारिक जीव हैं। वे स्वयं अपने आपको वही कहती हैं। रिश्तों को बेहद महत्व देने वाली रचनाकार हैं मालती जोशी। उनकी कहानियों में अनेक संबंधों के बीच प्रेमपूर्ण व्यवहार रहता है। प्रेम को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है कि “मेरी पीढ़ी के लिए प्रेम महज एक टाइम पास नहीं था। हमारे लिए प्रेम का अर्थ त्याग, बलिदान, समर्पण आदि हुआ करता था। प्रेम एक उदात्त अनुभव, एक पवित्र भावना थी। एक मीठा दर्द था जो चुपके-चुपके सहा जाता था। वह एक व्रत था।” (चाँद अमावस की, भूमिका)। उनकी कहानियों में प्रेम एक अंत:धारा की तरह प्रवाहित होता रहता है।

मालती जोशी की कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन शैली को भलीभाँति देखा जा सकता है। स्वयं मध्यवर्गीय परिवार से होने के नाते मालती जोशी अपने देखे हुए और भोगे हुए अनुभव जगत को कहानियों के माध्यम से व्यक्त करती हैं। इसका खुलासा उन्होंने स्वयं किया है – “सारी कहानियों को अगर एक शीर्षक में बाँधना हो तो कहना पड़ेगा कि ये मध्यमवर्गीय जीवन का दस्तावेज हैं। मैं स्वयं इसी वर्ग से हूँ इसलिए मध्यमवर्ग के सुख-दुख, राग-द्वेष, आशा-आकांक्षा से अच्छी तरह परिचित हूँ। मध्यमवर्गीय परिवार या मध्यमवर्गीय नारी मेरी कहानियों का केंद्रबिंदु रहे हैं।” (रहिमन धागा प्रेम का, भूमिका)

15 मई,, 2024 को मालती जोशी का निधन हो गया। उनको भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सूर्यबाला कहती हैं कि “वरिष्ठ कथा लेखिका मालती जोशी अगले चार जून को अपने जीवन के 90 गौरवशाली वर्ष पूरे करतीं, लेकिन अफसोस, इसके पूर्व ही 15 मई को वे अंतिम यात्रा पर चली गईं। यह मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति से अधिक कथा लेखन के एक युग का अवसान है। वे जीवन और लेखन दोनों में संयम, संतुलन और समरसता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करने वाली रचनाकार थीं। उनकी लेखनी मध्यवर्ग का आईना बन गई। मालती जोशी ने अपनी कहानियों में मानवीय संबंधों के इतने जटिल और विरल यथार्थ उकेरे हैं कि वे अपने समय और समाज की क्लाइडोस्कोप कही जा सकती हैं। हमारे समय की कोई स्थिति नहीं है, जो उनकी लेखनी से छूट गई हो।”

मालती जोशी की कविता ‘आत्मकथ्य’ की इन पंक्तियों से हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं –

समय के इस सिंधु में है बिंदु भर अस्तित्व मेरा
इसलिए अभिमान भी कभी करती नहीं मैं
प्राप्य जो मेरा रहा है, वह मुझे सब मिल गया है
परम तृप्ति से हृदय का कलश नित भरती रही मैं
                        छू न पाता है मुझे यह तुमुल कोलाहल जगत का
                        क्योंकि अपने आप से संवाद होता है निरंतर
                        एक दुनिया साथ मेरे चल रही है जन्म से ही
                        और भीतर पल रही है, दूसरी दुनिया समांतर
उम्र के सोपान चढ़ती जा रही हूँ अनवरत मैं
कब कहाँ विश्राम होगा, यह अभी अज्ञात है
आज तक जो भी रचा सब उस रचयिता की कृपा है
श्रेय की भागी बनी मैं यह अनोखी बात है
                        थी नहीं स्पर्धा किसी से, और ईर्ष्या भी नहीं है
                        हैं प्रभु के रूप हम सब, सत्य मैं यह जानती हूँ
                        राह में जो भी मिले सब बंधु थे, सब मित्र ही थे,
                        आज मैं नतशीश हो आभार सब का मानती हूँ 
                                                                            (वीणा मासिक, फरवरी 2023)

भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?


जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

इन पंक्तियों को पढ़कर क्या कोई पाठक सहज ही अनुमान नहीं लगा सकता है कि इन पंक्तियों के रचनाकार कौन हैं? इन पंक्तियों को पढ़कर पंत, बच्चन, भगवती चरण वर्मा अथवा शमशेर का नाम ले भी सकते हैं; लेकिन ये पंक्तियाँ ‘क्रांतिकारी की कथा’ कहने वाले भोलाराम के जीव की ओर सबका ध्यान खींचने वाले व्यंग्य को विधा के रूप में दर्जा दिलाने वाले व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की हैं।

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 को होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में हुई। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे नागपुर गए। अध्ययन के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र में उतरे, लेकिन बाद में नौकरी करने के बजाय लेखक बनकर जीवनयापन करना श्रेयस्कर समझा। हिंदी ही नहीं, किसी भी भाषा में महज लेखन के माध्यम से आजीविका जुटाना आसान काम नहीं है। लेकिन परसाई जी जीवनपर्यंत अपने निर्णय पर अटल रहे। उन्होंने ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। यह पत्रिका उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वे अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से गौरवान्वित हुए।

परसाई जी के साहित्य का केंद्रीय तत्व है व्यंग्य। उनकी साहित्यिक कृतियों में कहानी, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार आदि विधाओं का समुच्चय देखा जा सकता है। आमतौर पर व्यंग्य को एक शैली के रूप में देखा जाता था, लेकिन हरिशंकर परसाई ने उसे एक अलग स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया। आस-पास घटित घटनाओं एवं व्याप्त विसंगतियों को देखकर जब कोई व्यक्ति भीतर से उद्वेलित हो उठता है, तो उसकी कलम से ‘सदाचार का ताबीज’, ‘बेईमानी की परत’, ‘न्याय का दरवाजा’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘आवारा भीड़ के खतरे’, ‘हरिजन को पीटने का यज्ञ’ जैसी रचनाओं का सृजन स्वाभाविक है। इस संबंध में श्रीलाल शुक्ल का यह कथन उल्लेखनीय है – “परसाई विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सुस्पष्ट विचारों को आधार बनाकर उन्होंने राजनीतिक व्यंग्य को एक खास दिशा दी और गुणवत्ता में नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं।” (श्रीलाल शुक्ल, कुछ साहित्य चर्चा, पृ.216)

हरिशंकर परसाई की लेखन शैली नितांत निजी है। वे यह नहीं मानते कि साहित्य सृजन के लिए किसी पारंपरिक ढाँचे को ही अपनाना पड़ेगा। वे तो रूढ़ियों को तोड़ने पर बल देते थे। वे हमेशा यही कहा करते थे कि ‘सत्य शुभ हो, अशुभ हो, काला हो, सफेद हो – साहित्य उसी से बनता है।’ (हरिशंकर परसाई, देश के लिए दीवाने आये)। परसाई आम आदमी की जिंदगी में व्याप्त विसंगतियों से इस कदर बेचैन हो उठते हैं कि उनका अंतस कराह उठता है। उन्होंने स्वयं कहा है कि “मैं निहायत बेचैन मन का घोर संवेदनशील आदमी हूँ। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता। इसलिए गर्दिश नियति है।” (सं. कमलेश्वर, गर्दिश के दिन, पृ.128)।

हिंदी साहित्य को धारदार व्यंग्य के माध्यम से समृद्ध करने वाले, पाठकों को हँसाने वाले, चुटकी लेने का मौका न छोड़ने वाले हरिशंकर परसाई के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानना हो तो उनके द्वारा लिखी हुई उनकी कहानी को ही पढ़ना होगा। जी हाँ! परसाई की कहानी अपनी जुबानी! (उनके इस बयान के सब सूत्र ‘गर्दिश के दिन’ में छिपे हैं।) तो, सुनिए!

मैं हरिशंकर परसाई! एक शताब्दी के बाद आपके सामने आ रहा हूँ। ‘घायल बसंत’ को देखकर डर गया था। इसलिए ‘भोलाराम का जीव’ बनकर अपने आपको छुपा लिया था। ‘ठिठुरता गणतंत्र’ को देखकर ‘शिकायत मुझे भी है’, लेकिन क्या कर सकता हूँ! लाचार हूँ न! यहाँ तो सबकी ‘अपनी अपनी बीमारी’ है। सब के सब ‘भेड़ें और भेड़िये’ ही तो हैं। ‘बेईमानी की परत’ खोलने में सफल हो सकता हूँ क्या? ‘तुलसीदास चंदन घिसें’ तो मैं क्या ‘तिरछी रेखाएँ’ नहीं खींच सकता! करना तो बहुत कुछ चाहता हूँ। करने के लिए इस संसार में बहुत कुछ है, लेकिन जब जब मैं ‘पाखंड का अध्यात्म’ देखता हूँ तब तब बेचैन हो उठता हूँ। मेरी अंतरात्मा पुकारने लगती है ‘सुनो भाई साधो’। पर मेरी आवाज जनता तक नहीं पहुँचती। ‘एक मध्यवर्गीय कुत्ता’ कर क्या सकता है भला! सोच रहा हूँ कि ‘जैसे उनके दिन फिर’ मेरे भी फिरेंगे। ‘सुदामा का चावल लेकर ‘बस की यात्रा’ करूँगा और ‘क्रांतिकारी की कथा’ लिखूँगा पर ‘समझौता’ नहीं करूँगा।

यादें तो मेरे पास बहुत हैं। आपकी दिलचस्पी किस बात में है? क्या आप जानना चाहते हो कि हरिशंकर परसाई नामक यह आदमी जो हँसता है, मस्ती करता है, जो तीखा है, कटु है – इसकी अपनी जिंदगी कैसी है? यह कब गिरा? कब उठा? कैसे टूटा? कैसे फिर से जुड़ा? जानने की इच्छा है! मैं तो एक निहायत कटु निर्मम और ‘धोबीपछाड़’ आदमी हूँ। बचपन में मुझे जिस घटना ने तोड़ा, पहले उसके बारे में ही बताऊँगा। बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। शायद 1936 या 37 होगा। उस वक़्तशायद मैं आठवीं में पढ़ रहा था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में रहने चली गई थी। हम नहीं गए थे। माँ सख्त बीमार थी। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। सब लोग जा चुके थे। कस्बा वीरान हो चुका था। भाँय-भाँय करते पूरे आसपास में हमारे घर में ही चहल-पहल थी। काली रातें। इनमें हमारे घर जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गए थे। ऐसी स्थिति में तो रात के सन्नाटे में हमारी ही आवाजें हमें डरावनी लगती थीं। वह रात भयंकर थी। उसे याद कर रहा हूँ, तो आज भी मेरी आत्मा काँप रही है। मरणासन्न माँ के सामने हम आरती गा रहे थे। गाते गाते पिताजी सिसकने लगे, माँ बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपका रही है और हम रो रहे हैं। यह रोज रोज की बात हो गई। पिताजी, चाचा जी और एक-दो रिश्तेदार लाठी-बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूमकर पहरा देते। ऐसे भयंकर वातावरण में एक रात माँ हम सब को बिलखते छोड़कर कहीं दूर चली गई। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया। कुत्ते भी सिमटकर आ गए कहीं से योगदान देने। पाँच भाई-बहनों में माँ की मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था – सबसे बड़ा जो हूँ! प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं। जिस आतंक, निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे, उसके सही अंकन के लिए हिम्मत चाहिए। हममें से कोई इस कदर टूटे नहीं थे, जिस कदर पिताजी टूटे थे।

दिन बीतते गए। मैं पढ़ाई और नौकरी में व्यस्त हो गया। मेट्रिक हुआ कि नहीं जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता था। चूहे, बिच्छू और साँपों ने खूब काटा, लेकिन ज़हरमोहरा मुझे शुरू में ही मिल गया था। इसलिए ‘बेचारा परसाई’ का मौका ही नहीं आने दिया। मुझे दिखाऊ सहानुभूति से बेहद नफरत है। अभी भी है। दिखाऊ सहानुभूति दिखाने वालों को चाँटा मार देने की इच्छा होती है। फिर स्कूल में मास्टरी की थी। टीचिंग ट्रेनिंग और फिर नौकरी की तलाश। पिताजी अपनी अंतिम साँसें गिन रहे थे। परिस्थितियों के कारण मैं अनिश्चय में जी लेना सीख ही गया।

मैं बहुत भावुक, संवेदनशील और बेचैन तबीयत का आदमी हूँ। सामान्य स्वभाव का आदमी ठंडे-ठंडे जिम्मेदारियाँ भी निभा लेता है। दुनिया से तालमेल भी बिठा लेता है। व्यक्तित्वहीन नौकारीपेशी आदमी की तरह जिंदगी साधारण संतोष से भी गुजार लेता है। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मैं अपने व्यक्तित्व और चेतना की रक्षा करने में जुट गया। तब मैंने सोचा ही नहीं था कि लेखक बनूँगा। पर मैं अपने विशिष्ट व्यक्तित्व की रक्षा तब भी करना चाहता था। मैंने अपने आपको समझाया – हे परसाई! किसी से मत डरो! ‘भीतर तुम जो भी हो, जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी के साथ निभाओ। यदि जिम्मेदारी के साथ निभाओगे तो नष्ट हो जाओगे।’ अपने से बाहर निकल आओ। दुनिया देखो, समझो और हँसो!

मैं डरा नहीं। ‘लोगों से नहीं डरा, तो नौकरियाँ गईं। लाभ गए, पद गए, ईनाम गए। पहले अपने दुखों के प्रति सम्मोहन था। अपने आपको दुखी मानकर मनवाकर आदमी राहत भी पा लेता है। बहुत लोग अपने लिए ‘बेचारा’ शब्द सुनकर संतुष्ट हो जाते हैं। अपार आनंद का अनुभव करने लगते हैं। मुझे भी पहले ऐसा ही लगा। आखिर मैं भी एक साधारण इंसान ही तो हूँ। पर मैंने आस-पास देखा। तब मुझे लगा ‘इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा! इतने विकट संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष!’ इन सब परिस्थितियों के बीच मेरे भीतर लेखक कैसे जन्मा यह सोचता हूँ तो कुछ सूझता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैंने दुनिया से लड़ने के लिए लेखन को एक हथियार के रूप में अपनाया। इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा। ‘अपने को अविशिष्ट होने से बचाने के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया। पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दुख के जाल से निकल गया।’ इस संसार में दुखी, अन्याय से पीड़ित तथा शोषित और भी हैं। अतः मैंने अपने आपको विस्तार दिया। मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना संपन्न हूँ। यहीं से व्यंग्य लेखक ‘पर-साई’ का जन्म हुआ।

इस संसार में सर्वत्र मनुष्य किसी न किसी रूप में संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ‘मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता।’ पाप से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य छटपटाता रहता है। पर बड़ी लड़ाई केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। ‘अकेले वही सुखी हैं जो लड़ना ही नहीं चाहते। न उनके मन में सवाल उठते हैं, न शंका उठती है। ये जब-तब सिर्फ शिकायत कर लेते हैं। शिकायत भी सुख देती है। और वे ज्यादा सुखी हो जाते हैं।’ कबीर ने ठीक ही कहा है – ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै/ दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।’ जागने वाले का रोना कभी खत्म नहीं होता। व्यंग्य लेखक की गर्दिश भी कभी खत्म नहीं होगी। मेरी गर्दिश सौ सालों के बाद भी ताजा है। इस भोलाराम के जीव को कब मुक्ति मिलेगी!!!

2024! हरिशंकर परसाई का जन्मशताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर उनको याद करके उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ। 

प्रकृति रही दुर्जेय




निकल रही थी मर्म वेदना,
करुणा विकल कहानी-सी।
वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही,
हँसती-सी पहचानी-सी।

*****

प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित
हम सब थे भूले मद में;
भोले थे, हाँ तिरते केवल,
सब विलासिता के नद में। 
                                                                (कामायनी : जयशंकर प्रसाद)

जी हाँ, प्रकृति ही वह शक्ति है जो मनुष्य की वेदना, पीड़ा और उसकी करुण कहानी की मूक श्रोता है। वह विविध रूपों में मनुष्य के समक्ष प्रकट होती है। सौम्य रूप धारण करके प्रकृति जितना मन को आह्लादित कर सकती है, वह पल भर में रौद्र रूप धारण करके प्रलय भी मचा सकती है। (तरुण तपस्वी-सा वह बैठा,/ साधन करता सुर-श्मशान।/ नीचे प्रलय सिंधु लहरों का/ होता था सकरुण अवसान – कामायनी : जयशंकर प्रसाद)।

सर्वविदित है कि प्रकृति और मनुष्य का संबंध जन्मजात है। प्रकृति की गोद में बच्चा बड़ा होता है। प्रकृति के विविध रूप आलंबन बनकर मानव मन को आह्लादित करते हैं। इंद्रधनुष देखकर बच्चे मचल उठते हैं। (जगमग ओस-बिंदु गुंथ जाते साँसों के तारों में,/ गीत बदल जाते अनजाने मोती के हारों में।/ जब-जब उठता नाद मेघ, मंडलाकार घिरते हैं,/ आस-पास वंशी के गीले इंद्रधनुष तिरते हैं - व्याल-विजय : रामधारी सिंह ‘दिनकर’)। तेलुगु के कवि श्री श्री (श्रीरंगम श्रीनिवास राव) भी कहते हैं कि इंद्रधनुष को देखकर बच्चे खुशी से फूलकर कुप्पा हो जाते हैं। वे हर वक़्त पंचतत्वों के निकट होते हैं। सागर किनारे बैठकर रेत के घरौंदे बनाते हैं। प्रकृति से निरंतर पाठ सीखते हैं - पर्वत कहता शीश उठाकर,/ तुम भी ऊँचे बन जाओ।/ सागर कहता है लहराकर,/ मन में गहराई लाओ।/ समझ रहे हो क्या कहती हैं/ उठ उठ गिर गिर तरल तरंग/ भर लो भर लो अपने दिल में/ मीठी मीठी मृदुल उमंग!/ पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो/ कितना ही हो सिर पर भार,/ नभ कहता है फैलो इतना/ ढक लो तुम सारा संसार! – प्रकृति संदेश : सोहनलाल द्विवेदी)

विद्यानिवास मिश्र ‘छितवन की छाँह’ में लिखते हैं, “कमल में पुरइन की बूँद की तरह तरल और चंचल लक्ष्मी का प्रतीक लोगों ने ढूँढ़ निकाला, चंपा में रूप के अभिमान की, शेफाली में तरुण अनुराग की, बंधूक में अधर के आमंत्रण की, कुमुदिनी में प्रकृति की कोमलता की, गुलाब में कीर्ति के सौरभ की और कास में मही के हास की खोज की जा चुकी है; जूही संध्या के, बेला और हरसिंगार आधी रात के, कमल अरुणोदय के और बंधूक दुपहरिया के शृंगार के रूप में सर्वमान्य हो चुके हैं।” प्रकृति अनेक भावों के लिए प्रतीक बन चुकी है। कबीर कहते हैं कि “सबकी उतपति धरती, सब जीवन प्रतिपाल/ धरति न जाने आप गुन, ऐसा गुरू विचार” तो तुलसी कहते हैं “देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥/ राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥/ सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥/ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥” यह तो हुई कबीर और तुलसी की बात। प्रयोगशीलता से ओतप्रोत कवि अज्ञेय कहते हैं कि “मैं सोते के साथ बहता हूँ/ पक्षी के साथ गाता हूँ/ वृक्षों के कोंपलों के साथ थरथराता हूँ/ और उसी अदृश्य क्रम में, भीतर ही भीतर/ नए प्राण पाता हूँ।” आज के युवा कवि आशीष नैथानी ‘पहाड़ों पर सुबह’ के मनोरम दृश्य को उकेरते हैं – “हल्की ठंडी हवा चलती है जब/ ओस की बूँद/ गुलाब की पंखुरी पर अंगड़ाई लेती है/ कोयलों का कलरव भी हो जाता है शुरू/ सुथरे नीले अंबर पर/ पहाड़ों के कंधों से/ निकलता है सूरज सफर पर/ रात भर निर्जीव हो चुके पौधों की/ धमनियों में दौड़ने लगता है रक्त/ माटी होने लगती है मुलायम/ देवदार रगड़ता है हथेलियाँ।”

ऐसे सुरम्य वातावरण को आज शहरों में ही नहीं अपितु गाँवों में भी देखना बहुत कठिन होता जा रहा है, क्योंकि प्रकृति से निरंतर पाठ सीखने वाला, बचपन में उसके निकट जीवन व्यतीत करने वाला बच्चा जैसे ही बड़ा हो जाता है, वैसे ही प्रकृति से दूर होने लग जाता है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह उसका अंधाधुंध उपयोग करने लगता है। उसका संतुलन बिगाड़ने लगता है। यह भी नहीं सोचता कि इसका परिणाम क्या हो सकता है। बढ़ते बाजारवाद और औद्योगिकीकरण के कारण मनुष्य प्रकृति से छेड़छाड़ करने लगा है। परिणामस्वरूप धरती का तापमान बढ़ने लगा है। ऋतु-चक्र भी बदल गया है। तरह-तरह की बीमारियाँ फैलने लगीं हैं। चारों ओर प्रदूषण का साम्राज्य है। इससे हर कोई विचलित है। घटते प्राकृतिक संसाधनों के कारण यह डर बना हुआ है कि कहीं भविष्य में बच्चों को पेड़-पौधे, पर्वत, जंगल, चिड़िया, नदियाँ, मिट्टी आदि को मानचित्र के माध्यम से न दिखाना पड़ जाए। रघुवीर सहाय को यह चिंता सालती है। अतः वे कहते हैं, “ये पहाड़, जंगल, मिट्टी के मैदान हरे/ छोटे हो रहे हैं जो इतिहास में बड़े देश के प्रमाण थे/ इनकी विशालता का कोई गुणगान अब सुन नहीं पड़ता।”

आज हरी-भारी प्रकृति को देखने के लिए मन तरस जाता है। “न ठीक सागर बचे हैं, न नदियाँ/ पहाड़ उदास हैं और झरने लगभग चुप/ आसमान में चक्कर काटते पक्षियों के दल/ नजर नहीं आते/ क्योंकि वे बनाते थे जिन पर घोंसले/ वे वृक्ष कट चुके हैं या सूख चुके हैं।” (भवानी प्रसाद मिश्र)। भूमि बंजर बन चुकी है। नदी मर चुकी है। धरती का लाल दुखी है। “नदी ने समेट लिया अपने को!/ रुक गए प्रवाह/ गायब हो गई लहरें/ फैलने लगा सेवार अंदर ही अंदर/ दुखी था किसान/ मर गई थी नदी।” (नागार्जुन)। यदि आपके पास संवेदना का स्टेथोस्कोप हो तो कानों में लगाकर सुनिए धरती की गुहार। उसका करुण क्रंदन। हो सके तो रोकिए प्रकृति का विनाश। याद रखिए वन दिवस (मार्च 21), जल दिवस (मार्च 22), पर्यावरण दिवस (जून 5), ओज़ोन दिवस (दिसंबर 16), पर्वत दिवस (दिसंबर 31) आदि मनाने से पर्यावरण को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। इन्हें केवल औपचारिकता के लिए न निभाएँ, बल्कि आजीवन प्रकृति की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाएँ। इसके लिए हर एक व्यक्ति को पर्यावरण के प्रति सजग होना पड़ेगा। अकारण न छेड़ो प्रकृति को, अन्यथा उसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।

गुरुवार, 23 मई 2024

सच्चा मनुष्य वही है जो समर्पित करे आत्मा को : सुब्रह्मण्य भारती


 राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्य भारती का स्थान भारतीय साहित्य में अप्रतिम और अग्रणी है। भारती न सिर्फ तमिल साहित्य की आधुनिक काव्यधारा के अग्रदूत थे, बल्कि 20 वीं सदी में भारतीय जीवन और साहित्य में जो पुनर्जागरण की लहर उभरी, उसमें वे राष्ट्रीय चेतना के अमर गायक के रूप में उभरे। उनके संपूर्ण साहित्य का मूल स्वर जनजागृति और राष्ट्रीय चेतना है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, वीरेशलिंगम पंतुलु, रवींद्रनाथ ठाकुर, पी. बी. शेली जैसे अनेक युगांतरकारी साहित्यकारों से भारती की तुलना की जा सकती है।     

सुब्रह्मण्य भारती का जन्म 11 दिसंबर, 1882 को तिरुनलवेली जिले के एट्टयपुरम में हुआ था। साहित्यकारों और कलाकारों को वहाँ के राजा आश्रय देते थे। भारती के पिता चिन्नस्वामी अय्यर इसी दरबार में साहित्यकार के रूप में सम्मान पाते थे। अतः सुब्रह्मण्य भी राजदरबार में जाते थे। अपनी माता लक्ष्मी अम्माल से उन्होंने स्त्रियों का सम्मान करना सीखा तथा पिता से राष्ट्रप्रेम। बचपन में सब उन्हें प्यार से सुब्बय्या कहकर पुकारते थे। 

सुब्बय्या की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा तमिलनाडु में हुई। पिताजी के आदेश पर अंग्रेजी की उच्च शिक्षा पाने के लिए तिरुनलवेली गए, लेकिन उन्होंने अंग्रेजी का अध्ययन कभी भी मन लगाकर नहीं किया। हाँ, पिताजी की आज्ञा का पालन करके अंग्रेजी सीख ज़रूर ली थी। इसके संबंध में उनका कहना है कि ‘मेरे पिता ने आदेश दिया कि में नेल्लई में विदेशी ज्ञान प्राप्त करूँ। यह वैसा ही था जैसे किसी शेर के बच्चे को घास दी जा रहे हो।’ (नंदकुमार प्रेम, सुब्रह्मण्य भारती, पृ.6)। बाद में उच्च शिक्षा के लिए वे वाराणसी गए। स्कूल की नियमित शिक्षा में कभी भी उनका मन नहीं रमा। अधिकतर वे खेलकूद में ही समय व्यतीत करते थे। 1901 तक वाराणसी प्रवास के बाद वे पुनः तमिलनाडु वापस आए। 1908 में पांडिचेरी गए। उस समय वहाँ फ्रांसीसियों का राज्य था। उस प्रवास के दौरान भारती के जीवन में अनेक क्रांतिकारी घटनाएँ घटीं। उस समय भारती ने ‘जयम उनदु’ (विजय तुम्हारी) शीर्षक कविता की रचना की - ‘भयभीत मत हो, मन, विजय निश्चित है/ स्वतंत्रता हमारी है, इसी क्षण से, यहीं से,/ मेरे हृदय में शक्तिशाली माँ का निवास है/ भक्ति के वृक्ष में अमृतफल लगेंगे।/ हमारे कंधे, पहाड़ से ऊँचे हैं/ वे ढोते हैं माँ के सुनहले चरण/ आवेग, कर्म और विचार/ सब उसी के हैं/ यहाँ धर्म भी है और शक्ति भी।’  

बाल्यावस्था में ही अर्थात 5 वर्ष की उम्र में ही सुब्बय्या को माता से बिछड़ना पड़ा। यह क्षति अपूरणीय थी। अतः वे ज्यादातर एकांत में ही समय बिताते थे। परिणामस्वरूप वे प्रकृति के निकट हुए। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनके बाल मन पर पड़ा। उनकी रचनाओं में प्रकृति अनेक रूपों में विद्यमान है। प्रकृति के बहाने वे मानव मन की प्रशंसा करते हुए कहते हैं - 'चाँदनी, तारे और हवा को/ अपने सामने रख कर, हम/ पीते हैं उनका मधु/ और जकड़ लेता है हमें/ एक काव्यात्मक उन्माद। / वह आणविक वस्तु जो मन है/ हम उसे छोड़ देंगे मुक्त विचरने के लिए।/ किसी स्वादिष्ट फल में बंदी मधुमक्खी/ गाती है तो/ किसी को अचरज क्यों?/ मन तू अभी चला जा/ तारों के मुक्ता-झुंड में शामिल होने के लिए।’     

एट्टयपुरम के महाराज ने भारती को अपने राज दरबार में स्थान दिया था। एक दिन एट्टयपुरम के राज दरबार में उपस्थित विद्वानों को चुनौती देने वाले शत्रु देश के दरबारी की चुनौती सुब्बय्या ने स्वीकार की। उन्होंने अपनी शैली में भाषण दिया जो विनोद से भरा हुआ था। सुब्बय्या की बुद्धिमत्ता को देखकर एट्टयपुरम के राजा ने उन्हें ‘भारती’ की उपाधि दी। ‘भारती’ अर्थात ज्ञान की देवी - माँ सरस्वती। इस घटना के बाद वे ‘भारती’ बने। आज इसी नाम से ही उनकी चर्चा होती है। 

सुब्बय्या का विवाह चेलम्माल के साथ बचपन में ही संपन्न हुआ। भले ही उस समय उन्होंने पिता के आदेश से बाल विवाह किया, पर वे इस तरह के विवाह को प्रोत्साहित नहीं करते। अपनी आत्मकथा में उन्होंने यह लिखा कि जब उनका ज्ञान विकसित हुआ तब उन्होंने यह महसूस किया कि उनके दो स्वामी थे। एक प्यार और दूसरा कर्तव्य। इन दोनों के बीच के संघर्ष के कारण भारती के रचनात्मक लेखन और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष होना स्वाभाविक था। लेकिन उन्होंने इन स्थितियों पर भी विजय पा ली। 

किशोरावस्था मैं, 14वें वर्ष में पदार्पण करते ही भारती के सिर से पिता की छाया भी उठ गई। अभावों की जिंदगी जीने के लिए वे अभिशप्त हुए। इसका उल्लेख उन्होंने अपनी कविता ‘धन की महिमा’ में किया है। पिता की मृत्यु के बाद भारती अपने चाचा-चाची के पास बनारस चले गए। बनारस प्रवास के समय वे अंग्रेजी कविता के प्रति खूब आकर्षित हुए। इसके सहारे वे काव्य संबंधी परंपरागत दृष्टिकोण और उसकी सीमाओं को समझ सके। इसके साथ ही वे उन्होंने परंपरागत सीमाओं को तोड़कर नए क्षितिज की तलाश की। वे तमिल काव्य को भारी भरकम शब्दावली से मुक्त करना चाहते थे। अतः उन्होंने इस परंपरागत काव्य रूढ़ि को तोड़ा। भारती ने शेक्सपीयर, बायरन, शेली और कीट्स का गहरा अध्ययन किया था। शेली से अत्यंत प्रभावित भारती ‘शेल्लीदासन’ (शेली का दास) उपनाम से लिखने लगे।    

बचपन से ही भारती स्त्रियों का आदर व सम्मान करते थे। एक राजनैतिक समारोह में सिस्टर निवेदिता ने जब भारती से पूछा कि वे अपनी पत्नी को क्यों साथ में नहीं लाए तो उन्होंने जवाब दिया कि उनके परिवार में पत्नियों को सार्वजनिक स्थलों में ले जाने की परंपरा नहीं है। इस बात पर सिस्टर निवेदिता ने कहा, ‘समाज का आधा वर्ग यदि शेष आधे वर्ग को गुलाम बनाए रखता है, तो वह कैसे स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है!’ इन बातों से प्रभावित भारती उनकी स्मृति में लिखते हैं कि ‘माता निवेदिता!/ तू एक मंदिर है प्यार का/ सूर्य है, जो मेरी आत्मा के/ अंधकार को नष्ट करता है-/ तू वर्षा है/ हमारे जीवन की सूखी धरती के लिए/ तू भटके और निराश लोगों की/ मददगार है/ महानता के प्रति समर्पित/ तू दिव्य सत्य की चिनगारी है/ तुझे मेरा नमन।’ उन्होंने ‘स्वदेश गीतंगल’ (स्वदेश के गीत, 1907) तथा ‘जन्मभूमि’ (1909) काव्य संग्रहों को सिस्टर निवेदिता को समर्पित किया। ‘स्वदेश गीतंगल’ (स्वदेश के गीत) में कुल 14 गीत संग्रहीत हैं। प्राक्कथन में कवि ने यह स्पष्ट किया कि ये पुष्प उस भारतमाता के चरणों में समर्पित हैं जो शक्ति और एकता के प्रतीक हैं। ‘जन्मभूमि’ के प्राक्कथन में भी उन्होंने इसी बात कि पुष्टि की कि माता के चरणों में समर्पित करने के लिए कुछ और फूल लाए हैं।       

भारती के मन में बचपन से ही देश के प्रति अपार प्रेम विद्यमान था। इसी कारण उनकी अधिकांश कविताओं में देशभक्ति की भावना को देखा जा सकता है। गांधी जी से मिलने से पहले तक भारती उग्र और सशस्त्र क्रांति की भावनाओं से ओत-प्रोत थे। परंतु गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के संदेश से उग्र-पंथी भारती पराजित हो गए। महात्मा गांधी को संबोधित एक कविता में उन्होंने लिखा- 'स्वतंत्रता की उस धार्मिक राह के वास्तविक मूल्य/ का अनुभव करके/ (जिसे महान उपदेशकों और त्यागियों ने दिखाया था)/ तुमने युद्ध और हत्या के तरीके को खत्म किया/ सत्याग्रह के नए रास्ते के अनुकूल परिणामों का आभास/ तुम्हें हुआ था/ हम भूल जाएँ अब तक के सारे अत्याचार/ और धरती पर सूर्योदय हो न्याय के जीवन का।’

भारती के ‘वन्देमातरम्’ और ‘जयभारत’ उन मंत्रों के समान हैं जिन्हें जंजीरों में जकड़े वीर सैनिको ने अपनी पूरी शक्ति के साथ गाया था - 'नमन तुम्हें हम करते माता/ विजयी माता।/ नमन तुम्हें .../ मन से पीड़ित/ तन से जर्जर/ चिल्लाते हैं देशभक्त/ अब भी मन की गहराई से/ नमन तुम्हें करते माता।/ विजय हमारी हो, हम/ हारें या मर जाएँ/ खड़े एकजुट हम सस्वर/ आवाज उठाते, गाते/ नमन तुम्हें हम करते माता।’ (वन्देमातरम्)। बंकिमचंद्र चटर्जी ने ‘आनंदमठ’ उपन्यास में भारतमाता की प्रार्थना जोड़ दी थी जिसकी पहली पंक्ति थी ‘वन्देमातारम्’। यह बंगाल विभाजन के विरुद्ध होने वाले आंदोलन के दौरान बहुत लोकप्रिय हुई थी। भारती ने तमिलवासियों के मन में बलिदान के सहारे देशभक्ति को जगाकर मन-मंदिर में उस प्रतिमा को प्रतिष्ठित करने का दायित्व लिया और देशभक्ति के गीत रच डाले। 

भारत विविधताओं का देश है। फिर भी यहाँ के निवासी एक तत्व से जुड़े हुए हैं और वह है ‘भारतीयता’। ‘विभिन्नता में एकता’ को भारती ने इस प्रकार दर्शाया है - ‘उसका हृदय एक है/ लेकिन चेहरे तीस करोड़/ उसका मस्तिष्क एक है/ लेकिन बोलती है अठारह भाषाएँ।’ भारती बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य बनने के लिए सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है। सच्चा मनुष्य वही है जो अपनी आत्मा को देश के लिए समर्पित कर देता है।