शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

व्योमकेश दरवेश

हर्ष का विषय है कि हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी की रचना ‘व्योमकेश दरवेश’ (2011, राजकमल प्रकाशन) का वर्ष 2014 के मूर्तिदेवी पुरस्कार के लिए चयन किया गया है. स्मरणीय है कि वर्ष 2013 में अपनी इस बहुचर्चित कृति के लिए उन्हें व्यास सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अतिरिक्त वे गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके हैं और उन्हें प्रगतिशील समीक्षा के आधार स्तंभ के रूप में जाना जाता है. 

16 फरवरी, 1932 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के विस्कोहर गाँव में जन्मे विश्वनाथ त्रिपाठी सफल आलोचक तो हैं ही, पर वे मूलतः कवि हैं. उनका पहला काव्य संग्रह 1980 में ‘जैसा कह सका’ के नाम से प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका त्रिलोचन शास्त्री ने लिखी थी और यह समर्पित था विष्णुचंद्र शर्मा को. इसके बाद ‘प्रेमचंद विस्कोहर’ नाम से उनकी कविताओं का दूसरा संग्रह प्रकशित हुआ. उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं – (आलोचना) कुछ कहानियाँ : कुछ विचार, हिंदी आलोचना, लोकवादी तुलसीदास, देश के इस दौर में; (संस्मरण) व्योमकेश दरवेश; (आत्मकथा) नंगातलाई का गाँव. 

विश्वनाथ त्रिपाठी मनुष्य को सबसे ऊपर मानते हैं. 80 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में बातचीत करते हुए जब शशिभूषण द्विवेदी ने उनसे प्रश्न किया कि ‘जब आदमी बहत्तर साल का हो जाता है तो देवता हो जाता है, अब आप तो अस्सी के हो गए हैं. क्या लगता है देवता हो गए हैं या अभी तक मनुष्य ही हैं?’ तो उन्होंने कहा कि ‘यह बात मेरे गुरुजी हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने ‘अनामदास का पोथा’ में लिखी है कि बहत्तर साल का आदमी देवता हो जाता है. पंडितजी संस्कृत, ज्योतिष और तंत्र के भी विद्वान थे, उन्होंने ऐसा लिखा है तो संभव है कि परंपरा में ऐसी कोई बात रही हो. लेकिन मेरी समझ से यह बात उन्होंने व्यंग्य में लिखी थी. अब बहत्तर साल का रिटायर्ड आदमी किसी काम का तो रह नहीं जाता, इंद्रियाँ जवाब दे जाती हैं, जो जीना-भोगना होता है, जी-भोग लिया होता है. अब उसे पड़े-पड़े भगवद्-भजन के अलावा क्या करना है. तो ऐसे आदमी को देवता कहो या जो कहो. रही मेरी बात तो मैं मनुष्य ही बना हुआ हूँ और वही बना रहना चाहता हूँ’. अपने गुरु की भाँति विश्वनाथ त्रिपाठी मनुष्य और मनुष्यता को प्रधान मानते हैं. 

विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी जड़ों से जुड़े हुए रचनाकार हैं. उनकी कविताओं में सघन मानवीय संवेदना है. वे अपनी कविताओं में राहुल सांकृत्यायन, त्रिलोचन शास्त्री, रामविलास शर्मा, प्रेमचंद और लेनिन को याद करते हैं, साथ ही कुछ ऐसे प्रश्न उठाते हैं जो पाठकों को झकझोरते हैं – ‘मरोड़ी हुई मेरी भुजाओं/ और मेरी बिटिया की दूब-बाहों के बीच/ अधजली रोटी का यह टुकड़ा कहाँ से आ जाता है.’ उनकी कविता में अवधी की छटा भी विद्यमान है – ‘उड़त पखेरुआ हिए छॉंह परि जाइ/ परितै मनई गूँग बहिर ह्वै जाय.’ 

विश्वनाथ त्रिपाठी की रचनाओं में देश, गाँव और मनुष्य को बखूबी देखा जा सकता है. ‘देश के इस दौर में’ (1989) शीर्षक कृति के माध्यम से उन्होंने परसाई के रचना संसार को उद्घाटित करने के साथ साथ रचनात्मक मूल्य, रचनाधर्मिता और स्वातंत्र्योत्तर भारत के बनते-बिगड़ते यथार्थ का शब्दचित्र खींचा है. 

विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘नंगातलाई का गांव’ (2006) को ‘स्मृति आख्यान’ की संज्ञा दी है. इस आत्मकथा में वे बिसनाथ और नंगातलाई दो रूपों में उपस्थित हैं. इसे विलक्षण जुगलबंदी कह सकते हैं. इसके बारे में स्पष्ट करते हुए उन्होंने स्वयं कहा है कि नंगातलाई का गांव वस्तुतः विस्कोहर ही है. यदि कहा जाय कि इसके बहाने उन्होंने ग्रामीण जीवन शैली और सभ्यता की मनोरम झांकी प्रस्तुत की है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इसमें जय-पराजय, हास-परिहास, मान-अभिमान, क्रोध, प्रसन्नता, विनम्रता, अहंकार आदि सब कुछ समाहित है. यह सिर्फ ‘नंगातलाई’ या कहें ‘विस्कोहर’ का आख्यान नहीं है बल्कि यह भारत के हर गाँव का आख्यान है. इसमें ऐसे अनेक प्रसंग और चरित्र हैं, उनसे जुड़ी स्मृतियाँ हैं, अन्न और जल के संदर्भ हैं जो उस भारतीय मनीषा को झकझोरते हैं जो गाँव की जीवन शैली से अवगत है. उन्होंने इस कृति के माध्यम से गाँव की व्यथा-कथा को दर्शाया है. 

मूर्तिदेवी पुरस्कार हेतु चयित ‘व्योमकेश दरवेश’ (2011) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित विलक्षण स्मृति आख्यान है. स्वयं लेखक ने इस पुस्तक को ‘पुण्य स्मरण’ कहा है. इस पुस्तक को लिखने के पीछे निहित पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने इस प्रकार कहा है – ‘इस पुस्तक को लिखने की इच्छा मेरी बहुत पहले से थी लेकिन कभी हिम्मत नहीं कर पाता था. एक तो पंडितजी का व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उन पर लिखते हुए हमेशा डरता था कि न्याय कर पाऊँगा या नहीं. सबसे पहले इसे लिखने की इच्छा मैंने भीष्म साहनी के सामने जाहिर की थी. अज्ञेय और भीष्म साहनी के बड़े भाई बलराज साहनी पंडितजी के साथ काम कर चुके थे. फिर पंडितजी के न रहने पर मुझे उनकी याद बहुत सताती थी. उनके साथ मेरा तेईस साल लंबा साथ था. उनके परिवार की भी मुझ पर बहुत कृपा रही. छात्र जीवन में जब मैं उनके संपर्क में आया तो बहुत साधनहीन था. बहुत कम लोगों ने अपने छात्र जीवन में उतने उपवास किए होंगे जितने मुझे करने पड़े. कानपुर से बीए किया. वहाँ सिनेमा देखने का चस्का लग गया था. सो किसी तरह सेकंड डिवीजन में पास हुआ. बड़ा दु:खी हुआ और भागकर पंडितजी की शरण में आ गया. पंडितजी के बारे में बहुत सुना था. उनके पास गया तो भक्तिभाव में था, मगर उन्होंने कहा कि तुम्हें क्या पता कि मुझमें कितने दोष हैं. खैर... पंडितजी जानते थे कि भूख आदमी की अनिवार्य जरूरत है. उन्होंने खुद बहुत गरीबी देखी थी. उनके पास जाने पर वे हमेशा पूछते थे कि भोजन किया है या नहीं. भूखे तो नहीं हो. यह बात उनकी सर्जना में भी दिखाई देती है. पंडितजी शास्त्रज्ञ पंडित थे लेकिन साधारण मनुष्य के सुख-दु:ख और उनके जीवन में उनकी बहुत रुचि थी. दलित, वंचित और अभावग्रस्त मनुष्य को लेकर उनके मन में बहुत करुणा थी. वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अस्पृश्य के संदर्भ में ‘दलित’ शब्द का प्रयोग किया. पंडितजी परंपरा से जुड़े विद्वान थे लेकिन उनका दृष्टिकोण संकीर्णतारहित था. उनका मानना था कि हिंदी कोई अकेली भाषा नहीं है, वह अखिल भारतीय भाषाओं से जुड़ी है. उसका एक कांटा काशी में है तो दूसरा भुवनेश्वर में और तीसरा केरल में. इस तरह ये चीज उनके साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से जुड़ती है. हिंदी क्षेत्रों में तो लोग हिंदी के नाम पर तमाम कर्मकांड करते रहते हैं लेकिन पंडित जी ने शांतिनिकेतन में एक बांग्लाभाषी क्षेत्र में पहली बार हिंदी भवन बनवाया. वे कहते थे कि हिंदी राष्ट्रभाषा है या नहीं, यह सोचना हिंदी वालों का काम नहीं है. इस बारे में दूसरे लोग सोचें. हमारे लिए तो हिंदी मातृभाषा है. पंडितजी किसी तरह के कर्मकांड में विश्वास नहीं करते थे. अकादमिक दुनिया में भी तमाम तरह के कर्मकांड होते हैं जो पंडितजी को नहीं आते थे इसलिए वे अकादमिक दुनिया में हमेशा ही अनफिट रहे. उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय छोडऩा पड़ा तब भी कुछ ऐसी ही स्थितियाँ थीं. उनके विरोधी बहुत हो गए थे. उन्होंने विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में मीराँ पर पद्मावती ‘शबनम’ की किताब की जगह परशुराम चतुर्वेदी की किताब लगवा दी थी. बेशक परशुराम चतुर्वेदी की किताब पद्मावती ‘शबनम’ की किताब से लाख गुना बेहतर थी लेकिन जिस तरह अकादमिक कर्मकांडों को ताक पर रखकर पंडितजी ने उसे पाठ्यक्रम में लगवाया वह बहुत से लोगों को हजम नहीं हुआ और उनका बहुत विरोध हुआ. आखिरकार पंडितजी को विश्वविद्यालय से हटना पड़ा. लेकिन पंडितजी का सम्मान बहुत था. काशी विश्वविद्यालय से हटते ही उन्हें चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से बुलावा आ गया. चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में उनकी जगह प्रोफेसर पद के जो उम्मीदवार थे इंद्रनाथ मदान उन्होंने पंडितजी के कारण अपना नाम वापस ले लिया यह कहकर कि प्रोफेसर बनने से अच्छा है पंडितजी के अधीन रहकर रीडर बने रहना. तो पंडितजी का सम्मान तो बहुत था लेकिन अकादमिक कर्मकांड में वे कभी फिट नहीं हो पाए. खैर... तो पंडितजी को मैं जानना चाहता था. जिसके प्रति आपका लगाव होता है उसे आप जानना चाहते हैं. उनके प्रति एक जिज्ञासा थी. श्रद्धा में भी एक जिज्ञासा होती है जैसे प्रेम में होती है. तो उसी जिज्ञासा यानी जानने की प्रक्रिया में यह किताब लिखी गई. लिखना जानने की ही प्रक्रिया है. यही ज्ञान है, गुणकथन है, कीर्तन है. यही कविता है. तो यह एक ही प्रक्रिया के विभिन्न आयाम हैं. फार्म के स्तर पर यह किताब पंडितजी की जीवनी है लेकिन वस्तुत: यह संस्मरणात्मक जीवनी है. चूंकि पंडितजी के प्रति मेरी इतनी श्रद्धा रही है कि उन्हें लेकर मैं तटस्थ रह ही नहीं सकता इसलिए अपनी अक्षमता का मुझे बोध भी है. पंडितजी पर जैसी किताब लिखी जानी चाहिए वह तो बहुत मुश्किल है. हालांकि इस किताब को लिखने को लेकर किसी तरह के नैतिक दायित्व का भाव मुझमें नहीं रहा, बस मैं इसे लिखे बिना रह नहीं सकता था. यह एक तरह से मेरे अस्तित्व की माँग थी. इसे लिखवाने में नामवर जी और नित्यानंद तिवारी की बड़ी भूमिका रही है. मेरे लेखन पर नामवर जी का बहुत असर रहा है. पंडितजी पर किताब लिखने का पहला हक तो नामवर जी का ही था. किन्हीं कारणों से वे नहीं लिख पा रहे हैं, यह अलग बात है. फिर भी उन्होंने पंडितजी पर जो लिखा है - ‘दूसरी परंपरा की खोज’ वह बहुत महत्वपूर्ण है. उसने मुझे बहुत प्रेरित किया. इस तरह इस किताब को लिखने का बहुत बड़ा श्रेय नामवर सिंह को ही जाता है. पंडितजी के बारे में बहुत सी बातें मुझे उन्हीं से पता चलीं.’ इस स्मृति आख्यान को रचने में विश्वनाथ त्रिपाठी जी को काफी समय लगा. उन्होंने एक जगह यह भी कहा है कि ऐतिहासिक महत्व की इस रचना के सृजन के दौरान लंबे समय तक वे द्विवेदी जी की यह डाँट याद करते रहे हैं कि, ‘आलस्य प्रतिभा की खाद होती है, लेकिन तुममे खाद कुछ ज्यादा ही हो रही है.’ 

पाठक ‘व्योमकेश दरवेश’ को पढ़ते समय संस्मरण के साथ साथ आत्मकथा, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, डायरी और समीक्षा का आनंद उठा सकते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि इस कृति के बहाने विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने गुरु को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है. यह कृति निश्चित ही विश्वनाथ त्रिपाठी की शोधदृष्टि का परिचायक है. इस पुस्तक में हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन को अलग-अलग भागों में सोपानबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है. पहला भाग बचपन, बसरिकापुर और काशी तथा उनके छात्र जीवन से संबंधित है. इस भाग में प्रामाणिक जानकारी प्रदान करने के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी ने आचार्य विश्वनाथ द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, ग्रंथावली के वैयक्तिक संस्मरण खंड - ‘शांतिदूत’, नागरी प्रचारिणी पत्रिका के आचार्य केशव प्रसाद मिश्र स्मृति ग्रंथ तथा द्विवेदी जी द्वारा लिखित महत्वपूर्ण पत्रों व अन्य संदर्भों का उपयोग किया है. साथ ही द्विवेदी जी के परिवार और गाँव सब जगह से उनकी स्मृतियों को खंगाला है और इन सूत्रों को रोचक ढंग से पिरोया है.

दूसरा भाग है ‘अथेयं विश्वभारती.’ इसमें शांतिनिकेतन का प्रभाव, हिंदी भवन, विश्वभारती पत्रिका, शांतिनिकेतन का जीवन, मातृ संस्था का निमंत्रण, मन का बंधन आदि उपशीर्षकों के अंतर्गत द्विवेदी जी के जीवन की परतों को खोला गया है. तीसरा भाग है ‘काशी विश्वविद्यालय : देखी तुम्हारी काशी’. इसमें उन्होंने अध्यापक मंडल, सतीर्थ प्रकरण, ‘संदेश रासक’ प्रकरण, बना रहे बनारस हिंदी विश्वविद्यालय : हजारी प्रसाद द्विवेदी, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, साहित्य अकादमी तथा द्विवेदी जी : परिवार में जैसे उपशीर्षकों के माध्यम से बहुत ही अंतरंग और मार्मिक घटनाओं का उल्लेख किया है. आकाशधर्मा का विस्थापन, गाढ़े का साथी : पंजाब, फिर बैतलवा उसी डार पर, व्योमकेश दरवेश चलो अब - शीर्षक भागों में संवेदनशील लेखक ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के अकादमिक संघर्ष से लेकर उनके अवसान तक की घटनाओं का हृदयस्पर्शी अंकन किया है. 

विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी को जड़ों से समझा है. यदि ऐसा नहीं होता तो इस स्मृति आख्यान को लिख पाना संभव नहीं होता. द्विवेदी जी की विद्वत्ता से तो वे परिचित थे ही, साथ ही गुरु के सान्निध्य में रहकर उनकी विशेषताओं, कमजोरियों और सीमाओं को भी आत्मसात करने का अवसर उन्हें मिला था. इसलिए वे इस पुस्तक में द्विवेदी जी के जीवन की छोटी-छोटी बातों को भी प्रस्तुत कर सके हैं. उन्होंने लिखा है ‘एक कुर्ता तक बनाने के लिए घर में महाभारत मच जाता था. किंतु येन-केन-प्रकारेण काशी पहुँचकर उनकी प्रतिभा रंग लाई.’ 

हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक को बहुत महत्व देते थे. विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की पुस्तक में भी लोक जीवन का अत्यंत रोचक वर्णन है. देखें - “बनारस के आसपास की ग्रामीण औरतें लाल कत्थई रंग की साडियाँ बहुत पहनती हैं. वे घास काटतीं, घास के गट्ठर सिर पर रखे, सड़क के किनारे काम करती हुई अक्सर दिखलाई पड़तीं. ग्रामीण औरतें जब साथ-साथ चलती हैं तब चुप नहीं रहतीं. या तो गाती, या बात करती हैं, हँसी-ठट्ठा करती हैं, या फिर झगड़ा करती हैं. गुस्से में चुप रहना, न बोलना, शहराती लोगों को आता है.” 

काशी की संस्कृति के बारे में विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं कि, “काशी में विद्वत्ता और कुटिल दबंगई का अद्भुत मेल दिखलाई पड़ता है. कुटिलता, कूटनीति, ओछापन, स्वार्थ - आदि का समावेश विद्वता में हो जाता है. काशी में प्रतिभा के साथ परदुखकातरता, स्वाभिमान और अनंत तेजस्विता का भी मेल है जो कबीर, तुलसी, प्रसाद और भारतेंदु, प्रेमचंद आदि में दिखलाई पड़ता है. काशी में प्रायः उत्तर भारत, विशेषतः हिंदी क्षेत्र के सभी तीर्थ स्थलों पर परान्नभोजी पाखंड़ी पंडों की भी संस्कृति है जो विदग्ध, चालू, बुद्धिमान और अवसरवादी कुटिलता की मूर्ति होते हैं. काशी के वातावरण में इस पंडा-संस्कृति का भी प्रकट प्रभाव है. वह किसी जाति-संप्रदाय, मुहल्ला तक सीमित नहीं सर्वत्र व्याप्त है. पता नहीं कब किसमें झलक मारने लगे.” अभिप्राय यह है कि आचार्य द्विवेदी के बहाने लेखक ने ‘व्योमकेश दरवेश’ में एक ओर तो अपनी लोक-संपृक्ति को सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है वहीं दूसरी ओर भारतीय जीवन-दर्शन की मनुष्य-केंद्रीयता को अपने रचना-नायक के माध्यम से पुनः रेखांकित किया है. ऐसी बहुआयामी कृति के मूर्तिदेवी पुरस्कार हेतु चयन पर ‘स्रवंति’ परिवार की ओर से अनंत शुभकामनाएँ!!

शनिवार, 4 जुलाई 2015

‘चाँद’ का ‘फांसी’ अंक

हो जाता है शक्तिहीन जब, शासन अतिशय अविनय से।
लखता है जग बलिदानों की, पूर्ण विजय तब विस्मय से।।

‘चाँद’ का ‘फांसी’ अंक 
'चाँद' का 'फाँसी'  अंक
राधाकृष्ण प्रकाशन
1988 पहला पुस्तकाकार संस्करण
1997 द्वितीय आवृत्ति 

                              फाँसी के फंदे में डाकू कह, जो फाँसे जाते हैं;
                              उनसे बढ़कर उन लोगों को, हम अपराधी पाते हैं।
                              निरपराध जनता का रण में, जो नित रुधिर बहाते हैं; 
                              नर-घातक नृशंस हैं फिर भी, जो नरपाल कहाते हैं। 
                                                     दमन निरत दुश्मन के मन पर, क्या अधिकार जमाया है?
                                                      अगणित अबलाओं का तूने विधवा-वेश बनाया है!! 
                                                ***                              ***
                           तूने क्रूर दृष्टि से अपनी, कितने ही घर घाले हैं; 
                           अमित अशक्त अबोध सरल शिशु हा अनाथ कर डाले हैं!
                          बंधुहीन हा बंधु अनेकों, पड़कर तेरे पाले हैं, 
                         पुत्रहीन कर वृद्ध पिता को, किए स्वकर मुख काले हैं।
                                                  अरी निश्चरी सर्वनाश का, यह क्या भाव समाया है?
                                                  अगणित अबलाओं का तूने विधवा-वेश बनाया है!! 
                                                                     (‘एक राष्ट्रीय आत्मा’, फाँसी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 226) 

[1]

2006 में पत्रकारिता डिप्लोमा करते समय भारतीय पत्रिकारिता का इतिहास, प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने नाम, संपादकों के नाम आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की. उसी अवधि में कक्षा में ‘चाँद’ के ‘मारवाड़ी’ और ‘फाँसी’ अंक तथा ‘हिंदू पंच’ के ‘बलिदानी’ अंक के बारे में भी जानने का मौक़ा मिला था. लेकिन उस अवधि में उन पत्रिकाओं को पढ़ना तो दूर की बात देखा तक नहीं. लाइब्रेरी में पत्रकारिता की पुस्तकें खोजते समय एक-दो बार देखा भी, पर विशेष ध्यान नहीं दिया. लेकिन पिछले दिनों जब ‘मनमीत’ और ‘शार्प रिपोर्टर’ के संपादक अरविंद कुमार सिंह और परिलेख प्रकाशन के संस्थापक अमन कुमार त्यागी हैदराबाद आए तो मैं उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की लाइब्रेरी दिखाने ले गई. अरविंद कुमार सिंह थोड़ी देर में ‘फाँसी अंक’ के साथ प्रकट हुए. उसे देखकर मैं चौंक उठी. हम लोगों ने उस अंक की जीरॉक्स भी करवा ली. अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि ‘शार्प रिपोर्टर’ के पत्रकारिता विशेषांक के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है तो अमन कुमार त्यागी ने सुझाया कि इस पर एक छोटा-सा लेख हो जाए तो अच्छा बन पड़ेगा. उन दोनों के आग्रह से मैंने इस अंक को पढ़ना शुरू किया. पढ़ने से बहुत सारे तथ्य सामने आए. भारतीय दंड व्यवस्था और कानून के बारे में जाना ही उसके साथ ही देश-विदेश की क्रांतियों और फाँसी के विभिन्न तरीकों से भी अवगत हुई. पढ़ते समय मेरा पूरा शरीर काँप उठा. ‘चाँद’ के इस ऐतिहासिक ‘फाँसी’ अंक के बारे में आपसे कुछ साझा करना चाहती हूँ. 

[2]

साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘चाँद’ का महत्वपूर्ण स्थान है. 1922 में इस पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रारंभ हुआ था. रामरख सिंह सहगल, महादेवी वर्मा आदि इसके संपादक रहे. पत्रिका में संपादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान नियत था. ‘फाँसी’ अंक [नवंबर 1928] के ‘संपादकीय विचार’ शीर्षक स्तंभ में संपादक की यह टिप्पणी सोचने पर बाध्य करती है – ‘समाज अपराधियों को तैयार करता है. अपराधी उसके यंत्र हैं, जो उसे पूरा करते हैं. सामाजिक वातावरण अपराध के उगने का क्षेत्र है. अपराधी तो एक बीज-जंतु है, जो क्षेत्र पाने पर उग पड़ता है. प्रत्येक समाज अपने योग्य अपराधी उत्पन्न कर लेता है. अपराध की समस्या में सामाजिक कारणों का व्यक्त करना शक्य नहीं.’ (संपादकीय विचार, ‘अपराध का विकास’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 6). राजनैतिक अपराधियों के बारे में कहा गया है कि ‘ये अपराधी निस्संदेह उच्च श्रेणी के होते हैं और इनके उद्देश्य तात्कालिक समाज-स्थिति के विपरीत होते हैं. राजनैतिक अपराधी क्रांतिवाद के प्रवर्तक होते हैं. क्रांतिवाद की प्रवृत्ति में उनकी उच्च परार्थ-वृत्ति ही अधिक होती है.’ (वही). 

यह भी ध्यान देने की बात है कि ‘चाँद’ के संपादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे. इसके साथ ही कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित करते थे जो समाज में स्त्रियों की स्थिति को उजागर करते थे. इसमें साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनैतिक विषय स्थान पाते थे. ‘चाँद’ के ‘फाँसी’ अंक में ‘दुबे की चिट्ठी’ नाम से प्रकाशित एक पत्र का छोटा-सा अंश देखें – 
                    ‘अजी संपादक जी महाराज, 
                                             जयराम जी की! 
                  आप ‘फाँसी-अंक’ निकालने जा रहे हैं? फाँसी पर इतनी खफगी? आखिर आप फाँसी से इतने नाराज                    क्यों हैं, पहले यह बताइए!’ 

इस पर संपादकीय टिप्पणी इस प्रकार है – 
‘मेरी क्षुद्र-बुद्धि में तो यही आता है कि फाँसी का दंड अनावश्यक होने के साथ ही साथ हिंसा तथा बर्बरता का द्योतक है. इसके विरुद्ध पाश्चात्य देशों के अनेक विद्वानों ने बहुत-कुछ लिखा है. अनेक पाश्चात्य  देशों में मृत्यु-दंड की अमानुषिक प्रथा उठती जा रही है. इस संबंध में प्रभावशाली आंदोलन हो रहे हैं! जब संसार अन्य बातों में सभ्यता की मूर्ति बन रहा है तो भारतवर्ष को इस विषय में सभ्यता का परिचय देना  चाहिए.’ (दुबे की चिट्ठी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 162) 

[3]

स्मरणीय है कि ‘फाँसी’ अंक का ऐतिहासिक महत्व है. पत्रिका के तेवर के बारे में क्या कहना. ‘फाँसी’ अंक पढ़ने से पता चलता है कि इसका तेवर तो ऐसा है कि बड़े बड़ों तक को चुनौती देने में कोई हिचक नहीं. इस संदर्भ में नरेशचंद्र चतुर्वेदी का कथन उल्लेखनीय है – ‘यों तो ‘चाँद’ अपनी विचारोत्तेजक शैली एवं नए भावबोध के कारण सभी से अलग विशिष्ट प्रकार का मासिक पत्र था. देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सभी प्रकार की सामग्री को इसमें प्रकाशित किया जाता था. अंग्रेजी राज के विरुद्ध भी उसका दृष्टिकोण बहुत साफ था और मैं समझता हूँ ‘फाँसी’ अंक उसी की चरम परिणति था. ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक जैसे प्रसिद्ध हुआ था उसी प्रकार ‘चाँद’ का ‘मारवाड़ी’ अंक भी बड़ा प्रसिद्ध हुआ था, परंतु तब अपने ही भाइयों के एक वर्ग और जाति के विरुद्ध सामग्री होने के कारण उसको वह स्थान नहीं मिल पाया जो ‘फाँसी’ अंक को मिला.’ (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, भूमिका, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1988 पहला पुस्तकाकार संस्करण, 1997 द्वितीय आवृत्ति). 

[4]

1928 नवंबर में दीवाली के अवसर पर ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक प्रकाशित हुआ था जो सवा तीन सौ पृष्ठों का था. यह ‘चाँद’ के सातवें वर्ष का प्रथम अंक था. इस अंक में फाँसी पर चढ़ाए गए शहीद पत्रकारों के जीवनवृत्त तो हैं ही, साथ ही फ्रांस की स्त्रियों, यूरोप, स्कॉटलैन्ड, रोम आदि प्रसिद्ध देशों के नायक-नायिकाओं के बलिदानों की कहानी से संबंधित सामग्री, विभिन्न देशों की क्रांतियों का इतिहास और उनके चित्र भी अंकित हैं. फ्रांस की राज्यक्रांति, 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता विद्रोह, प्राणदंड की क्रूरता आदि की जानकारी भी उपलब्ध है. यह अंक वास्तव में दस्तावेजी महत्व का है. इस अंक में भले ही ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खुला विद्रोह और बगावत की बात नहीं कही गई परंतु इस अंक में संकलित सामग्री प्रामाणिक, ऐतिहासिक और मार्मिक सामग्री है जो प्रकारांतर से विद्रोह और बगावत को बढ़ाने वाली है. इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने ‘चाँद’ के इस अंक को ज़ब्त कर लिया था. इस अंक का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि अमर शहीद सरदार भगतसिंह ने छद्म नाम से इस अंक में अनके लेख लिखे हैं. ध्यान देने की बात है कि बलवंत सिंह, युवक और विद्रोह आदि छद्मनामों से भगत सिंह ‘मतवाला’, ‘प्रताप’ आदि अनेक पत्रिकाओं में लेख लिखते थे. 

‘फाँसी अंक में जो महत्वपूर्ण सामग्री संकलित है उसे पाठक यदि ध्यान से पढ़ेंगे तो यह भलीभाँति समझ सकेंगे कि देश की आजादी के लिए कुर्बान होने वाले अनेक साहसी वीरों ने कैसे अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, कैसे उनके विचार थे और अपने देश के भविष्य को वे कैसा देखते थे. इस अंक में कई ऐसी विशेषताएँ भी हैं जो स्मरण करने योग्य हैं. क्रांतिकारियों ने अपने को गोपन रखकर यह प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करने के लिए किस तरह का जोखिम उठाया होगा! यह कम आश्चर्य की बात नहीं है. उनके बाद उनके संबंध में सही जानकारी देने वाले भी तो नहीं रह जाते. इस अंक में जिन आधुनिक फाँसी चढ़ने वाले वीरों का ब्यौरा दिया गया है 'उनमें से कुछ रेखाचित्र सरदार भगतसिंह ने जेल की काल-कोठारी से लिखकर भेजे थे. उन्होंने डॉ. मथुरासिंह और बलवंत सिंह के छद्म नामों से भी कुछ लेख लिखे थे. इस प्रकार की बहुत-सी सामग्री इस अंक में है. (आलेखों के) नीचे जो नाम दिए गए हैं, वे छद्म नाम हैं और उनके बारे में यह कहना कठिन है कि उनमें से कौन-से सरदार भगतसिंह के हैं और कौन-से अन्य व्यक्तियों के हैं.’ (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, भूमिका) 

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‘फाँसी’ अंक ने एक ओर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए प्राणों का बलिदान आवश्यक माना है तो दूसरी ओर भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में प्राणदंड/ फाँसी को क्रूर, अमानुषिक और पाशविक व्यवहार घोषित किया है. यही इस अंक का मूल स्वर है. इस अंक का संपादकीय निश्चित ही क्रांति के व्यावहारिक पहलू की सार्थकता को सिद्ध करता है. संपादकीय का शीर्षक है ‘क्रांतिवाद’. उसका एक अंश यहाँ प्रस्तुत करना समीचीन होगा. ‘फाँसी’ अंक के संपादक के रूप में आचार्य चतुरसेन शास्त्री यह लिखते हैं कि ‘क्रांति एक स्थिर सत्य है. पर यह बात सर्वथा असंभव है कि सत्य सब अवस्थाओं में मधुर और दर्शनीय हो. भावनाओं का मूल्य वास्तव में विपत्ति है, और कोई भी सद्भावना उतनी ही ऊँची उतरती है, जितनी कि विपत्तियों में वह स्थायी रहती है. सद्भावनाएँ भी कभी-कभी देखने में कुत्सित और भीषण हो जाती हैं. जैसे खोटे सोने से खोटापन निकालने को जब उसे तेज़ाब में पकाते हैं, तब उसका जैसा वीभत्स, मैला और भीषण रूप बनता है, वैसे ही जब सत्य कलुषित स्वार्थों से पद-दलित होता है तो विशुद्ध होने के लिए सत्य को भीषण बनना पड़ता है. क्रांति भी सत्य का एक भीषण रूप है. वह चाहे जैसी भयानक क्यों न हो, सदा सत्य की पवित्रता और शांति की पुनर्रचना के लिए ही होती है. ‘क्रांति’ एक बड़ा डरावना शब्द है. शांतिप्रिय लोग, चाहे वे कितने ही संपन्न और सशक्त क्यों न हों, क्रांति के नाम से डरते हैं. कोई राजसत्ता चाहे कैसी ही उदार क्यों न हो, उसने क्रांति को तत्क्षण बलपूर्वक दबा देने के लिए कड़े से कड़े कानून पहले ही से बना रक्खे हैं. मतलब यह कि राजा और प्रजा दोनों ही क्रांति के नाम से काँपते हैं और क्रांति के बीज को तत्काल नष्ट कर देने में सबसे अधिक व्यग्रता तथा तत्परता दिखाते हैं. इतना सब है, फिर भी संसार के सभी सभ्य राज्यों में – अच्छे से अच्छे ज़मानों में, भारी से भारी शक्ति के सामने समय-समय पर क्रांति बराबर हुई, और यद्यपि तत्कालीन सत्ताधारियों ने क्रांति के नेताओं को फाँसी देने, सूली पर चढ़ाने, गर्दन काटने, जीता जलाने, विष पिलाने और आजन्म कारावास के निर्दय और चरमसीमा के दुःख दिए हैं, परंतु बाद में इतिहास ने उन्हें मुक्तकंठ से धर्मात्मा और निर्दोष माना है.’ (संपादकीय विचार, ‘क्रांतिवाद,’ ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 8,9).

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‘फाँसी’! मात्र कल्पना से ही पूरा शरीर काँप उठता है. इतिहास गवाह है कि इंग्लैंड में ‘6 वर्ष का बालक ढाई आने का रंग चुराने के अपराध में फाँसी पर चढ़ाया गया था!’ (संपादकीय विचार, ‘फाँसी’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 13). यहाँ तक कि भेड़ें और पोस्ट-ऑफिस की चिट्ठियाँ चुराने के अपराध में भी व्यक्तियों को फाँसी पर लटका दिया जाता था!!! आज भी फाँसी की सजा का औचित्य विवाद का ही विषय है. ‘फाँसी’ अंक में प्रकाशित ‘फाँसी के भिन्न-भिन्न तरीके’ (रमेशप्रसाद) शीर्षक लेख फाँसी देने की क्रूर प्रथा को आँखों के सामने चित्रों के माध्यम से उकेरता है. 12 चित्र हैं. अर्थात 12 अलग-अलग अमानुषिक तरीके. ‘कहा जाता है कि 600 प्रकार के फाँसी देने के यंत्र आविष्कृत हुए हैं और उनमें कई तो बड़े विचित्र हैं.’ (रमेशप्रसाद, ‘फाँसी के भिन्न-भिन्न रूप’, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 142). फाँसी देने का अर्थ है मनुष्य का प्राण हरण. अक्सर फिल्मों में दिखाते हैं - गले में रस्सी डालकर, कुत्तों या मगरमच्छों से नुचवाकर, पत्थरों से मारकर, जीवित समाधि बनाकर, विष पिलाकर, सिर पर पानी डालकर, गरम तेल की कड़ाही में डालकर, पानी में डुबोकर, क्रॉस में लटकाकर, घोड़ों के पीछे बाँधकर, कीलों पर सुलाकर आदि आदि आदि तरीकों से व्यक्ति को मरने की कोशिश की जाती है. स्त्रियों को फाँसी देने के लिए ‘डकिंग स्टूल’ का प्रयोग किया जाता था. इस तरीके में अपराधी को एक कुर्सी पर बैठा दिया जाता था और कुर्सी को अपराधी सहित पानी में डुबोकर बाहर निकाला जाता था. पानी में अपराधी को रखने का समय धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था. अंत में जल समाधि. कितनी भयानक यातना. ध्यान देने की बात है कि इतना होने पर भी देशभक्त क्रांतिकारी अपने प्राणों की आहुति देने से पीछे नहीं हटे. लेखकों/पत्रकारों ने भी बराबर अपनी लेखनी के माध्यम से सरकार को चुनौती दी. आने वाली पीढ़ी के समक्ष अद्भुत मिसाल कायम की. 

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स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ पुरुष ही नहीं थे महिलाएँ भी थीं. हर क्षेत्र में उस समय स्त्री सशक्त थी. देश की आजादी के लिए अपने आपको होम करने में अग्रणी थी. ‘फाँसी’ अंक में 1857 के कुछ संस्मरण भी दर्ज हैं. उन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि कैसे अंग्रेजी सेना ने गाँवों को जलाकर श्मसान बना दिया, बगावत का संदेश फैलाने वाले हिंदुस्तानी सिपाहियों को तोप से कैसे उड़ा दिया गया और असहाय स्त्रियों और बच्चों का संहार कैसे किया गया. इतिहास-लेखक जॉन का संस्मरण पढ़कर मेरा मन द्रवित हो उठा. वे लिखते हैं, ‘बूढ़ी औरतों और बच्चों का उसी तरह वध किया गया है, जिस प्रकार उन लोगों का, जो विप्लव के दोषी थे. इन लोगों को सोच-समझकर फाँसी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें उनके गाँव के अंदर जलाकर मार डाला गया; शायद कहीं-कहीं उन्हें इत्तिफाकिया गोली से भी उड़ा दिया गया. *** सड़कों के चौरास्तों पर और बाजारों में जो लाशें टंगी हुई थीं, उनको उतारने में सूर्योदय से सूर्यास्त तक मुर्दे ढोने वाली आठ-आठ गाडियाँ बराबर तीन-तीन महीने तक लगी रहीं और इस प्रकार एक स्थान पर छह हजार मनुष्यों को झटपट खतम करके परलोक भेज दिया गया.’ (सन 57 के कुछ संस्मरण, ‘चाँद’ का ‘फाँसी’ अंक, पृ. 149-150). अंग्रेजों ने ही नहीं बल्कि भारतवासियों ने भी अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों की हत्या की. 15 जुलाई, सन 57 की इस घटना को भारतीय विप्लवकारियों के नाम पर सदा के लिए कलंक के रूप में याद किया जाता है. ‘बीबीगढ़ (कानपुर) के 125 अंग्रेज कैदी स्त्रियाँ और बच्चे कत्ल कर डाले गए और 16 तारीख को सवेरे उनकी लाशें एक कुँए में डाल दी गईं.’ (वही, पृ. 156). बूढ़े, स्त्रियाँ और बच्चे चाहे अंग्रेज हों या भारतीय, वे तो असहाय और निरीह होते हैं. उनका वध करना सच में शर्मनाक बात है. 

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रघुवीर सिंह का आलेख ‘फ्रांस की राज्यक्रांति के कुछ रक्त रंजित पृष्ठ’ तथा त्रिलोचन पंत का आलेख ‘फ्रांस में स्त्रियों का प्राण-दंड’ पढ़ें तो फ्रांस के रक्त रंजित इतिहास का पता चलता है. शोलित कोर्दे, मेरी आंत्वानते, मादाम रोलाँ आदि को फ़्रांस की क्रांति में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी. उस समय तो तत्कालीन शासक खून के प्यासे थे. फाँसी देना या किसी को मौत के घाट उतराना उनके लिए आम बात थी. लेकिन क्रांतिकारी निडर थे. हर देश में हर समय क्रांतिकारी निडर होकर अपने लक्ष्य पर डटे रहे. आजादी से पहले तत्कालीन पत्रकारों ने भी ईमानदारी, निडरता और देशभक्ति का प्रमाण दिया. फाँसी के डर से वे अपने लक्ष्य से नहीं भटके बल्कि खुशी-खुशी फाँसी के तख्ते पर चढ़ गए और बलिदान हो गए. 

                                   देश-दृष्टि में, माता के चरणों का मैं अनुरागी था।
                                                   देश-द्रोहियों के विचार से, मैं केवल दुर्भागी था।।
                                   माता पर मरने वालों की, नज़रों में मैं त्यागी था।
                                                  निरंकुशों के लिए अगर मैं, कुछ था तो बस बागी था।।

                                  देश-प्रेम के मतवाले कब, झुके फाँसियों के भय से।
                                                 कौन शक्तियाँ हटा सकी हैं, उन वीरों को निश्चय से।।
                                  हो जाता है शक्तिहीन जब, शासन अतिशय अविनय से।
                                                 लखता है जग बलिदानों की, पूर्ण विजय तब विस्मय से।।

                                  वीर शहीदों के शोणित से, राष्ट्र-महल निर्माण हुए।
                                                उत्पीड़क बन राजकुलों के, भाग्य-दीप निर्वाण हुए।।
                                  माता के चरणों पर अर्पित, जिन देशों के प्राण हुए।।
                                                रहे न पल भर पराधीन फिर, प्राप्त उन्हें कल्याण हुए।।
                                                                                              (शोभाराम जी ‘धेनुसेवक’, फाँसी के तख्ते से) 

शनिवार, 20 जून 2015

एक दिन पिता के लिए

यों तो भारत में पूर्वजों के स्मरण और तर्पण के लिए प्रति वर्ष एक पक्ष निर्धारित है – पितृपक्ष. जो हमसे पहले गुजर गए उनके प्रति हम अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं और कामना करते हैं कि वे सब दिवंगत आत्माएँ शांति को उपलब्ध हों. लेकिन पिता के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए एक और अच्छा अवसर ‘पिता के दिन’ (फादर्स डे) के रूप में हमारे सामने है. दरअसल इस दिन को मनाने की शुरूआत एक दुर्घटना से हुई. फादर्स डे सबसे पहले पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंट में 5 जुलाई 1908 को मनाया गया था. कई महीने पहले 6 दिसंबर 1907 को मोनोंगाह, पश्चिम वर्जीनिया में एक खान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं के सम्मान में इस विशेष दिवस का आयोजन श्रीमती ग्रेस गोल्डन क्लेटन ने किया था. यह कारण अब अतीत की वस्तु हो चुका है और सहज रूप में पिता-दिवस संतानों के लिए यह महसूस करने का दिन बन गया है कि पिता हमारे लिए अपनी सब सुख-सुविधाओं को वार कर हमारे जीवन को सँवारने में लगे रहते हैं. साथ ही यह दिन पिता के समक्ष यह प्रकट करने का भी दिन है कि हमें आपके स्नेह, त्याग और छत्रछाया का गहरा आभास है, हम जो कुछ हैं आप के रचे हुए हैं तथा भले ही हमने आज तक कभी इसे व्यक्त न किया हो परंतु हम अपने पूरे अस्तित्व से आपको प्यार करते हैं. 

पिता हमसे क्या चाहते हैं? वे हमें दुनिया में लाए क्यों? वे हमारा इतना ख्याल क्यों रखते हैं? वे अपने तमाम कष्टों और पीड़ाओं को बड़ी कठोरता से आखिर क्यों अपनी छाती में समेटकर रखते हैं? एक पिता को आखिर संतान से चाहिए क्या? जिसने अपने सारे सामर्थ्य से हमें गढा और इस योग्य बनाया कि तमाम तरह की विपरीत हवाओं के बीच हम खड़े रह सकें, हरे रह सकें, फलते-फूलते रह सकें; भला उसे हम दे भी क्या सकते हैं? दे सकते हैं. अवश्य दे सकते हैं. स्वार्थहीन, निष्कुंठ प्रेम! पिता की भूमिका ही कुछ ऐसी होती है कि उसे अपने आपको पत्थर जैसा दिखाना पड़ता है. संतानें अगर इस पत्थर में धड़कते दिल को छूती रहें तो फिर पिता को और चाहिए क्या? लेकिन कितने पिता ऐसे सौभाग्यशाली हैं जिनकी संतानें यह पहचानती हों कि पिता कठोरता के कवच में लिपटा हुआ नवनीत है – पल पल द्रवित. 

पिता-दिन हमें एक अवसर देता है कि हम उछलकर एक बार फिर नन्हे बालक बनकर पिता के गले से लिपट जाएँ और दो पीढ़ियों के बीच जमी हुई बर्फ के पूरी तरह पिघल जाने तक इसी तरह लिपटे रहें. सारे शब्द उस पुलक स्पर्श के सामने सामर्थ्यहीन हैं जो हमारे बालों में घूमती हुई पिता की अंगुलियाँ हमें दे जाती है. 

यहाँ मुझे एक घटना याद आ रही है. 7 सितंबर, 2013 को डॉ. ऋषभदेव शर्मा के कविता संग्रह ‘सूँ साँ माणस गंध’ का लोकार्पण करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कविता के रूप में जिस कविता की चर्चा की थी वह पिता और संतान के संबंध पर ही केंद्रित है. पिता-दिन के अवसर पर ‘स्रवंति’ के पाठकों के लिए वह कविता यहाँ साभार उद्धृत की जा रही है –

भाषाहीन 

मेरे पिता ने बहुत बार मुझसे बात करनी चाही
मैं भाषाएँ सीखने में व्यस्त थी
कभी सुन न सकी उनका दर्द
बाँट न सकी उनकी चिंता
समझ न सकी उनका मन

आज मेरे पास वक़्त है
पर पिता नहीं रहे
उनकी मेज़ से मिला है एक ख़त

मैं ख़त को पढ़ नहीं सकती
जाने किस भाषा में लिखा है
कोई पंडित भी नहीं पढ़ सका

भटक रही हूँ बदहवास आवाजों के जंगल में
मुझे भूलनी होंगी सारी भाषाएँ
पिता का ख़त पढ़ने की खातिर 

बुधवार, 17 जून 2015

खोज

बालकनी में बैठकर
आसमान को ताकना कितना भला लगता है!
अभी कल की ही बात है,
काले काले बादलों को देख
रोमांचित हो उठी थी मैं.

अचानक बिजली चमक उठी
कभी दाएँ - कभी बाएँ.
मेरा दिल धड़क सा गया.
तुम्हें ढूँढ़ने लगी.
ढूँढ़ने से तुम कभी नहीं मिलते,
कल भी नहीं मिले.

तुम ठहरे बादल
कभी यहाँ बरसे कभी वहाँ
कभी धरती की प्यास बुझाई
कभी पर्वत शृंखलाओं से खेले

वर्षा थम गई
आज वातावरण शांत है
धूप खिल आई है
मेरा मन भरा है कोलाहल से
तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ हर दिशा में
ढूँढ़ने से तुम कभी नहीं मिलते,
आज भी नहीं मिले!

बगिया फूल उठी है
मैं तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ
भँवरा कलियों पर मंडरा रहा है
फूलों का रस पी रहा है.
यह तुम्हीं तो नहीं?
तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ
गली-गली कली-कली
ढूँढ़ने से तुम कभी नहीं मिले.
कभी तो मिलो -
खुद ढूँढ़कर!